Rajat Sharma

My Opinion

‘कुछ ताकतें’ क्यों नहीं चाहतीं कि धरने पर बैठे किसान घर लौटें

AKB30 केंद्र और किसान यूनियन के नेताओं के बीच चल रही बातचीत शुक्रवार को उस वक्त बेपटरी हो गई जब किसान नेताओं ने सरकार से साफ कह दिया कि वे तीनों विवादास्पद कानूनों को निरस्त करने के अलावा और किसी और चीज पर सहमत नहीं होंगे। वहीं, केंद्र सरकार ने भी यह कहते हुए अपना रुख सख्त कर लिया कि तीनों कानूनों को डेढ़ साल के लिए स्थगित करने के प्रस्ताव से बेहतर दूसरा कोई विकल्प नहीं है और कानूनों को निरस्त करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर शुक्रवार को हुई बैठक के बाद दुखी नजर आए। उन्होंने कहा, ऐसा लगता है कि कुछ ताकतें नहीं चाहती कि कोई हल निकले और उनकी पूरी कोशिश आंदोलन को लंबा करके अपने खुद के राजनीतिक हितों को साधने की है। अगले दौर की बातचीत के लिए कोई नई तारीख भी तय नहीं की गई, जिससे यह साफ इशारा मिला कि अब पूरा मामला बेपटरी हो गया है।

शुक्रवार की बैठक में मंत्रियों ने किसान नेताओं से बार-बार अनुरोध किया कि वे कृषि कानूनों को स्थगित रखने के सरकार के प्रस्ताव पर दोबारा गौर करें लेकिन बात नहीं बनी। किसान नेताओं ने साफ कह दिया कि नए कृषि कानूनों को निरस्त किए बगैर बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी। इस पर सरकार ने भी कह दिया कि कानूनों को स्थगित करना ही एकमात्र संभव हल है और इसके अलावा कोई दूसरा प्रस्ताव नहीं है।

शुक्रवार को किसानों के साथ 11वें राउंड की मीटिंग हुई थी। मुझे याद है कि दसवें दौर तक की हर बातचीत के अंत में तोमर मुस्कुराते हुए निकलते थे और कहते थे कि उन्हें अभी भी उम्मीद है कि मामले का हल निकलेगा। लेकिन शुक्रवार की बातचीत के बाद उनके चेहरे पर दुख और निराशा नज़र आई। तोमर परेशान क्यों थे, बातचीत फेल क्यों हुई, इसका संकेत भी उन्होंने मीटिंग के बाद दे दिया। उन्होंने कहा, ‘जब आंदोलन की पवित्रता खत्म हो जाती है, जब स्वार्थी लोग हावी हो जाते हैं, तो यही होता है।

किसान संगठनों ने गुरुवार की शाम को ही ऐलान कर दिया था कि उन्हें सरकार का प्रस्ताव मंजूर नहीं है, इसलिए यह तभी तय हो गया था कि शुक्रवार की मीटिंग में क्या होना है। शुक्रवार को बातचीत नाकाम होने के बाद ज्यादातर किसान नेता भी खुश नहीं दिखे।

एक किसान नेता ने कहा कि वे शनिवार को दोपहर 12 बजे तक विचार करेंगे और फिर से सरकार को बताएंगे, लेकिन इतना तो तय है कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड जरूर होगी। एक अन्य हार्डलाइनर किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा कि बैठक तो आधे घंटे के भीतर तभी खत्म हो गई थी, जब मंत्रियों ने उनसे ये कहा कि कानूनों को सस्पेंड करना ही एकमात्र बेस्ट ऑफर है और यह किसानों को ऊपर है कि वे क्या तय करते हैं। मंत्री मीटिंग से यह कहकर चले गए कि किसान संगठन आपस में बात कर लें। चढ़ूनी ने कहा, ‘बातचीत तो आधे घंटे में ही खत्म हो गई थी, उसके बाद तो सरकार ने किसानों को बेकार में बिठाकर रखा।’

लेफ्ट की तरफ झुकाव रखने वाले किसान नेता हन्नान मोल्लाह, जो कि प्रत्येक दौर की बातचीत के बाद मीडिया से रूबरू होते हैं, भी उदास दिखे। शुक्रवार को उन्होंने कहा, ‘हम क्या कर सकते हैं? कोई फैसला नहीं हुआ। अब कल 12 बजे तक सरकार को हम अपनी राय बताएंगे।’

उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, ‘हम एक बार फिर से सरकार के प्रस्ताव पर विचार करेंगे। अगर सरकार से बात करनी होगी तो करेंगे, नहीं तो आंदोलन चलता रहेगा।’ भारतीय किसान यूनियन के एक अन्य नेता युद्धवीर सिंह ने कहा, ‘अब फिलहाल बातचीत के रास्ते बंद हो गए हैं। सरकार ने कह दिया है कि ये आखिरी मीटिंग है। अगर सरकार कानूनों को वापस नहीं लेती तो किसान आंदोलन इसी तरह जारी रहेगा।’

मुझे लगता है कि सरकार ने डेढ़ साल तक किसान कानूनों को स्थगित करने का जो प्रस्ताव दिया था, उसके पीछे किसान नेताओं को बीच का रास्ता देने की मंशा थी ताकि आंदोलन भी खत्म हो जाए और आंदोलन करने वाले नेताओं की साख भी बची रहे। इसमें सरकार की तरफ से न तो कोई राजनीतिक पैंतरेबाजी थी, न कोई छल-कपट था। पर्दे के पीछे जिन किसान नेताओं से बात हुई थी, उन्होंने भरोसा दिलाया था कि अगर ऐसा ऑफर दे दिया जाए तो बात बन जाएगी।

लेकिन किसान संगठनों के नेताओं ने गुरुवार और शुक्रवार को जिस अंदाज में जवाब दिए, उससे लगा कि वे उन लोगों के दबाव में आ गए हैं जो टकराव चाहते हैं। जब किसी आंदोलन को कोई एक नेता नहीं होता तो इसी तरह की स्थिति पैदा होती है। यह भी साफ दिखाई दिया कि कई संगठन, कई किसान नेता समझते हैं कि सरकार ने जो ऑफर दिया उससे किसानों को फायदा होगा। लेकिन किसान नेताओं के बीच कुछ ऐसे भी तत्व हैं जो किसानों के फायदे की बजाए राजनीतिक फायदे के बारे में सोचते हैं। ये लोग सरकार को डराना चाहते हैं, नीचा दिखाना चाहते हैं। ये बीच के किसी भी रास्ते को मानने के लिए तैयार नहीं हैं और चाहते हैं कि आंदोलन जारी रहे। ये लोग बार-बार 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च निकालने की धमकी देते हैं। इनका एकमात्र मकसद सरकार पर दबाव बनाना है।

मुझे यह भी पता चला कि किसानों के बीच कई नेता ऐसे हैं जो नहीं चाहते कि ट्रैक्टर मार्च निकले और गणतंत्र दिवस के जश्न में खलल खलल पड़े, लेकिन जो हालात हैं उसमें किसानों से इस मार्च को रोकने की बात भी नहीं कर सकते। इसलिए जो किसान नेता कहते हैं कि ट्रैक्टर मार्च शन्तिपूर्ण होगा, वे भी जानते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सब कुछ उनके बस में रह पाएगा, ठीक वैसे ही जैसे कि इस आंदोलन में सहमति बनाना किसी के बस में नहीं है।

इतिहास गवाह है कि आंदोलन कितना भी बड़ा हो, कितना भी उग्र हो, रास्ता बातचीत से ही निकलता है। मेरा कहना है कि किसान नेताओं को संवाद की डोर जोड़े रखनी चाहिए और बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहिए। डेढ़ साल का वक्त कम नहीं होता, इसलिए सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए। हालांकि वे इस सलाह को मानेंगे इसकी गुंजाइश कम ही है।

तोमर ने ठीक कहा था कि कुछ ऐसी ताकतें हैं जो इस मामले में सुलह नहीं चाहती। शुक्रवार को इसका सबूत मभी मिल गया, जब बातचीत खत्म होने के थोड़ी ही देर बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने चंडीगढ़ से एक सियासी बयान दिया। उन्होंने ऐलान किया कि किसान आंदोलन में जितने किसान शहीद हुए हैं, उन सबके परिवारों को 5-5 लाख रुपये और परिवार के एक मेंबर को सरकारी नौकरी दी जाएगी। कैप्टन ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार को किसानों की चिंता नहीं है, बीजेपी सरकार ने लोकतन्त्र का गला घोंट दिया है, लेकिन पंजाब सरकार किसानों को अकेला नहीं छोड़ेगी।

आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मौत हुई, उनके परिवारों के प्रति भारत के लोगों की पूरी सहानुभूति है। पंजाब के मुख्यमंत्री के द्वारा उन किसानों के परिवारों की मदद करने का ऐलान काबिले तारीफ है। लेकिन उनके इस बयान की टाइमिंग और नीयत पर शक होता है। आंदोलन की शुरुआत से ही कैप्टन अमरिंदर सिंह आंदोलनकारियों को पूरा समर्थन दे रहे हैं और उनकी कोशिश रही है कि यह चलता रहे।

उनकी पार्टी के नेता राहुल गांधी और उनके सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किए, राष्ट्रपति के पास गए, और आंदोलन के समर्थन में रोजाना बयान भी देते रहे। इस बीच राहुल गांधी विदेश जाकर नया साल भी मना आए, तमिलनाडु में जलीकट्टू देख आए, ट्विटर के जरिए लगातार किसानों को अपना समर्थन देते रहे और मोदी को ताने भी मारते रहे। उन्होंने किसानों से ‘वीर तुम बढ़े चलो’ भी कहा और उनकी पार्टी की वर्किंग कमिटी ने किसान आंदोलन के समर्थन में एक प्रस्ताव भी पास किया।

इन सारी चीजों को देखते हुए यह समझना मुश्किल काम नहीं है कि नरेन्द्र सिंह तोमर ने किसके लिए कहा था कि ‘कुछ ताकतें’ हैं, जो नहीं चाहतीं कि किसान सड़क से उठकर घर पर जाएं। अब यह दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे किसानों को तय करना है।

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Why ‘some forces’ do not want the farmers to return home

AKBTalks between the Centre and farm union leaders almost collapsed on Friday after the latter conveyed to the government that they would not agree to anything short of a repeal of the three controversial laws. On its part, the Centre hardened its stand saying that the offer to suspend the operation of the three laws for one and half year was the only best deal possible and repealing the laws was out of question.

