Rajat Sharma

My Opinion

CBSE : बिना ट्रायल के नया सिस्टम क्यों लागू हुआ?

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CBSE को फिर सवालों का सामना करना पड़ा. CBSE और शिक्षा मंत्री ने ऐलान किया था कि बारहवीं का इम्तिहान देने वाले छात्रों की कॉपी का री-इवैल्युएशन प्रॉसेस 1 जून से शुरू होगा. लेकिन पहले ही दिन वेबसाइट जवाब दे गई. दूसरे दिन, आज 2 जून को वेबसाइट चालू हुई.

   CBSE ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि वेबसाइट में कुछ तकनीकी दिक़्क़तें थीं. वेबसाइट चालू होते ही छात्र अपनी कॉपी री-चेक कराने के लिए एप्लाई कर पाएंगे.

  इससे पहले  CBSE ने 22 मई से री-इवैल्युएशन की वेबसाइट  ओपन की थी लेकिन जब चार लाख से ज़्यादा छात्रों ने अपनी स्कैन्ड answer-sheets मांगने के लिए एप्लाई किया तो वेबसाइट बैठ गई. बहुत से छात्र फीस का भुगतान नहीं कर पाये.

   CBSE ने 1 जून से revamped वेबसाइट शुरू करने का भरोसा दिया था लेकिन पहले ही दिन CBSE अपने वादे पर खरी नहीं उतरी.

  CBSE के ऑनस्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर नए सवाल उठे. आरोप लगा कि बच्चों की कॉपी को मोबाइल से स्कैन किया गया था, इसी वजह से कॉपी धुंधली नज़र आ रही थीं. उन पर क्लिप्स के निशान थे. ये गड़बड़ी OSM का ठेका लेने वाली कंपनी Co-empt की तरफ़ से हुई थी.

   वहीं CBSE ने OSM के लिए answer sheets को जिस पोर्टल पर अपलोड किया था उसको हैक करके छात्रों की कॉपी को पब्लिक डोमेन में डाला गया.

   एथिकल हैकर्स ने कहा कि CBSE ने वेबसाइट सिक्योर करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये. उसी वजह से बच्चों की कॉपी पब्लिक डोमेन में आ गई. ये छात्रों की निजता की सुरक्षा में बड़ी खामी है.

   CBSE ने इस मामले में भी अपनी ग़लती मान ली है और सिस्टम को सुधारने का वादा किया है.

  इसके अलावा CBSE OSM का ठेका लेने वाली कंपनी Co-empt के ऊपर भारी जुर्माना लगाने और भविष्य में उसे ठेका न देने जैसे कड़े क़दम उठाने पर भी विचार कर रही है.

   CBSE ने डिजिटल सिस्टम लागू तो किया था छात्रों की भलाई के लिए, Re-evaluation को मजबूत बनाने के लिए लेकिन इसे बिना पूरी तरह टेस्टिंग के operationalise कर दिया गया इसलिए लेने के देने पड़ गए.

    Re-evaluation system लागू करने से पहले चुनिंदा विषयों में  pilot project  कराये जाने चाहिए थे, फिर बड़े पैमाने पर dry run होना चाहिए था. कम से कम 6 महीने का trial run होता तो बेहतर होता. ये नहीं हुआ और पूरा सिस्टम अपने ही बोझ तले दब गया.

  Re-evaluation का सिस्टम बुरा नहीं है, इसे लागू करने में जो सावधानी बरती जानी चाहिए थी, वो नहीं बरती गई, इसलिए छात्रों को इतनी परेशानी हुई.

बंगाल : दीदी तो ठीक हैं, पर दादा ने TMC को डुबाया

बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी  तृणमूल कांग्रेस वस्तुत: टूट चुकी है. तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बगावत कर दी है. उनका आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने 13 विधायकों के फर्जी दस्तखत करके विपक्ष के नेता पद के लिए विधानसभा के अध्यक्ष को चिट्ठी दी थी.

   अब इस मामले की जांच CID कर रही है, CID अभिषेक बनर्जी से पूछताछ करने उनके घर पहुंची लेकिन वो सामने नहीं आए.

  तृणमूल कांग्रेस के विधायकों का दावा है कि जिस मीटिंग में विरोधी दल के नेता के चुनाव का दावा किया गया और जिन विधायकों के साइन वाली चिट्ठी स्पीकर को दी गई, वो MLAs मीटिंग में नहीं थे.

   ममता बनर्जी अभिषेक बनर्जी के बचाव में उतरीं. उन्होंने दो विधायकों को पार्टी से निकाल दिया. ममता ने कहा कि कुछ विधायक और सांसद सरकार के दबाव में, कुछ डर कर, कुछ लालच में पार्टी के खिलाफ बोल रहे हैं, लेकिन वह डरने वाली नहीं हैं.

  बागी तृणमूल विधायकों ने कहा कि ममता ईमानदार हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी ने पार्टी को पर्सनल प्रॉपर्टी समझ लिया है वह सांसदों और विधायकों के साथ घर के नौकरों जैसा बर्ताव करते हैं, अभिषेक के कर्मों के कारण ही पार्टी की लुटिया डूबी है.

