Rajat Sharma

My Opinion

पीएम मोदी ने क्यों कहा, वंशवाद की राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा

rajat-sirपार्लियामेंट के सेंट्रल हॉल में शुक्रवार को संविधान दिवस मानने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। उन्होंने इस कार्यक्रम को संबोधित करने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया था। ओम बिरला ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को निमंत्रण भेजा था लेकिन कांग्रेस के कहने पर तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, डीएमके, वामदल, राष्ट्रीय लोक दल और आम आदमी पार्टी सहित 14 विपक्षी दलों ने इस समारोह का बहिष्कार किया।

हालांकि इन पार्टियों ने कहा कि वे संविधान का सम्मान करते हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार से नाराज हैं और अपना विरोध दर्ज कराते हुए समारोह में नहीं गए। इन पार्टियों ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार हर संस्थान को खत्म कर संविधान को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैं।

इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से एक ही परिवार द्वारा नियंत्रित राजनीतिक दलों ने भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा किया है। उन्होंने कहा- ‘भारत एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रहा है जो संविधान को समर्पित लोगों के लिए चिंता का विषय और वो है पारिवारिक पार्टियां। ये लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’

पीएम मोदी ने इसका मतलब भी समझाया। उन्होंने कहा कि अगर एक ही परिवार के कई लोग राजनीति में आते हैं और वे चुनाव जीतकर विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं, सरकार में मंत्री बनते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन अगर राजनीतिक दलों में वंशवाद है और पार्टी पर एक ही परिवार का कब्जा है, पार्टियों में आंतरिक लोकतन्त्र खत्म हो रहा है तो ये देश के लोकतन्त्र के लिए खतरा है। पीएम मोदी ने कहा, ‘कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ज्यादातर राज्यों में वंशवाद की राजनीति हावी है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।’

मोदी की बात सही है। अगर आप वामपंथी दलों को छोड़ दें तो मुख्यधारा की जितनी पार्टियां हैं उन सबका यही हाल है। अधिकांश राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों पर पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार का कब्जा है। कांग्रेस में परिवारवाद के बारे में तो सब जानते हैं लेकिन कोई कांग्रेसी नेता यह मानने को तैयार नहीं होता कि कांग्रेस में परिवारवाद है। आज कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं ने इस मुद्दे को अनदेखा किया। लेकिन इसका जवाब सिर्फ मल्लिकार्जुन खड़गे ने दिया जो राज्यसभा में कांग्रेस के नेता हैं। उन्होंने कहा- मोदी शायद गांधी परिवार की तरफ इशारा कर रहे थे। उस परिवार ने देश के लिए बलिदान दिए हैं और 1989 के बाद तो गांधी-नेहरू परिवार से कोई प्रधानमंत्री नहीं बना इसलिए मोदी कांग्रेस को उपदेश न दें, अपनी पार्टी को देखें।

खड़गे ने सही कहा कि 1989 के बाद गांधी-नेहरू परिवार से कोई प्रधानमंत्री नहीं बना लेकिन जो मुद्दा मोदी ने उठाया वह पीएम के बारे में नहीं था, बल्कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा था। 1998 में सीताराम केसरी को पार्टी अध्यक्ष के दफ्तर से जबरन निकालने के बाद आज तक वहां दस जनपथ का ही कब्जा है। सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं फिर 2017 में उन्होंने अपने बेटे राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाया। राहुल गांधी इस पद पर दो साल तक रहे लेकिन चुनावी हार के बाद पार्टी में मतभेद सामने आए तो राहुल ने पद छोड़ दिया और सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं। अब फिर राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपने की तैयारी है।

मोदी सही कहते हैं कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों पर एक ही परिवार का नियंत्रण है। कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस पर दिवंगत अब्दुल्ला परिवार का नियंत्रण है। पीडीपी पर मुफ्ती परिवार का कब्जा है। पंजाब में अकाली दल मतलब बादल परिवार, यूपी में समाजवादी पार्टी का मतलब मुलायम सिंह यादव फैमिली, बिहार में आरजेडी का मतलब लालू यादव का परिवार, महाराष्ट्र में शिवसेना मतलब ठाकरे परिवार और एनसीपी का मतलब शरद यादव परिवार। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी और उनके भतीजे द्वारा नियंत्रित है। तमिलनाडु में डीएमके मतलब करुणानिधि का परिवार और झारखंड में जेएमएम का मतलब शिबू सोरेन का परिवार। कहने का अर्थ यह है कि देश में ऐसी पार्टी खोजना मुश्किल है जिसमें वंशवाद न हो, परिवारवाद की छाया न हो। लेकिन जब यही बात याद दिलाई जाती है तो नेता बुरा मान जाते हैं। जब आईना दिखाया जाता है तो आईने को तोड़ने की कोशिश करते हैं।

अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल ने इस मामले पर कहा-बीजेपी को दूसरों को ज्ञान देने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। मैं आपको ऐसे सौ उदाहरण दे सकता हूं जहां बीजेपी नेताओं के बेटे प्रभावशाली पदों पर हैं। सबसे दिलचस्प रिएक्शन महाराष्ट्र एनसीपी प्रमुख जयंत पाटिल का आया। दरअसल एनसीपी में शरद पवार सुप्रीमो हैं, फिर नंबर आता है उनकी सांसद बेटी सुप्रिया सुले का और तीसरे नंबर पर हैं शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के डिप्टी चीफ मिनिस्टर अजीत पवार। चौथे नंबर पर अजित पवार के बेटे पार्थ पवार हैं। इसलिए एनसीपी नेता जयंत पाटिल यह तो नहीं कह सकते कि कहां हैं वंशवाद? लेकिन इतना जरूर कहा-‘अगर पार्टी और पार्टी के कार्यकर्ताओं को दिक्कत नहीं है तो फिर किसी और को बोलने की क्या जरूरत है? अगर किसी परिवार के कई लोगों को जनता चुनती है, तो उसमें गलत क्या है ?’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी की बात का समर्थन करते हुए कहा-‘वंशवाद की राजनीति थोड़े वक्त के लिए भले ही चल जाए,लेकिन कुछ समय के बाद जनता इसे रिजेक्ट कर देती है।’

नरेन्द्र मोदी ने देश में ऐसा वातावरण बना दिया है कि कम से कम बीजेपी में तो कोई वंशवाद की बात नहीं करता। बीजेपी के नेता पार्टी में पद की बात तो छोड़िए अपने बेटे के लिए टिकट मांगने से पहले भी सौ बार सोचते हैं। नरेन्द्र मोदी के रहते बीजेपी में कोई सिर्फ इसलिए नेता नहीं बन सकता कि उसके पिता बड़े नेता हैं या उसकी मां मंत्री हैं।

इसी तरह नीतीश कुमार ने भी अपने परिवार को सक्रिय राजनीति से दूर रखा है लेकिन बाकी ज्यादातर दूसरी पार्टियों में एक ही परिवार का कब्जा है। जैसे राजा का बेटा राजा बनता था उसी तरह इन पार्टियों में अध्यक्ष पद एक ही परिवार के पास रहता है।

लालू यादव तो इसका क्लासिक उदारहण हैं। पहले खुद पार्टी के अध्यक्ष थे और बिहार के मुख्यमंत्री भी थे। जेल गए तो पार्टी के अध्यक्ष बने रहे लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राबड़ी देवी को बैठा दिया और जब चारा घोटाले में सजा हो गई और चुनाव लड़ने पर रोक लग गई तब भी पार्टी के अध्यक्ष बने रहे। लालू ने दोनों बेटों को विधानसभा चुनाव लड़वाया और दोनों को मंत्री बनवाया। लोकतन्त्र के लिए इससे ज्यादा शर्म की क्या बात हो सकती है?

नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में लोकतन्त्र की जिस दूसरी बीमारी का जिक्र किया उसे भी लालू यादव से जोड़कर देखा गया। मोदी ने कहा ‘वंशवादी राजनीति के बाद लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार दूसरी सबसे बड़ी बुराई है। जब देश का युवा यह देखेगा कि भ्रष्टाचार के दोषी नेता को फिर पहले की तरह मान-सम्मान मिल रहा है। वह नेता पहले की तरह राजनीति में एक्टिव हो रहा है तो फिर लोग यही सोचेंगे कि भ्रष्टाचार करना गलत नहीं है। इससे देश में बहुत खराब संदेश जाएगा।’

हालांकि पीएम मोदी ने अपने बयान में किसी का नाम नहीं लिया लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा लालू प्रसाद यादव की तरफ था। चारा घोटाले में लालू यादव दोषी साबित हो चुके हैं। आजकल वो ज़मानत पर हैं और एक बार फिर से सियासत में एक्टिव हो रहे हैं। बिहार विधानसभा उपचुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी बात होती है, शरद पवार उनसे मिलने जाते हैं, विपक्षी दलों की मीटिंग में लालू शामिल होते हैं। यानी चुनाव लड़ने के अलावा लालू यादव हर वो काम कर रहे हैं जो एक एक्टिव लीडर करता है। एक तरह से कहा जाए तो पॉलिटिक्स में लालू यादव का पुनर्वास हो चुका है।

मोदी का संदेश निश्चित रूप से उन नेताओं तक गया होगा जिन्होंने शुक्रवार के कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। उनका एकमात्र उद्देश्य नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने का था। वरना इस समारोह को नरेन्द्र मोदी ने तो आयोजित नहीं किया था। इसे लोकसभा अध्यक्ष ने आयोजित किया था। दो दिन पहले सभी पार्टियों को कार्ड भेजे गए थे। जहां तक कांग्रेस का यह इल्जाम है कि विपक्ष को सिर्फ मोदी का भाषण सुनने के लिए बुलाया गया था, विपक्ष को सम्मान नहीं दिया गया। जबकि हकीकत यह है कि इस समारोह में मंच पर विपक्ष के नेता के तौर पर अधीर रंजन चौधरी और मल्लिकार्जुन खड़गे दोनों के बैठने की व्यवस्था की गई थी और आखिरी वक्त पर मंच से कुर्सियां हटानी पड़ी। इसलिए विरोधी दल कोई भी तर्क दें लेकिन विपक्ष के इस रवैए का समर्थन नहीं किया जा सकता। विपक्ष को समझना चाहिए कि संविधान किसी एक पार्टी या किसी एक सरकार का नहीं बल्कि देश का है।

संविधान की गरिमा की रक्षा की जितनी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की है उतनी ही राहुल गांधी, शरद पवार, ममता बनर्जी और अन्य नेताओं की है। संविधान की रक्षा की उतनी ही जिम्मेदारी मेरी भी है और आपकी भी है। इसलिए संविधान दिवस समारोह का बहिष्कार करने का विपक्ष का फैसला ठीक नहीं था।

संविधान सबको अभिव्यक्ति की आजादी देता है, हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है और सबको न्याय मिले इसका वादा करता है। आज सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार, संसद और न्यायपालिका मिलकर यह सुनिश्चित करें कि सरकार की योजनाओं का लाभ सबको मिले। न्याय की प्रक्रिया इतनी जटिल न हो कि गरीब इससे वंचित रह जाए और संसद के समय का इस्तेमाल लड़ाई-झगड़े में न हो बल्कि कानून बनाने के लिए किया जाए। कुल मिलाकर संविधान दिवस का असली संदेश तो यही है।

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Why Modi said, dynastic politics is a threat to Indian democracy

rajat-sirTo celebrate Constitution Day on Friday, the Lok Sabha Speaker Om Birla organized a function in the Central Hall of Parliament, and invited the President and Prime Minister to address. The Speaker had sent invitations to leaders of all political parties, but at the instance of Congress, 14 opposition parties including Trinamool Congress, Shiv Sena, Samajwadi Party, Bahujan Samaj Party, DMK, Left Parties, Rashtriya Lok Dal and Aam Aadmi Party boycotted the function.

While most of these parties said they respected the Constitution, they said, they were boycotting the function to register their protest against Modi government. These parties alleged that the government was undermining the Constitution, by subverting every single institution, which, they said, are under “constant attack”.

At the function, Prime Minister Narendra Modi hit out at the opposition parties. He said parties controlled by a single family for generations posed a threat to the health of Indian democracy. “India is heading towards a crisis caused by political parties controlled by dynasties and the family controlling the entire party system is the biggest threat to a healthy democracy”, Modi said.

The Prime Minister explained his point of view by saying, there is nothing wrong if several members of a family join politics, get elected to assemblies and Parliament and become ministers, but if a political party depends on dynastic politics, or if a single family controls the party, it puts an end to internal democracy in the party. This, undoubtedly, is a danger to a healthy democracy and should be a matter of concern for the nation, Modi said.

The Prime Minister said, “from Kashmir to Kanyakumari, in most of the states, dynastic politics is dominant. This is not good for Indian democracy.”

Modi is right. If you leave aside the Left parties, most of the national and regional parties are controlled by single families, since generations. Everybody knows about dynastic domination in the Congress, but not a single Congress leader is brave enough to accept this as a fact. It was left to the Congress leader in Rajya Sabha, Mallikarjun Kharge to reply. Kharge said, “Modi was probably referring to the Gandhi family. We must know the sacrifices made by Gandhi family for the nation. And since 1989, no one from Gandhi family has become Prime Minister. So, Modi should not give homily to the Congress.”

Kharge is right when he says that no one from Gandhi family became PM since 1989, but the issue that Modi raised was not about PM, but internal democracy. Since 1998, when Sitaram Kesri was forcibly removed from his chamber in AICC office as party president, it is 10, Janpath which has been occupying this room. Sonia Gandhi replaced Kesri as President, and she remained as party president . In 2017, her son Rahul Gandhi was anointed party president. Rahul stayed in this post for two years, but after open dissensions in the party following electoral defeats, Rahul quit, and it is now Sonia Gandhi who is the interim president. Preparations are now afoot to hand over the reins to Rahul Gandhi again.

