Rajat Sharma

My Opinion

यूपी के चुनावी दंगल में अपराधियों की कैसे हुई वापसी?

rajat-sir बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को यह बता दिया कि बीजेपी के चुनाव प्रचार का फोकस क्या होगा। उन्होंने बाहुबली और अपराधिक चरित्र के नेताओं पर जमकर निशाना साधा। योगी ने कहा कि विधानसभा चुनाव के लिए जारी की गई समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट, इस पार्टी के ‘दंगा प्रेमी’ और ‘तमंचावादी’ होने का सबूत है। उन्होंने कहा-‘उत्तर प्रदेश की जनता पलायन नहीं, प्रगति चाहती है। जनता दंगे और अपराधियों से मुक्त प्रदेश चाहती है।’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने दावा किया कि पिछले 5 साल में दंगाई और पेशेवर अपराधी या तो राज्य छोड़कर भाग गए थे या जेल में चले गए थे। लेकिन अब उनमें से कई को अखिलेश यादव ने टिकट दिया है। योगी ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने अपनी पहली लिस्ट में ही सहारनपुर और मुज़फ़्फ़रनगर के दंगाई, कैराना में हिन्दुओं के पलायन के ज़िम्मेदार लोगों को टिकट देकर अपनी मानसिकता साफ कर दी है।

मैंने इंडिया टीवी के रिपोर्टर्स से इन तमाम विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि खंगालने को कहा। इन उम्मीदवारों के एफिडेविट चेक किए गए और हमारे रिपोर्टर्स ने इन उम्मीदवारों से बात की। इन उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि और इनके मुकदमों की लिस्ट देखेंगे तो आप चकित रह जाएंगे।

सबसे पहले कैराना की बात करते हैं। यहां से समाजवादी पार्टी ने नाहिद हसन को उम्मीदवार बनाया है। जब नाहिद हसन को समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार घोषित किया था उस वक्त वो फरार चल रहा था। लेकिन जब नाहिद पर्चा दाखिल करने गया तो पुलिस ने उसे दबोच लिया। अदालत ने नाहिद हसन को 14 दिन की कस्टडी में जेल भेज दिया है।

नाहिद का जब पुराना रिकॉर्ड खंगाला गया तो पता चला कि उसपर अभी कुल 17 मुकदमे चल रहे हैं। इनमें हत्या की कोशिश, बलवा, दंगा करने, लोगों पर हमला करने, धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और समाज में वैमनस्यता पैदा करने के मामले हैं। नाहिद के खिलाफ गुंडा एक्ट और गैंगस्टर एक्ट भी लगा है। एक साल पहले स्थानीय अदालत ने नाहिद हसन को भगोड़ा घोषित कर दिया था। लेकिन जैसे ही समाजवादी पार्टी ने उसे उम्मीदवार बनाया उसके अगले ही दिन वह नमांकन दाखिल करने पहुंच गया। लेकिन नामांकन दाखिल करने से पहले ही पुलिस ने नाहिद को पकड़ लिया। नाहिद को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। चूंकि जमानत की उम्मीद कम है इसलिए बैकअप के तौर पर नाहिद हसन की बहन इकरा हसन ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल किया है। नामांकन दाखिल करने के बाद इकरा हसन ने कहा कि उनके भाई पर जितने भी मामले चल रहे हैं वो फर्जी हैं। जबकि सच्चाई ये है नाहिद पर दर्ज कुल 17 मामलों में से ज्यादातर मामले योगी के सत्ता में आने से पहले दर्ज हो चुके थे।

उधर, हापुड़ के धौलाना सीट से समाजवादी पार्टी ने असलम चौधरी को टिकट दिया है। असलम चौधरी पर 10 मुकदमे चल रहे हैं। इनमें दफा 307 यानी हत्या की कोशिश, जान से मारने की धमकी, जमीनों पर जबरन कब्जे और गैंगस्टर एक्ट के तहत मामले चल रहे हैं। असलम चौधरी दंगे की साजिश करने, भड़काऊ बयान देकर बलवा कराने के मामले में भी आरोपी हैं। इंडिया टीवी के रिपोर्टर ने जब असलम चौधरी से उनपर चल रहे मुकदमों के बारे में पूछा तो उन्होंने ज्यादातर मुकदमों को झूठा और फर्जी बताया। हर मुकदमे की एक कहानी सुना दी। इसके बाद उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा मुकदमे तो योगी के खिलाफ थे, तो योगी साधु और हम अपराधी कैसे हो गए?असलम चौधरी बीएसपी के विधायक थे और कुछ दिन पहले ही समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं। असलम चौधरी ने अपने हलफनामे में 10 मुकदमों का जिक्र किया है लेकिन पुलिस रिकॉर्ड से पता चलता है कि उनके खिलाफ कुल 21 केस लंबित हैं।

मेरठ शहर विधानसभा सीट से रफीक अंसारी सपा के उम्मीदवार हैं। रफीक अंसारी का दावा है कि उनपर हत्या की कोशिश का सिर्फ एक केस चल रहा है। यह मामला वर्ष 2007 का है। इस मामले में कोर्ट ने रफीक के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था जिस पर उन्होंने हाईकोर्ट से स्टे ले रखा है। रफीक अंसारी समाजवादी के मौजूदा विधायक हैं।

हाजी यूनुस बुलंदशहर सीट से राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के उम्मीदवार हैं। उनके खिलाफ हत्या की कोशिश का केस चल रहा है। यह केस समाजवादी पार्टी की सरकार के वक्त दर्ज हुआ था। लेकिन जनाब का कहना है कि यह झूठा मामला है। वे इस मुकदमे को लड़ाई-झगड़े का मामला बता रहे हैं। हाजी यूनुस के खिलाफ सात मुक़दमे चल रहे हैं। इनमें रेप, हत्या की कोशिश, जान से मारने की धमकी और मारपीट जैसे संगीन मुकदमे हैं। हालांकि हाजी यूनुस कह रहे हैं कि उनपर कोई गंभीर केस नहीं है और जो भी मामले हैं वो पारिवारिक विवादों से जुड़े हैं। हाजी यूनुस ने कहा कि अगर हमारी सरकार बन गई और उनके नेता मुख्यमंत्री बन गए तो उनके मुकदमे भी एक घंटे में खत्म हो जाएंगे।

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की लिस्ट लंबी है। मदन सिंह कसाना ऊर्फ मदन भैया को आरएलडी ने लोनी सीट से चुनाव मैदान में उतारा है। लोनी इलाके में उनका खौफ है, उनकी छवि एक बाहुबली नेता की है। कुछ दिन पहले जब सीएम योगी आदित्यनाथ नोएडा में चुनाव प्रचार के लिए आए थे तब उन्होंने मदन भैया का नाम लेकर समाजवादी पार्टी पर निशाना भी साधा था। मदन भैया ने शुक्रवार को अपने राजनीतिक विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे हद में रहकर चुनावी बातें करें, वरना याद रखें कि उनका नाम मदन भैया है। जब इंडिया टीवी के रिपोर्टर ने मदन भैया से कहा कि यह तो धमकी वाला अंदाज है, इसीलिए लोग आपको बाहुबली कहते हैं। इस पर मदन भैया ने कहा-‘बाहुबली होना बुरा नहीं है, बाहुबली तो बजरंगबली भी हैं।’ मदन भैया ने कहा, उनके खिलाफ केवल दो मामले लंबित हैं और दोनों राजनीति से प्रेरित हैं।

एक बात तो हम सबने देखी कि यूपी में योगी सरकार ने अपने पांच साल के शासन में अपराधियों, गैंगस्टर्स और असामाजिक तत्वों के खिलाफ जबरदस्त एक्शन लिया। उनकी प्रॉपर्टी जब्त की, सरकारी जमीनों से कब्जे को हटाया। करीब 1500 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वसूली। योगी सरकार आने से पहले किसी ने ऐसा नज़ारा नहीं देखा था कि अपराधी हाथ जोड़कर, गले में तख्ती लटकाकर थाने में पहुंचे और कहे कि जेल भेज दो वरना पुलिस ठोक देगी। क्या पहले कभी किसी ने देखा कि अदालत में अपराधी अपनी जमानत को रद्द करवाने के लिए आवेदन दे और कहे कि उसे जेल जाना है। जेल में वो ज्यादा सुरक्षित है। जेल से बाहर पुलिस एनकाउंटर कर देगी।

यह सही है कि योगी ने अपराधियों के दिल में कानून, पुलिस और प्रशासन का खौफ तो पैदा किया है। इसमें कोई दो राय नहीं है। योगी के राजनीतिक विरोधी भी इस बात को मानते हैं। लेकिन राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों का राजनीति में आना आज भी जारी है। इसे रोकने के लिए कानून भी बनाए गए लेकिन अपराधी उससे बचने का रास्ता ढूंढ लेते हैं। कानून यह है कि अगर किसी को दो साल से ज्यादा की सजा होती है तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता। लेकिन सजा होने में 20 साल लग जाते हैं, तब तक वो कई बार चुनाव लड़ चुका होता है और कई बार तो मंत्री भी बन चुका होता है। दूसरी बात यह है कि अपराधियों के खिलाफ कितने केस चल रहे हैं, इसकी जानकारी जनता को नहीं होती।

इस बार चुनाव आयोग ने यह नियम बनाया था कि उम्मीदवारों को अपने आपराधिक रिकॉर्ड का पूरा ब्यौरा अखबारों में छपवाना होगा। जनता को बताना होगा। साथ ही राजनीतिक दल जिन लोगों को टिकट देंगे उनके खिलाफ चल रहे मामलों की जानकारी वेबसाइट पर डालनी होगी। अब यह नियम तो बन गया लेकिन जब हमारे रिपोर्टर्स ने समाजवादी पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट देखी तो पता चला कि ब्यौरा तो अपलोड किया गया है लेकिन उसे देखकर कोई समझ ही नहीं सकता कि किसके खिलाफ कौन से अपराध का केस चल रहा है। वेबसाइट पर तमाम धाराएं लिख दी गई हैं जिससे आम आदमी यह नहीं समझ पाता कि अपराधी कितना बड़ा है और उस पर किस अपराध के लिए केस दर्ज हुआ है। चुनाव आयोग को इस कमी पर ध्यान देना चाहिए।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

How criminals in UP are back in the electoral fray?

rajat-sir BJP’s chief ministerial candidate Yogi Adityanath on Friday set the tone and focus of his party’s campaign, by speaking out against ‘bahubali’ politicians who wield the gun, and have a past record of many criminal cases. He said, there were several “rioters” (danga-premi) and “tamachawaadi” (gun toting criminals) in the list of SP candidates. “The people of UP are no more escapist, they want progress and a state free from riots and criminals”, Yogi said.

The UP chief minister claimed that rioters and gangsters were on the run for the last five years during his rule, but many of them have now been given tickets by Akhilesh Yadav. Yogi alleged that the masterminds of Saharanpur and Muzaffarnagar riots and those behind the exodus of Hindus from Kairana have now become SP candidates.

I sent India TV reporters to check the affidavits filed by such candidates having criminal backgrounds, and the cases mentioned in those affidavits are eye-openers.

Take for instance, Kairana, from where exodus of Hindus took place five years ago due to threats from gangsters belonging to other community. SP has given ticket to Nahid Hasan, the MLA from Kairana. When he went to file his nomination, he was promptly arrested by police and sent to judicial custody.

There are 17 cases against Nahid Hasan, which include attempt to murder, rioting, cheating, criminal conspiracy, and creating ill-will between communities. Sections of Goonda Act and Gangster Act have also been added in these cases. A year ago, Nahid Hasan was declared absconder by a local court, but soon after getting SP ticket, he went to file his nomination papers. He was arrested and sent to 14 days’ judicial custody. Since there are slim chances of him getting bail, his sister Iqra Hasan has filed nomination as an independent for backup. Iqra claims that most of the cases filed against her brother were fake. The fact is, many of the cases out of the total number of 17 were filed against Nahid Hasan, even before Yogi came to power.

In Dhaulana seat of Hapur, Aslam Choudhary has been given the SP ticket. There are ten criminal cases including those of attempt to murder, pending against him. Other cases include threat to life, forcible occupation of land, rioting and making inflammable speeches. Cases under Gangsters Act have been lodged against Choudhary. When asked by India TV reporter, Aslam Choudhary said, most of the cases were false. Instead, he alleged that there were criminal cases against chief minister Yogi too. “How can he become a saint and I, a criminal?”, he asked. Aslam Chaudhary was BSP MLA, who joined SP recently. In his affidavit, he mentioned only 10 cases, but police records show, there are 21 cases pending against him.

In Meerut City, Rafiq Ansari is the SP candidate. He has a criminal case of attempt to murder filed in 2007, but he got a stay on from High Court on his arrest warrant issued by a lower court. Ansari is the sitting SP MLA.