Agriculture Minister Narendra Singh Tomar appeared sad on Friday after the meeting. He said, it appears that there are some forces which do not want a solution to evolve and are trying to serve their own political interests by prolonging the agitation. No fresh date was set for the next round of talks indicating that the matter is heading towards a dead end.

At Friday’s meeting, the ministers repeatedly requested the farm leaders to reconsider the government’s offer to keep the farm laws on hold, but the latter were adamant. They clearly said that there could be no progress in talks if the laws were not repealed. The government replied that the offer to suspend the laws was the only possible solution, and there was no other offer to be made.

Friday’s meeting was the eleventh one in the series. I remember, at the end of every round of talks till the tenth one, Tomar used to come out with a smiling face to say that he was still hopeful of a breakthrough. But on Friday, after the eleventh round, he looked sad and downcast. He minced no words when he said why the talks failed. He said, ‘this is what happens, when the sanctity of a movement ends and self-seekers start dominating’.

Farm union leaders had already announced on Thursday evening that they were rejecting the government’s offer and the outcome of Friday’s meeting was a foregone conclusion. After the talks failed, most of the farmer leaders also looked unhappy. One of them said, they would meet again on Saturday, but the January 26 tractor rally will definitely take place. One hardliner farm union leader Gurnam Singh Chadhuni said that the meeting was practically over within half an hour, when the ministers told them that the suspension of laws was the only best possible deal and it was up to the farmers to decide. The ministers went away asking farm leaders to discuss among themselves. Chadhuni said, ‘we were unnecessary asked to wait when the talks had ended after half an hour’.

Hannan Mollah, the Left-leaning farmer leader, who used to speak to media after every round of talks, also looked sad. On Friday, his reaction was: “What can we do? There was no breakthrough. We will convey our views to the government by 12 noon tomorrow”.

U.P. farmer leader Rakesh Tikait said, ‘we will discuss among ourselves. If required, we will talk with the government, otherwise the agitation will continue.’ Another Bhartiya Kisan Union leader Yudhveer Singh said, ‘for the moment, the path of talks is closed, the government has said, this is the last meeting. If the government refuses to repeal the laws, the agitation will continue.’

I think, the government had given the offer to suspend the farm laws for 18 months in order to give the farm leaders a face-saver so that they could return home and tell their supporters that they have secured a win. The agitation would have ended and the prestige of the farm leaders would have remained intact. There was no political skullduggery involved on part of the government. The offer was given only after some of the farm leaders had, in closed door meetings, told the government that this could be a possible way out.

But the manner in which the farm leaders responded on Thursday and Friday clearly shows that the confrontationists among them had an upper hand. Such a situation occurs when there are multiple leaders heading an agitation. Their response clearly showed that there were many among the farmer leaders who were in favour of keeping the farm laws under suspension because it was going to benefit the farmers in the long run. But there are elements among the farm leaders who want to further their own interests more than those of the farmers. These elements want to browbeat and denigrate the government. These elements are unwilling to accept any middle path and want the agitation to continue. They have been repeatedly announcing that the January 26 tractor rally will take place. Their only motive is to create pressure on the government.

I know there are several among the farm leaders who are not in favour of a tractor rally to spoil Republic Day celebrations, but in the current situation, they cannot ask farmers to stop their rally. Leaders who promise that the tractor rally will be peaceful, do not know themselves that there is no guarantee that the rally may remain under their control, similar to the case where a breakthrough in talks was under control of a single individual.

History has witnessed many mass movements, which were bigger and more violent, but at the end, dialogue was the only way out that provided solutions. My appeal to the farmer leaders is: do not snap off the thread of dialogue, the period of 18 months is not too small, they should accept the government’s offer. There is little possibility of them accepting this suggestion.

Tomar was right when he said there are some forces which do not want a breakthrough. It was evident on Friday, when soon after the talks ended, Punjab chief minister Capt Amarinder Singh made a politically loaded statement from Chandigarh. He announced Rs 5 lakh assistance and a job to one member of the families of those farmers who became ‘martyrs’ during the agitation. The CM alleged that BJP was throttling democracy, the Centre was indifferent to the pleas of farmers, but his government in Punjab will not leave the farmers in lurch.

The people of India have full sympathy towards the families of those farmers who died during the agitation, and the Punjab CM’s announcement of assistance was welcome. But the timing and intent of this statement raise suspicions. Since the beginning of the agitation, Capt. Amarinder Singh was extending full support to the agitators and he wanted the agitation to prolong.

His party leader Rahul Gandhi and his MPs staged protests, went to the President, and gave statements daily in support of the agitation. In between, Rahul took time off to celebrate New Year abroad, came back and watched Jallikattu bull fight in Tamil Naadu, and through Twitter, he daily extended his support to farmers, while deriding Modi. He exhorted the farmers to march ahead like ‘warriors’ and his party working committee passed resolution in support of the agitation.

In the backdrop of all this, one can easily understand to whom was Narendra Singh Tomar referring to as “some forces”, who do not want the farmers to return to their homes. It is now for the farmers sitting on the outskirts of Delhi to decide.

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केंद्र का प्रस्ताव मानने के लिए किसान नेता अपने साथियों को समझाएं

akbकृषि कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने और इस दौरान कमेटी बनाकर किसानों की आशंकाएं दूर करने का केन्द्र का प्रस्ताव किसानों को मंजूर नहीं है। किसान नेताओं ने गुरुवार की शाम केंद्र की उस पेशकश को नामंजूर कर दिया जिसमें 18 महीनों के लिए तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को स्थगित करने की बात कही गई थी। किसान नेताओं ने कहा कि वे तीनों कानूनों को रद्द करने से कम पर कोई समझौता नहीं करेंगे।

किसानों के इस फैसले को लेकर कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई और सिर्फ एक प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई। जबकि हर बार किसान संगठनों की मीटिंग के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और ज्यादातर नेता बोलते हैं, लेकिन गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर दी गई और मीटिंग खत्म होने के बाद एक छपा हुआ बयान डॉ. दर्शन पाल की तरफ से जारी किया गया। इसमें लिखा था-‘संयुक्त किसान मोर्चा की आम सभा में सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया है। आम सभा में तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को पूरी तरह रद्द करने और सभी किसानों के लिए सभी फसलों पर लाभदायक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए एक कानून बनाने की बात, इस आंदोलन की मुख्य मांगों के रूप में दोहराई गई।’

सरकार के प्रस्ताव पर किसान संगठनों के नेताओं ने दिन भर विचार किया। आमतौर पर सरकार के साथ बातचीत में किसान संगठनों के 40 नेता शामिल होते हैं। अब तक सरकार के साथ 10 दौर की बातचीत हो चुकी है और इसमें भी 40 संगठनों के नेता शामिल हुए। लेकिन गुरुवार को सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए सिंघु बॉर्डर पर हुई मीटिंग में 80 किसान संगठनों के नेताओं ने हिस्सा लिया।

मेरी जानकारी ये है कि किसान संगठनों ने भले ही बयान जारी करके सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो लेकिन इस मुद्दे पर किसान नेताओं में अभी एक राय नहीं है। किसानों के जो पुराने और अनुभवी नेता हैं, उनका कहना है कि सरकार के इस प्रस्ताव को मान लेना चाहिए। उन्होंने मीटिंग में अन्य किसान नेताओं को यह समझाने की कोशिश की कि एक बार कानून स्थगित हुए तो उन्हें वापस लाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इन नेताओं ने ये भी कहा कि इससे अच्छा प्रस्ताव दूसरा नहीं हो सकता है।

किसान आंदोलन में पंजाब से जो नेता आए हैं उनमें दो ऐसे हैं जिनका सपोर्ट बेस काफी बड़ा है और इनके ज्यादा लोग इस वक्त धरने पर बैठे हैं, वो इस बात पर अड़े हैं कि कानून को रद्द करने से कम पर समझौता नहीं करना चाहिए। इनका कहना है कि इस समय सरकार दबाव में है और 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च के प्लान से सरकार घबरा गई है। इसलिए अगर अड़े रहे तो सरकार को झुकना पड़ेगा और तीनों कानून रद्द करवा कर घर लौटे तो हमारी जीत मानी जाएगी।

वहीं कुछ पुराने और अनुभवी किसान नेता जिन्होंने कई आंदोलन देखे हैं, उनका कहना है कि अभी तो सरकार झुकने के मूड में है लेकिन अगर इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो सरकार का रुख बदल भी सकता है। सरकार का रुख और कड़ा हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो बातचीत का रास्ता बंद हो जाएगा और इसका इल्जाम किसान नेताओं पर लगेगा। इन लोगों ने ये भी कहा कि आज जनता से जो समर्थन और सहानुभूति मिल रही है वो भी चली जाएगी।

चिंता की बात ये है कि इन्हीं किसान नेताओं में एक बड़ा तबका है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोधी है। उनका एजेंडा किसानों का भला कम और मोदी विरोध ज्यादा है। ये वो लोग हैं जो किसान आंदोलन के नाम पर अपनी सियासत को चमकाना चाहते हैं, लेकिन उनका सपोर्ट बेस (जन समर्थन का आधार) कम है। ये लोग चाहते हैं कि आंदोलन चलता रहे।

इन लोगों ने किसान नेताओं से कहा कि अगर एक बार धरने से उठ गए तो दोबारा इतना बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर पाएंगे। इतना ही नहीं, इन लोगों ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की नोटिस का भी जिक्र किया और कहा कि अगर आंदोलन खत्म कर दिया तो और लोगों को ऐसे नोटिस मिल सकते हैं और फिर से लोगों को इकट्ठा करना संभव नहीं होगा।

किसान नेताओं की तरफ से अब 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली की कॉल देकर सरकार पर दबाब बनाने की कोशिश हो रही है। दिल्ली पुलिस की तरफ से ट्रैक्टर रैली की इजाजत किसानों को नहीं मिली है लेकिन किसान नेता अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इन नेताओं का दावा है कि ट्रैक्टर रैली के लिए किसान पहले ही पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी और कुछ अन्य राज्यों से दिल्ली के लिए रवाना हो चुके हैं।

अब सरकार की दिक्कत ये है कि वह किसानों पर सख्ती बरतना नहीं चाहती। अब तक किसानों के साथ प्रशासन-पुलिस ने बहुत संयम के साथ काम लिया है, लेकिन गणतन्त्र दिवस पर सुरक्षा को लेकर भी कोई समझौता नहीं हो सकता। किसान संगठनों के कुछ नेता ऐसे हैं जो इस बात को न तो सुनने को तैयार हैं और ना ही समझने को तैयार हैं।

मेरा किसान नेताओं से ये सवाल है कि आठ राज्यों के जो किसान नेता सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाई गई कमेटी के साथ बात करने पहुंचे, क्या वो किसान नहीं है? क्या वो किसानों का भला नहीं चाहते? पूरे देश के लाखों-करोड़ों किसान जो इस वक्त खेतों में काम कर रहे हैं और जो सरकार की तरफ से बनाए गए कृषि कानूनों का समर्थन कर रहे हैं, क्या उनकी बात सिर्फ इसलिए नहीं सुनी जानी चाहिए क्योंकि वो आंदोलन नहीं कर रहे हैं? सड़क पर नहीं बैठे और टकराव का रास्ता नहीं अपना रहे?