Modi is right when he says that most of the regional parties from Kashmir to Kanyakumari are controlled by single families.

In Kashmir, National Conference is controlled by the late Sheikh Abdullah’s family, ranging from Dr Farooq Abdullah to Omar Abdullah, JKPDP is controlled by Mehbooba Mufti, daughter of the late Mufti Mohammed Sayeed, Shiromani Akali Dal in Punjab is controlled by Badal family, Samajwadi Party in UP is controlled by Yadav family with Akhilesh Yadav as party chief, Rashtriya Janata Dal in Bihar is controlled by Lalu Prasad Yadav, his wife and his sons, Shiv Sena in Maharashtra is controlled by Thackeray family, NCP in Maharashtra is controlled by Sharad Pawar’s family, Trinamool Congress in Bengal is controlled by Mamata Banerjee and her nephew, ruling DMK in Tamil Nadu is controlled by the late M. Karunanidhi’s family members, and Jharkhand Mukti Morcha is controlled by Shibu Soren’s son Hemant Soren.

To put it briefly, it will be difficult to find parties in states which are not controlled by a single family. But when a mirror is showed to these parties, efforts are made to break the mirror itself.

Akali Dal chief Sukhbir Badal reacted by saying, “I can show you hundred of examples where BJP leaders have their sons in influential positions”. The most interesting reaction came from Maharashtra NCP chief Jayant Patil. In his party, Sharad Pawar is the supremo, his daughter Supriya Sule, MP, occupies second position, Pawar’s nephew and Maharashtra Deputy CM Ajit Pawar comes third, and in the fourth position comes Ajit Pawar’s son Parth Pawar. Jayant Patil said, “if party workers do not have any objections (to Pawar family) then why should others object? If people elect members of a single family, what is wrong?”

It was left to Bihar chief minister Nitish Kumar to support what Modi said. He said, “dynastic politics may succeed for a short period, but later people reject such dynasties”.

Narendra Modi has created a situation in which not a single person in India can allege that there is dynastic politics in BJP. Forget key positions, BJP leaders think a hundred times before seeking tickets for their family members. With Modi at the helm, nobody in BJP can aspire for key positions only because he or she has a powerful father or mother.

A shrewd and astute politician like Nitish Kumar kept his family members away from active politics. No one can say that Janata Dal (United) is controlled by a family. But in most of the regional parties, sons or daughters of party supremo consider it their divine right to lead the party.

Lalu Prasad Yadav’s family is a classic example. When Lalu Yadav was arrested, he resigned as CM but continued to be party president. Lalu appointed his wife Rabri Devi as chief minister. When he was convicted in fodder scam and was jailed, he continued to remain party chief, despite being disqualified from contesting elections. He fielded both his sons in elections and made them ministers. What could be more shameful for a democracy?

On Friday, Modi raised another issue. He warned against the “tendency of forgetting and glorifying convicted corrupt people”. The allusion was clearly towards Lalu Prasad Yadav. Modi said, “after dynastic politics, corruption is the second biggest evil for a democracy. It is surprising that leaders who have been convicted on charges of corruption, are being supported by other parties. What will the younger generation learn after seeing such instances? When young people find that a leader convicted of corruption is being accorded respect, and the leader becomes active again in politics, people will start believing that to indulge in corruption is not a crime. This will send a wrong message to the nation.”

Though Modi did not name Lalu Prasad Yadav, it is clear whom he meant. Lalu Yadav is a convict, who after being released on bail from jail, campaigned for his party candidates in the recent Bihar assembly byelections. He has again become active in national politics. He maintains regular contacts with Congress president Sonia Gandhi, and NCP supremo Sharad Pawar calls on him. Lalu Yadav attends meeting of opposition leaders. To put it briefly, Lalu Yadav has been politically rehabilitated.

Modi’s message must surely have fallen on deaf ears of those leaders who boycotted Friday’s event. Their sole objective was to show Modi in poor light. The event was not organized by Modi, it was organized by the Lok Sabha Speaker. Invitation cards were send to these parties two days in advance. Congress leaders said, they were invited “ only to listen to Modi’s speech, and due respect was not accorded to the opposition”.

The fact remains that there were two chairs on the dais for Adhir Ranjan Chowdhury, leader of Congress in Lok Sabha, and Mallikarjun Khadge, opposition leader in Rajya Sabha. When both of them chose not to attend, the two chairs had to be removed. The allegation by Congress leaders has no basis. The opposition should understand that the Indian Constitution does not belong to a single party or government. It belongs to the nation.

The responsibility of protecting the dignity of Constitution not only devolves on Prime Minister Modi, but also on leaders like Rahul Gandhi, Sharad Pawar, Mamata Banerjee and others. The responsibility of protecting the Constitution is also mine and yours, that is, of every Indian citizen. Therefore, the opposition’s decision to boycott the Constitution Day function was not proper.

The Constitution gives us freedom of expression, protects our fundamental rights, and promises justice to all. The Parliament, executive and judiciary must join hands and ensure that the Constitution is upheld, come what may. The executive must ensure that the benefits of welfare schemes reach all sections of people, judiciary must ensure that that judicial process must not be so long that the poor are deprived of justice, and Parliament must use its productive time for enacting legislations and refrain from wasting time through pandemonium.

This, in essence, is the message of Constitution Day, the day on which the founding fathers signed our Constitution in 1949.

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क्या जेवर एयरपोर्ट से बदलेगी पश्चिमी यूपी की किस्मत?

akbप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश के जेवर में एशिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का भूमिपूजन किया। इस मौके पर मोदी को सुनने के लिए नोएडा, गाजियाबाद, अलीगढ़, बुलंदशहर, आगरा, मेरठ से आए लाखों लोग मौजूद थे। मोदी ने अपने भाषण में बताया कि कैसे यह एयरपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहनेवाले लोगों की किस्मत बदल देगा। आपको बता दें कि दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर जो किसान धरने पर बैठे हैं उनमें बड़ी संख्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की है। इसीलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपने भाषण में लोगों को बताया कि जेवर में एयरपोर्ट बनने से सबसे ज्यादा फायदा पश्चिमी यूपी के लोगों को होगा और यह एयरपोर्ट इस क्षेत्र का भविष्य बदल देगा।

पीएम मोदी ने कहा कि 6,200 हेक्टेयर जमीन पर बननेवाले इस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का निर्माण 30 हजार करोड़ की लागत से होगा और यह पश्चिमी यूपी के एक लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराएगा। जेवर में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बनेगा। इस एयरपोर्ट के बनने के बाद दिल्ली देश का पहला शहर होगा जहां 70 किलोमीटर के दायरे में तीन एयरपोर्ट होंगे। मौजूदा समय में दिल्ली-एनसीआर में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और गाजियाबाद के हिंडन एयरपोर्ट से उड़ानें संचालित हो रही हैं। हिंडन एयरपोर्ट को घरेलू उड़ानों को लिए शुरू किया गया था। जेवर एयरपोर्ट के चालू होने से पश्चिमी यूपी के 30 जिलों और हरियाणा के फरीदाबाद, पलवल और बल्लभगढ़ में रहने वाले लोगों को फायदा होगा।

इस एयरपोर्ट के निर्माण के पहले चरण में वर्ष 2024 तक 1,334 हेक्टेयर में एक टर्मिनल और एक रनवे का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद अलग-अलग चरण में पांच और रनवे बनाए जाएंगे। केंद्र सरकार का यह लक्ष्य है कि सितंबर 2024 से देश के 9 शहरों के साथ-साथ दुबई के लिए फ्लाइट शुरू हो जाए। इस एयरपोर्ट को स्विस कंपनी ज्यूरिख इंटरनेशल एयरपोर्ट एजी (Zurich International Airport AG) डेवलप कर रही है।

बड़ी बात ये है कि जेवर में देश का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट मेंटिनेंस सेंटर यानी एमआरओ (Maintenance, Repair and Operations)भी बनेगा। अभी तक देश में सिर्फ एक एमआरओ सेंटर महाराष्ट्र के नागपुर में है जो बहुत छोटा है। फिलहाल देश के विमानों को मेंटिनेंस, रिपेयर और ओवरहालिंग के लिए विदेश भेजा जाता है जिसपर हर साल करीब 15 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। लेकिन जब जेवर एयरपोर्ट बनकर तैयार हो जाएगा तो वहां हैंगर में एक साथ 178 विमानों को पार्क किया जा सकेगा।

मोदी ने कहा जेवर एयरपोर्ट पश्चिमी यूपी को पूरी दुनिया से जोड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस एयरपोर्ट को बहुत पहले बन जाना चाहिए था लेकिन यूपी की पहले की सरकारें डेडलाइन पूरा करने में नाकाम रहीं। मोदी ने याद दिलाया कि कैसे यूपी के लोग अपनी गरीबी और पिछड़ेपन के कारण दूसरे राज्यों के लोगों के ताने सुनते थे। उन्होंने कहा, लोग पूछते थे कि क्या कभी यूपी की इमेज बदल पाएगी या नहीं।

उन्होंने कहा-‘ लोगों को कभी गरीबी, कभी जात-पात की राजनीति, कभी हजारों करोड़ के घोटाले, कभी खराब सड़कें, कभी उद्योग तो कभी राजनीति में माफिया नेताओं को लेकर ताने सुनने पड़ते थे। लेकिन अब हालात बेहतर हो रहे हैं। मोदी ने कहा कि झूठे सपने दिखाकर लोगों को गुमराह किया गया।

यह बात तो सही है कि नरेन्द्र मोदी के काम करने का तरीका अलग है। वह खुद कहते हैं कि जिस परियोजना की आधारशिला मैं रखता हूं, उसका उद्घाटन भी करता हूं। बीस साल से मोदी संवैधानिक पद पर हैं और अब तक उनका जो रिकॉर्ड है उसमें यह बात साबित भी होती है।

मोदी किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले उसके पूरा होने की तारीख तय कर लेते हैं और फिर उसी डेडलाइन के हिसाब से काम करते हैं। गुरुवार को मोदी ने इस बात का जिक्र किया कि यूपी में पहले की सरकारें बिना किसी जमीनी काम किए प्रोजेक्ट की आधारशिला रख देती थी और फिर भूल जाती थी। जेवर एयरपोर्ट का प्रोजेक्ट भी इसका सबूत है। लेकिन अब ‘भूमि पूजन’ का फैसला तब किया गया जब भूमि अधिग्रहण जैसे सारे ग्राउंड वर्क कर लिए गए।

मोदी ने कहा, योगी चाहते तो तो 2017 में ही भूमि पूजन करा देते लेकिन उन्होंने ऐसा तबतक नहीं किया जब तक सारा ग्राउंड वर्क पूरा नहीं कर लिया गया। उन्होंने कहा, पहले राजनीतिक लाभ के लिए आनन-फानन में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की घोषणा होती थी और इसके लिए कोई ग्राउंड वर्क नहीं किया जाता था जिसका नतीजा ये होता था कि प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाती थी और काम लटक जाता था। उन्होंने कहा-‘इंफ्रास्ट्रक्चर हमारे लिए राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति का हिस्सा है’। उन्होंने कहा-हम यह तय कर रहे हैं कि प्रोजेक्ट लटके नहीं। हमने देरी होने पर जुर्माने का प्रावधान किया है।

मोदी की बात सुनकर आपको शायद समझ आ गया हो कि उन्होंने यह बात क्यों कही। असल में गुरुवार को यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने एक ट्वीट कर दावा किया कि उनके कार्यकाल में जेवर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई थी और बीजेपी एक अधूरे काम को शुरू करने का क्रेडिट ले रही है। मायावती ने कहा कि उनके कार्यकाल में किसानों से भूमि अधिग्रहण शुरू हुआ था और बीजेपी अब रैलियां कर इसे अपनी उपलब्धि बता रही है। मोदी जानते थे कि पूर्व मुख्यमंत्रियों की ओर से ऐसे दावे किए जाएंगे।

इसलिए मोदी ने ये भी बता दिया कि यह सही है कि जेवर एयरपोर्ट का प्रोजेक्ट नया नहीं है। यह बीस साल पुराना प्रोजक्ट है। इसका प्लान सबसे पहले उस वक्त बना था जब राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद मोदी ने यह भी बता दिया कि इस बीच मायावती, मुलायम सिंह, और अखिलेश यादव की सरकार आई लेकिन एयरपोर्ट के लिए एक ईंट भी नहीं रख पाई, क्योंकि कभी राज्य सरकारों ने ढिलाई की तो कभी केन्द्र की यूपीए सरकार ने अड़ंगा लगा दिया। मोदी ने कहा-‘चूंकि यूपी में डबल इंजन की सरकार है इसलिए अब तेजी से काम हो रहा है और एयरपोर्ट वक्त पर बनकर तैयार हो जाएगा।’

जेवर में एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट और एविएशन हब की योजना 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की सरकार द्वारा तैयार की गई थी। 2002 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं। तब मायावती बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चला रही थीं। उन्होंने इस परियोजना को तेज गति से पूरा करने की कोशिश की। 2004 में यूपी में सरकार बदल गई और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट को आगरा ले जाने की कोशिश की। बात आगे बढ़ी तो कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने दूरी को लेकर फाइल लटका दी। अब करीब 20 साल बाद जेवर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने का सपना पूरा हो रहा है।

मोदी ने एक और बात कही कि हजारों हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण करना कोई आसान काम नहीं है। उन्होंने कहा, किसानों को जमीन देने के लिए राजी करना, उन्हें उचित मुआवजा देना, सबको खुश रखना और बिना किसी बाधा के प्रोजेक्ट को शुरू कराना कोई छोटी बात नहीं है।