There is another example. Haji Younus, the RLD candidate from Bulandshahr, has a criminal case of attempt to murder since Akhilesh Yadav’s rule, but Haji Younus says, the case is false. The fact is, there are seven cases of attempt to murder, attempt to rape, giving threat of life and other charges, against him. Haji Younus claims, most of these cases are related to family disputes. He says, if we have our own chief minister after polls, we will get all these cases closed, within an hour.

The list of candidates with criminal background is long. Madan Singh Kasana alias Madan Bhaiya, is the RLD candidate from Loni, Ghaziabad. He is feared in his locality for his ‘bahubali’ image. A few days ago, Yogi Adityanath mentioned his name during his poll campaign in Noida. On Friday, Madan Bhaiya warned his political rivals that they should remain within limits while criticizing him, “otherwise they must remember that my name is Madan Bhaiya”. When India TV reporter met him, Madan Bhaiya said, “it is not a shame if one becomes a Bahubali. Even Bajranbali (Lord Hanuman) was a ‘bahubali’”. He said, he had only two cases pending against him, and both were politically motivated.

It is an acknowledged fact that during the five years of Yogi’s rule, stringent action was taken against gangsters, criminals and anti-social elements. Properties of mafia gangsters were seized and in several cases demolished by using bulldozers. Forcible occupation of government land by mafia gangsters was removed in several cases.

More than Rs 1,500 crore worth properties were recovered. People of UP never saw in the past, videos of gangsters putting placards round their necks, begging police to arrest them and put in jail, before they die in encounters. Did anybody see in the past, criminals filing petitions in courts pleading for cancellation of their bail, and opting for judicial custody, because they considered themselves safe inside jail?

Even his rivals admit that Yogi struck terror of police, administration and law in the hearts of criminals during five years of his rule, but even to this day, criminalization of politics and entry of criminals in politics continue to be rampant.

Despite enactment of laws barring entry of criminals in politics, they find ways to circumvent the law. The law says, anybody convicted even for two years imprisonment stands disqualified from contesting polls, but there are instances where it takes even up to 20 years for getting a conviction. By that time, the criminal, taking undue advantage of legal delay, contests elections several times, and in some cases, also becomes a minister. Secondly, the common public who go to polling booths to cast their votes, do not know about the cases pending against candidates.

This time, Election Commission has made it mandatory for candidates to publish the list of cases pending against them in newspapers for the benefit of voters. Political parties, the EC has said, must put on their websites the list of cases pending against their official candidates.

Our reporters checked the official website of Samajwadi Party and found that the cases were uploaded, but nobody can clearly understand what are the cases pending against the candidates. Only sections of IPC and CrPC are mentioned, and the common man never understand the charges under which these sections have been mentioned. The Election Commission should go through this point and plug the loopholes.

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

अखिलेश- जयंत गठबंधन को लेकर पश्चिमी यूपी में असमंजस !

AKBउत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच सीटों को लेकर हुए समझौते पर भी मुश्किलों के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल,अखिलेश यादव ने जिन सीटों के लिए राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) से समझौता किया था और जिन सीटों पर आरएलडी के लोगों को टिकट दिए, उनमें से कई उम्मीदवारों के खिलाफ बगावत हो गई है। स्थानीय जाट नेता समाजवादी पार्टी द्वारा मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारने का विरोध कर रहे हैं। आरएलडी सुप्रीमो जयंत चौधरी के लिए इन उम्मीदवारों को संभालना मुश्किल हो गया है। वहीं एक अन्य घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने मैनपुरी जिले की करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उधर, समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के एक और करीबी रिश्तेदार ने गुरुवार बीजेपी का दामन थाम लिया।

सबसे पहले आपको मथुरा की मांट विधानसभा सीट का हाल बताता हूं। सपा और आरएलडी के बीच मतभेदों का जीता-जागता उदाहरण इस सीट पर देखा जा सकता है। यहां समाजवादी पार्टी और आरएलडी गठबंधन का एक उम्मदीवार पहले ही आरएलडी के चुनाव निशान पर पर्चा भर चुका है। अब इसी सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट पर दूसरे उम्मीदवार ने भी नामांकन कर दिया है। इस सीट पर सपा प्रत्याशी संजय लाठर और आरएलडी प्रत्याशी योगेश नौहवार ने पर्चा दाखिल किया है। यह कंफ्यूजन इसलिए हुआ क्योंकि पहले यह सीट आरएलडी को देने का फैसला हुआ था। इसलिए जयंत चौधरी ने योगेश नौहवार को चुनाव निशान एलॉट कर नामांकन दाखिल करने को कहा और योगेश नौहवार ने पर्चा भर दिया। लेकिन बाद में अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी से बात की और यह सीट समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को देने को कहा। अखिलेश की बात जयंत चौधरी मान गए और मांट सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार संजय लाठर ने पर्चा भर दिया।

संजय लाठर कह रहे हैं कि उन्हें पूरा भरोसा है कि योगेश नौहवार मान जाएंगे। लेकिन नौहवार अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि वे तभी इस सीट से अपना नामांकन वापस लेंगे जब आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी खुद यहां से चुनाव लड़ेंगे। नौहवार का कहना है कि वे केवल 432 वोटों के मामूली अंतर से पिछला चुनाव हारे थे और इस बार इस सीट को नहीं बचा सके तो इसे दुर्भाग्य समझेंगे। योगेश नौहवार अगर किसी दबाव में जयंत चौधरी की बात मानते हुए पर्चा वापस ले लेते हैं तब भी वे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के लिए उतनी मेहनत तो नहीं करेंगे जिसकी उम्मीद जयंत चौधरी और अखिलेश यादव को होगी। अब इन दोनों में से जो उम्मीदवार भी मैदान से हटेगा वह दूसरे को जिताने के लिए जमीन पर काम तो नहीं करेगा। ऐसी मुश्किल कई सीटों पर है।

मेरठ की सिवालखास विधानसभा सीट को लेकर सपा और आरएलडी के अंदर तीन दिन से जंग छिड़ी हुई है। समाजवादी पार्टी के साथ हुए समझौते के तहत यह सीट आरएलडी को मिली है। लेकिन जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी के नेता गुलाम मोहम्मद को आरएलडी का चुनाव चिन्ह दे दिया है। यानि चुनाव निशान राष्ट्रीय लोकदल का लेकिन उम्मीदवार समाजवादी पार्टी का। इस बात से आरएलडी के नेता नाराज हैं।

सिवालखास से समाजवादी पार्टी के नेता गुलाम मोहम्मद पिछला चुनाव हार गए थे। सीटों के बंटवारे के तहत अखिलेश यादव ने यह सीट आरएलडी को दे दी। आरएलडी के नेता चाहते थे कि किसी जाट नेता को मैदान में उतारा जाए और राजकुमार सांगवान को टिकट दिया जाए। लेकिन सिवालखास सीट आरएलडी को देने पर गुलाम मोहम्मद ने विरोध कर दिया। तब रास्ता यह निकाला गया कि गुलाम मोहम्मद आरएलडी के टिकट पर चुनाव लड़ लें। लेकिन अब आरएलडी में बगावत हो गई। राजकुमार सांगवान के समर्थकों ने जगह-जगह हंगामा शुरू कर दिया। सिवालखास विधानसभा क्षेत्र में कई जगह समाजवादी पार्टी और आरएलडी के कार्यकर्ताओं में भिड़ंत हुई है। आरएलडी के समर्थक गुलाम मोहम्मद के समर्थकों को प्रचार से रोक रहे हैं, गांवों में घुसने नहीं दे रहे हैं।

गुलाम मोहम्मद को टिकट देने पर आरएलडी में इस हद तक नाराजगी है कि कई जगह पार्टी सुप्रीमो जयंत चौधरी के खिलाफ नारेबाजी की गई। आरएलडी के झंडे और बैनर तक जलाए गए। उधर, गुलाम मोहम्मद ने कहा कि कोई विरोध नहीं हैं, राजकुमार सांगवान से उनकी बात हो गई है और वो मान गए हैं। हालांकि गुलाम मोहम्मद को टिकट देने से जाटों की उपेक्षा का मैसेज निचले स्तर तक गया है। जाट समर्थकों के बीच यह संदेश गया है कि उनके दावों की अनदेखी की गई है।

उधर, गौतमबुद्धनगर जिले की जेवर विधानसभा सीट पर गुर्जर नेता अवतार सिंह भड़ाना ने चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि वे कोरोना से पीड़ित होने के चलते चुनाव मैदान से बाहर हो रहे हैं। भड़ाना बीजेपी छोड़कर आरएलडी में शामिल हुए थे। उन्होंने तीन दिन पहले पर्चा भी दाखिल कर दिया था। भड़ाना के इस ऐलान के बाद पार्टी की ओर से एडवोकेट इंद्रवीर भाटी को मैदान में उतारने का फैसला किया गया लेकिन देर रात भड़ाना ने ट्वीट किया कि उनकी आरटी-पीसीआर रिपोर्ट निगेटिव आई है, वह आरएलडी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। सूत्रों के कहना है कि भड़ाना ने अपने विधानसभा क्षेत्र में एक सर्वे कराया था और उसमें यह पाया कि बीजेपी बड़े अंतर से चुनाव जीतने जा रही है। इस वजह से उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था लेकिन देर रात उन्होंने अपना मन बदल लिया।

उधर, बागपत के पास छपरौली विधानसभा सीट से आरएलडी ने पूर्व विधायक वीरपाल राठी को उम्मीदवार बनाया था जिसका जबरदस्त विरोध हुआ। नाराज लोग दिल्ली में चौधरी जयंत सिंह के घर पहुंच गए और उम्मीदवार बदलने की मांग करने लगे। लोगों ने जयंत चौधरी से यहां तक कह दिया कि अगर छपरौली से उम्मीदवार नहीं बदला गया तो जाट पंचायत बुलाई जाएगी और नए उम्मीदवार को निर्दलीय लड़ाया जाएगा। लोगों के विरोध के बाद जयंत चौधरी ने छपरौली से वीरपाल राठी को हटाकर अजय कुमार को उम्मीदवार बनाया है।

आमतौर पर नेता और कार्यकर्ता तब तक आपस में लड़ते हैं जब तक टिकट फाइनल नहीं हो जाता लेकिन समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल में उम्मीदवारों के नाम का ऐलान होने के बाद बगावत होना अच्छे संकेत नहीं हैं। इसके दो मतलब हो सकते हैं, पहली बात यह हो सकती है कि पार्टी के बड़े नेताओं अखिलेश यादव और जयंत चौधरी ने तो हाथ मिला लिया लेकिन निचले स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के दिल नहीं मिल पाए। दूसरी बात यह हो सकती है कि उम्मीदवारों का चयन करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि उनके खिलाफ अपने ही लोग आवाज उठा सकते हैं।

अगर पहले फेज से ऐसा माहौल बना तो अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पश्चिमी यूपी में पहले चरण के चुनाव में सपा का सिर्फ आरएलडी के साथ गठबंधन है। लेकिन यूपी के बाकी इलाकों में तो बहुत सारी छोटी-छोटी पार्टियां हैं। सबकी अपनी-अपनी मांग है। इन पार्टियों के नेता काफी मुखर हैं। वे अपनी पार्टी के लिए और अपनी जाति के लिए खुलकर लड़ते हैं। अगर उन सबकी बात मान ली गई तो अखिलेश की अपनी पार्टी के लिए सीटें कम पड़ जाएंगी और अपनी पार्टी के नेता नाराज हो जाएंगे।

भारतीय राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि गठबंधन बनाना आसान होता है लेकिन चलाना बहुत मुश्किल। इसी तरह से परिवार के नाम पर राजनीति करना आसान होता है लेकिन पूरे परिवार को साथ लेकर चलना मुश्किल होता है। अखिलेश की लीडरशिप में मुलायम सिंह यादव का परिवार टुकड़ों में बिखर रहा है।

गुरुवार को मुलायम सिंह यादव के नजदीकी रिश्तेदार प्रमोद गुप्ता ने भी समाजवादी पार्टी छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए। गुप्ता औरैया जिले की बिधूना सीट से सपा के विधायक रह चुके हैं। वे मुलायम सिंह की पत्नी साधना गुप्ता के जीजा लगते हैं। पांच साल पहले विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। जिसके बाद प्रमोद गुप्ता अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। अब जबकि अखिलेश के चाचा सपा गठबंधन में शामिल हो गए तब प्रमोद गुप्ता को बिधूना सीट से टिकट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन बिधूना से बीजेपी विधायक विनय शाक्य और उनके भाई के सपा में शामिल होने के बाद समीकरण पूरी तरह से बदल गए। लिहाजा, टिकट न मिल पाने पर गुप्ता बीजेपी में शामिल हो गए और उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश ‘वन मैन शो’ चला रहे हैं और अपने पिता की भी नहीं सुन रहे हैं। गुप्ता ने आरोप लगाया कि अखिलेश अपने परिवार के एक-एक रिश्तेदार को दरकिनार कर रहे हैं।

