Rajat Sharma

My Opinion

क्या KCR सचमुच अंधविश्वास और परिवारवाद में यकीन रखते हैं?

akb fullतेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) को टोना-टोटका और ‘6’ नंबर को लकी मानने के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने अपने ज्योतिषी की सलाह पर पिछले 5 साल से राज्य के सचिवालय में कदम नहीं रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए KCR पर परिवारवाद की राजनीति करने और अंधविश्वास के आधार पर फैसले लेने के लिए निशाना साधा।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, के. चंद्रशेखर राव मुख्यमंत्री बनने के बाद से सचिवालय नहीं गए हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस भवन का वास्तु उनके लिए ठीक नहीं है। उन्होंने 2016 में 50 करोड़ की लागत से घर पर ही एक वास्तुसम्मत कार्यालय बनवाया । उन्होंने सचिवालय में कभी कदम नहीं रखा जबकि उनके मंत्री और नौकरशाह वहीं से काम करते हैं। उन्होंने बेगमपेट में अपने कैंप ऑफिस की मरम्मत कराई और इसे 5 मंजिल ऊंचा और 6 ब्लॉक्स तक बढ़ा दिया। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, KCR का मानना है कि ‘शासक को ऐसी जगह से काम करना चाहिए जो दूसरों की तुलना में ज्यादा ऊंचाई पर हो।’

KCR ने एक नया सचिवालय बनवाने की कोशिश की लेकिन उन्हें जनता का विरोध झेलना पड़ा। वह नए सचिवालय के निर्माण के लिए सेना की जमीन का अधिग्रहण करना चाहते थे। इसके बाद उन्होंने पूरे सचिवालय को वास्तुसम्मत बनाने के लिए उसकी मरम्मत करवानी शुरू कर दी। पिछले 5 साल से KCR सचिवालय की बजाय अपने सरकारी आवास से काम कर रहे हैं।

लोगों को लगता है कि चंद्रशेखर राव 6 को अपने लिए लकी अंक मानते हैं, इसीलिए उनके काफिले में जितनी गाड़ियां होती हैं, उनका नंबर या तो 6 है या सभी अंकों का जोड़ 6 है। चंद्रशेखर राव कोई भी काम मुहूर्त देखे बिना नहीं करते। मुहूर्त में भी इस बात का ख्याल रखा जाता है कि टाइम ऐसा हो, जिसका जोड़ 6 हो। जब वह पहली बार CM बने तो उन्होंने दोपहर 12:57 मिनट पर शपथ ली, जिसके अंकों का जोड़ 6 होता है। एक बार वह महबूब नगर जिला गए तो वहां 51 बकरों की बलि चढ़ाई गई। लोगों का दावा है कि 51 बकरों की बलि इसीलिए चढ़ाई गई क्योंकि इसका जोड़ भी 6 होता है। चंद्रशेखर राव जो कमेटियां बनाते हैं, उनके सदस्यों की संख्या भी इस तरह रखते हैं जिसके अंकों का जोड़ 6 हो। शायद यही वजह है कि उन्होंने किसानों के लिए जो को-ऑर्डिनेशन कमेटी बनाई उसमें 15 सदस्य रखे। उनकी पार्टी की जिला समिति में 24 सदस्य हैं, राज्य स्तरीय समिति में 42 सदस्य हैं और इन सबका जोड़ 6 है।

तेलंगाना के सियासी जानकारों के मुताबिक, KCR हैदराबाद की मशहूर हुसैन सागर झील कभी नहीं जाते, क्योंकि कहा जाता है कि हुसैन सागर झील जाने के बाद ही एनटी रामाराव से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी छिन गई थी।

अपनी जनसभा में KCR पर कटाक्ष करते हुए मोदी ने कहा, “आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के इस युग में .. अभी भी, 21वीं सदी में भी, जो लोग अंधविश्वास के गुलाम बने हुए हैं, वो अपने अंधविश्वास में किसी का भी नुकसान कर सकते हैं। ये अंधविश्वासी लोग तेलंगाना के सामर्थ्य के साथ कभी न्याय नहीं कर सकते। मुझे याद है जब मैं गुजरात में मुख्यमंत्री था, तो वहां भी कुछ शहरों की पहचान बना दी गई थी कि उस शहर में कोई मुख्यमंत्री जा नहीं सकता है। अगर वहां जाएगा तो उसकी कुर्सी चली जाएगी। मैं डंके की चोट पर वहीं पर जाता था, बार-बार जाता था।“

मोदी ने कहा- “मैं विज्ञान …टेक्नोलॉजी में विश्वास करता हूं। मैं तो आज तेलंगाना की इस धरती से उत्तर प्रदेश के हमारे मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ जी को भी बधाई देता हूं। वो तो संत परंपरा से हैं, सन्यासी परंपरा से हैं। उनके कपड़े और भेषभूषा देखकर के कोई भी बात मान लेगा। जब उनके सामने आया कि फलानी जगह पर नहीं जाना है, ढिकानी जगह पर नहीं जाना चाहिए। योगी जी ने कहा, मैं विज्ञान में विश्वास करता हूं, वे चले गए और दोबारा जीतकर मुख्यमंत्री बने।“
मोदी ने कहा, “अंधविश्वास को इस प्रकार से तवज्जो देने वाले लोग, उसके भविष्य को कभी संवार नहीं सकते हैं। ऐसे अंधविश्वासी लोगों से हमारे तेलंगाना को हमें बचाना है।.. .. अंधविश्वासी लोग कभी तेलंगाना के सामर्थ्य के साथ न्याय नहीं कर सकते। कुछ लोग हैं जो अंधविश्वास पर भरोसा करते हुए कुछ जगहों पर नहीं जाते।“

मोदी ने आरोप लगाया कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “ परिवारवाद और परिवारवादी पार्टियां, देश के लोकतंत्र और देश के युवा, दोनों की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। देश ने देखा है, तेलंगाना के लोग देख रहे हैं कि एक परिवार को समर्पित पार्टियां जब सत्ता में आती हैं तो कैसे उस परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार, उसका सबसे बड़ा चेहरा बन जाते हैं। तेलंगाना के लोग देख रहे हैं कि परिवारवादी पार्टियां किस तरह सिर्फ अपना विकास करती हैं, अपने परिवार के सदस्यों की तिजोरियां भरती हैं। इन परिवारवादी पार्टियों को गरीब के दर्द की, गरीब की तकलीफों की, न उनको कोई चिंता नहीं होती है, न परवाह होती है।“

मोदी ने कहा, “इनकी राजनीति सिर्फ इस बात पर केंद्रित होती है कि एक परिवार लगातार किसी भी तरह सत्ता पर कब्जा करके लूट सके तो लूटता रहे। इसके लिए, ये लोग समाज को बांटने की साजिशें रचतें हैं, जनता के विकास में उनकी कोई रूची नहीं होती है। पिछड़ेपन, समाज पीछे रहे उसी में उनका भला देखते हैं। परिवारवाद की वजह से देश के युवाओं को, देश की प्रतिभाओं को राजनीति में आने का अवसर भी नहीं मिलता। परिवारवाद उनके हर सपनों को कुचलता है, उनके लिए हर दरवाजे बंद करता है। इसलिए, आज 21वीं सदी के भारत के लिए परिवारवाद से मुक्ति, परिवारवादी पार्टियों से मुक्ति एक संकल्प भी है, और एक नैतिक आंदोलन भी है। जहां जहां परिवारवादी पार्टियां हटी हैं, वहां वहां विकास के रास्ते भी खुले हैं।“

मोदी परिवारवाद की राजनीति के खिलाफ पूरे अधिकार से बोल सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति से दूर रखा है। लोग उनके भाइयों, भतीजों या अन्य करीबी रिश्तेदारों के नाम भी नहीं जानते हैं। न ही मोदी के रिश्तेदार उनके पद का कोई फायदा उठा सके। वंशवाद की राजनीति के मुद्दे पर कोई भी मोदी को नहीं घेर सकता। इसके उलट भारत में जितनी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, वे ज्यादातर परिवारवाद की शिकार हैं। वे चाहें लालू प्रसाद यादव हों, मुलायम सिंह यादव हों, ओम प्रकाश चौटाला हों, प्रकाश सिंह बादल हों, एम करुणानिधि हों, एच डी देवेगौड़ा हों, उद्धव ठाकरे हों या डॉ फारूक अब्दुल्ला हों।

KCR ने अपने परिवार के कई सदस्यों को विधायक, सांसद या मंत्री बनाया है। KCR खुद मुख्यमंत्री हैं, उनके बेटे KTR (के.टी.राम राव) तेलंगाना राष्ट्र समिति के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और अपने पिता के मंत्रिमंडल में ताकतवर मंत्री भी हैं। KCR की बेटी के. कविता सांसद थीं। वह पिछला चुनाव हार गईं, लेकिन उनके पिता ने उन्हें MLC बना दिया और उन्हें जल्द ही मंत्री भी बनाया जा सकता है। KCR के भतीजे टी. हरीश राव भी उनकी सरकार में मंत्री हैं। KCR के एक और भतीजे जोगिनापल्ली संतोष कुमार सांसद हैं। केसीआर ने उन्हें राज्यसभा में भेजा है। इसलिए उनके परिवार के 5 लोग तो अब महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। अब चर्चा यह है कि KCR अपने एक और भतीजे वामसी को सक्रिय राजनीति में लाएंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह अंधविश्वास के चलते वामसी को राजनीति में ला रहे हैं। लोगों का कहना है कि KCR 6 नंबर को लकी मानते हैं, इसलिए वह ‘6’ तक पहुंचने के लिए परिवार के एक और सदस्य को सियासत में लाना चाहते हैं।

KCR कई बार पीएम नरेंद्र मोदी से सीधे तौर पर मिलने से बचने की कोशिश कर चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि ऐसा वह ज्योतिषियों की सलाह की वजह से कर रहे हैं। जब भी मोदी तेलंगाना के दौरे पर जाते हैं, तो KCR कोई न कोई बहाना बनाकर तेलंगाना से बाहर चले जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह ऐसी किसी भी मुलाकात को अपने लिए ‘अनलकी’ मानते हैं। जब मोदी इस साल फरवरी में 11वीं सदी के संत श्री रामानुजाचार्य की स्मृति में स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी के उद्घाटन के लिए तेलंगाना गए थे, तब KCR बीमारी की बात कहकर एयरपोर्ट पर पीएम का स्वागत करने नहीं पहुंचे थे। गुरुवार को जब मोदी हैदराबाद पहुंचे, KCR उससे 3 घंटे पहले ही एच. डी. देवेगौड़ा और उनके बेटे से मिलने बेंगलुरु के लिए रवाना हो चुके थे। वहां उनका कोई सरकारी काम भी नहीं था। KCR ने मोदी की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए बेंगलुरु में कहा, ‘भाषणबाजी और वादों के अलावा हकीकत क्या है। उद्योग बंद हो रहे हैं, जीडीपी नीचे जा रही है, महंगाई मुंह उठा रही है और रुपया बुरी तरह गिर गया है। आज कोई खुश नहीं है, चाहे किसान हों, दलित हों, आदिवासी हों। राष्ट्रीय स्तर पर जल्द ही बदलाव होगा। 2-3 महीने बाद आपको सनसनीखेज खबर मिलेगी।’

आपने वीडियो में देखा होगा कि KCR जब एच. डी. देवगौड़ा और उनके बेटे की मौजूदगी में मीडिया से बात कर रहे थे तो उनकी बाजू पर एक चमकीला कपड़ा बंता हुआ था। मुझे इसके बारे में पता चला कि चंद्रशेखर राव जब भी किसी विशेष मिशन पर जाते हैं, या किसी जरूरी मीटिंग में जाते हैं तो इस तरह का बाजूबंद उनकी बांह पर होता है। यह बाजूबंद केसीआर की सरकार में होम मिनिस्टर महमूद अली उन्हें देते हैं। इस बाजूबंद को ‘इमाम-ए-ज़ामिन’ कहा जाता है। KCR को यकीन है कि ‘इमाम-ए-ज़ामिन’ उनकी रक्षा करता है और वह जिस काम से जाते हैं, वह पूरा हो जाता है।

KCR केंद्र में जिस ‘बदलाव’ की बात कर रहे हैं उसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। KCR ने भविष्यवाणी की थी कि देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनेंगे, औऱ वह बन भी गए। लेकिन उन्होंने यह भविष्यवाणी नहीं की थी कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कुमारस्वामी बार-बार रोएंगे, इसके बाद बगावत होगी और उनकी सरकार चली जाएगी। जबकि ऐसा ही हुआ था। KCR ने यह भी नहीं बताया कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इसी तरह की बातें बोली थीं, देवगौड़ा और दूसरे नेताओं से मिलने के बाद मोदी को मात देने का ऐलान किया था। लेकिन क्या हुआ, पूरी दुनिया ने देखा।

मोदी ने गुरुवार को हैदराबाद में जो भी कहा, साफ कहा: जो करना है कर लो, जितनी ताकत लगानी है लगा लो, जो टोने-टोटके करने हैं कर लो, लेकिन बीजेपी के उखाड़ नहीं पाओगे। बीजेपी ने पिछले 8 सालों में जनता के दिल में जगह बना ली है।

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Does KCR actually believe in superstition and dynastic politics ?

rajat-sirThe chief minister of Telangana, K. Chandrashekhar Rao, is known for his belief in superstitions and his infatuation with the numeral ‘6’. It is said that he did not go to the State Secretariat for the last five years on the advice of his astrologer. On Thursday, Prime Minister Narendra Modi, while addressing a public meeting in Hyderabad, lashed out at KCR for trying to perpetuate dynastic politics and taking decisions on the basis of superstitious advice.

There have been media reports on how K. Chandrashekhar Rao, after becoming CM, did not go to the secretariat, because he thought it was not Vaastu-compliant, and in 2016, built a Rs 50 crore home-cum-office which he claimed to be Vaastu-compliant. He never went to the state secretariat from where his ministers and bureaucrats work. He got his camp office in Begumpet renovated, raising it to five floors and six blocks. There were media reports at that time which said he believed that a “ruler must work from a place that is at a greater height than others”.

KCR tried to build a new secretariat but there were public protests over this. He wanted to acquire a land belonging to the army and build a secretariat. He then started renovating the entire secretariat to make it Vaastu-compliant. For the last five years, KCR had been working from his official residence instead of the secretariat.

Because of his fetish for the numeral 6, all the vehicles that form part of KCR’s cavalcade have digits which add up to six. KCR never does any important work without consulting ‘muhurta’ (almanac time). He took oath as chief minister at 12:57 pm, and the digits add up to six. When he once visited Mehboob Nagar district, 51 goats were sacrificed, and here too, the digits added up to six. Similarly, the numeral ‘6’ dominates in the committees that have been set up by him. The coordination committee on farmers has 15 members, his party district committees have 24 members, the state level committee has 42 members, and all these digits add up to six.

