Rajat Sharma

My Opinion

Covid pandemic in Maharashtra is alarming

akb 0909In my show ‘Aaj Ki Baat’ on Thursday night, I showed a viral video of Om Prakash Shete, who used to be OSD to former Maharashtra chief minister Devendra Fadnavis, describing the plight of Covid-19 victims in the state. At one point, Shete broke down saying “I feel very bad, cannot sleep at times. The common man is unable to save himself from Covid. We have served 17 lakh people till now, but still people are dying. Every day 600 people die. I feel exhausted after replying to umpteen number of requests from people for assistance. Many people are dying. It is my request to the court to remove this technical error.”
What is the technical error? When Fadnavis was chief minister, there was a medical assistance cell in the Chief Minister’s Office. Poor people who were unable to get costly medical treatment, used to send applications, and financial assistance was released to them from the Chief Minister’s Relief Fund. Shete was the man who used to clear these applications. When Uddhav Thackeray became the CM, he discontinued release of medical assistance from the Chief Minister’s Relief Fund. Thousands of poor people, who needed assistance for treatment of Covid, are now dying because Shete is helpless. This is one major reason why the Covid death toll in Maharashtra is high.

It was this viral video which the Bombay High Court bench consisting of Chief Justice Dipankar Datta and Justice Girish Kulkarni referred to while disposing of an application for opening up place of religious worship. The Chief Justice said, “we can just say that the situation is alarming especially if we look at the numbers, which are rising daily. We have received numerous messages stating that the situation in Maharashtra is really bad.”
Referring to Om Prakash Shete’s video that was sent to the court through WhatsApp, the Chief Justice said, “if the contents of this video are authentic and true, then we think something should be done at the earliest…but for that you (Advocate General) need to verify the authenticity of this video and ascertain if this man is indeed the officer of the Chief Minister’s Medical Assistance Cell.”

Maharashtra accounts for nearly 20 per cent of total number of Covid cases in India. Out of 58.2 lakh Covid cases in India, Mahrashtra accounts for 12.6 lakh. Out of these, 9.56 lakh people recovered in Maharashtra. Out of 92,290 Covid related deaths in India, Maharashtra accounts for 33,886 deaths. Andhra Pradesh, Tamil Nadu and Karntaka come second, third and fourth respectively in the Covid list.

Mumbai has been the Corona hotspot since the beginning, and there has been a consistent rise in the number of Covid cases. Social distancing norms are still being ignored in Mumbai and other cities of Maharashtra. We have visuals of crowds inside Mumbai’s suburban trains similar to those that we used to see in pre-pandemic days. Most of the commuters do not wear masks, and they jostle one another in order to gain a foothold inside the train coach.

Officials argued that since it rained heavily on Thursday, fewer suburban trains ran because of which there were huge crowds of commuters. But the fact remains that even when the weather was normal on Friday, similar crowds were seen in suburban trains. Commuters were saying on camera that they would face more crowds if they travelled in buses.

Maharashtra government needs to pay more attention to arrest the spread of Covid pandemic, both in Mumbai and in the hinterland. On Friday, 21,029 new Covid cases were reported from Maharashtra. In his video meeting with Maharashtra chief minister Uddhav Thackeray on Thursday, Prime Minister Narendra Modi advised him to focus on those 20 districts where the pandemic is spreading. In all, there are 60 districts in India which account for nearly 80 per cent of Covid cases. Uddhav Thackeray had promised the PM that his government would put in its best to control the spread of pandemic.

But Thackeray is facing a Himalayan challenge. Where is the infrastructure? Where are the hospitals, where are the oxygen cylinders and where are the doctors and healthcare workers needed to tackle the pandemic? Above all, why is the infrastrutcture that was created in March and April to tackle Corona not being used? The same situation is prevalent in Nagpur. Covid patients are facing shortage of hospital beds, there are inadequate number of oxygen cylinders, and above all, there is acute scarcity of doctors and healthcare workers.

I know for a fact that five buildings in Nagpur were converted into a Covid hospital. It was equipped with beds, oxygen cylinders and medical equipments. But this Covid hospital is now locked. Local officials say there is lack of doctors and para-medical staff, because of which this hospital has been locked. Uddhav Thackeray needs to fix all such loopholes, on a war footing.

Th he present Covid situation in Maharashtra was alarming and there has been a steep rise in number of Covid cases, particularly in rural areas.

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चीन पहले अपने वादे को निभाए

मै आपको बता दूं कि इस वक्त अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर पचास हजार जवान तैनात हैं। पांच हजार आईटीबीपी के जवानों की तैनाती है, जो अधिक ऊंचाई वाले इलाके, मुश्किल हालात में सर्वाईव करने में और जंग करने में माहिर हैं। इस इलाके में राफेल के साथ सुखोई-30, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे फाइटर जेट भी लगातार उड़ान भर रहे हैं। चीन की तरफ भी सैनिकों की तैनाती जबरदस्त है।

AKB2209 बुधवार की रात अपने शो ‘आज की बात’ में मैंने पहली बार आपको अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सैनिकों की तैनाती के दृश्य दिखाए। भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी में से 1,080 किलोमीटर का हिस्सा अकेले अरुणाचल प्रदेश में पड़ता है। यहां से तिब्बत बिल्कुल करीब है। तिब्बत के पठार के अधिकांश हिस्से को अरुणाचल के एलएसी से आसानी से देखा जा सकता है। कई प्वाइंट्स पर तो हालात ये है कि भारत और चीन के जवान एक दूसरे को आमने-सामने देख सकते हैं और बात कर सकते हैं।

चीन के बारे में जैसा आप जानते हैं कि वह 50 के दशक से ही अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताने की कोशिश करता रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिणी तिब्बत’ का हिस्सा बताकर इसे भारत के एक राज्य के रूप में मान्यता नहीं देता है। देश के टीवी दर्शकों ने अबतक अपने टीवी स्क्रीन पर एलएसी को लेकर ज्यादातर दृश्य लद्दाख का ही देखा है जो कि पश्चिमी सेक्टर में पड़ता है। उन्होंने एलएसी के पूर्वी सेक्टर में पड़ने वाले अरुणाचल प्रदेश का दृश्य कम ही देखा है। जबकि टेंशन तो पूरी एलएसी पर है। अरूणाचल प्रदेश से लगती चीन की सीमा पर भी दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं। इंडिया टीवी रिपोर्टर अनुपम मिश्रा कैमरामैन सुजीत दास के साथ एलएसी तक गए और उस जगह की तस्वीरें भेजी हैं, जहां से सिर्फ दो सौ मीटर की दूरी पर हिन्दुस्तान और चीन के जवान एक-दूसरे के सामने मोर्चा संभाले खड़े हैं।