अखिलेश ने गुरुवार को कहा कि वे अपने परिवार में ‘वंशवादी राजनीति को खत्म’ करने के लिए बीजेपी के आभारी है। यह बात गौर करनेवाली है कि जब मंत्री और नेता बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो रहेथे तो अखिलेश खुशी से माला पहनाकर उनका स्वागत कर रहे थे। ठीक उसी उत्साह से बीजेपी के नेता भी मुलायम सिंह परिवार से बीजेपी में आनेवाले लोगों को भगवा पट्टे पहनाकर स्वागत कर रहे हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अखिलेश मुलायम सिंह के अपने इलाके में दबदबे का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। गुरुवार को समाजवादी पार्टी की ओर से यह ऐलान किया गया कि अखिलेश मैनपुरी की करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। मैनपुरी से ही मुलायम सिंह लोकसभा के सांसद हैं। मुलायम सिंह की प्रारंभिक शिक्षा करहल में ही हुई थी। उन्होंने जैन इंटर कॉलेज से पढ़ाई पूरी की और उसी कॉलेज में लेक्चरर बने थे।

मुलायम सिंह ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत मैनपुरी से ही की थी। उन्होंने मैनपुरी, आजमगढ़ और इटावा में कड़ी मेहनत की और अपना जनाधार बनाया। उन्होंने लगातार इन इलाकों के गांवों की यात्रा की और समाजवादी पार्टी की स्थापना की। इस इलाके में मुलायम सिंह के प्रभाव की बड़ी वजह यह भी है कि यहां यादव और मुसलमान एकजुट हैं, और दोनों के बीच सह-अस्तित्व की भावना है। इलाके के यादव और मुसलमान मुलायम सिंह और उनके परिवार का काफी सम्मान करते हैं। करहल से चुनाव लड़ना राजनीतिक तौर पर अखिलेश यादव के लिए प्लस प्वाइंट है। वहीं समाजवादी पार्टी के इस फैसले पर बीजेपी सांसद सुब्रत पाठक ने कहा कि हार के डर से अखिलेश ने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र की सुरक्षित सीट चुनी है।

बीजेपी के नेता चाहे जो भी कहें लेकिन वर्ष 2002 को छोड़कर कई दशकों से करहल की सीट समाजवादी पार्टी के लिए एक सुरक्षित सीट रही है। 2002 में इस सीट से जीत हासिल करनेवाले बीजेपी उम्मीदवार भी बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर की तरह मैनपुरी को भी समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मैनपुरी की चार में से तीन विधानसभा सीटें जीती थी। इस बीच गुरुवार को भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ ने भी ऐलान कर दिया कि वह गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे। चुनाव का नतीजा क्या होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं है।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

Akhilesh-Jayant alliance: Confusion on ground in Western UP !

akb fullPolitical developments are taking place at a fast pace with differences arising among Samajwadi Party and RLD leaders over fielding of candidates in western UP. Local Jat leaders are protesting fielding of Muslim candidates by Samajwadi Party, and RLD chief Jayant Chaudhary is having a tough time persuading them to fall in line. In another development, SP supremo Akhilesh Yadav has decided to contest from Karhal assembly seat in Mainpuri district. Another close relative of SP patriarch Mulayam Singh Yadav joined BJP on Thursday.

A glaring example of differences between SP and RLD was evident from Maant assembly seat in Mathura district, where both SP and RLD candidates have filed nominations. SP candidate Sanjay Lather and RLD candidate Yogesh Nauwhar filed their nominations from the same seat. The confusion arose because Jayant Chaudhary had earlier given ticket to Yogesh Nauwhar, but after Akhilesh Yadav spoke to the RLD chief, the latter decided to give the seat to SP, and Sanjay Lather filed his nomination on bicycle symbol. Lather says, he is hopeful Nauwhar would agree and withdraw his nomination. Nauwhar is adamant. He says, he will withdraw only if RLD chief Jayant Chaudhary contests from this seat. He says, he lost the last election by a slender margin of 432 votes, and would not concede this seat this time. Even if Nauwhar withdraws his nomination under pressure from his party chief, there are chances of he and his supporters sabotaging the prospects of SP candidate Sanjay Lather.

Similarly, for Siwalkhas seat in Meerut, a tug-of-war has broken out between SP and RLD camps for the last three days. Under seat sharing agreement, SP gave this seat to RLD, but Jayant Chaudhary has given the ticket to SP candidate Ghulam Mohammed on RLD symbol. Local RLD workers are up in arms. They want the nomination to be given to their own candidate Raj Kumar Sangwan. Ghulam Mohammed, who lost last time, opposed this, and a way was found out for Ghulam Mohammed to contest on RLD symbol. Clashes between workers of RLD and SP have broken out at several places in Siwalkhas. RLD workers are not allowing Ghulam Mohammed’s supporters to enter Jat dominated villages for campaigning. RLD workers have even raised slogans against their own party chief Jayant Chaudhary and have burnt RLD flags and banners. Ghulam Mohammed claims, differences have been ironed out after he spoke to Raj Kumar Sangwan. However, the message has gone down among Jat supporters that their claims have been ignored.

In Jewar assembly seat of Gautam Budh Nagar district, local Gurjar stalwart Avtar Singh Bhadana on Thursday declared that he was opting out from the race because he was suffering from Covid. Bhadana had left BJP and joined RLD. He had filed his nomination three days ago. RLD decided to field advocate Indraveer Bhati in his place, but late at night, Bhadana tweeted that his RT-PCR report was found negative, and he would contest on RLD ticket. Insiders say, Bhadana carried out a survey in his constituency and found that the BJP was going to win by a big margin. It was because of this that he decided to opt out of the race, but late at night, he changed his mind.

In Chhaprauli near Baghpat, Jat supporters objected to the nomination of RLD candidate Veerpal Rathi and demanded that the candidate be changed. They threatened to call a Jat panchayat and field an independent. To stall the rebellion, RJD chief Jayant Chaudhary has now decided to field Ajay Kumar to replace Rathi.

Normally, party workers stage protests when their candidates fail to get party tickets, but in western UP, the picture is quite the opposite. Workers of both SP and RLD, supposed to be electoral allies, are attacking each other and threatening to sabotage their prospects. This is quite serious. The reasons could be: One, while the supremos of both parties join hands to form a coalition, workers and local leaders of both parties were yet to reconcile to the views of their party chiefs. Two, while selecting candidates, care was not taken to rule out possibility of their own supporters objecting to the choice of candidates.

Akhilesh Yadav will now have to tread carefully. In the first phase of polls in western UP, SP has only one ally, RLD, but in other regions of UP, he has allies belonging to smaller, local, caste-based parties. The headaches are definitely going to increase. Each of these smaller parties are quite demanding and vociferous. Their leaders prefer to look after the interests of their own castes and communities. If Akhilesh Yadav accedes to most of the demands of these smaller parties, he will have fewer seats left for his own party. His own party leaders may then revolt.

In Indian politics, it is often said, it is easy to form a coalition, but difficult to keep all constituents together. Similarly, it can be said, ‘to run a family is easy, but to keep the entire flock together is difficult’. Under Akhilesh Yadav’s leadership, the MSY family is breaking into pieces.

On Thursday, Mulayam Singh Yadav’s close relative Pramod Gupta left SP and joined BJP. Gupta was SP MLA from Bidhuna seat in Auraiya district. He is the brother-in-law of Mulayam Singh’s wife Sadhana Gupta. Akhilesh did not give him a ticket five years ago, after which Gupta joined Akhilesh’s uncle Shivpal Singh Yadav’s Pragatisheel Samajwadi Party. This time since Akhilesh’s uncle has joined the alliance, Gupta hoped to get a ticket from Bidhuna, but the equations changed completely after BJP MLA from Bidhuna Vinay Shakya and his brother joined SP. Failing to get a ticket, Gupta joined BJP and on Thursday, alleged that Akhilesh was running a “one-man show” and was not even listening to his father. Gupta alleged, Akhilesh is sidelining each one of his family relatives.

Reacting to this, Akhilesh Yadav on Thursday said, he was grateful to BJP for “ending dynastic politics” in the Yadav family. The contrast is striking. When ministers and leaders quit BJP and joined Samajwadi Party, an elated Akhilesh Yadav welcomed them with garlands. With the same enthusiasm, senior BJP leaders are now welcoming members of MSY family to the party by putting saffron scarves on their shoulders.

There is no denying the fact that Akhilesh Yadav is using to the hilt, the dominance that Mulayam Singh used to command in his region. On Thursday, it was announced that Akhilesh will contest assembly election from Karhal in Mainpuri, from where Mulayam Singh is the Lok Sabha MP. Mulayam Singh Yadav had his early education in Karhal. He studied in Jain Inter College, Karhal, and later became a lecturer in the same college.

Mulayam Singh began his political foray in UP from Mainpuri. He toiled hard in Mainpuri, Azamgarh and Etawah and created his electoral base. He constantly travelled to villages in this region and founded the Samajwadi Party. One big reason is that Yadavs and Muslims co-exist in this region, and they accord utmost respect to Mulayam Singh Yadav and his family. For Akhilesh Yadav, this is a plus point for him politically while contesting from Karhal. BJP MP Subrat Pathak said, Akhilesh has chosen a safe seat from his father’s constituency because he feared defeat.

Whatever BJP leaders may say, Karhal has been a safe seat for Samajwadi Party over several decades, except 2002 election. The BJP candidate who won in 2002, also later joined SP. In the last assembly elections, the SP won three out of four seats in Mainpuri, which is considered a citadel of Samajwadi Party, just like Gorakhpur, which is a citadel of UP CM Yogi Adityanath. On Thursday, Bhim Army chief Chandrashekhar Azad ‘Ravan’ declared he would contest against Yogi Adityanath in Gorakhpur. The result is a foregone conclusion.

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

मोदी और योगी ने पिछड़े वर्गों के लिए अब तक क्या किया है

AKBउत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को बुधवार को उस समय झटका लगा जब पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव ने बड़ी बगावत करते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया। अपर्णा यादव बीजेपी में शामिल हुईं और उन्होंने इसे राष्ट्रवादी पार्टी बताया। हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने बार-बार ये कहा कि बीजेपी नफरत की राजनीति करती है, योगी और मोदी देश को बांटने की सियासत करते हैं। लेकिन अखिलेश के इन आरोपों का जवाब उनकी भाभी अपर्णा यादव ने दिया और उन्होंने योगी और मोदी की तारीफ की।

बीजेपी में शामिल होने के बाद अपर्णा ने कहा कि सत्ता, सरकार, सियासत, पार्टी और परिवार से देश बड़ा है। उन्होंने कहा-‘ मैं एक राष्ट्रवादी हूं और अब एक राष्ट्रवादी पार्टी में शामिल हुई हूं।’ अपर्णा यादव यूपी की राजनीति में कोई बड़ी लीडर नहीं हैं, उनका कोई वोट बैंक नहीं हैं। लेकिन अपर्णा का बीजेपी में शामिल होने से एक बड़ा संदेश मतदाताओं के बीच गया है। बीजेपी के नेता अगर चाहते तो अपर्णा यादव की ज्वाइनिंग लखनऊ में ही करवा सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अपर्णा यादव को दिल्ली में पार्टी की सदस्यता दी गई।

बीजेपी में शामिल होने के बाद अपर्णा यादव ने पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और अन्य सीनियर नेताओं से मुलाकात की। बीजेपी के नेताओं से मिलने के बाद अपर्णा यादव ने कहा कि पार्टी अलग होने से रिश्ते नहीं टूटते। उन्होंने कहा कि परिवार अपनी जगह है, पार्टी अपनी जगह है। बीजेपी में होने के बाद भी बहू का कर्तव्य निभाएंगी। उन्होंने कहा-‘मैं राष्ट्र अराधना के लिए निकली हूं,
राष्ट्रवादी सोच के साथ आगे बढ़ना चाहती हूं।’

वहीं अखिलेश यादव ने इस पर रिएक्ट करते हुए कहा-‘अच्छी बात है कि जिन लोगों को समाजवादी पार्टी टिकट नहीं दे पा रही है, उन्हें बीजेपी टिकट दे रही है। मुझे खुशी है की समाजवादी विचारधारा का विस्तार हो रहा है।’ वहीं हाल ही में बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल होनेवाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने अलग तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा-‘अपर्णा यादव की एक राजनीतिक नेता के तौर पर कोई हैसियत नहीं है, वो सिर्फ एक बड़े खानदान की बहू हैं।’

शाम को स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य का भी रिएक्शन आ गया। संघमित्रा मौर्य बदायूं से बीजेपी की सांसद हैं। उन्होंने कहा-‘मेरे पिता के समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद जो लोग मुझ पर उंगलियां उठा रहे थे, उन्हें अब नए सिरे से सोचना चाहिए।’

संघमित्रा मौर्य ने सोशल मीडिया पर एक सियासी पोस्ट लिखा-‘संस्कार शब्द अच्छा है लेकिन संस्कार है किसके अंदर ? हफ्ते भर पहले एक बेटी का पिता पार्टी बदलता है तो पुत्री पर वार हो रहा था….आज एक बहू अपने चचेरे भाई (योगी आदित्यनाथ) के साथ एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आती है तो स्वागत। क्या इसको भी वर्ग से जोड़ा जाना चाहिए कि बेटी पिछड़े वर्ग की है और बहू अगड़े वर्ग से है? संघमित्रा ने आगे लिखा-क्या बहन-बेटी की भी जाति और धर्म होता है? अगड़ा बीजेपी में आता है तो राष्ट्रवादी और वो वोट बीजेपी को करेगा या नहीं इसपर सवाल खड़ा करना तो दूर, सोचा भी नहीं जाता, लेकिन पार्टी में रहने वाला राष्ट्रद्रोही, उसके वोट पर सवाल खड़े हो रहे ऐसा क्यों ?

