प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एंटी पेपर लीक बिल पर लोक सभा में बहस के समय जिस तरह ‘इडियट’, ‘अंधभक्त’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, उसे किसी भी सूरत में शालीन नहीं कहा जा सकता. इसके बाद राहुल ने अगला तीर छोड़ा. उन्होंने सीधे अमित शाह पर वार किया और कहा कि छात्रों पर फायरिंग का आदेश गृह मंत्री ने दिया था, उनके हुक्म पर ही पुलिस ने छात्रों पर फायरिंग की. राहुल ने कहा कि अमित शाह डरे हुए हैं, इसलिए वह सदन में नहीं आए.
प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज, टियर गैस, पैलेट गन का इस्तेमाल, पुलिसवालों पर पथराव, पुलिसवालों का ज़ख्मी होना, ये सारी बातें बीसियों बार कही जा चुकी हैं. लेकिन संसद में मुश्किल तब हुई, जब राहुल गांधी ने बिना किसी किंतु-परन्तु के आरोप लगा दिया कि छात्रों पर गोली चलाने का आदेश अमित शाह ने दिया. अगर राहुल गांधी यही बात सोच समझ कर नपे-तुले शब्दों में कहते, चतुराई से सवाल उठाते, तो सरकार को जवाब देना पड़ जाता. लेकिन राहुल गांधी ने ये कहकर कि उन्होंने संसद में अमित शाह की 30 गाड़ियों का काफिला देखा, कार में बैठे अमित शाह के हाथ कांप रहे थे, सारी बातों को हल्का बना दिया.
अमित शाह के बारे में कोई जो चाहे कहे, उन्हें डरपोक कोई नहीं कहेगा. जो लोग अमित शाह को नहीं भी जानते, उन्हें भी पता है कि अमित शाह कांपने वालों में नहीं, दूसरों को कंपाने वालों में हैं. टेंशन लेने वालों में नहीं, टेंशन देने वालों में हैं. संसद में राहुल के भाषणों का एक फार्मूला है, एक पैटर्न है. विषय से भटकाना, बेमतलब की कहानियां सुनाना, दूसरों का मज़ाक़ उड़ाना, अपने आस-पास बैठे सांसदों को हंसाना, दूसरों को डरपोक और अपने आप को बहादुर बताना, ऐसी ऐसी बातें कहना जो सामने वालों को उत्तेजित करें, फिर शोर मचे तो ये कहना कि मुझे बोलने नहीं दिया जाता.
राहुल गांधी को अगर वाकई बोलना है तो उन्हें प्रियंका गांधी से सीखना चाहिए. परसों प्रियंका गांधी ने मुस्कुरा-मुस्कुरा कर सरकार पर ज़बरदस्त हमला किया, उन्हें किसी ने नहीं रोका. दूसरे दिन राहुल गांधी के पास अच्छा-खासा मौका था सरकार को घेरने का, छात्रों का समर्थन करने का, शिक्षा प्रणाली में सुधारों के लिए सुझाव देने का, लेकिन वो अपने ही जाल में फंसकर रह गए, मौका गंवा दिया, सरकार को मौका दे दिया, बीजेपी को हमला करने का मसाला दे दिया.
पेपर लीक किसी एक राज्य का मसला नहीं
पेपर लीक और परीक्षा में चीटिंग की घटनाएं बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, पंजाब में भी हुई है. बिहार में ढाई साल पहले 88 हजार शिक्षकों की भर्ती की परीक्षा हुई थी लेकिन बीपीएससी TRE-3 का पेपर लीक हो गया. 296 आरोपी पकड़े गए. ढाई साल बाद कल पुलिस ने एक और आरोपी डॉक्टर मनीष कुमार को गिरफ्तार किया. सोचने वाली बात है कि मार्च 2024 में जो परीक्षा हुई, उसी दिन आर्थिक अपराध शाखा ने दो दर्जन से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन ढाई साल बीत गए, पर जांच पूरी नहीं हुई. ज्यादातर आरोपियों को जमानत मिल चुकी है.
