Rajat Sharma

My Opinion

भावी रेलवे स्टेशन बनेंगे नये भारत के प्रतीक

rajat-sirप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भविष्य के जिन रेलवे स्टेशनों की प्लानिंग की है, उनकी तस्वीरें मंत्रमुग्ध कर देने वाली हैं। अब रेलवे स्टेशन एयरपोर्ट से बेहतर नजर आएंगे। इन स्टेशनों पर यात्रियों के लिए ऐसी सुविधाएं होंगी, जिनकी कल्पना भी हमारे देश में अब तक नहीं की जा सकती थी।

भारतीय रेलवे 10,000 करोड़ रुपये की लागत से नई दिल्ली, मुंबई छत्रपति शिवाजी टर्मिनस और अहमदाबाद रेलवे स्टेशनों की कायापलट करेगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को लंबे समय से लटके हुए इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह प्रस्ताव पहली बार यूपीए सरकार में पेश हुआ था जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री हुआ करते थे।

इन स्टेशनों में रूफ-टॉप प्लाजा, मनोरंजन सुविधाएं, कैफेटेरिया फूड कोर्ट, वेटिंग लाउंज, बच्चों के खेलने की जगह, मनोरंजन स्थल जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध होंगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप (PPP) के ज़रिये इन स्टेशनों के पुनर्विकास के पुराने प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया है। अब इनका पुनर्विकास भारत सरकार के बजट आवंटन से होगा। इन प्रोजेक्ट्स के लिए इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट कंस्ट्रक्शन (EPC) मोड के जरिए टेंडर मंगाए जाएंगे।

नये स्टेशनों में यात्रियों के लिये अधिकाधिक सुविधों पर ज़ोर दिया जायेगा । अश्विनी वैष्णव ने कहा कि अगले 10 दिनों में इन प्रोजेक्टस के लिए टेंडर जारी हो जाएंगे और तब पूरी लागत के बारे में सटीक जानकारी मिल पाएगी। इन तीनों स्टेशनों के पुनर्विकास में ढाई साल से साढे तीन साल लगेंगे। इस काम को 2026 तक पूरा कर लेने का लक्ष्य है। इस बात रक भी ज़ोर रहेगा कि पुर्नविकास कार्य चलते समय इन रेलवे स्टेशनों के आसपास ट्रैफिक की भीड़भाड़ न हो। पर्याप्त पार्किंग सुविधाओं के साथ ट्रैफिक के सहज संचालन के लिए मास्टर प्लान तैयार किया गया है।

इन तीनों रेलवे स्टेशनों के आसपास की सभी सड़कों, मौजूदा इमारतों और बस एवं मेट्रो स्टेशनों को प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में विकसित किया जाएगा। वैष्णव ने कहा कि यात्रियों के आवागमन को आसान बनाने के लिए एलिवेटेड सड़कों का एक नेटवर्क बनाया जाएगा।

अश्विनी वैष्णव ने कहा, सभी तीनों स्टेशनों की डिजाइन में प्लैटफॉर्म्स और रेल पटरियों के ठीक ऊपर एक विशाल ‘रूफ प्लाजा’ बनेगा, जहां फूड कोर्ट, दुकानें, बच्चों के खेलने की जगह और मनोरंजन स्थल होंगे। इससे ये रेलवे स्टेशन आधुनिक एयरपोर्ट जैसे नज़र आयेंगे।

delhi2नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में दो बड़े गुंबद बनेंगे , जिनमें चार मंज़िला रूफ प्लाजा होंगे। इससे 15 एकड़ की अतिरिक्त जगह बनेगी। रूफ प्लाजा रेल पटरियों से 10 मीटर ऊपर होगा । भीड़भाड़ कम रखने के लिए स्टेशन में आगमन और प्रस्थान द्वार बिलकुल अलग अलग होंगे। दोनों गुंबदों के चारों ओर एलिवेटेड रोड का जाल बिछाया जाएगा। यात्री रूफ प्लाजा में अपनी ट्रेनों का इंतजार कर सकेंगे और ज्यों ही ट3म के प्रस्थान की घोषणा होगी, वे एलीवेटर या लिफ्ट के ज़रिए रुफ प्लाज़ा से उतर कर प्लेटफॉर्म पर पहुंच सकेंगे। इसी तरह ट्रेन के स्टेशन पहुंचने के बाद यात्री रूफ प्लाजा से होते हुए स्टेशन से बाहर निकल सकेंगे ।

Mumbaiमुंबई CST के लिए, स्टेशन में दो मंज़िला रूफ प्लाजा होगा और पूरा परिसर करीब साढे पांच एकड़ पर फैला होगा। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की मुख्य इमारत को यूनेस्को ने विरासत घोषित किया है, इसलिये उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इस मुख्य इमारत के आसपास के इलाकों का विकास होगा और लंबी दूरी की ट्रेनों के लिए नया ब्लॉक बनाया जाएगा। प्रतिदिन कई लाख यात्री लोकल ट्रेनों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिये इन दैनिक यात्रियों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

Ahmअहमदाबाद रेलवे स्टेशन के लिए जो डिजाइन बनई है, उसमें मोढेरा सूर्य मंदिर और सूर्य के थीम वाली वास्तुकला से प्रेरित एक विशाल मेहराब होगा। स्टेशन में रेल पटरियों के ठीक ऊपर एक बड़ा रुफ प्लाजा बनेगा। लोग आसानी से स्टेशन पहुंच सकें, या स्टेशन से बाहर निकल सकें, इसके लिए चारों ओर एलिवेटेड सड़कें बनाई जाएंगी। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए स्टेशन के पास एक एम्फीथिएटर बनेगा।

भारत में मुसाफिरों के लिये रेल यात्रा हमेशा एक झंझट वाला काम रहा है। रेलवे स्टेशन तक पहुँचने में, अथवा यात्रा के बाद रेलवे स्टेशन से निकलने में हमेशा दिक्कतें होती थी। ऑटो और टैक्सी वाले यात्रियों से मनमाना किरया वसूलते थे, और पार्किंग एरिया में हमेशा सैकडों गाड़ियों का जमघट होता था । इन तीनों रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास के बाद यात्रियों को अब बिलकुल अलग किस्म का अनुभव होगा। वे ट्रेन का इंतजार करते समय रूफ प्लाजा में टहल सकते हैं, भोजन या नाश्ता कर सकते हैं, उनके बच्चे खेल सकते हैं। यात्रियों को स्टेशन पहुंचती ही प्लैटफॉर्म पर गाड़ियों का इंतज़ार नहीं करना पडेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने रेल यात्रा का चेहरा बदलने का फैसला किया है, ताकि यात्रियों को बढ़िया अनुभव मिल सके। कमर्शियल प्लाजा की तर्ज़ पर रेलवे स्टेशनों को बदला जायेगा, ताकि वे महज रेलवे स्टेशन न रहकर उस शहर की शान बन सके।

नई दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद स्टेशनों के पुनर्विकास के साथ-साथ 199 स्टेशनों की तस्वीरें भी बदली जाएंगी। ये ऐसे स्टेशन हैं, जहां हर साल 50 लाख से ज्यादा यात्री पहुंचते हैं। ये पहले चरण का काम होगा। 37 स्टेशनों पर काम शुरू हो चुका है, जबकि 42 अन्य स्टेशनों के लिए टेंडर मंगाए गए हैं। दूसरे चरण में, ऐसे स्टेशनों को चुना जाएगा जहां 10 लाख से ज्यादा यात्री हर साल पहुंचते हैं।

अपनी कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, रेलवे स्टेशन किसी भी शहर की पहचान होता है। रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास ऐसा होना चाहिए जिससे कि उस शहर के निवासी गर्व महसूस कर सकें। इसके साथ ही उसका बुनियादी ढांचा मजबूत होना चाहिए ताकि वह अगले 50 साल की जरूरतों को पूरा कर सके।

आजादी के 75 साल पूरे हो चुके हैं, पर आज भी स्टेशनों पर रेल मुसाफिरों को तमाम असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। देश के तीनों बड़े रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास की योजना निश्चित रूप से उत्साहजनक है। इन मॉडलों को बनाने में काफी प्लानिंग की गई है। उम्मीद है, अपने नए रंग रूप में ये रेलवे स्टेशन न सिर्फ लाखों यात्रियों को सुविधा प्रदान करेंगे, बल्कि एक नये, बदलते भारत के गौरवपूर्ण प्रतीक के रूप में खड़े होंगे।

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Revamped Railway Stations: To be symbols of a new India.

rajat-sirImages of railway stations of future, planned by Prime Minister Narendra Modi , are mesmerising. Railway stations will now look better than airports. They will have facilities for commuters which, till now, were considered unthinkable in our country.

Indian Railways will revamp the New Delhi, Mumbai Chhatrapati Shivaji Terminus and Ahmedabad railway stations by giving them a futuristic look at a cost of Rs 10,000 crore. The Union Cabinet on Wednesday approved this long-awaited proposal, which had been hanging fire since the days Lalu Prasad Yadav was Railway Minister in UPA government.

The stations will have roof-top plazas, entertainment lounges, playing areas, waiting areas, food courts and recreational facilities. Railway Minister Ashwini Vaishnaw said, the earlier proposal for redeveloping these stations on public-private-partnership (PPP) basis has been discarded, and they will now be redeveloped through budgetary means. Tenders for the projects will be called through Engineering Procurement Construction (EPC) mode.

The stations will be redeveloped with futuristic design, with stress on users’ convenience. The exact breakup of the cost will be available, once the tenders for these projects are floated in the next ten days, Vaishnaw said. The redevelopment of these three stations will take two to three and a half years. The target year is 2026. At the same time, it will be ensured that there are no traffic congestions in and around these railway stations. Master plan has been prepared for smooth movement of traffic, with adequate parking facilities.

All the roads, existing buildings, and bus and metro stations around these three railway stations will be overhauled as part of the projects. There will be a network of elevated roads to ensure smooth movement, Vaishnaw said.

Giving details about the proposed revamp, Vaishnaw said, the designs for all the three stations will include creation of spacious “roof plazas” above the platforms and tracks with all passenger amenities at one place, along with spaces for retail, cafeteria, recreational facilities and play areas for kids. This will give these railway stations an airport-type look.

delhi2The design for revamped New Delhi railway station will have two unique twin domes with four floors of roof plazas creating additional space of about 15 acres. The roof plaza will be 10 metres above the track and there will be complete segregation of arrival and departure to avoid crowding. A network of elevated roads will be built around the two domes. Passengers can wait in the roof plaza area and will come to the platform only to board a train. Similarly, after getting off a train, passengers will exit the station through the roof plaza.

MumbaiFor the Mumbai CST, the station will have two-floor roof plazas and additional space of around 5.5 acres. “the focus will be on smooth traffic flow and maximum convenience for passengers at these stations”, Vaishnaw said. The Chhatrapati Shivaji Terminus, declared a UNESCO heritage, will not be disturbed. Railways will develop the areas around the heritage station, and create a new block for long distance trains. Special focus will be given to deal with the large numbers of daily passengers who use the suburban railways.

AhmFor Ahmedabad railway station, the iconic design will have a huge arch inspired by the Modhera sun temple and sun-themed architecture . The station will have a wide roof plaza above the tracks. Elevated network of roads has been planned around the station for easy traffic movement. There will be an amphitheatre near the station for holding cultural events.

Normally, for passengers, railway travel had always been a cumbersome issue. For reaching a railway station to catch a train, or leaving a railway station after travel had always been problematic, with auto and taxi drivers fleecing the travellers, and hundreds of vehicles clogging the parking areas. After the three railway stations are redeveloped, passengers will get an out-of-the-world feel. They can loiter in the roof plaza, have food or snacks, their kids can play, while waiting for the train. In a nutshell, the passengers will not have to rush to the platform once they reach the station. They can take the escalator to reach the platform once the train departure is announced.

Prime Minister Narendra Modi’s government has decided to change the face of railway travel, so that passengers can get a wholesome experience. Railway stations will be redeveloped on the lines of commercial plazas, so that they can become big urban space in the heart of cities, instead of being mere railway stations.

Along with the redevelopment of New Delhi, Mumbai and Ahmedabad stations, 199 stations, having an annual footfall of over 50 lakhs, will get a makeover in the first phase. Work has already begun on 37 stations, while tenders have been floated for 42 other stations. In the second phase, stations having an annual footfall of more than 10 lakhs will be selected for redevelopment.

At his cabinet meeting, Prime Minister Modi said, a railway station is the identity of a particular city. Railway stations, he said, must be redeveloped so that the residents of the city can take pride. Along with this, the infrastructure should be strong so that it can meet the needs for the next 50 years.

For the last 75 years since Independence, railway travellers had been facing inconvenience because of the shabby facilities that were normally provided at stations. The plans for remodelling the top three new railway stations are surely encouraging. Much planning has gone into creating these models. The redeveloped railway stations will not only provide convenience to millions of passengers, but will stand as proud symbols of a new, changing India.