जो बात संघमित्रा मौर्य कहना चाहती हैं वो मैं आपको साफ-साफ बता देता हूं। असल में मुलायम सिंह की छोटी बहु अपर्णा यादव शादी से पहले अपर्णा बिष्ट थी। योगी आदित्यनाथ का नाम संन्यास लेने से पहले अजय सिंह बिष्ट था। दोनों की जाति एक है। इसलिए संघमित्रा मौर्य अपर्णा को योगी की चचेरी बहन बता रही हैं लेकिन बीजेपी के नेताओं का दावा है कि योगी का अपर्णा से कोई रिश्ता नहीं हैं। अपर्णा यादव के बीजेपी ज्वाइन करने से भी ज्यादा बड़ी बात वो है जो अपर्णा ने बीजेपी के बारे में कही। उन्होंने बीजेपी को राष्ट्रवादी पार्टी बताया। इस पर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को जबाव देना मुश्किल होगा। क्योंकि वो तो हमेशा बीजेपी को नफरत फैलाने वाली पार्टी बताते हैं। अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के दूसरे नेता अब यह कहेंगे कि समाजवादी पार्टी से टिकट नहीं मिला इसलिए अपर्णा को बीजेपी राष्ट्रवादी पार्टी लगने लगी। लेकिन हकीकत यह है कि 2017 में योगी सरकार बनने के बाद अपर्णा ने कई बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी। अपर्णा ने जब गौशाला खोली तो वहां सीएम योगी आदित्यनाथ को भी बुलाया था।

अखिलेश यादव राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटाने वाले बीजेपी और वीएचपी के लोगों को चंदाजीवी कह रहे थे लेकिन अपर्णा यादव ने राम मंदिर के लिए 11 लाख रुपए का दान दिया। इसीलिए अब बीजेपी के नेता कहेंगे कि वह राष्ट्रवादी और देशप्रेमी लोगों को पार्टी में जगह दे रहे हैं जबकि समाजवादी पार्टी दंगाइयों, अपराधियों को टिकट दे रही है। बुधवार को योगी ने कहा कि कैराना में हिन्दुओं के पलायन के ज़िम्मेदार नाहिद हसन को टिकट देकर समाजवादी पार्टी ने अपनी मानसिकता साफ कर दी है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी अपराधियों, माफिया और तमंचाजीवियों को टिकट दे रही है।

पिछड़े वर्गों का समर्थन हासिल करने की एक बड़ी कोशिश के तहत बीजेपी ने बुधवार को अपना दल और निषाद पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया। इन दोनों दलों का पटेल और निषाद समुदायों के बीच अच्छा समर्थन है। केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। दोनों नेताओं ने योगी आदित्यनाथ सरकार के काम की तारीफ की और कहा कि वे यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए बीजेपी से हाथ मिलाएंगे।

खबरों के मुताबिक बीजेपी अपना दल को ज्यादा से ज्यादा 15 और निषाद पार्टी को 10 सीटें देगी। अनुप्रिया पटेल तो 2014 से ही बीजेपी के साथ हैं। अपना दल की कुर्मी वोटरों के बीच अच्छी पैठ है। यूपी की करीब 48 विधानसभा सीटें और 8 से 10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कुर्मी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उधर, निषाद पार्टी का मल्लाह वोटर्स पर अच्छा असर माना जाता है। यूपी में करीब 35 सीटों पर निषादों के वोट हार-जीत पर असर डालते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब यादवों और दलितों को छोड़कर ज्यादातर पिछड़े वर्ग के मतदाता बीएसपी के लिए सामूहिक तौर पर वोटिंग करते थे। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने ओम प्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को अपने साथ लिया। इसका नतीजा ये रहा कि बीजेपी को विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल हुई। अब ये दोनों नेता बीजेपी से अलग होकर अखिलेश के खेमे में चले गए हैं। योगी ने अपने शासनकाल में इन दोनों नेताओं को मनमानी करने या फिर पॉलिटकल कार्ड खेलने की इजाजत नहीं दी।

बुधवार को संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल दोनों सामने आए और दोनों ने नरेंद्र मोदी और योगी सरकार की तारीफ की। दोनों नेताओं ने कहा कि पांच साल में योगी सरकार ने पिछड़े वर्ग का सबसे ज्यादा ख्याल रखा। अनुप्रिया ने कहा कि मोदी सरकार में पिछड़े वर्ग के 27 नेता मंत्री हैं। नरेंद्र मोदी ने ही निषाद समुदाय की बेहतरी के लिए फिशरीज मिनिस्ट्री (मत्स्यपालन मंत्रालय) का गठन किया। पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का काम भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने किया। कुल मिलाकर बीजेपी यूपी विधानसभा चुनाव में पिछड़े वर्गों को लुभाने की पूरी कोशिश कर रही है।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

What Modi and Yogi have done for backward classes

akb fullSamajwadi Party in Uttar Pradesh got a shock on Wednesday when Aparna Yadav, the younger daughter-in-law of party patriarch Mulayam Singh Yadav, joined the BJP, describing the party as “rashtrawaadi” (nationalist). SP supremo Akhilesh Yadav had been alleging in recent weeks that the BJP is indulging in politics of hate, and that Prime Minister Narendra Modi and UP CM Yogi Adityanath are trying to divide communities. On Wednesday, Akhilesh’s sister-in-law Aparna replied to these charges and praised both Modi and Yogi.
Aparna Yadav said, nation is foremost compared to power, politics, party and family. “I am a nationalist and have now joined a nationalist party”, she added. Aparna Yadav is not a big leader in UP politics, but by allowing her in the party, BJP is trying to send a big message to the voters. That is why BJP leaders decided to induct her into the party in Delhi, instead of Lucknow.
After joining the party, she met BJP president J P Nadda, UP chief minister Yogi Adityanath, both deputy CMs and other senior leaders. Later, she said, despite changing parties, she would continue to perform her duties as a ‘bahu’ (daughter-in-law) in the family. “I want to move forward with a nationalistic approach”, she said.
Reacting to this, Akhilesh Yadav said, “it’s nice to see that those who have not been given ticket by SP are being given tickets by BJP. This shows that the Samajwadi ideology is expanding its area of influence.” Swami Prasad Maurya, who recently resigned from BJP and joined SP, reacted differently. Maurya said, “the bahu of a big khaandaan leaving the party will make no difference, because she does not wield any political clout.”
By evening, Sanghamitra Maurya, daughter of Swami Prasad, but now in BJP as MP from Badayun reacted in a different tone. Sanghamitra Maurya said, “Those who were raising fingers against me after my father joined SP, should now think afresh.
She wrote on social media, “a week ago when the father joined another party, fingers were raised against the daughter. Today, a ‘bahu’ has joined the party of her paternal cousin (Yogi Adityanath) and she is being welcomed. Who has more ‘sanskaar’? Should this be looked from the prism of class and caste? The daughter comes from a backward class and the daughter-in-law comes from a forward class. If those from forward class join BJP, they become ‘rashtrawadi’, but those from backward class, who is in the party, is considered anti-national.
Let me explain what Sanghamitra Maurya wants to say. Aparna Yadav, before her marriage, was Aparna Singh Bisht, and Yogi Adityanath, before taking ‘sanyaas’ was Ajay Singh Bisht. Sanghamitra wants to convey that Aparna is the paternal cousin sister of Yogi, but BJP leaders clarify that there is no direct relation between Aparna and Yogi. The main point is that Akhilesh will now have a tough time replying to what Aparna said in praise of BJP. Akhilesh may say that Aparna left the party because she was denied ticket, but the fact is that, in 2017, when Yogi came to power, Aparna met the CM several times. She set up a ‘gaushala’ for cows and invited Yogi there.
Akhilesh used to describe those from BJP and VHP collecting donations for Ayodhya Ram temple as ‘chandaajeevi’, but Aparna donated Rs 11 lakhs for Ram temple. BJP leaders are, therefore, elated. They are now saying that BJP have opened its doors for all nationalists, while SP is giving tickets to mafia gangsters. On Wednesday, Yogi said clearly that Samajwadi Party is giving tickets to criminals, mafia gangsters and ‘tamanchajeevis’ (gun wielders). He was referring to SP fielding Nahid Hassan, from Kairana, who was instrumental in forcing an exodus of Hindus from the area.
In a major effort to garner support from backward classes, BJP on Wednesday announced an alliance with Apna Dal and Nishad party, small caste-based parties which have good support among Patel and Nishad (fishermen) communities. Union Minister Anupriya Patel and Nishad Party chief Sanjay Nishad addressed a joint press conference with BJP president J P Nadda. Both leaders praised the performance of Yogi Adityanath’s government, and said they would join hands with BJP to contest all 403 assembly seats in UP.
Reports say, BJP will leave 15 seats for Apna Dal and 10 seats for Nishad Party. Patel (Kurmi) voters hold dominance in at least 48 assembly seats, while Nishad voters can make a major impact in at least 35 seats. There was a time in UP politics when most of the backward classes, except Yadavs, and Dalits used to vote en bloc for Bahujan Samaj Party. In the last assembly polls, BJP joined hands with backward class leaders like Om Prakash Rajbhar and Swami Prasad Maurya, who played a significant role in the landslide victory. Now both Rajbhar and Maurya have joined the Akhilesh camp. Yogi did not allow both these leaders to play political cards during his rule.
On Wednesday, both Anupriya Patel and Sanjay Nishad praised the role of Narendra Modi and Yogi Adityanath is working for the betterment of all backward classes and Dalits. Patel pointed out that there were 27 ministers from backward classes in the Modi government.
It was Modi who, for the first time, set up a Ministry of Fisheries for the betterment of Nishad (fishermen) community. Modi government also granted Constitutional status to the National Commission for Backward Classes. To sum it up, BJP is going all out to woo the backward classes in UP assembly elections.

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

कैसे यूपी चुनाव में तेजी से घुल रहा है सांप्रदायिकता का रंग

akb full_frame_60183उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के रंग अब तेजी से बदल रहे हैं। ये वो रंग है जो अब तक पर्दे के पीछे था लेकिन अब खुलकर सामने आ गया है। बरेली के मौलाना तौकीर रजा के नफरत से भरे भाषणों के मुद्दे पर मंगलवार को बीजेपी ने कांग्रेस को घेरने की कोशिश की। कुछ दिन पहले ही इस मौलाना ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी और कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया था। अब बीजेपी ने याद दिलाया कि ये वही तौकीर रजा हैं जिन्होंने कुछ हफ्ते पहले नफरत से भरे अपने भाषण में हिन्दुओं को धमकी दी थी।

मौलाना ने धमकी देते हुए कहा था कि ‘अगर मुसलमान लड़कों को गुस्सा आ गया और उन्होंने कानून को अपने हाथ में ले लिया तो हिन्दुओं को हिन्दुस्तान में कहीं पनाह नहीं मिलेगी।’ ठीक इसी तरह से नाहिद हसन भी समाजवादी पार्टी की मुसीबत बने हैं।अखिलेश यादव ने नाहिद हसन को कैराना से उम्मीदवार बनाया तो बीजेपी ने याद दिलाया कि ये वही नाहिद हसन हैं जिन्होंने पांच साल पहले कैराना से हिन्दू परिवारों का पलायन करवाया था। नाहिद हसन के खिलाफ आपराधिक मामलों की एक पूरी लिस्ट है। पिछले हफ्ते उसने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया जिसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उधर, समाजवादी पार्टी के इसी रंग में यूपी के पूर्व मंत्री आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम भी नजर आए। मंगलवार को अखिलेश यादव ने अब्दुल्ला आजम का खुलकर समर्थन किया और उन पर लगे ज्यादातर मुकदमों को फर्जी बताया।