मै आपको बता दूं कि इस वक्त अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर पचास हजार जवान तैनात हैं। पांच हजार आईटीबीपी के जवानों की तैनाती है, जो अधिक ऊंचाई वाले इलाके, मुश्किल हालात में सर्वाईव करने में और जंग करने में माहिर हैं। इस इलाके में राफेल के साथ सुखोई-30, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे फाइटर जेट भी लगातार उड़ान भर रहे हैं। चीन की तरफ भी सैनिकों की तैनाती जबरदस्त है।

अरुणाचल प्रदेश में सरहद तक पहुंचना आसान नहीं है। हमारे रिपोर्टर और कैमरामैन भारत-चीन एलएसी के आखिरी प्वॉइंट तक पहुंचे, जहां से चीन की चोटियां, चीन की सरहद, चीन का पहाड़ी इलाका बिल्कुल साफ-साफ नजर आ रहा था। यहां पर भी अतिरिक्त सैनिकों की पूरी तैनाती हो चुकी है। लगातार ऊंचाई वाले इलाके में फॉरवर्ड पोस्ट की तरफ जवानों का मूवमेंट भी हो रहा है। हैवी आर्टिलरी गन समेत तमाम सेना के कई अहम हथियार और युद्ध के साजो-सामान भी तैनात किए जा चुके हैं।

सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण से हम आपको इस बात की बारीक डिटेल दे नहीं सकते कि किस तरह के युद्ध के हथियार और साजो-सामान यहां इकट्ठा किए गए हैं लेकिन मैं इतना बता सकता हूं कि इस वक्त अरुणाचल में भारत और चीन के बीच एलएसी पर हमारी सेना बिल्कुल अलर्ट है। आर्मी के लिए सप्लाई लाइन लगातार चालू है। आने वाले ठंड के मौसम को देखते हुए रसद और अन्य दूसरे सामान यहां पहुंचाए जा रहे हैं। इस इलाके का सबसे बड़ा दुश्मन मौसम है। सर्दियों के दौरान, बर्फबारी और भूस्खलन के बीच जीना बेहद मुश्किल होता है। दिन में यहां न्यूनतम तापमान माइनस 10 डिग्री रहता है तो वहीं रात में यह घटकर माइनस 20 डिग्री तक चला जाता है। लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी हमारे जवान चीनी सैनिकों की हर चाल पर पहाड़ की ऊंचाइयों से नजर रख रहे हैं।

एलएसी पर जारी तनाव के बीच चीन की ओर से लगातार विभिन्न तरह के संकेत भेजे जा रहे हैं। सोमवार की रात को चीनी सेना द्वारा तिब्बत की राजधानी ल्हासा में हवाई हमले का सायरन बजाया गया था। सायरन बजने के बाद अफसरा-तफरी मच गई और लोग बंकर्स की तरफ भागे। दरअसल, साफतौर पर यह चीन की सेना (पीएलए) की चाल थी। इस तरह की हरकत दुश्मन को दबाव में लाने और विरोधी को अचानक चौंका कर गलत कदम उठाने के लिए मजबूर करने के लिए की जाती है। चीन ने इस हरकत के जरिए हमारी वायुसेना का रिएक्शन देखने और परखने की कोशिश की। लेकिन भारतीय सेना के अफसर और जवान चीन की इस चाल में नहीं फंसे। कोई जवाब नहीं दिया गया। लेकिन ये सही है कि हमारी आर्मी और एयरफोर्स पूरी तरह तैयार है। बुधवार को राफेल की गगनभेदी गर्जना लद्दाख में सुनाई दी। राफेल लड़ाकू विमानों ने लद्दाख में एलएसी के पास उड़ान भरी जिसे देखकर लोग रोमांचित हो उठे।

हालांकि, भारत और चीन के बीच अग्रिम मोर्चे पर और सैनिक नहीं भेजे जाने को लेकर सहमति बनी है लेकिन चीन ने जो पचास हजार जवान पूर्वी लद्दाख के अलग-अलग फ्रिक्शन प्वाइंट पर तैनात कर रखा है, उसे कब पीछे हटाएगा इसपर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। चीन ने जो फाइटर जेट्स, गोला बारूद, एंटी टैंक मिसाइल आदि हाथियार इकट्ठा कर रखा है उसे चीनी सैनिक अपने साथ कब पीछे ले जाएंगे इसपर बात अटकी हुई है। कुल मिलाकर, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संयुक्त राष्ट्र में यह दावा करने के बावजूद कि उनका देश न तो कोल्ड वार चाहता है और न ही हॉट वार, चीनी सेना के जनरलों के रवैये और इरादे में कोई बदलाव नहीं आया है।

भारतीय सेना की खुफिया इकाई के पास पूरी जानकारी है कि चीन ने सरहद के पास कितने जवानों को तैनात किया है। कहां- कहां पर कौन से हथियार फिट किए गए हैं। कौन-कौन से फाइटर जेट तैनात किए गए हैं और हकीकत ये है कि शी जिंनपिंग के शान्ति के बयान के बाद भी एलएसी पर तैनात चीन के जवानों की संख्या कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ गई है। एलएसी की तरफ हथियारों के मूवमेंट का सिलसिला बंद नहीं हुआ है। इसीलिए हमारी तरफ से चीन को साफ-साफ कहा गया है कि पहले चीन पीछे हटे, जवानों की, टैंकों और अन्य हथियारों की तैनाती को कम करे और इसके सबूत दे। उन सबूतों को जब हमारी सेना वैरीफाई कर लेगी, उसके बाद ही शान्ति हो सकती है, तभी तनाव कम हो सकता है। अन्यथा यह गतिरोध जारी रहेगा। अब यह चीन पर निर्भर करता है कि वह अपने वादे पर अमल कर शांति की राह बनाना चाहता है या फिर गतिरोध को बरकरार रखना चाहता है।

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China must act on what it has promised