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PFI पर प्रतिबंध : सही वक़्त पर उठाया गया कदम

AKBदेश में बढ़ रही मजहबी कट्टरता को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने मंगलवार रात को एक बड़ा कदम उठाया। सरकार ने जिहादी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और इससे जुड़े संगठनों पर 5 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया और उन्हें गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ‘अवैध’ घोषित कर दिया।

इससे पहले देशभर में दो चरणों में PFI नेताओं की धरपकड़ हुई थी। मंगलवार को सुबह 3 बजे से 11 बजे तक हुई धरपकड़ में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक, केरल और गुजरात में 300 से ज्यादा PFI कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। उत्तर प्रदेश में मेरठ, बुलंदशहर, लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद से 57 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

मुस्लिम नौजवानों को फिरकापरस्त बनाने, हवाला के जरिये पैसे मंगवाने और आतंकी संगठनों के साथ रिश्ता रखने के आरोपों के कारण वैसे भी पिछले कई महीनों से PFI सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। इस प्रतिबंध के बाद देश भर में बीजेपी और RSS दफ्तरों के बाहर सुरक्षा कड़ी कर दी गई और दिल्ली, मुंबई समेत यूपी के कई शहरों में पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया है।

PFI के जिन सहयोगी संगठनों पर प्रतिबंध लगा है उनमें रिहैब इंडिया फाउंडेशन, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया इमाम काउंसिल, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन, नेशनल विमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पॉवर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन (केरल) के नाम शामिल हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना में आरोप लगाया है कि PFI के कुछ संस्थापक सदस्य ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया’ (SIMI) के नेता हैं और PFI के तार जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) से भी जुड़े हैं। JMB और SIMI दोनों ही प्रतिबंधित संगठन हैं। अधिसूचना में कहा गया कि ‘PFI के इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ संबंधों के भी कई मामले सामने आए हैं।’

मंत्रालय ने कहा, ‘PFI और उसके सहयोगी या मोर्चे देश में असुरक्षा होने की भावना फैलाकर एक समुदाय में कट्टरता बढ़ाने के लिए गुप्त रूप से काम कर रहे हैं, जिसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि PFI के कुछ कार्यकर्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय आतंकवादी संगठनों में शामिल हुए हैं।’

अधिसूचना में कहा गया, ‘PFI कई आपराधिक और आतंकी मामलों में शामिल रहा है और यह देश के संवैधानिक प्राधिकार का अनादर करता है तथा बाह्य स्रोतों से प्राप्त धन और वैचारिक समर्थन के साथ यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।’

सरकारी सूत्रों ने बताया कि उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में PFI नेता मोहम्मद नदीम के पास से इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) बनाने का मैनुअल बरामद किया गया था। यूपी के खदरा में PFI नेता अहमद बेग नदवी के पास से एक और मैनुअल बरामद हुआ था जिसका शीर्षक ‘आसानी से उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करके IED कैसे बनाया जाए’ था।

सूत्रों ने कहा कि तमिलनाडु में SDPI के रामनाड जिला अध्यक्ष बरकतुल्लाह के घर से 2 Lowrance LHR-80 फ्लोटिंग मरीन हैंडहेल्ड VHF/GPS रेडियो और नेविगेटर सेट बरामद किए गए। वहीं, प्रवर्तन निदेशालय ने PFI के अध्यक्ष ओ.एम. अब्दुल सलाम के पास से एक डायरी बरामद की। सलाम के करीबी सहयोगी मोहम्मद इस्माइल ने भारत में ‘गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने के लिए’ एक खौफनाक साजिश के बारे में खुलासा किया था।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, PFI के दो वरिष्ठ नेता पी. कोया और ई.एम. अब्दुल रहमान की अल-कायदा से जुड़े तुर्की के एक संगठन IHH ने खुफिया तौर पर मेजबानी की थी। NIA ने कई ‘आपत्तिजनक दस्तावेज’ भी जब्त किए हैं, जो विदेशों से आतंकी संगठनों की मदद से भारत में इस्लामी निज़ाम कायम करने के PFI के मकसद की ओर इशारा करते हैं।

सूत्रों ने बताया कि PFI के कई वरिष्ठ नेताओं के पास से हथियार और भारी मात्रा में नकदी जब्त की गई है। PFI के ‘मिशन 2047′ (भारत को इस्लामिक स्टेट में बदलने) से संबंधित प्रचार सामग्री और CD, PFI की महाराष्ट्र इकाई के उपाध्यक्ष के पास से जब्त की गईं। यूपी में PFI नेताओं के पास से ISIS, ‘गजवा-ए-हिंद’ (भारत में इस्लामी राज्य) से संबंधित वीडियो वाली पेन ड्राइव जब्त की गई हैं।

भारत के 17 से ज्यादा राज्यों में PFI की मौजूदगी है। सरकारी सूत्रों ने बताया कि PFI के नेता अक्सर अपने कैडर से कहते हैं कि वे हिंसा का रास्ता अपनायें और भारत के सेक्यूलर ताने-बाने को नुकसान पहुंचाएं। पुलिस और NIA ने अब तक अलग अलग राज्यों में PFI और उससे जुड़े संगठनों के खिलाफ 1,300 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज किए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पिछले साल नवंबर में केरल में एक RSS कार्यकर्ता संजीत की हत्या में भी PFI कार्यकर्ताओं का हाथ था।

तमिलनाडु में PFI कार्यकर्ताओं ने 2019 में एक हिंदू नेता वी. रामलिंगम की हत्या कर दी थी। PFI के लोगों ने 2010 में कथित ईशनिंदा के आरोप में केरल में एक प्रोफेसर टीजे जोसेफ का हाथ बेरहमी से काट दिया था। सूत्रों ने बताया कि केरल में PFI ने पदम वन इलाके का इस्तेमाल अपने कैडर को मिलिट्री ट्रेनिंग देने के लिए एक अड्डे के तौर पर कर रहा था।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, कर्नाटक के सीएम बसवराज बोम्मई और बीजेपी के अन्य नेताओं ने प्रतिबंध का स्वागत किया, वहीं AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘मनमाना कदम’ बताया, हालांकि उन्होंने कहा कि वह PFI की सोच से सहमत नहीं हैं। ओवैसी ने कहा, ‘इस तरह का कठोर प्रतिबंध खतरनाक है क्योंकि यह ऐसे किसी भी मुसलमान पर प्रतिबंध है जो अपने मन की बात कहना चाहता है। मैंने यूएपीए कानून का विरोध किया है और मैं हमेशा इस कानून के तहत होने वाली कार्रवाई का विरोध करता रहूंगा ।’

कांग्रेस ने इस मामले में बीच का रास्ता अपनाया। पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने कहा कि उनकी पार्टी सभी प्रकार की सांप्रदायिकता के खिलाफ है, चाहे वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक। उन्होंने ट्वीट किया, ‘कांग्रेस की नीति हमेशा उन सभी विचारधाराओं और संस्थानों से लड़ने की रही है जो हमारे समाज का ध्रुवीकरण करने के लिए धर्म का गलत इस्तेमाल करते हैं, जो धर्म का दुरुपयोग पूर्वाग्रह, नफरत, कट्टरता और हिंसा फैलाने के लिए करते हैं।’ RJD नेता लालू प्रसाद यादव ने कहा, ‘ये लोग बिना मतलब PFI का हौवा खड़ा कर रहे हैं । हिंदू कट्टरपंथ फैलाने वाले RSS पर पहले प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।’

सियासी बयान जगह है, हक़ीक़त ये है कि PFI और उसके सहयोगियों पर प्रतिबंध सही समय पर उठाया गया कदम है। PFI नेताओं की मंशा खतरनाक थी और वे कानून को चकमा देने में काफी माहिर हो चुके थे। PFI नेता और कार्यकर्ता सोशल मीडिया के जरिए नफरत फैला रहे थे और इसके लिए वे अपने संचार तंत्र का तेज़ी से इस्तेमाल कर रहे थे।

सरकार PFI, उसकी पोलिटिकल विंग और स्टूडेंट विंग के खिलाफ कार्रवाई की योजना पिछले कई महीनों से बना रही थी। इसके लिए खुफिया एजेंसियों से मिले इनपुट की मदद ली गई और इस पूरे ऑपरेशन को NIA ने विभिन्न राज्यों की पुलिस की मदद से कोऑर्डिनेट किया। UAPA कानून के तहत गिरफ्तार सभी लोगों को यह बताने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया जाएगा कि उनका PFI और उसके संगठनों से किसी भी तरह का रिश्ता है या नहीं। उन्हें यह साबित करने के लिए भी 30 दिनों का वक्त दिया जाएगा कि उनके घरों का इस्तेमाल आतंकी और हिंसक गतिविधियों के लिए किया गया या नहीं। अगर वे ऐसा नहीं कर पाये, तो उन्हें UAPA कानून के तहत कम से कम 2 साल जेल में बिताने पड़ सकते हैं और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।

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Ban on PFI by Centre is a timely step

AKBIn a major step to root out religious fanaticism, the Government of India on Tuesday banned the radical Popular Front of India (PFI) and its affiliate organisations for a period of five years and declared them ‘unlawful’ under Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA).

This followed the nationwide crackdown on PFI leaders in two phases. On Tuesday, in a nationwide crackdown from 3 am till 11 am, more than 300 PFI activists were rounded up in Delhi, UP, MP, Maharashtra, Assam, Karnataka, Kerala and Gujarat. In UP, 57 activists were arrested from Meerut, Bulandhshar, Lucknow, Kanpur and Ghaziabad.

PFI had been under the radar of security agencies after violent protests took place in several towns, along with charges of radicalizing Muslim youths, money laundering and maintaining links with terror groups. Following the ban, security has been tightened outside BJP and RSS offices across India, and police has been put on high alert in Delhi, Mumbai and several cities of UP.

The PFI affiliates banned, include Rehab India Foundation, Campus Front of India, All India Imams council, National Confederation of Human Rights Organization, National Women’s Front, Junior Front, Empower India Foundation and Rehab Foundation, Kerala.

In its notification, the Home Ministry has alleged that some of PFI’s founding members are the leaders of Students’ Islamic Movement of India (SIMI), and PFI has linkages with Jamaat-ul-Mujahideen Bangldesh, both of which are banned organizations. The notification also said, “There had been a number of instances of international linages of PFI with global terrorist groups like Islamic State of Iraq and Syria (ISIS)”.

The ministry said, “PFI and its associates or affiliates or fronts have been working covertly to increase radicalization of cone community by promoting a sense of insecurity in the country, which is substantiated by the fact that some PFI cadres have joined international terrorist organizations.”

The notification said, “PFI is involved in several criminal and terror cases and shows sheer disrespect towards the constitutional authority of the country, and with funds and ideological support from outside, it has become a major threat to internal security of the country.”

Official sources pointed out Improvised Explosive Device (IED) making manual was seized from PFI leader Mohammed Nadeem in Barabanki, UP, and another manual titled “A short course on how to make IEDs using easily available materials” was seized from PFI leader Ahmed Beg Nadwi in Khadra, UP.

Sources said, two Lowrance LHR-80 floating marine handheld VHF/GPS radio and navigator sets were recovered from the home of Barkatullah, SDPI’s Ramnad district president, in Tamil Nadu, while a diary was recovered by Enforcement Directorate from PFI chairman O.M.A. Salam’s close associate Mohammed Ismail which revealed a sinister plot “to create a civil war like situation” in India.

Official sources also pointed out that two senior PFI leaders P. Koya and E. M. Abdul Rahman were privately hosted by IHH, an Al-Qaeda-linked Turkish charity organisation. NIA has seized several “incriminating documents” which point out to PFI’s aim of establishing an Islamic State in India, with the help of terror outfits from abroad.

Weapons and huge amount of cash were seized from several senior PFI leaders, sources said. Brochures and CDs relating to PFI’s ‘Mission 2047’ (for converting India into an Islamic State) were seized from the Maharshtra unit vice-president of PFI. Pen drives contaiing videos related to ISIS, ‘Gajwa-e-Hind’(Islamic state in India) were seized from PFI leaders in UP.

The 16-year-old PFI has its presence in more than 17 states of India. Official sources said, PFI encourages its cadre to resort to violence and disrupt the secular fabric of India. Over 1,300 criminal cases have been registered by police and NIA against PFI and its front organisations in different states. Sources pointed out that PFI cadres had a hand in the murder of Sanjith, an RSS worker in Kerala in November last year.

In Tamil Nadu, PFI activists had killed a Hindu leader V. Ramalingam for challenging its ‘Dawah’ (religious) activities in 2019. PFI activists had brutally chopped the hand of a professor T. J. Joseph in Kerala for alleged blasphemy in 2010. In Kerala, the Padam forest area was being used by PFI as a site to impart military training to its cadre, sources pointed out.

While UP chief minister Yogi Adityanath, Maharashtra deputy CM Devendra Fadnavis, Karnataka CM Basavaraj Bommai and other BJP leaders welcomed the ban, AIMIM chief Asaduddin Owaisi described it as “draconian”, though he said he did not agree with the approach of PFI. In a series of tweets, Owaisi said, “A draconian ban of this kind is dangerous as it is a ban on any Muslim who wishes to speak his mind. ..I have opposed UAPA and I will always oppose all actions under UAPA.”