मुझे लगता है कि लोकतन्त्र में सबको अपनी बात कहने का हक है। जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उन्हें संविधान आंदोलन करने का हक देता है। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए और सरकार ने उनकी बात सुनी भी है। उनसे खुले दिल से बात की है। सरकार कृषि कानूनों में संशोधन करने के लिए तैयार है। सुप्रीम कोर्ट ने भी आंदोलन करने वाले किसानों के साथ हमदर्दी जताई है। लेकिन क्या सरकार के प्रस्ताव को नामंजूर करके, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से बात करने से इंकार करके किसान संगठन ठीक कर रहे हैं?

मेरा कहना ये है कि लोकतंत्र में रास्ता बातचीत से ही निकलता है इसलिए बातचीत का रास्ता बंद न हो ये सुनिश्चित करना चाहिए। किसान संगठनों को सरकार के प्रस्ताव पर एक बार फिर से सोचना चाहिए और जो लोग उग्र हैं, जो इसका विरोध कर रहे हैं उनको समझाने की कोशिश करनी चाहिए।

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Farmer leaders must persuade their colleagues to accept Centre’s offer

akb full_frame_74900Farmer leaders on Thursday evening rejected the Centre’s offer to put the three controversial farm laws on hold for 18 months, saying they want nothing short of a repeal of the three laws.

There was no official briefing, and only a press release was issued by Dr Darshan Pal at the end of the meeting which read: “In a full general body meeting of the Samyukta Kisan Morcha today, the proposal put forth by the Government was rejected. A full repeal of three central farm acts and enacting a legislation for remunerative MSP for all farmers were reiterated as the pending demands of the movement.”

The press release at the end of a day long meeting of all farmer leaders representing 80 farmer unions. Normally, the delegation that had been attending ten rounds of talks with the Centre consisted of leaders from 40 farmer unions. There are indications that despite the unions rejecting the Centre’s proposal, there seems to be lack of unanimity on the issue of farm laws. Old and experienced farmer leaders who had been attending the talks were of the view that the Centre’s offer to suspend the laws be accepted. They tried to convince other leaders that once the laws were suspended, it would be difficult for the government to freshly implement them again.

However, two of the top farmer leaders from Punjab, who have a large support base, insisted that nothing short of repeal of the farm laws was acceptable to them. They were of the view that the government was presently under pressure because of the plans for a tractor march on January 26, and if the leaders insisted on repeal, the government would accept their demand finally. These leaders said that once the Centre agreed for repeal of the laws, the farmers could return to their homes to tell people that they have won the battle.

Some old and experienced farmer leaders, who were veterans of several agitations in the past, pointed out that even if the Centre was now appearing soft, it could adopt a tough stance if the offer was rejected. The talks would break down and the ultimate blame would be put on farmer leaders. The farmers will then lose the sympathy that they are presently getting from the people.

The most worrying part of all is that there is a large segment among the farmer leaders which is blindly opposed to Prime Minister Narendra Modi, and this appears to be their single point agenda. These leaders have hardly any wider base and they want to reap political advantage. These leaders want the agitation to continue and are consistently telling others that once the farmers return, they would never be able to mobilize on this scale again. They are also telling others that once the farmers return, they would be facing more notices from the National Investigation Agency.

The farmer leaders continue to remain adamant on taking out a tractor rally on Delhi’s Outer Ring Road on January 26, despite rejection from Delhi Police. These leaders claim that farmers riding on tractors have already left for Delhi from Punjab, Haryana, western UP and some other states. The Centre does not want to use force to stop the farmers, and till now, the police and administration have shown utmost restraint. However, national security cannot be compromised at any cost on Republic Day, even if the farmers are unwilling to listen to reason.

My question to the farmer leaders is: farmers from eight states have come to Delhi to appear before the Supreme Court appointed experts’ committee to place their views. Are they not farmers? Should the voice of millions of farmers across India who are happy with the farm laws not be heard only because they have not resorted to agitation by blocking highways and adopting a path of confrontation? In a democracy, people have the right to let their voices be heard, the Constitution grants farmers the right to agitate, the government has listened to the views of the farmers, it is also willing to amend the farm laws, the Supreme Court showed full sympathy towards the farmers, but are the farmer unions doing the right thing in refusing to appear before the Supreme Court appointed committee or by rejecting the Centre’s offer to suspend operation of farm laws?

My view is that dialogue is the only way out to end an impasse in a democracy. The path of dialogue must not be closed. Farmer unions should reconsider the Centre’s offer to suspend operation of the farm laws for 18 months. They should persuade their colleagues who are adopting a hardline, to accept the offer and end the agitation.

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बायडेन प्रशासन से भारत को क्या-क्या उम्मीदें हैं

akb‘आज अमेरिका का दिन है। आज लोकतंत्र का दिन है। आज इतिहास और आशा का दिन है। पुनरुज्जीवन और संकल्प का दिन है।’ इन्हीं शब्दों के साथ अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बायडेन ने बृहस्पतिवार को शपथ ग्रहण के बाद अपना पद संभाल लिया। उन्होंने कैपिटल (अमेरिकी संसद भवन) की सीढ़ियों पर शपथ ली जहां 6 जनवरी को डोनाल्ड ट्रम्प के उकसाए जाने के बाद अनियंत्रित गोरी कट्टरपंथी भीड़ ने जबर्दस्त उत्पात मचाया था। डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव हार गए थे लेकिन वे हार स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान बायडेन के भाषण को भीड़ बड़े ध्यान से सुन रही थी। नेशनल गार्ड्स के जवान इस पूरे समारोह पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए थे और पूरी तरह से अलर्ट थे। बायडेन ने कहा- ‘आज हम एक उम्मीदवार की विजय का जश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र के ध्येय की जीत का उत्सव मना रहे हैं। जनता की इच्छा को सुना और समझा गया है। हमने आज फिर सीखा है कि लोकतंत्र बेशकीमती है, लोकतंत्र नाजुक है और मित्रों, इस वक्त लोकतंत्र की विजय हुई है ।’

बायडेन के भाषण को शब्दों में पिरोने, उसे मूर्त्त रूप देने का काम भारतीय मूल के अमेरिकी सी. विनय रेड्डी ने किया था। विनय रेड्डी का परिवार मूल रूप से तेलंगाना का रहनेवाला है। पूरे राष्ट्रपति चुनाव में बायडेन के भाषण को लिखने का काम उन्होंने ही किया था। बायडेन की टीम में वे भाषण लिखने वाली टीम के डायरेक्टर थे। विनय रेड्डी बायडेन के साथ लंबे अर्से से जुड़े हैं। ओबामा के शासनकाल में जब बायडेन उपराष्ट्रपति थे, उस समय भी विनय रेड्डी बायडेन के साथ थे।

बायडेन ने कहा, ‘हम पूरी रफ्तार और तेज़ी के साथ आगे बढ़ेंगे क्योंकि हमें खतरा और संभावनाओं से भरे इस शीतकाल में काफी कुछ करना है, काफी कुछ दुरुस्त करना है, काफी कुछ बहाल करना है, काफी कुछ हासिल करना है। हमारे इतिहास में बहुत कम समय ऐसे आये हैं जो आज की तुलना में ज्यादा कठिन और चुनौतीपूर्ण रहे हैं। सौ साल में एक बार आया यह वायरस देश भर में चुपचाप चहलकदमी कर रहा है। इस वायरस ने एक साल में इतनी जानें लीं जितनी अमेरिका ने पूरे द्वितीय विश्व युद्ध में गंवाई थी। लाखों लोग बेरोजगार हो गए। हजारों कारोबार बंद हो गए…. और अब हम राजनीतिक उग्रवाद, श्वेत वर्चस्व, घरेलू आतंकवाद के मुकाबिल है और इन्हें हरा कर रहेंगे ।’

बायडेन ने कहा: ‘मैं आपको यह वचन देता हूं कि मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति बना रहूंगा।’

इससे पहले कमला देवी हैरिस ने अमेरिका की पहली महिला उपरष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेकर इतिहास रच दिया। कमला हैरिस प्रथम अश्वेत और भारतीय मूल की उपराष्ट्रपति हैं। शपथ ग्रहण समारोह से कुछ घंटे पहले डोनाल्ड ट्रम्प मरीन वन हेलीकॉप्टर में सवार होकर व्हाइट हाउस से निकल गए। उन्होंने मैरीलैंड हवाई अड्डे पहुंचकर अपने समर्थकों को संबोधित किया। ट्रम्प ने अपने भाषण में कहा- ‘हम किसी न किसी रूप में वापस आएंगे ‘। ऐसी खबरें हैं कि ट्रम्प पैट्रियट पार्टी के नाम से एक नया राजनीतिक संगठन तैयार कर सकते हैं। वहीं ट्रम्प के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति का पद संभालने वाले माइक पेंस ट्रम्प की विदाई में तो शामिल नहीं हुए, लेकिन वे जो बायडेन के शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद थे ।

दरअसल सच्चाई ये है कि अपने चार साल के उथल-पुथल भरे शासन के दौरान, खास कर राष्ट्रपति चुनाव में अपनी हार के बाद के कुछ हफ्तों में, ट्रम्प ने नस्ल और जाति के आधार पर अमेरिकी जनता को बांटने का काम किया। यही वो दर्द था.. यही वो बात थी जो बायडेन के भाषण में बार-बार उभरकर सामने आई। उन्होंने अपने भाषण में बार-बार ‘एकता’ पर जोर दिया।

कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेते देख भारतीय मूल के हर अमेरिकी को गर्व का अनुभव हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्विटर पर बधाई दी और कहा, ‘यह एक ऐतिहासिक अवसर है। भारत-अमेरिका संबंधों को और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए उनके साथ बात करने को लेकर आशान्वित हूं। भारत और अमेरिका के बीच साझेदारी पूरी दुनिया के हित में है।’ वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने जो बायडेन को भी ट्वीट कर बधाई दी। मोदी ने ट्वीट किया: ‘मैं भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए उनके साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं।”

नये अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन पहले ही भारत-अमेरिका संबंधों को ‘एक द्विपक्षीय सफलता की कहानी’ बता चुके हैं। मुझे उम्मीद है कि अमेरिका भारत के बारे में अपनी नीतियों में निरंतरता बनाए रखेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही रक्षा क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। भारत को उम्मीद है कि अमेरिका एक व्यापक व्यापार समझौते के साथ आगे आएगा जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा। दोनों देशों को मिलकर उस आतंकवाद का मुकाबला करना होगा जिसका पालन-पोषण भारत के पड़ोस में हो रहा है।

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What India expects from the Biden administration

akb“This is America’s day. This is democracy’s day. A day of history and hope. Of renewal and resolve.” – With these words US President Joe Biden took office on Thursday after being administered the oath of office on the steps of the Capitol, scene of unprecedented violence by an unruly radical white mob which went on rampage on January 6 after being egged on by Donald Trump, his predecessor, who had lost the elections but was unwilling to concede.

As Biden continued, the crowd watched and listened with rapt attention, with National Guards keeping a vigil. He said, “Today we celebrate the triumph, not of a candidate, but of a cause: the cause of democracy. The will of the people has been heard, and the will of the people has been heeded. We have learned again, that democracy is precious. Democracy is fragile. And at this hour, my friends, democracy has prevailed.”

These were words scripted by an American of Indian origin, C. Vinay Reddy, whose family hails from Telangana. He had written Biden’s speeches throughout the presidential election. He is director of speech writing in Biden’s transition team. Reddy was with Biden during his days as Vice-President during Obama’s regime.

Biden said: “We will press forward with speed and urgency, for we have much to do in this winter of peril and possibility. Must to repair. Much to restore. Much to heal. Much to build. And much to gain. Few periods in our nation’s history have been more challenging or difficult than the one we’re in now. A once-in-a-century virus silently stalks the country. It has taken as many lives in one year as America lost in all of World War II. Millions of jobs have been lost. Hundreds of thousands of businesses closed. … And now, a rise in political extremism, white supremacy, domestic terrorism, that we much confront and we will defeat.”

In his speech, Biden said: “I pledge this to you: I will be a President for all Americans”. Earlier, history was created when Kamala Devi Harris took oath of office as the first female Vice-President, the first of Black and Indian heritage. Hours before the inauguration ceremony, Donald Trump exited the White House in a Marine One helicopter to Maryland air base, where he delivered a speech to his supporters promising “we will be back in some form”. There were reports that Trump may form a new political outfit called the Patriot Party. The outgoing Vice-President Mike Pence did not attend Trump’s farewell, but attended Biden’s inauguration.

It is a fact that during his turbulent four-year rule, and particularly during the weeks after his defeat in the presidential elections, Donald Trump divided the American people on the basis of race and ethnicity, and it was left to Biden to stress on “Unity” several times in his inauguration speech.

Every American of Indian origin felt pride on watching Kamala Harris taking oath as the Vice-President. Prime Minister Narendra Modi was to greet her on Twitter and said “It is a historic occasion. Looking forward to interacting with her to make India-USA relations more robust. The India-USA partnership is beneficial to our planet.” To Joe Biden, Modi tweeted: “I look forward to working with him to strengthen India-US strategic partnership.”

The new US Secretary of State Antony Blinken, appointed by Biden, has already described India-USA relations as “a bi-partisan success story”. India expects continuity in US policies towards the world’s most populous democracy. Already there has been much progress in the field of defence ties.

India expects the US to come forward with a comprehensive trade agreement that will be beneficial for both. Both the countries will have to jointly fight the scourge of terrorism that is being nurtured and exported from the neighbourhood.

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हमारे युवा क्रिकेटरों ने ऑस्ट्रेलिया की सरजमीं पर यूं रचा इतिहास

AKB30 नए साल की नई-नई शुरुआत में नए इंडिया की नई टीम ने ऑस्ट्रेलिया की सरजमीं पर एक नया इतिहास रच दिया है। गाबा में हो रहे टेस्ट मैच के आखिरी दिन मंगलवार को टीम इंडिया ने स्टार क्रिकेटरों से भरी ऑस्ट्रेलियाई टीम को मात देकर टेस्ट सीरीज पर कब्जा किया और इसके साथ ही कामयाबी की एक नई इबारत लिख दी। भारत ने ऑस्ट्रेलिया में यह दूसरी टेस्ट सीरीज जीती है। ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम का अभेद्य किला माने जाने वाले गाबा के मैदान पर कंगारू पिछले 32 सालों में एक भी मैच नहीं हारे थे।

युवा भारतीय टीम ने इतिहास बदलकर रख दिया और अविश्वसनीय धैर्य एवं दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन करते हुए नए कीर्तिमान स्थापित किए। शुभमन गिल के 91, क्लासिक चेतेश्वर पुजारा के 56 और डायनैमिक ऋषभ पंत के 89 रनों की बदौलत भारत ने टेस्ट मैच में ऐतिहासिक जीत हासिल की। टेस्ट मैच के आखिरी दिन टीम इंडिया के सामने 328 रनों का पहाड़ जैसा टारगेट था। आमतौर पर टेस्ट मैच के अंतिम दिन इतने रन बनाना आसान नहीं होता, क्योंकि पिच वियर एंड टियर हो चुकी होती है, बड़े क्रैक्स पड जाते हैं और गेंद में अनइवेन बाउंस रहता है।

इसके अलावा, ऐसे कम ही लोग होंगे जो ऐसी पिच पर ऑस्ट्रेलिया के विश्व स्तरीय तेज गेंदबाजों के सामने जीतने की कल्पना भी कर सकते हैं। लेकिन भारत के युवा और बहादुर क्रिकेटरों ने न सिर्फ इस चुनौती का मुकाबला किया, बल्कि ऑस्ट्रेलियाई टीम पर पूरी तरह हावी भी रहे। कमेंटेटर्स भारतीय टीम के लिए डिटरमिनेशन, फियरलेस क्रिकेट, इंटेंट और रेजलियंस जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते रहे। वह भी उस टीम के लिए जो अपने सीनियर और अनुभवी क्रिकेटरों के बिना खेल रही थी।

जसप्रीत बुमराह, रविचंद्रन अश्विन, मोहम्मद शमी, उमेश यादव, रवींद्र जडेजा और हनुमा विहारी जैसे खिलाड़ी घायल होकर पविलियन में बैठे थे, जबकि कप्तान विराट कोहली अपने घर आए हुए थे। हार्दिक पांड्या भी टीम में नहीं थे। ऑस्ट्रेलिया का सामना करने वाले कई खिलाड़ी ऐसे थे जो अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहे थे, कई बॉलर्स तो वे थे जो नेट्स में बॉलिंग करने के लिए ऑस्ट्रेलिया में रोके गए थे। इन खिलाड़ियों को प्लेइंग इलेवन में चुने जाने की उम्मीद न के बराबर थी। यह युवा टीम मैदान में न तो मैच बचाने के लिए उतरी, और न ही ड्रॉ करने के लिए बल्कि जीत हासिल करने के लिए आगे बढ़ती रही।

जैसा कि आजकल सोशल मीडिया पर लोग काफी ज्यादा ऐक्टिव हैं, इसलिए ट्विटर, फेसबुक और अन्य प्लैटफॉर्म्स पर आज उन लोगों को सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ी, जिन्होंने एडिलेड में ’36 रन पर आउट’ हो जाने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम पर सवाल उठाए थे। कमेंटेटरों और पूर्व क्रिकेटरों में से कइयों ने, जिनमें ज्यादातर विदेशी थे, भारतीय टीम को दूसरे दर्जे का कहा था। कुछ ने तो यह भी भविष्यवाणी की थी कि भारतीय टीम बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी जीत ही नहीं सकती। एडिलेड टेस्ट हारने के बाद विराट कोहली वापस भारत लौट आए थे।

इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान माइकल वॉन ने कहा था कि ऑस्ट्रेलिया इस सीरीज में भारत को 4-0 से हराएगी। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज मार्क वॉ ने भी इसी तरह की बातें की थीं। ऑस्ट्रेलिया के एक और पूर्व क्रिकेटर माइकल क्लार्क ने कहा था कि विराट कोहली के बिना टीम इंडिया की बैटिंग लाइनअप काफी कमजोर दिखती है। अब जबकि भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को उसी की जमीन पर धूल चटा दी है, तो इनके जैसे अन्य पूर्व क्रिकेटर्स जैसे कि रिकी पॉन्टिंग को अब अपने बयानों पर शर्मिंदा होना पड़ रहा है। भारत ने 2018-19 में भी ऑस्ट्रेलिया को उसी की धरती पर मात दी थी और अब 2021 में एक बार फिर से वही कारनामा दोहराया है।

मंगलवार की सुबह अंतिम दिन के खेल को देखते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी बॉलीवुड थ्रिलर को पर्दे पर उतरता हुआ देख रहा हूं। लोग एक-एक रन, एक-एक बाउंड्री के लिए टीम इंडिया का हौसला बढ़ा रहे थे। और जब मैच जीतकर टीम इंडिया के युवा खिलाड़ियों ने ट्रॉफी उठाई, तिरंगे को लहराया और मैदान का चक्कर लगाया, तब जाकर यकीन आया कि ऑस्ट्रेलिया में वाकई चमत्कार हो गया। हमारी टीम ने कंगारुओं को जोर का झटका दे दिया।