Local residents say, the CM avoids going to the famous Husain Sagar Lake in Hyderabad, because he was told that N. T. Ramarao lost his throne as AP chief minister, after visiting Husain Sagar Lake.

At the public meeting, while taking potshots at the Telangana CM, Modi said: “Superstitious people cannot work for the progress of Telangana. Some people believe in superstitions and do not go to certain places….I too was advised to avoid certain places and cities, but I make sure I visit those places as many times as possible. I believe in science. I believe in technology. I want to mention UP chief minister Yogi Adityanath here. He lives simply and is a monk wears saffron robes. It would be easy to think that he might be a highly superstitious man, but let me tell you, he rejects all such superstitions. Several former UP chief ministers avoided visiting Noida considering it a bad omen, but Yogi visited Noida several times, disregarding the advice of astrologers. Yogi twice became the chief minister.”

Modi said, it was astonishing that the head of a state government believes in superstition during the 21st century, at a time when science and technology is dominant. He also alleged that the Telangana CM was promoting dynastic politics. He said, “these ‘parivarvaadi’ parties loot people’s money and fill up their coffers. They have no compassion for the poor. Leaders who believe in dynastic politics have damaged the country and spoiled the future of youths. Dynastic politics is a threat to our democracy. Time has come to say goodbye to dynastic politics.”

Modi has the right to speak out against dynastic politics. He has kept his family members away from politics. People do not even know the names of his brothers, nephews or other close relatives. Nor could Modi’s relatives take any advantage of his position. Nobody can point fingers at Modi on the issue of dynastic politics. On the contrary, we have a plethora of regional parties in India, which are run by families. Whether it is Lalu Prasad Yadav, Mulayam Singh Yadav, Om Prakash Chautala, Parkash Singh Badal. M. Karunanidhi, H. D. Devegowda, Uddhav Thackeray or Dr Farooq Abdullah.

KCR has made several of his family members MLAs or MPs or ministers. KCR himself is the chief minister, his son KTR (K.T.Rama Rao) is the working president of Telangana Rashtra Samithi and also a heavyweight minister in his father’s cabinet, KCR’s daughter K. Kavitha was MP, she lost the last election, but his father made her an MLC. She could be made a minister soon. KCR’s nephew T. Harish Rao is a minister. Another nephew of KCR Joginapally Santosh Kumar is a MP. He was sent to Rajya Sabha by KCR. So, five of his immediate family members now hold important positions. There are now reports that KCR will now bring another of his nephews, Vamsi in active politics. Media reports say, he is bringing Vamsi into politics because of superstition. People say, KCR believes in the number six, so he wants to add one more to reach the numeral ‘6’, which he considers lucky for him.

KCR has tried to avoid meeting PM Narendra Modi directly several times. Media reports say, it was because of the advice from astrologers. He always avoids meeting Modi, when the latter visits the state. Media reports say, he considers any such meeting as ‘unlucky’ for him. When Modi went to Telangana in February this year to open the Statue of Equality to commemorate 11th-century saint Shri Ramanujacharya, KCR did not go to receive the PM at the airport on grounds of illness. On Thursday, three hours before Modi reached Hyderabad, KCR left for Bengaluru to meet H. D. Devegowda and his son. He had no official work there. In Bengaluru, KCR reacted to Modi’s barbs by saying,: “There’s a lot of ‘bhaashanbaazi’ (speeches), many promises are made, but what is the reality? Industries are closing down, GDP is falling, inflation is rising, farmers, Dalits and tribals are unhappy….There will soon be change at the national level. You will get sensational news after two-three months”.

You might have noticed in the visuals that KCR was wearing some arm band when he was speaking to the media in the presence of H.D. Devegowda and his son. I was told that whenever KCR goes in a special plane, or attends an important meeting, he wears this armband, said to have been given to him by his Home Minister Mahmood Ali, which is called ‘Imam-e-Zaamin’, which ‘protects’ him from evil and his objective is always fulfilled.

There is no need to speculate on the ‘change’ that KCR expects at the Centre. In the past, KCR had predicted that Devegowda’s son H.D.Kumaraswamy will become the CM of Karnataka. But he did not predict that Kumaraswamy will go through turbulence once he becomes the CM, face revolt, and will soon lose his throne. This is what happened. KCR did not mention that he uttered similar words before the 2019 Lok Sabha elections, when he had met Devegowda and other leaders and had promised that Modi will lose. The rest is history.

What Modi said in Hyderabad on Thursday was clear: Come what may, let KCR carry on with his superstitions, he will never be able to dislodge BJP from power. BJP has already carved its niche in the hearts of common people in the last eight years.

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यासीन मलिक को उम्रकैद की सजा क्यों हुई?

rajat-sirदिल्ली की एक स्पेशल NIA कोर्ट ने बुधवार को JKLF के नेता यासीन मलिक को आतंकी फंडिंग और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में दो बार उम्र क़ैद की सजा सुनाई। स्पेशल जज प्रवीण सिंह ने यासीन मलिक की इस दलील को खारिज कर दिया कि वह 1994 में आतंकवाद का रास्ता छोड़ने के बाद पिछले 28 सालों से महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते पर चल रहा था।

स्पेशल जज ने अपने फैसले में कहा, ‘यह सही हो सकता है कि मुजरिम ने 1994 में बंदूक छोड़ दी हो, लेकिन उसने 1994 से पहले की गई हिंसा के लिए कभी अफसोस ज़ाहिर नहीं किया था। मुजरिम ने दावा किया है कि उसने अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन किया । चौरी-चौरा में हुई हिंसा की एक घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था, लेकिन यहां मुजरिम ने घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा होने के बावजूद न तो इसकी मुखालफत की और न ही अपना आन्दोलन वापस लिया, जिसके कारण हिंसा और फैली।’

NIA के इस तर्क पर कि यासीन मलिक घाटी में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार था, स्पेशल जज ने कहा, ‘यह मुद्दा इस वक्त न तो इस अदालत के सामने है, न ही इस पर कोई फैसला सुनाया गया है, इसलिए अदालत खुद को इस तर्क से प्रभावित नहीं होने देगी ।’

यह पहला बड़ा मामला है जिसमें केंद्र ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। यह टेरर फंडिंग का भी पहला ऐसा मामला है जिसमें अदालत ने सजा सुनाई है। अदालत के आदेश के मुताबिक, यासीन मलिक को 5 दफाओं में 10-10 साल की, और 2 दफाओं में 20-20 साल की सजा काटनी होगी, और 10 लाख रुपये का जुर्माना भी भरना होगा।

कुल मिलाकर यासीन मलिक के खिलाफ आतंकवादी वरदात की साजिश रचने, दहशगर्दी के लिए फंड जुटाने, दहशतगर्द तंजीमों के साथ राब्ता रखने, देश के साथ गद्दारी करने यानी राजद्रोह के आरोप साबित हुए हैं। कहा जा सकता है कि अगर यासीन मलिक अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं देता है तो उसे आखिरी सांस तक जेल में रहना पड़ेगा।

सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद यासीन मलिक को दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया गया और साथ ही घाटी में पथराव की घटनाएं शुरू हो गईं। इसके अलावा घाटी में विरोध प्रदर्शन भी हुए। पाकिस्तान की बात करें तो प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, पूर्व पीएम इमरान खान, पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी और अन्य नेताओं ने फैसले की निंदा की।

सबसे पहले मैं आपको बताता हूं कि पूरा मामला क् था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 2017 में यासीन मलिक के खिलाफ आतंकी फंडिंग के आरोपों की जांच शुरू की थी। NIA ने अदालत में साबित किया कि मलिक ने लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद से पैसे लिए थे। यासीन मलिक ने यह पैसा घाटी में सक्रिय दहशतगर्द तंज़ीमों को भेजा था। इस पैसे का इस्तेमाल पत्थरबाजी की घटनाओं को तूल देने, सेना और सुरक्षाबलों पर हमला करने और टारगेट किलिंग्स के लिए किया गया था।

इस मामले में कुल 12 लोग आरोपी थे, जिनमें से 2 अभी भी फरार हैं। NIA ने जनवरी 2018 में इस मामले की चार्जशीट दाखिल की थी। इस मामले में यासीन मलिक के अलावा, शब्बीर शाह, मसर्रत आलम, असिया अंद्राबी और इंजीनियर राशिद को भी आरोपी बनाया गया था। सुनवाई के दौरान NIA ने 3000 पन्नों में सुबूत पेश किए, शब्बीर शाह, यासीन मलिक और अन्य लोगों के ई-मेल कोर्ट के सामने रखे।

कुल मिलाकर 400 से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस भी कोर्ट में पेश किए गए। इसमें गुनहगारों के बीच बातचीत की रिकॉर्डिंग, पाकिस्तानी हाई कमीशन से रिश्तों के सबूत और हुर्रियत का आतंकवादी प्लान भी शामिल हैं। NIA ने यासीन मलिक पर जुर्म साबित करने के लिए 125 गवाह भी कोर्ट में पेश किए। एनआईए ने यासीन मलिक द्वारा जुटाई गई जायदाद के सबूत दिए, जिसके आधार पर अदालत ने उस पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

पूरी दुनिया जानती है कि यासीन मलिक ने 1990 से पहले बंदूक उठाई थी, और वह आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने के लिए पाकिस्तान गया था। पाकिस्तान से लौट कर यासीन मलिक ने कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया। वह देश के पूर्व गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बहन रूबिया सईद के अपहरण का मास्टरमाइंड था। वह जनवरी 1990 में भारतीय वायु सेना के जवानों पर हुए उस हमले का भी मास्टरमाइंड था जिसमें 4 अफसर शहीद हो गए थे।

उन शहीदों के परिवारों में स्क्वॉड्रन लीडर रवि खन्ना का परिवार भी शामिल है, जो पिछले 32 सालों से इंसाफ का इंतजार कर रहा है। उनकी पत्नी निर्मल खन्ना ने बुधवार को कहा कि इस फैसले से न्याय पाने की उनकी उम्मीदें फिर से जग गई हैं। शहीद की पत्नी ने कहा, ‘इंसाफ का पहिया आखिरकार चलने लगा है। मुझे सौ फीसदी यकीन है कि मुझे इंसाफ दिया जाएगा। लोग कहते हैं कि इंसाफ में देरी का मतलब अन्याय है, मगर मैं उस बात में यकीन नहीं करती।’

निर्मल खन्ना ने कहा, ‘यासीन मलिक ने न सिर्फ मेरे पति की हत्या की, बल्कि मेरी सास, ससुर और मेरी मां की भी हत्या की। मेरे दो नन्हे-मुन्नों का बचपन खो गया और पल भर में मेरी खुशी छिन गई। इस आतंकवादी ने हमारी दुनिया को उलट-पलट कर रख दिया।’ स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना को एके-47 राइफल से 27 बार गोली मारी गई थी।

अगस्त 1990 में सुरक्षा बलों के साथ एक मुठभेड़ में यासीन मलिक घायल हो गया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। वह 1994 तक जेल में रहा। यासीन मलिक ने अदालत में दावा किया कि 1994 में जेल से छूटने के बाद से उसने कभी हिंसा नहीं की। मौजूदा मामले में यासीन मलिक ने खुद के लिए वकील रखने से इनकार कर दिया था और अदालत ने उसे खुद अपना पक्ष रखने की इजाजत दी थी।

यासीन मलिक को तिहाड़ जेल भेज दिया गया है और उसे सिक्युरिटी बैरक में रखा गया है। हालांकि ये लोअर कोर्ट का फैसला है, अभी यासीन मलिक के पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाने का रास्ता खुला है। लेकिन यासीन मलिक का जो स्वभाव है, जिस तरह का माइंडसैट है, हो सकता है वह अपील न करे। उसने अदालत में भी कह दिया था कि वह गुनाह कबूल करता है, और अदालत को जो सजा देनी है वह उसे कबूल है।

ये भी सही है कि यासीन मलिक ने 28 साल से किसी तरह की हिंसक गतिविधि में हिस्सा नहीं लिया है। गुजराल से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक, वह सभी प्रधानमंत्रियों से मिला। यह भी सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उसे पासपोर्ट दिया। इसका मतलब उस वक्त की सरकारों ने यासीन मलिक पर यकीन किया और उसे पॉलिटिकल मेन स्ट्रीम में लाने की कोशिश की। इसके बाद भी अगर यासीन मलिक ने आतंकवाद के लिए पैसे का इंतजाम किया, तो यह बहुत बड़ा गुनाह है। यह गुनाह अदालत में तो अब साबित हुआ है, लेकिन जनता की अदालत में तो ये गुनाह पहले ही साबित हो चुका है। आम लोगों का जो पर्सेप्शन है, वह यासीन मलिक के खिलाफ है।

जैसे ही श्रीनगर में यासीन मलिक के इलाके मैसूमा में विरोध शुरू हुआ, JKPDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने अपने बयान में कहा कि यह ‘कश्मीरियों पर अत्याचार’ का एक उदाहरण है। उसने कहा, ‘सजा देने से कश्मीर मुद्दे को हल करने में मदद नहीं मिलेगी। मुझे लगता है कि भारत की ताकत इस्तेमाल करने की नीति के नतीजे अच्छे नहीं होंगे। स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है। मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है।’

नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा, यासीन मलिक को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा, ‘अदालत ने अपना फैसला दिया है, और यह यासीन मलिक को तय करना है कि क्या करना है। मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।’

यासीन मलिक को मैं अच्छी तरह जानता हूं। मैंने उसे 2 बार ‘आप की अदालत’ के कठघरे में बिठाया है, उससे सख्त सवाल पूछे है। शो के दौरान काफी तकरार हुई थी। ऑडियंस के बीच बैठे कश्मीरी पंडितों ने उसे हत्यारा कहा था, कश्मीरी पंडितों का खून बहाने वाला आतंकवादी कहा था और उसे कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार बताया था। उसे बार-बार इस बात के लिए कोसा गया कि उसने फौज के लोगों को मारा। हालांकि जिस केस में सजा हुई वह टेरर फंडिंग का केस है।

यासीन मलिक बार-बार कहता था कि जब उसने हथियार उठाए थे तब कश्मीर में माहौल ही ऐसा था। उसने दावा किया था कि 1994 में हथियार छोड़ने के बाद वह गांधीजी के अहिंसा के रास्ते में चल रहा है। यासीन मलिक ने मुझसे यह भी कहा कि उन्होंने कश्मीर के नौजवानों को बंदूक की बजाय बैलट का रास्ता अपनाने को कहा है।