The Congress party took a middle line. Jairam Ramesh, the party leader in charge of communication, said, his party was against all forms of communalism, whether minority or majority. “The Congress policy has always been to fight uncompromisingly all ideologies and institutions that abuse religion for polarising our society, that misuse religion to spread prejudice, hate, bigotry and violence”, he tweeted. RJD leader Lalu Prasad Yadav said, “they keep raising the bogey of PFI. It is the RSS, which advocates Hindu extremism, and deserves to be banned first.”

Political remarks notwithstanding, the fact remains that the banning of PFI and its affiliates was a timely move. The designs of PFI leaders were evil and they are past masters in dodging the law. PFI leaders and activists have been spreading hate through social media and their communication network acts at a fast pace.

The crackdown on PFI, its political wing and students’ wing had been planned since several months, with the help of inputs from Intelligence Bureau, and the entire operation was coordinated by NIA with the assistance of state police networks. Under UAPA, all those arrested will be given 15 days’ time to disclose whether they have association with PFI and its outfits. They will also be given 30 days’ time to prove that their place of residence has not been used for terror and violent activities. In the absence of this, they may have to spend at least two years in jail and will also be liable for fine, under the provisions of UAPA.

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गहलोत और गांधी परिवार के बीच क्यों आई दूरी?

AKBराजस्थान कांग्रेस में आज ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ का तीसरा दिन है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट के विधायक अपने-अपने नेताओं के साथ पूरी वफादारी दिखाते हुए वार-पलटवार कर रहे हैं। कांग्रेस के सामने इस वक्त एक बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है।

हाईकमान को तय करना होगा कि पार्टी अध्यक्ष किसे चुना जाए। सोनिया और राहुल गांधी की पहली पसंद अशोक गहलोत का पार्टी अध्यक्ष बनना लगभग तय था, लेकिन अब हाईकमान के सिपहसालार किसी दूसरे विकल्प की तलाश में हैं। सोमवार को मध्य प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज कमलनाथ का नाम सामने आया, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें ‘कोई दिलचस्पी नहीं है।’ अध्यक्ष पद के लिए दिग्विजय सिंह, मुकुल वासनिक और मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम भी उछाले जा रहे हैं।

ऐसी खबरें हैं कि गांधी परिवार अशोक गहलोत से नाराज है क्योंकि रविवार को उनके समर्थक विधायकों ने पूरी दुनिया के सामने ‘बगावत’ कर दी थी। गहलोत के वफादार विधायकों ने न सिर्फ केंद्रीय पर्यवेक्षकों से मिलने से इनकार कर दिया, बल्कि अपना इस्तीफा देने के लिए सीधे स्पीकर के घर पहुंच गए। सीएम पद के लिए सोनिया और राहुल गांधी की पहली पसंद सचिन पायलट थे, लेकिन फिलहाल उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना कम ही नजर आ रही है। 92 विधायक सचिन पायलट के खिलाफ हैं। गहलोत के समर्थकों ने जिस तरह से खुलेआम अपनी राय रखी, उससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि गहलोत यदि चाहें तो मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, और अगर उन्हें हटाने के लिए कोई कदम उठाया गया तो राजस्थान में कांग्रेस की सरकार गिर भी सकती है।

अब सवाल उठता है कि गांधी परिवार पार्टी अध्यक्ष पद के लिये किसे उम्मीदवार बनाएगा? क्या गहलोत और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी? सचिन पायलट का क्या होगा? पार्टी पर्यवेक्षक अजय माकन ने सोमवार की रात को जो बयान दिया उससे साफ है कि संकट काफी बड़ा है। माकन ने कहा, उन्हें और खड़गे को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि ज्यादातर विधायक पर्यवेक्षकों से मिलने से इनकार कर देंगे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में आज तक कभी भी नेता के चुनाव को लेकर कोई प्रस्ताव शर्तों के साथ पारित नहीं हुआ ।

दोनों पर्यवेक्षक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने और उनकी जगह सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के आलाकमान के फरमान पर विधायकों की मुहर लगवाने गए थे, लेकिन गहलोत के वफादार विधायक मिलने ही नहीं आए। इस खेमे की तरफ से साफ संदेश दिया गया कि सचिन पायलट को बतौर मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं करेंगे। पार्टी आलाकमान अब सोच रहा है कि इस फैले हुए रायते को कैसे समेटा जाए। रविवार को जयपुर में जो हुआ, वह कांग्रेस के इतिहास में कभी नहीं हुआ था।

गहलोत के वफादार विधायक मुख्यमंत्री के खासमखास शांति धारीवाल के आवास पर मिले और उन्होंने केंद्रीय पर्यवेक्षकों को अपनी तीन मांगों के बारे में बताया, (1) राजस्थान में गहलोत के उत्तराधिकारी का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का नतीजा आने के बाद तय हो (2) पर्यवेक्षक या ऑब्जर्वर विधायकों से अलग-अलग नहीं बल्कि ग्रुप में बात करें (3) गहलोत का उत्तराधिकारी उन्हीं 102 विधायकों में से हो जो उनके खेमे के हैं।

ये तीनों बातें कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के उस आदेश के खिलाफ थीं जिसे लेकर अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे जयपुर गए थे। सोनिया गांधी का साफ निर्देश था कि पर्यवेक्षक विधायकों से अलग-अलग बात करें और पता लगायें कि वे क्या चाहते हैं, लेकिन गहलोत के वफादार विधायक इसके लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद अजय माकन और खड़गे को खाली हाथ दिल्ली लौटना पड़ा। अजय माकन ने मांग की कि बगावत का नेतृत्व करने वाले दो मंत्रियों, शांति धारीवाल और प्रताप सिंह खाचरियावास के खिलाफ हाईकमान को कार्रवाई करनी चाहिए।

जयपुर में शांति धारीवाल ने अजय माकन के बयान का जवाब दिया। धारीवाल ने कहा, ‘अजय माकन हाईकमान की तरफ से ऑब्जर्वर के तौर पर नहीं, सचिन पायलट के लिए कैन्वेसिंग करने वाले नेता के तौर पर जयपुर आए थे। वह सचिन पायलट के पक्ष में विधायकों का समर्थन इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे थे। हमने कभी अनुशासनहीनता नहीं की। अजय माकन सिर्फ एक लाइन का प्रस्ताव पारित कराना चाहते थे कि विधायकों ने गहलोत के उत्तराधिकारी को चुनने का फैसला सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष पर छोड़ दिया है, लेकिन हमारे विधायक नहीं माने। सोनिया गांधी के फैसले को कोई चुनौती नहीं देगा, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री तो उन्हीं विधायकों में से चुनना होगा जो पार्टी के वफादार हैं, और बगावत करने वालों के साथ नहीं हैं। गद्दारों को इनाम देना सही नहीं होगा। सचिन पायलट या उनके किसी सपोर्टर को मुख्यमंत्री बनाना मंजूर नहीं होगा।’

अशोक गहलोत की जादूगरी ने सोनिया गांधी का प्लान चौपट कर दिया। 48 घंटे में फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट बदल गई। कहां तो कांग्रेस पार्टी नए अध्यक्ष की तलाश कर रही थी, और कहां अब राजस्थान में सरकार बचाने के लाले पड़ रहे हैं। अशोक गहलोत, सोनिया गांधी के तमाम सिपहसालारों से ज्यादा चतुर निकले। पहले वह सोनिया गांधी की आंखों के तारे थे, अब आंख की किरकिरी बन गए। अब खबर यह है कि अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस में नहीं हैं, और कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी के लिए नए सिरे से तलाश शुरू हो गई है।

अब दो बातें तो बिल्कुल साफ हो गई हैं। पहली, राजस्थान में कांग्रेस के अधिकांश विधायक अशोक गहलोत के साथ हैं, और दूसरी, गहलोत के समर्थन में उतरे विधायक अब पार्टी हाईकमान की धमकियों से भी नहीं डर रहे। हाईकमान अगर सचिन पायलट को सीएम बनाने की जिद पर अड़ा तो कांग्रेस टूट सकती है।

अशोक गहलोत खुद खामोश हैं, हालांकि उनकी तरफ से उनके करीबी प्रताप सिंह खाचरियावास, महेश जोशी, शांति धारीवाल और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा बोल रहे हैं, जमकर बयान दे रहे हैं। ये नेता साफ-साफ कह रहे हैं कि होगा वही जो विधायक चाहेंगे। नंबर गेम में गहलोत खेमा साफ तौर पर आगे है। 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के पास 108 विधायक हैं, जिनमें से गहलोत खेमा 92 सदस्यों के समर्थन का दावा कर रहा है। कहा जा रहा है कि सचिन पायलट गुट के पास सिर्फ 6 विधायकों का समर्थन है, जबकि करीब 10 विधायक ऐसे हैं जो वक्त देखकर फैसला लेंगे।

यह गहलोत ही थे जिन्होंने बसपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन जुटाया और अपनी सरकार को अच्छी तरह से चलाया। कांग्रेस हाईकमान के बड़े-बड़े नेताओं के सामने अशोक गहलोत हर मामले में भारी पड़ रहे हैं। यह संभावना बन सकती थी कि आलाकमान खुद गहलोत से इस्तीफा मांग ले, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ता। इसीलिए गहलोत ने अपने सभी समर्थक विधायकों से इस्तीफे की चिटठी लिखवाकर स्पीकर सीपी जोशी के पास भिजवा दी। मतलब अगर गहलोत जाएंगे तो पार्टी के ज्यादातर विधायक भी इस्तीफा दे देंगे।

सबसे बड़ी बात यह है कि कांग्रेस में जो हो रहा है, वह गुपचुप तरीके से नहीं बल्कि खुलेआम हो रहा है। यानी अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी की लीडरशिप को कांग्रेस के नेता खुली चुनौती दे रहे हैं। गहलोत कैंप के विधायक जोश में हैं, जबकि पायलट के समर्थक थोड़े निराश लग रहे हैं।

राजस्थान की बगावत का एक असर तो यह हुआ कि अब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव खुल गया है। रविवार तक यह लग रहा था कि अध्यक्ष के चुनाव में अशोक गहलोत गांधी परिवार के वफादार हैं, सोनिया गांधी के नॉमिनी हैं, इसलिए वही कांग्रेस के अगले अध्यक्ष बनेंगे। लेकिन रविवार को जयपुर में जो हुआ उसके बाद लग रहा है कि गहलोत पार्टी अध्यक्ष पद के लिए शायद नॉमिनेशन ही फाइल न करें। सोमवार की रात कमलनाथ ने सोनिया गांधी से मुलाकात की, लेकिन बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के अध्यक्ष पद में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मैं सोनिया गांधी को नवरात्रि की शुभकामनाएं देने आया था।’

साफ है कि गांधी परिवार को पता ही नहीं चला कि जमीन पर क्या हो रहा है। उन्हें तो यकीन था कि उनके एक इशारे पर राजस्थान का मुख्यमंत्री बदला जा सकता है। MLA क्या चाहते हैं, क्या कहते हैं, इसका कोई मतलब नहीं होता। यही सोचकर जुबानी हुकुमनामा जारी कर दिया गया था कि अशोक गहलोत कांग्रेस के अध्यक्ष बनेंगे और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा।

जो हालात पैदा हुए हैं उनसे साफ पता चलता है कि सोनिया और राहुल गांधी जमीनी हकीकत से कितने दूर हैं। दो दिन पहले तक जो अशोक गहलोत गांधी परिवार के आंखों के तारे थे, रातों रात आंखों की किरकिरी बन गए। गहलोत इतने वफादार थे कि पार्टी उन्हें सौंपी जा रही थी, और जयपुर में उनके समर्थकों ने जो किया उसके बाद पलक झपकते ही उन्हें गद्दार करार दे दिया गया। यह तय करना मुश्किल हो गया है कि कौन वफादार है और कौन गद्दार?

दो साल पहले सचिन पायलट ने बगावत करके पार्टी की नाक में दम किया था, और अब अशोक गहलोत ने अपनी ताकत दिखाकर बता दिया कि वही हाई हैं, वही कमान हैं। हैरानी की बात है कि गांधी परिवार ने पिछले दिनों के अनुभव से कुछ नहीं सीखा।

पंजाब में भी रातों रात सिद्धू को सपना दिखाया, कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाया और चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। नतीजा यह हुआ कि पंजाब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सूबे से पूरी तरह साफ हो गई।

कांग्रेस के पुराने नेताओं को डर है कि अगर राजस्थान के मामले में भी मनमानी करने की कोशिश हुई तो कहीं पंजाब वाला हाल न हो जाए। कांग्रेस में जो हो रहा है उसे देखकर पार्टी के कार्यकर्ता हैरान हैं, परेशान हैं। जिन लोगों ने गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरिंदर सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं को पार्टी छोड़कर जाते देखा है, उन्हें हताशा जरुर हुई होगी। अब वे अशोक गहलोत की तरफ देखने लगे थे। उन्हें लगा था कि अशोक गहलोत पुराने, अनुभवी और वफादार नेता हैं, नैया पार लगाएंगे लेकिन अब वह भी शक के दायरे में आ गए।

कांग्रेस के कुछ नेता अब पूछ रहे हैं कि पार्टी की जो लीडरशिप अपनों को साथ नहीं रख पाई, वह शरद पवार, लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के साथ गठबंधन कैसे बनाएगी?