इस मैच के हीरो विकेटकीपर बैट्समैन ऋषभ पंत थे। इस खिलाड़ी के बारे में हाल के दिनों में कई लोगों ने तमाम तरह की कड़ी बातें कही थीं। कई लोग कहते थे कि ऋषभ पंत में पोटेंशियल की कमी नहीं है, बस उन्हें थोड़ा डिसिप्लिंड होने की जरूरत है। लेकिन 23 साल के इस नौजवान खिलाड़ी ने सिडनी और ब्रिसबेन में अपने प्रदर्शन से दिखाया कि वह अपने दम पर किसी भी समय मैच पलटने का माद्दा रखता है।

जब चेतेश्वर पुजारा 56 रन बनाकर आउट हुए, तो लगा कि जैसे टीम इंडिया यह मैच अब ड्रॉ करने के लिए खेलेगी। इसके बाद जब मयंक अग्रवाल भी जल्दी आउट हो गए, तो फिर लगा कि इस मैच में तीनों रिजल्ट जीत, ड्रॉ और हार, कुछ भी मुमकिन है। लेकिन ऋषभ पंत के इरादे तो कुछ और ही थे। वह ठानकर आए थे कि जब तक क्रीज पर मौजूद हैं, जीतने के लिए ही खेलेंगे। इसीलिए उन्होंने अपना अटैकिंग गेम जारी रखा और वॉशिंगटन सुंदर के साथ 53 रनों की साझेदारी की। इसके बाद तो जीत के लिए सिर्फ औपचारिकताएं रह गई थीं। लेकिन जब वॉशिंगटन सुंदर और शार्दुल ठाकुर एक के बाद एक आउट हो गए तो प्रेशर एक बार फिर ऋषभ पंत पर आ गया। सुंदर और शार्दुल वही खिलाड़ी थे, जिन्होंने पहली इनिंग्स में 123 रनों की जबर्दस्त पार्टनरशिप करके भारत की मैच में वापसी करवाई थी। ऋषभ पंत आखिर तक टिके रहे, टीम को जीत दिलाकर ही दम लिया, और नाबाद 89 रन बनाने के लिए उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ का अवॉर्ड भी मिला।

टीम के मुख्य कोच रवि शास्त्री ने बाद में बताया कि कैसे टीम इंडिया इस अग्निपरीक्षा से पार पाने में सफल रही। उन्होंने कहा, ऑस्ट्रलिया का उसी की जमीन पर सामना करना काफी मुश्किल काम है, भारतीय खिलाड़ियों को क्वॉरन्टीन में जाना पड़ा, कई घायल हुए, एडिलेड में इतिहास के अपने न्यूनतम स्कोर 36 रन पर आउट हो गए, और फिर वहां से वापसी की और चैंपियंस की तरह खेले। शास्त्री ने कहा कि यह बेहद अविश्वसनीय था।

ब्रिसबेन के क्रिकेट इतिहास में इससे पहले किसी भी टीम ने 300 रन से ऊपर के स्कोर का पीछा करते हुए जीत दर्ज नहीं की थी। लेकिन हमारी टीम ने एक दिन में ही 300 रन से ज्यादा के स्कोर का कामयाबी से पीछा किया। इस मैच को जीतने में शार्दुल ठाकुर और मोहम्मद सिराज का काफी बड़ा रोल रहा। सिराज अभी ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर आए ही थे कि तभी खबर आई कि उनके पिता का देहांत हो गया है। लेकिन अच्छे गेंदबाजों की कमी को देखते हुए सिराज ने ऑस्ट्रेलिया में ही रुकने का फैसला किया। सिडनी और ब्रिस्बेन में उन्हें कुछ ऑस्ट्रेलियाई फैन्स की नस्लीय टिप्पणियों से भी गुजरना पड़ा। सिराज ने इन सभी लोगों को अपनी शानदार परफॉर्मेंस से जवाब दिया।

मंगलवार की सुबह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि टीम इंडिया यह मैच जीतेगी। रोहित शर्मा 7 रन बनाकर आउट हो चुके थे, दुनिया के नंबर एक बल्लेबाज विराट कोहली, जिन्हें रन मशीन कहा जाता है, टीम में ही नहीं थे, लेकिन जब सलामी बल्लेबाज शुभमन गिल ने अच्छे शॉट्स लगाते हुए शानदार 91 रन बनाए, तो ऐसा लगा कि टीम जीत सकती है। चेतेश्वर पुजारा विकेट के सामने दीवार बनकर खड़े थे। उन्होंने कभी छाती पर तो कभी अंगूठे पर, कुल 6 बार बॉल से चोट खाई। जब मैंने उन्हें दर्द से कराहते हुए और मैदान में लेटे हुए देखा तो मुझे लगा कि हम यह मैच लगभग हार गए हैं। लेकिन वह फिर खड़े हुए, 211 गेंदों का सामना करते हुए 56 रन बनाए और ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को जमकर छकाया।

जब मयंक अग्रवाल भी नहीं चले तो जीत की उम्मीद काफी कम हो गई थी। इसके बाद ऋषभ पंत खेलने आए और एक छोर संभाले रखा। वह इस पूरी सीरीज़ में ज्यादा कुछ नहीं कर पाए थे, और सिर्फ एक ही अच्छी इनिंग्स खेली थी। लेकिन इस बार उन्होंने कमाल कर दिया। जिस अंदाज में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के स्पिनर्स की पिटाई की, उससे लग गया था कि अब जीत तो पक्की है।

पंत ने साबित कर दिया कि वह वाकई में हार को जीत में बदलने वाले बैट्समैन हैं। वह जैसे-जैसे बाउंड्री मार रहे थे, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के चेहरे उतरते जा रहे थे। वॉर्नर और स्मिथ जैसे वर्ल्ड क्लास प्लेयर्स के चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि नए खिलाड़ियों ने उनकी टीम को इस अंदाज में मात दी। भारतीय टीम के कई खिलाड़ी अपना पहला ही मैच खेल रहे थे।

भारत की इस युवा टीम की कामयाबी को लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता। गाबा की पिच पर यह भी साबित हो गया कि भारतीय क्रिकेट टीम का भविष्य भी काफी उज्ज्वल है। बस इन युवा खिलाड़ियों को इस सफलता को बड़े संयम से अपनी यादों में संजो कर रखना होगा। हमारे युवा क्रिकेटरों ने जो हिम्मत और दृढ़ संकल्प दिखाया है, उसकी मिसाल आने वाले खिलाड़ियों को हमेशा दी जाएगी।

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How our young cricketers scripted history on Australian soil

aaj ki baatThe New Year has marked a new beginning with a new Indian cricket team scripting a new history on Australian soil. Team India scripted a fairy tale on the final day of the Test at Gabba on Tuesday clinching the Test series by defeating the mighty Australian team packed with star cricketers. This was Indian’s second Test series win in Australia. Gabba is considered an impregnable fortress for the Australians who have not lost a single match on this ground since the last 32 years.

The young Indian team changed history and rewrote records displaying incredible grit and determination. Opened Shubhman Gill’s 91 runs, classic Cheteshwar Pujara’s 56 runs and dynamic Rishabh Pant’s 89 not out forged India’s historic victory. On the last day of the Test, Team India had a huge target of 328 runs. Normally it is difficult to score so many runs on the last day, because the pitch witnesses wear and tear, with big cracks and the ball carries an uneven bounce.

Moreover, few could imagine the team coming out victorious facing world-class fast bowlers of Australia on such a pitch. The young, brave Indian cricketers not only surmounted all obstacles but also dominated last day’s play. The commentators were busy throwing up words like determination, fearless cricket, intent and resilience for the Indian team. That too, for a team sans senior and experienced cricketers.

Players like Jasprit Bumrah, R. Ashwin, Mohammed Shami, Umesh Yadav, Ravindra Jadeja and Hanuma Vihari were injured, sitting in the pavilion, while captain Virat Kohli was busy at home. Hardik Pandya too was absent. The players who faced Australia were mostly those who were playing their first Test, there were bowlers who had been kept during the Australian tour for net practice. Hopes of these players being inducted into the playing Eleven was almost nil. This young team went to the ground not in order to save the match, neither make a try for a draw, but went ahead with the zeal to win.

Since the social media is hyperactive nowadays, cricket fans took to Twitter, Facebook and other platforms to pan those who had written off the Indian team after the “36 not out” fiasco at Adelaide. Many of the commentators and former cricketers, mostly from abroad, had described the Indian team as second-rated, some had predicted that there was no chance of the Indian team taking home the Border-Gavaskar Trophy. Virat Kohli had returned to India after the Adelaide fiasco.

Former England captain Michael Vaughan had predicted a 4-0 whitewash for India. Former Aussie batsman Mark Waugh had given a similar opinion. Another former Australian cricketer Michael Clarke had said that the Indian team without Virat Kohli did not stand a chance in batting. Now that the Indian team has demolished Australia on its own soil, these and other former players like Ricky Ponting will not have to eat their words. India had defeated the Australia on their soil in 2018-19 and have now repeated the same in 2021.

On Tuesday morning, as I watched the final day’s play, I felt as if I was watching a Bollywood thriller rolling out on the screen. People were cheering the Indians for each run and each boundary. And when the brave young Indian players lifted the trophy, waved the Tricolour and jogged round the stadium, it looked as if a miracle has occurred. The kangaroos have been beaten, thoroughly.

The hero of the match was wicketkeeper batsman Rishabh Pant, the player about whom many had said unkind words in the recent past. Some said he lacked potential, some others said he should be more disciplined, but the 23-year-old player showed with his performances at Sydney and Brisbane that he has the capability to turn a match around on its head.

When Cheteshwar Pujara was out for 56, it appeared as if Team India would now struggle for a draw. When Mayank Agrawal left, it looked as if the team could either win, lose or draw. But Rishabh Pant had come with a plan in his mind. He had decided that he would stay on the pitch, come what may, till the team wins. He carried on with his attacking game. Pant did a 53-run partnership with Washington Sundar, and now the win was a mere formality. But when Sundar and Shardul Thakur left one after another, it looked as if the entire weight would now fall on Pant. Sundar and Shardul had done a miraculous 123-run partnership in the first innings. Pant continued to stay on the pitch and remained 89 not out, and ultimately got the Man of The Match award.

It was head coach Ravi Shastri who later summed up how Team India came through the ordeal by fire. He said, it was a huge task to face Australia on its soil, Indian players had to gone into quarantine, were injured, were out for 36 in Adelaide for their lowest total in history, and then they made the comeback and played like champions. It was unbelievable, he said.