सबसे पहले मौलाना तौकीर रजा की बात करते हैं। तौकीर रजा कोई नेता नहीं हैं। उन्होंने कभी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा लेकिन फिर भी यूपी की सियासत में तौकीर रजा चर्चा में हैं। असल में तौकीर रजा ने एक पार्टी बनायी थी जिसका नाम इत्तहादे मिल्लत काउंसिल है। पिछले हफ्ते उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। वे प्रियंका गांधी से जाकर मिले और उन्होंने राहुल- प्रियंका को सबसे बड़ा सेक्युलर बताया।

मौलाना ने यूपी में अखिलेश यादव को मुसलमानों के लिए बीजेपी से ज्यादा खतरनाक बताया। उन्होंने समाजवादी पार्टी को मुसलमानों का दुश्मन कहा और यूपी के मुसलमानों से कांग्रेस को समर्थन देने की अपील की। समाजवादी पार्टी ने तो तौकीर रजा के इस बयान को लेकर कुछ नहीं कहा लेकिन बीजेपी के नेताओं ने प्रियंका गांधी के साथ उनकी मुलाकात पर सवाल उठाए।

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस इस मौलाना के साथ गठबंधन करके यूपी चुनाव में नफरत का रंग घोलने की कोशिश कर रही है। हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलने वालों को पार्टी में जगह दी जा रही है। संबित पात्रा ने मौलाना तौकीर रजा के पुराने भाषणों का जिक्र किया जिसमें तौकीर रजा ने कहा था-‘मुसलमान अब अपना धैर्य खो रहे हैं, अगर मुस्लिम युवा कानून अपने हाथ में ले लेंगे तो हिंदुस्तान में हिंदुओं को पनाह नहीं मिलेगी।’

असल में हरिद्वार में हुई साधु संतों की धर्म संसद के जबाव में मौलाना तौकीर रजा ने बरेली में 7 जनवरी को मुस्लिम धर्म संसद बुलाई थी। हरिद्वार धर्म संसद में कुछ साधुओं ने नफरत भरे भाषण दिए थे। तौकीर रजा की मुस्लिम धर्म संसद में कोरोना प्रोटोकॉल लागू होने के बाद भी बरेली के इस्लामिया ग्राउंड में हज़ारों लोग जुटे। यहां तौकीर रजा ने जो तकरीर की वह वाकई जहर घोलने वाली थी।

इस मीटिंग में तौकीर रज़ा ने कहा, ‘मैं गांव-गांव जाता हूं, बस्ती-बस्ती देखता हूं कि मेरे नौजवानों के दिलों में जितना गुस्सा पनप रहा है….मैं डरता हूं उस वक्त से जिस दिन मेरे नौजवान का गुस्सा फूट पड़ा..जिस दिन मेरा नौजवान मेरे कंट्रोल से बाहर आ गया। मुझसे बहुत लोग कहते हैं- मियां, तुम तो बुजदिल हो गए हो..तुम कुछ करना नहीं चाहते, लेकिन मैं कहता हूं कि पहले मैं मरूंगा बाद में तुम्हारा नंबर आएगा। इसलिए अपने हिंदू भाइयों से खास तौर पर कह रहा हूं-जिस दिन मेरा ये नौजवान कानून अपने हाथ में ले लेगा तो तुम्हें हिंदुस्तान में कहीं पनाह नहीं मिलेगी।’

स्पष्ट है कि मौलाना तौकीर रजा मुस्लिम नौजवानों को भड़काने की कोशिश कर रहे थे। अपने नफरत भरे इस भाषण के एक हफ्ते बाद मौलाना की तस्वीर प्रियंका गांधी के साथ नजर आई। तौकीर रजा यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई दिए, जहां उन्होंने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस को अपने संगठन इत्तहादे मिल्लत काउंसिल का पूरा समर्थन देने का वादा किया। वहीं कांग्रेस नेताओं ने तौकीर रजा को ‘आला-ए-हजरत’ बताया।

प्रेस कांफ्रेंस में मौलाना ने कहा, अगर उत्तर प्रदेश को दंगे-फसाद से मुक्त रखना है तो फिर समाजवादी पार्टी को हराना होगा क्योंकि समाजवादी पार्टी, बीजेपी से अलग नहीं है। दोनों मुसलमानों की दुश्मन हैं। मौलाना ने संघ प्रमुख मोहन भागवत और मुलायम सिंह की एक फोटो दिखाते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी का आरएसएस के बीच ‘गुप्त समझौता’ हो गया है, इसलिए अखिलेश यादव पर भरोसा करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि बीजेपी और समाजवादी पार्टी मिले हुए हैं, इसलिए कांग्रेस को मजबूत करना ही मुसलमानों के लिए बेहतर होगा।

मौलाना तौकीर रजा जिस तस्वीर का जिक्र कर रहे थे दरअसल वह तस्वीर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की पोती की शादी की है। इस शादी में मुलायम सिंह और मोहन भागवत भी शामिल हुए थे। लेकिन तौकीर रजा ने उसे जिस तरह से ट्वीस्ट दिया उससे साफ है कि मौलाना तौकीर रजा ने मुसलमानों के मन में संदेह का बीज बोने की कोशिश की।

इसमें कोई संदेह नहीं कि तौकीर रजा की तकरीर जहरीली होती है। वह हिन्दू-मुसलमान के बीच दूरियां बढ़ाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस को यह सब नहीं दिखता। मजे की बात यह है कि कांग्रेस तौकीर रजा के साथ गठजोड़ करने की गलती पहले भी कर चुकी है।

असल में साल 2006 में तौकीर रजा ने एलान किया था कि जो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश का सिर काटकर लाएगा उसे 25 करोड़ का इनाम देंगे। उनके बयान से देश की बड़ी बदनामी हुई। लेकिन वर्ष 2009 में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह तौकीर रजा को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पहुंच गए। लोकसभा चुनाव में गठबंधन का ऐलान होना था। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में तौकीर रजा के बयान पर सवाल उठने लगे और जब जवाब देते नहीं बना तो प्रेस कॉन्फ्रेंस बीच में छो़ड़कर भागना पड़ा। अब एक बार फिर उन्ही तौकीर रजा से समर्थन लेने के चक्कर में कांग्रेस घिर गई है। कांग्रेस के नेताओं को जबाव देते नहीं बन रहा है।

मंगलवार को बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर अपराधियों, गुंडों, माफिया का बचाव करने और राजनीति में आगे बढ़ाने का आरोप लगाया। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने समाजवादी पार्टी के उन उम्मीदवारों की लिस्ट गिनाई जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। पात्रा ने कैराना से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार बनाए गए नाहिद हसन को लेकर अखिलेश यादव से सवाल किया। उन्होंने कहा कि नाहिद हसन पर कैराना में हिन्दू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर करने के इल्जाम हैं, समाजवादी पार्टी ने नाहिद हसन को कैराना से टिकट क्यों दिया। उधर, पुलिस ने नाहिद हसन को गैंगस्टर एक्ट में पकड़ कर जेल भेज दिया है।अब समाजवादी पार्टी नाहिद हसन की बहन को टिकट देगी।

संबित पात्रा ने यह पूछा कि क्या समाजवादी पार्टी जानबूझकर ऐसे लोगों को टिकट दे रही है जो हिन्दुओं को दुश्मन मानते हैं? समाजवादी पार्टी को क्रिमिनल बैकग्राउंड के लोग ही क्यों मिलते हैं? कैराना से नाहिद हसन के अलावा समाजवादी पार्टी ने रफीक अंसारी को मेरठ शहर से उम्मीदवार बनाया है। किठौर से शाहिद मंजूर को टिकट मिला है जबकि धौलाना से असलम चौधरी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हैं। इन सारे उम्मीदवारों के खिलाफ तमाम केस दर्ज हैं।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब इस मुद्दे पर अखिलेश से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के नेताओं को झूठे मुकदमों में फंसाया गया है। सैकड़ों फर्जी केस दर्ज किए गए हैं और अब उन्हीं मुकदमों का हवाला देकर नेताओं को अपराधी बताने की कोशिश की जा रही है। अखिलेश ने कहा कि चाहे नाहिद हसन का मामला हो, आजम खान के खिलाफ केस हो या फिर अब्दुल्ला आजम को जेल भेजने का मुकदमा, सारे फर्जी मामले हैं। अखिलेश ने कहा-‘अगर इस तरह से मुकदमों के आधार पर नेताओं को अपराधी घोषित करने लगें तो योगी आदित्यनाथ भी कभी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे क्योंकि योगी के खिलाफ भी दर्जनों केस हैं।’

दरअसल आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम पर भी दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। वे कई महीने तक जेल में बंद थे और दो दिन पहले ही जेल से रिहा हुए हैं। बीजेपी नेता बृजलाल ने कहा कि अदालत ने विधायक के रूप में उनकी सदस्यता भी रद्द कर दी है।

वैसे तो यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कहीं मुकाबले में दिखाई नहीं देती। समाजवादी पार्टी, बीजेपी को टक्कर दे रही है। लेकिन मुस्लिम वोटों को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की दावेदारी बराबर की है। मजे की बात यह है कि इस बार यूपी के चुनाव में अखिलेश और प्रियंका दोनों अब तक मुसलमानों का नाम लेने से बचते रहे। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने मुसलमानों के पिछड़ेपन और उनके दुख-दर्द की बात की नहीं की। दोनों को लगता है कि अगर उन्होंने मुसलमानों की बात की, उन्हें खुश करने की कोशिश की तो बीजेपी इसे मुद्दा बनाएगी और इसका फायदा उठाएगी।

इसीलिए अखिलेश और प्रियंका अपनी-अपनी पार्टियों के लिए मुस्लिम वोटों को लुभाने की कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन पर्दे के पीछे से। समाजवादी पार्टी औऱ कांग्रेस यह मानती है कि योगी आदित्यनाथ को मुसलमान वोट नहीं देंगे। अब इन दोनों में बड़ा सेक्युलर कौन है यह साबित करने की कोशिश हो रही है। इसी फेर में कांग्रेस तौकीर रजा के चक्कर में पड़ गई जबकि अखिलेश अब तक एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे थे लेकिन उन्होंने भी नाहिद हसन और अब्दुल्ला आजम की खुलकर वकालत की। वो भी जानते हैं कि इससे ज्यादा दिन बचा नहीं जा सकता। यही वजह है कि मुसलमानों से कहा जा रहा है कि जो कुछ करो चुपचाप करो। जैसे बंगाल के चुनाव में बीजेपी ने कहा था ‘चुपचाप कमल छाप’। अब मुसलमानों के लिए अखिलेश का मैसेज है ‘चुपचाप साइकिल छाप’ और बाकी चुनाव के बाद।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

How UP elections are now fast gaining a communal colour

akbThe colours in Uttar Pradesh assembly elections are now changing fast, with clerics and mafia gangsters entering the fray. On Tuesday, the BJP tried to corner the Congress on the issue of hate speeches given by a Maulana from Bareilly, Tauqeer Raza. A few days ago this Maulana met Congress general secretary Priyanka Gandhi and announced that his outfit will lend support to the Congress. BJP leaders promptly reminded how this Maulana had given threats to Hindus in his hate speech, a few weeks ago.

The Maulana had threatened that “if Muslim youths take law into their own hands, Hindus in Hindusthan will have no place to hide”. Similarly when SP supremo Akhilesh Yadav gave the Kairana nomination to Nahid Hassan, BJP leaders reminded how it was because of him that Hindus living in Kairana had to flee five years ago. Nahid Hassan has a long list of criminal charges against him and last week he surrendered to police, and was immediately sent to judicial custody. Former UP minister Azam Khan’s son Abdullah Azam was similarly supported by Akhilesh Yadav on Tuesday. He said, most of the cases filed against Abdullah Azam were false.

Maulana Tauqeer Raza is not a politician. He never contested any assembly election, but floated an outfit called Ittehad-e-Millat Council. Last week, he announced that his outfit would lend support to the Congress. He met Priyanka Gandhi, and said Priyanka and her brother Rahul Gandhi were true secular leaders.

The Maulana also said, Akhilesh Yadav was more dangerous than the BJP for Muslims in UP. While SP leaders remained silent and chose to ignore his remarks, BJP leaders took the cue and questioned his meeting with Priyanka Gandhi.

BJP spokesman Sambit Patra alleged that the Congress, by aligning with this Maulana, was trying to inject communal venom in UP politics. Sambit Patra brought out old speeches of Maulana Tauqeer Raza, in which he had said, “Muslims are now losing patience. If Muslim youths take law into their own hands, Hindus in Hindusthan will have no place to take shelter”.

The Maulana had called a Muslim religious conference on January 7 in Bareilly, in reply to a Hindu Dharma Sansad in Haridwar, where hate speeches against Muslims were given by some Hindu sadhus. At the Islamia ground in Bareilly, thousands of Muslims assembled, defying Covid protocol.