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Gehlot and the Gandhis: What went wrong?

akb full_frame_74900The ‘Game of Thrones’ in Rajasthan Congress entered the third day today with legislators owing allegiance to both the Ashok Gehlot and Sachin Pilot camps casting aspersions against one another. The Congress Party is now facing a crisis.

The high command will have to decide who should be elected the party president. Rajasthan chief minister Ashok Gehlot, who was the first choice of Sonia and Rahul Gandhi, was almost set to be elected party chief, but now the high command’s advisers are looking for alternatives. On Monday, the name of MP Congress stalwart Kamal Nath cropped up, but he said he was “not interested”. He told reporters, “I have no interest in the Congress president post, I have come to Delhi for Navratri.” Names of Digvijaya Singh, Mukul Wasnik and Mallikarjuna Kharge were also floated for the party chief post on Monday.

Reports say, the Gandhi family is unhappy with Ashok Gehlot because of the ‘rebellion’ by his supporter MLAs on Sunday, when they refused to meet the central observers, and instead went straight to the Speaker’s residence to submit their resignation letters. Sachin Pilot was the first choice of Sonia and Rahul Gandhi for the CM’s post, but presently there appears to be least chances of him being made the chief minister. As many as 92 MLAs are against Sachin Pilot. The manner in which Gehlot loyalists aired their opinions in public, make it quite clear that Gehlot can continue as chief minister, if he wants. And if any move is made to dislodge him, the Congress government in Rajasthan may collapse.

Questions now arise about whom the Gandhi family will prop up as party chief, whether action will be taken against Gehlot and his supporters, and the political fate of Sachin Pilot. Party observer Ajay Maken’s remarks on Monday night make it quite clear that the crisis is serious. Maken said, he and Kharge were not prepared for the situation when majority of the MLAs refused to meet the observers. He added, there has been no past precedent in the Congress of any resolution being passed with conditions.

Both the observers were sent from Delhi to mobilize party MLAs to accept Sachin Pilot as CM and Gehlot as party president, but Gehlot’s loyalists refused to meet them. They conveyed a clear message saying, Sachin Pilot was not acceptable as CM. The party high command is now thinking of how to rein in these dissenters. What happened in Jaipur on Sunday, had never happened in the history of Congress party.

Gehlot loyalist MLAs met in Shanti Dhariwal’s residence and conveyed their three demands to the central observers, (1) Gehlot’s successor be decided only after the party president election is over (2) central observers should not meet the MLAs individually, but in groups, and (3) Gehlot’s successor should be picked only from those MLAs who are his supporters.

All these three demands went against the directive of party interim chief Sonia Gandhi. She had sent both the observers with the directive that they should speak to each MLA separately, but Gehlot loyalists were unwilling to meet the observers individually. Maken and Kharge had to return empty handed. Ajay Maken demanded that the high command must take disciplinary action against two ministers who led the rebellion, Shanti Dhariwal and Pratap Singh Khachriyawas.

In Jaipur, Shanti Dhariwal refuted Ajay Maken’s remarks. Dhariwal said, “Maken had come to Jaipur not as an observer from high command, but as one who was canvassing support for Sachin Pilot. We did not commit indiscipline. Ajay Maken wanted a single line resolution to be adopted entrusting the selection of Gehlot’s successor to the party president, but our MLAs did not agree. Nobody will challenge Sonia Ji, but she would have to choose the CM from those MLAs who are party loyalists, and not from among those who had tried to revolt in the past. It will not be justified to reward the traitors. We cannot accept Sachin Pilot or any of his supporter as CM”.

Ashok Gehlot’s magic has spoiled Sonia Gandhi’s plans. Within a span of 48 hours, the entire script was changed. The party, which was in search of a president, is now trying to save its government in Rajasthan. Gehlot proved to wiser than Sonia Gandhi’s advisers. Gehlot was the Gandhi family’s first choice for party president, but today, he seems to have fallen from grace. Already a search is on to pick somebody to replace Gehlot as the official candidate for party chief post.

Two things are now clear. One, majority of Congress MLAs in Rajasthan are with Ashok Gehlot, and Two, Gehlot loyalist MLAs are no more afraid of threats from party high command. If the high command insists on anointing Sachin Pilot as CM, the party can split.

Ashok Gehlot has maintained silence, but, on his behalf, his close loyalist like Pratap Singh Khachriyawas, Mahesh Joshi, Shanti Dhariwal and state party chief Govind Singh Dotasara are openly giving statements in support of their MLAs. Gehlot camp is clearly ahead in the numbers game. In the 200-member Rajasthan assembly, Congress ha 108 MLAs, out of which Gehlot camp claims the support of 92 members. It is being claimed that Sachin Pilot camp has the support of only six MLAs, while 10 members are reported to be neutral.

It was Gehlot who arranged the support of BSP and independent MLAs and ran his government smoothly. And now Gehlot has proved to be a heavyweight compared to the advisers of Sonia and Rahul Gandhi. To forestall the possibility of the high command seeking the CM’s resignation, Gehlot’s advisers ensured that all supporter MLAs submit their resignations straight to the Speaker C.P.Joshi.

The most interesting part is that, for the first time, the entire drama is taking place in public, and is not shrouded in secrecy. In other words, this is an open challenge to Sonia and Rahul Gandhi’s leadership. Gehlot camp is now upbeat, while Pilot’s supporters are a bit disappointed.

The revolt in Rajasthan has now made the field open for the post of Congress president. Till Sunday morning, it was almost clear that Ashok Gehlot, a known loyalist of Gandhi family, will become the party chief since he was Sonia’s nominee, but after Sunday’s incidents, there is a possibility that Gehlot may not contest for party chief post. Kamal Nath met Sonia Gandhi on Monday night, but after coming out, he said he was not interested in the party chief post. “I had come to extend best wishes to Sonia Gandhi on Navratri”, he said.

It is now clear that the Gandhi family was completely out of touch with what was happening on the ground. The family had believed that the chief minister of Rajasthan would be changed with a single hint from the high command. The views of MLAs were not taken into account. Verbal instruction was given to ensure that Gehlot would become party president, and Sachin Pilot would become the CM.

The fact that Sonia and Rahul Gandhi are out of touch with ground reality can be easily verified by the situation that has now cropped up. Two days ago, Gehlot was the blue-eyed favourite of Gandhi family, and now he has become a stye in the eye. Gehlot was the arch loyalist who was getting the party chief post on a platter, but after what his supporters did in Jaipur, he is now being named as a traitor. It has now become difficult to decide who is the loyalist and who is the traitor?

Two years ago, Sachin Pilot had raised the banner of revolt and had taken his MLAs to Manesar, Haryana, and now Gehlot has displayed his political muscle. It is strange that the Gandhi family has not learnt its lessons from what happened in Punjab.

In Punjab, Navjot Singh Sidhu was shown the dream of leading the party, Capt. Amarinder Singh was sacked, but Charanjit Singh Channi was made the CM. The net result: Congress was wiped out in the assembly elections in Punjab.

Old timers in Congress are now fearing the worst in Rajasthan. The developments in Congress have made the common party workers confused and worried. They have reasons to worry, when they watch experienced leaders like Ghulam Nabi Azad, Capt. Amarinder Singh and Jyotiraditya Scindia making the exit. They had expected Ashok Gehlot to lead the party, given his long experience, his political acumen and consistent loyalty. But now, the needle of suspicion points towards Gehlot.

Some Congress leaders are now asking, how can the party high command, which could not keep its own senior leaders together, forge an alliance with the likes of Sharad Pawar, Lalu Yadav and Nitish Kumar?

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पीएम मोदी ने क्यों कहा- विकास विरोधी हैं ‘अर्बन नक्सल’

AKBगुजरात के एकता नगर में शुक्रवार को राज्य के पर्यावरण मंत्रियों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात का जिक्र किया कि कैसे ‘अर्बन नक्सलियों’ ने देश में विकास की धारा को रोकने की कोशिश की थी।

पीएम मोदी ने मंत्रियों से कहा, ‘आप जिस जगह पर बैठे हैं ना ये एकता नगर में, ये हमारे लिए आंखें खोलने वाला उदाहरण है। कैसे ‘अर्बन नक्सलियों’ ने, विकास विरोधियों ने, इस इतने बड़े प्रकल्‍प को, सरदार सरोवर डैम को रोक के रखा था। आपको जानकर हैरानी होगी साथियों, ये जो सरदार सरोवर डैम एकता नगर में आप बैठे हैं ना, इतना बड़ा जलाशय देखा होगा आपने, इसका शिलान्यास देश आजाद होने के तुरंत बाद किया था।’

पीएम मोदी ने कहा, ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। पंडित नेहरू ने शिलान्यास किया था लेकिन सारे अर्बन नक्सल मैदान में आ गए, दुनिया के लोग आ गए। काफी प्रचार किया ऐसा ये पर्यावरण विरोधी है, यही अभियान चलाया और बार-बार उसको रोका गया। जिस काम की शुरुआत नेहरू जी ने की थी, वो काम पूरा हुआ मेरे आने के बाद। बताइए, कितना देश का पैसा बर्बाद हो गया।’

पीएम मोदी ने कहा, ‘आज वही एकता नगर पर्यावरण का तीर्थ क्षेत्र बन गया। मतलब कितना झूठ चलाया था, और ये अर्बन नक्सल, आज भी चुप नहीं है, आज भी उनके खेल खेल रहे हैं। उनके झूठ पकड़े गए, वो भी स्‍वीकार करने को तैयार नहीं हैं और उनको अब कुछ लोगों का राजनीतिक समर्थन भी मिल जाता है ।’

उन्होंने कहा, ‘भारत में विकास को रोकने के लिए कई ग्लोबल इंस्टिट्यूशन भी, कई फाउंडेशंस भी ऐसे बड़े पसंद आने वाले विषय पकड़ करके तूफान खड़ा कर देते हैं और ये हमारे अर्बन नक्‍सल उसको माथे पर लेकर के नाचते रहते हैं और हमारे यहां रुकावट आ जाती है। पर्यावरण की रक्षा के संबंध में कोई समझौता न करते हुए भी संतुलित रूप से विचार करके हमें ऐसे लोगों की साजिशों को जो वर्ल्‍ड बैंक तक को प्रभावित कर देते हैं, बड़ी-बड़ी न्यायपालिका को प्रभावित कर देते हैं। इतना आप प्रचार कर देते हैं, चीजें अटक जाती हैं। मैं चाहता हूं कि हमें इन सारे विषयों में एक Holistic approach (समग्र दृष्टिकोण) अपना कर आगे बढ़ना चाहिए।’

प्रधानमंत्री मोदी की यह बात सही है कि कुछ लोगों ने कभी पर्यावरण के नाम पर, कभी स्थानीय लोगों के अधिकार के नाम पर, कभी आंदोलन करके तो कभी कोर्ट में जाकर बहुत सारी परियोजनाओं को रोका। वक्त के साथ इन परियोजनाओं की लागत बढ़ती गई और कई जगह ये परियोजनाएं बहुत लाभदायक और उपयोगी साबित नहीं हुईं और देरी हुई सो अलग। लेकिन कोई ऐसे एक्टिविस्ट से लड़ना नहीं चाहता था।

नरेंद्र मोदी ने इस परंपरा को बदला। पहले गुजरात में और फिर दिल्ली आकर ऐसे अर्बन नक्सलियों से लड़ने की हिम्मत दिखाई। योजनाओं को पूरा करवाया। हालांकि, अर्बन नक्सलियों ने भी हिम्मत नहीं हारी है। वो आज भी मोदी के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ रहे हैं। वे न केवल भारत के भीतर बल्कि विदेशों में भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ रहे हैं।

इसका एक सबूत गुरुवार को लंदन में दिखा। लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर, ‘साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप’ के सदस्यों ने भारत-विरोधी, मोदी विरोधी और आरएसएस विरोधी नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप साम्राज्यवाद-विरोधी और नस्लवाद-विरोधी संगठन होने का दावा करता है। मुट्ठीभर प्रदर्शनकारी यह आरोप लगा रहे थे कि आरएसएस समर्थक संगठनों ने इस सप्ताह के शुरुआत में ब्रिटेन के लीसेस्टर और स्मेथविक शहरों में हिंसा की थी। लेकिन इसके विजुअल्स और तथ्य घटना की अलग तस्वीर बयां करते हैं। दरअसल, मास्क पहने जिहादी मुसलमानों ने हिंदू मंदिरों और हिंदुओं के दुकानों पर हमला किया था और इसके विरोध में हिंदुओं ने प्रदर्शन किया थाा। लेकिन अचानक इस मामले में मोदी का नाम जोड़ दिया गया। ब्रिटेन में एंटी इंडिया प्रोपेगैंडा शुरू हो गया है और इसके पीछे ग्लोबल आउटरेज की पुरानी टूलकिट है, जो फिर से एक्टिव हो गई। सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे ब्रिटेन में भारत विरोधी प्रचार शुरू किया गया। साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप के प्रदर्शन की तस्वीरें, प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और पोस्टर देखकर ही आप समझ जाएंगे कि आख़िर मामला क्या है।