Never in Brisbane’s cricketing history had any team successfully chased a score of more than 300 runs. Team India accomplished that within a day. Shardul Thakur and Mohammed Siraj played vital roles. Siraj lost his father when he was playing in Australia, but considering the lack of good bowlers, he decided to stay back. In Sydney and Brisbane, he had to face the torment of listening to racial abuses from some Australian bigots. He gave his reply with his sterling performances.

On Tuesday morning, I never dreamed that Team India would win. Rohit Sharma was already out for 7, World No. 1 Virat Kohli, known as the run machine, was not in the team, but when opener Shubhman Gill started playing well-timed shots and made 91 runs, it appeared as if the team could win. Cheteshwar Pujara stood like a wall, he was hit six times, once on his chest and once on his thumb. When I saw him crying out in pain, lying on the ground, I thought the match was almost lost. But he stood up, made 56 runs facing 211 balls, and pierced the Australian bowling wall.

When Mayank Agrawal failed, chances of a win almost collapsed. Rishabh Pant was holding fort. He had not done well in the series, had played only one good innings. But Lady Luck wasin his favour this time. He spanked the Australian spinners and there was a clear sign of a win on the horizon.

Pant proved that he was a batsman who can indeed turn a match around. As he played boundaries, the Australian players were aghast and they lost their morale. World class players like Warner and Smith looked quite sad. They could not believe their eyes that their team was being roasted by rookies. Most of the players in the Indian team were playing their debut Test match.

One can hardly express admiration for the young Indian team in words. It was made quite clear on Gabba pitch today that the future of Indian cricket team is, indeed, bright. These young players must nurture the adulation that they will receive with modesty and care. The grit and determination that our young cricketers displayed today shall always remain a shining example for all budding players.

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किसानों को मेरी सलाह: संशोधन के बाद कृषि कानून पसंद न आएं तो आंदोलन करें

AKB30 आज अपने 55वें दिन में प्रवेश कर चुके किसान आंदोलन में पर्दे के पीछे से सियासी ताकतें सक्रिय तौर पर काम में लगी हैं। ऐंटी-मोदी मोर्चा अपने एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए किसानों का इस्तेमाल कर रहा है। सोमवार को किसान नेताओं के बीच अनबन की खबर आई थी। हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन के एक किसान नेता, गुरनाम सिंह चढ़ूनी को संयुक्त किसान मोर्चा ने सस्पेंड कर दिया था। इसके बाद सुलह की कोशिशें की गईं और शाम तक सस्पेंशन वापस ले लिया गया।

किसान नेताओं के बीच एकता में दरार के संकेत हैं जो पिछले 24 घंटों में दिखाई देने लगे हैं। चढ़ूनी और मध्य प्रदेश के एक अन्य किसान नेता शिव कुमार कक्काजी ने एक-दूसरे के खिलाफ तीखी बयानबाजी की। एक स्थानीय मीडिया ने कक्काजी के हवाले से खबर दी थी कि चढ़ूनी ने हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार को गिराने के लिए 10 करोड़ रुपये लिए थे, लेकिन बाद में कक्काजी ने ऐसा कोई भी आरोप लगाने की बात से इनकार कर दिया। वहीं, चढ़ूनी ने पलटवार करते हुए कक्काजी को ‘आरएसएस का एजेंट’ करार दे दिया।

बाद में चढ़ूनी ने साफ किया कि उन्होंने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में राजनीतिक दलों की एक मीटिंग आयोजित की थी। इस मीटिंग में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत 11 पार्टियों के नेता मौजूद थे। उन्होंने इस मीटिंग में व्यक्तिगत तौर पर हिस्सा लिया था और भविष्य में वह ऐसा नहीं करेंगे। संयुक्त किसान मोर्चा ने सोमवार की शाम को एक बयान जारी कर कहा कि चढ़ूनी द्वारा बुलाई गई राजनीतिक दलों की बैठक से उसका कोई लेना-देना नहीं है। मोर्चा ने कहा कि उसने इस मामले की जांच के लिए एक समिति का गठन किया है। इसने साफ किया कि इसका किसी भी राजनीतिक दल से सीधा जुड़ाव नहीं होगा, हालांकि कोई भी संगठन या पार्टी इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए स्वतंत्र है।

गैर-राजनीतिक किसान नेताओं ने कहा कि उन्होंने अपन आंदोलन स्थल पर न तो किसी पार्टी का झंडा लगने दिया और न ही किसी पार्टी के नेता को अपने मंच पर चढ़ने दिया, लेकिन कांग्रेस और वामपंथी दलों के नेता लगातार आंदोलन में घुसने की कोशिश करते रहे। इन राजनीतिक दलों ने कुछ किसान नेताओं को यह पट्टी पढ़ा दी कि सरकार की कोई बात न मानने में ही उनकी जीत है। जब हरियाणा कांग्रेस नेताओं के साथ बैठे चढ़ूनी की तस्वीरें सामने आईं, तो अन्य किसान नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई। इसके बाद किसान नेताओं की सबसे प्रमुख 7-मेंबर कमेटी की बैठक बुलाई गई, जिसमें चढ़ूनी को सस्पेंड करने का प्रस्ताव पारित किया गया। यह भी फैसला किया गया कि केंद्र के साथ दसवें दौर की बातचीत के लिए जाने वाले किसानों के प्रतिनिधिमंडल में चढ़ूनी नहीं होंगे। ऐसी अफवाहें थीं कि चढ़ूनी ने हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस नेताओं से डील कर ली है।

अपने सस्पेंशन के तुरंत बाद चढ़ूनी ने आरोप लगाया कि कक्काजी आरएसएस के एजेंट हैं और उन्हें किसानों के आंदोलन में दरार पैदा करने के लिए भेजा गया है। चढ़ूनी ने कहा कि कक्काजी के संगठन में मुश्किल से 100 किसान हैं। उन्होंने उस अखबार को भी मानहानि का नोटिस भेजने की धमकी दी जिसमें कक्काजी का यह आरोप छापा गया था कि चढ़ूनी कांग्रेस पार्टी ने टिकट देने की पेशकश की है।

कक्काजी से चढ़ूनी इसलिए नाराज थे क्योंकि जिस 7-सदस्यीय कमेटी ने उन्हें सस्पेंड किया उसकी अध्यक्षता कक्काजी ही कर रहे थे। शाम को जारी किए गए एक वीडियो संदेश में कक्काजी ने कहा कि उन्होंने कभी भी ऐसा बयान नहीं दिया है कि चढ़ूनी ने कांग्रेस से 10 करोड़ रुपये लिए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि बीकेयू के एक अन्य नेता राकेश टिकैत ने भी कक्काजी का समर्थन किया और कहा कि चढ़ूनी को सस्पेंड करने का फैसला कमेटी ने किया था।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनका आरोप अब सच साबित हो गया है कि किसानों के आंदोलन के पीछे कांग्रेस का हाथ है, लेकिन ‘इस तरह की काली करतूतों से कुछ नहीं होगा और न ही वे लोग मेरी सरकार गिरा पाएंगे। ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से एक्सपोज किया जाएगा। न तो मेरी सरकार गिरेगी और न ही मैं अपना टेंपर लूज करूंगा।’ खट्टर को पिछले हफ्ते करनाल में एक किसान महापंचायत को संबोधित करना था, लेकिन चढ़ूनी के नेतृत्व में किसानों ने इसमें तोड़फोड़ कर दी थी और प्रोग्राम को कैंसिल करना पड़ा था।

कांग्रेस को उम्मीद थी कि उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल खट्टर सरकार को गिराने के लिए समर्थन करेगी, लेकिन चौटाला ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। सोमवार को दुष्यंत चौटाला ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा गतिरोध का हल ढूंढ़ लिया जाएगा और हरियाणा सरकार को कोई खतरा नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हमारी सरकार निश्चित रूप से 5 साल पूरे करेगी।’

इस बीच सोमवार को किसानों ने सिंघू बॉर्डर के पास 26 जनवरी की अपनी ट्रैक्टर रैली का रिहर्सल किया, और कहा कि वे दिल्ली के आउटर रिंग रोड पर अपनी रैली निकालेंगे। ट्रैक्टर रैली का एक और रिहर्सल चंडीगढ़-पंजाब बॉर्डर पर किया गया। मध्य प्रदेश के रतलाम में 5 किमी लंबी रैली निकाली गई जिसमें 500 से भी ज्यादा ट्रैक्टरों ने हिस्सा लिया। भारत के चीफ जस्टिस एस. ए. बोबडे ने सोमवार को कहा कि ट्रैक्टर रैली की इजाजत देने के बारे में फैसला दिल्ली पुलिस को करना है। दिल्ली पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने सोमवार को किसान नेताओं से मुलाकात की और उनकी योजनाओं पर चर्चा की।

बहुत से संगठन और देश विरोधी ताकतें किसान आंदोलन की आड़ में अपने मंसूबे पूरे करने की फिराक में हैं। वे किसानों के आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश में हैं। विदेशों में बैठे खालिस्तानी तत्व, पाकिस्तान के इशारे पर साजिशें रच रहे हैं और राजपथ पर होने वाली गणतंत्र दिवस परेड में खलल डालने वालों को इनाम देने का ऐलान कर रहे हैं।

मुझे पूरा भरोसा है कि हमारे किसान राष्ट्रवादी हैं। उनका तिरंगे में विश्वास है, वे देशभक्त हैं और वे कभी भी भारत विरोधी ताकतों से हाथ नहीं मिलाएंगे। मैं किसान नेताओं के बीच पैदा हुई दरार को लेकर ज्यादा चिंतित हूं। उनके बीच अब किसानों की बात कम हो रही है, और सियासत की बात ज्यादा हो रही है । अब इस बात की चर्चा ज्यादा होती है कि कौन कांग्रेसी है, कौन अकाली है, कौन कम्युनिस्ट है और कौन RSS में रहा है। कुछ खट्टर सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करते रहते हैं।