यह बात भी सही है कि भारत में यासीन मलिक ने अलग-अलग सरकारों के साथ मिलकर कश्मीर का मसला हल करने की कोशिश की। लेकिन ये भी सच है कि यासीन मलिक इस मामले में पाकिस्तान को पार्टी बनाना चाहता था, जो कि भारत को मंजूर नहीं था।

यासीन मलिक मानता था कि पाकिस्तान को बातचीत में लाये बगैर कश्मीर का मसला हल नहीं हो सकता। वह पाकिस्तान के नेताओं से मिलता था, पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादियों के आकाओं से भी उसके रिश्ते थे। मैंने पाकिस्तान में हाफिज सईद के साथ उसकी तस्वीर दिखाई थी।

यासीन ने मिशाल मलिक नाम की एक पाकिस्तानी लड़की से शादी की है,जो वहीं रहती है। उनकी एक छोटी-सी बेटी भी है। बुधवार को जब दिल्ली में सजा सुनाई गई, तो मिशाल अपनी बेटी के साथ पाकिस्तान की फेडरल इन्फर्मेशन मिनिस्टर मरियम औरंगजेब के साथ इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई दीं। मिशाल मलिक ने कहा, ‘मेरे पति को न तो वकील दिया गया और न ही दलील देने की इजाजत दी गई और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई।’ मरियम औरंगजेब ने कहा कि यासीन मलिक पिछले 8 साल से अपनी बेटी से नहीं मिल पाए हैं।

बड़े पाकिस्तानी नेताओं में, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्वीट किया, ‘आज का दिन भारतीय लोकतंत्र और उसकी न्याय प्रणाली के लिए एक काला दिन है। भारत यासीन मलिक को शारीरिक रूप से कैद कर सकता है लेकिन वह कभी भी स्वतंत्रता के उस विचार को कैद नहीं कर सकता जिसका वह प्रतिनिधित्व करते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए आजीवन कारावास कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार को नयी गति प्रदान करेगा।’

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने ट्वीट किया, ‘मैं कश्मीरी नेता यासीन मलिक के अवैध कारावास से लेकर फर्जी आरोपों में उनकी सजा तक के खिलाफ मोदी सरकार की फासीवादी रणनीति की कड़ी निंदा करता हूं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को कश्मीर में हिंदुत्व फासीवादी मोदी शासन के स्टेट टेररिज्म के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।’

पाकिस्तान के विदेश मंत्री और PPP सुप्रीमो बिलावल भुट्टो जरदारी ने टिप्पणी की: ‘एक फर्जी मुकदमे में हुर्रियत नेता यासीन मलिक की अन्यायपूर्ण सजा की कड़ी निंदा करता हूं। भारत कभी भी कश्मीरियों की आजादी और आत्मनिर्णय की आवाज को चुप नहीं करा सकता। पाकिस्तान कश्मीरी भाइयों और बहनों के साथ खड़ा है, उनके न्यायपूर्ण संघर्ष में हर संभव मदद करता रहेगा।’

जब मैं यासीन मलिक के बारे में सोचता हूं, जब पिछले 28 साल का उसका ट्रैक रिकॉर्ड देखता हूं, तो लगता है कि यासीन मलिक ने 28 सालों में हथियार नहीं उठाया, पॉलिटिकल सिस्टम में शामिल होने की कोशिश भी की, इसलिए उसके साथ नरमी बरती जानी चाहिए।

लेकिन इसके बाद जब यह ख्याल आता है कि यासीन मलिक के कारण हमारी एयरफोर्स के 4 बहादुर अफसर शहीद हुए, यासीन मलिक ने हाफिद सईद से पैसा लिया और कश्मीर में खूनखराबे को बढ़ावा दिया, तो लगता है कि उसे सजा मिलनी चाहिए। यासीन मलिक ने भले खुद बंदूक न उठाई हो, लेकिन अगर उसने कश्मीरी लड़कों के हाथ में पत्थर या बंदूक थमाने के बदले पैसे दिए, पाकिस्तान से उसे फंड मिले, तो ये गुनाह माफी के काबिल नहीं है।

भारत की आम जनता का परशेप्सन भी यही है कि यासीन मलिक सजा का हकदार है। हो सकता है महबूबा मुफ्ती को जनता का रुख न दिख रहा हो, इसीलिए अभी भले ही वह पाकिस्तान की भाषा बोल रही हों, लेकिन इतना तय है कि अब पाकिस्तान की भाषा हिंदुस्तान में तो नहीं चलेगी, न इसका कुछ असर होगा। अब हिंदुस्तान बदल चुका है। अब आतंकवादियों के साथ रहम नहीं होता। अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाता है।

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Why did Yasin Malik get life imprisonment?

rajat-sirA special NIA court in Delhi on Wednesday pronounced two concurrent life term imprisonment sentences to JKLF leader Yasin Malik on charges of terror funding and waging war against the nation. Special Judge Parveen Singh rejected Yasin Malik’s contention that he had been adhering to Mahatma Gandhi’s ideas of non-violence for the last 28 years, when he gave up militancy in 1994.

In his verdict, the Special Judge said, “The convict may have given up the gun, but he never expressed any regret for the violence he committed prior to 1994…The convict claimed that he had followed Gandhian principle of non-violence…It took only one small incident of violence at Chauri Chaura, for the Mahatma to call off the entire non-cooperation movement, but the convict….neither condemned the violence (in the Valley) nor withdrew his calendar of protest which had led to the said violence.”

On the NIA prosecution’s argument that Yasin Malik should be given the death penalty for his role in the genocide and exodus of Kashmiri Pandits from the Valley, the Special Judge said: “This issue is neither before this court, nor has been adjudicated upon and thus the court cannot allow itself to be swayed by this argument”.

This is the first big case in which the Centre has taken a strong stand against terrorism in Jammu & Kashmir. This is the also the first case of terror funding in which a verdict has been given. Yasin Malik has also been sentenced for 10-years rigorous imprisonment under five different sections, and 20-year imprisonments under two other sections, apart from paying Rs 10 lakh fine.

The charges include, conspiring terror attacks, arranging funds for terrorists, maintaining contacts with terror groups, sedition and waging war against the nation. If Yasin Malik does not challenge this verdict in higher courts, he may have to spend his time in jail till his last breath.

Soon after the sentencing, Yasin Malik was sent to Delhi’s Tihar jail, and simultaneously, incidents of stoning began in the Valley. There were protests too. In Pakistan, leaders, right from Prime Minister Shehbaz Sharif, ex-PK Imran Khan, to ex-cricketer Shahid Afridi and others, condemned the verdict.

Let me first go into the depth of this case. National Investigation Agency (NIA) had begun its probe into terror funding charges against Yasin Malik, way back in 2017. NIA proved in court that he had taken money from Lashkar-e-Tayyaba chief Hafiz Saeed. Yasin Malik sent this money to terror groups active in the Valley. This money was used to provoke stone throwing incidents, attacks on army and security forces and targeted killings.

There were 12 persons accused, out of whom two are absconding. NIA filed its chargesheet in January, 2018, and made Yasin Malik, Shabbir Shah, Masrat Alam, Aasiya Andrabi and Engineer Rashid as accused. During trial, NIA produced 3,000 pages of evidence, recordings of conversations between the accused, e-mails between Shabbir Shah, Yasin Malik and others.

In all, more than 400 electronic evidences were produced in court. Evidences were produced on how the accused had contacts with Pakistan High Commission in Delhi, and terror plans by Hurriyat Conference. A total of 125 witnesses were produced before the court. The NIA gave evidences of properties acquired by Yasin Malik, on the basis of which the court levied Rs 10 lakh fine on him.

The world knows that Yasin Malik had taken up the gun in 1990, went to Pakistan for arms training, and on his return carried out several terror attacks. He was the mastermind behind the kidnapping of Rubaiya Sayeed, sister of former Chief Minister Mehbooba Mufti, and daughter of the then Union Home Minister Mufti Mohammed Sayeed. He was also the mastermind behind the terror attack on Indian Air Force personnel in January, 1990, in which four officers were martyred.

The martyrs’ families included Squadron Leader Ravi Khanna’s family, which has been waiting for justice for last 32 years. His widow Nirmal Khanna said on Wednesday that her hopes for getting justice have been rekindled by this verdict. “Wheels of Justice have finally started rolling. I am 100 per cent confident that we will get justice. Normally people say, justice delayed is justice denied, but I do not believe in that”, the martyr’s widow said.

Nirmal Khanna said, “Yasin Malik not only murdered my husband, but also killed my mother-in-law, father-in-law and my mother. Childhood of my two small kids was lost and my happiness was snatched away in a second. This terrorist turned our world upside down.” Squadron Leader Ravi Khanna was shot 27 times with an AK-47 assault rifle.

In August, 1990, Yasin Malik was injured in an encounter with security forces, and was arrested. He remained in prison till 1994. Yasin Malik claimed in court that after his release from jail in 1994, he never indulged in violence. In the current case, Yasin Malik refused hiring a lawyer and the court allowed him to place his defence on his own.

Now that Yasin Malik has been lodged in security barracks of Tihar Jail, it is awaited whether he will appeal against this verdict in high court. Considering Yasin Malik’s mindset, I do not think, he may seek appeal. He had told the trial court that he admits his guilt and would accept whatever sentence is given.

It is true that Yasin Malik did not directly take part in any incident of violence for the last 28 years. He had met Prime Ministers I. K. Gujral, Atal Bihari Vajpayee and Dr Manmohan Singh in the past. It is also true that the Vajpayee government issued him a passport to travel abroad. This shows that the previous governments trusted him and tried to bring him into the political mainstream. In spite of all these, if Yasin Malik arranged funding for terror groups in the Valley, it is a crime, which has now been proved in court. His crime has already been proved in the court of the people. The common Indian’s perception is against Yasin Malik.

As protests begain in Yasin Malik’s locality, Maisuma, in Srinagar, JKPDP chief Mehbooba Mufti came up with her remark that this is an example of “atrocities on Kashmiris”. She said, “Sentencing won’t help resolve Kashmir issue. ..I feel the consequences of the muscular policy of India won’t be good. The situation is deteriorating by the day. The issue is getting complicated instead of being resolved.”

National Conference leader Omar Abdullah said, Yasin Malik has every right to approach the higher court. “the court has given its verdict, and it is up to Yasin Malik to decide what to do. I don’t want to comment on that.”

I know Yasin Malik personally. He came twice to my show ‘Aap Ki Adalat’. I grilled him by asking him many tough questions. There was much tough talk during the show. Kashmiri Pandits, sitting in the audience, described him during the show as a murderer, responsible for genocide and killing of air force officers. This is a case of terror funding.

Yasin Malik used to say, he took up the gun only because the situation was such in the Valley. He claimed that he was following the Gandhian path of non-violence since 1994. Yasin Malik also told me, he used to ask Kashmiri youths to fight with ballots and not bullets.

It is also true that Yasin Malik had tried to solve the Kashmir issue by sitting with several governments in the past. But is also a fact that he wanted to make Pakistan a party in the Kashmir dispute, which was not acceptable to India.

Yasin Malik used to say that the Kashmir issue can never be solved without involving Pakistan. He had close relations with the Pakistani masters sitting across the border. I had shown the pictures of Yasin Malik sitting with LeT chief Hafiz Saeed in Pakistan.

Yasin had married a Pakistani girl Mishal Malik, and has a young daughter. Mishal is staying in Pakistan with her daughter. On Wednesday, when the sentencing was done in Delhi, Mishal appeared at a press conference in Islamabad with her daughter, along with Pakistan’s Federal Information Minister Maryam Aurangzeb. Mishal Malik said, “My husband was not given a lawyer, nor was allowed to place his arguments, and was sentenced to life imprisonment.” Maryam Aurangzeb said that Yasin Malik has not been able to meet his daughter for the last eight years.

Among top Pakistani leaders, Prime Minister Shehbaz Sharif tweeted: “Today is a black day for Indian democracy & its justice system. Indian can imprison Yasin Malik physically but it can never imprison the idea of freedom he symbolises. Life imprisonment for valiant freedom fighter will provide fresh impetus to Kashmiris’ right to self-determination”.

Former PM Imran Khan tweeted: “Strongly condemn the continuing fascist tactics of Modi govt against Kashmiri leader Yasin Malik from his illegal imprisonment to his conviction on fake charges. International community must act against the Hindutva fascist Modi regime’s state terrorism in IIOJK.”

Pakistan Foreign Minister and PPP chief Bilawal Bhutto Zardari remarked: “Strongly condemn unjust sentencing of Hurriyat leader Yasin Malik in a sham trial. Indian can never silence Kashmiris’ voice for freedom and self-determination. Pakistan stands with Kashmiri brothers and sisters, will continue to provide all possible support in their just struggle.”

I think, going by the track record of Yasin Malik for the past 28 years, when he did not take up the gun and tried to join the political system, he could have been dealt with lightly, and that too, in a case of terror funding.

But when I remember the martyrdom of our four valiant IAF officers, Yasin Malik taking money from LeT mastermind Hafiz Saeed and instigating violence in the Valley, I feel Yasin Malik deserved imprisonment. Yasin Malik may not have personally taken up the gun, but he encouraged Kashmiri youths to take up stones and guns to cause mayhem. He took funds from Pakistan and channelled them to these youths. Such a crime can never be condoned.

The popular Indian perception is that Yasin Malik deserved imprisonment. Mehbooba Mufti and her Ilk may be speaking Pakistan’s language today, but this much is certain: There can be no place for Pakistan’s language in India. India has now changed. Terrorists are no more given leniency. Pakistan is being paid back in its own coin.