दरअसल, यह विदेश में नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस के विरोध में एक प्रचार अभियान है। ये वही टूलकिट है जो हमने किसान आंदोलन के दौरान भी देखी थी। भारत से नफरत करनेवाले इन लोगों ने गायिका रिहाना जैसे कुछ प्रभावशाली लोगों के ट्वीट्स का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया था कि उनके आंदोलन को दुनिया भर में समर्थन मिल रहा है। इसका उद्देश्य मोदी को निशाना बनाना और आरएसएस को एक फासीवादी संगठन के रूप में दिखलाना था। ब्रिटेन में हिंदू-मुस्लिम तनाव के दौरान वही ‘टूल किट’ एक्टिव हो गया था, और जेएनयू कैंपस में ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग से जो नारे हम सुनते थे, वही अब लंदन में सुनने को मिल रहे हैं। बड़ा सवाल ये है कि ब्रिटेन में विरोध-प्रदर्शन कर रहे ये लोग हैं कौन और किससे आज़ादी मांग रहे हैं ? असल में ये वही अर्बन नक्सलियों का गैंग है जो ग्लोबल लेवल पर एक्टिव है। लंदन में यह विरोध प्रदर्शन इंडिया हाउस के सामने किया गया। वैसे तो यह प्रदर्शन हिंदू-मुस्लिम समुदाय की एकता के लिए था लेकिन प्रदर्शनकारियों की बात सुनकर आप सब समझ जाएंगे। एक प्रदर्शनकारी ने कहा-‘हम यहां शांति चाहते हैं। हम यहां रहने वाले दक्षिण एशियाई समुदाय (हिंदुओं और मुसलमानों) की एकजुटता चाहते हैं और हम यहां इसलिए इकट्ठे हुए हैं ताकि मोदी को संदेश दे सकें कि आप हमारे समुदाय को बांटना बंद करें। आप अपने फ़ासीवादी लोगों को हमारे देश में हिंसा फैलाने के लिए भेजना बंद कीजिए। क्योंकि हमें पता है कि ये नफरत वहीं से भेजी जा रही है। इसीलिए हम यहां इकट्ठे हुए हैं।’

पता चला कि ब्रिटेन में मोदी विरोधी अभियान साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप चला रहा है। यह ग्रुप पूरे ब्रिटेन में बीजेपी-आरएसएस के विरोध के प्रोग्राम करता है। कश्मीर हो या मुसलमानों पर ज़ुल्म के आरोप, गुजरात के दंगे या फिर किसान आंदोलन, साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप की वेबसाइट इन सारे विषयों से भरी पड़ी है। भीमा कोरेगांव की हिंसा हो, शाहीन बाग़ का धरना हो या फिर कानपुर और दिल्ली में हुए दंगे हों, हर मौके पर यह ग्रुप लंदन में इंडिया हाउस के सामने इकट्ठा होता है और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करता है। जुलाई में भी इस ग्रुप ने लंदन में प्रदर्शन किया था। इस दौरान दक्षिण एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप की कल्पना विल्सन ने भाषण दिया था और कहा था- ‘भारत में आज जो कुछ भी हो रहा है उसमें ब्रिटिश सरकार भी शामिल है। ब्रिटिश सरकार, भारत में जल्द ही होने वाले मुसलमानों के नरसंहार में शामिल है। क्योंकि, इस नरसंहार की भविष्यवाणी उन लोगों ने की है जिन्होंने रवांडा में नरसंहार की भविष्यवाणी की थी और वो कह रहे हैं कि भारत में भी मुस्लिम समुदाय का वैसा ही नरसंहार होने वाला है। हम इस बात को कैसे भूल सकते हैं कि मोदी की सरकार, मुसलमानों के घर गिराने के लिए जेसीबी बुलडोज़र भेज रही है। फिर चाहे वो दिल्ली हो या यूपी। और जैसा कि हम सबने देखा अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने एक बहादुर कार्यकर्ता फ़ातिमा का घर इलाहाबाद में बुलडोज़र चलाकर गिरा दिया था।

मोदी के खिलाफ इस तरह का विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। यह अभियान तो 2002 से चल रहा है जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे। लेकिन, मोदी ने कभी इसकी परवाह नहीं की। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश-विदेश की कई ताकतें इस अभियान में शामिल हो गई। लेकिन पिछले आठ साल में जितने विरोधी जमा हुए उससे कई गुना ज्यादा मोदी के प्रशंसक एक्टिव हो गए। विदेशों में रहने वाले भारतीयों को जब यह लगा कि मोदी की वजह से अपने-अपने देशों में उनका मान बढ़ा है तो वो मोदी के एक्टिव सपोर्टर बन गए।

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Why Modi said ‘Urban Naxals’ are anti-development

AKBWhile addressing a conference of state environment ministers in Ekta Nagar, Gujarat, on Friday, Prime Minister Narendra Modi pointed out how ‘Urban Naxals’ had tried to stall development in India.

Modi told the ministers, “The place where you are sitting in Ekta Nagar is an eye-opener example of how ‘urban naxals’ who were against development, had stalled the Sardar Sarovar Dam project. You will be surprised to know that the foundation stone of the big dam that you are seeing in Ekta Nagar, was laid soon after independence.”

Modi said, “Sardar Vallabh Bhai Patel played a major role. Pandit Nehru laid the foundation stone, but all ‘urban naxals’ along with their foreign supporters opposed it. The project was described as anti-environment, they ran a campaign and continuously stopped its work. The work that began during Nehru’s time was completed when I took over as chief minister. Imagine the amount of nation’s money that was wasted.”

The PM said, “Today, this Ekta Nagar has become a sort of pilgrimage place for environment lovers. They (urban naxals) spun a web of lies, they are not silent even today, and are playing games. They are not even to accept that their lies have been nailed and they are now getting political support from some people.”

He said, “There are several global institutions, some foundations that create a storm by taking up these issues as fads, and our urban naxals use them as props to dance in glee, thus bringing projects to a standstill. Without compromising on issues relating to environment, we can take a balanced approach, we can expose the conspiracies of such people. Even the World Bank and big judiciary gets impressed with their campaigns and work on such projects stop. I think, we should move forward by taking a holistic approach on such issues.”

Modi is right when he says that some people, by launching agitations stall work on major projects by going to courts while raising environmental issues or issues relating to rights of local inhabitants. The resultant delay leads to rise in cost of projects, and in some cases, these projects became unviable. Nobody likes to question these activists.

Modi changed this tradition, first in Gujarat, and then, at the Centre. He should courage in dealing with ‘urban Naxals’ and completed the projects. Urban Naxals are still active and they have not lost hope. They are still fighting against Narendra Modi, not only inside India, but abroad too.

On Thursday evening, outside the Indian High Commission in London, members of ‘South Asia Solidarity Group’, which claims to be an ‘anti-imperialist, anti-racist organization of South Asian diaspora’, staged protest shouting anti-India, anti-Modi and anti-RSS slogans. The handful of protesters were alleging that pro-RSS outfits had carried out violence in Smethwick and Leicester early this week, but the facts and visuals give a completely different picture. Jihadi Muslims wearing masks attacked Hindu temples and shops, and Hindu residents staged protests in retaliation. Suddenly, Modi-haters added the Prime Minister’s name with these violent incidents, and anti-India propaganda was initiated across UK through social media, using the old, time-tested ‘global tool kits’. The visuals of SASG protesters holding anti-India, anti-Modi and anti-RSS placards in London need no explanation. This is the same ‘tool kit’ that was used against India during the farmers’ agitation in Delhi. These India-haters had used tweets from some global influencers like singer Rihanna to show that their agitation had worldwide support. The aim was to target Modi and paint RSS as a fascist organization. The same ‘tool kit’ was activated during Hindu-Muslim tension in Britain, and the same slogans that we used to hear in the JNU campus from the ‘tukde tukde’ gang are now being heard in London. The question is: from whome are these protesters in Britain seeking ‘azadi’ (freedom) from? These are the faces of ‘Urban Naxals’ who are also active on a global level. The protest was ostensibly for “peace and unity” among South Asian communities (read Hindus and Muslims), but the soundbites from protesters were self-explanatory. One protester said, “We have gathered here to convey a message to Modi to stop dividing our community. He should stop sending fascist people to spread violence in this country, because we know from where this hate is being spread.”

The South Asia Solidarity Group carries out anti-BJP, anti-RSS protests across Britain. The issues may vary. Sometimes it is over ‘atrocities against Kashmiris’, or ‘repression of Muslims in India’, or ‘Gujarat riots’ or ‘repression of Indian farmers’. The official website of SASG is full of such topics. Whether it is the Bhima-Koregaon violence, or Shaheen Bagh protests, or riots in Delhi and Kanpur, on every such issue, this group stages protest against Modi government outside the Indian High Commission in London. I would like to mention excerpt from a speech by Kalpana Wilson of South Asia Solidarity Group, in which she said in July this year: “Even the British government is part of whatever is happening in India today. British government is also responsible for the genocide of Muslims in India, because people who had forecasted Rwanda genocide had forecasted the same in India by saying that Muslims will have to face the same in India. How can we forget that the Modi government is sending JCB bulldozers to raze homes of Muslims, whether it is in Delhi or UP? As we have seen recently, they razed the house of a brave activist Fatima in Allahabad a few days ago.”

Anti-Modi protests are nothing new. Such campaigns have been going on since the Gujarat riots of 2002, when Modi was Chief Minister. Modi never bothered about such protests. After he became Prime Minister, several forces in India and abroad joined this Hate Modi campaign. The number of Modi haters has been surpassed several times by huge numbers of Modi supporters spread across India and abroad. The Indian diaspora, after realizing that India’s stature on the global level has risen after Modi became PM, is now his biggest support base in countries spread across the world.

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PFI नेताओं के खिलाफ कार्रवाई एक सही वक्त पर उठाया गया कदम है

akbराष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने गुरुवार की सुबह एक देशव्यापी अभियान में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पुलिस के साथ मिलकर 15 राज्यों में 202 जगहों पर छापेमारी की। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और उसके साथ जुड़े संगठन SDPI के 100 से ज्यादा नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

गुरुवार को दिल्ली, मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे, जयपुर, उदयपुर, बारां, बहराइच, कानपुर, लखनऊ, औरंगाबाद, पुणे, कोल्हापुर, बीड, परभनी, नांदेड़, जलगांव, जालना, मालेगांव, दक्षिण कन्नड़ा, मंगलुरु, उल्लाल, कोप्पल, दावणगेरे, शिवमोग्गा, मैसूर, बेंगलुरु, मल्लापुरम, तिरुवनंतपुरम, एर्नाकुलम, चेन्नई और मदुरै में छापेमारी की गई।

गिरफ्तार लोगों में PFI के अध्यक्ष ओ.एम. अब्दुल सलाम, इसके उपाध्यक्ष ई.एम. अब्दुल रहीमन, राष्ट्रीय सचिव वी.पी नजरुद्दीन एल्लाराम, केरल राज्य प्रमुख सी. पी. मोहम्मद बशीर, प्रो. पी. कोया और SDPU के अध्यक्ष ई. अबूबकर शामिल हैं। केरल हाई कोर्ट द्वारा हड़तालों पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद PFI ने शुक्रवार को सुबह से शाम तक राज्यव्यापी ‘केरल बंद’ का आह्वान किया गया था।

शुक्रवार को केरल के कई शहरों में तोड़फोड़ और हिंसा की कई घटनाएं हुई। कई शहरों में बंद समर्थकों ने केरल राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों, ट्रकों और अन्य निजी गाड़ियों पर पथराव किया । सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने एहतियातन हिरासत में ले लिया।

NIA ने अदालतों के समक्ष अपनी रिमांड एप्लिकेशन में आरोप लगाया है कि PFI राष्ट्रविरोधी एवं आतंकी गतिविधियों में लिप्त था और अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, इस्लामिक स्टेट समेत कई अन्य आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए मुस्लिम युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहा था। अपने रिमांड एप्लिकेशन में NIA ने आरोप लगाया है कि PFI नेता तकरीरों और रैलियों के जरिए गैर-मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैला रहे थे, और नफरत भरे संदेश फैलाने के साथ-साथ PFI की गतिविधियों के बारे में गोपनीय जानकारी प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल कर रहे थे। PFI नेताओं के दफ्तरों और घरों से कई मोबाइल फोन और कंप्यूटर डिवाइसेज जब्त की गई हैं।

NIA द्वारा PFI पर तैयार किए गए एक डोजियर के मुताबिक, कट्टरपंथी संगठन का मकसद कई तरह की स्ट्रैटिजी अपनाकर भारत में तालिबान ब्रैंड के इस्लाम को लागू करना था। यह अपने कैडर और केरल के मजेरी, मलप्पुरम जिले में स्थित सत्यसारिणी मरकजुल हिदायत एजुकेशनल ऐंड चैरिटेबल ट्रस्ट जैसे संस्थानों के जरिए कट्टरपंथी इस्लामवाद का प्रचार कर रहा था।

PFI नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ देशव्यापी छापेमारी में 300 से ज्यादा अधिकारी शामिल थे। अकेले NIA अधिकारियों ने 93 जगहों पर तलाशी ली और PFI के 45 नेताओं को गिरफ्तार किया। NIA अधिकारियों ने कहा कि कि ये छापे गैरकानूनी गतिविधियों के सबूत मिलने के बाद पूरी तैयारी के साथ मारे गए।