जो भी नेता या ऐक्टिविस्ट्स मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहते हैं, वे सब इस आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं। उनमें से कुछ सामने आ गए हैं तो कुछ पर्दे के पीछे से ही सक्रिय हैं। उन्हें इस बात से मतलब नहीं है कि तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की किसान नेताओं की जिद सही है या नहीं। उनमें से कोई कहता है कि चूंकि धरने पर बैठे ज्यादातर किसान सिख हैं, इसलिए इनसे धार्मिक भावनाएं जुड़ गई हैं। कोई कहता है कि सरकार ने आंदोलन कर रहे किसानों में से कई को खालिस्तान समर्थक कहकर गलती कर दी। कुछ लोगों ने कहा कि आढ़तियों पर रेड करना और कई किसान नेताओं से NIA की पूछताछ ठीक नहीं है।

लेकिन कोई भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद किसानों की शंकाओं को दूर करने की पूरी कोशिश की। बीजेपी के किसी भी वरिष्ठ नेता ने किसान नेताओं पर खालिस्तान का समर्थक होने का आरोप नहीं लगाया। बल्कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो खुलकर कहा कि किसान नेताओं पर खालिस्तान से जुड़े होने का सवाल उठाना गलत है। पुलिस ने अपनी ओर से पूरा संयम बनाए रखा है। इसलिए इन सारे सवालों का कोई मतलब नहीं है। केंद्र सरकार अभी भी तीनों कृषि कानूनों में शामिल किसी भी प्रावधान में कोई भी संशोधन करने के लिए तैयार है और किसान नेताओं को यह प्रस्ताव मान लेना चाहिए।

इस पर मेरी सलाह है: किसानों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए कानूनों में संशोधन किए जाएं, और तीनों कानूनों को एक निश्चित अवधि के लिए आजमाया जाए। यदि कानून किसानों के लिए फायदेमंद साबित नहीं होते हैं, तो किसान फिर से अपना आंदोलन शुरू कर सकते हैं। आज की तारीख में जरूरी ये है कि सियासी लोग अपने फायदे के लिए किसानों के दर्द का, उनकी तकलीफ का फायदा न उठाने पाएं।

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My advice to farmers: Amend farm laws, give them a try, then agitate if you are not happy

akb0611Political parties are actively working behind the scenes in the ongoing farmers’ agitation which has entered its 55th day today. A coalition of anti-Modi activists is using the farmers to promote its agenda. On Monday, there was news of a rift among farmer leaders. A farmer leader from Bharatiya Kisan Union in Haryana, Gurnam Singh Chaduni was suspended by Samyukta Kisan Morcha. There were efforts for reconciliation and by the evening, the suspension was withdrawn.

There are signs of cracks in unity among the farmer leaders that have started showing in the last 24 hours. Chaduni and another farmer leader from Madhya Pradesh, Shiv Kumar Kakkaji made scathing remarks against each other. A local media quoted Kakkaji as alleging that Chaduni had taken Rs 10 crore to topple Chief Minister Manohar Lal Khattar’s government in Haryana, but Kakkaji later denied making such allegation. Chaduni, on his part, described Kakkaji as “an RSS agent”.

Later Chaduni clarified that he had organized a meeting of 11 political parties, including Congress and AAP, at the Constitution Club in Delhi, attended by political leaders, in his personal capacity, and would not do so in future. The Samyukta Kisan Morcha issued a statement on Monday evening and said that it was not associated with the meeting of political parties called by Chaduni. The Morcha said it has set up a committee to inquire into the matter. It clarified that it will not have direct engagement with any political party, though any organization or party was free to extend support to the movement.

Non-political farmer leaders say, they scrupulously followed the norm of not allowing flags of political parties to flutter at their agitation site, nor did they allow any political leader a platform to address them, but Congress and Left leaders consistently tried to infiltrate the movement. These political parties managed to convince some of the farmer leaders that they would win only if they do not accept any offer from the government. When pictures of Chaduni sitting with Haryana Congress leaders appeared in public, other farmer leaders objected and called for the seven-member apex meeting of farm leaders, in which a resolution was passed to suspend Chaduni. It was also decided that Chaduni will not be allowed to accompany the farmers’ delegation to the tenth round of talks with the Centre. There were rumours that Chaduni had sealed a deal with Congress leaders by taking money to topple Khattar government in Haryana.

Soon after his suspension, Chaduni alleged that Kakkaji has been sent by the RSS as a mole to create rift in the farmers’ agitation and that there were hardly 100 farmers in his organization. He threatened to send a defamation notice to the newspaper which published Kakkaji’s allegation that he was offered a ticket by Congress party.

Chaduni’s ire towards Kakkaji was because the latter was heading the seven-member committee that suspended him. In the evening, Kakkaji, in a video message, denied that he ever made the remark about Chaduni taking Rs 10 crore from Congress party. It should be noted that Kakkaji was supported by another BKU leader Rakesh Tikait who said that the decision to suspend Chaduni was taken by the committee.

Haryana chief minister Manohar Lal Khattar reacted to the development saying that his allegation that Congress was behind farmers’ agitation has now been proved true, but “these black deeds will never succeed and they will not be able to topple my government. Such people will be exposed in public. Neither will my government fall, nor shall I lose my temper”. Khattar was to address a kisan mahapanchayat in Karnal last week but it was disrupted by farmers led by Chaduni.

The Congress was expecting support from Deputy CM Dushyant Chautala’s Indian National Lok Dal to topple Khattar government, but Chautala refused to play ball. On Monday, Dushyant Chautala said, that there must be no doubt that a solution will be found out to the current impasse and there was no danger to the Haryana government. “Our government will surely complete five years”, he added.

Meanwhile, on Monday, farmers carried out a rehearsal of their January 26 tractor rally near Singhu border, and said that they would take out their rally on Delhi’s Outer Ring Road. Another rehearsal of tractor rally was done on Chandigarh-Punjab border. In Ratlam, Madhya Pradesh, more than 500 tractors took part in a five km long rally. The Chief Justice of India S. A. Bobde said on Monday that the decision to allow the tractor rally rests with Delhi Police. A top level official of Delhi Police met the farmer leaders on Monday and discussed their plans.

Already, anti-national elements are active to lower India’s image taking advantage of the farmers’ agitation. Khalistani elements, in collusion with Pakistan, have promised to give rewards to those who can disrupt Republic Day Parade at Rajpath.

I have full faith in the nationalist credentials of our farmer leaders. They have full faith in the Tricolour, they are patriotic and will never join hands with anti-Indian forces. I am more worried about the rift that has developed among farm leaders. They are no more talking about farm issues, but devoting more time to speak on political matters. They are finger pointing at who owes allegiance to the Congress, to AAP, to RSS and to Akali Dal. Some are vowing to topple Khattar government and some are blindly opposed to Prime Minister Narendra Modi.

Most of the leaders and activists, who are opposed to Modi, have now come under a single umbrella. Some of them have come out in the open and others are active behind the scenes. They are least bothered to think over whether the farmer leaders’ insistence on repeal of the three farm laws is justified or not. Some of them have been saying that since most of the farmers sitting on dharna are Sikhs, the issue is now related to religious concerns. Some others say the government made a mistake by saying that many of the agitating farmers were pro-Khalistan. Some leaders say the raids on commission agents (adhatiya) and the NIA interrogation of several farmer leaders were not correct steps.

But nobody is willing to acknowledge that it was Prime Minister Narendra Modi, who himself tried his best to remove all misgivings from the minds of farmers. No senior BJP leader levelled the allegation that the farmer leaders were pro-Khalistan. On the contrary, Defence Minister Rajnath Singh has said that it would be wrong to describe the farmer leaders as Khalistani. The police, on its part, maintained maximum restraint. All these questions are now meaningless. The Centre is still ready to amend any of the provisions mentioned in the three farm laws and the farm leaders must accept this offer.

My take on this is: let there be amendments to the laws to assuage the feelings of farmers, and give the three laws a try for a certain period. If the laws do not prove beneficial for the farmers, there is always the option for farmers to resume agitation. Today, it is essential that no political leader must be allowed to gain undue advantage from the pains and miseries of the farmers.

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किसानों को सियासी दलों का मोहरा बनने से बचना चाहिए

AKB30 दिल्ली में शुक्रवार को केंद्र और किसान नेताओं के बीच 5 घंटे तक चली बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि किसान नेता कृषि कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अड़े रहे, जबकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उनसे इन कानूनों के एक-एक बिंदु पर चर्चा करने की बात कही थी।

यह मीटिंग तक शुरू होते ही खत्म हो गई जब केंद्र ने किसान नेताओं से उन प्रावधानों के बारे में पूछा जिनपर उन्हें आपत्ति थी। इसके जवाब में किसान नेताओं ने कहा कि वे कानून के प्रावधानों पर बात नहीं करेंगे और बल्कि उनकी मांग है कि तीनों कानूनों को रद्द किया जाए।

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने किसान नेताओं से पूछा कि आपकी आशंका क्या है, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि सरकार ‘हां’ या ‘ना’ में बता दे कि वह कानून वापस ले रही है या नहीं। तोमर ने ये भी कहा कि अगर किसान नेताओं को कानून की बारीकियों पर बात नहीं करनी तो किसान सगंठन अपने एक्सपर्ट्स की कमेटी बना दें, इसके जरिए भी बात हो सकती है। लेकिन किसान संगठनों के नेताओं ने कहा कि न तो वे कोई कमेटी बनाएंगे, न ही सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से कोई बात करेंगे।

तोमर ने किसान नेताओं को समझाने की बहुत कोशिश की, वे न तो सुनने को तैयार थे, न समझने को। वे तीनों कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अड़े रहे। फिर ये मीटिंग पांच घंटे तक कैसे खिंच गई? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुछ किसान संगठनों के नेताओं ने मांग की कि हरियाणा और पंजाब में जिन किसानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं, वे वापस लिए जाएं। वहीं, कुछ किसान संगठनों ने आढ़तियों के खिलाफ चल रही ईडी की जांच को रोकने की मांग की।

किसानों ने साफ कह दिया कि वे सरकार से बात करने आए हैं और आगे भी आएंगे, लेकिन बात तभी बनेगी जब सरकार तीनों कृषि कानून वापस ले लेगी। अब अगले दौर की बातचीत 19 जनवरी को होगी और नरेंद्र सिंह तोमर को अभी भी उम्मीद है कि अगले राउंड में बात बन जाएगी। तोमर ने कहा कि सरकार को कड़ाके की ठंड में खुले में बैठे किसानों और उनके परिवारों की चिंता है।