At the meeting, Tauqeer Raza said: “I visit many villages and localities and meet our youths. Our people have now started losing patience. I find anger brewing in the hearts of Muslim youths. I fear the day, if this anger explodes and our youths go out of my control. Some of my people tell me, Maulana, you are a coward. I tell them, I will die first and then let you people die. That’s why I am telling my Hindu brothers: The day our youths take law into their own hands, you (Hindus) will not get any place in Hindusthan to take shelter.”

Clearly the Maulana was trying to incite Muslim youths. A week after making this hate speech, he appeared at a press conference with Congress leader Priyanka Gandhi and UP state Congress chief Ajay Kumar Lallu, where he publicly extended support to the party. Congress leaders extolled the Maulana as “Aala-e-Hazrat”.

At the press conference, the Maulana said, if Muslims want peace in UP, they should defeat both Akhilesh Yadav and the BJP, because both were enemies of Islam, and incited communal riots. The Maulana showed a picture taken of a meeting between RSS Chief Mohan Bhagwat and SP founder Mulayam Singh Yadav, and alleged that “a secret pact” has been reached between both SP and RSS, and Muslims must not trust Akhilesh Yadav. The best alternative for Muslims is to strengthen the Congress, the Maulana said.

The picture the Maulana was referring to was taken during Vice President M Venkaiah Naidu’s grand daughter’s wedding, where both Mulayam Singh Yadav and Mohan Bhagwat were present. The cleric tried to give this brief meeting a political twist to sow suspicions in the minds of Muslims.

There is no doubt that Maulana Tauqeer Raza’s hate speeches are full of venom. He tries to create a gulf between Hindus and Muslims, but the surprising part is that Congress leaders have chose to ignore his hate speeches. In the past too, the Congress committed the mistake of aligning with the Maulana.

In 2006, this Maulana had announced a reward of Rs 25 crore to any person who can behead US President George W. Bush. This dented India’s image abroad. During the 2009 Lok Sabha elections, Congress leader Digvijay Singh took the Maulana to a press conference to announce an alliance, but when probing questions about his ‘reward’ and hate speeches were made, the Congress leaders could not reply satisfactorily. Digvijay Singh and others had to cut short the press conference abruptly. And now, again, the Congress has been cornered over taking support from the controversial Maulana.

On Tuesday, BJP spokesman Sambit Patra, at a press conference, read out the names of mafia gangsters and those with criminal cases, given tickets by Samajwadi Party. He questioned why SP supremo Akhilesh Yadav gave ticket to a mafia gangster Nahid Hassan, who was responsible for the exodus of Hindu families from Kairana. Nahid Hasan is presently in judicial custody, and the SP will now give the ticket to his sister.

Patra asked whether the SP would now give tickets to those who are blatantly anti-Hindus. Among the others having criminal cases, who have been fielded by SP include: Rafiq Ansari from Meerut City, Shahid Manzoor from Kithaur and Aslam Chaudhary from Dhaulana.

When Akhilesh Yadav was asked at a press conference on this issue, he replied that most of the criminal cases filed against his party candidates were false. He said, cases against Nahid Hassan, former minister Azam Khan and his son Abdullah Azam were mostly false. “Even CM Yogi Adityanath has dozens of criminal cases against him, and he may never be able to contest elections”, Akhilesh Yadav said.

Azam Khan’s son Abdullah Azam has many cases filed against him, he was in jail for several months, and was released two days ago. BJP leader Brij Lal said, a court has even quashed his membership as MLA.

In the UP assembly elections, the Congress is nowhere in the race. The main battle is being fought between the BJP and Samajwadi Party. Both the SP and Congress are trying their best to reach out to Muslim voters. The interesting part is that both Akhilesh Yadav and Priyanka Gandhi had been avoiding any mention of Muslims in their speeches till now. Both fear that if they raise Muslim issues, the BJP will promptly pick this up and make a counter-attack.

Both Akhilesh and Priyanka are trying to take support of Muslim leaders, not openly, but behind closed doors. Both SP and Congress leaders think that Muslim voters will not vote for Yogi Adityanath, and hence a tug-of-war is going on for Muslim votes between both these parties. Both Akhilesh and Priyanka were till now treading this path softly, but on Tuesday, the cat was out of the bag. Priyanka was cornered on the issue of hate speeches by Maulana Tauqeer Raza, while Akhilesh was cornered on the issue of giving tickets to Muslims leaders like Nahid Hassan and Abdullah Azam.

Both these leaders know that they cannot evade the Muslim issue any more. That is why Muslim voters are being told to do “silently” (chupchaap karo), as was done during Bengal elections, when BJP had given the slogan “Chup chaap, Kamal chhaap” (vote for Lotus silently). Akhilesh Yadav’s message to Muslims now is: “Chup Chaap, Cycle chhaap” (Vote for Cycle silently).

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

अंतरिक्ष-देवास सौदा भ्रष्टाचार का एक ऐसा ‘प्रयोग’ था, जो सफल नहीं हो पाया

akb fullआज मैं आपको सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बारे में बताना चाहता हूं। कभी-कभी चुनावी खबरों के शोर में ऐसी खबरें दब जाती हैं, लेकिन देश हित में इस फैसले के महत्व को समझना होगा।

अंतरिक्ष-देवास डील में सोमवार को आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत की वैश्विक छवि से जुड़ा है। कहने को तो खबर इतनी सी है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देवास मल्टीमीडिया की अपील को खारिज कर दिया, और पिछले साल सितंबर में दिए गए NCLAT (नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल) के आदेश को बरकरार रखा। NCLAT ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के उस आदेश को बरकरार रखा था जिसमें प्रमोटरों को कंपनी को बंद करने के लिए कहा गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब है कि देवास मल्टीमीडिया को अब लिक्विडेशन में जाना होगा और कंपनी को बंद करना होगा।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम की बेंच ने NCLAT के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि देवास को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की वाणिज्यिक शाखा अंतरिक्ष कॉर्पोरेशन के कुछ अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर ‘कपटपूर्ण तरीके से गैरकानूनी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए’ शामिल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी और राजनीतिक असर होगा और ऐसी संभावना है कि भारत सरकार ICC (इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स) की आर्बिट्रेशन अदालत में देवास की जीत को चुनौती देने के लिए अपनी कानूनी लड़ाई में इसका इस्तेमाल कर सकती है। देवास की कोशिश है कि अदालती आदेशों के बाद विदेशों में भारत की संपत्ति को जब्त कर लिया जाए।

मैं पहले आपको देवास-अंतरिक्ष डील की पूरी कहानी समझाता हूं। देवास मल्टीमीडिया 2004 में ISRO के कुछ पूर्व अधिकारियों और वर्ल्ड स्पेस के कुछ कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई एक कंपनी थी। एक साल बाद 28 जनवरी 2005 को देवास और अंतरिक्ष कॉर्पोरेशन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत ISRO, देवास को 167 करोड़ रुपये में 12 साल के लिए 2 संचार उपग्रह लीज पर देने वाला था।

यह स्टार्टअप कंपनी ISRO द्वारा 766 करोड़ रुपये की लागत से बनाए गए 2 उपग्रहों पर एस-बैंड स्पेक्ट्रम ट्रांसपॉन्डर्स का इस्तेमाल करके भारत में मोबाइल प्लेटफॉर्म पर मल्टीमीडिया सर्विस उपलब्ध करवाने वाली थी। 2011 में जब टेलिकॉम सेक्टर में 2जी टेलिकॉम घोटाला सामने आया तो तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने जल्दबाजी में इस डील को रद्द कर दिया।

आरोप लगे कि देवास को एस-बैंड स्पेक्ट्रम आवंटित करना एक नई फर्म की मदद करने के लिए एक ‘स्वीट डील’ के अलावा और कुछ नहीं था। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई, तो CBI को सौदे की जांच करने के लिए कहा गया। 2016 में सीबीआई ने देवास, अंतरिक्ष और इसरो के 8 अधिकारियों के खिलाफ ‘आधिकारिक पदों का दुरूपयोग करके स्वयं एवं अन्यों को अनुचित लाभ पहुंचाने के इरादे से रचे गए आपराधिक षड्यंत्र में भूमिका अदा करने के लिए’ चार्जशीट दायर की।

जिन 8 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर हुई उनमें इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर का नाम भी था। CBI ने इन अधिकारियों पर सरकारी खजाने को 578 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। प्रवर्तन निदेशालय ने अंतरिक्ष कॉर्पोरेशन के एक पूर्व प्रबंध निदेशक और देवास मल्टीमीडिया के 5 अधिकारियों के खिलाफ Prevention of Money Laundering कानून के तहत चार्जशीट भी दायर की। ED की चार्जशीट में दावा किया गया कि 2005 के सौदे के बाद मिली 579 करोड़ रुपये की फंडिंग का 85 फीसदी हिस्सा विभिन्न बहानों से अमेरिका ट्रांसफर किया गया।

अंतरिक्ष-देवास डील रद्द होने के बाद स्टार्टअप के निवेशक विदेश में मध्यस्थता के लिए गए। उन्होंने वाणिज्यिक आर्बिट्रेशन के लिए नीदरलैंड में ICC ट्रिब्यूनल के समक्ष और पूंजीनिवेश आर्बिट्रेशन के लिए भारत-मॉरीशस और भारत-जर्मनी द्विपक्षीय निवेश संधियों के तहत अपील दायर की। इन सभी मामलों में भारत के खिलाफ फैसला आया। अक्टूबर 2020 में देवास को 835 करोड़ रुपये का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड मिला।

इसकी वजह से फ्रांस और कनाडा की अदालतों ने बकाया वसूलने के लिए इन देशों में भारत की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश दिया। कनाडा ने वसूली के लिए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और एयर इंडिया की संपत्ति को जब्त करना शुरू भी कर दिया। इन कदमों ने विदेशों में भारत की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने देवास मल्टीमीडिया कंपनी को फर्जी बताते हुए उसके परिसमापन (लिक्विडेशन) का आदेश दे दिया है, भारत को ये सारे केस फिर से लड़ने होंगे। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली यूपीए सरकार किस तरह ऐसे फैसले लिए जिनसे वैश्विक स्तर पर भारत की साख को बट्टा लगा।

आसान भाषा में कहें तो यह कुछ ऐसा ही था कि कोई मेरी ही दुकान से कोई सामान खरीदे और फिर उसे 10 गुना ज्यादा कीमत में मुझे ही बेच दे, और मैं खुद ही उसे ऐसा करने की परमिशन दूं। मनमोहन सिंह के शासनकाल में भारत सरकार ने यही किया। यूपीए सरकार ने एक कंपनी को 12,000 करोड़ रुपये का एस-बैंड स्पेक्ट्रम 1,000 करोड़ रुपये की मामूली कीमत पर दे दिया।

मामला खुलने के डर से डील जल्दबाजी में रद्द कर दी गई। अब वही कंपनी भारत सरकार से हजारों करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग कर रही है। कंपनी अपना मुआवजा वसूलने के लिए विदेशों में भारत सरकार की संपत्ति को जब्त करना चाहती है। यह मामला 15 साल से ज्यादा पुराना है। 2004 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद ही खेल शुरू हुआ।

इसरो के एक पूर्व अधिकारी डॉ. एम. चंद्रशेखर ने देश को लूटने की नीयत से एक कंपनी बनाई। इस कंपनी में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों के निवेशक रखे गए। इनकी योजना थी कि सरकार से सस्ते में एस-बैंड स्पेक्ट्रम लिया जाए और फिर हजारों करोड़ रुपये कमाए जाएं। इस कंपनी के साथ इसरो की सहयोगी कंपनी अंतरिक्ष कॉरपोरेशन ने एक समझौता किया। इस समझौते के तहत देवास मल्टीमीडिया कंपनी को भारत के लिए 2 सैटेलाइट बनाने थे और भारत में डिजिटल और मल्टीमीडिया सेवाएं देनी थीं। सरकार 1,000 करोड़ रुपये में स्टार्टअप कंपनी को एस-बैंड स्पेक्ट्रम देने के लिए राजी हो गई।

वहीं, दूसरी ओर उसी सरकार ने अपनी ही कंपनियों, BSNL और MTNL को एस-बैंड स्पेक्ट्रम प्रदान करने के लिए 12,500 करोड़ रुपये की मांग की। साफ है कि उस वक्त सरकार में बैठे अफसरों ने जानबूझ कर देश के हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इस दौरान स्टार्टअप कंपनी ने कोई काम नहीं किया, और 2011 में 1.75 लाख करोड़ रुपये का 2जी टेलीकॉम घोटाला उजागर हो गया। चूंकि इस घोटाले में मनमोहन सिंह की सरकार बुरी तरह घिर गई थी, इसलिए उसने घबराकर अंतरिक्ष-देवास डील को जल्दबाजी में रद्द कर दिया।