PFI के खिलाफ इस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन मिडनाइट’ नाम दिया गया था। आधी रात के बाद करीब एक बजे यह ऑपरेशन शुरू हुआ और सुबह 5 बजे तक खत्म हो गया। इस पर नजर रखने के लिए गृह मंत्रालय में एक कमांड सेंटर बनाया गया था। ऑपरेशन के बेहतर कोऑर्डिनेशन के लिए देश के 6 अलग-अलग इलाकों में जोनल कमांड कंट्रोल सेंटर भी बने थे। पूरे ऑपरेशन पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल सीधी नजर रख रहे थे, और इसकी पूरी जानकारी गृह मंत्री अमित शाह को दी जा रही थी।

पूरे ऑपरेशन को बेहद कॉन्फिडेंशियल रखा गया था। NIA के एक ADG लेवल के अधिकारी, 4 IG और 16 SP को इस ऑपरेशन को पूरा करने का जिम्मा दिया गया था। NIA के 200 अधिकारियों की टीम को देश के अलग-अलग हिस्सों में छापेमारी के लिए भेजा गया था। कुछ राज्यों के एंटी टेरर स्क्वॉड को भी इसमें शामिल किया गया था। कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 5 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।

PFI के सबसे ज्यादा 22 नेता केरल से गिरफ्तार किए गए। कर्नाटक और महाराष्ट्र के संगठन के 20-20 नेताओं को गिरफ्तार किया गया। तमिलनाडु से 10, उत्तर प्रदेश से 8 और असम से 9 नेताओं को गिरफ्तार किया गया। छापेमारी के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज, हथियार और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद हुई हैं।

पूरे ऑपरेशन को गुप्त रखा गया था और छापे के बारे किसी को कानों कान खबर नहीं हुई। फिर भी NIA और स्थानीय पुलिस अधिकारी यह देखकर हैरान रह गए कुछ ही वक्त में सैकड़ों लोग उस जगह पर इकट्ठे हो गए जहां रेड हो रही थी। जब PFI के नेताओं को हिरासत में लेकर गाड़ियों में ले जाया जा रहा था तो सैकड़ों लोग विरोध कर रहे थे। इससे इस बात का अंदाजा लगा कि PFI का नेटवर्क और कम्युनिकेशन सिस्टम कितना मजबूत है। तमिलनाडु के डिंडीगुल, केरल के मल्लपुरम, कर्नाटक के कलबुर्गी और महाराष्ट्र के नासिक जैसे दूर-दराज के इलाकों में सैकड़ों PFI समर्थक जमा होकर इन गिरफ्तारियों का विरोध करने लगे।

2006 में जिस PFI की स्थापना हुई, अब उसकी जड़ें कम से कम 16 राज्यों में फैल चुकी हैं। इन 16 राज्यों के छोटे-छोटे शहरों में PFI का काडर बन चुका है। छापा मारने से पहले NIA ने PFI की पूरी कुंडली खंगाल ली थी। एजेंसी ने एक डोजियर तैयार किया था जिसमें हर नेता और हर दफ्तर के बारे में पूरी जानकारी थी। PFI की फंडिंग कहां से हो रही है, कितना पैसा आ रहा है और कहां खर्च हो रहा है, सब पता लगा लिया गया था।

NIA के अफसरों को मालूम था कि छापेमारी होने के साथ ही विरोध शुरू हो जाएगा, और ऐसा ही हुआ भी। कर्नाटक के मंगलुरु, कलबुर्गी और बेंगलुरु के साथ-साथ केरल के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। NIA ने यह भी पाया कि PFI नेता केवल पढ़े-लिखे मुस्लिम नौजवानों की भर्ती करते हैं ताकि उनका ब्रेनवॉश किया जा सके। यह संगठन भले ही हाई-फाई टेक्नॉलजी से दूर रहता है लेकिन इसका सूचना तंत्र बहुत मजबूत है।

NIA के डोजियर में इस बात का भी जिक्र है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू होने के बाद उत्तर भारतीय राज्यों में PFI ने कैसे अपनी गतिविधियां बढ़ा दीं। PFI उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में ऐक्टिव हो गया, और दिल्ली में शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन और दिल्ली दंगों में PFI का एक बड़ा रोल सामने आया। इस साल जून में कानपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ नूपुर शर्मा के बयान के बाद हुए हिंसक रोध प्रदर्शनों में भी PFI का हाथ पाया गया था।

PFI समर्थकों ने गुरुवार को लखनऊ और कानपुर में विरोध प्रदर्शन किया। राजस्थान में पिछले एक साल में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं हो चुकी हैं। करौली में एक हिंदू जुलूस पर हमला किया गया, जोधपुर में दंगे जैसी स्थिति पैदा हो गई और उदयपुर में एक हिंदू दर्जी कन्हैयालाल का सिर कलम कर दिया गया। इन सभी घटनाओं में PFI का कनेक्शन पाया गया। NIA ने उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, बारां और कोटा में PFI के ठिकानों पर छापेमारी की और इसके नेताओं को गिरफ्तार किया। इसके तुरंत बाद कोटा, बारां और जयपुर में विरोध प्रदर्शन हुए।

NIA अफसरों का कहना है कि PFI की विचारधारा वही है जो सिमी और उसके बाद इंडियन मुजाहिदीन की रही है। लेकिन काम करने के तरीके और रणनीति के मामले में PFI, सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन से बहुत अलग है। PFI की रणनीति है कि टेक्नॉलजी में माहिर, कानूनी पेचीदगियों के जानकार, पढ़े-लिखे मुस्लिम नौजवानों की ऐसी फौज तैयार की जाए जो कानूनी पचड़े में फंसे बिना, भारत में इस्लामिक तौर तरीके लागू कराने के लिए लड़े।

मैंने जांच एजेंसियों के सीनियर अफसरों से पूछा कि PFI को बैन क्यों नहीं किया जा रहा। जवाब यह मिला कि सिमी को बैन करके कोई फायदा नहीं हुआ, इसकी जगह PFI बन गया। PFI ने पहले ही अपने कई संगठन बना रखे हैं और यह खुद सामाजिक संगठन के तौर पर रजिस्टर्ड है। SDPI इसका पॉलिटिकल विंग है, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया PFI का स्टूंडेंट विंग है। ये सारे अलग संगठन के तौर पर रजिस्टर्ड हैं। PFI ने ऑल इंडिया इमाम काउंसिल के नाम से मौलानाओं और मौलवियों का एक अलग संगठन बना रखा है। गैर-मुसलमानों का इस्लाम में धर्मांतरण कराने के लिए इसने केरल में सत्यसारिणी एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट खोल रखा है। महिलाओं के लिए इसने नेशनल वुमेन फ्रंट बनाया हुआ है। इसी तरह एम्पावरमेंट फ्रंट ऑफ इंडिया, रिहैब इंडिया फाउंडेशन, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स और ऑल इंडिया लॉयर्स काउंसिल को भी PFI नेतृत्व ने रजिस्टर्ड करवाया है।

सीनियर अफसरों ने मुझसे कहा कि चूंकि PFI के इतने सारे संगठन हैं, इसलिए इन सभी पर प्रतिबंध लगाना अक्लमंदी की बात नहीं होगी। इसीलिए इन संगठनों की गतिविधियों को काबू में करने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि देश विरोधी गतिविधियों को रोकने के दो तरीके हैं। पहला, अधिकांश सक्रिय सदस्यों को सलाखों के पीछे डालना, और दूसरा, पैसा मिलने के रास्ते बंद कर देना।

जब PFI के वित्तीय स्रोतों के बारे में जांच शुरू हुई तो जो बातें सामने आईं, उन्हें देखकर अफसर भी हैरान रह गए। पता लगा कि PFI को विदेशों से बेशुमार पैसा मिल रहा है। PFI के बड़े नेता अक्सर सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत और इराक जैसे खाड़ी देशों का दौरा करते हैं। PFI के नेता तुर्की का दौरा भी कई बार कर चुके हैं। उन्हें इन सभी देशों से पैसे मिलते हैं।

ED अफसरों को इस बात के सबूत मिले हैं कि PFI से जुड़े बैंक खातों में 60 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जमा हुई थी। इनमें से 30 करोड़ रुपये तो कैश ही जमा हुए। पिछले महीने ED ने PFI के 22 बैंक खाते फ्रीज कर दिए थे। पुराने पुलिस अफसर बताते हैं कि PFI के लोगों को पकड़ना, सबूत जुटाना आसान नहीं है क्योंकि इसका नेतृत्व अपने समर्थकों को सबसे पहले यही सिखाता है कि सबूत कैसे मिटाए जाते हैं और बिना सबूत छोड़े काम कैसे किया जाता है।

PFI पर हुई छापेमारी को लेकर मुख्य धारा के राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया आमतौर पर सतही रही। ज्यादातर पार्टियां PFI को अपने सियासी फायदे के दायरे में देख रही हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने इस मामले की गंभीरता को समझा और एक सधी हुई और ठोस कार्रवाई की।

PFI एक मजबूत संगठन है जिसका काफी ज्यादा राजनीतिकरण हो चुका है। यह नए जमाने के डिजिटल नेटवर्क का दुरुपयोग करने में माहिर है। इसके पास फंड की कोई कमी नहीं है। जब सिमी पर प्रतिबंध लगाया गया तो उसके ज्यादातर नेता जो अंडरग्राउंड हो गए थे, वे फिर से सामने आए और उन्होंने PFI का गठन किया। नए संगठन ने सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने के अलावा मुसलमानों को संगठित करने, युवाओं को बरगलाने और उन्हें हथियारों और डिजिटल डॉमिनेशन की ट्रेनिंग देने का काम शुरू किया।

CPM और RSS के कई कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याओं में PFI का नाम सामने आया। 2012 में केरल सरकार ने हाई कोर्ट में एक हलफनामा दिया था जिसमें केरल की 27 सियासी हत्याओं में PFI का हाथ होने का दावा किया गया था। इसी एफिडेविट में केरल सरकार ने बताया था कि 2012 तक अकेले केरल में हुई 106 सांप्रदायिक घटनाओं में PFI का कनेक्शन पाया गया था। 2015 में PFI के 13 कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। PFI के इन कार्यकर्ताओं ने पैगंबर साहब के अपमान का आरोप लगाकर केरला के एक प्रोफेसर का हाथ काट डाला था।

दस्तावेज बताते हैं कि PFI भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है और उसने इसके लिए 2047 की डेडलाइन तय कर रखी है। PFI ने विजन 2047 नाम का डॉक्यूमेंट तैयार किया है जिसमें भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए क्या-क्या करना है, वह विस्तार से बताया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे अपने काडर को सरकारी नौकरियों में घुसाना है, कैसे बड़ी संख्या में अपने सदस्यों को फौज में भर्ती कराना है, और कैसे सरकारों में अपनी भागीदारी बढ़ानी है। PFI नेताओं पर देशव्यापी छापा उन देश विरोधी ताकतों को खत्म करने के लिए सही समय पर उठाया गया एक कदम है, जो भारत को तोड़ना और इसे कमजोर करना चाहते हैं।

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Nationwide swoop on PFI leaders is a timely move

akb full_frame_74900In a nationwide swoop on early Thursday morning, National Investigation Agency (NIA), in close coordination with Enforcement Directorate (ED) and state police raided 202 locations in 15 states and arrested more than a hundred leaders and activists of People’s Front of India(PFI), a radical Muslim outfit and its sister organisation SDPI.

Raids were carried out on Thursday in Delhi, Mumbai, Navi Mumbai, Thane, Jaipur, Udaipur, Baran, Bahraich, Kanpur, Lucknow, Aurangabad, Pune, Kolhapur, Beed, Parbhani, Nanded, Jalgaon, Jalna, Malegaon, Dakshin Kannda, Mangaluru, Ullal, Koppal, Davangere, Shivmogga, Mysuru, Bengaluru, Mallapuram, Thiruvananthapuram, Ernakulam, Chennai and Madurai.

Among those arrested include the PFI chairman O. M. Abdul Salam, its vice-chairman E. M. Abdul Rahiman, national secretary V.P Nazarudheen Ellamaram, Kerala state chief C P Mohammad Basheer, Prof. P. Koya and SDPU president E. Abubacker. A state-wide dawn-to-dusk ‘Kerala bandh’ call was given on Friday by PFI, despite a Kerala High Court banning strikes.

On Friday, several incidents of vandalism and violence were reported from across Kerala. Stones were pelted at Kerala State Road Transport Corporation buses, trucks and other private vehicles in several cities by bandh supporters. Hundreds of protesters were taken into preventive custody by police.

National Investigation Agency, in its remand applications before courts, has alleged that PFI was indulging in anti-national and terror activities and was brainwashing Muslim youths to join terror outfits like Al Qaeda, Lashkar-e-Taiba, Islamic State and others. In its remand applications, NIA has alleged that PFI leaders were spreading hatred against non-Muslims through public debates and rallies, and were misusing social media platforms for passing on not only hate messages but also confidential information about PFI activities. Several mobile phones and computer devices have been seized from the offices and homes of PFI leaders.