akb0809In my show ‘Aaj Ki Baat’ on Wednesday night, for the first time, I showed ground visuals of our troops deployed near the Line of Actual Control in Arunachal Pradesh. Out of 3,488 kilometre long LAC between India and China, Arunachal Pradesh alone accounts for 1,080 kilometres. Most of the Tibetan plateau can be seen from LAC in Arunachal Pradesh. At some points, Indian jawans and Chinese soldiers have even close eyeball contact and can speak to each other.
China has been claiming Arunachal Pradesh as “Southern Tibet” since the Fifties and has, till now, refused to accept this full-fledged state as Indian territory. Television viewers in India have so far seen the LAC on their screens mostly from Ladakh in the western sector, and they have rarely seen visuals from the eastern sector in Arunachal Pradesh, where both the armies are guarding the LAC. India TV reporter Anupam Mishra along with cameraperson Sujit Das took ground visuals from as near as 200 metres where Indian jawans and Chinese soldiers have been deployed facing each other.
The Indian army has deployed nearly 50,000 troops in Arunachal Pradesh sector with almost 5,000 Indo-Tibetan Border Police personnel also stationed to guard the LAC. These jawans are trained to guard our frontiers at high altitudes and can survive in cold winter. Indian Air Force has deployed Rafale, Sukhoi-30, Mirage-2000 and MiG-29 aircraft which are regularly carrying out sorties. China has also deployed a sizable number of troops.
Our reporter and cameraperson reached the last point of LAC from where the mountain peaks and hilly terrain under Chinese control can be clearly seen. Heavy artillery guns and other strategic assets have been deployed along with additional troops in this sector and there is constant movement of troops on the Indian side.
Due to operational and tactical reasons, we cannot share the minute details of the strategic assets here. Our armed forces are on full alert and the supply lines are active. Our troops are preparing for a long haul during snowfall this winter. Weather is the biggest enemy here and during winter, the very act of survival in the face of snowfall and landslides is a tough task. In daytime, the minimum temperature is minus 10 deg C and at night it drops to minus 20 deg C. Our jawans are keeping a hawk’s eye from mountain heights on Chinese troop movements.
In the midst of tension across the LAC, the Chinese leadership is constantly sending out mixed signals. On Monday night, air raid sirens were sounded in Lhasa, the capital of Tibet, by Chinese army. Clearly, the PLA is trying to test waters by sounding false air raid sirens. The Chinese are also trying to test the reaction time of our armed forces, but the Indian army is not going to fall in their trap by over-reacting. Rafale jet fighters carried out sorties near the LAC in Ladakh on Wednesday to the delight of Indians watching the aircraft.
Though India and China have agreed not to make further deployment of troops in forward areas, there is still no clarity on whether China will reduce its 50,000-strong troops in Tibet adjoining Ladakh sector. There is no information about whether China will reduce its deployment of jet fighters, artillery guns, tanks and other heavy weapons in forward areas. Overall, there has been no change in the attitude and intent of Chinese army generals despite President Xi Jinping claiming in the UN that his country neither wants a Cold War, nor a hot war.
Indian army intelligence is keeping a close watch on Chinese troops and strategic assets deployment. Till now, there has been no reduction in troops or weapons by China near the LAC. On the contrary, troops and weapon deployment is being increased at some points. India has clearly told China to reduce its troop deployment and withdraw its tanks, artillery pieces and jet fighter from forward areas. This must be verifiable. Once the reduction in deployment is verified, one can look forward to reduction in tension on India-China border. Otherwise, the standoff will continue. It is now up to China whether it wants to ‘walk the talk’.

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जमीनी हालात को समझने लगा है चीन

पीएलए का कहना है कि पैंगोंग झील के दक्षिणी तट की चोटियों से भारत को सबसे पहले अपने सैनिकों को हटाना चाहिए। भारतीय जवान अभी पैंगोंग झील के दक्षिणी तट के पास ठाकुंग से लेकर गुरुंग हिल तक के हिस्से पर अपना कंट्रोल बनाए हुए हैं। स्पंगगुर गैप, मगर हिल, मुखपारी, रेजांग ला और रेछिन ला तक कई अहम चोटियों पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। इन ऊंची चोटियों से भारतीय सैनिक चीन की हर हरकत पर नजर रख सकते हैं। चीन की सड़कें, चीनी सैनिकों के पोस्ट, मोल्दो में चीनी सैनिकों का जमावड़ा, इन सबपर भारतीय सैनिकों की पैनी नजर है। भारत का कहना है कि चीन को डेपसांग, पैंगोंग झील और गोगरा हॉट स्प्रिंग्स से अपने सैनिकों को हटाना चाहिए, लेकिन चीन की सेना इसके लिए तैयार नहीं है।

AKB2309 भारत और चीन के बीच लद्दाख में कोर कमांडर लेवल की छठे दौर की बैठक के बाद कुछ सकारात्मक संकेत उभरकर सामने आए हैं। दोनों देशों में इस बात पर सहमति बनी है कि अब सरहद पर फौज की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी। अग्रिम मोर्चे पर और अधिक सैनिक नहीं भेजे जाएंगे। सोमवार को करीब 14 घंटे तक चली बैठक में दोनों पक्षों की बीच बनी सहमति को लेकर संयुक्त बयान जारी किया गया। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए है कि (1) जमीनी स्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिश या कोई भी ऐसी कार्रवाई जो हालात को जटिल कर सकती है, उससे बचें (2) गलतफहमियों से बचें और शांति बनाए रखने के लिए कम्यूनिकेशन को मजबूत करें। (3) समस्याओं को उचित ढंग से सुलझाने के लिए व्यावहारिक उपाय करें और संयुक्त रूप से शांति बहाल करने की कोशिश करें और (4) जल्द से जल्द कमांडर लेवल की सातवें दौर की बातचीत शुरू हो।

हालांकि, एलएसी से सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर कोई सफलता नहीं मिली है। भारतीय सेना के सूत्रों ने बताया है कि दोनों पक्षों के बीच डिसएंग्जेमेंट और डी-एस्केलेशन के मुद्दे पर बातचीत का शायद ही कोई आधार था। दूसरी ओर, सैन्य और राजनयिक स्तर की बातचीत की आड़ में चीन की पीएलए सीमा के पास लॉजिस्टिक्स निर्माण और सैनिकों की तैनाती में जुटी है।

पीएलए का कहना है कि पैंगोंग झील के दक्षिणी तट की चोटियों से भारत को सबसे पहले अपने सैनिकों को हटाना चाहिए। भारतीय जवान अभी पैंगोंग झील के दक्षिणी तट के पास ठाकुंग से लेकर गुरुंग हिल तक के हिस्से पर अपना कंट्रोल बनाए हुए हैं। स्पंगगुर गैप, मगर हिल, मुखपारी, रेजांग ला और रेछिन ला तक कई अहम चोटियों पर भारतीय सैनिक तैनात हैं। इन ऊंची चोटियों से भारतीय सैनिक चीन की हर हरकत पर नजर रख सकते हैं। चीन की सड़कें, चीनी सैनिकों के पोस्ट, मोल्दो में चीनी सैनिकों का जमावड़ा, इन सबपर भारतीय सैनिकों की पैनी नजर है। भारत का कहना है कि चीन को डेपसांग, पैंगोंग झील और गोगरा हॉट स्प्रिंग्स से अपने सैनिकों को हटाना चाहिए, लेकिन चीन की सेना इसके लिए तैयार नहीं है।

असल में चीन को लेकर हमेशा रहस्य बना रहता है। सच कभी पता नहीं चलता, क्योंकि चीन से कभी पूरी जानकारी सामने नहीं आती
। इसलिए चीन के
इरादों की थाह पाना हमेशा मुश्किल होता है। चीन शांति की बात तो करता है, लेकिन साथ ही भारतीय जवानों पर हमले के लिए अपने सैनिकों को आयरन रॉड लेकर भी भेज देता है। संयुक्त राष्ट्र में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि वो किसी तरह का तनाव नहीं चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘चीन का किसी भी देश के साथ न तो कोल्ड वार और न ही हॉट वार का इरादा है।’ लेकिन लद्दाख से सटे तिब्बत में शी की सेना ने भारत को डराने के लिए स्टील्थ जेट लड़ाकू विमान, बम वर्षक विमान और हमलावर हेलीकाप्टर्स की खेप के साथ-साथ बड़ी संख्या में सैनिकों का जमावड़ा कर रखा है। चीनी कम्युनिस्ट नेतृत्व के साथ समस्या यह है कि न तो चीन के लोग इनके इरादों पर भरोसा करते हैं और न ही चीन को विश्व मंच पर उन गरीब अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों का ही समर्थन मिल पा रहा है जिन्हें वह अरबों डॉलर कर्ज के रूप में देता रहा है।