देवास ने इसके बाद इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स यानी ICC की आर्बिट्रेशन अदालत में मुकदमा कर दिया। जब वहां सुनवाई शुरू हुई तो मनमोहन सिंह की सरकार ने वकील तक नियुक्त नहीं किया। आखिरकार ICC ने भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए खुद ही एक वकील नियुक्त किया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत सरकार ने वकील को मामले की कोई जानकारी मुहैया नहीं कराई। आखिरकार ICC आर्बिट्रेशन अदालत ने विदेशों में भारत सरकार की संपत्ति को कुर्क करके बकाया राशि की वसूली का आदेश दे दिया। इसके बाद देवास के इन्वेस्टर्स ने अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की अदालतों में भी मामले दायर किए।

इस बीच 2004 में मोदी सरकार सत्ता में आ गई। उसने एक तरफ तो तुरंत CBI और ED को मामले की जांच के आदेश दिए और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में मुकदमों की पैरवी शुरू की। इसके साथ-साथ मोदी सरकार के निर्देश पर अंतरिक्ष कॉरपोरेशन ने NCLT में देवास मल्टीमीडिया के खिलाफ अपील की और कहा कि कंपनी को बंद कर दिया जाए क्योंकि इसे फ्रॉड करने की बदनीयती से ही बनाया गया था। NCLT ने कंपनी को बंद करने का फैसला सुनाया। देवास ने इसके बाद NCLAT के समक्ष अपील की, लेकिन NCLAT ने आदेश को बरकरार रखा। देवास फिर सुप्रीम कोर्ट गई और सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी।

कुल मिलाकर देवास मल्टीमीडिया डील की यही कहानी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जब कोई कंपनी धोखाधड़ी के इरादे से ही बनाई गई थी, तो मुआवजे के लिए उसके दावे पर विचार करने का कोई मतलब नहीं है। भारत सरकार अब आईसीसी आर्बिट्रेशन अदालत और अन्य विदेशी अदालतों में जा सकती है और मुआवजे के लिए देवास के दावे को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सामने रख सकती है।

ICC आर्बिट्रेशन अदालत ने भारत सरकार से देवास को 56.2 करोड़ डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया था। इस रकम पर ब्याज को मिलाकर अब देवास के शेयरहोल्डर्स भारत से 1.2 अरब डॉलर या करीब 90 अरब रुपये वसूलना चाहते हैं। देवास के निवेशक अमेरिका की अदालत में गए और वहां भी उनके पक्ष में ही फैसला आया। फ्रांसीसी अदालत ने भी देवास निवेशकों के पक्ष में आदेश दिया। कनाडा की एक अदालत ने भी देवास के पक्ष में फैसला सुनाया और भारतीय संपत्तियों को कुर्क करने का आदेश दिया।

यह मनमोहन सरकार की ऐसी विरासत है, जिससे अब मोदी सरकार को निपटना पड़ रहा है। इससे दुनिया में भारत की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है। यूपीए सरकार ने विदेशी अदालतों के सामने अपना पक्ष रखते हुए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ प्रावधानों तक को शामिल नहीं किया और ऐसे में ये सारे केस हार गई।

एक कंपनी को विदेशों में भारत की संपत्ति को जब्त करने, उसे बेचकर हर्जाने के भरपाई करने का हक मिल जाए, इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी कंपनी को दिल्ली में रेल भवन या शास्त्री भवन जैसी सरकारी इमारत को जब्त करने का हक मिल जाए। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी हुई है।

सवाल ये है कि जो कंपनी ISRO के पुराने अफसर ने बनाई उससे कांग्रेस की सरकार ने डील ही क्यों की? जिस एस-बैंड स्पेक्ट्रम के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने BSNL से 12 हजार करोड़ रुपये वसूले, वही एस-बैंड स्पेक्ट्रम देवास को सिर्फ एक हजार करोड़ रुपये में क्यों दे दिया? सरकार ने जब डील रद्द की, तो उसमें देश की सुरक्षा का प्रावधान क्यों नहीं डाला? अगर यूपीए सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का क्लॉज जोड़ा होता, तो देवास की याचिका ICC अदालत द्वारा खारिज कर दी जाती।

सबसे जरूरी सवाल यह है कि उस समय हमारी सरकार ने ICC अदालत में वकील नियुक्त क्यों नहीं किया? क्या इस वजह से देवास मल्टीमीडिया के पक्ष में एकतरफ फैसला हुआ? उस समय सरकार ने देवास कंपनी को खत्म करने की कार्यवाही क्यों नहीं की?

ये सारी बातें इत्तेफाक नहीं थीं। ये संयोग नहीं था, ये ‘करप्शन का प्रयोग’ था। वह तो वक्त रहते नरेन्द्र मोदी की सरकार ने केस की गंभीरता को समझा, सुप्रीम कोर्ट में केस की पैरवी की और अब देवास मल्टीमीडिया के खिलाफ पहली लड़ाई जीती है। अभी इंटरनेशनल कोर्ट में भी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उम्मीद है कि अब ICC की अदालत भी अपने फैसले की समीक्षा करेगी और आदेश देगी कि धोखाधड़ी के इरादे से बनाई गई कंपनी को मुआवजा पाने का कोई हक नहीं है।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

Antrix-Devas deal: An ‘experiment in corruption’ that failed

AKBToday I want to speak about an important judgment of Supreme Court. Often such a news item gets buried in the cacophony of election related news, but in the national interest, one has to understand the importance of this verdict.

Monday’s Supreme Court verdict in the Devas deal is related to India’s world image. The news item is simple: The Supreme Court on Monday dismissed the appeal filed by Bengaluru-based Devas Multimedia, and upheld the NCLAT (National Company Law Appellate Tribunal) order given in September last year. NCLAT had upheld the National Company Law Tribunal’s order asking the promoters to wind up the company. The apex court verdict makes it clear that Devas Multimedia must now undergo liquidation and the company will have to be wound up.

The SC bench comprising Justice Hemant Gupta and Justice V. Ramasubramaniam upheld the NCLAT order which stated that Devas was incorporated with “a fraudulent motive to collude and connive” with some officials of Antrix Corporation, the commercial arm of Indian Space Research Organization (ISRO). The Supreme court verdict has significant legal and political ramifications and it is likely that the Indian government may use it in its legal battle against an ICC (International Chamber of Commerce) arbitration award won by Devas, which is trying to enforce it by obtaining orders for seizure of India’s assets abroad.

Let me first explain the entire story about the Devas-Antrix deal. Devas Multimedia was a company started in 2004 by some former ISRO officials and World Space staff. The next year, on January 28, 2005, Devas and Antrix Corporation signed a deal under which ISRO was supposed to lease two communication satellites for 12 years at a cost of Rs 167 crore to Devas.

This start-up company was supposed to provide multimedia services to mobile platforms in India using the S-band spectrum transponders on two ISRO satellites built at a cost of Rs 766 crore by ISRO. In 2011, when the 2G telecom scam broke in the telecom sector, this deal was hurriedly cancelled by the then Manmohan Singh government.

There were allegations that allocating S-band spectrum was nothing but a “sweet deal” to help a fledgling firm. When Modi government came to power in 2014, the CBI was asked to probe the deal. In 2016, CBI filed a chargesheet against eight officials of Devas, Antrix and ISRO “for being party to a criminal conspiracy with an intent to cause undue gain to themselves or others by abusing official positions”.

Among the eight persons chargesheeted was former ISRO chairman G. Madhavan Nair. The CBI accused these officials for causing a loss of Rs 578 crore to the government. The Enforcement Directorate also filed a chargesheet under Prevention of Money Laundering Act against a former managing director of Antrix Corporation and five Devas Multimedia officials. The ED chargesheet claimed that 85 per cent of Rs 579 crore funding it received after the 2005 deal was transferred to USA under various pretexts.

After the Antrix-Devas deal was scrapped, the startup investors went for arbitration abroad. They filed for commercial arbitration before the ICC Tribunal in Netherlands and also for investment arbitration under India-Mauritius and India-Germany bilateral investment treaties. All these proceedings led to adverse awards given against India. In October, 2020, Devas obtained a Rs 835 crore arbitration award.

This led to courts in France and Canada ordering attachment of India’s assets in these countries to recover the dues. Canada even started seizing Airports Authority of India and Air India’s assets for recovery. These steps have severely dented India’s image abroad. Now that the Supreme Court has ordered liquidation of Devas Multimedia company describing it as fraudulent, India will have to fight its cases again. You will be surprised to find how the previous Congress-led UPA government used to take decisions that brought international disrepute to India.

In layman’s words, we can describe it like this: a person or a group of persons buys products from my shop, and then tries to sell me at prices ten times the cost. All, of course, with my permission. This is what the Government of India during Manmohan Singh regime did. UPA government gave away Rs 12,000 crore worth S-band spectrum to a company at a throwaway price of Rs 1,000 crore.

The deal was hurriedly cancelled after all hell broke loose. Now the same company is seeking compensation in thousands of crores from the Indian government. In trying to recover its compensation, this company wants to seize Indian government’s assets abroad. The case is more than 15 years old. When the UPA came to power in 2004, the game began, months after the new government took over.

A former ISRO official Dr M. Chandrashekhar set up a start-up company with the intent to rob the Indian government of its money. Investors from USA, Canada, France and Germany, and the aim was to obtain S-band spectrum from the government. The deal was signed with Antrix Corporation next year under which Devas was to build two satellites and provide digital and multimedia services in India. The startup company demanded S-band spectrum for Rs 1,000 crore in lieu of multimedia services, and the Centre agreed to provide S-band spectrum to the company.

On the other hand, the same government demanded Rs 12,500 crore for providing S-band spectrum to its own companies, BSNL and MTNL. The babus sitting in the corridors of government were clearly causing a huge loss to the exchequer. In the meanwhile, the startup company did not start any work, and, by 2011, the 2G telecom scam Rs 1.75 lakh crore broke. Since the Manmohan Singh government was tied up with the furore raised over 2G scam, it hurriedly cancelled the Antrix-Devas deal.

Devas went to International Chamber of Commerce ICC arbitration court, where hearings began. Manmohan Singh government did not even send its lawyer to represent India’s case before the arbitration court. ICC, on its own, appointed a lawyer to represent India, but strangely, our government did not even provide details of the case to the lawyer. Finally, ICC arbitration court ordered recovery of dues by attaching Indian government’s assets abroad. Cases were filed in the courts of USA, France, Germany and Canada by Devas investors.

By this time, Modi government came to power in 2004. It immediately ordered CBI and ED to prove the matter, and sent its lawyer to foreign courts. On Centre’s orders, Antrix Corporation requested NCLT to liquidate Devas Multimedia company, because it was set up with the intent to defraud the exchequer. NCLT ordered its liquidation, Devas appealed before NCLAT, but NCLAT upheld the order. Devas went to Supreme Court, and on Monday, the apex court dismissed its petition.

This, in short, is the story of Devas Multimedia deal. The apex court clearly said that when a company was set up with fraudulent intentions, there was no point in going through its claim for compensation. The Indian government can now go the ICC arbitration court and other foreign courts and place the Supreme Court’s verdict for quashing Devas’ claim for compensation.

The ICC arbitration court had ordered payment of 56.2 crore dollars to Devas from Indian government. Adding interest, it amounts to recovery of 1.2 billion USD or Rs 90 billion from India. Devas investors went to US Federal Court and obtained order in their favour. The French court also gave order in favour of Devas investors. A court in Canada also gave order favouring Devas and ordered attachment of Indian assets.

This is one of the legacies of Manmohan Singh government, which the present Modi government has to face. India’s international image has been brought to disrepute. The UPA government failed to include the ‘national security’ provisions while placing its case before foreign courts, and , in the process, lost all these cases.

This is big news because India’s international prestige is concerned. Nothing is more shameful than a company obtaining court orders to seize Indian government’s assets abroad. It is similar to, say, a company getting court orders to attach the Rail Bhavan or Shastri Bhavan. This has brought disrepute to India in international circles.

The questions that arise are: Why did the Congress government signed a deal with a company set up by former ISRO officials? Why did Manmohan Singh government took Rs 12,500 crore for S-band spectrum from its own company BSNL, but sold it for Rs 1,000 crore to Devas? When the deal was cancelled, why wasn’t the ‘national security’ clause not added? Had the UPA government added the ‘national security’ clause, the Devas petition would have been rejected by the ICC arbitration court.

The main question: Why didn’t our government fail to appoint a lawyer to present its case before ICC arbitration court? Why didn’t the then government initiate proceedings to liquidate Devas company?

These are not coincidences, this was ‘an experiment in corruption’ that failed. It goes to the credit of Narendra Modi government that it took timely steps and fought the case in Supreme Court. This is India’s first gain in the legal battle that will now continue in international courts. Let us hope the ICC arbitration court will review its verdict and order that a company set up for fraudulent purpose, has no right to seek compensation.