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सरकार को ASI संरक्षित सभी मंदिरों में पूजा की इजाज़त देनी चाहिए

akbवाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि ईदगाह और दिल्ली में कुतुब मीनार के आसपास मंदिरों के अस्तित्व पर विवाद चल रहा है। इस बीच मंगलवार को खबर आई कि सरकार देश भर में हेरिटेज साइटों पर स्थित और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित एक हजार से ज्यादा मंदिरों में पूजा की इजाजत देने के लिए 1958 के कानून में संशोधन पर विचार कर रही है।

मौजूदा कानून के तहत पुरातत्व विभाग की देखरेख में आने वाले मंदिरों में श्रद्धालुओं को प्रवेश नहीं मिलता और किसी तरह की पूजा-अर्चना पर पाबंदी होती है। प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 साफ तौर पर ASI-संरक्षित स्मारकों के परिसर में मौजूद मंदिरों में पूजा-अर्चना करने पर रोक लगाता है। यह कानून 64 साल पहले राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों को संरक्षित और सुरक्षित करने के लिए बनाया गया था।

इस कानून में संशोधन के लिए संसद के मॉनसून सत्र में एक विधेयक लाया जा सकता है जिसके बाद श्रद्धालुओं को इन प्राचीन मंदिरों में प्रवेश की अनुमति मिल जाएगी और वहां पूजा-अर्चना की जा सकेगी। भारत में लगभग 3,800 एएसआई-संरक्षित स्मारक हैं, जिनमें से अधिकांश जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। इनमें से 1,000 से भी ज्यादा प्राचीन हिंदू मंदिर हैं। सरकार इन मंदिरों को पूजा के लिए खोलने पर विचार कर रही है क्योंकि उसे लगता है कि 1958 का कानून बनाने के पीछे का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ और ऐसे कई पुराने मंदिरों और स्मारकों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।

चूंकि ASI के संरक्षण वाले स्मारकों में आमतौर पर किसी भी तरह की धार्मिक या मजहबी गतिविधि पर पाबंदी होती है, इसके कारण लोगों का आना जाना कम होता है और रखरखाव पर भी उतना ध्यान नहीं दिया जाता। सरकार को यह सुझाव दिया गया था कि अगर पुराने मंदिरों को पूजा पाठ के लिए खोल दिया जाता है तो इसके 2 फायदे होंगे। पहला, इससे इन मंदिरों में लोगों का आना-जाना बढ़ेगा, और दूसरा इन मंदिरों का रख-रखाव भी ठीक से होगा, और आम लोग भी इसमें भागीदार बनेंगे। संस्कृति मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि किलों और ऐतिहासिक स्मारकों के अंदर स्थित कई हिंदू मंदिर टूट-फूट रहे हैं, और उन्हें संरक्षित करने का एकमात्र तरीका इन मंदिरों में पूजा की इजाजत देना हो सकता है। स्थानीय निवासी इन मंदिरों के नियमित रखरखाव को सुनिश्चित कर सकते हैं, क्योंकि ASI के पास कर्मचारियों की कमी है। इनमें से अधिकांश मंदिरों को जीर्णोद्धार की सख्त जरूरत है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर है। यह मंदिर 2011 में उस वक्त सुर्खियों में आया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने इसके गुप्त तहखानों को खोलने के लिए पर्यवेक्षकों को नियुक्त किया था ताकि अंदर रखी संपत्तियों की एक लिस्ट बनाई जा सके। तब यह दावा किया गया था कि मंदिर के बंद तहखानों में 2 लाख करोड़ रुपये का खजाना छिपा हुआ है, लेकिन 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और फैसला सुनाया कि मंदिर का प्रशासन और नियंत्रण पहले की तरह ही त्रावणकोर के शाही परिवार के पास होगा। अब इस मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे मंदिर को अच्छी-खासी आय होती है।

इसी तरह एक और उदाहरण उत्तराखंड का का मशहूर शिव मंदिर जागेश्वर धाम है। इस प्राचीन मंदिर में भक्त हर साल बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, लेकिन इससे मंदिर को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा और उसका रखरखाव बेहतर हुआ है। इसे देखते हुए सरकार ने फैसला किया है कि ASI द्वारा संरक्षित और बंद पड़े प्राचीन मंदिरों में पूजा-अर्चना की इजाजत दी जाए, इससे उनके रखरखाव में मदद मिलेगी। ASI के संरक्षण के तहत मंदिरों कि अब कैटिगरी बनाई जा रही है।

कुछ मंदिर ऐसे हैं जो अच्छी हालत में है और इनमें देवी-देवताओं के विग्रह भी मौजूद है। बस इनकी साफ-सफाई करके श्रद्धालुओं के लिए खोला जा सकता है। कुछ ऐसे हैं जिनमें मंदिर का भवन तो है, लेकिन उनकी मूर्तियां खंडित अवस्था में हैं या फिर मूर्तियां हैं ही नहीं। ऐसे मंदिरों का सरकार पहले जीर्णोद्धार करेगी, उसके बाद इन मंदिरों में नई मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। इन मंदिरों को उनके पुराने स्वरूप में वापस लाकर ही पूजा-अर्चना के लिए खोला जाएगा।

तीसरी कैटिगरी उन मंदिरों की है जिनकी न बिल्डिंग पूरी तरह सुरक्षित है और न मूर्तियां, सिर्फ वहां खंडहर बचे हैं। ऐसे मंदिर ASI के संरक्षण में रहेंगे और इन्हें पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जा सकता है। हिंदू शासकों द्वारा बनाए गए किलों के अंदर मंदिर, जिनमें मूर्तियां हैं, प्रार्थना के लिए तुरंत खोले जा सकते हैं। इस दिशा में काम शुरू हो चुका है और कानून में संशोधन के बाद इन पुराने मंदिरों में पूजा फिर से शुरू हो सकती है। हिंदू शासकों के किलों में कई ऐसे मंदिर मौजूद हैं जिनमें मूर्तियां सही-सलामत हैं और इमारत भी ठीक-ठाक है, इसलिए वहां फौरन पूजा-पाठ की इजाजत दी जा सकती है। इस दिशा में काम शुरू हो गया है और कानून में संशोधन के बाद इन पुराने मंदिरों में पूजा फिर से शुरू हो सकती है।

कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने ASI द्वारा संरक्षित 8वीं सदी के मार्तंड सूर्य मंदिर में पूजा की थी। उन्होंने प्राचीन सूर्य मंदिर में नवग्रह अष्टमंगला पूजा में भाग लिया था। सिन्हा ने इसे ‘दिव्य अनुभव’ बताया था जबकि ASI ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा था कि आयोजन के लिए कोई अनुमति जारी नहीं की गई थी। मार्तंड सूर्य मंदिर को कश्मीर के शाह मिरी वंश के छठे सुल्तान सिकंदर शाह मिरी ने ध्वस्त कर दिया था। बाद में इस मंदिर ने कई भूकंपों को झेला और लगातार खंडहर में तब्दील होता गया। इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार किया जाएगा और इसे पूजा-पाठ के लिए खोला जा सकता है।

इसी तरह तमिलनाडु के महाबलीपुरम में समुद्र के किनारे महाभारत काल का एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर यूनेस्को की वर्ल्ड हैरिटेज साइट्स में भी शामिल है लेकिन यहां भी पूजा-पाठ की इजाजत नहीं है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी यहां गए थे। तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले में विजया चोलेश्वरम मंदिर है, जहां का ‘शिवलिंग’ बहुत पवित्र माना जाता है। यह मंदिर भी अब खंडहर हो चुका है। गुजरात में रुद्र महालय मंदिर है, जो ASI द्वारा संरक्षित होने के बावजूद बेहद खराब हालत में है।

मुझे लगता है कि ASI संरक्षित प्राचीन मंदिरों को श्रद्धालुओं और पूजा-पाठ के लिए खोलना एक स्वागत योग्य कदम है। यह हमारी समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में उठाया गया गंभीर कदम है। ASI 3,800 प्राचीन स्मारकों की देखरेख करता है, लेकिन उन जगहों की क्या हालत है यह सब जानते हैं। दिल्ली में ही आपको तमाम इमारतों के बाहर ASI द्वारा संरक्षित होने का बोर्ड लगा मिल जाएगा, लेकिन उनके रखरखाव का कोई इंतजाम नहीं होता है। तुगलकाबाद के किले या दक्षिणी दिल्ली के बेगमपुर गांव के प्राचीन स्मारकों की हालत देख लीजिए। दिल्ली के हौज खास में भी पुरानी हेरिटेज साइट्स बुरे हाल में हैं।

एएसआई के अधिकारियों का कहना है कि पुराने स्मारकों की उचित देखभाल में काफी फंड की जरूरत होती है। इस काम के लिए एक्सपर्ट्स चाहिए होते हैं और ASI के पास स्टाफ और फंड की दिक्कत है। मुझे लगता है कि अगर पुराने मंदिरों को, पुरानी इमारतों को खोला जाता है और लोगों की आवाजाही बढ़ती है तो इससे आमदनी भी बढ़ेगी और इन जगहों की उचित देखभाल भी होगी। आगरा के किले और ताजमहल में रोजाना हजारों लोग आते हैं। ऐसी खबरें हैं कि सरकार दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में पुराने एतिहासिक हथियारों का संग्राहलय बनाने पर विचार कर रही है। अगर लाल किले में संग्राहलय बन जाएगा, और लोग आएंगे तो इससे फायदा ही होगा। करतारपुर कॉरिडोर खुलने से दोनों देशों को मदद मिली है। इससे निश्चित रूप से मंदिरों की पवित्रता कम नहीं होगी। हां, यह जरूर है कि इस तरह के फैसले को भी कुछ लोग हिन्दू-मुसलमान से जोड़कर देखेंगे, लेकिन केंद्र को आगे बढ़कर इन प्राचीन मंदिरों को खोलना चाहिए। अदालतें इस तरह के विवादों को सुलझाने में सक्षम हैं।

ऐसे ही एक घटनाक्रम में दिल्ली की साकेत अदालत ने मंगलवार को जैन देवता तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव की ओर से वकील हरिशंकर जैन द्वारा दायर एक याचिका पर अपना आदेश 9 जून के लिए सुरक्षित रख लिया। याचिका में दावा किया गया था कि 27 हिंदू और जैन मंदिरों को सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद उसने हिंदू और जैन मंदिरों के खंभों और अन्य सामग्रियों का इस्तेमाल कर कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद का निर्माण करवाया था। ASI ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुतुब मीनार ‘पूजास्थल नहीं है और स्मारक की मौजूदा स्थिति को बदला नहीं जा सकता।’ ASI के वकील ने कोर्ट को बताया कि ‘भूमि की स्थिति का किसी भी तरह से उल्लंघन करते हुए मौलिक अधिकार का लाभ नहीं उठाया जा सकता।’ ASI ने कहा, ‘ऐसा कोई भी कदम 1958 के अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत होगा।’

अतिरिक्त जिला न्यायाधीश निखिल चोपड़ा ने वादी से सवाल किया कि कोई भी व्यक्ति ऐसी किसी चीज की बहाली के लिए कानूनी अधिकार का दावा कैसे कर सकते हैं, जो 800 साल पहले हुई है। उन्होंने पूछा, ‘कानूनी अधिकार किया है? सवाल यह है कि अगर उपासना का अधिकार एक स्थापित अधिकार है और यदि किसी अधिकार से वंचित किया जाता है, तो आप किस कानूनी उपाय के तहत ऐसी किसी चीज की बहाली के लिए कानूनी अधिकार का दावा कर सकते हैं, जो 800 साल पहले हुई है।’

एक अन्य घटना में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने मंगलवार को ASI को पत्र लिखकर मांग की कि कुव्वतुल मस्जिद में जुमे की नमाज को बहाल किया जाए क्योंकि मस्जिद वक्फ की संपत्ति है और वहां ‘प्राचीन काल’ से 5 बार नमाज अदा की जा रही थी।

वकील हरिशंकर जैन ने अदालत को कुतुब मीनार के बाहर लगाई गई ASI के शिलापट्ट के बारे में बताया, जिसमें लिखा गया है कि कुव्वतुल मस्जिद 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर और उसके सामान का फिर से इस्तेमाल करके बनाई गई थी। इस दावे में कोई शक नहीं है। लेकिन ASI का कहना है कि जब 1914 में कुतुब मीनार उसके नियंत्रण में आया, तो परिसर में कोई पूजा-पाठ नहीं हो रहा था, और इसलिए स्थिति और चरित्र को बदला नहीं जा सकता। ASI के वकील ने कहा कि उपासना का अधिकार मौलिक अधिकार हो सकता है, लेकिन पूर्ण अधिकार नहीं।

ASI ने अदालत में जो कहा वह सही है, लेकिन इस सच में कुछ और बातें और जोड़ी जानी चाहिए थीं। हकीकत यह है कि कुतुब मीनार परिसर में जो मस्जिद है, उसमें 13 मई तक, यानी कि 12 दिन पहले तक नमाज पढ़ी जा रही थी। असल में कुतुब परिसर में 2 मस्जिदें हैं, एक कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद और दूसरी मुगल मस्जिद। नमाज मुगल मस्जिद में ही पढ़ी जा रही थी। चूंकि ASI को समझ में आया कि यह विवाद बढ़ेगा तो उसने इस मस्जिद में भी नमाज पर पाबंदी लगा दी। इस मुगल मस्जिद में 46 साल से नमाज पढ़वाने का दावा कर रहे इमाम शेर मोहम्मद ने कहा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अचानक मस्जिद में नमाज पर पाबंदी क्यों लग गई। यह पूछे जाने पर कि कुव्वतुल मस्जिद के निर्माण में ध्वस्त किए गए 27 हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल क्यों किया गया, इमाम ने काफी दिलचस्प जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मस्जिद बनवाने वालों ने मंदिर नहीं तोड़े, बल्कि उन्होंने मलबा खरीदा और उससे मस्जिद बनवा दी। चूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा की इजाजत नहीं है, इसलिए जिन खंभों पर मूर्तियां थीं, या नक्काशी थी, उन्हें थोड़ा खुरच दिया गया है।

इमाम चाहे जो कहें, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि कुव्वतुल मस्जिद बनने से पहले 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़ा गया था। दिल्ली की एक दीवानी अदालत ने पहले ही कुतुब मीनार परिसर में प्रार्थना की इजाजत मांगने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया था, और अब अतिरिक्त जिला जज द्वारा की गई टिप्पणियों और ASI के रुख को देखते हुए यह निश्चित है कि इस नई याचिका को भी खारिज किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे विवाद भी खत्म हो जाएगा। और यह अंतिम विवाद नहीं है। ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा जन्मभूमि ईदगाह विवाद भी अदालतों में हैं।

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Centre must open up all ASI-protected temples for prayers

rajat-sir As controversies continue to rage over the Kashi Gyanvapi mosque, Krishna Janmashtami Eidgah in Mathura and the existence of temples around Delhi’s Qutub Minar, came news on Tuesday that the Centre is contemplating amendment to a 1958 law, to allow prayers in more than one thousand Hindu temples protected by Archaeological Survey of India (ASI), located at different heritage sites across India.

At present, no prayers are allowed in any religious shrine located in ASI-protected monuments under the Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958. The Act clearly bars offering of prayers by devotees in religious shrines located inside these ASI-protected monuments. This was done 64 years ago to preserve and protect ancient monuments which were of national importance.

The amendment to this law, for which a Bill may be brought in the Monsoon Session of Parliament, may allow access of devotees to these ancient religious shrines. Prayers may now be allowed in these ancient temples. There are nearly 3,800 ASI-protected monuments in India, most of them in dilapidated conditions. Out of them, there are more than 1,000 ancient Hindu temples. These temples many now be opened up for prayers and ‘aarti’ by devotees. The Centre feels that the objective behind framing the 1958 law was not fulfilled, and many such old shrines and monuments are now in dilapidated condition.