यह वह इलाका है जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 2015 में भट्टा परसौल किसान आंदोलन शुरू किया था और गिरफ्तारी दी थी। आंदोलन के बाद सरकार को जमीन अधिग्रहण कानून वापस लेना पड़ा था। इसके बाद सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून में बदलाव किए और इस बदलाव के बाद ही भट्टा परसौल के किसानों ने अपनी जमीनें एयरपोर्ट के लिए दी। बदले में सरकार ने उम्मीद से ज्यादा मुआवजा दिया। इसीलिए मोदी ने कहा कि पिछली सरकारें जो काम 14 साल में नहीं करा सकीं वह काम योगी ने चार साल में कर दिखाया। उन्होंने किसानों को धन्यवाद दिया और मुख्यमंत्री को ‘कर्मयोगी’ बताया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपने भाषण में किसानों को धन्यवाद दिया और कहा कि पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश गन्ने की मिठास के लिए प्रसिद्ध था लेकिन पिछली सरकारों के राज में यह इलाका दंगों के लिए बदनाम हो गया। लेकिन अब ये इलाका प्रदेश के गन्ने की मिठास को बढ़ाएगा, जिन्नावादियों और दंगा कराने वालों को भगाएगा।

मोदी और योगी की कैमिस्ट्री कैसी है यह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया। दरअसल सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई जिसमें पीएम मोदी ने अपना बायां हाथ योगी के कंधे पर रखा हुआ है। इसी तस्वीर का जिक्र राजनाथ सिंह ने सीतापुर में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में की। उन्होंने कहा,’इस तस्वीर में मोदी, योगी आदित्यनाथ के कंधे पर हाथ रखकर उनके कान में तेज गति से बैटिंग करने को कह रहे हैं। अगर योगी तेजी से बैटिंग करते रहे तो बीजेपी की जीत निश्चित है।’

राजनाथ सिंह ने जो बात कही वह सही है। योगी आदित्यनाथ आजकल T20 के बैट्समैन की तरह बल्लेबाजी कर रहे हैं। लगातार चौके-छक्के मार रहे हैं और उनको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लगातार शाबाशी भी मिल रही है। नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि जो काम पिछली सरकारें 14 साल में नहीं कर पाई वो यूपी ने चार साल में कर दिया।

नरेंद्र मोदी की हर बात में योगी के लिए एक पॉलिटिकल मैसेज था। जब उन्होंने कहा कि पहले पिछड़ेपन के लिए यूपी के लोगों को ताने सुनने पड़ते थे तो उन्होंने यह भी इशारा किया कि योगी आदित्यनाथ की वजह से यूपी की छवि पॉजिटिव बनी। जब मोदी ने कहा कि यूपी में डबल इंजन की सरकार है इसलिए काम तेजी से हो रहे हैं तो इसका मतलब था कि योगी को फिर से वोट दो तो मोदी की मदद से काम तेजी से होगा।

असल में मोदी और योगी ने मिलकर यूपी में एक माहौल बनाया है और अपने विरोधियों को डिफेंसिव खेलने के लिए मजबूर कर दिया है। जेवर में एयरपोर्ट का शिलान्यास इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

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Jewar Airport: Will it change the fortunes of western UP?

akb2711Prime Minister Narendra Modi on Thursday performed the ‘bhoomi poojan’ (ground breaking) ceremony of Asia’s largest international airport at Jewar in Uttar Pradesh. Lakhs of people from Noida, Ghaziabad, Aligarh, Bulandshahar, Agra, Mathura and Meerut gathered at the meeting to hear Modi saying that this airport would change the fortunes of people living in western UP. It should be noted that a large number of farmers sitting on dharna at Delhi’s Ghazipur border are from western UP. Chief Minister Yogi Adityanath told the meeting that the Jewar airport would change the future of this region in the coming years.

Spread over 6,200 hectares of land, this international airport will be built at a cost of Rs 30,000 crore and would provide jobs to nearly one lakh people in western UP, Modi said. Jewar will become the world’s fourth largest international airport. After Jewar airport is ready, Delhi NCR will become India’s first city to have three airports within a range of 70 km. At present, there is the Indira Gandhi international airport in Delhi and an airport in Hindon, Ghaziabad for domestic flights. People living in 30 districts of western UP, and in Faridabad, Palwal, and Ballabhgarh of Haryana will benefit, once the Jewar airport is functional.

In the first phase, a terminal and a runway will be built on 1,334 hectares of land and will be ready by 2024. After that, five more runways will be built in different phases. The Centre’s target is to start flight operations to nine Indian cities and Dubai by September, 2024. Swiss company Zurich International Airport AG will develop this airport.

India’s biggest aircraft maintenance centre MRO(Maintenance, Repair and Operations) will be built in Jewar. At present, there is only a small MRO centre in Nagpur. Normally, aeroplanes are sent from India for repairs, overhauling and maintenance abroad at an annual cost of nearly Rs 15,000 crore. When the Jewar airport will be complete, 178 planes can be parked in hangars.

Modi said, Jewar airport will connect western UP to the entire world. He said, this airport should have been ready much earlier, but previous governments in UP failed to achieve the deadline. Modi reminded how people of UP used to hear taunts from people of other states because of its poverty and backwardness. He said, the people of UP used to wonder when their image would get a makeover.

“There used to be taunts on poverty, taunts on casteist politics, taunts over thousands of crores worth scams, taunts over poor roads, taunts over lack of industries and taunts over mafia leaders in politics, but now the situation is changing for the better”, Modi said. People were misled by false dreams, he added.

It is true that Modi is known for his acumen of completing projects. He often says that whenever he lays the foundation of any project, he ensures that he would inaugurate the same within a fixed deadline. For the last two decades, Modi has been occupying Constitutional posts, and records vouch for his claim.

Before starting a project, Modi fixes the deadline for its completion and then works accordingly. On Thursday, Modi pointed out how former rulers in UP used to lay foundation stones for projects without doing actual groundwork. Jewar airport is an example. The ‘bhoomi poojan’ ceremony took place only after the entire groundwork like land acquisition, etc. was completed.

Modi said, had CM Yogi wanted, he could have performed the Bhoomi Poojan in 2017 but did not do so, since the groundwork was not complete. He said, earlier infra projects used to be announced in a hurry without doing proper groundwork, and as a result, the cost of projects used to spiral as work lingered on. “For us, infrastructure is not politics (rajneeti), it is state policy (rashtra-neeti)”, Modi said. There is a provision for fines if work on the project is delayed, he added.

It is easy to understand why Modi said this. Former chief minister Mayawati claimed in a tweet on Thursday that the Jewar airport project was cleared during her tenure and that the BJP was taking credit for launching an incomplete work. Mayawati said, it was during her tenure that land acquisition from farmers began, and BJP is now tomtoming it as its achievement by holding rallies. Modi knew such claims would be made by former rulers.

Modi said, it is true that the Jewar airport project is 20 years old and the first plans were ready when Rajnath Singh was the chief minister of UP. He pointed out that governments of Mayawati, Mulayam Singh Yadav and Akhilesh Yadav came, but not a single brick was laid for the airport. Modi said, this was because state governments delayed the work, and the former UPA government at the Centre too delayed the project. “Now that UP has got a double engine government, both at the Centre and in the state, work on the project moved faster”, Modi said.

The plan for an international airport and aviation hub at Jewar was prepared by the then Chief Minister Rajnath Singh’s government in 2001. Mayawati became CM in 2002, and since BJP was then its ally, she tried to out the project on a fast pace. In 2004, the government changed, and when Mulayam Singh Yadav became the CM, he tried to take the airport project to Agra. The Congress-led UPA government at the Centre put the project in cold storage citing distance issues, and 20 years later, the dream has at last come true.

Modi also pointed to one more issue. He said, acquiring several thousands of hectares of land from farmers was not an easy task. He said, persuading farmers to part with their land, giving them proper compensation, keeping them in good humour, and then without speed breakers, doing the take-off, was not a mean achievement.

This is the region where Congress leader Rahul Gandhi had launched his Bhatta Parsaul farmers’ agitation in 2015 and had courted arrest. Because of his agitation, the government had to withdraw the Land Acquisition Bill. The government made changes in land acquisition law, and only then, the farmers of Bhatta Parsaul parted with their land. In return, the government gave them compensation more than what the farmers had expected. That is why, Modi said, Yogi Adityanath completed the work in four years, what previous governments could not do in 14 years. He offered a big Thank You to farmers and described the CM as ‘KarmaYogi’ in his speech.

Chief Minister Yogi Adityanath, in hi speech, too, thanked the farmers and said, western UP used to be famous for its sweet sugarcane, but during previous rule, it became infamous for communal riots, but now, this region will increase the sweetness of sugarcane again, and will force ‘Jinnahwadis’(Jinnah supporters) and rioters to flee from this region.

The physical chemistry between Modi and Yogi, as depicted in the famous photograph that went viral on social media, in which the PM had put his left hand on the shoulder of the UP CM, was best described by experienced politician and Defence Minister Rajnath Singh at a party workers meeting in Sitapur on Thursday. Describing Yogi as a good batsman who makes runs at a fast pace, Rajnath Singh said, “in this picture, Modi, while putting his arm on Yogi’s shoulder, was telling him in his ears to go on batting at a fast pace. If Yogi bats faster, BJP is bound to win.”

I agree with Rajnath Singh that Yogi Adityanath is behaving like a T20 cricket batter who is making runs at a fast pace, scoring fours and sixes. He is regularly getting accolades from Prime Minister Modi. On Thursday too, Modi said, Yogi did the work in four years, which others could not do in 14 years.

Modi’s speech in Jewar had a political message for Yogi too. By saying that earlier people of UP used to hear taunts over poverty and backwardness, Modi was indirectly telling that Yogi has now given UP a positive image makeover. By speaking about double engine government in UP, Modi was telling voters that if they voted for Yogi, they should be rest assured that they would get his (Modi’s) support too.

For now, Modi and Yogi seem to have changed the electoral scenario in UP and have put political rivals on the defensive. The Bhoomi Poojan of Jewar international airport was one major step in this direction.

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आपकी गाढ़ी कमाई को कैसे लूट सकती है क्रिप्टोकरेंसी?

AKBसरकार ने बुधवार को साफ कर दिया कि वह भारत में सभी तरह की प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी को प्रतिबंधित करके इसके व्यापार को नियंत्रित करेगी। 29 नवंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में एक विधेयक पेश किया जाएगा। इस विधेयक को ‘क्रिप्टोकरेंसी एंड रेगुलेशन ऑफ ऑफिशियल डिजिटल करेंसी बिल, 2021’ नाम दिया गया है।

इस विधेयक का उद्देश्य ‘भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी की जाने वाली आधिकारिक डिजिटल मुद्रा के निर्माण के लिए एक सुविधाजनक ढांचा बनाना’ है। लोकसभा बुलेटिन के मुताबिक, ‘विधेयक में इस बात का प्रावधान है कि भारत में सभी तरह की निजी क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाया जाय। हालांकि, इसमें कुछ अपवाद भी है, ताकि क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित प्रौद्योगिकी एवं इसके उपयोग को प्रोत्साहित किया जा सके।’ सूत्रों ने बताया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी डिजिटल करेंसी लॉन्च करने की व्यावहारिकता की जांच कर रहा है, और इसके लॉन्च की संभावित तारीख पर फैसला होना अभी बाकी है।

केंद्र के फैसले के बाद भारत में क्रिप्टोक्यूरेंसी बाजार में भारी बिकवाली हुई, जिससे बिटकॉइन की कीमतें 17 प्रतिशत तक गिर गईं। एक बिटकॉइन जो पहले 44 लाख रुपये में बेचा जा रहा था, वह अचानक 38 लाख रुपये पर पहुंच गया। वहीं, एथेरियम, टेथर, कार्डानो जैसी अन्य क्रिप्टोकरेंसी की कीमतें भी तेजी से गिर गईं।

क्रिप्टोकरेंसी क्या है? ‘क्रिप्टो’ शब्द का मतलब होता है गुप्त या छिपा हुआ। चूंकि यह नोट या सिक्के की तरह भौतिक रूप में नहीं है, इसलिए कोई भी इसे देख नहीं सकता । यह एक एन्क्रिप्टेड डिजिटल फाइल है जिसमें डिजिटल कोड्स होते हैं, और इसे एक मजबूत साइबर प्रोग्राम द्वारा काफी जटिल प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रॉसेस को डिकोड करना लगभग असंभव है। इस साइबर प्रोग्राम द्वारा जो कोड जनरेट होता है उसे करेंसी कहते हैं।

खरीददार इन ‘कॉइन्स’ की कीमत लगाते हैं, इनमें पूंजी लगाते हैं। खरीददारों की संख्या जितनी बढ़ती जाती है, इन ‘कॉइन्स’ की कीमत भी उतनी ही बढ़ती जाती है। जिसने पहले सस्ते में इन्हें खरीदा होता है वह बढ़ी हुई कीमत पर इन्हें दूसरे को बेच कर बड़ा मुनाफा कमा सकता है। अगर करेंसी की कीमत अचानक गिर गई तो खरीददार को बड़ा नुकसान भी हो सकता है। ये सब इतनी तेजी से होता है कि कुछ ही घंटों में हजारों की करेंसी की कीमत लाखों रुपये का रिटर्न दे सकती है, और कुछ ही पलों में करोड़ों के इन्वेस्टमेंट को खाक में बदल सकती है।

कुल मिलाकर यह एक तरह से ऐसे अनियंत्रित शेयर बाजार की तरह है, जिसका कोई माई-बाप न हो। जिसके बारे में किसी को ये पता न हो कि कौन इसे नियंत्रित कर रहा है। आपको नहीं पता कि आपने जो पैसा लगाया, वह कहां जा रहा है। यहां सबकुछ वर्चुअल होता है।