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

यूपी की चुनावी जंग में जाति कितना मायने रखती है?

akbसमाजवादी पार्टी ने शुक्रवार को खुले तौर पर चुनाव आयोग के उस निर्देश का उल्लंघन किया जिसमें चुनावी राज्यों में सभी तरह की रैलियों पर प्रतिबंध लगाया गया था। सपा ने एक ‘वर्चुअल रैली’ आयोजित की जिसमें पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। रैली में मौजूद लोगों को पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने संबोधित भी किया।

सोशल मीडिया पर हंगामा मचने के बाद देर रात उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने गौतमपल्ली थाना प्रभारी दिनेश सिंह बिष्ट को ‘कर्तव्यों के निर्वहन में घोर लापरवाही’ के आरोप में निलंबित करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्होंने एसीपी अखिलेश सिंह और लखनऊ मध्य निर्वाचन क्षेत्र के रिटर्निंग ऑफिसर गोविंद मौर्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया। चुनाव आयोग ने यह कार्रवाई लखनऊ के जिलाधिकारी अभिषेक प्रकाश द्वारा भेजी गई एक रिपोर्ट के आधार पर की। रिपोर्ट में कहा गया था कि रैली का आयोजन चुनाव आचार संहिता और कोविड प्रोटोकॉल का घोर उल्लंघन था।

लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डीके ठाकुर ने कहा, समाजवादी पार्टी के पार्टी मुख्यालय में लगभग 2,500 लोग जमा हुए, जो 15 जनवरी तक सारी फिजिकल रैलियों पर चुनाव आयोग के प्रतिबंध का उल्लंघन था। पुलिस कमिश्नर ने कहा, ‘हमारी पुलिस टीम ने कार्यक्रम का वीडियो बनाया है और इन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।’

रैली का आयोजन सपा में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी सहित 8 विधायकों और मंत्रियों के स्वागत में किया गया था। इन मंत्रियों ने इसी हफ्ते बीजेपी की सरकार से इस्तीफा दे दिया था। पूरे भारत में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने के साथ, चुनाव आयोग ने 15 जनवरी तक मतदान वाले राज्यों में सभी रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उत्तर प्रदेश में अकेले शुक्रवार को 16 हजार से ज्यादा नए मामले सामने आए। इनमें से सिर्फ लखनऊ में ही 2,209 नए मामले दर्ज किए गए। चुनाव आयोग ने नुक्कड़ सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाया हुआ है, और ज्यादा से ज्यादा सिर्फ 5 लोगों को ही घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करने की इजाजत दी है।

तथाकथित ‘वर्चुअल रैली’ के वीडियो में साफ नजर आ रहा है कि वहां हजारों पार्टी कार्यकर्ता मौजूद हैं और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव समेत लगभग 50 नेता एक साथ मंच पर बैठे हुए हैं। चुनाव आयोग ने 5 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाई हुई है और इस ‘वर्चुअल रैली’ में 50 से ज्यादा नेता एक साथ बैठे थे। ज्यादातर नेता बिना मास्क के थे, जबकि अखिलेश यादव ने अपनी जेब में मास्क रखा था जिसे वह कभी पहन लेते थे तो कभी उतार देते थे। जब रैली के वीडियो न्यूज चैनलों पर चलने लगे तो लखनऊ के डीएम ने रैली को रिकॉर्ड करने के लिए तत्काल पुलिस की एक टीम भेजी। लखनऊ के डीएम ने कहा, रैली की इजाजत नहीं ली गई थी।

सपा की साइकिल पर सवार हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने दावा किया कि लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर से लेकर कालीदास मार्ग तक का पूरा इलाका कार्यकर्ताओं से पटा पड़ा है। मौर्य ने दावा किया, ‘अगर कोई कोविड प्रोटोकॉल नहीं होता, तो भीड़ सारे रिकॉर्ड तोड़ देती।’ सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, चुनाव आयोग के दिशानिर्देश हैं, लेकिन हम और ज्यादा वर्चुअल रैलियां करेंगे और फिजिकल रैलियां भी करेंगे।

मैं मानता हूं कि समाजवादी पार्टी को चुनाव के दौरान प्रचार करने का पूरा हक है, लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि राज्य में कोरोना की वजह से हालात सामान्य नहीं हैं। पूरे राज्य से नेताओं को अपने समर्थकों को लाने की इजाजत देकर साफ तौर पर कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया गया था। अब जब ये समर्थक अपने जिलों में लौटेंगे, तो वे सुपर स्प्रेडर्स के रूप में काम करेंगे। ऐसे में चुनाव आयोग अगर सख्त कार्रवाई करता है तो पार्टी के नेता इल्जाम लगाएंगे कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

सवाल यह भी है जब तमाम नेता पहले ही मीडिया के सामने आकर अपनी बात कह चुके थे, तो फिर सबको एक साथ लाकर, कार्याकर्ताओं को जुटाकर इतनी बड़ी रैली करने की क्या जरूरत थी? हो सकता है कि चुनाव आयोग द्वारा दिशानिर्देशों की घोषणा करने से पहले इस रैली की योजना बनाई गई हो। लेकिन प्रतिबंध लगने के बावजूद समाजवादी पार्टी के नेताओं ने अपनी रणनीति में बदलाव न करने का फैसला किया, और चुनाव आयोग के प्रतिबंध की धज्जियां उड़ाते हुए अपने समर्थकों को इकट्ठा किया। चुनाव आयोग की कार्रवाई से बचने के लिए उन्होंने इसे ‘वर्चुअल रैली’ का नाम दे दिया।

रैली में स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव को ‘भविष्य का मुख्यमंत्री’ बताया और दावा किया कि चुनावी जंग पिछड़ों, दलितों और अन्य का प्रतिनिधित्व करने वाले 85 प्रतिशत और बाकी के 15 प्रतिशत के बीच लड़ी जाएगी।

सपा की चुनौती का मुकाबला करने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार दौरे पर हैं, विभिन्न वर्गों और जातियों के नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं। गोरखपुर के पीरू शहीद दलित बस्ती में शुक्रवार को योगी ने एक दलित अमृत लाल भारती के घर खिचड़ी खाई। मकर संक्रांति के मौके पर होने वाले इस आयोजन को ‘खिचड़ी सहभोज’ का नाम दिया गया है। स्थानीय बीजेपी नेताओं ने कहा कि योगी हर साल मकर संक्रांति के मौके पर दलितों के साथ भोजन करते हैं। इस मौके पर योगी ने कहा कि जो लोग वंशवाद की राजनीति में विश्वास रखते हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, वे कभी भी सामाजिक न्याय के समर्थक नहीं हो सकते। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘ये नेता अपने परिवारों, माफिया सरगनाओं और भ्रष्ट व्यापारियों को बढ़ावा देते रहे हैं, वे कभी भी दलितों के लिए सामाजिक कल्याण को बढ़ावा नहीं दे सकते।’

वक्त बदला है, पिछले 8 सालों में राजनीति का अंदाज बदला है, लोगों का मिजाज बदला है। आम लोगों के नजरिए में बदलाव की वजह से अब पूरा राजनीतिक शब्दकोष भी बदल गया है। 2014 तक राजनीति काफी हद तक जातियों और समुदायों पर आधारित थी, विकास की बात कुछ ही नेता करते थे, लेकिन अब यह ट्रेंड बदल गया है। इसके साथ ही नियमों में भी बदलाव किया गया है। पहले उम्मीदवार नामांकन दाखिल करते वक्त हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का जिक्र करते थे। अब सभी उम्मीदवारों को सार्वजनिक तौर पर विज्ञापनों के जरिए अपने खिलाफ दर्ज मामलों के साथ-साथ यदि किसी मामले मे सजा हुई है, तो उसकी भी जानकारी देनी होगी।

यह मान लेना कि मतदाता अब केवल जाति के आधार पर ही वोट करेंगे, गलत होगा। लोग कब तक अपनी जाति के लोगों को वोट देते रहेंगे, भले ही उनकी जाति का उम्मीदवार माफिया गैंगस्टर ही क्यों न हो? अपराधी और गैंगस्टर की कोई जाति नहीं होती। मेरा मानना है कि इस बार यूपी के मतदाता इस भ्रम को तोड़ देंगे कि वोट सिर्फ जाति के नाम पर मिल सकता है।

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook

UP polls: How much does caste matter ?

rajat-sirThe Samajwadi Party on Friday openly violated the Election Commission’s directive banning all physical rallies in poll-bound states, by organizing a ‘virtual rally’ attended by thousands of party workers and addressed by party supremo Akhilesh Yadav.

Late in the night, after a furore in social media, the Chief Electoral Officer of UP directed suspension of the in-charge of Gautampalli police station, Dinesh Singh Bisht for ‘gross negligence in discharge of duties’, and issued show cause notices to Assistant Commissioner of Police Akhilesh Singh and Returning Officer of Lucknow Central constituency Govind Maurya. The action was taken on the basis of a report sent by Lucknow District Magistrate Abhishek Prakash which said the holding of rally was in gross violation of Election Code of Conduct and Covid protocols.

Lucknow Police Commissioner D K Thakur said, about 2,500 people gathered at the party headquarters of Samajwadi Party which was in breach of Election Commission’s ban on all physical rallies till January 15. “Our police team captured the event on video and an FIR has been lodged against these people”, the police chief said.

The SP rally was organized to welcome eight MLAs and ministers, including Swami Prasad Maurya and Dharam Singh Saini to the party fold. These ministers had resigned this week from the BJP government. With Covid-19 cases rising exponentially across India, the Election Commission had imposed ban on all rallies in poll-bound states till January 15. On Friday alone, more than 16,000 cases were reported across UP, out of which Lucknow alone accounted for 2,209 cases. ECI had banned even street corner meetings, and door-to-door campaigning has been allowed only up to a limit of five persons.

Videos of the so-called ‘virtual rally’ clearly show thousands of party workers attending the rally, with party chief Akhilesh Yadav and nearly 50 other leaders sitting on a dais together. ECI had banned gathering of more than five persons, and here, at this ‘virtual rally’, there were more than 50 leaders sitting together. Most of the leaders were without masks, while Akhilesh Yadav, who had kept his mask in his pocket, was occasionally wearing and taking it off. When videos of the rally were telecast on news channels, the DM of Lucknow sent a police team immediately to record the rally. The DM of Lucknow said, no permission was taken for holding the rally.

Swami Prasad Maurya, who joined SP, claimed that a large number of supporters had gathered at the party office, and had spilled over on Kalidas Marg. “Had there been no Covid protocol, the gathering would have been huge”, Maurya claimed. SP chief Akhilesh Yadav said, EC guidelines are there, but we will hold more virtual rallies and also physical rallies.

I agree, Samajwadi party has the right to campaign during elections, but he should know, the Covid situation prevailing in the state is not normal. By allowing leaders to bring in their supporters from all over the state, Covid protocol was clearly violated. Once these supporters return to their districts, they will be acting as super spreaders. If the Election Commission acts tough, the party leaders will allege that the EC is not partial.

Since most of the leaders who joined the SP have already spoken through media, what was the need for assembling all of them with their supporters for the rally? It could be that this rally was planned earlier, before the EC announced its guidelines. But once the ban was imposed, the SP leaders decided not to change their strategy, and assembled their supporters in defiance of the EC ban. To evade EC action, they named it a “virtual rally”.

At the rally, Swami Prasad Maurya described Akhilesh Yadav as the “future chief minister”, and claimed that the battle would be fought between 85 per cent representing backwards, Dalits and others, and the remaining 15 per cent.

To counter the SP challenge, UP chief minister Yogi Adityanath is constantly on tour, meeting leaders of different classes and castes. On Friday, Yogi had a ‘khichdi’ lunch at the house of a Dalit, Amrit Lal Bharti, in the Peeru Shaheed Dalit Basti of Gorakhpur. It was named ‘Khichdi Mahabhoj’ to coincide with Makar Sankranti. Local BJP leaders said, Yogi lunches with Dalits every year on Makar Sankranti. On this occasion, Yogi said, those who believe in dynastic politics and indulge in corruption, can never be supporters of social justice. “These leaders have been promoting their families, mafia gangsters and corrupt businessmen, they can never promote social welfare for the downtrodden”, the chief minister said.

Times have changed, style of politics has changed in the last eight years, the mood of people has changed in recent years. The entire political lexicon has undergone a change because of a sea change in the outlook of common people. Till 2014, politics was largely based on castes and communities, few leaders spoke about development, but the trend has now changed. Along with it, the rules have also changed. Earlier, candidates used to mention the cases filed against them in their nomination affidavits. Now, all candidates will have to mention in public advertisements the cases filed against them, and also conviction, if any.

To assume that voters will now cast their votes only on the basis of castes will be incorrect. For how long will voters vote for their own castes, even if their own caste candidates is a mafia gangster? A criminal and a gangster has no caste. I believe, the voters of UP this time will break this illusion that votes can be cornered only on the basis of castes.

Get connected on Twitter, Instagram & Facebook