Since the ASI had banned entry of devotees and offering of prayers, there have been fewer visitors and these shrines were not being properly maintained. If devotees are allowed to perform prayers in these old temples, the benefits will be two-fold: One, large number of devotees will come to these temples and two, people can help in ensuring maintenance of these shrines. Sources in the Culture Ministry say that many Hindu temples located inside forts and historic monuments are disintegrating, and the only way to preserve them can be by allowing prayers in these temples. Local residents can pitch in with their efforts in ensuring that regular maintenance is done, since the ASI is short of staff. Most of these temples are in desperate need of restoration.

The shining example of such a situation is the Sree Padmanabhaswamy Temple in Thiruvananthapuram, Kerala, which came into headlines in 2011, when the Supreme Court appointed observers to open the secret vaults of the temple to prepare an inventory of assets kept inside. It was then claimed that more than Rs 2 lakh crore worth gold and other costly items were inside the vaults, but in 2020, the Supreme Court overturned the Kerala High Court verdict and ruled that the administration and control of the temple shall vest with the erstwhile Travancore royal family. Every year lakhs of devotees now visit this temple and the earnings of the temples have increased.

There is another example of the famous Shiva temple Jageshwar Dham in Uttarakhand. Thousands of devotees visit this ancient temple, and the shrine is now well maintained. In view of this, the Centre has decided that many such ancient temples, protected by ASI, should be opened up for prayers by devotees. This will help their maintenance. Temples under ASI protection are now being categorized, where the structures are intact but the idols of gods and goddesses are broken. Some temples have the main idol missing. The Centre will renovate these temples and open them up for devotees. New idols will be installed in these temples.

In the third category are those shrines, where the structure is dilapidated, there are no idols and the temples are in ruins. Such temples will remain under ASI protection, and can be developed as tourist places. Temples inside forts built by Hindu rulers, which have proper idols, can be opened up immediately for prayers. Work has already begun in this direction, and after the law is amended, prayers in these old temples can be resumed.

In Kashmir, the J&K Lt. Governor Manoj Sinha had offered prayers at the 8th century ASIS protected Martand Surya temple in South Kashmir. He took part in the Navagraha Ashtamangala Pooja at the ancient sun temple. The Lt. Gov. described this event as a “divine experience”, but the ASI said no permission was issued for this event. The Martand Surya temple was destroyed by Sikandar Shah Miri, the 6th Sultan of the Shah Miri dynasty of Kashmir. Later, several earthquakes caused more ruins to the remains of this temple. This temple will also be renovated and may be opened up for prayers and devotees.

Similarly, in Mahabalipuram, Tamil Nadu, is an ancient Mahabharata period temple on the shores of the sea. It is a UNESCO World Heritage site, and there is no permission for prayers at this temple. In 2019, Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping had visited this temple. In Pudukottai district of Tamil Nadu stands the Vijaya Choleswaram Temple, where the ‘shivling’ is considered highly sacred. This temple is also now in ruins. There is the Rudra Mahalaya temple in Gujarat, which is an ASI-protected monument, and is in dilapidated condition.

I think, opening up of ancient ASI-protected temples for devotees and prayers, is a welcome step. It is a serious step in preserving our rich religious and cultural heritage. The conditions of nearly 3,800 ancient monuments, protected by ASI, are there for all to see. In Delhi, you will find boards proclaiming old structures as ASI protected monuments, but nothing is being done for their maintenance. Take the example of Tughlaqabad Fort, or the ancient monuments at Begumpur village in South Delhi. Old heritage sites in Hauz Khas, Delhi, are also in ruins.

ASI officials say, taking proper care of old monuments is a costly affair. Support from experts is required, and the ASI is always short of funds and staff. I think, the first step must be taken to open up the old temples to devotees, so that local residents can pitch in and carry out regular maintenance. This can bring more earnings for the ASI. Thousands of people visit Agra Fort and Taj Mahal daily. There are reports of the Centre thinking of setting up a Museum for old, ancient weapons inside the historic Red Fort in Delhi. This can raise the daily footfall of tourists. Opening up of the Kartarpur route has helped both countries. This will surely not compromise the sanctity of shrines. There are people who can try to rake up Hindu-Muslim issues, but the Centre should go ahead and open up these ancient temples. Courts are fully competent if disputes arise.

In a simultaneous development, the Saket court in Delhi on Tuesday reserved its order for June 9 on a petition filed by advocate Hari Shankar Jain on behalf of Jain deity Tirthankar Lord Rishabh Dev, claiming that 27 Hindu and Jain temples were partly demolished by Sultan Qutubuddin Aibak, and Quwwatul Islam mosque was raised by re-using the material for Hindu and Jain temples. The ASI opposed the suit, saying Qutub Minar “is not a plce of worship and the existing status of the monument cannot be altered”. The lawyer for ASI told the court that the “fundamental rights cannot be availed of in violation of any status of the land.” ASI said, “any such move will be contrary to the provisions” of the 1958 Act.

The Additional district judge Nikhil Chopra asked the plaintiff how can legal remedy for offering prayers be sought for an act that was committed 800 years ago. He asked, “What is the legal right? Question is if the right to worship is an established right and if there is any denial of right, under what legal remedy can the petitioners claim a legal right of restoration “for something that happened 800 years ago?”

In another move, Delhi Waqf Board on Tuesday wrote to the ASI demanding that Friday prayers at the Quwwatul mosque be restored because the mosque is a waqf property and five times namaaz were being offered there since “time immemorial”.

The advocate Hari Shankar Jain told the court about the ASI plaque put outside the Qutub Minar which says, Quwwatul mosque was built after demolishing 27 Hindu and Jain temples, and reusing the material. There can be no doubt about this claim. But the ASI’s stand is that when it got control over Qutub Minar in 1914, no pooja was being offered at the complex, and hence the status and character cannot be changed. The ASI advocate said that the right to perform prayers could be a fundamental right, but not an absolute right.

On the contrary, the fact remains that namaaz was being offered even 11 days ago, till May 13, at the Mughal masjid, and when ASI realized that the dispute could escalate, it stopped offering of namaaz at this mosque too. Sher Mohammad, the imam of Mughal masjid, claims that for the last 46 years namaaz was being offered at the mosque, and he did not know why it have been prohibited now. Asked why material from 27 demolished Hindu and Jain temples were used to build the Quwwatul mosque, the imam gave an interesting reply. He said, that those who built the mosque did not demolish the temples, “they purchased the debris (malba) and built the mosque. Since idol worship is not permitted in Islam, many of the broken idols or artwork were brushed off while using them for the mosque”.

Whatever the imam may say, it is a historical fact that 27 Hindu and Jain temples were demolished before Quwwatul mosque was built. Already a Delhi civil court had quashed an earlier petition seeking permission for prayer in Qutub Minar complex, and now, judging from the observations made by Additional district judge, and the stand taken by ASI, it is certain that this fresh petition may also be rejected. But this does not mean that it will put a full stop to the controversy. And this is not the final dispute. Gyanvapi mosque and Mathura Janmashtami Eidgah disputes are also before the courts.

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क्वॉड शिखर: मोदी ने बताई और दिखाई दिशा

AKBतोक्यों में मंगलवार को भारत-अमेरिका शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करते हुए कहा कि वह भारत के साथ अमेरिका की साझेदारी को ‘पृथ्वी की सबसे निकटतम साझेदारी’ बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बायडेन ने कहा, उन्हें खुशी है कि भारत और अमेरिका US Development Finance Corporation के लिए वैक्सीन उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा पहल में सहयोग करने के लिए एक समझौते पर पहुंचे हैं। उन्होंने कहा, ‘दोनों देश साथ मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं और करेंगे। मैं भारत-अमेरिका की साझेदारी को धरती की सबसे करीबी साझेदारी बनाने के लिए प्रतिबद्ध हूं।’

अपनी प्रारंभिक टिप्पणियों में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-अमेरिका के बीच strategic partnership को ‘भरोसे की साझेदारी’ बताते हुए कहा, ‘मुझे विश्वास है कि भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए अच्छाई की ताकत के रूप में जारी रहेगी। इस बीच 4 देशों के समूह क्वॉड ने तोक्यो में काफी तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए बयान जारी किया। चीन का नाम लिए बिना भारत, अमेरिक, ऑस्ट्रेलिया और जापान के नेताओं ने कहा कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी भी तरह की ‘बलपूर्वक, भड़काऊ या एकतरफा कार्रवाई’ का कड़ा विरोध करते हैं।

क्वाड शिखर बैठक के बाद जारी साझा बयान में कहा गया, ‘हम ऐसी किसी भी बलपूर्वक, उकसाने वाली या एकतरफा कार्रवाई का पुरजोर विरोध करते हैं, जिसके जरिये यथास्थिति को बदलने और तनाव बढ़ाने की कोशिश होती हो । इसमें विवादित इलाकों में सैन्यबल का इस्तेमाल, तटरक्षक पोतों एवं नौवहन मिलिशिया का खतरनाक उपयोग, दूसरे देशों के तट के नज़दीक संसाधनों के उपयोग की गतिविधियों को बाधित करने जैसी कार्रवाई शामिल है। हम अंतरराष्ट्रीय कानून का अनुपालन करने के हिमायती हैं, जैसा समुद्री कानून को लेकर संयुक्त संधि (UNCLOS) में परिलक्षित होता है। साथ ही हम नौवहन एवं विमानों की उड़ान संबंधी स्वतंत्रता को बनाये रखने के पक्षधर हैं ताकि नियम आधारित नौवहन व्यवस्था की चुनौतियों का मुकाबला किया जा सके, जिसमें पूर्वी एवं दक्षिण चीन सागर शामिल है।’

यह बयान ऐसे समय आया है जब चीन विवादित दक्षिण चीन सागर के लगभग पूरे हिस्से पर अपना दावा ठोक रहा है, जबकि ताइवान, फिलीपींस, ब्रुनेई, मलेशिया और वियतनाम भी इसके कुछ हिस्सों पर अपना दावा ठोकते हैं। चीन ने दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप और सैन्य प्रतिष्ठान बना लिए हैं। मंगलवार को एक बड़ी नई पहल में क्वाड ने इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (IPMDA) लॉन्च किया, जो सहयोगी देशों को अपने तटों पर समुद्र की अच्छी तरह निगरानी करने लिए टेक्नोलॉजी और ट्रेनिंग के साथ-साथ ‘रियल-टाइम के करीब, इंटिग्रेटेड और कॉस्ट इफेक्टिव’ मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस पिक्चर देगा। इससे प्रशांत द्वीपसमूह, दक्षिण पूर्व एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र के देश अपने तटों पर समुद्र की पूरी तरह से निगरानी कर सकेंगे।

क्वाड ने मंगलवार को ‘क्वाड क्लाइमेट चेंज एडाप्टेशन एंड मिटिगेशन पैकेज’ (Q-CHAMP) भी लॉन्च किया और इसके दो मुख्य विषय हैं: न्यूनीकरण और अनुकूलन। जापान की अपनी सफल यात्रा को समाप्त करने से पहले मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन के अलावा जापानी पीएम फुमियो किशिदा और नए ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं।

सोमवार को 13 देशों के इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्परिटी (IPEF) को भी लॉन्च किया गया, जिसमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। इन 13 देशों की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी का 40 फीसदी है। मोदी ने कहा कि IPEF की घोषणा हिंद-प्रशांत क्षेत्र को वैश्विक आर्थिक विकास का इंजन बनाने की सामूहिक इच्छा की घोषणा है। इसे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

मोदी ने कई बड़ी जापानी कंपनियों के CEOs से भी मुलाकात की, जिनमें सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन, NEC कॉरपोरेशन, फास्ट रिटेलिंग और सॉफ्टबैंक कॉरपोरेशन शामिल हैं। इन सभी कंपनियों का भारत में बड़ा निवेश है। सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन 2026 तक भारत में 18,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करने जा रही है। इसका काम पहले ही शुरू हो चुका है। गुरुग्राम और मानेसर के बाद सुजुकी हरियाणा के खरखौदा में अपना तीसरा मैन्युफैक्चरिंग कारखाना लगाएगी। इस कारखाने में लगभग 11,000 कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रमिकों को रोजगार मिलेगा। इस प्लांट की ढाई लाख कारों का उत्पादन करने की क्षमता है । जापानी कंपनी सॉफ्टबैंक ने भारत मे बड़ी संख्या में स्टार्टअप को कर्ज़ दिया है। मोदी ने जापान के उद्योगपतियों को बताय़ा कि भारत सरकार ने प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम चालू की है । मोदी चाहते हैं कि भारत सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में चीन को पीछे छोड़ दे।

मोदी ने जापान में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करने के लिए भी वक्त निकाला और अपने 8 साल के शासन की उपलब्धियों के बारे में जानकारी दी। मोदी ने प्रवासी भारतीयों से कहा, ‘आज भारत दुनिया के सामने नए उदाहरण स्थापित कर रहा है। भारत कई क्षेत्रों में आगे चल रहा है और दुनिया भारत के आत्मविश्वास को देख रही है। एक समय था जब भारत मदद के लिए दुनिया की तरफ देखता था, आज दुनिया मदद के लिए भारत की तरफ देख रही है। भारत दुनिया के सामने समय की कसौटी पर खरा उतरा है। कोविड महामारी के दौरान भारत ने दुनिया भर के 100 से ज्यादा देशों में दवाएं और वैक्सीन भेजीं। अब, दुनिया जलवायु परिवर्तन से चिंतित है और भारत रास्ता दिखा रहा है। भारत ने साल 2070 के लिए शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत आज डिजिटल लेनदेन में दुनिया में सबसे आगे है।’

यह बात तो सही है कि मोदी बड़े लक्ष्य रखते हैं और उन्हें हासिल करने की पूरी कोशिश करते हैं। स्वच्छ भारत के तहत उन्होंने हर घर में शौचालय उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा, जल जीवन मिशन के तहत उन्होंने हर गांव में पाइप से पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा, उजाला मिशन के तहत उन्होंने हर घर के लिए बिजली का कनेक्शन देने की बात की, उज्ज्वला योजना के तहत गरीब लोगों के घरों में एलपीजी सिलेंडर पहुंचा दिया, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत सरकार ने कोविड महामारी के दौरान 80 करोड़ से ज्यादा देशवासियों को मुफ्त राशन दिया। पहले के नेता ऐसे लक्ष्य तय करने से डरते थे, लेकिन मोदी अलग सांचे में बने हैं। उन्होंने लक्ष्य निर्धारित किए और उन्हें पूरा करने की कोशिश की। इसलिए मोदी ने तोक्यो में प्रवासी भारतीयों से कहा: ‘मुझे मक्खन पर नहीं, पत्थर पर लकीरें खींचने की आदत है।’