तकनीकी रूप से, क्रिप्टोकरेंसी बाइनरी डेटा का एक संग्रह है जिसे विनिमय के माध्यम के रूप में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। कॉइन के मालिकाना हक का रिकॉर्ड एक बहीखाते में संग्रहीत किया जाता है। यह एक कम्प्यूटरीकृत डेटाबेस होता है जो लेनदेन रिकॉर्ड को सुरक्षित करने के लिए मजबूत क्रिप्टोग्राफी का इस्तेमाल करता है। यह अतिरिक्त कॉइन्स के निर्माण को नियंत्रित करता है और कॉइन के मालिकाना हक के ट्रांसफर की भी पुष्टि करता है।

किसी एक यूजर द्वारा जारी किए जाने से पहले जब क्रिप्टोकरेंसी का निर्माण किया जाता है, तो इसे आमतौर पर केंद्रीकृत माना जाता है, लेकिन जब इसे विकेन्द्रीकृत नियंत्रण के साथ लागू किया जाता है, तो प्रत्येक क्रिप्टोकरेंसी डिस्ट्रिब्यूटेड ledger टेक्नॉलजी के जरिए काम करती है, जिसे आमतौर पर ‘ब्लॉकचेन’ कहा जाता है, जो कि एक पब्लिक ट्रांजैक्शन डेटाबेस की तरह काम करता है।

दुनिया की पहली विकेन्द्रीकृत क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन थी जो 2009 में जारी हुई थी। तब से, एथेरम, पोल्काडॉट, चेनलिंक, मूनकॉइन, शिबा इनू, रिपल, कार्डानो, स्टेलर, लाइटकॉइन, EOS, NEO, NEM आदि जैसी कई अन्य क्रिप्टोकरेंसी बनाई गई हैं। आज दुनिया भर में 700 से भी ज्यादा क्रिप्टोकरेंसी खरीदी या बेची जा रही हैं, जिसमें बिटकॉइन सबसे आगे है। 9 बड़ी क्रिप्टोकरेंसी के बाजार में 6,000 से भी ज्यादा डिजिटल कॉइन चल रहे हैं। इनकी कीमत 3,000 रुपये से लेकर 40 लाख रुपये तक है। इसलिए क्रिप्टोकरेंसी को भयंकर रूप से अस्थिर माना जाता है।

हाल ही में हुए आईपीएल और टी-20 वर्ल्ड कप के दौरान आपने टीवी पर क्रिप्टोकरेंसी को प्रमोट करने वाले कई विज्ञापन देखे होंगे। लेकिन इन विज्ञापनों को अगर आपने ध्यान से देखा हो तो आखिरी में कहा जाता है कि कारोबार अपने रिस्क पर कीजिए। लेकिन चूंकि पैसा बहुत जल्दी बढ़ने का दावा किया जाता है, इसलिए लोग जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं और क्रिप्टोकरेंसी में अपनी मेहनत की कमाई को जमकर लगा रहे हैं।

क्रिप्टोकरेंसी की ट्रेडिंग के लिए कई क्रिप्टो एक्सचेंज मौजूद हैं। भारत में WazirX, CoinDCX, Coinswitch, Kuber और Unocoin जैसे क्रिप्टो एक्सचेंज हैं। इनके जरिए क्रिप्टोकरेंसी का कारोबार होता है। ये क्रिप्टो एक्सचेंज कमीशन के आधार पर या फिर अपना कुछ मार्जिन रखकर इन क्रिप्टोकरेंसीज की डीलिंग करते हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि ये क्रिप्टो एक्सचेंज शेयर मार्केट की तरह न तो वैधानिक हैं और न ही पारदर्शी है।

शेयर्स के भाव चढ़ते-गिरते रहते हैं, और यदि इनके भाव ज्यादा गिर जाते हैं तो फिर सरकार इसे रेगुलेट करती है, सर्किट लगा देती है और ट्रेडिंग बंद हो जाती है। लेकिन क्रिप्टोकरेंसी में ऐसा नहीं है। कुछ ही मिनटों में लाखों रुपया शून्य पर आकर रह जाता है और कई बार कुछ मिनटों में लाखों गुना बढ़ जाता है। इसे कौन नियंत्रित कर रहा है, किस आधार पर दाम घट-बढ़ रहे हैं, इसका कोई अता-पता नहीं होता। इसका कोई नियंत्रक या नियामक नहीं है। कोई कंपनी, कोई सरकार, कोई देश इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता। ये पता ही नहीं है कि इसे बनाने वाले लोग कौन हैं, किस देश के हैं। जिस तरह इंटरनेट अब हर कंप्यूटर में है, उसी तरह ये क्रिप्टोकरेंसी अब हर देश में घूम रही है। यह एक विकेन्द्रीकृत वर्चुअल करेंसी है और इसका कोई गारंटर नहीं है।

इन क्रिप्टो कॉइन्स को जेनरेट कौन करता है? आसान भाषा में बताऊं- ये एक तरह की अत्याधुनिक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग है। दुनिया में फिलहाल ऐसे कुछ ही लोग हैं जो कंप्यूटर पर बेहद खास एल्गोरिदम के जरिए एक-एक कंप्यूटर पर क्रिप्टो कॉइन्स को जेनरेट करते हैं। इसे ‘माइनिंग’ कहा जाता है। एक बार डिजिटल कॉइन जेनरेट हो जाने के बाद उसकी कॉपी या डुप्लिकेट बनाना लगभग असंभव है। ये कॉइन्स बेहद ही जटिल इक्वेशंस से कोडेड होते हैं, और जब कोई व्यक्ति इन कंप्यूटर इक्वेशन्स को सॉल्व करता है, तो फिर उस यूजर को इनाम के तौर पर एक कॉइन मिलता है।

जब कॉइन ट्रेड किया जाता है या बेचा जाता है तो यूजर को पता होता है, लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन क्रिप्टोकरेंसी को कौन बनाता है, कौन इन्हें माइन करता है, इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ये सबकुछ किसी गहरे राज़ की तरह है। दुनिया की सबसे पुरानी क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन है, और आज एक बिटकॉइन की कीमत करीब 40 लाख रुपये है। इसमें टेस्ला के मालिक एलन मस्क तक ने पूंजी लगाई है, लेकिन बिटकॉइन को किसने बनाया, ये कोई नहीं जानता। आज बिटकॉइन का बाजार पूंजीकरण (market capitalization) एक ट्रिलियन डॉलर है। प्रॉपर्टी, सोना, स्टॉक या म्यूचुअल फंड की तुलना में बिटकॉइन का रिटर्न काफी ज्यादा है। हालांकि, इसकी कीमतें किसी सेट पैटर्न पर तय नहीं होतीं।

एल सल्वाडोर दुनिया का पहला ऐसा देश है जहां क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मान्यता मिली है। क्यूबा ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए इसे कानूनी मान्यता दी है। जापान में क्रिप्टोकरेंसी वैध नहीं है, लेकिन इसे ‘संपत्ति’ के रूप में इस्तेमाल करने की इजाजत है। चीन, जो कि इस समय क्रिप्टोकरेंसीज का सबसे बड़ा बाजार है, ने इस साल सितंबर में सभी तरह की क्रिप्टोकरेंसी के कारोबार को अवैध घोषित कर दिया।

कई देशों में तो बिटकॉइन के लिए एटीएम तक खुल चुके हैं। 2018 में बेंगलुरु में भी क्रिप्टो कॉइन्स के लिए ATM खुला था, लेकिन बाद में इसे जब्त कर लिया गया। कई बार ऐसी खबरें भी आईं कि लोग अब क्रिप्टोकरेंसी देकर अपराधियों और आतंकियों तक को नियुक्त कर रहे हैं। बुधवार को गुजरात पुलिस ने एक चौंकानेवाला खुलासा करते हुए कहा कि कुछ लोगों ने 4 करोड़ रुपये की ड्रग्स खरीदने के लिए बिटकॉइन का इस्तेमाल किया था।

क्रिप्टोकरेंसी के लिए ऐसी दीवानगी क्यों है? दरअसल, यह जल्द से जल्द अमीर बनने की ललक की उपज है। इस तरह की खबरें सोशल मीडिया पर फैलती हैं कि एक व्यक्ति ने एक हजार रुपये क्रिप्टोकरेंसी में लगाए और 24 घंटे में उसका पैसा बढ़कर 28 करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह एक और उड़ती फिरती खबर आई कि किसी ने 10 हजार रुपये लगाए और वह 24 घंटे में 50 करोड़ रुपये का मालिक हो गया। इसी चक्कर में क्रिप्टोकरेंसी का बोलबाला हो रहा है।

चूंकि भारत में क्रिप्टोकरेंसी वैध नहीं है, आप इससे सूई तक नहीं खरीद सकते। फिर भी एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में लोगों ने अब तक क्रिप्टोकरेंसी में लगभग 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की पूंजी लगा दी है।

अब जबकि सरकार ने क्रिप्टोकरेंसी के कारोबार को विनियमित करने का फैसला किया है, डिजिटल करेंसी में निवेश करने वाले अब राहत की सांस ले सकते हैं। अभी तो कोई भी अपनी क्रिप्टोकरेंसी बनाकर उसे मार्केट में उतार सकता है। लोग उसमें इन्वेस्ट कर दें और फिर क्रिप्टोकरेंसी बनाने वाला अपनी दुकान बंद करके भाग जाए तो कोई उसे नहीं पकड़ सकता। अच्छी बात यह है कि RBI खुद ट्रेडिंग के लिए अपनी डिजिटल करेंसी जारी करने वाला है। RBI की डिजिटल करेंसी में निवेश करने वालों को टैक्स देना होगा। जब विधेयक कानून बन जाएगा तो क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने वाले कम से कम उम्मीद तो कर सकते हैं कि वे धोखाधड़ी के शिकार नहीं होंगे। सरकार उन लोगों के लिए भी अपने पैसे निकालने की कोई व्यवस्था कर सकती है जिन्होंने फिलहाल क्रिप्टोकरेंसी में निवेश किया है।

इन सभी आश्वासनों के बावजूद मैं आप सभी को यही सलाह दूंगा कि लालच में मत पड़िए। रातों रात करोड़पति बनने का सपना मत देखिए। याद रखिए कि हमारे देश में करोड़ों लोगों ने लालच में पड़कर चिट फंड्स और ऐसी ही संदिग्ध स्कीमों के चक्कर में अपनी मेहनत की कमाई गंवाई है। चिट फंड का कम से कम दफ्तर तो होता था जहां लोग जाकर अपने पैसे मांग सकते थे, लेकिन क्रिप्टोकरेंसी का न कोई बैंक है, न दफ्तर है, न कोई माई-बाप है। ये असली नोट लेकर आपको इंटरनेट पर वर्चुअल क्रिप्टो कॉइन की फोटो दे देते हैं। असली नोट देकर नकली करेंसी के चक्कर में पड़ना समझदारी नहीं है। इसलिए लालच में मत पड़ें।

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How cryptocurrencies can rob you of your hard earned money

AKBThe Centre on Wednesday confirmed that it would regulate the trade in cryptocurrencies, by prohibiting all private cryptocurrencies in India. A bill will be introduced in the winter session of Parliament beginning November 29 to this effect. The bill is titled “Cryptocurrency And Regulation Of Official Digital Currency Bill, 2021”.

The bill seeks “to create a facilitative framework for creation of the official digital currency to be issued by the Reserve Bank of India”. According to a Lok Sabha bulletin, “the bill also seeks to prohibit all private cryptocurrencies in India, however, it allows for certain exceptions to promote the underlying technology of cryptocurrency and its uses”. Sources said, the RBI is examining the feasibility of launching its own digital currency, and is yet to decide on a possible date for its launch.

There was huge selling in the cryptocurrency market in India after the Centre’s decision, with prices of Bitcoins crashing by 17 per cent. A Bitcoin which was being sold at Rs 44 lakh was now being available at Rs 38 lakhs. But prices of other cryptocurrencies like Ehtereum, Tether, Cardano fell sharply.

What is cryptocurrency? ‘Crypto’ literally means secret or concealed. Since it is not in physical form, as currency notes or coins, nobody can see it. It is an encrypted digital file having digital codes, backed by a strong cyber program, prepared with a complicated process. It is almost impossible to decode this process. Codes generated by this cyber program are called currency.

Buyers fix the prices of these ‘coins’, they invest money in those coins, and as the number of buyers increases, the price of coins increase. Those who bought the coins early sell them at a huge profit. If the price crashes, the buyers of these coins suffer. The transactions take place at such a fast pace that a few thousand rupees can give returns worth lakhs within a few minutes. Alternately, coins worth crores can become zilch within a few hours.

To put it in simple words, it is like a big unregulated stock market, where there are no regulators to enforce laws. Where nobody knows who is regulating this market. Nobody knows where the money you invested goes. Everything is virtual.

Technically, cryptocurrency is a collection of binary data which is designed to work as a medium of exchange. Individual coin ownership records are stored in a ledger, which is a computerized database using strong cryptography to secure transaction records. It also controls the creation of additional coins and verifies the transfer of coin ownership.

Once a cryptocurrency is minted or created before it is issued by a single user, it is generally considered as centralized, but when it is implemented with decentralized control, each cryptocurrency works through distributed ledger technology, typically called a ‘blockchain’, that serves as a public transaction database.

The first decentralized cryptocurrency released in the world in 2009 was the Bitcoin. Since then, many other cryptocurrencies like Ethereum, Polkadot, Chainlink, Mooncoin, Shiba Inu, Ripple, Cardano, Stellar, Litecoin, EOS, NEO, NEM, etc. have been created. There are more than 700 cryptocurrencies being bought or sold across the world today, with Bitcoin as the leader. Nine big cryptocurrencies have more than 6,000 digital coins floating in the market. Their prices vary from Rs 3,000 to Rs 40 lakh. That is why cryptocurrency is considered volatile.

During the recently concluded IPL T-20 World Cup held in UAE, you might have noticed numerous ads on TV promoting cryptocurrencies. If you had noticed the fine print in all these ads, it says, trading at your risk. Since the urge to become rich is big, people are ready to take risks and they invest their hard earned money in these crypto coins.