According to a dossier on PFI prepared by NIA, the radical outfit was aiming to enforce Taliban brand of Islam in India through a multi-pronged strategy. It was propagating orthodox Islamism through its cadre and institutions like Sathyasarini Markazul Hidaya Educational and Charitable Trust based in Majeri, Malappuram district of Kerala.

More than 300 officers were involved in the nationwide swoop against PFI leaders and activists. NIA officers alone searched 93 locations and arrested 45 PFI leaders. NIA officials said that the raids were carried out after detailed preparations and meticulous homework.

Codenamed ‘Operation Midnight’, the nationwide swoop began at 1 am and before dawn, the operation was over by 5 am. A command centre was set up in the Home Ministry, with zonal command centres active in six different zones across India. National Security Adviser Ajit Doval was overseeing the operation, and was giving regular updates to Home Minister Amit Shah.

The operation was kept highly confidential. An Additional DG-level official, assisted by 4 IG-level officers and 16 SPs were entrusted with executing the operation. Several state anti-terror squads were also involved in the operation. For ensuring law and order, more than 5,000 policemen were deployed in the states.

The highest number of arrests of PFI leaders was made in Kerala, where 22 leaders were nabbed. 20 PFI leaders each from Karnataka and Maharashtra were also arrested. 10 were arrested from Tamil Nadu, eight from UP and nine from Assam. Several important documents, weapons and electronic devices were seized.

The entire operation was shrouded in secrecy and there were no leaks about the raids. Yet, NIA and local police officers were surprised to find immediate protests by hundreds of PFI supporters, even as the leaders were being taken in vehicles under custody. It goes to show the strong network and communication system of the radical outfit. In faraway places like Dindigul in Tamil Nadu, Mallapuram in Kerala, Kalburgi in Karnataka and Nashik in Maharashtra, hundreds of PFI supporters came out to protest these arrests.

The PFI, which was set up in 2006, is now active in 16 states, where it has recruited cadre from small towns. NIA had prepared a detailed dossier that included the addresses of each office and PFI leader. It had also traced the sources of funding from PFI and the points where these funds were being spent.

NIA had anticipated protests over the arrests, and expectedly there were protests in Mangaluru, Kalburgi and Bengaluru of Karnataka, and in different cities of Kerala. NIA also found that PFI leaders were focusing on recruiting only educated Muslim youths in order to brainwash them. In spite of staying away from modern hi-fi technology, its communication network was very strong.

The NIA dossier also mentions how PFI became active in North Indian states after the Citizenship Amendment Act was enacted. PFI became active in UP, MP and Rajasthan, and in Delhi, the Shaheen Bagh protests following by Delhi riots noticed a large footprint of PFI. The communal riots in June this year in Kanpur, and the violent protests over Nupur Sharma’s remark against Prophet Mohammed, were meticulously planned by PFI leaders.

There were protests by PFI supporters in Lucknow and Kanpur on Thursday. In Rajasthan, there have been several incidents of communal violence in the last one year. A Hindu procession was attacked in Karauli, a riot-like situation took place in Jodhpur and in Udaipur, a Hindu tailor Kanhaiyalal was beheaded. PFI connections were found in all these incidents. NIA raided PFI locations in Udaipur, Jaipur, Jodhpur, Baran and Kota, and rounded up PFI leaders. Soon after, protests took place in Kora, Baran and Jaipur.

NIA officials believe that PFI’s ideology is similar to that of SIMI and Indian Mujahideen, both radical outfits, which do not exist any more. But PFI’s work style is different from that of SIMI and Indian Mujahideen. PFI’s strategy appears to be to brainwash educated Muslim youths who can master technology and know about law, and with getting entangled in court cases, work for bringing “Islamic governance” in India.

I asked senior officials why PFI is not being banned. The investigating officers pointed out that the ban on SIMI in the past had no effect, and, in place of SIMI, PFI came up. PFI is registered as a social organisation, but SDPI is its political wing. Campus Front of India is the students’ wing of PFI. All these organisations are registered separately. PFI has also set up All India Imam Council for maulanas and moulvis. For converting non-Muslims to Islam, it has opened Sathya Sarini Educational and Charitable Trust in Kerala. For women, it has set up National Women’s Front. Similarly Empowerment Front of India, Rehab India Foundation, National Confederation of Human Rights and All India Lawyers Council have also been registered by PFI leadership.

The senior officers told me, since there is a plethora of organisations, it would not be wise to ban all these frontal outfits. More stress is, therefore, being laid on preventing the activities of these outfits from spreading its tentacles. Security agencies say, there are two ways of preventing anti-national activities. One, to put most of the active members behind bars, and Two, to stop the sources of funding.

While investigating, the security officials were surprised to find that PFI was getting huge amount of money from foreign sources through different channels. PFI leaders frequently visit Gulf countries like UAE, Saudi Arabia, Qatar, Kuwait and Iraq. They have also visited Turkey. They get donations from all these countries.

ED officials have found evidences of more than Rs 60 crore deposited in PFI bank accounts, out of which, it was found, nearly Rs 30 crore was deposited in cash. Last month, ED had put a freeze on 22 PFI bank accounts. Old timers in security establishment say, it is not easy to collect evidences to nail PFI leaders, because the leadership of this outfit trains its supporters and cadre on how to remove all evidences before carrying out any act.

The reactions on PFI raids were mostly superficial from mainstream political parties. Most of the parties look at PFI from the angle of their own political advantage. It was left to Home Minister Amit Shah who realized the enormity of this challenge and took a concerted action.

PFI is a strong and highly politicised organisation, which specializes in misusing digital network of the new era. It does not lack funds. When SIMI was banned, most of its leaders who went underground, resurfaced and formed PFI. The new outfit started to recruit educated youths and trained them in use of weapons and digital dominance, apart from spreading hate on social media.

PFI’s hand was behind the brutal murders of several CPI(M) and RSS workers in Kerala. In 2012, Kerala government, in an affidavit given in the High Court had alleged that PFI had a hand in at least 27 political murders. In the affidavit, the state government alleged that till 2012, PFI connection was found in at least 106 communal incidents. In 2015, 13 PFI workers were convicted and given life term imprisonment. PFI activists had dismembered the hand of a professor in Kerala for making a blasphemous remark about Prophet Mohammed.

PFI has set a deadline of 2047 for making India an Islamic country. In its Vision 2047 document, PFI has detailed steps and measures to achieve this aim. These include how to infiltrate its cadre in government jobs, in the armed forces, and in different levels of government. The nationwide swoop on PFI leaders is a timely move to put an end to anti-national forces who are engaged in subversion and want to weaken India.

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योगी ने यूपी में सभी वक्फ संपत्तियों के सर्वे का आदेश क्यों दिया?

AKBउत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सुन्नी और शिया सेंट्रल वक्फ बोर्डों की सभी संपत्तियों के सर्वे का आदेश दिया है। सर्वे का मकसद संपत्तियों के स्वामित्व में गड़बड़ियों का पता लगाना है, साथ ही इस बात का भी पता लगाना है कि किन लोगों ने इन संपत्तियों पर गैरकानूनी तरीके से कब्ज़ा किया ।

यूपी में करीब 1,62,229 वक्फ संपत्तियां हैं, जिनमें सुन्नी वक्फ बोर्ड नाम लगभग 1,50,000 संपत्तियां और शिया वक्फ बोर्ड के नाम लगभग 12,229 संपत्तियां रजिस्टर्ड हैं। इन संपत्तियों की कीमत हजारों करोड़ रुपये में है।

वक्फ और हज मामलों के मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा, ‘सर्वे अच्छे इरादे से किया जा रहा है और सबसे पहले वक्फ संपत्तियों की पहचान करने के आदेश दिए गए हैं।’ सर्वे का आदेश सभी जिलाधिकारियों को भेज दिया गया है और उन्हें एक महीने के भीतर ब्योरा देने को कहा गया है।

सर्वे का मकसद यह पता लगाना है कि क्या वक्फ संपत्तियों पर व्यक्तियों या संगठनों ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। इस्लामी परंपराओं के मुताबिक, धार्मिक और कल्याणकारी कार्यों के लिए दान की जाने वाली संपत्तियां ‘वक्फ’ की श्रेणी में आती हैं, जिसका मतलब होता है, दीन के काम के लिए दान दी गई वस्तु या संपत्ति। एक बार दान की गई इस संपत्ति को ‘अल्लाह की संपत्ति’ माना जाता है।

राज्य सरकार को ऐसी तमाम शिकायतें मिली थीं जिनमें कहा गया था कि वक्फ बोर्ड के कुछ सदस्यों को रिश्वत देकर वक्फ की संपत्तियों को मार्केट रेट से काफी कम कीमत पर बेच दिया गया। यह भी पता चला कि बोर्ड के कुछ सदस्यों ने अपने करीबियों को वक्फ संपत्तियों का केयरटेकर (मुतवल्ली) बनाया, और उन्होंने तमाम तिकड़में लगाकर प्रॉपर्टी पर कब्जा कर लिया। वक्फ की संपत्ति को ‘अल्लाह की संपत्ति’ माना जाता है क्योंकि यह लोगों की दान की हुई जायदाद होती है। ऐसी संपत्ति का इस्तेमाल इमामबाड़े, मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान, ईदगाह और कर्बला के लिए होता है।

वक्फ की संपत्तियों का इस्तेमाल दीन की बेहतरी के लिए, गरीब मुसलमानों की भलाई के लिए, स्कूल-कॉलेज और हॉस्टल बनाने में होता है। इस संपत्ति में अगर कोई कॉमर्शल प्रॉपर्टी है तो उससे होने वाली आमदनी भी मुसलमानों की बेहतरी में ही खर्च होती है।

वक्फ की संपत्तियों की देखरेख की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड पर है। स्थानीय स्तर पर वक्फ बोर्ड की तरफ से मुतवल्ली या केयरटेकर नियुक्त किए जाते हैं, बस यहीं खेल हो जाता है। बहुत सी जगहों पर मुतवल्लियों ने प्रॉपर्टी डीलर्स और दूसरे लोगों के साथ साठ-गांठ करके, वक्फ की संपत्ति औने-पौने दाम में बेच दी या अवैध कब्जे करवा दिए। इन वक्फ संपत्तियों पर कब्जा जमाने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की रिश्वत दी जाती है। मिसाल के तौर पर, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान पर यही इल्जाम है कि उन्होंने मदरसे को तोड़ कर दुकानें बनवा दीं। इन दुकानों को मामूली किराये पर चढ़ा दिया जाता था और बदले में करोड़ों रुपये की रिश्वत वसूल ली जाती थी।

यूपी शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी के मुताबिक, वक्फ की संपत्ति लैंड माफिया का पसंदीदा निशाना बन चुकी है। वक्फ बोर्ड का कानून साफ कहता है कि इसकी किसी भी प्रॉपर्टी को मार्केट वैल्यू से 2.5 पर्सेंट से कम किराये या लीज पर नहीं दिया जा सकता, और 11 महीने से ज्यादा का रेंट और लीज एग्रिमेंट नहीं हो सकता, लेकिन इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

अली जैदी ने यूपी सरकार से वक्फ की 6 संपत्तियों पर अवैध कब्जों की शिकायत की थी। इनमें लखनऊ में ठाकुरगंज की मोती मस्जिद, महानगर के कब्रिस्तान, लालबाग का इमामबाड़ा, प्रयागराज का छोटा कर्बला शामिल हैं। इसी तरह प्रयागराज के गुलाम हैदर इमामबाड़े के एक बड़े हिस्से को भू-माफिया ने अवैध रूप से बेच दिया था, और कुछ हिस्से को किराए पर दे दिया था।

प्रयागराज के इस इमामबाड़े की जमीन पर अवैध कब्जे का इल्जाम इसके मुतवल्ली वकार रिजवी पर था। वकार रिजवी को उस वक्त के शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने मुतवल्ली बनाया था। बाद में इमामबाड़े की जमीन पर हुए अतिक्रमण पर बुलडोजर चला और मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी। इमामबाड़े की तरफ से हाई कोर्ट में पैरवी करने वाले वकील फरमान नकवी ने बताया कि वक्फ की संपत्ति में हेराफेरी की ये पूरी साजिश शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने ही रची थी।

एक अनुमान के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में वक्फ की 60 से 70 फीसदी संपत्ति पर अवैध कब्जे हैं। देश भर में 2009 तक वक्फ के पास करीब 4 लाख एकड़ जमीन थी, जो 2022 में बढ़कर 8 लाख एकड़ हो गई। सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा प्रॉपर्टी के मामले में वक्फ तीसरे नंबर पर आता है। अधिकांश राज्यों में वक्फ बोर्ड पर जो लोग काबिज हैं, वे अपने लोगों को मुतवल्ली बनाकर ऐसी संपत्तियों पर कब्जा कर लेते हैं। कई बार इसका उल्टा भी होता है, और सरकारी जमीनों के साथ-साथ निजी जमीनों को भी वक्फ की संपत्ति बताकर उसपर कब्जा कर लिया जाता है।