चीन की अर्थव्यवस्था बदहाली के दौर से गुजर रही है और कोविड -19 महामारी फैलाने में संदिग्ध भूमिका के कारण चीन दुनिया भर में अलग-थलग भी पड़ गया है। चीन में एक्सपोर्ट लगभग बंद है, कारोबार बंद हो रहे हैं, लोग नाराज हैं। शी जिनपिंग के राजनीतिक विरोधी भी उनके खिलाफ माहौल बना रहे हैं। इन सारी बातें से ध्यान हटाने के लिए जिनपिंग ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोला, टेंशन क्रिएट किया ताकि राष्ट्रवादी भावनाओं का लाभ मिल सके, लेकिन यहां भी कामयाबी नहीं मिली।

चीन के साथ समस्या यह है कि वह एलएसी के पास अपनी हरकतों से भारत को डराने में विफल रहा और अब जमीन और हवा दोनों पर उसे भारतीय सेनाओं की ताकत का सामना करना पड़ रहा है। शी जिनपिंग ने अपनी सेना को एक ऐसे जाल में फंसा दिया है जिससे पीछे हटना मुश्किल है। इसीलिए, चीन की पीएलए डीपसांग, पैंगोंग और गोगरा हॉट स्प्रिंग्स में अपनी पोजीशन से पीछे हटने को तैयार नहीं है। यदि उनके सैनिक पीछे हटते हैं, तो वे अपने देशवासियों को क्या मुंह दिखाएंगे।

कोर कमांडर्स की बातचीत के दौरान केवल एक बात पर सहमति बनी और दोनों मुल्कों की तरफ से कहा गया है कि अब सीमा (अग्रिम मोर्चे) पर फौज नहीं बढ़ाई जाएगी। शी जिनपिंग के सामने मुश्किल ये है कि चीन इतना आगे बढ़ चुका है कि उसको फेस सेविंग का रास्ता भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि चीन भारतीय सैनिकों से लद्दाख की उन चोटियों से हटने पर जोर दे रहा है, जिसे भारतीय सेना के बहादुर जवानों ने एक ही रात में अपने नियंत्रण में ले लिया था।

सोमवार को कमांडर लेवल की मीटिंग में भारत ने चीन को साफ-साफ कह दिया कि अब सिर्फ बातें करने से काम नहीं चलेगा। क्योंकि चीन अपनी बात पर कायम नहीं रहता है इसलिए वह सबसे पहले पुरानी स्थिति बहाल करे। समयबद्ध तरीके से पीछे हटे, अप्रैल वाली यथास्थिति बहाल करे, उसके बाद ही टेंशन कम हो सकती है। भारत की मजबूत पोजीशन और कड़े रूख का ही असर है कि चीन के राष्ट्रपति को संयुक्त राष्ट्र में कहना पड़ा कि वो टेंशन नहीं चाहते। किसी तरह का युद्ध नहीं चाहते।

फिलहाल, दोनों देशों के बीच सरहद पर सैनिकों की संख्या नहीं बढ़ाने पर सहमति बन गई हैं। अगर अग्रिम मोर्चे पर और सैनिक नहीं भेजकर इस समझौते का पालन किया जाता है तब उम्मीद तो करनी चाहिए कि अब एलएसी पर टेंशन कम होगी। लेकिन न तो हमारी फौजी तैयारी कम होगी, न तैनाती कम होगी। क्योंकि चीन की बात पर तब तक यकीन नहीं किया जा सकता, जब तक चीन अपनी सेना को पीछे हटा ना ले और हमारी फौज इसकी पूरी तरह से पुष्टि ना कर दे।

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China Feels The Heat

The Chinese economy is in bad shape and China is almost isolated in the world because of its questionable role in spreading Covid-19 pandemic.

akb1809One positive sign that has emerged from the sixth round of Corps Commander level talks between India and China in Ladakh is that both sides have agreed not to send more troops to forward areas. In talks that went on for 14 hours on Monday, the two sides in a joint statement agreed (1) avoid unilateral changes on ground, or any action that can complicate the situation, (2) avoid misunderstandings and misjudgments and strengthen communication to maintain peace (3) take practical measures to solve problems properly and jointly safeguard peace and tranquility and (4) hold the seventh round of military commander level talks as soon as possible.

However, there was no breakthrough on the issue of withdrawing troops from LAC. Indian army sources said that there was hardly any meeting ground between the two sides over the issue of disengagement and de-escalation. On the other hand, the Chinese PLA is using the cover of military and diplomatic level talks to carry out logistics build-up and beef up its troops near the border.

The PLA is demanding that India should first withdraw its troops from tactical heights that it gained on the southern bank of Pangong lake. Indian jawans are presently in control of several tactical heights on the ridgeline stretching from Thakung near southern bank of Pangong lake to Gurung Hill, Spanggur Gap, Magar Hill, Mukhpari, Rezang La and Reqin La. From these heights, Indian troops can keep watch on Chinese positions, roads and the Chinese military garrison in Moldo. India has demanded that China should disengage its troops from Depsang, Pangong lake and Gogra Hot Springs, but the Chinese army is unwilling.

It is always difficult to fathom Chinese intentions that are mostly wrapped in the cloak of mystery. It can talk of peace and tranquility, but at the same time, can also send its troops armed with iron clubs and steel rods to attack Indian jawans. At the United Nations, the Chinese President Xi Jinping said “China has no intention of fighting either a Cold War or a hot war with any country”, but in Tibet adjoining Ladakh, its army has amassed stealth jet fighters, bombers, attack helicopters and a huge concentration of troops to intimidate India. The problem with the Chinese communist leadership is that neither the Chinese people trust its intentions nor has China able to garner support at world forums despite pumping in billions of dollars as loans to poor African and South American countries.

The Chinese economy is in bad shape and China is almost isolated in the world because of its questionable role in spreading Covid-19 pandemic. Exports from China are down, industries and businesses are closing down and Xi’s political rivals are secretly gunning for him. In order to divert the attention of Chinese people, Xi opted to ratchet up border tension with India in order to take advantage of Chinese nationalistic sentiments.

The problem with China is that it failed to intimidate India near the LAC by committing transgressions and is now facing the might of Indian armed forces, both on land and in air. Xi Jinping has drawn his army into a trap from which it is difficult to retreat. That is why, the Chinese PLA is unwilling to withdraw from its positions in Depsang, Pangong and Gogra Hot Springs. If their troops withdraw, they will have to face ignominy before their own countrymen.