There are several crypto exchanges where the trading in cryptocurrencies takes place. In India, WazirX, CoinDCX, Coinswitch, Kuber and Unocoin are active. These are crypto exchanges where trading in coins takes place. These crypto exchanges deal in cryptocurrencies by charging commission or margins. These exchanges, mind you, are not legal and are not transparent.

When prices of shares rise or fall steeply in stock exchanges, the regulator applies circuit and prevent the shares from rising or falling steeply. But in crypto exchanges, the prices can turn into millions or become zero within minutes. There is no regulator and nobody knows the reasons why the prices of cryptos are rising or falling. There is no guarantor. Since every transaction is encrypted with unbreakable codes, nobody can find out who is the originator/regulator/owner of the crypto exchange.

Who generates these crypto coins? In layman’s language, it is a sophisticated computer programming, using special algorithms, which generates coins. This is called ‘mining’. Once a digital coin is generated, it cannot be copied or duplicated. These coins are coded with tough equations and anybody solving the equation gets a coin as a reward.

A user knows when a coin is traded or sold, but nobody knows who mines or generates these coins. Bitcoin is the world’s oldest cryptocurrency, and each Bitcoin is now worth Rs 40 lakhs. Tesla founder Elon Musk is reported to have invested his money in Bitcoins. But nobody knows who generated the Bitcoin. The market capitalization of Bitcoin today is one trillion dollars. Bitcoins give huge returns compared to property, gold, stocks or mutual funds. The quantum of returns does not follow a set pattern.

El Salvador was the first country to declared Bitcoin as legal tender. Cuba also followed, to bypass US sanctions. Cryptocurrency is not legal in Japan, but it is allowed to be used as ‘asset’. China, which is presently the single largest market for cryptocurrencies, declared all cryptocurrency transactions as illegal in September this year.

There are even ATMs for Bitcoins in several countries. In Bengaluru, an ATM for crypto coins was opened in 2018, but was seized immediately. There are reports of cryptocurrencies being used to hire criminals and terrorists. On Wednesday, Gujarat police disclosed that Bitcoins were used to purchase Rs 4 crore worth narcotics.

Why is this craze for cryptocurrencies? It is the urge to become rich quickly. This urge is fuelled by social media where unverified information is shared about how a person who invested a thousand rupees in cryptocurrency became richer by Rs 28 crore within 24 hours. There was another unverified information about how a person who invested Rs 10,000 in cryptocurrency, became richer by Rs 50 crore within 24 hours.

Since cryptocurrency is not legal tender in India, you cannot even buy a pin with this currency. Yet experts say, more than Rs 40,000 crore has been invested till now in cryptocurrencies in India.

Now that the Centre has decided to regulate trading in cryptocurrencies, investors in such digital currencies can now heave a sigh of relief. Those who were dealing in private cryptocurrencies may run for cover, and could remain untraceable. The positive part is that the RBI may introduce its own digital currency for trading. Those investing in RBI’s digital currency will have to pay taxes. When the bill becomes law, those investing in cryptocurrencies can at least hope that they will not become victims of fraud. The government may provide a window for those who have already invested money in cryptocurrencies to dispose of their investments.

In spite of all these assurances, let me advise all of you: Do not succumb to the urge to become rich. Do not dream of becoming billionaires overnight. Remember how crores of people lost their hard earned money in chit funds and other dubious schemes. At least the chit funds had their offices where people could go and seek their money, and government used to take cheaters to task, but cryptocoins have no offices, no banks, no regulators. They take legal tender from you and in exchange give you images of virtual crypto coins on internet. By paying real currency notes and becoming a victim of virtual currency is not a wise deal. Stay away from greed.

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योगी की चेतावनी: यूपी में कोई शाहीन बाग नहीं बनने देंगे!

aaj ki baatपाकिस्तान से आए दिन हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। यही वजह है कि भारत सरकार दो साल पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लेकर आई। इस कानून की वजह से अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में सताए गए उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ जो हिंदू, सिख, जैन, पारसी या ईसाई हैं और दिसंबर 2014 के अंत से पहले भारत आ चुके हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में मुसलमानों के एक वर्ग ने लगभग दो महीने तक इस कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।

उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इस हफ्ते चेतावनी दी थी कि यदि CAA और NRC को रद्द नहीं किया गया, तो प्रदर्शनकारी यूपी की सड़कों पर उतरकर शाहीन बाग जैसा एक और आंदोलन शुरू करेंगे।

कानपुर में मंगलवार को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीएए के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की कोशिश करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। योगी ने ‘अब्बा जान’ और ‘चाचा जान’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ओवैसी का नाम लिए बगैर कहा, ‘उत्तर प्रदेश में 2017 से पहले हर तीसरे-चौथे दिन दंगे होते थे, आज यहां पर मैं उस व्यक्ति को चेतावनी दूंगा जो सीएए के नाम पर यहां फ‍िर से भावनाओं को भड़काने का कार्य कर रहा है। मैं इस अवसर पर ‘चचाजान’ और ‘अब्बाजान’ के इन अनुयायियों से कहूंगा कि वे सावधान होकर सुन लें, अगर प्रदेश की भावनाओं को भड़काकर माहौल खराब करोगे तो फिर सरकार सख्ती के साथ निपटना जानती है।’

योगी ने आगे कहा, ‘हर व्यक्ति जानता है कि ओवैसी सपा के एजेंट बनकर प्रदेश में भावनाओं को भड़काने का काम कर रहे हैं। अब यूपी दंगों के लिए नहीं बल्कि दंगा मुक्त राज्य के रूप में जाना जाता है। हमारी सरकार माफियाओं को संरक्षण नहीं देती है, यह एक ऐसी सरकार है जो माफियाओं के सीने पर बुल्डोजर चलाती है।’ योगी ने यह बात माफियाओं की संपत्ति के तोड़फोड़ के संदर्भ में कही थी।

यूपी के मुख्यमंत्री बूथ स्तर के बीजेपी नेताओं के एक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी संबोधित किया। नड्डा ने कहा कि यूपी में होने जा रहे चुनावों में लड़ाई राष्ट्रवादियों और ‘जिन्नावादियों’ के बीच होगी। नड्डा सपा प्रमुख अखिलेश यादव का जिक्र कर रहे थे, जिन्होंने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जिन्ना की तुलना नेहरू, पटेल और गांधी से की थी।

मंगलवार को ओवैसी महाराष्ट्र के सोलापुर में थे, जहां उन्होंने एक जनसभा में कहा कि भारत में मुसलमानों को जिन्नावादी कहकर अपमानित किया जा रहा है। ओवैसी ने कहा, हकीकत यह है कि बंटवारे के बाद भारत में रहने वाले सभी मुसलमानों ने जिन्ना का विरोध किया था, और उन्होंने हिंदुस्तान को अपना वतन माना था। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को से लोगों के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, जो उनकी देशभक्ति पर सवाल उठा रहे हैं।

विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही यूपी के सियासी माहौल में और ज्यादा तपिश देखने को मिलेगी। योगी आदित्यनाथ एक बेबाक नेता हैं, जो कहते हैं, करके दिखाते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में अपने साढे चार साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने न केवल प्रमुख विकास परियोजनाओं पर तेजी से काम किया, बल्कि ऐसे सभी अपराधियों और माफिया गिरोहों के खिलाफ ज़ोरदार कार्रवाई की, जिन्हें नेताओं का संरक्षण मिला हुआ था। यूपी के अपराधी योगी से अब डरने लगे हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के दिल में दहशत पैदा करने वाले मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफिया सरगनाओं की अवैध संपत्तियों पर योगी सरकार ने ‘बुल्डोजर’ चलवाया है। 19 मार्च 2017 को जबसे योगी आदित्यनाथ ने अपना कार्यभार संभाला है, तब से वह ‘माफिया संस्कृति’ का सफाया करने के अपने मिशन पर काम कर रहे हैं। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, विजय मिश्रा, सुंदर भाटी समेत 40 से ज्यादा माफिया सरगनाओं की 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की अवैध संपत्ति जब्त की गई है। करीब 800 गैंगस्टरों और उनके करीबियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं।

सीएए पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की किसी भी कोशिश पर ओवैसी को योगी की खुली चेतावनी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ओवैसी पर आरोप लगाया था कि वह यूपी में बीजेपी की ‘बी टीम’ बनकर काम कर रहे हैं, लेकिन मंगलवार को योगी ने साफ कहा कि ओवैसी को समाजवादी पार्टी के एजेंट के तौर पर काम रहे हैं।

व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि ओवैसी न किसी पार्टी की ‘ए’ टीम हैं और न किसी की ‘बी’ टीम। यूपी की सियासत में उनकी एंट्री के बाद अखिलेश यादव के खेमे को इस बात की चिंता है कि कहीं वो मुस्लिम वोट बैंक में बड़ी सेंध न लगा दें ।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को छोड़कर ज्यादातर पार्टियां खुद को मुसलमानों का दोस्त बताती हैं, लेकिन ओवैसी दिखा रहे हैं कि हर किसी की थाली में छेद है। क्या राहुल गांधी इस बात का जवाब देंगे कि कांग्रेस ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर सरकार क्यों बनाई?

ओवैसी उत्तर प्रदेश के वोटरों को याद दिला रहे हैं कि मायावती ने यूपी में दो-दो बार बीजेपी के साथ मिलकर सरकारें बनाई। क्या अखिलेश यादव मुस्लिम मतदाताओं को इस बात का जवाब देंगे कि कल्याण सिंह ने 2009 के लोकसभा चुनाव के समय समाजवादी पार्टी के लिए प्रचार किया था और उनके बेटे राजवीर सिंह सपा में शामिल हो गए थे? यही वजह है कि ओवैसी पूरे यूपी में घूम कर मुसलमानों से कह रहे हैं कि सिर्फ वही मुसलमानों के हक़ की लड़ाई लड़ सकते हैं।

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Yogi warns: No Shaheen Bagh allowed in UP!

AKBAt a time when Hindus, Sikhs, Christians and other minorities are facing persecution in neighbouring Pakistan, Indian government enacted the Citizenship Amendment Act (CAA) two years ago, that provided a pathway to Indian citizenship for persecuted religious minorities from Afghanistan, Bangladesh and Pakistan, who are Hindus, Sikhs, Jain, Parsis or Christians and have arrived in India prior before the end of December, 2014. There were protests against the law by a section of Muslims at Delhi’s Shaheen Bagh for nearly two months.

In the run-up to the forthcoming UP assembly elections, All India Majlis Ittehadul Muslimeen (AIMIM) chief Asaduddin Owaisi, while addressing a public meeting this week, warned that if CAA and NRC (National Register of Citizens) were not scrapped, protesters will take to streets in UP and launch another Shaheen Bagh-type agitation.

On Tuesday in Kanpur, UP chief minister Yogi Adityanath minced no words and threatened strict action against those who are trying to incite communal passion over CAA. Yogi Adityanath used the jibes ‘abba jaan’ and ‘chacha jaan’, and without naming Owaisi, said, “Prior to 2017, there used to be riots every third or fourth day in UP. I would like to warn the person who is once again trying to incite feelings in the name of CAA….I am asking followers of ‘chacha jaan’ and ‘abba jaan’ to listen carefully that if attempts are made to vitiate the atmosphere of the state by inciting feelings, the state government will deal with it strictly”.

Yogi added, “Everyone knows that he is inciting feelings as an agent of the Samajwadi Party. Now UP is not known for riots but as a riot-free state….Our government does not patronize mafias, it is a government that runs bulldozers on the chest of mafias”. This was in reference to demolition of properties owned by criminals.

The UP chief minister was addressing a convention of booth-level BJP leaders. This convention was also addressed by BJP president J P Nadda, who said the fight in the forthcoming elections in UP will be between nationalists and ‘Jinnahites’ (Jinnahwadi). Nadda was referring to SP chief Akhilesh Yadav, who had compared Jinnah as a freedom fighter along with Nehru, Patel and Gandhi.

On Tuesday, Owaisi was in Solapur, Maharashtra, where he told a public meeting that Muslims in India are being insulted by naming them as ‘Jinnahwadis’. Owaisi said, the reality is that all Muslims who stayed in India after Partition, had opposed Jinnah, and they considered India as their motherland. He asked Muslims to unite against those who were questioning their patriotism.

The political atmosphere in UP is bound to witness more heat as assembly polls approach nearer. Yogi Adityanath is a no-nonsense politician. Throughout his four and a half years tenure as chief minister of UP, he not only acted fast on major development projects, but also took exemplary action against all criminals and mafia gangs who were earlier being patronized by politicians. Criminals in UP have started fearing him.

Yogi’s government confiscated ill-gotten properties of criminal mafia gang leaders like Mukhtar Ansari and Atiq Ahmed, who used to strike fear in the hearts of people of eastern UP. Since the day he took charge on March 19, 2017, Yogi Adityanath has been working on his mission to wipe out ‘mafia culture’. Illegal assets worth more than Rs 1000 crore belonging to more than 40 mafia leaders, including Mukhtar Ansari, Atiq Ahmed, Vijay Mishra, Sundar Bharati have been confiscated. Cases against nearly 800 gangsters and their close associated have been registered.

Yogi’s open warning to Owaisi over any attempt to create communal tension over CAA should be seen in this context. SP chief Akhilesh Yadav had alleged that Owaisi was working as ‘B team’ of BJP in UP, but on Tuesday, Yogi clearly said, Owaisi is working as an agent of Samajwadi Party.

I personally feel, Owaisi is not working as any party’s A team or B team. His entry into UP politics has caused concern in Akhilesh Yadav’s camp because he can cause a severe dent into Muslim vote bank.

Most of the parties in UP, except BJP, have been projecting themselves as protectors of Muslims, but it is Owaisi who publicly punctures the claims of such parties. How can Rahul Gandhi tell Muslim voters that his party is running a coalition government with Shiv Sena in Maharashtra?