वक्फ के नाम पर क्या-क्या होता है, इसका एक बहुत ही हैरान करने वाला उदाहरण आपको बताता हूं। तमिलनाडू के तिरुचिरापल्ली जिले के एक पूरे के पूरे गांव को वक्फ की प्रॉपर्टी बता दिया गया। इस गांव में हिंदुओं की आबादी ज्यादा है। गांव में 150 साल पुराना मंदिर है। फिर भी इस गांव के लोगों के पुश्तैनी घरों और उनकी जमनी को वक्फ की प्रॉपर्टी बताकर उन पर कब्जा करवाने की मांग की गई थी। गांव के लोगों को जमीन बेचने के लिए वक्फ से NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) लेनी पड़ रही थी, यह साबित करना पड़ रहा था कि जमीन उनकी है, वक्फ बोर्ड की नहीं।

चूंकि दस्तावेजों में हेरफेर करके इस तरह की गड़बड़ियां की जाती हैं, इसलिए यूपी सरकार द्वारा सर्वे कराने का फैसला एक स्वागत योग्य कदम है। एक और उदाहरण है। प्रयागराज में प्रसिद्ध चंद्रशेखर आजाद पार्क (पूर्व में अल्फ्रेड पार्क), जहां 1931 में अंग्रेजों से लड़ते हुए महान क्रांतिकारी ने खुद को गोली मार ली थी, को इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने वक्फ संपत्ति के रूप में दिखाया गया था। ऐसे ही हजारों मामले हैं, और राज्यव्यापी सर्वे करने के योगी आदित्यनाथ के कदम का समर्थन मुस्लिम उलेमा भी कर रहे हैं।

योगी सरकार का आदेश 1989 के बाद रजिस्टर्ड हुईं सभी वक्फ संपत्तियों के सर्वे से संबंधित है। AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल किया कि 1989 को कट-ऑफ वर्ष क्यों तय किया गया। यूपी सरकार के सूत्रों ने बताया कि 7 अप्रैल 1989 को मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के राजस्व विभाग ने एक आदेश जारी किया था जिसके तहत बंजर भूमि को वक्फ संपत्ति के रूप में ‘अवैध रूप से रजिस्टर्ड’ किया गया था।

आदेश में कहा गया था कि राज्स्व रिकॉर्ड में चूंकि वक्फ की कई संपत्तियां बंजर, ऊसर, भीटा आदि के तौर पर दर्ज है, उन्हें दुरूस्त करके कब्रिस्तान, मस्जिद या ईदगाह के तौर पर दर्ज की जाए। इस आदेश का असर यह हुआ कि तमाम जगहों पर सरकारी जमीन और ग्राम पंचायतों की जमीन वक्फ की संपत्ति के तौर पर दर्ज हो गई।

इसी साल 7 सितंबर को योगी सरकार ने 1989 के राजस्व विभाग के आदेश को रद्द कर दिया था। इसने सभी डिविजनजल कमिश्नरों और जिलाधिकारियों को एक महीने के भीतर राजस्व रिकॉर्ड को सही करने के लिए 1989 के आदेश के तहत की गई सभी कार्यवाहियों की जांच करने का निर्देश दिया था। वक्फ संपत्तियों का सर्वे भी 8 अक्टूबर तक पूरा कर लिया जाएगा।

AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने 1989 की समयसीमा पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यूपी सरकार मुसलमानों को निशाना बना रही है। उन्होंने कहा, ‘यह मदरसों और वक्फ संपत्तियों के सर्वे पर ही नहीं रुकेगा। यूपी सरकार वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है।’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, ‘जो लोग यूपी को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कर रहे थे, वे अब हिंदू मुसलमान के मुद्दों पर पब्लिक को उलझा रहे हैं। योगी जी को बताना चाहिए कि क्या ऐसे ही यूपी एक देश की इकनॉमी का पावर हाउस बनाएंगे। एक ट्रिलियन डॉलर की इकनॉमी सर्वे करने से बन जाएगी?’

इस साल 21 फरवरी को केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक चिट्ठी भेजकर सर्वे करने के बाद अपने लैंड रिकॉर्ड्स को सही करने के लिए कहा था, क्योंकि रेवेन्यू रिकॉर्ड्स में वक्फ की संपत्तियों के कई व्यक्तियों और निजी संगठनों के नाम पर रजिस्टर्ड होने के बारे में तमाम शिकायतें मिली थीं।

इसी चिट्ठी के मिलने के बाद योगी सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को वक्फ संपत्तियों का सर्वे करने का निर्देश दिया। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि राज्य सरकार वक्फ संपत्तियों पर से अवैध कब्जे को हटाने की कोशिश करेगी, और इनका इस्तेमाल गरीब मुसलमानों के कल्याण के लिए किया जाएगा।

वक्फ की संपत्ति पर सियासत करने की बजाय इस मामले को समझने की जरूरत है। सियासत करने वाले समझा रहे हैं कि सर्वे में सिर्फ यह पता लगेगा कि कितनी सरकारी जमीन पर वक्फ का कब्जा है, लेकिन यह आधा सच है। असल में सर्वे से यह भी पता चलेगा कि वक्फ की कितनी जमीन पर गैरकानूनी कब्जे हैं।

सर्वे में उन लोगों के नाम और चेहरे भी सामने आएंगे जिन्होंने अवैध तरीके से वक्फ संपत्तियों को कौड़ियों के दाम किराए पर ले रखा है और उन पर कब्जा जमा लिया है। इससे आखिरकार वक्फ बोर्ड और गरीब मुसलमानों को ही फायदा होगा। मुस्लिम छात्रों के लिए स्कूल और कॉलेज की जगह मिलेगी, कब्रिस्तानों के लिए जमीन मिलेगी, और वक्फ की आमदनी बढ़ेगी।

सर्वे से उन लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगी जो वक्फ की जायदाद पर कब्जा करके बैठे हैं। उससे उन्हीं लोगों को दिक्कत हो रही है। यह सर्वे सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार का ही नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार ने भी सभी राज्यों में वक्फ की संपत्तियों की जानकारी हासिल करने को कहा है। अनुमान तो यह है कि वक्फ बोर्ड देशभर में कुल मिलाकर 8 लाख एकड़ जमीन के मालिक हैं, लेकिन इस बारे में कोई पक्का रिकॉर्ड नहीं है। सभी वक्फ संपत्तियों का देशव्यापी सर्वे इसीलिए जरूरी है।

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Why Yogi ordered a survey of all waqf properties in UP?

AKB30 The Uttar Pradesh government led by Chief Minister Yogi Adityanath has ordered a survey of all properties managed by Sunni and Shia Central Waqf Boards in the state to find out anomalies, if any, in the ownership of properties and to find out how these properties were acquired.

There are presently nearly 1,62,229 waqf properties, which include nearly 1,50,000 properties registered with the Sunni Waqf Board and nearly 12, 229 properties registered with Shia Waqf Board, the values of which run into several thousands of crores.

“The survey is being done with good intention and orders have been given to identify Waqf properties first”, said Dharampal Singh, UP Minister for Waqf and Haj Affairs. The order for surveying all Waqf properties has been sent to all district magistrates and they have been asked to submit details of the properties within one month.

The survey is meant to find out whether waqf properties have been illegally occupied by individuals or organizations. Under Islamic customs, properties that are donated for religious and welfare work come under the category of ‘Waqf’, which means a charitable, religious endowment. This property, once donated, is treated as “Allah’s property”.

The state government had received numerous complaints about reported sale of waqf properties at rates lower than the prevailing market prices, with huge bribes paid to some Waqf Board members. It has also been found that some Board members appointed their acolytes as caretakers (mutawallis) of waqf properties, who grab them through various means. Waqf properties which are considered ‘Allah’s properties’ because of donations by people, are normally used as Imambara, mosque, kabristan (burial ground), Eidgah or ‘Karbala’ ground.

Waqf properties are also used for building schools colleges and hostels for the betterment of Muslim community. If there is any commercial property on Waqf land, the earnings from the property is used for the welfare of the community.

The game begins when Waqf Boards appoint caretakers or mutawallis to look after these properties. These caretakers in connivance with property dealers and other vested interests, sell these properties at throwaway prices or allow outsiders to grab them. Lakhs and crores worth bribe money is paid for acquiring these waqf properties. In Delhi, AAP MLA Amanatullah Khan is facing charge of demolishing a madarsa, and built shops in its place. These shops were rented out at nominal rates, and, in return, crores of rupees in bribes were paid.

According to UP Shia Waqf Board chairman Ali Zaidi, waqf properties have become the favourite targets for ‘land mafia’. The Waqf Board law clearly says, no property shall be rented or leased out at less then 2.5 per cent of market value, and no rent or lease agreement shall be for a period exceeding 11 months, but these rules have been flouted.

Ali Zaidi had lodged complaints about illegal occupation of six major waqf properties, like Moti Masjid in Lucknow’s Thakurganj, the burial ground in Mahanagar locality of Lucknow, the Imambara in Lal Bagh and the Chhota Karbala in Prayagraj. He had also alleged that a large portion of Ghulam Haider Imambara in Prayagraj was illegally sold to land mafia, and some portions were rented out.

The accused was Waqar Rizvi, who was appointed caretaker (mutawalli) by the then Shia Waqf Board chairman Waseem Rizvi. Later, local authorities used bulldozers to raze illegal constructions on Imambara land and the matter was handed over to CBI for probe. According to Farman Naqvi, advocate for Imambara in Allahabad High Court, the entire conspiracy was masterminded by the then Shia Waqf Board chief Waseem Rizvi.

According to one calculation, nearly 60 to 70 per cent waqf properties in UP have been illegally occupied. Across India, Waqf Boards owned nearly four lakh acres of land in 2009, which went up to 18 lakh acres by 2022. Presently, Waqf Boards are the third largest owner of properties in India, after Army and Railways. In most of the states, board members appoint their own men as caretakers (mutawallis) to occupy such properties, and in reverse, even government owned or private land is also shown as waqf property and occupied by vested interests.

I would like to mention a stark example of how properties are acquired in the name of waqf. In Tiruchirapalli, Tamil Nadu, an entire village was shown as waqf property despite the fact that most of the population in this village belonged to Hindu community. There is a 150-year-old temple in this village. Yet, the ancestral homes and land of residents in this village, were sought to be occupied by showing them as waqf properties. The people of this village had to take NOC (no objection certificates) from the Waqf Board for selling their properties.

Since documents relating to waqf properties are tampered with, such a survey by UP government is a welcome step. There is another example. The famous Chandrashekhar Azad Park (formerly Alfred Park) in Prayagraj, where the great revolutionary shot himself during an encounter with British Indian police in 1931, was shown as waqf property before the Allahabad High Court. There are thousands of similar cases, and the Muslim ulema is now supporting Yogi Adityanath in his move to carry out a state-wide survey.

Yogi government’s order relates to survey of all waqf properties registered after 1989. AIMIM chief Asaduddin Owaisi questioned why the 1989 cut-off year was decided. UP government sources said, on April 7, 1989, the revenue department of the then Congress government led by Chief Minister Narayan Dutt Tiwari had issued an order under which uncultivable land was “illegally registered” as waqf property.

The order stated that since several waqf properties are registered as fallow land, the revenue records should be corrected and the properties should be mentioned as kabristan, masjid or Eidgah. Because of this order, thousands of government and panchayat land were registered as waqf properties.

On September 7 this year, the Yogi government revoked the 1989 revenue department order. It directed all divisional commissioners and district magistrates to examine, within one month, all proceedings that were carried on under the 1989 order, in order to correct revenue records accordingly. The survey of waqf properties will also be completed by October 8.

AIMIM chief Asaduddin Owaisi, while questioning the 1989 deadline, alleged that the UP government is targeting Muslims. “This will not end with surveys of madarsas and waqf properties. The UP government wants to occupy waqf properties.”

Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav said, “those who were claiming to make UP a trillion-dollar economy, are now embroiling Hindus and Muslims in disputes. Yogi must reveal his plans for making UP an economic powerhouse of India”.

On February 21 this year, the Centre had sent a letter to all state governments asking them to correct their land records after conducting surveys, as numerous complaints had been received about waqf properties being registered in the name of individuals and private organisations in revenue records.

In pursuance of this letter, Yogi government directed all district magistrates to conduct the survey of waqf properties. UP deputy chief minister K P Maurya said, the state government will try to remove illegal occupation of waqf properties, and these would be used for the welfare of poor Muslims.

The issue of waqf properties should be seen in the correct perspective, instead of looking at it from political angles. Politicians may say that the survey will only reveal how much government land had been occupied by waqf boards, but this is a half-truth. The survey will reveal how much waqf properties have been illegally occupied.

The survey will also reveal the names and faces of those who have grabbed waqf properties through illegal means, by purchasing them at throwaway prices. This will ultimately benefit the Waqf Boards and poor Muslims. More land will be available as burial grounds, for building schools and colleges for Muslim students, and the earnings of Waqf Boards will rise.

The survey will help in reoccupying waqf land grabbed by vested interests. Naturally, some leaders and their acolytes are worried about this survey. This survey in UP is a follow-up of the Centre’s direction for conducting a survey of all waqf properties in India. According to one estimate, there is nearly 18 lakh acres land lying as waqf property, but there are no authentic data to substantiate this. A nationwide survey of all waqf properties is the need of the hour.

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