The only point agreed upon during talks was that India and China will not send more troops to forward areas. Xi Jinping’s problem is that the Chinese army has stretched itself too much and it badly needs a face saving device. That is why, China is insisting on Indian troops to withdraw from the tactical heights in Ladakh that its brave jawans achieved in a single night.

In Monday’s commander level talks, India bluntly told China that mere talks will not do, because China has not been fulfilling the promises that it had made in earlier talks. The Indian side insisted that China, in a time bound manner, must agree to status quo ante, the position where its troops were stationed in April this year. This is the only way to reduce tensions completely. It is because of India’s firm stand that the Chinese President had to tell at the UN that it does not want to create tension, nor does it seek a war.

If the first step towards not sending fresh troops to forward areas is implemented, one can hope that tensions near the LAC in Ladakh may gradually subside provided that no fresh friction takes place. Our army jawans will not lower their guard, and all the preparations and deployment will still be in place. China cannot be trusted, until and unless it pulls out its troops from forward areas, and our army confirms that it has done so.

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हंगामा करने वाले सांसदों को देश कभी माफ नहीं करेगा

मंगलवार की सुबह देश ने देखा कि डिप्टी चेयरपर्सन हरिवंश अपने घर से चाय लेकर धरनास्थल पर आए और सभी निलंबित सांसदों को खुद चाय पिलाई। यह हरिवंश की मानवता थी। यह उनके बड़े दिल और उच्च नैतिक मूल्यों को दिखाता है। जो कानून बनाते हैं वे ही नियमों की धज्जियां उड़ाने लगेंगे, शिष्टाचार की परवाह नहीं करेंगे, तो वे आम आदमी से सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि सांसद अपने खुद के पीठासीन अधिकारी की इज्जत नहीं करेंगे, माइक तोड़ेंगे और कागजात फाड़ेंगे, तो क्या उन्हें लगता है कि आम आदमी उनके इस व्यवहार को देखकर खुश होगा? राज्यसभा को हाउस ऑफ एल्डर्स कहा जाता है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के बेहद अनुभवी और पढ़े-लिखे सदस्य सारे राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां बैठते हैं और कानून बनाते हैं।

AKB2209 राज्यसभा में रविवार को 2 कृषि विधेयकों के पारित होने के दौरान विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा किया। उनमें से कुछ सेक्रेट्री जनरल की मेज पर चढ़ गए, तो कई अन्य चेयरमैन के पोडियम पर जाकर खड़े हो गए। कुछ विपक्षी सांसदों ने डिप्टी चेयरपर्सन हरिवंश की माइक को तोड़ दिया, उन्हें लगातार परेशान करते रहे, सदन के वेल में कागजात को फाड़ा और मार्शलों के साथ दुर्व्यवहार किया। उनमें से कुछ ने डिप्टी चेयरपर्सन पर कागजात और रूलबुक फेंका, साथ ही उन्हें धमकियों और गालियों से डराने की कोशिश भी की।

विपक्षी सांसद मांग कर रहे थे कि कृषि विधेयकों को एक हाउस कमिटी को भेजा जाए, लेकिन उनके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं था। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के मुताबिक, फार्म बिलों का विरोध करने वाले सांसदों की संख्या 70 के आसपास थी, जबकि 110 सांसद इसके समर्थन में थे। विपक्ष द्वारा हंगामा किए जाने के कारण कोई विभाजन नहीं किया जा सका। यह भारत के 70 साल लंबे संसदीय इतिहास के सबसे अंधेरे क्षणों में से एक था। देश इन सांसदों को उनके गैरजिम्मेदाराना और शर्मनाक आचरण के लिए कभी माफ नहीं करेगा। राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने सोमवार को हंगामा करने वाले 8 सांसदों को एक सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया। सदन के स्थगित होने के बाद ये सभी सांसद संसद परिसर के अंदर ही धरने पर बैठ गए।

मंगलवार की सुबह देश ने देखा कि डिप्टी चेयरपर्सन हरिवंश अपने घर से चाय लेकर धरनास्थल पर आए और सभी निलंबित सांसदों को खुद चाय पिलाई। यह हरिवंश की मानवता थी। यह उनके बड़े दिल और उच्च नैतिक मूल्यों को दिखाता है। जो कानून बनाते हैं वे ही नियमों की धज्जियां उड़ाने लगेंगे, शिष्टाचार की परवाह नहीं करेंगे, तो वे आम आदमी से सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि सांसद अपने खुद के पीठासीन अधिकारी की इज्जत नहीं करेंगे, माइक तोड़ेंगे और कागजात फाड़ेंगे, तो क्या उन्हें लगता है कि आम आदमी उनके इस व्यवहार को देखकर खुश होगा? राज्यसभा को हाउस ऑफ एल्डर्स कहा जाता है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के बेहद अनुभवी और पढ़े-लिखे सदस्य सारे राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहां बैठते हैं और कानून बनाते हैं।

हंगामा करने वाले सांसद ये भी भूल गए थे कि वे कोरोना के समय में सोशल डिस्टैंसिंह के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वे जानबूझकर उन सारे सख्त प्रोटोकॉल्स तोड़ रहे थे जिन्हें कार्यवाही के सुचारू संचालन के लिए संसद के दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने सावधानीपूर्वक तैयार किया था। हंगामा करने वाले सांसदों को एक सप्ताह के लिए निलंबित करने की राज्यसभा के सभापति की कार्रवाई सही दिशा में उठाया गया कदम है। प्रत्येक राजनेता को असहमति व्यक्त करने, विरोध व्यक्त करने और लोगों की आवाज उठाने का हक है, लेकिन सदन के भीतर इन सांसदों ने जिस तरह का व्यवहार किया है वह पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

ऐसा नहीं है कि सरकार कृषि बिलों को लेकर चिंताओं और आशंकाओं को दूर करने की कोशिश नहीं कर रही है। प्रधानमंत्री ने खुद कई बार कहा है कि न तो कृषि उपज विपणन समितियों (APMC), जिन्हें मंडी भी कहा जाता है, को बंद किया जाएगा और न ही अनाज और अन्य उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था को खत्म किया जाएगा। कई राज्यों में किसानों के बीच आधारहीन अफवाहें फैलाई जा रही हैं और उन्हें विपक्षी नेताओं द्वारा गुमराह किया जा रहा है।

कृषि विधेयकों के मुद्दे पर कांग्रेस डबल गेम खेल रही है। कुछ समय पहले ही डॉक्टर मनमोहन सिंह ने ‘मंडियों’ को खत्म करने की वकालत की थी। अजय माकन ने राहुल गांधी के बगल में बैठकर पार्टी के 2019 के चुनावी घोषणापत्र को जारी किया था जिसमें मंडियों को खत्म करने और कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को बढ़ावा देने का वादा किया गया था।। यहां तक कि कपिल सिब्बल ने संसद में अपने भाषण के दौरान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और ‘मंडियों’ को खत्म करने के पक्ष में भी बात की थी।