मोदी 40 घंटे के दौरे पर जापान गए, क्वाड और IPEF की बैठकों में भाग लिया, दुनिया के बड़े राजनेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं, और कई बड़े जापानी उद्योगपतियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कुल 23 बैठकें कीं, एक रात टोक्यो में रुके जबकि 2 रातें हवाई जहाज में बिताईं। इतने व्यस्त कार्यक्रम और जेटलैग के बावजूद मोदी हमेशा तरोताजा और फिट दिखे।

मोदी की जापान यात्रा को लेकर चीन परेशान है। क्वाड, IPEF और अन्य बैठकों के बाद आधिकारिक बयानों में जो बातें सामने आई हैं, चीनी नेता ग़ौर से उनका अध्ययन कर रहे हैं। ये सब तब हुआ है जब मीडिया में चीन द्वारा ताइवान पर हमले की तैयारी की खबरें आ रही थीं।

एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया के बाजार चीन में बने प्रॉडक्ट्स से अटे पड़े हैं, भारत ने अपनी तकनीकी और विनिर्माण क्षमता को उन्नत करने और चीन को पीछे छोड़ने के लिए IPEF और क्वाड से समर्थन लेने की योजना बनाई है। चीन इस समय कोरोना से जूझ रहा है और उसकी अधिकांश फैक्ट्रियां बंद हैं। गणेश जी की मूर्तियों से लेकर आईफोन तक शायद ही कोई सामान हो, जो चीन न बनाता हो। चीन अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल दूसरे देशों को डराने-धमकाने के लिए कर रहा है। इसलिए चीन का मुकाबला करना जरूरी है और IPEF का निर्माण उस दिशा में एक बड़ा कदम है।

अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ से मुकाबला करने के लिए यूरोपीय देशों के साथ मिलकर NATO बनाया था। अब उसी तरह एशिया में चीन को हद में रखने के लिए अमेरिका ने भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य पूर्वी एशियाई देशों के साथ मिलकर IPEF बनाया है।

फर्क सिर्फ इतना है NATO एक सैन्य गठबंधन है, अब वक्त बदल गया है, इसलिए चीन को काबू में रखने के लिए जो IPEF बनाया है वह आर्थिक गठबंधन है। इसके ऐलान के साथ ही असर दिखने लगा है। चीन की तरफ से यह खबर फैलाई गई कि जैसे रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, उसी तरह अमेरिका के बढ़ते दखल को रोकने के लिए वह किसी भी वक्त ताइवान पर हमला कर सकता है। लेकिन अब सारी दुनिया देख रही है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही कहा था कि भारत न तो आंख झुकाकर बात करेगा, न आंख चुराकर बात करेगा, यह आंखों में आंखें डालकर बात करेगा। डोकलाम और लद्दाख में ऐसा ही हुआ, जब भारतीय सेना ने चीन के विश्वासघात का बहादुरी से जवाब दिया। एक समय आएगा जब चीन को अपनी मूर्खता का एहसास होगा।

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Modi in Quad: knows the way, shows the way …

rajat-sir At the India-US Summit in Tokyo on Tuesday, US President Joe Biden, while welcoming Prime Minister Narendra Modi, said he was committed to making India-US partnership among “the closest on earth”. Biden said, he was pleased that India and the US have reached an agreement for US Development Finance Corporation to collaborate in vaccine production and clean energy initiatives. “There is so much our countries can and will do together. I am committed to make the India-US partnership among the closest we have on earth”, Biden said.

In his opening remarks, Prime Minister Modi described the India-US strategic relationship as a “partnership of trust”….I am confident that the friendship between India and America will continue to be a force for good for global peace and stability, for the sustainability of the planet and for the well-being of mankind”.

Meanwhile, in Tokyo, in a strongly-worded joint statement, without naming China, the leaders of India, US, Australia and Japan in the four-nation grouping Quad, said, they strongly opposed “coercive, provocative or unilateral actions” in Indo-Pacific region.

The Quad summit joint statement said: “We strongly oppose any coercive, provocative or unilateral actions that seek to change the status quo and increase tensions in the area, such as the militarization of disputed features, the dangerous use of coast guard vessels and maritime militia, and efforts to disrupt other countries’ offshore resource exploitation activities”.

“..….We will champion adherence to international law, particularly as reflected in the UN Convention on the Law of the Sea (UNCLOS), and the maintenance of freedom of navigation and overflight, to meet challenged to the maritime rules-based order, including in the East and South China Seas”.

This statement has come at a time when China has been staking its claim on nearly all of the disputed South China Sea, but Taiwan, Philippines, Brunei, Malaysia and Vietnam all claim parts of it. China has built artificial island and military installations in the South China Sea.

In a major new initiative on Tuesday, the Quad launched the Indo-Pacific Maritime Domain Awareness (IPMDA), which will provide technology and training to partner countries to fully monitor the waters on their shores, and offer “near real-time, integrated and cost-effective” maritime domain awareness picture, so that countries in Pacific Islands, Southeast Asia, and Indian Ocean region can fully monitor the waters on their shores.

The Quad also launched on Tuesday the “Quad Climate Change Adaptation and Mitigation Package (Q-CHAMP) and its two main themes are: mitigation and adaptation. Before rounding off his successful Japan visit, Modi had bilateral meetings with, apart from US President Joe Biden, Japanese Pm Fumio Kishida and the new Australian PM Anthony Albanese.

On Monday, a 13-nation Indo-Pacific Economic Framework for Prosperity (IPEF) was launched which includes India, US, Australia, Japan, Brunei, Indonesia, Malaysia, New Zealand, Philippines, Singapore, Thailand and Vietnam. These 13 countries together account for 40 per cent of world GDP. Modi described the launch of IPEF as a declaration of “our collection will” to make the region an engine of global economic growth. This is seen as a bid to counter China’s growing economic influence in the region.

Modi also met several top CEOs of Japanese companies, including Suzuki Motor Corporation, NEC Corporation, Fast Retailing and Softbank Corporation, who had been making big investments in India. Suzuki Motor corporation is going to invest more than Rs 18,000 crore in India by 2026. Work has already started. After Gurugram and Manesar, Suzuki will set up its third manufacturing plant in Kharkoda, Haryana. It will provide jobs to nearly 11,000 skilled, semi-skilled and unskilled workers. The plant can produce upto 2.5 lakh cars. Japanese conglomerate Softbank has become a major lender for Indian startups. Modi told the Japenese business leaders about India’s production linked incentive schemes. Modi wants India to replace China as the biggest manufacturing hub.

Modi also took time out to address the NRIs based in Japan, outlining the achievements of his eight-year rule. The Prime Minister told the Indian diaspora: “Today India is setting new examples before the world. India is leading in many areas…The world is watching India’s self-confidence. There was a time when India used to watch the world seeking help, today the world is looking at India for help. India has stood the test of time before the world. During Covid-19 pandemic, India sent medicines and vaccines to more than 100 countries across the world…Now, the world is worried about climate change and India is showing the way. India has set net zero carbon emission target for the year 2070….India is now a world leader in digital transactions today. “

Modi undoubtedly keeps big targets and tries his best to achieve them. Under ‘Swachh Bharat’ scheme, he aimed at providing toilets to every household, under Jal Jeevan Mission scheme, he has aimed to provide piped drinking water to every village, under Ujala mission, he sought to provide power connections to every home, under Ujjwala Yojana, he carried out a massive provision of LPG cylinders in the homes of poor people, under PM Garib Kalyan Anna Yojana, the Centre is providing free foodgrains to more than 80 crore Indians since the Covid pandemic. Earlier, politicians used to fear while fixing such targets, but Modi is made in a different mould. He fixed the targets and strove to achieve them. That is why Modi said in Tokyo before the Indian diaspora: “I have this habit of drawing lines on stones, not on butter”.

Modi visited Japan for a span of 40 hours, attended meetings of Quad and IPEF, had bilateral meetings with top statesmen, and also met top Japanese businessmen. He had 23 meetings in all, spent only one night in Tokyo, and two nights in the special plane. In spite of such a hectic schedule and jetlag, Modi always looked fresh and fit.

China is anxious about the outcome of Modi’s Japan visit. Chinese leaders are going through each and every word that have come out in official statements on Quad, IPEF and other meetings. All these took place at a time when there were media reports of China preparing to attack Taiwan.

At a time when China dominates the world market for manufactured products, India has planned to take support from IPEF and Quad to upgrade its technological and manufacturing might and replace China. China is presently busy fighting the Covid pandemic, with most of its factories closed. There are hardly any goods, from statues of Ganesh Ji to iPhone, that are not manufactured in China. China is using its economic cleft to browbeat other countries. China needs to be countered on an urgent basis and the creation of IPEF is one major step in that direction.

After the Second World War, the US had formed a grouping called NATO with most of the western European countries to counter the influence of Communist Soviet Union. In a similar manner, the US has now launched IPEF with India, Japan, Australia and other East Asian countries to counter Chinese influence.

The difference is: while NATO is a military alliance, times have changed, and the IPEF is an economic alliance. It is because of these developments that China is threatening to take military actions against Taiwan, but the entire world is now watching. Since the time he became PM, Modi had said that India will never lower its eyes and look up for help, it will watch its rival straight in the eye and give a matching response. This is what happened in Doklam and Ladakh, when Indian army bravely responded to Chinese treachery. A time will come when China will realize its follies.

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ज्ञानवापी केस का फैसला अब अदालत को ही करने दीजिए

rajat-sirज्ञानवापी केस को निचली अदालत से जिला अदालत में ट्रांसफर करने के सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से साफ है कि निचली अदालत के सभी आदेशों और कार्यवाही पर रोक लगाने की अंजुमन इंतेज़ामिया मसाजिद कमेटी की अपील को नामंजूर कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत परिसर की धार्मिक प्रकृति का पता लगाने के लिए इसके सर्वे पर कोई पाबंदी नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि क्या हिंदू भक्तों को ज्ञानवापी के अंदर पूजा करने की इजाजत दी जा सकती है, इससे जुड़े मामले की जटिलता और संवेदनशीलता को देखते हुए बेहतर होगा कि एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी इसे देखें, और इसी कारण यह केस अब जिला जज को ट्रांसफर कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालत को यह भी निर्देश दिया है कि वह परिसर के अंदर देवी श्रृंगार गौरी और अन्य देवताओं की पूजा की मांग करने वाली 5 हिंदू महिलाओं द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई को प्राथमिकता दे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि शिवलिंग जैसे स्ट्रक्चर को सुरक्षा देने का उसका 17 मई का आदेश बना रहेगा, और जिला मजिस्ट्रेट को नमाजियों के लिए ‘वजू’ की वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। ‘वजुखाना’ सील रहेगा, लेकिन मस्जिद में ‘नमाज’ जारी रहेगी। जब मुस्लिम पक्ष ने अदालत द्वारा नियुक्त आयुक्तों द्वारा सर्वे पर रोक लगाने की मांग की, तो जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि किसी स्थान के धार्मिक चरित्र की जांच पर कोई पाबंदी नहीं है, और अयोध्या और ज्ञानवापी के मामले में काफी अंतर है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष नागेंद्र पांडे ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अदालत जो चाहे जांच करा ले, जिससे चाहे जांच करा ले, अगर मस्जिद में शिवलिंग मिला है, तो उसकी पूजा-अर्चना का हक हिंदुओं को दे। उन्होंने कहा कि अगर यह साबित होता है कि काला पत्थर शिवलिंग नहीं है, तो हिंदू अपना दावा छोड़ देंगे।

दूसरी ओर, AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का केस को निचली अदालत से जिला अदालत में ट्रांसफर करने का आदेश, और जिला अदालत को हिंदू महिलाओं द्वारा दायर मूल मुकदमे की मेंटेनेबिलिटी पर सुनवाई करने का निर्देश, यह साबित करने के लिए काफी है कि मुस्लिम पक्ष के वकील की दलीलों में दम है।

ओवैसी ने आरोप लगाया कि ज्ञानवापी मस्जिद में नमाजियों को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा क्योंकि वजूखाना सील होने की वजह से नमाजी वजू नहीं कर पाए। लेकिन हकीकत यह है कि ज्ञानवापी मस्जिद से जुमे की नमाज पढ़कर निकले लोगों ने कहा कि नमाज बहुत अच्छे से हुई, किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई। प्रशासन ने ज्ञानवापी मस्जिद में वजू के लिए एक-एक हजार लीटर पानी के 2 ड्रम और 50 लोटों का इंतजाम किया था।

बनारस के शहर काजी अब्दुल बातिन नोमानी ने शुक्रवार को कहा कि जिसे लोग शिवलिंग बता रहे हैं, वह पुरानी तकनीक से बनाया गया एक फव्वारा ही है। वह पिछले 25 सालों से खराब पड़ा हुआ है और आजकल लोग इस तकनीक से वाकिफ नहीं हैं, इसलिए उसे चला नहीं पा रहे। नोमानी ने दावा किया कि बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाने से कई साल पहले ही ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी थी। उन्होंने कहा कि इस मस्जिद को पहले अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ के धर्मनिरपेक्षता के उसूलों पर बनवाया था, इसलिए मस्जिद की दीवारों पर डमरू, त्रिशूल, स्वास्तिग और शेषनाग जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीक बने हुए हैं।

दावे और प्रतिदावे एक तरफ, इस मामले में जो दिख रहा है वह साफ दिख रहा है। उस हकीकत को हिंदू भी जानते हैं और मुसलमान भी। सच यही है कि काशी विश्वनाथ के मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई थी। मंदिर के शिखर पर मस्जिद के गुंबद रख दिए गए। कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट इस सच की तस्दीक करती है।

मुस्लिम पक्ष यह जानता है कि अगर केस मंदिर-मस्जिद के आधार पर चलता है तो इसमें हार निश्चित है। इसीलिए ओवैसी हों, शफीकुर्ररहमान बर्क हों या बनारस के शहर काजी अब्दुल बातिन नोमानी हों, कोई यह नहीं कहता कि जहां आज ज्ञानवापी मस्जिद है पहले वहां मंदिर नहीं था। सब कांग्रेस शासन के दौरान पारित धार्मिक पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला दे रहे हैं। इस ऐक्ट के तहत कहा गया है कि अयोध्या विवाद को छोड़कर देश के सभी धर्मिक स्थानों का चरित्र वही रहेगा जो आजादी के वक्त यानी 15 अगस्त 1947 को था। ओवैसी बार-बार यही कह रहे हैं कि इस ऐक्ट के रहते ज्ञानवापी मस्जिद को विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा कैसे बता सकते हैं।

हकीकत यह है कि हिंदू पक्ष यह दावा कर ही नहीं रहा है कि मस्जिद पर उसका मालिकाना हक है। हिंदू पक्ष ने सिर्फ श्रृंगार गौरी की पूजा करने की इजाजत मांगी है, और जो 15 अगस्त 1947 से लेकर 1991 तक जारी रही। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने शुक्रवार को कहा कि यह कोई मालिकाना हक का नहीं बल्कि पूजा से जुड़ा मामला है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों में हो रही कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। ओवैसी कुछ भी कहें, लेकिन कानून के लिहाज से उनकी दलीलें खरी नहीं हैं।

कुछ लोग कह रहे हैं कि मुस्लिम पक्ष के अड़ियल रवैये की वजह से यह मुद्दा इतना आगे बढ़ गया। यदि मुस्लिम पक्ष ने हिंदू वादियों को श्रृंगार गौरी की पूजा करने की इजाजत दे दी होती, तो मामला वहीं खत्म हो जाता। ऐसे में मामला न तो अदालत में जाता, न अदालत कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति करती, न सर्वे होता, न वीडियोग्राफी होती, न मुस्लिम पक्ष को सुप्रीम कोर्ट दौड़ना पड़ता। लेकिन अब मामला हाथ से निकल चुका है और दूर तक जाएगा। अब कोर्ट को ही फैसला करने दीजिए।

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Gyanvapi: Let the court decide now

rajat-sirThe interim order by the Supreme Court transferring the Gyanvapi case from lower court to district court clearly indicates that the plea of Anjuman Intezamia Masajid Committee seeking stay on all the orders and proceedings of the lower court has not been accepted. The apex court has clearly said that the survey of the complex to ascertain its religious nature is not barred under Places of Worship Act, 1991.