पिछले महीने महाराष्ट्र में TET का पेपर लीक हुआ. उसमें भी अभी तक जांच ही चल रही है. ठाणे पुलिस ने कल खुलासा किया कि TET का पेपर आगरा की प्रेस में प्रिंट हुआ था और ये पेपर प्रेस से ही लीक हो गया. प्रिंटिंग प्रेस में काम कर चुके सोनू कुमार दिवाकर ने प्रेस के दो कर्मचारियों के साथ मिलकर पेपर लीक किया. सोनू कुमार ने सोमवार को पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. इस केस में अब तक कुल पंद्रह लोग पकड़े जा चुके हैं लेकिन अभी भी एक आरोपी फरार है. अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है, चार्जशीट फाइल नहीं हुई है लेकिन सियासत जमकर हो रही है.
झारखंड लोक सेवा आयोग के Mains पेपर की परीक्षा 25 से 27 जुलाई तक होने वाली थी, लेकिन इसे अचानक स्थगित कर दिया गया. वो इसलिए कि 19 अप्रैल को प्रिलिम्स की जो परीक्षा हुई थी, उसमें गड़बड़ी पाई गई. दो जुलाई को प्रीलिम्स का रिजल्ट आया तो पता लगा कि ऐसे उम्मीदवार भी पास हो गए जिन्होंने सिर्फ 48 सवालों के जवाब दिए थे. पास होने वालों में 400 से ज्यादा परीक्षार्थी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के थे.
मामले का खुलासा हुआ तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने इसकी जांच सीआईडी को दी. सीआईडी दो दिन से JPSC के पूर्व अध्यक्ष एल. ख्यांग्ते से पूछताछ कर रही है. लेकिन बीजेपी आरोप लगा रही है कि मामले को दबाया जा रहा है. ऐसे में इसकी जांच सीबीआई को देने की मांग की जा रही है. पंजाब में फार्मेसी अफसरों के पद के लिए हुई परीक्षा में छात्र ब्लूटूथ का इस्तेमाल करते हुए पकड़े गये. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने कहा कि पंजाब में 6 पेपर लीक हो चुके हैं, पांच लाख से ज्यादा छात्र प्रभावित हुए हैं.
फार्मेसी अफसर की भर्ती में धांधली हुई, लेकिन सरकार मानने को तैयार नहीं है. महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और पंजाब से आई पेपर लीक की खबरें इस बात की गवाह हैं कि पेपर लीक का मसला न तो किसी एक राज्य का है, न किसी एक सरकार का, न किसी एक मंत्री का. पिछले 20-25 साल में माफिया ने अपना जाल बिछाया. पेपर लीक को काली कमाई का धंधा बनाया. इस माफिया की जड़ें गहरी हैं. इनको बहुत सारे भ्रष्ट कोचिंग सेंटर्स की मदद मिली हुई है. अभी जो कानून है उसमें बेल मिल जाती है, पेपर लीक का पाप करने वाले छोटी-मोटी सज़ा पाकर बच जाते हैं, इसीलिए उनकी हिम्मत बढ़ती रही. उन्हें किसी का डर नहीं था.
ज़रूरत ऐसे कानून की है जो ऐसे माफिया के दिलोदिमाग़ में खौफ पैदा करे. संसद ने कानून में जो संशोधन किया है, उससे यही अपेक्षा है. लेकिन इसके साथ-साथ ये भी जरूरी है कि परीक्षाओं की पूरी प्रणाली को दुरुस्त किया जाए. सरकार ने नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में जो कमेटी बनाई है, वह कमेटी यही काम करेगी. इस कमेटी की सिफारिशों के आधार पर जो कदम उठाए जाएंगे, उससे एक नया सिस्टम बनेगा जिससे छात्रों पर परीक्षा मे पेपर लीक होने का दबाव कम होगा और पारदर्शिता आएगी.