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने इस तरह की रणनीति अपनाई है। जब 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण बिल लाई थी, तो राहुल गांधी ने गवर्नमेंट को ‘सूट-बूट की सरकार’ कहा था। उन्होंने तब आरोप लगाया था कि मोदी सरकार अडानियों और अंबानियों की मदद कर रही है, और किसानों से कहा था कि सरकार उनके खेतों को उद्योगपतियों को सौंप देगी। यह मोदी के शासन का पहला साल था, और किसानों में गलतफहमी न फैले इसलिए सरकार ने विपक्ष के सामने झुकते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस ले लिया।

लेकिन अब वक्त बदल गया है। भारत के किसानों ने अब देख लिया है कि मोदी सरकार ने पिछले 6 सालों में कैसे उनकी मदद की है। फसल बीमा से लेकर मृदा कार्ड तक, प्रत्येक किसान के खाते में 6,000 रुपये सीधे ट्रांसफर करने से लेकर एमएसपी में भारी वृद्धि तक, मोदी सरकार ने किसानों के लिए बहुत कुछ किया है। अब भारतीय कृषि का चेहरा बदलने के लिए सरकार ये नए बिल लेकर आई है। कृषि उत्पादों की बिक्री पर लगी सारी रुकावटों को हटाने के बाद किसानों की औसत आय में निश्चित तौर पर वृद्धि होगी। किसानों के मुनाफे का अधिकांश हिस्सा खुद डकार लेने वाले बिचौलिए और कमीशन एजेंट हमेशा के खत्म हो जाएंगे। इस तरह किसानों के हिस्से का मुनाफा उनकी ही जेब में जाएगा।

यह निश्चित रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल देगा, और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जो वर्तमान में COVID महामारी के कारण संघर्ष कर रही है। बिचौलियों का जमाना अब बीत चुका है, बेहतर होगा कि विपक्षी दल इस बात को समझ लें और किसानों के हित में बोलना शुरू करें। जहां तक मोदी सरकार की बात है, तो यह संसद में विपक्ष से निपट चुकी है और अब सड़क पर भी उनका सामना करने के लिए तैयार है।

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Nation will never forgive the erring MPs

akb0809On Sunday, opposition MPs in Rajya Sabha created bedlam during the passage of two farm bills. Some of them stood on the Secretary General’s table, several others stood on the podium of the Chairman, yanked the Deputy Chairperson Harivansh’s mike, heckled him continuously, tore papers in the well of the House and misbehaved with the marshals. Some of them hurled papers and rule books at the Deputy Chairperson and tried to intimidate him with threats and abuses.

The opposition MPs were demanding that the bills be sent to a House Committee, but they lacked the numbers. According to Law Minister Ravi Shankar Prasad, only over 70 MPs opposed the bills, while 110 members supported the bills. No division could be carried out because of bedlam created by the opposition.

This was one of the dark moments in India’s 70-year-long parliamentary history. The nation will never forgive the MPs for their irresponsible and shameful conduct. The Rajya Sabha Chairman M. Venkaiah Naidu on Monday suspended the eight erring MPs for a week. These MPs sat on dharna inside Parliament premises after the House was adjourned.

On Tuesday morning, the nation watched as the Deputy Chairperson Harivansh brought tea from his home, came to the dharna site, and personally offered tea to the suspended MPs. This was a humane gesture from Harivansh. It displays his large heartedness and high moral values.

If lawmakers break their own rules, throw decorum to the wind, how can they expect respect from the common man? If MPs start insulting their own presiding officer, break mikes and tear up papers, do they think the common people will appreciate their behavior? Rajya Sabha is known as the House of Elders, where members with vast experience and knowledge in different fields, representing all the states, sit and frame laws.

Those MPs who indulged in hooliganism forgot that they were violating social distancing norms in the time of Corona. They were deliberately breaking all strict protocols that were meticulously prepared by the presiding officers of both Houses of Parliament for smooth conduct of proceedings. The action of the Rajya Sabha Chairman in suspending the erring MPs for a week is a step in the right direction. Every political leader has the right to question, to oppose, to express dissent and to convey the voice of the people, but the manner in which these MPs behaved inside the House is totally unacceptable.

It is not that the government is not trying to allay to fears and apprehensions being expressed over the farm bills. The Prime Minister himself has time and again said that neither the agricultural produce marketing committees (APMCs), known as mandis, will not be abolished, nor the MSPs (minimum support price) of cereals and other produces will be discontinued. Farmers in many states are being fed baseless rumours and they are being misguided by opposition leaders.

The Congress is playing a double game on the farm bills issue. In the recent past, former Prime Minister Dr Manmohan Singh had advocated abolition of ‘mandis’, Ajay Maken, with Rahul Gandhi sitting beside him, had released the party’s 2019 election manifesto promising abolition of ‘mandis’ and promotion of contract farming. Even Kapil Sibal had spoken in favour of contract farming and abolition of ‘mandis’ during his speech in Parliament.

This is not the first time that Congress has indulged in such tactics. In 2014, when the Narendra Modi government had brought the land acquisition bill, Rahul Gandhi had described the government as ‘suit-boot ki sarkar’. He had then alleged that the Modi government was helping the Adanis and Ambanis, and had told farmers that the government would hand over their farmland to industrialists at a pittance. It was the first year of Modi’s rule, and in order to assuage the feelings of farmers, the government, bowing to opposition, withdrew the land acquisition bill.

But now, the times have changed. Farmers in India have seen how Modi government has helped them during the last six years. From crop insurance, to soil card, from direct transfer of Rs 6,000 to the account of each farmers to big hikes in MSPs, Modi government has done a lot for farmers. Now, it has come with these new bills to transform Indian agriculture. The average income of farmers is bound to go up after removal of all restrictions on sale of farm produce. The middlemen and commission agents, who were cornering most of the farmers’ profits, will be removed forever, and farmers will pocket the profits.

This will definitely change the face of rural economy, and it will have a bandwagon effect on Indian economy which is presently struggling due to COVID pandemic. The days of middlemen are gone and it would be better if the opposition parties realize this and start speaking in the interest of the farmers. On its part, the Modi government has tackled the opposition in Parliament, and it is now ready to face them in the streets.