Owaisi is telling UP voters that it was BSP supremo Mayawati who ruled UP twice with BJP as its coalition partner. How can Akhilesh Yadav tell Muslim voters that it was Kalyan Singh who campaigned for SP during the 2009 Lok Sabha elections, and his son Rajveer Singh had joined the Samajwadi Party? It is, in this backdrop, that Owaisi is moving around in UP, claiming that he is the sole protector of Muslims.

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राजनीतिक मक़सद के कारण धरना खत्म नहीं कर रहे किसान

akb fullप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब शुक्रवार को तीनों कृषि कानूनों का वापस लेने का ऐलान किया तब यह उम्मीद की जा रही थी कि किसान एक साल से ज्यादा समय से चल रहे अपने आंदोलन को खत्म कर देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब लोगों के मन में यह सवाल है कि आखिर संयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं को क्या चाहिए? इनका असली उद्देश्य क्या है?

पिछले साल भर के दौरान ये किसान नेता इस बात का वादा कर रहे थे कि सरकार नए कृषि कानूनों को वापस ले, फिर हम घर चले जाएंगे। लेकिन अब वे आपने वादे से पीछे हटते दिख रहे हैं। अब ये किसान नेता न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गारंटी के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। इनका कहना है कि संसद द्वारा कृषि कानूनों को निरस्त करने और एमएसपी पर कानून बनने के बाद ही दिल्ली के बॉर्डर से संयुक्त किसान मोर्चे के टेंट, ट्रैक्टर और ट्रॉली हटेंगी और किसान धरना स्थल से वापस लौटेंगे। लेकिन सवाल ये है कि अगर सरकार किसानों की यह मांग भी मान ले तो क्या आंदोलन खत्म हो जाएगा?

अभी तक इस बात की कोई गारंटी नहीं कि है अगर एमएसपी गारंटी पर कानून पास हो गया तो किसान धरना स्थल से हट जाएंगे। इस बात को भी समझने की जरूरत है कि क्या किसानों की एमएसपी गांरटी देने की मांग को मान पाना सरकार के लिए संभव है? देश की अर्थव्यवस्था पर इसके असर को समझना चाहिए। किसान नेता यह अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी यह मांग पूरी नहीं होनेवाली है और वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे।

पिछले एक साल से दिल्ली के तीन मुख्य बॉर्डर आवागमन के लिए बंद हैं। यहां संयुक्त किसान मोर्चा के तंबू गड़े हैं और ट्रैक्टर से सड़कें ब्लॉक हैं। ज्यादातर किसान नेता पंजाब, यूपी और उत्तराखंड में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक होने के चलते ये किसान नेता इन राज्यों के सियासी माहौल को गर्म कर रहे हैं।

राकेश टिकैत और युद्धवीर सिंह जैसे किसानों नेताओं का फोकस यूपी पर है जबकि गुरनाम सिंह चढ़ूनी और बलवीर सिंह राजेवाल का फोकस पंजाब पर है। सोमवार को टिकैत ने लखनऊ में एक किसान महापंचायत का आयोजन किया। टिकैत ने बार-बार ये साबित करने की कोशिश की कि मोदी सरकार आंदोलन के दबाव में और यूपी-पंजाब में विधानसभा चुनाव के कारण पीछे हटी है।

टिकैत ने कहा कि सरकार ने भले ही कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया है लेकिन इससे किसानों का भला नहीं होगा। किसानों की हालत तभी सुधरेगी जब सरकार किसानों को उनकी फसल के सही दाम की गारंटी दे। उन्होंने कहा कि जब तक एमएसपी गारंटी का कानून नहीं बनता तब तक किसान आंदोलन चलता रहेगा। अब एमएसपी की गारंटी मिलने के बाद भी आंदोलन खत्म हो जाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि अगर सरकार ऐसा कर भी दे तो किसान नेता एमएसपी तय करने के फॉर्मूले पर सवाल उठाएंगे।

सोमवार को ही किसान नेताओं ने अपनी मंशा के संकेत देने शुरू कर दिए। राकेश टैकत ने कहा कि अगर सही फॉर्मूला अपनाया गया होता और फसलों के दाम सही तरीके से बढ़ते तो एक क्विंटल गेहूं के भाव आज 15 हजार रुपये होते। यानी 150 रुपये किलो के भाव किसानों को मिलते!

राकेश टिकैत अब किसान नेता की तरह नहीं बल्कि राजनीतिक दल के नेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह किसानों को उकसाने और भड़काने का काम कर रहे हैं। 15 हजार रुपये प्रति क्विंटल खरीद दर की बात कर रहे हैं लेकिन यह नहीं बताते कि 15 हजार रुपए क्विटंल का भाव उन्होंने किस साइंटिफिक फॉर्मूले से निकाला है। टिकैत ने कहा कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने एमएसपी की गांरटी की मांग करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को एक रिपोर्ट पेश की थी। टिकैत ने कहा कि अब वही रिपोर्ट नरेंद्र मोदी लागू कर दें तो किसान अपना आंदोलन खत्म करके घर चले जाएंगे।

मैंने एमएसपी को लेकर कई रिपोर्ट्स का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अगर कुछ फसलों के लिए सरकार ने एमएसपी की गारंटी दे दी और इसके लिए कानून बनाया तो ये नई मुसीबत को दावत देना होगा। क्योंकि अपने देश में हजारों किस्म की फसलें, फल और सब्जियां पैदा होती हैं। अगर सरकार सिर्फ धान और गेहूं को एमएसपी की गांरटी देगी तो दूसरे किसान भी तो अपनी फसल की कीमत की गारंटी मांगेंगे।

फिलहाल केंद्र सरकार 23 फसलों की एमएसपी तय करती है लेकिन ये कीमत कोई कानूनी गारंटी नहीं है। इसका मतलब यह है कि सरकार जितनी फसल खरीदेगी वो एमएसपी पर ही खरीदेगी लेकिन किसान चाहे तो व्यापारियों, आढ़तियों, राइस और फ्लोर मिल वालों को अपनी फसल आपसी सहमति के आधार पर तय रेट पर बेच सकते हैं। किसान चाहते हैं कि सरकार ये कानून बनाए कि व्यापारी भी एमएसपी से कम रेट पर फसल न खरीद सकें। अगर सरकार ने ये गारंटी दे दी तो व्यापारी किसानों की फसल बाजार से ज्यादा रेट में खरीदेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसके बाद सरकार पर दबाव होगा कि वो किसानों की फसल खरीदे, भले ही जरूरत हो या न हो, भंडारण की क्षमता हो या न हो।

एमएसपी गारंटी का कानून अगर पास हो गया तो फिर सरकार पर किसान की सारी फसल एमएसपी पर खरीदने का दबाव बनाया जाएगा। महाराष्ट्र स्थित शेतकारी संगठन के अध्यक्ष और किसानों के मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल के सदस्य अनिल घनवट का कहना है कि विकसित देशों में भी सरकारें एमएसपी की गारंटी नहीं देती हैं बल्कि सब्सिडी ऑफर करती हैं।

अनिल घनवट का कहना है कि अगर केंद्र सरकार सभी फसलों को एमएसपी पर खरीदना शुरू कर दे तो देश दो साल के अंदर कंगाल हो जाएगा। भंडारण क्षमता की कमी के चलते हर साल लाखों टन धान और गेहूं बर्बाद हो जाते हैं। फिलहाल देश में 48 लाख मीट्रिक टन धान की खपत होती है लेकिन सरकार पहले ही 110 लाख मीट्रिक टन धान खरीद चुकी है। यह कुल खपत से ढ़ाई गुना ज्यादा है।

अगर एमएसपी गारंटी कानून लागू किया गया तो किसान तो अपनी फसल सरकार को बेचकर घर चले जाएंगे लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार के पास इतनी भंडारण क्षमता है? सरकार के पास न तो इन फसलों को रखने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर है, न गोदाम । इसलिए विशेषज्ञ कहते हैं कि एमएसपी की गारंटी से ज्यादा जरूरी है कि इन्फ्रास्ट्रक्टर में निवेश किया जाए। विशेषज्ञ कहते हैं कि पूरी दुनिया में यही होता है कि किसी भी उत्पाद की कीमत बाजार तय करता है। मांग और आपूर्ति के अधार पर कीमत तय होती है। लेकिन किसान नेता कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं।

जब हमारे रिपोर्टर ने विशेषज्ञों की राय के बारे में राकेश टिकैत से बात की तो उन्होंने कहा-‘1967 में तीन बोरे गेहूं में एक तोला सोना आता था। सरकार हमें यह रेट दे दे। किसान और कुछ नहीं मांगेंगे।’ आम आदमी के लिए ये बातें तर्कसंगत लग सकती हैं। बात सही भी है कि जिस हिसाब से दूसरी चीजों की कीमतें बढ़ी उस हिसाब से किसानों की फसल की कीमत नहीं बढ़ी।

लेकिन विशेषज्ञ इसे अलग तरीके से समझाते हैं। उनका कहना है कि 1967 में जिस वक्त तीन बोरे गेहूं में एक तोला सोना आता था उस वक्त हमारे देश में गेहूं का उत्पादन बहुत कम होता था। हमें खाने के लिए गेहूं और चावल विदेशों से मंगाना पड़ता था। आपको याद होगा 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने खाद्यान्न की कमी के कारण दिन में एक वक्त खाने और दूसरे वक्त उपवास रखने की अपील की थी। उस वक्त देश में अनाज की भयंकर कमी आई थी। इसके बाद एमएसपी का कॉन्सेप्ट आया ताकि किसान फसल की पैदावार बढ़ाएं। उस समय एमएसपी को कानून के जरिए नहीं बल्कि एक एग्जक्यूटिव आदेश के जरिए लाया गया था। मकसद सिर्फ इतना था कि किसान ज्यादा से ज्यादा अन्न उपजाएं और सरकार एमएसपी पर उनकी फसल खरीद लेगी।

अब हालात बिल्कुल उल्टे हो गए हैं। देश में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है। अनाज का उत्पादन इतना हो रहा है कि रखने की जगह नहीं है और कोई खरीददार नहीं है। मजे की बात ये है कि राकेश टिकैत, योगेन्द्र यादव, युद्धवीर सिंह, गुरनाम सिंह चढ़ूनी, हन्नान मोल्लाह या फिर बलबीर सिंह राजेवाल जैसे किसान नेता भी इस हकीकत को जानते हैं लेकिन वे किसानों को गुमराह कर रहे हैं। ये लोग कुछ ऐसी शर्तें रख रहे हैं जिसे कोई सरकार पूरा नहीं कर सकती। इसकी वजह ये है कि इन किसान नेताओं को अब किसानों के कल्याण में कोई दिलचस्पी नहीं है। ये किसान नेता आनेवाले विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की पार्टी की हार तय करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

देश का प्रधानमंत्री हाथ जोड़कर ये कहे कि उन्होने ईमानदारी, पवित्र हृदय और सही नीयत से किसानों के हित में कानून बनाए थे लेकिन कुछ किसानों को अपनी बात समझाने में नाकाम रहे इसलिए कानून वापस ले रहे हैं। किसानों को अपना आंदोलन खत्म कर वापस घर लौट जाना चाहिए। इससे ज्यादा साफ और क्या कहा जा सकता है? प्रधानमंत्री ने यह भी माना कि उनकी तपस्या में कोई कमी रह गई होगी जिसके कारण वह सभी किसानों को नए कानूनों के बारे में समझा नहीं सके।

अब ये भी साफ हो गया कि मोदी जिन किसान नेताओं को अपनी बात नहीं समझा पाए वो कभी समझेंगे भी नहीं क्योंकि वो समझना ही नहीं चाहते। कल अगर संयुक्त किसान मोर्चे की एमएसपी गारंटी की मांग भी मान ली जाए तो कहेंगे कि किसानों पर लगे मुकदमे वापस लो। किसानों से मुकदमे वापस हो जाएंगे तो कहेंगे कि प्रदूषण (पराली जलाने) पर बने कानून वापस हों। वो भी हो जाएगा तो कहेंगे बिजली की कीमतों पर बना कानून रद्द हो। वो भी हो जाएगा तो कहेंगे कि सरकार बीज और दूध को लेकर जो कानून बनाएगी उस पर बात हो। यानी कुल मिलाकर सरकार एक मांग मानेगी तो उसके सामने दूसरी मांग रख दी जाएगी लेकिन तंबू नहीं उखड़ेंगे। तंबू दिल्ली के बॉर्डर पर गड़े रहेंगे और किसान नेता विधानसभा चुनावों में बीजेपी के खिलाफ प्रचार करते रहेंगे।

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Political motives behind farmer leaders’ move to continue dharna

akb fullAfter the Prime Minister Narendra Modi announced withdrawal of the three farm laws on Friday, farmers were expected to end their year-long agitation, but this did not happen. People of India are now wondering as to what is the real aim of Samyukta Kisan Morcha, the umbrella forum for agitating farmers.

During the last one year, these farmer leaders had been promising to call off their agitation once the new farm laws are repealed, but now they seem to have gone back on their word. Farmer leaders are now demanding a law to guarantee minimum support prices. These leaders are now saying, only after the farm laws are repealed by Parliament, and the MSP law is enacted, the agitators will leave the dharna sites. The question now is: will the farmer leaders really call off their agitation once this is done?

There is, as of now, no guarantee that the farmers would leave once the MSP guarantee law is passed. One should also understand whether it is feasible on part of the Centre to guarantee minimum support prices to farmers? One should understand the effect it would have on the nation’s economy. The farmer leaders know it very well that this demand is not going to be fulfilled and they would merrily carry on with their agitation.

For the last one year, three major border points of Delhi are practically closed to traffic with farmers pitching their tents along with their tractors. Most of the farmer leaders are busy campaigning in Punjab, UP and Uttarakhand. The political atmosphere in these three states is on the boil as assembly elections are fast approaching.