The apex court has said that whether Hindu devotees can be allowed to perform prayers inside Gyanvapi involved complex and sensitive issues that are needed to be dealt with by a seasoned judicial hand, and because of this, the case has now been transferred to the district judge. The Supreme Court has also directed the district court to take up on priority the issue of maintainability of the suit filed by five Hindu female devotees seeking worship of Goddess Shringar Gauri and other deities inside the complex.

The apex court by saying that its May 17 order for providing to security to the Shivling-type structure shall remain, and the district magistrate should make alternate arrangements of ‘wazu’ for Muslim devotees. The ‘wazukhana’ shall remain sealed, but ‘namaaz’ inside the mosque will continue. When the Muslim side sought stay on the survey by court-appointed commissioners, the bench of Justices D y Chandrachud, P S Narasimha and Surya Kant said that there was no bar on checking the religious character of a shrine, and that the Ayodhya and Gyanvapi issues were vastly different.

The apex court order was welcomed by Nagendra Pandey, president of Kashi Vishwanath Temple Trust, who said that the court, whether lower or district court, should verify whether the black stone found was a Shivling or not. If after probe, it was found that it was not a Shivling, Hindus would not press their claim, Pandey said.

On the other hand, AIMIM chief Asaduddin Owaisi said that the apex court order transferring the case from lower to district court, and directing the district court to decide on priority the maintainability of the original suit filed by female Hindu devotees, prove that the arguments placed by the advocate for Muslim side were strong.

Owaisi’s allegation that Muslim devotees in Gyanvapi mosque were facing ablution problems because of sealing of wazukhana, was rejected by the devotees themselves who offered namaaz on Friday. The district administration had provided two huge containers of 1000 litre water along with 50 ‘lotas’ for performing ‘wazu’.

The Shahar Qazi of Benaras Abdul Batin Nomani said on Friday that that it was an old fountain built with old technique, but was lying unused for the last 25 years because people nowadays are not conversant with this technique. Nomani claimed that the Gyanvapi mosque was built many years before Emperor Aurangazeb demolished the Kashi Vishwanath temple. He claimed it was built by Emperor Akbar, based on his secular principle of ‘Deen-e-Ilahi’, and that is why religious Hindu symbols like damru, swastika, can be found on the walls.

Claims and counter-claims aside, the evidences that are now in public domain are known to both the Hindu and Muslim sides. The fact is that Gyanvapi mosque was built after demolishing Kashi Vishwanath temple, the three domes of the mosque were installed atop the spires of the old temple. This has been confirmed in the court commissioner’s report.

The Muslim side knows that if the case proceeds on the basis of temple or mosque, it is bound to lose the case. That is why, none of the Muslim leaders like Owaisi, Shafiqur Rahman Barq or the Shahar Qazi Nomani are rejecting the theory that there existed a temple on the spot where Gyanvapi mosque is located. They are only proferring the Places of Religious Worship Act, 1991 passed during the Congress rule, which clearly says that there shall be status quo as of August 15, 1947, in all religious shrines, except Ayodhya. All shrines will keep their religious characters. Owaisi is saying, ad nauseum, how the Gyanvapi mosque can be declared as part of Kashi Vishwanath temple, as the 1991 Act exists in statute book.

The fact is that the Hindu side is not claiming that it holds ownership rights on the mosque. The Hindu side has only sought permission to offer prayers for Goddess Shringar Gauri, and which has been continuing from August 15, 1947 till 1991. That is why the Supreme Court bench on Friday said that this was not a title suit but a worship suit, and refused to stay the proceedings in lower courts. Owaisi is free to speak his own mind, but his arguments do not hold water, legally.

Some people have been saying that this issue became complex because of the intransigence on part of the Muslim side. Had the Muslim side allowed Hindu plaintiffs to perform pooja of Shringar Gauri, the matter would have ended there, and would not have gone to court, nor would the court have appointed a commissioner to carry out survey and videography. At least the Muslim side would have been spared the process of approaching the Supreme Court. But now, the issue has gone out of hand and will go far. Let the courts decide now.

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क्या ज्ञानवापी मस्जिद बनने से पहले मंदिर था ?

AKBसुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ज्ञानवापी का मामला सिविल जज (सीनियर डिवीजन) से वाराणसी के जिला जज को ट्रांसफर कर दिया। अपने अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वाराणसी के जिला जज सबसे पहले इस मुद्दे पर फैसला सुनाएंगे कि मस्जिद में श्रृंगार गौरी की पूजा करने के लिए पांच हिन्दू महिलाओं ने जो याचिका दी थी, क्या वह ग्रहणयोग्य है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने कहा, ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 17 मई का उसका अंतरिम आदेश जारी रहेगा।

जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पी.एस नरसिम्हा की पीठ ने कहा-‘इस मामले की सुनवाई कुछ ज्यादा अनुभवी और परिपक्व हाथों से होनी चाहिए’। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हम ट्रायल जज को कोई दोष नहीं दे रहे हैं, लेकिन यदि एक अधिक अनुभवी और परिपक्व हाथ इस केस को संभालता है तो इससे सभी पक्षों को फायदा होगा।’

उच्चतम न्यायालय ने जिलाधिकारी को नमाजियों के लिए वजू का इंतजाम कराने और नमाज को जारी रखने की इजाजत देने का आदेश दिया। इसके साथ ही जिला अदालत को मुस्लिम पक्ष की दलीलों पर तेजी से सुनवाई करने का भी निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा बल वजूखाना में पाए गए शिवलिंग जैसे काले पत्थर की सुरक्षा करते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश अगले आठ सप्ताह तक प्रभावी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा, यह उसके लिए ‘देश में एकता की भावना को बनाए रखने का एक साझा मिशन है। एक बार आयोग की रिपोर्ट आ जाने के बाद उससे कुछ गिनी-चुनी चीजें लीक नहीं हो सकती। प्रेस को ये चीजें लीक न करें। केवल जज ही रिपोर्ट को खोल कर पढें।’ पीठ ने यह भी कहा, ‘हम एक जिला जज को गाइड नहीं कर सकते। यह मामला उन्हें संभालने दें। उनके पास पर्याप्त अनुभव है। हम उन्हें यह आदेश नहीं दे सकते कि वे इस केस को इस तरह या उस तरह सुनें। ‘ सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद समिति के वकील हुजैफा अहमदी ने अदालत को बताया कि शुरू से (सिविल कोर्ट द्वारा) पारित सभी आदेशों से समाज को एक बड़ा नुकसान हो सकता है। यह संसद द्वारा पारित कानून के बावजूद हो रहा है।’

हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा, ‘आज की विशेष अनुमति याचिका निष्प्रभावी है क्योंकि तीनों आदेशों का पहले ही पालन किया जा चुका है। अब ज्ञानवापी मस्जिद का धार्मिक चरित्र तय करना होगा। आयोग की रिपोर्ट अदालत को देखना होगा।’ बेंच ने उनके इस तर्क का जवाब देते हुए कहाः ‘हमने आपकी बात मान ली, इसलिए हम इसे जिला जज को सौंप रहे हैं।‘

ज्ञानवापी मस्जिद में शुक्रवार को जुमे की नमाज शांतिपूर्वक अदा की गई। बड़ी संख्या में नमाजी ज्ञानवापी मस्जिद पहुंचे। अंजुमन इंतेज़ामिया मसाजिद कमेटी ने कुछ प्रतिबंधों की वजह से सीमित संख्या में लोगों से आने की अपील की थी लेकिन नमाजियों की एक बड़ी भीड़ मस्जिद में जमा हो गई। विश्वनाथ धाम के गेट नंबर 4 के बंद होने के कारण कई नमाजियों को वापस लौटना पड़ा। बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई थी। अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने अपनी अपील में कहा था कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सुरक्षा बलों ने वजूखाना सील कर दिया है, इसलिए नमाजियों से बहुत कम संख्या में आने की अपील की जाएगी। जिला प्रशासन द्वारा वजूखाना और शौचालय दोनों को सील कर दिया गया है।

वहीं निचली अदालत द्वारा नियुक्त कमिश्नरों द्वारा गुरुवार को सर्वे रिपोर्ट पेश की गई जो इंगित करती है कि जहां ज्ञानवापी मस्जिद है वहां एक शिव मंदिर हो सकता है। हिंदू पक्ष का दावा है कि उस जगह पर 450 साल पुराना बाबा विश्वनाथ मंदिर मौजूद था।

हिंदू पक्ष का दावा है कि मंदिर के कुछ हिस्से ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर छिपे हुए हैं। इस परिसर में भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं को दर्शाने वाले कई धार्मिक चिन्ह पाए गए हैं। सर्वे टीम को ज्ञानवापी परिसर जो आकृतियां मिलीं उनमें त्रिशूल, डमरू, कमल के फूल, के साथ ही दीवारों पर शंख और स्वास्तिक, घंटियां और पान के पत्ते के निशान हैं। अनुष्ठान के लिए मंडप प्राचीन मंदिर के अस्तित्व की तरफ इशारा करते हैं।

तीन सीलबंद बक्सों में 15 पेज की रिपोर्ट के साथ 32 जीबी की वीडियो फुटेज, नक्शों का पुलिंदा और तस्वीरें सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर को सौंपी गई हैं। सोमवार (23 मई) को जब अदालत इस मामले की सुनवाई करेगी तब आधिकारिक तौर पर इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा।

हिंदू पक्ष का दावा है कि तीन दिनों के सर्वे के दौरान मस्जिद के आंतरिक हिस्से में कई ऐसी चीजें पाई गईं जो पुराने हिंदू मंदिर के वास्तुकला के कुछ हिस्सों को दर्शाती हैं। हिंदू पक्ष ने वजूखाने में मिले काले पत्थर को एक पुराना शिवलिंग होने का दावा किया । यह बेलनाकार संरचना वजूखाने के बीच में मिली है। वहीं मस्जिद प्रबंधन का दावा है कि यह शिवलिंग नहीं बल्कि फव्वारा है। जब वजूखाने का पानी निकला गया तो यह शिवलिंग जैसी संचरना नजर आ रही थी। सूत्रों के मुताबिक सर्वे टीम में शामिल ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन के मुंशी एजाज मोहम्मद से जब स्पेशल कमिश्नर ने इस तथाकथित फव्वारे के बारे में पूछा, तब उन्होंने जवाब दिया कि फव्वारा लंबे समय से काम नहीं कर रहा है, लेकिन उन्हें यह याद नहीं है कि किस वर्ष इसने काम करना बंद कर दिया। फिर कहा 20 साल से बंद है और बाद में बोले कि 12 साल से बंद है। सूत्रों के मुताबिक जब हिंदू पक्ष के वकीलों ने मस्जिद कमेटी के मुंशी से कहा कि वो इस फव्वारे को चलाकर दिखाएं तो उन्होंने इंकार कर दिया।

दोनों पक्ष भले ही अपने-अपने दावे कर रहे हों, लेकिन अब तक जो हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीकों के प्रमाण मिले हैं, उनसे साफ पता चलता है कि जहां मस्जिद है, वहां 450 साल पुराना बाबा विश्वनाथ मंदिर था।

जिस समय सर्वे चल रहा था उस समय ज्ञानवापी परिसर के अंदर कुल 52 लोग थे, जिनमें दोनों पक्षों के वकील भी शामिल थे। इस सर्वे रिपोर्ट को एकतरफा नहीं कहा जा सकता। उत्तरी भारत के अधिकांश मंदिरों में शंख के आकार के शिखर हैं। इस वक्त जो काशी विश्वनाथ मंदिर बना है उसका शिखर भी शंकुआकार के ही है। सबसे अहम बात यह है कि शंख के आकार की संरचना न केवल उत्तरी गुंबद के अंदर बल्कि तीनों गुंबदों में है। इतना ही नहीं इस शिखरनुमा आकृति में फूल, पान के पत्ते और कमल के फूल की आकृतियां भी मिली हैं।

इंडिया टीवी संवाददाता भास्कर मिश्रा ने अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन से ज्ञानवापी परिसर में मिले स्वास्तिक, कमल, श्लोक जैसे हिंदू प्रतीकों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा ज्ञानवापी में मस्जिद वहां उपलब्ध स्थानीय मैटेरियल से बनाई गई थी और कारीगर भी स्थानीय थे। उन्होंने कहा, ‘हो सकता है कि जब मस्जिद बन रही होगी तब हिंदू प्रतीकों को जोड़ा गया होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वास्तिक के निशान से कोई मस्जिद, मंदिर नहीं बन जाती’।

अब सवाल यह है कि दुनिया की किस मस्जिद में स्वास्तिक के निशान हैं ? किस मस्जिद में कमल के फूल, त्रिशूल और घंटियां खुदी हैं। किस मुस्लिम घर की दीवारों पर राम का नाम खुदा है ? अंजुमन इंतजामिया मस्जिद के वकील कह रहे हैं कि चूंकि कारीगर हिन्दुस्तान के थे इसलिए औरंगजेब के उस जमाने में मस्जिद की दीवारों पर त्रिशूल, कमल, स्वास्तिक और घंटियां बना दी। मुझे तो हैरानी इस बात की है कि उन्होंने ये नहीं कहा कि गुंबदों से बारिश का पानी नीचे न टपके इसलिए गुंबदों के नीचे मंदिर के शिखर बना दिए।

जब सर्वे रिपोर्ट का विवरण मीडिया के माध्यम से सामने आया तो एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी एक अलग तर्क के साथ सामने आए। उन्होंने सर्वे रिपोर्ट तैयार करने वाली अदालत द्वारा नियुक्त कमिश्नरों पर सवाल उठा दिया। ओवैसी ने कि कहा रिपोर्ट बनाने वाले ही निष्पक्ष नहीं थे। मुस्लिम पक्ष ने जिन्हें कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने पर आपत्ति जताई थी और जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे, लोअर कोर्ट ने उन्हीं को मुंसिफ बना दिया तो ऐसी ही रिपोर्ट आएगी। आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं?