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मोदी के तीनों कृषि बिल निश्चित तौर पर किसानों के हित में हैं

प्रधानमंत्री ने किसानों को आश्वासन दिया कि गेहूं, चावल और अन्य कृषि उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीद जारी रहेगी और कृषि विपणन निकायों (कृषि मंडियों) की व्यवस्था को खत्म नहीं किया जाएगा। मोदी ने कहा कि ये तीन कृषि बिल पिछले 7 दशकों में किसानों पर थोपे गए प्रतिबंधों से मुक्त करेंगे। मोदी ने कहा, ‘ऐसी पार्टियां हैं जिन्होंने दशकों तक देश पर शासन किया है और अब किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। इन दलों ने पिछले चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में इन उपायों का वादा किया था, लेकिन अब जब एनडीए ने ऐसा किया तो वे इसका विरोध कर रहे हैं।

akb190920 संसद द्वारा इस हफ्ते पारित तीन कृषि विधेयकों को लेकर निहित स्वार्थों के चलते कुछ समूह और कुछ राजनीतिक दल, जिनमें मुख्य रूप से कांग्रेस शामिल है, किसानों के मन में संदेह और आशंकाएं पैदा कर रहे हैं। हालांकि कुछ किसान संगठनों ने 25 फरवरी को ‘भारत बंद’ का आह्वान किया है, लेकिन कई राजनीतिक दलों और उनके किसान संगठनों ने पहले ही विभिन्न राज्यों में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में बीजेपी की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने भी विधेयकों का विरोध किया है और उनकी मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीनों कृषि विधेयकों के बारे में किसानों को गुमराह करने के लिए विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस पर हमला बोला। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बिहार में कई परियोजनाओं की शुरुआत करते हुए मोदी ने इस कदम को ‘ऐतिहासिक’ बताया और आरोप लगाया कि तथाकथित किसानों के विरोध प्रदर्शनों को उन ‘बिचौलियों’ ने हवा दी है जिनके व्यावसायिक हितों को इन विधेयकों से चोट पहुंचेगी। उन्होंने किसानों से कहा कि वे बिचौलियों द्वारा फैलाई जा रही आधारहीन अफवाहों पर ध्यान न दें और इन बिलों का समर्थन करें क्योंकि इससे उनकी कमाई में वृद्धि होगी और बिचौलियों का खात्मा होगा।

प्रधानमंत्री ने किसानों को आश्वासन दिया कि गेहूं, चावल और अन्य कृषि उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीद जारी रहेगी और कृषि विपणन निकायों (कृषि मंडियों) की व्यवस्था को खत्म नहीं किया जाएगा। मोदी ने कहा कि ये तीन कृषि बिल पिछले 7 दशकों में किसानों पर थोपे गए प्रतिबंधों से मुक्त करेंगे। मोदी ने कहा, ‘ऐसी पार्टियां हैं जिन्होंने दशकों तक देश पर शासन किया है और अब किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। इन दलों ने पिछले चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में इन उपायों का वादा किया था, लेकिन अब जब एनडीए ने ऐसा किया तो वे इसका विरोध कर रहे हैं।

आइए, एक-एक करके तीनों विधेयकों को समझते हैं। सबसे पहले, कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक एक इको-सिस्टम बनाएगा जहां एक किसान भारत में कहीं भी अपनी उपज बेच सकता है। इसके अंतर्गत इंटर-स्टेट और इंट्रा-स्टेट ट्रेडिंग, यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग की भी इजाजत होगी। किसान विपणन में आने वाली लागत पर बचत करेंगे। वर्तमान व्यवस्था के तहत एक किसान केवल APMC या एक पंजीकृत लाइसेंसधारी या राज्य सरकार के माध्यम से ही अपनी उपज बेच सकता है। वह अपनी उपज को ई-ट्रेडिंग या इंट्रा-स्टेट ट्रेडिंग के माध्यम से नहीं बेच सकता है। विपक्ष का कहना है कि किसानों को एपीएमसी से पर्याप्त कीमत मिलती थी, बाजार विनियमित होता था और राज्य सरकारें मंडी शुल्क कमाती थीं। सरकार का कहना है कि APMC और MSP को खत्म नहीं किया जाएगा और यह व्यवस्था जारी रहेगी।

दूसरी बात, कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक के चलते रिस्क किसानों से ट्रांसफर होकर उन लोगों पर शिफ्ट हो जाएगा जो उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट अग्रीमेंट करेंगे। कॉन्ट्रैक्ट खेती के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा प्रदान किया जाएगा। एक किसान अपनी उपज को निश्चित दरों पर बेचने के लिए कंपनियों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों और बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ अनुबंध या कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अग्रीमेंट में कृषि उत्पादों के ग्रेड, गुणवत्ता, मानकों और कीमतों के लिए नियम और शर्तें निर्धारित होंगी। सरकार का कहना है भले ही उत्पादों की कीमत में गिरावट आ जाए, किसानों को समझौते में तय दरों के अनुसार ही भुगतान किया जाएगा। समझौते में बोनस और प्रीमियम का भी प्रावधान होगा।

इस बिल का विरोध करने वालों का कहना है कि भले ही रेट की गारंटी दी गई हो, लेकिन कीमत तय करने के तरीके के बारे में कोई स्पेसिफिक मैकेनिज्म नहीं बताया गया है। उन्हें डर है कि प्राइवेट कॉर्पोरेट किसानों का शोषण कर सकते हैं। उनका कहना है कि अधिकांश कृषि क्षेत्र असंगठित हैं और उनके पास बड़े कॉर्पोरेट्स से डील करने के लिए संसाधनों की कमी है। वर्तमान में, किसान की उपज पूरी तरह से मॉनसून, उत्पादन से संबंधित अनिश्चितताओं और बाजार की जरूरतों पर निर्भर करती है। इसमें बहुत ज्यादा रिस्क है और किसान को अपनी उपज पर पूरा फायदा नहीं मिलता है। भारत में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कोई नई बात नहीं है। गन्ने की खेती और मुर्गीपालन के क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पहले से ही चल रही है।

तीसरा है आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक। भारत में अधिकांश कृषि उत्पादों का सरप्लस है, लेकिन आवश्यक वस्तु अधिनियम के कारण कोल्ड स्टोरेज, गोदामों, प्रोसेसिंग और निर्यात में कम निवेश होता है। जब भी किसी फसल का उत्पादन काफी ज्यादा होता है तो किसान कीमतों में गिरावट और खेतों में अनाज और सब्जियों के सड़ने के कारण अच्छे रिटर्न पाने में असफल रहते हैं। नया विधेयक युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, अत्यधिक मूल्य वृद्धि और अन्य स्थितियों को छोड़कर उत्पादन, भंडारण, आवाजाही और वितरण पर सरकारी नियंत्रण को खत्म कर देगा। यह कोल्ड स्टोरेज और फूड सप्लाई चेन को आधुनिक बनाने में मदद करेगा, और अंततः किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हित में होगा। किसी भी उत्पाद के स्टॉक की सीमा तभी लागू होगी जब उसकी कीमत दोगुनी हो जाएगी। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। विपक्ष का कहना है कि ऐसा करने पर निर्यातक, प्रोसेसर और व्यवसायी फसल के सीजन में जमाखोरी का सहारा लेंगे और इसके चलते कीमतें अस्थिर हो जाएंगी। खाद्य सुरक्षा खत्म हो जाएगी। आलोचकों का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर जमाखोरी और ब्लैकमार्केटिंग को बढ़ावा मिलेगा।