Farmer leaders like Rakesh Tikait and Yudhvir Singh are focussing on UP, while Gurnam Singh Chadhuni and Balbir Singh Rajewal are focussing on Punjab. Tikait held a Kisan Mahapanchayat in Lucknow on Monday. He tried his best to prove that Prime Minister Modi has bowed to increasing pressure due to elections in Punjab and UP.

Tikait said, the agitation will not end after the repeal of the farm laws and it will continue until and unless farmers get the Centre’s guarantee for ensuring good prices for their produce. The agitation will continue till the MSP guarantee law is enacted, he said. Even if the law is enacted, farmer leaders will raise the manner in which MSP formulas are made.

Already, on Monday, they gave clear indications about their intent. Rakesh Tikait went to the extent of saying that a quintal of wheat should be purchased at Rs 15,000 if a correct formula is adopted. In other words, 100 kg of wheat should be purchased at Rs 15,000, which amounts to a price of Rs 150 per kg, payable to farmers!

Rakesh Tikait is now behaving more like a politician than a farmer leader. He is inciting and misleading the farmers and quoting an outrageous Rs 15,000 per quintal procurement rate. He is unwilling to show any scientific formula on which he arrived at this amount. He said, when Narendra Modi was Gujarat Chief Minister, he had then demanded a guarantee for MSP while submitting his report to the then PM Dr Manmohan Singh. Tikait said, Modi should at least act on his own report.

I have gone through different reports on MSPs, and have come to the conclusion that if the Centre offers guarantee of MSP for certain crops, it will open a Pandora’s box. Thousands of crops, fruits and vegetables are grown by farmers, and if the Centre offers MSP guarantee for wheat and paddy, farmers will demand similar MSP for other produce.

At present, the Centre decides MSP for 23 crops, but there is no legal guarantee. It only implies that the government will pay the MSPs only when it procures these crops, while farmers are free to sell their crops to traders, millers and others at mutually agreed prices. Farmer leaders are demanding Centre’s guarantee, by law, but if traders are unwilling to buy those crops, it will be the responsibility of the government to buy those crops, regardless of the fact that it has storage capacity or financial resources, or not.

Once such a law is passed, farmers will put pressure on the Centre to buy all those crops. Even in developed countries, the governments do not give MSP guarantee, but do offer subsidies, says Anil Ghanwat, president of Maharashtra-based Shetkari Sanghatana, and a member of the Supreme Court appointed panel on farmer issues.

Anil Ghanwat says, if the Centre starts purchasing all crops at MSPs, it will become bankrupt within two years. Every year millions of tonnes of paddy and wheat go waste because of lack of storage capacity. At present, 48 lakh MT paddy is consumed in India, but the government has already procured 110 MT of paddy, that is two and a half times the amount of consumption.

If the MSP guarantee law is enacted, farmers may sell their crops to the government and go home, but where is the storage capacity? That is why, experts are laying stress on building storage infrastructure first, rather than guarantee MSPs. Experts say, it is the market which decides the prices of crops, based on demand and supply, but the farmer leaders are unwilling to listen to reason.

When our reporter told the expert’s view to Rakesh Tikait in Lucknow, he said, “In 1967, three bags of wheat fetched one tola of gold. Let the government give us this rate, we will go home”. For a layman, this may sound logical. Prices of paddy and wheat did not rise at the speed with which prices of other commodities rose, over the decades.

But experts explain this in a different manner. They point out that in 1967, when three bags of wheat fetched a tola of gold, wheat production was very low in India. There was huge shortage of wheat, and India had to import wheat. You may remember, in 1965, the then prime minister Lal Bahadur Shastri had appealed to people to observe fast once every day because of severe food shortage. It was only then that the MSP concept was introduced, to encourage farmers to produce more. At that time the MSP was introduced not through legislation, but through an executive order.

The situation now has undergone a sea change. There is no more shortage of food. There is shortage of space to store the foodgrains, and no buyers. The interesting part is that farmer leaders like Rakesh Tikait, Yogendra Yadav, Gurnam Singh Chadhuni, Yudhvir Singh, Hannan Mollah and Balbir Singh Rajewal know this fact for sure, but are trying to mislead the farmers. They are putting up conditions which no government can accept. The reason: the farmer leaders are no more interested in the welfare of farmers, they are more interested in ensuring the defeat of Narendra Modi’s party in the forthcoming assembly elections.

What more can a Prime Minister do, except appeal to farmers with folded hands and a sincere heart, that he would repeal the farm laws and farmers should now go home? The Prime Minister admits that there might be shortcomings in his ‘tapasya’(efforts) because of which he could not convince all the farmers about the new laws.

Farmer leaders will never understand the sincerity of Modi’s intent, because they do not want to. Even if the MSP guarantee law is enacted, these farmer leaders will again shift their goal posts and come forward with more demands: withdrawal of criminal cases against agitators, withdrawal of ‘parali’(paddy stubble) burning ban order, withdrawal of all power tariff on farmers, new law for fixing prices for seeds and milk, etc. In other words, the demands will go on increasing, but the tents will continue to remain in place. Till then, the farmer leaders will be busy touring the states where elections are going to be held.

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कृषि कानूनों को वापस लेकर मोदी ने कैसे एक झटके में विपक्ष के हमलों की हवा निकाल दी

AKB

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु नानक देव जयंती के दिन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान कर दिया। इन कानूनों को पिछले साल लागू किया गया था। अचानक हुए इस ऐलान ने नरेंद्र मोदी के कद को और बड़ा बना दिया है।

नरेंद्र मोदी ने सिर्फ कानून वापस लेने का ऐलान ही नहीं किया बल्कि हाथ जोड़कर देश से माफी मांगी। उन्होंने किसी गलती के लिए नहीं बल्कि ये कहकर माफी मांगी कि वो अच्छे कानूनों पर भी कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए। नरेन्द्र मोदी को देश के लोगों को समर्थन हासिल है। उनकी सरकार के पास संसद में सवा तीन सौ से ज्यादा सांसदों का समर्थन है और उनकी सरकार को किसी तरह का खतरा नहीं है। किसी तरह का कोई दबाव नहीं है। इसके बावजूद मोदी ने कहा कि वह तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने जा रहे हैं क्योंकि उनकी सरकार किसानों के एक वर्ग को नए कानून के लाभ समझा पाने में विफल रही।

उन्होंने कहा-‘ऐसा लगता है कि हमारी तपस्या में कोई कमी रह गई, क्योंकि हमारे कुछ किसान भाई इन कानूनों को मानने को तैयार नहीं हैं इसलिए हमलागों ने उन तीनों कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है।’ पीएम मोदी ने करीब एक साल से धरने पर बैठे आंदोलनकारी किसानों से घर लौटने की अपील की।

मैंने 40 साल की पत्रकारिता में इंदिरा गांधी से लेकर अब तक की सारी सरकारें देखी है। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ जब प्रधानमंत्री ने बिना किसी लाग लपेट के देश के सामने आकर बिना गलती के माफी मांगी हो, सिर्फ इसलिए माफी मांगी हो कि वह सभी लोगों को कृषि कानून पर सहमत नहीं कर पाए। नरेंद्र मोदी ने यह दिखा दिया कि उन्हें स्टेट्समैन क्यों कहा जाता है। वो दुनिया के सबसे लोकप्रिय राजनेता क्यों हैं। पीएम मोदी को जो कहना था वो उन्होंने 17 मिनट में कहा और फिर से अपने काम में लग गए। लेकिन उनकी इस घोषणा से राजनीतिक जगत में खलबली मच गई।

गांधी परिवार से लेकर शरद पवार, लालू यादव, कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू समेत लगभग सभी राजनीतिक नेताओं ने अपने रिएक्शन दिए। देर शाम किसान मोर्चा संयुक्त मोर्चा ने भी एक बयान जारी कर पीएम की घोषणा का स्वागत किया लेकिन कहा कि जबतक संसद में इन कृषि कानूनों को निरस्त नहीं किया जाता है तब तक आंदोलन जारी रहेगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में राकेश टिकैत, शिव कुमार शर्मा कक्काजी, दर्शन सिंह, गुरनाम सिंह चढ़ूनी और बलबीर सिंह राजेवाल जैसे किसान नेता क्या कदम उठाते हैं। साथ ही इस फैसले का असर यूपी, पंजाब, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में होनेवाले चुनावों पर क्या पड़ता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा।

अब इससे बड़ी बात क्या होगी कि देश का प्रधानमंत्री जनता के सामने आकर ये कहे कि उसने नेक नीयत और पवित्र हृदय और पूरी ईमानदारी से किसानों के हित के लिए कानून बनाया लेकिन कुछ किसान इससे सहमत नहीं हैं और उनकी सरकार इन्हें नहीं समझा पाई है, इसलिए कानूनों को वापस ले रहा हूं। ये उनके बड़े दिल को दर्शाता है। मुझे याद है,बहुत पुरानी बात नहीं है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने अपने सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील साइन की थी। वामपंथी दल तो संसद में मनमोहन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ले आए थे लेकिन मनमोहन सिंह ना पीछे हटे और ना माफी मांगी। हमारे पूर्व प्रधानमंत्रियों के ऐसे कई उदाहरण हैं।

लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा नहीं किया। उनकी सरकार ने किसान नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत की। उनकी जरूरतों के मुताबिक कानून में संशोधन की पेशकश भी की, यहां तक कि कानूनों को लागू होने से भी रोके रखा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक्सपर्ट कमेटी द्वारा इस कानून की समीक्षा को लेकर भी सहमति जताई और अंत में यह कहकर इन कानूनों को वापस लेने का फैसला किया कि सरकार किसानों के एक वर्ग को समझा नहीं पाई। पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें जिस दिन से जिम्मेदारी मिली उस दिन से पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ किसानों की भलाई के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नए कानून इसलिए बनाए क्योंकि वर्षों से कृषि विशेषज्ञों और किसानों की ओर से जरूरी सुधार लाने की मांग की जा रही थी।

मोदी ने कहा, उनकी सरकार ने छोटे और सीमांत किसान जो देश के किसान वर्ग का 80 फीसदी हिस्सा हैं, के लिए कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं लागू की। देश में 10 करोड़ से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान हैं जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उन्होंने कहा कि इन छोटे किसानों को बीज, मार्केटिंग, फसल बीमा और आर्थिक सहायता मुहैया कराई गई है।

यह एक तथ्य है कि मोदी सरकार ने पिछले सात वर्षों में किसानों के कल्याण के लिए काफी कुछ किया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत 1 लाख 62 हजार करोड़ रुपए सीधे देशभर के किसानों के खाते में ट्रांसफर किए गए। करीब1 हजार मंडियों को ई-नैम (e-NAM ) के तहत जोड़ा गया। अनाज के भंडारण के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर पर एक लाख करोड़ रुपए खर्च किया। क्रॉप लोन, माइक्रो-इरीगेशन, किसान क्रेडिट कार्ड, सॉइल हेल्थ कार्ड और फसल बीमा जैसी तमाम योजनाएं नरेन्द्र मोदी की सरकार ने शुरू की। उन्होंने कहा कि एमएसपी को और ज्यादा असरदार और पारदर्शी बनाने के लिए जल्द ही एक कमेटी बनाई जाएगी। ये कमेटी एमएसपी के साथ-साथ जीरो बजट खेती, नेचुरल खेती और फसल के पैटर्न को वैज्ञानिक तरीके से बदलने पर विचार विमर्श करेगी।

नरेन्द्र मोदी ने कृषि कानूनों को वापस लेकर बड़ा दिल दिखाया। उन्होंने किसानों से कहा कि आपकी भलाई के लिए और ज्यादा मेहनत करूंगा। अगर आप देश के सबसे बड़े नेता हैं तो आपकी सोच भी सबसे बड़ी होनी चाहिए। नरेन्द्र मोदी की बात को सिर्फ किसानों से जुड़े कानून की वापसी तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। मोदी ने जो किया वह एक जवाब है उन सब लोगों को जो कहते थे कि मोदी को अंहकार है। मोदी का ईगो बहुत बड़ा है। जिस प्रधानमंत्री को अहंकार हो वो टीवी पर आकर पूरे देश के सामने बिना किसी लाग लपेट और बिना किसी गलती के हाथ जोड़कर माफी नहीं मांगता।

बिना किसी कसूर के क्षमायाचना करने के लिए बहुत हिम्मत और बड़ा जिगर चाहिए। मुझे लगता है आज देश के किसी और शीर्ष नेता में ना इतनी हिम्मत है ना किसी के पास इतना बड़ा दिल है। नरेन्द्र मोदी देश के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। संसद में उनके पास पूर्ण बहुमत और कृषि सुधारों को लागू करने के लिए कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति है। वह चाहते तो अपनी जिद पर अड़े रह सकते थे लेकिन मोदी ने साल भर से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे किसानों की भावनाओं का ख्याल किया और उनका विश्वास जीतने के लिए गुरुपर्व का दिन चुना। मोदी ने गुरू नानक देव जी के बताए रास्ते का अनुसरण किया जिन्होंने अपने अनुयायियों को शांति और भाईचारे का अर्थ सिखाया।

यह न किसी की हार है और न किसी की जीत है। पीएम मोदी ने तो बड़ा दिल दिखाया लेकिन किसान मोर्चे के नेताओं ने देश के प्रधानमंत्री की इस भावना का सम्मान नहीं किया। उन्होंने अपनी जीत का ‘जश्न’ तो मनाया लेकिन आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तब तक धरने पर बैठे रहेंगे जब तक संसद तीनों कृषि कानूनों को निरस्त नहीं कर देती और एमएसपी की गारंटी देने वाला एक नया कानून नहीं लाया जाता है। सबसे आपत्तिजनक टिप्पणी बीकेयू नेता राकेश टिकैत की ओर से आई। राकेश टिकैत ने कहा- ‘क्या वह किम जोंग-उन हैं कि जैसे ही वह टीवी पर घोषणा करेंगे, कानूनों को निरस्त कर दिया जाएगा?’