     ममता ने कहा कि जो लोग आज बगावती तेवर दिखा रहे हैं, उन सबके पीछे बीजेपी है, बीजेपी तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश कर रही है, अभिषेक बनर्जी को टारगेट किया जा रहा है लेकिन वो डरने वाली नहीं हैं, न वो मैदान छोड़ेंगी और न ही अभिषेक पीछे हटेंगे.

   लेकिन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस में जो कुछ हो रहा है उससे बीजेपी का कोई लेना देना नहीं है.

   शुभेंदु ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के पापों का घड़ा भर चुका है, अब कानून के मुताबिक पूरा हिसाब होगा.

   रविवार को ममता ने विधायकों की बैठक बुलाई थी, इस मीटिंग में 80 में से सिर्फ 20 विधायक पहुंचे.. 60 MLAs गायब थे. ममता को मीटिंग कैंसिल करनी पड़ी.

    सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर पत्थरों और अंडों से हमला हुआ और वह किसी तरह जान बचा कर निकले. ममता का कहना है कि हमला बीजेपी समर्थकों ने किया.

    अभिषेक बनर्जी से चाहे जितनी नाराजगी हो, उन पर हमला करना, गाली देना, उनके साथ मारपीट करना बिल्कुल गलत है.

   अभिषेक बनर्जी से जनता की जो नाराजगी थी, जनता ने अपने वोट से उन्हें सजा दे दी. लोकतंत्र में गुस्सा जाहिर करने का ये सबसे सही तरीका है, मार-पिटाई करके गुस्सा उतारना जनता के इस फैसले का अपमान है.

    किसी पर भी हाथ उठाने को, धक्का-मुक्की करने को, स्याही फेंकने को सही नहीं ठहराया जा सकता. ये लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, हमारी संस्कृति के विरुद्ध है.

    अच्छा होता कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले की निंदा करते और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को समझाते.

   एक ज़माना था जब ममता बनर्जी के सामने किसी की आवाज़ नहीं निकलती थी. अपनी पार्टी में तो क्या, विरोधी भी कुछ कहने से घबराते थे.

   सरकार बदली, सब एकाएक बदल गया. अब अपनी पार्टी के विधायक बगावत  करने लगे. जगह-जगह तृणमूल के पार्षद पार्टी छोड़ने लगे. ममता ने 80 विधायकों को बुलाया तो 20 आए.

   ममता के लिए ये Shocking है, लेकिन पार्टी छोड़कर जाने वाले कहते हैं कि दीदी तो ठीक हैं, लेकिन दादा ने बहुत डराया और सताया, जो ममता की तारीफ करते हैं, वो अभिषेक बनर्जी को कोसते हैं.

   लेकिन ममता किसी भी हाल में अभिषेक बनर्जी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इसलिए अगर तृणमूल कांग्रेस टूट जाए, पार्टी के विधायक बगावत कर दें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

योगी : गऊ पशु नहीं, माता है

  बिजनौर में योगी आदित्यनाथ ने उन लोगों को जवाब दिया जो गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहे हैं. योगी ने कहा कि हिन्दू गाय को माता मानते हैं, क्या किसी बेटे को मां के साथ अपने रिश्ते का सर्टिफिकेट देने की जरूरत होती है?

      योगी ने कहा कि जो लोग बकरीद के दिन गाय की फोटो लगाकर एक दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे, वही लोग गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने को लेकर ड्रामा कर रहे हैं, इन ढोंगियों पर कोई भरोसा नहीं करेगा, क्योंकि गाय और गंगा को हर हिंदू दिल से अपनी मां मानता है, इसलिए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की कोई जरूरत नहीं है.

      बकरीद से पहले जब बीजेपी शासित राज्यों ने गोहत्या के खिलाफ कानून को सख्ती से लागू करने की बात कही तो जमीयत उलेमा के चीफ मौलाना अरशद मदनी समेत तमाम बड़े बड़े मौलानाओं ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की थी.

   पहली बात तो ये कि कोई राज्य सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु  घोषित नहीं कर सकती, केन्द्र सरकार ये फैसला कर सकती है, लेकिन कुछ राज्यों में आदिवासी समाज इसका विरोध करते हैं.

  केरल में गो-कशी रोकने का कोई क़ानून नहीं है. ओडिशा में 14 साल से ज़्यादा उम्र के बैल के वध की अनुमति है. बंगाल में भी 14 साल से ज़्यादा उम्र की गाय के वध के लिए अनुमति है. असम में सिर्फ़ सार्वजनिक स्थानों पर बीफ खाने या बेचने पर बैन है. तमिलनाडु में 10 साल से ज़्यादा उम्र के बैलों का वध वैध है. नॉर्थ ईस्ट में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिज़ोरम और नगालैंड जैसे राज्यों में गोहत्या पर बैन लगाने वाला कोई क़ानून नहीं है.

    इसलिए इन राज्यों को भरोसे में लिए बगैर केन्द्र सरकार के लिए भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना मुश्किल है.

     मुस्लिम संगठन और मौलाना भी इस बात को जानते हैं, इसीलए बकरीद पर मौलानाओं ने बीजेपी को बैकफुट पर लाने के लिए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की लेकिन योगी ने इन सबके इरादों पर पानी फेर दिया.

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