नरेन्द्र सिंह तोमर बहुत पुराने नेता हैं, और बतौर किसान उनकी जड़ें मध्य प्रदेश के खेतिहर समुदाय से जुड़ी हुई हैं। वह अन्नदाता की मुश्किलें भी जानते हैं और किसानों के मुद्दे पर हो रही सियासत को भी समझते हैं। यही वजह है कि वह बार-बार काम बनने की उम्मीद जताते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि किसान संगठनों के कुछ नेता ये तय कर चुके हैं कि आंदोलन 26 जनवरी तक चले और इसके बाद ही कुछ रास्ता निकले। इसका अंदाजा भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की बात सुनकर हुआ जब उन्होंने कहा कि बात होती रहेगी और मीटिंग में भी आते रहेंगे, लेकिन सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़ेंगे और किसान गणतंत्र दिवस के मौके पर ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे।

किसान संगठन पूरी ताकत के साथ ट्रैक्टर रैली की तैयारी कर रहे हैं और इसमें हिस्सा लेने के लिए पंजाब और हरियाणा से सैकड़ों ट्रैक्टर दिल्ली की तरफ रवाना हो चुके हैं। 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च में हिस्सा लेने के लिए हरियाणा के फतेहाबाद-सिरसा से सैकड़ों की संख्या में ट्रैक्टरों का काफिला दिल्ली के लिए रवाना हुआ। सड़क पर चल रहे ट्रैक्टर्स का यह काफिला लगभग 2 किलोमीटर लंबा है। इस काफिले में तमाम ऐसे ट्रैक्टर्स भी शामिल हैं जिन्हें किसानों ने खासतौर से 26 जनवरी के की ट्रैक्टर रैली के लिए खरीदा गया है।

किसान दिल्ली के बाहरी इलाकों में बीते 51 दिनों से धरने पर बैठे हैं। अब तक लोगों की सहानुभूति किसानों के साथ रही है और इसकी एक बड़ी वजह ये है कि कड़ाके की सर्दी का सामना कर रहे किसानों का प्रदर्शन शान्तिपूर्ण है। दूसरी बात ये है कि अब तक किसानों ने नेताओं और राजनीतिक दलों को अपने आंदोलन से दूर रखा है। लेकिन अगर किसानों को भड़काने की बात हुई और उनके आंदोलन में सियासी लोग घुस गए, तो जाहिर है लोगों का सपोर्ट कम हो जाएगा।

गणतंत्र दिवस सेना के हमारे बहादुर अफसरों, जवानों और शहीदों को याद करने का दिन है। यह हमारे शूरवीरों की वीरता का, उनके शौर्य का पर्व है। यदि गणतंत्र दिवस समारोह में बाधा डालने की कोशिश की गई तो इससे सारे देश की बदनामी होगी और दुनिया में भारत का नाम खराब होगा। आंदोलनकारी किसान अपने प्रति लोगों की सहानुभूति और प्यार खो देंगे। मैं अभी भी हमारे किसान नेताओं से अपील करता हूं कि वे एक बार जरूर विचार करें कि उन्हें 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च निकालना चाहिए या नहीं। हालांकि ऐसा मुश्किल ही लग रहा है क्योंकि तमाम सियासी ताकतें किसानों को भड़काने में लगी हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को थकाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि बीजेपी सरकार को तीन कृषि कानूनों को खत्म करना ही होगा। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी 4-5 उद्योगपतियों को फायदा पहुंचा रहे हैं और वे ही देश भी चला रहे हैं। उन्होंने मोदी को याद दिलाया कि किस तरह कांग्रेस ने भट्टा पारसौल आंदोलन के बाद एनडीए सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से पीछे हटने के लिए मजबूर किया था।

अब इस बात को सब समझते हैं कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट, ये दोनों सियासी दल अपने फायदे के लिए किसानो के आंदोलन का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस और कम्युनिस्ट, दोनों ही पार्टियां किसानों के जरिए अपनी बंजर हो चुकी जमीन पर वोटों की फसल उगाना चाहती हैं। उनकी ख्वाहिश है कि राजनीतिक रूप से बंजर उनकी जमीन पर मेहनत किसानों की लगे, खून-पसीना किसान का बहे और उनके लिए बंपर सियासी फसल पैदा हो।

अगर राहुल गांधी को वाकई में किसानों की चिंता होती तो वह दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी में सड़क पर ठिठुर रहे किसानों को उनके हाल पर छोड़कर नए साल की छुट्टी मनाने इटली न जाते। अगर राहुल गांधी को किसानों की फिक्र होती तो विदेश में न्यू इयर मनाने की बजाए बारिश में सड़क पर भीग रहे किसानों के पास पहुंचते।

क्या ये बात सही नहीं है कि पंजाब के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने कृषि कानूनों में इसी तरह के बदलावों का वादा किया था जैसा कि मोदी सरकार ने किया है? क्या ये सही नहीं है कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा के इलेक्शन में अपने मैनिफेस्टो में APMC ऐक्ट में बदलाव करके कृषि क्षेत्र में प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देने का, और किसानों को कहीं भी और किसी को भी फसल बेचेने का हक देने का वादा किया था? अब अगर यही बदलाव नरेंद्र मोदी की सरकार ने कर दिए कांग्रेस नेता उन्हें ‘किसानों का दुश्मन’ और ‘अंबानी और अडानी का दोस्त’ करार दे रहे हैं। इसे कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है?

मुझे लगता है कि किसान भाइयों को विपक्षी दलों की सियासत का मोहरा नहीं बनना चाहिए? उन्हें अपना आंदोलन चलाने का और अपनी आवाज उठाने का पूरा हक है, लेकिन सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट की बात भी सुननी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा है कि रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, क्योंकि जब बातचीत के रास्ते बंद होते हैं तो दोनों पक्षों में दूरियां बढ़ती जाती हैं और फिर रास्ते अलग हो जाते हैं।

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Farmers must not become pawns in the hands of political parties

AKB30 The five-hour-long meeting between the Centre and farmer leaders in Delhi on Friday did not yield any breakthrough as the farmers’ representatives stuck to their single demand for scrapping of the three new farm laws, while the Agriculture Minister Narendra Singh Tomar offered clause-by-clause discussion on these legislations.

The meeting ended almost as soon as it began when the Centre asked farmer leaders to point out the clauses on which they had objections. The farmers’ representatives said they would not discuss the clauses and wanted the three laws to be scrapped.

The Union ministers asked what were their apprehensions, and the farmer leaders replied that the Centre must tell a clear-cut ‘yes’ or ‘no’ to their demand for repeal. Tomar even asked the farmer leaders to set up their own experts’ committee for discussing the legal clauses, but the farmer leaders said they would neither form a committee nor would appear before the experts’ committee set up by the Supreme Court.

Tomar tried his best to persuade the farmer leaders, but the later stuck to their rigid stand for repeal of the three laws. Then why did the talks stretch for five hours? It was because some of the farmer leaders demanded that FIRs filed against them in Haryana and Punjab be withdrawn, while some others demanded that the ED probe against adhatiyas (commission agents) be stopped.

The farmer leaders told the Centre that they would continue to come to the talks but any breakthrough can happen only if the Centre agrees to scrap all the three laws. The next round of talks will take place on January 19 and Tomar was still hopeful of a breakthrough. He said, the government was worried about farmers and their families sitting out in the biting cold in the open.

Tomar is an astute politician and an agriculturist who has his roots among the farming community in Madhya Pradesh. He knows the problems of ‘annadatas’(food providers). He is still hopeful of a breakthrough, but I think most of the farm leaders want the agitation to continue till January 26. Bharatiya Kisan Union leader Rakesh Tikait let the cat out of the bag when he said that the leaders would continue to attend talks, but the Centre must withdraw the laws and the farmers will take out a tractor rally on Republic Day.

Already preparations have started and hundreds of tractors have started moving towards Delhi from Punjab and Haryana to join the rally. A convoy of several hundred tractors started on its journey to Delhi from Haryana’s Fatehabad-Sirsa. The convoy was almost two kilometres long. Several of the tractors taking part were those which were bought by farmers for the January 26 tractor rally.

The farmers are sitting on dharna on Delhi’s outskirts for the last 51 days. They have gained sympathy among the common masses, the main reason being the dharna has so far been peaceful and the squatters have been braving the cold winter. Secondly, till now, the farmers have kept politicians and political parties at arm’s length from their agitation. But if efforts are made to incite farmers and if political activists infiltrate their ranks, the agitating farmers will lose people’s sympathy.

Republic Day is a day for remembering our brave army officers, jawans and martyrs. It is a day for celebrating the gallantry of our heroes and if any effort is made to disrupt the Republic Day celebrations, it will lower India’s prestige in the comity of nations. The agitating farmers will then lose the love and sympathy of the people. I still appeal to our farmer leaders to rethink whether they should bring out a tractor march on January 26 or not. This seems to be a tall order because political parties are already instigating the farmers.

On Friday, Congress leader Rahul Gandhi joined his party workers to demand repeal of the three farm laws. He alleged that the Prime Minister Narendra Modi was trying to tire out the farmers and asserted that the BJP government will have to scrap the three farm laws. Rahul Gandhi also alleged that Prime Minister Modi was benefiting four or five businessmen and they were running the country. He reminded Modi of how the Congress forced the NDA government to back out from amending land acquisition law after the Bhatta Parsol agitation.

It is no more a secret that the Congress and the Left parties have been trying to incite the agitating farmers. Both the Congress and Left are trying to harvest political crops on their fallow land as their mass base is shrinking fast. They want the agitating farmers to toil on their politically unfertile land and hand over a bumper political crop to them.

Had Rahul Gandhi been really worried about the demands of farmers, he would not have gone vacationing to Italy during New Year holidays and left the farmers to fend for themselves in the open in Delhi’s biting winter.

Is it not a fact that the Congress had promised the same laws during assembly polls that Modi government has enacted ? Is it not a fact that the Congress had promised private sector partnership in agriculture, right to sell their crops anywhere in India and amendment of APMC Act in its 2019 Lok Sabha poll manifesto? Now that Modi government has implemented those promises, the Congress leaders are describing him as ‘enemies of farmers’ and ‘friends of Ambanis and Adanis’. How can this be justified?

Farmers should not become political pawns in the hands of opposition parties. They have the right to agitate and let their voices be heard, but all parties must respect the Supreme Court’s order. Even the apex court has said that discussions are the only way out and if talks are discontinued, the gap between the two camps will become wider.

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