टिकैत की टिप्पणी पर गौर फरमाते हुए जरा सोचिए, जिस नेता के साथ 139 करोड़ लोगों का समर्थन है, जो पूर्ण बहुमत की सरकार का प्रधान और दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का मुखिया है, वो हाथ जोड़कर विनम्रता के साथ कानून वापस लेने की बात कर रहा है और राकेश टिकैत उसकी तुलना नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग से कर रहे हैं। ये लोकतन्त्र और प्रधानमंत्री की विनम्रता का अपमान है। राकेश टिकैत के रुख से साफ है कि इस तरह के किसान नेता यही चाहते हैं कि देश में माहौल खराब हो। उनकी दुकान चलती रहे। ऐसे नेता किसानों के कल्याण के बजाय क्षुद्र राजनीति में ज्यादा रुचि रखते हैं।

टिकैत ने जिस अंदाज में बात की वह उनका हल्कापन दिखाता है। यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा बेतुका बयान दिया है। टी20 वर्ल्ड कप में जब भारत पाकिस्तान से हार गया तो टिकैत ने कैमरे के सामने आकर कहा कि यह मैच मोदी सरकार ने हराया जिससे देश को हिंदू-मुसलमान में बांटा जा सके। अगर किसी ने टिकैत से अफगानिस्तान के संकट के बारे में पूछ होता तो शायद वो कहते कि किसान आंदोलन की तरफ से ध्यान बंटाने के लिए तालिबान को भी मोदी ही सत्ता में लेकर आए। इसलिए ऐसी सोच का आप कुछ नहीं कर सकते। आप टिकैत और उन जैसे लोगों से बेहतर की उम्मीद नहीं कर सकते।

पीएम मोदी ने जैसे ही शुक्रवार को टीवी पर कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया तब से राकेश टिकैत समेत तमाम दूसरे किसान नेता सकते में हैं। उन्हें कतई उम्मीद नहीं थी कि मोदी कृषि कानूनों को वापस लेंगे। सच तो ये है कि अगर ये आंदोलन खत्म हो गया तो इनमें से कई नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। इसीलिए मुझे लगता है कि अब सरकार एमएसपी का कानून ले आए, बिजली से जुड़े कानून में बदलाव कर दे और संयुक्त किसान मोर्चे की सारी मांगें मान ले तब भी संयुक्त किसान मोर्चे के नेता आंदोलन वापस नहीं लेंगे। ये किसान नेता मोदी को धन्यवाद देने के बजाए मोदी पर सवाल उठा रहे हैं, आंदोलन को आगे बढ़ाने पर अड़े हैं। वहीं दूसरी ओर प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह और शरद पवार जैसे अनुभवी विपक्षी नेताओं ने पीएम मोदी को धन्यवाद दिया।

कांग्रेस, एसपी, बीएसपी और अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि कृषि कानूनों को वापस लेने के पीएम मोदी के फैसले ने इन पार्टियों को झकझोर दिया है, जो आनेवाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी पर हमले शुरू करने की योजना बना रहे थे। लेकिन मोदी के इस फैसले से विपक्षी दलों को बड़ा झटका लगा है। ये नेता ये कह सकते हैं कि मोदी ने कानूनों को वापस इसलिए लिया क्योंकि उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार का डर था। जबकि सच्चाई इसके विपरीत यह है कि तमाम विपक्षी दल किसी बड़े मुद्दे के अभाव में आनेवाले चुनावों में अपनी हार देख रहे हैं।

प्रियंका गांधी, मायावती, असदुद्दीन औवैसी और अखिलेश यादव कह रहे हैं कि मोदी ने यूपी के चुनाव को देखते हुए फैसला किया। अगर ऐसा है भी तो इसमें गलत क्या है? कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी भी तो जीतने के लिए मेहनत कर रहे हैं। बीजेपी भी अपनी जीत की रणनीति बनाकर उसके तहत काम करे और फैसले ले तो इसमें बुरा क्या है? पंजाब में कांग्रेस की सरकार ने चुनाव से पहले बिजली के रेट कम किए और पुराने बिल माफ कर दिए। ये फैसले भी तो चुनाव को देखकर ही लिए गए। यह भी गलत नहीं है।

दरअसल, मायावती और अखिलेश की परेशानी की असली वजह दूसरी है। इन पार्टियों को लगता था कि पश्चिम उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में मुस्लिम वोटों का धुव्रीकरण होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन को जाटों का अच्छा समर्थन मिल रहा था। जाटों को बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है और पिछले चुनाव में पश्चिमी यूपी की 136 में से 103 सीटें बीजेपी ने जीती थी। मायावती और अखिलेश को लग रहा था कि इस बार जाट वोट बीजेपी से दूर होगा और इसका फायदा उन्हें मिलेगा। लेकिन मोदी ने एक ही झटके में सारा खेल पलट दिया।

शुक्रवार की सुबह कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर अपने विरोधियों को टेंशन में डालकर मोदी काम में लग गए हैं। कहा ये जा रहा था कि कृषि कानूनों से सबसे ज्यादा नाराजगी पश्चिम उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में है और मोदी कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान करने के बाद सीधे बुंदेलखंड पहुंच गए। यहां उन्होंने किसानों की दुर्दशा के लिए ‘परिवारवादी’ दलों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कांग्रेस, एसपी और बीएसपी का नाम लिए बगैर बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाके में पानी सप्लाई नहीं करने का आरोप लगाया। पीएम मोदी रानी लक्ष्मी बाई के जन्मदिन के मौके पर झांसी के किले भी गए। इसी किले से रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया था। इस बार मोदी ने सियासी जंग का ऐलान कर दिया।

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How Modi, by repealing farm laws, has taken the wind out of the sails of opposition parties

AKB

On the day of Guru Nanak Dev Jayanati, Prime Minister Narendra Modi took the opportunity to announce repeal of all the three farm laws that were enacted last year. By making this sudden announcement, Modi enhanced his stature as a statesman.

With folded hands, he apologized to the people of India, not for committing a mistake, but for his government’s inability to convince a section of farmers about the advantages of the farm laws. Modi has the people of India behind him, his government has the support of more than 325 members in Parliament, there was no danger to his government, nor any pressure, and yet, Modi said he was going to get the farm laws repealed because his government failed to convince the farmers.

“It appears there might be some shortcomings in our ‘tapasya’ (labour), because some of our farmer friends are unwilling to accept these laws, that is why we have decided to repeal them”, he said. Modi appealed to the agitating farmers who has been sitting on dharna for nearly a year, to return home.

In my 40 years of experience in journalism, I have seen many governments, including that of Indira Gandhi, but never witnessed a prime minister like Modi, who did not hesitate to humbly apologize to the people, for no mistakes that he had committed. Modi showed to the people why he is the most popular political leader and statesman on the planet. He spoke for 17 minutes and went to his routine work, but his announcement caused tremors in the political space.

There were reactions from almost all political leaders, ranging from the Gandhis to Sharad Pawar, Lalu Yadav, Capt. Amarinder Singh, Navjot Sidhu and others. Late in the evening, the farmers’ front Samyukta Kisan Morcha issued a statement welcoming the PM’s announcement but said the agitation will continue till the farms laws are finally repealed in Parliament. It will now be interesting to watch how farm leaders like Rakesh Tikait, Shiv Kumar Sharma Kakkaji, Darshan Singh, Gurnam Singh Chaduni and Balbir Singh Rajewal will respond in the coming days. It will also be interesting to watch the effects of this announcement on forthcoming polls in UP, Punjab, Uttarakhand and other states.

For a prime minister to come and tell his people that he had made the farm laws with “good intent, utmost sincerity and with a clear heart”, and then announce that he was repealing the three laws because his government failed to convince a section of farmers, shows his large-heartedness. I remember how the then Prime Minister Dr Manmohan Singh stuck to his stand on India-US nuclear deal despite strong opposition from his Left allies, who had brought a no-confidence motion against him in Parliament. Dr Manmohan Singh did not change his stand nor did he offer apology. There are many such examples of our former prime ministers.

Modi did not follow this line. His government held several rounds of talks with farmer leaders, offered to amend the laws to suit their requirements, even suspended the implementation of the laws, agreed to a Supreme Court appointed experts committee to re-examine the laws, and, at the end, decided to repeal them by saying it could not convince a section of farmers. On Friday, Modi said, he wanted farming to be profitable for the agriculturists and wanted to improve the conditions of farmers. He said, he framed the new laws because, for years, there had been demands from farm experts and farmers for bringing much-needed reforms.

Modi said, his government has implemented many welfare schemes for the benefit of small and marginal farmers, who constitute 80 per cent of India’s farming community. There are more than 10 crore small and marginal farmers who have land holdings of less than two hectares. Seeds, marketing, crop insurance and monetary help have been provided to these small farmers, he said.

It is a fact that Modi government has done a lot for the welfare of farmers in the last seven years. Rs 1.62 lakh crore money was sent directly to the bank accounts of farmers across India under Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi Yojana. Nearly 1,000 agriculture marketing centres (mandis) have been connected through e-NAM (electronic National Agricultural Market), Rs 1 lakh crore was spent on foodgrains storage, crop loan, micro-irrigation, kisan credit cards, soil health cards and crop insurance schemes have been implemented. He promised to set up an experts committee for transparent fixing of minimum support prices. He also promised to introduce zero budget natural farming and scientifically change crop patterns.

Whatever Modi as PM did on Friday (by repealing farm laws) should not be seen in isolation. In his own inimitable style, he effectively replied to those who were alleging that Modi was egotist and arrogant. An egotistic prime minister will never come before the nation and offer unconditional ‘apology’ with folded hands, for not being able to convince a section of farmers, particularly when he committed no mistakes.

This requires large heartedness and courage, which, I think, none of the leading politicians in India presently have. Modi is an elected prime minister, commanding a clear majority in Parliament. He has the Constitutional power to frame laws for ushering in agricultural reforms. Had he wanted, he could have stuck to his stand and refused to yield. But a statesman like Modi, who has grown from humble roots, know the difficulties that farmers went through while sitting on dharna for more than a year, on the borders of Delhi, braving summer and harsh winter. He respected the sentiments of Indian farmers and selected the sacred day of Guru Nanak Dev Jayanti to announce that he was repealing the farm laws. He followed the path of Guru Nanak, who taught his followers the meaning of peace and brotherhood.

Modi displayed his large heartedness, but the farmer leaders, while celebrating their ‘victory’ refused to call off their agitation. They said, they would continue to sit on dharna till Parliament repeals the three farm laws, and a new law to give statutory guarantee for minimum support prices is brought. The most objectionable comment came from BKU leader Rakesh Tikait who said, “is he Kim Jong-un that the laws will be repealed as soon as he makes the announcement on TV?”

Just notice the sheer arrogance in Tikait’s remark. Modi is an elected leader who represents 139 crore Indians and is the leader of the world’s most populous democracy. To compare Modi with the North Korean dictator is an outrageous insult to Indian democracy. It is an insult to the Prime Minister’s sense of humility. Farmer leaders like Tikait want disorder and anarchy in India. Such leaders are more interested in petty politics rather than the welfare of farmers.

It is not the first time that Rakesh Tikait has made such a ludicrous statement. When India lost to Pakistan in T20 World Cup, Tikait said in front of TV cameras that it was Modi who caused Team India’s defeat, so that Hindus and Muslims could be polarized. Had any reporter asked him about Afghanistan, Tikait would have replied that it was Modi who brought in the Taliban to power in order to divert people’s attention from farmers’ agitation. You cannot expect better from Tikait and his ilk.

All the farmer leaders, including Tikait, were shocked on Friday morning when Modi suddenly announced repeal of the three laws. It has taken the wind out of their sails. What I feel is: even if the government brings statutory MSP law, effects changes in electricity law, or accepts all the other demands of farmers leaders, they are not going to withdraw their agitation. Instead of thanking Modi for his large heartedness, they are now adamant about carrying on with the agitation. On the other hand, experienced political leaders like Sharad Pawar, Capt Amarinder Singh and Parkash Singh Badal have thanked Modi for repealing the farm laws.

Going through the reactions of Congress, SP, BSP and other leaders, it is clear that Modi’s sudden decision to repeal the farm laws has shocked these parties, which were planning to launch attacks on BJP during the forthcoming assembly polls. It has taken the wind out of their sails. These leaders may well say that Modi repealed the laws because he feared BJP’s defeat in the forthcoming assembly polls. The fact is the opposite: these parties are now staring at defeat in the forthcoming polls, in the absence of a single big issue.

Priyanka Gandhi, Mayawati, Asaduddin Owaisi and Akhilesh Yadav claimed that Modi took this step because of UP polls. If that is so, what is wrong in that? There is nothing wrong if the BJP changes and reformulate its strategy. In Punjab, the Congress government slashed power tariff and condoned all electricity arrears in view of forthcoming polls.

In reality, both the SP and BSP expected polarization of Muslim votes in western UP and Purvanchal. The farmer leaders were getting good support from Jat voters in western UP. Most of the voters earlier used to be BJP supporters. BJP had won 103 out of 136 assembly seats in western UP during the last elections. Both Akhilesh Yadav and Mayawati were hoping to get support from Jat voters this time, but, with a single strike, Modi has put paid to all such ambitions.

Modi has thus changed the emerging political game in western UP by repealing the farm laws. The political wind that was blowing in UP will now change after Modi’s announcement. The opposition parties are now confused and are in a quandary.

After putting the opposition on the defensive by making his Friday morning announcement, Modi went to Bundelkhand where he lashed out at “parivarwadi” (pro-dynasty) parties for ignoring the plight of farmers. He blamed the Congress, SP and BSP, without naming them, for not ensuring water supply in the dry region of Bundelkhand. Modi also went to the famous Jhansi fort, from where Rani Laxmibai had sounded the war bugle against the British. This time, it was Modi sounding the war bugle for the forthcoming elections.

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