ओवैसी की ये बात सही है कि फैसला सुप्रीम कोर्ट ही करेगा। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद सबूतों के आधार पर करेगा ही फैसला होगा। लेकिन ये बात गलत है कि अगर रिपोर्ट आपके मनमाफिक नहीं है तो सर्वे करने वालों की ईमानदारी, निष्पक्षता और निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए जाएं। ये निचली अदालत की तौहीन है। ओवैसी ने तो एक लाइन में कह दिया कि कोर्ट कमिश्नर निष्पक्ष नहीं थे लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि मुस्लिम पक्ष इसी तरह कोर्ट में हर बार कोर्ट कमिश्रर का विरोध करके मामले को लटकाता रहा है। मुस्लिम पक्ष की मांग पर पहले भी दो बार कोर्ट कमिश्नर बदले जा चुके थे। इसके बाद भी अगर कोई निचली अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाए तो मुझे लगता है कि उसकी नीयत में खोट है।

दूसरी बात, ओवैसी ये कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस केस को खारिज कर दे। इसे बैलेंस करने की जरूरत नहीं है। वो कह रहे हैं कि सबको किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। लेकिन ओवैसी उन मुस्लिम नेताओं और मौलानाओं को नहीं समझाते जो खुद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने को तैयार नहीं है। जो अभी से धमकी दे रहे हैं। रज़ा अकेडमी के सचिव मौलाना खलील उर रहमान ने धमकी भरे अंदाज में कहा, ‘मुसलमानों के सब्र का बांध टूट रहा है, उनसे एक-एक कर मस्जिदें छीनी जा रही हैं। बीजेपी एक बार में ही बता दे कि उसे कौन-कौन सी मस्जिदें चाहिए जिससे मुसलमानों को सड़कों पर उतर आने में आसानी हो।’ समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने कहा, ‘ज्ञानवापी मस्जिद को बचाने के लिए मुसलमान अपनी जान की कुर्बानी देंगे।’ एक अन्य मौलवी मुफ्ती सलमान अज़हरी ने कहा, बर्क साहब को अपना बलिदान देने के लिए पहले आना चाहिए, क्योंकि मुसलमानों ने उन्हें वोट दिया था। उन्होंने यह भी कहा, “हमने बाबरी मस्जिद खो दी है, हम किसी भी कीमत पर ज्ञानवापी मस्जिद को छीनने नहीं देंगे।”

मुझे लगता है कि मामला कोर्ट कचहरी से नहीं बिगड़ता, मामला बयानबाजी से बिगड़ता है। कोर्ट के आदेश पर सर्वे हुआ और सिर्फ कोर्ट कमिश्नर्स ने सर्वे नहीं किया। इसमें दोनों पक्षों के वकील और पैरोकार थे। पचास से ज्यादा लोगों की मौजदूगी में सर्वे हुआ। इसलिए कोई ये तो नहीं कह सकता कि सर्वे करने वाले झूठ लिख देंगे।

हैरानी की बात ये है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी कह रहे हैं कि हमारे यहां तो कोई कहीं भी पत्थर रख दे, टीका लगा दे, झंडा लगा दे वहीं मंदिर हो जाता है। अगर अखिलेश यादव की यह बात मान भी ली जाए कि कहीं भी पत्थर और लाल झंडा लगा दो तो वो मंदिर हो जाता है तो उन्हें ये बताना पड़ेगा कि जहां शिवलिंग, त्रिशूल, डमरू और स्वास्तिक के निशान मिले वो शिवजी का मंदिर होगा या नहीं। अगर शफीकुर रहमान बर्क ये कहते हैं कि हम इबादतगाह की हिफाजत करेंगे तो वो हिंदुओं को ये कहने से कैसे रोक सकते हैं कि वो अपने मंदिरों की सुरक्षा करेंगे।

अगर मौलाना रहमान कहते हैं कि मुसलमानों से एक-एक करके मस्जिद छीनी जा रही है तो उन्हें ये बताना होगा किसने मस्जिद छीनी। कौन सी मस्जिद छीनी। फिर हिंदू समाज के लोग उनसे पूछेंगे कि जब कश्मीर में मंदिर तोड़े गए तो ये लोग कहां थे ? ये तो ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ा और उनकी जगह पर मस्जिदें बनाई। इसीलिए ये विवाद बार-बार खड़े होते हैं। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर भी इसी तरह का विवाद है।

अब जबकि मामला वाराणसी की जिला अदालत में है, सबकी निगाहें इस बात पर रहेंगी कि ज्ञानवापी मामले में जिला जज आगे क्या कदम उठाते हैं।

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Was there was a temple before Gyanvapi mosque was built?

akb fullThe Supreme Court on Friday transferred the Gyanvapi case from Civil Judge (senior division) to District Judge in Varanasi. In its interim order, the apex court said, the district judge of Varanasi shall first decide maintainability of civil suits filed by Hindu plaintiffs upon transfer of prayers. The court said, its interim order of May 17 for protection of Shivling area in Gyanvapi complex will continue and arrangement for ‘wazu’ (ablution) will be done.

The bench of Justices D Y Chandrachud, Surya Kant and P. S. Narasimha, said, “a slightly more seasoned and mature hand should hear this case”. The bench, however added, “we are not making aspersion on trial judge but if a more seasoned hand handles this case, it will benefit all parties”.

The apex court also directed the district magistrate to make arrangements for ‘wazu’(ablution) for devotees and allow ‘namaaz’ to continue. It also directed the district court to hear the pleas of Muslim side speedily. The apex court said security forces shall continue to protect the ‘Shivling-like’ structure found in the ‘wazukhana’. The interim order of Supreme Court shall be in force for next eight weeks.

The apex court bench said, it is on “a joint mission to preserve a sense of unification in the country. Once a commission report is there, there cannot be selective leaks. Do not leak things to the press. Only the judge opens the report”. The bench also said, “we cannot guide a District Judge. Let them handle it. They have enough experience at the bench. We cannot command him to hear it this way or that way”. The apex court made this observation when the advocate for Anjuman Intezamia Masajid Committee Huzaifa Ahmadi told the court that all the orders passed from beginning (by civil court) are capable of creating great public mischief. It is in the teeth of an injunction passed by Parliament”.

Senior Advocate C S Vaidyanathan, representing the Hindu side, said, ‘the special leave petition today is infructuous since all the three orders have been complied with. Religious character of the mosque has to be decided. The commission report has to be seen by the court”. Replying to this, the bench said, “we took your point, that is why we are entrusting it to a district judge.”

Meanwhile, Friday ‘namaaz’ was offered peacefully by a large number of Muslim devotees at the controversial Gyanvapi Masjid in Varanasi. The Anjuman Intezamia Masajid Committee had appealed to Muslims to come in limited numbers because of certain restrictions, but a large crowd of devotees assembled at the mosque for ‘namaaz’ prayers. Many of the devotees were turned away from Gate No. 4 of Vishwanath Dham, as the gate was closed. There was heavy deployment of security forces to ensure law and order. The Anjuman Intezamia Masajid Committee had in its appeal said that since the ‘wazukhana’ (ablution pond) has been sealed by security forces on order of Supreme Court, it would be advisable for lesser number of devotees to come for prayers. Both the ‘wazukhana’ and toilet have been sealed by the district administration.

The survey report was submitted by the court-appointed commissioners on Thursday, which indicates that there could be a Shiva temple where the Gyanvapi mosque stands. The Hindu side claims that the 450-year-old Baba Vishwanath temple existed on that spot.

The Hindu side claims that portions of the temple lie hidden within the Gyanvapi mosque. Several religious signs depicting Lord Shiva and other gods and goddesses have been found. Symbols resembling a conch shell (shankh), considered holy in Hinduism, a Swastik sign, bells and betel leaves, trishul, damroo, designated places to keep diyas and idols, and mandaps for performing rituals have been found by the survey team.

The 15-page report along with 32 GB of video footage, sheaf of maps and photographs has been submitted in three sealed boxes to Civil Judge (Senior Division) Ravi Kumar Diwakar. Officially, the report will be made public when the court will take up the case for hearing on Monday(May 23).
The Hindu side claims that several objects which indicate parts of old Hindu temple architecture, have been found in the inner sanctum of the mosque during the three-day survey.

The Hindu side claimed that on the black stone claimed to be an old Shivling, a cylindrical structure carved out of black stone in the middle of ‘wazukhana’ “resembles a Shivling” rather than a portion of a fountain, as claimed the mosque management. Once the water of the ‘wazukhana’ was drained out, the black cylinder structure was visible. According to sources, Aijaz Mohammed, the munshi of the Gyanvapi mosque management, who was part of the survey team, was asked by the Special Court Commissioner about this so-called foundation. He replied that the fountain has been non-functional for a long time, but he could not recollect in which year it stopped working. The masjid munshi first said, 20 years, and later changed it to 12 years. The lawyers for Hindu side challenged him to show that the fountain could work, but the munshi refused, sources said.

Both sides may be making their respective claims, but the evidences of Hindu religious symbols that have been found till now clearly indicates that there existed a 450-year-old Baba Vishwanath temple, where the mosque is located.

At the time of survey, there were a total of 52 people inside, which included lawyers from both sides. One cannot describe this survey report as one-sided. Most of the temple in northern India have ‘conch-shell’ shaped spires. The present Kashi Vishwanath temple also has a similar spire. The most important thing is that the conical shape structure is not only inside the northern dome but in all the three domes. These bear the symbols of flower, betel leaves and lotus flower.

India TV reporter Bhaskar Mishra asked S. M. Yaseen, joint secretary of Anjuman Intezamia Masajid Committee, about Hindu symbols like swastika, lotus, ‘shlokas’ found in the Gyanvapi complex. He replied that the mosque in Gyanvapi was built with locally available material, and the artisans were also local. “It could be that Hindu symbols must have been added when the mosque was being built. Discovery of Swastik symbol does not make a mosque, a temple”, he said.

The question is: in which mosque of the world can one find the ‘swastik’, lotus, trishul or bell symbols. Which Muslim home has the name ‘Ram’ carved on the walls? Lawyers for Anjuman Intezamia Masajid Committee say that the artisans were from India, and in the age of Mughal emperor Aurangzeb they added trishul, lotus, swastika symbols while building the walls of the mosque. I am surprised why they did not say that they put Hindu temple spires beneath the domes of mosque to prevent leaking of rain water during monsoon.

When details of the survey report became public through media, AIMIM chief Asaduddin Owaisi came with a different argument. He questioned the capability of the court-appointed commissioners who prepared the survey report. Owaisi said, the Muslim side had questioned the impartiality of the advocate who was appointed as commissioner, but the lower court made him the arbitrator. “What else can you expect”, Owaisi asked.

Owaisi is right when he says that it is the Supreme Court which will decide on this matter, based on real evidences. But it is unjustified, when you start blaming the survey commissioners for preparing a report which does not suit one side. To question the impartiality and honesty of the advocate commissioners, who conducted the survey, is indirectly casting aspersions on the lower court. Owaisi did not disclose the fact that the lower court had to change commissioners twice, when Muslim side questioned their impartiality. I think the intentions are not bonafide.

Secondly, Owaisi is demanding that the Supreme Court should reject this survey order outright, and no ‘balance’ is required. Owaisi may wait for the Supreme Court verdict, but what about other maulanas who are unwilling to wait for the apex court to decide. Maulana Khalilur Rahman, secretary of Raza Academy, on Thursday menacingly said, “Muslims have started losing their patience. One by one, mosques are being taken away from their possession. Let BJP give the list of mosques which they want, so that it could be easier for Muslims to come on the streets.” Samajwadi Party MP Shafiqur Rahman Barq said, “Muslims will sacrifice their lives to save Gyanvapi mosque.” Another cleric Mufti Salman Azhari said, Barq saheb should come first to offer his sacrifice, because Muslims voted for him. He also said, “We have lost Babri mosque, we will not allow Gyanvapi mosque to be taken away, at any cost.”

I think, matters do not take an ugly turn because of courts. They take an ugly turn because of irresponsible remarks that leaders and clerics made. Let us be clear. The survey was done on the orders of local court. The team consisted of not only court-appointed commissioners, but also lawyers and plaintiffs from both sides. The survey was done in the presence of more than 50 people. Nobody can allege that the survey commissioners have written lies in their report. The report that has been submitted is a clear narration of what the commissioners saw.

I am also surprised over Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav’s remark. He said, in India, a temple is built whenever I somebody installs a stone, puts vermillion mark on the stone, and hoists a saffron flag. It becomes a temple. Akhilesh Yadav should clearly say whether the spot from where the Shivling was found and symbols like swastika, lotus, damroo and trishul were found, had a Shiv temple or not. If his party MP Shafiqur Rahaman Barq can say that Muslims will offer sacrifice to protect the mosque, then how can they stop Hindus from saying that they will also sacrifice to regain their temples.

If Maulana Khalilur Rahman says that mosques are being taken away, one by one, from Muslims, then he must explain which are those mosques that have been forcibly taken away. In that case, those from Hindu society will ask where were they when Hindu temples were destroyed in Kashmir. It is an accepted historic fact that Emperor Aurangzeb issued order for demolishing Kashi Vishwanath temple and built mosques in their places. He also ordered demolition of Keshav Dev temple in Mathura. The Eidgah built on Shri Krishna Janmabhoomi in Mathura is a glaring example.

Now that the ball is in the district court of Varanasi, all eyes will now be on what next steps the District Judge takes in the Gyanvapi issue.

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