इनमें से ज्यादातर आशंकाएं निराधार हैं। APMC और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था जारी रहेगी, अंतर सिर्फ इतना होगा कि किसानों को अपने राज्य के अंदर या बाहर, दोनों ही जगहों पर अपनी उपज को खरीदारों को अच्छी कीमत पर बेचने का बेहतर विकल्प मिलेगा। नए कृषि कानून किसानों को बिचौलियों और कमीशन एजेंटों के चंगुल से मुक्त कर देंगे। किसानों को उनकी मेहनत और निवेश की अधिकतम कीमत मिलेगी। ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि कॉर्पोरेट्स किसानों की जमीन हड़प लेंगे, लेकिन नए कानून में यह साफ किया गया है कि कॉर्पोरेट्स की भूमिका केवल उपज की खरीद तक ही सीमित रहेगी और वे न तो किसानों की ज़मीन खरीद सकते हैं और न ही उसे पट्टे पर ले सकते हैं। पंजाब में पेप्सिको पहले से ही आलू की सप्लाई के लिए किसानों के साथ मिलकर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रही है और यही मॉडल देश के अन्य राज्यों में भी लागू होगा।

यह भी आशंका जताई जा रही है कि किसानों को अपनी उपज की कीमत पाने के लिए कॉर्पोरेट्स के चक्कर लगाने होंगे। नए कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसानों से सीधे फसल खरीदने वाली कंपनियों को तुरंत भुगतान करना होगा और ईकॉ-मर्स के जरिए किया गया भुगतान ज्यादा से ज्यादा 3 दिन में किसान के अकाउंट में पहुंच जाना चाहिए।

कांग्रेस ने अपने पिछले चुनावी घोषणापत्र में किसानों के लिए इन उपायों का वादा किया था। फरवरी 2011 में जब डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, उन्होंने एक बेहतर मार्केटिंग चेन बनाने के लिए डिलीवरी सिस्टम को आधुनिक बनाने का आह्वान किया था। उन्होंने तब निजी क्षेत्र को कृषि क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए कहा था। लेकिन अब कांग्रेस ने पूरी तरह से यू-टर्न ले लिया है और अब वह इन विधेयकों को ‘किसान विरोधी’ बता रही है। यह साफ तौर पर वोट बैंक की राजनीति है। सरकार द्वारा किसानों को विधेयकों के प्रावधानों को समझाने के लिए समय मिलने से पहले ही कांग्रेस ने अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया।

पिछले 6 सालों से विपक्ष साइडलाइन है, लेकिन अब उसे किसानों के मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका मिल गया है। इस साल बिहार में चुनाव होने वाले हैं और 2022 में पंजाब में भी इलेक्शन होने हैं। इन दोनों ही राज्यों में किसानों का वोट डिसाइडिंग फैक्टर होता है। पीएम मोदी को इस बात का पूरा श्रेय जाता है कि वह किसानों के मन से भय और आशंकाओं के बादलों को दूर करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

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Modi’s three farm bills are definitely pro-farmer

The new law clearly stipulates that farmers must get their money within three working days if they sell through e-commerce, and corporates that buy produces directly must pay the farmers on the spot.

akb1209Doubts and apprehensions are being created in the minds of farmers by vested interest groups and some political parties, mainly the Congress, over three farm bills passed by Parliament this week. While some farmers’ organizations have given a call for ‘Bharat Bandh’ on February 25, several political parties and their farmers’ wings have already launched protests in different states. Shiromani Akali Dal, an ally of BJP in NDA, has opposed the bills and its minister Harsimrat Kaur Badal has resigned from the cabinet.

On Friday, Prime Minister Narendra Modi lashed out at the opposition, particularly the Congress, for misleading farmers about the three farm bills. Launching several projects in poll-bound Bihar through video conferencing, Modi described the measure as “historic” and alleged that so-called farmers’ protests have been engineered by “middlemen”, whose business interests will be hurt. He told farmers not to listen to baseless rumours being floated by middlemen, and support these bills because it will enhance their earnings will the elimination of middlemen.

The Prime Minister assured farmers that Minimum Support Price procurement of wheat, rice and other farm produces will continue and agricultural marketing bodies (Krishi mandi) will not be abolished. Modi said, the three farm bills will liberate farmers from many restrictions imposed over the years in the last seven decades. “There are parties who have ruled the country for decades and are now trying to misguide the farmers. These parties had promised these measures in their manifestos during the last election, but now that the NDA has done it, they are opposing it”, Modi said.

Let us examine the three bills one by one. Firstly, Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill will create an eco-system where a farmer can sell his produce anywhere in India. Inter-state and intra-state trading, even electronic trading, will be allowed. Farmers will save on marketing costs. At present, a farmer can sell his produce only through APMC or a registered licensee or the state government. He cannot sell through e-trading or intra-state trading. The opposition says, farmers used to get adequate prices from APMC, the market is regulated and the state government used to earn mandi fees. The government says, APMCs and MSPs will not be abolished, they will continue.

Secondly, The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Bill will provide for shifting of risks from farmers to those who enter into contract agreement with them. A national framework will be provided for contract farming. A farmer can enter into contract with companies, processors, wholesalers, exporters and big retailers to sell his produce at fixed rates. The contract farming agreement will stipulate terms and conditions for grades, quality, standards and prices of agricultural produces. Government says, even if the price drops, farmers will get money as per rates decided in the agreement. There will also be provisions for bonus and premium in the agreement. Those opposed to this bill say, even if the rates are guaranteed, no specific mechanism has been mentioned as to how the price will be decided. They fear that private corporates may exploit the farmers. They say, most of the farming sector is unorganized and they lack resources to take on big corporates. Presently, a farmer’s produce fully depends on monsoon, uncertainties relating to production and need for a favourable market. The risks are heavier and a farmer does not get full return on his produce. Contract farming is not new in India. In sugarcane and poultry sectors, contract farming is already in place.

Third, Essential Commodities (Amendment) Bill. In India, there is a surplus of most agricultural produces, but due to the Essential Commodities Act, there is less investments in cold storage, godowns, processing and exports. Whenever there is a bumper crop, the farmers fail to get good returns due to fall in prices, and grains and vegetables rot in fields. The new bill will end government control on production, storage, movement and distribution, except during war, natural calamities, exorbitant price rise and other conditions. This will help in modernizing cold storage and food supply chains, and will ultimately help both farmers and consumers. Stock limit will apply only when the price of a produce doubles. Foodgrains, pulses, oilseeds, edible oil, onion and potatoes have been removed from essential commodities list. Opposition says, if this is done, exporters, processors and businessmen will resort to hoarding during crop season and this will destabilize prices. Food security will end. Critics say, this will lead to rampant hoarding and blackmarketing.

Most of these apprehensions are baseless. APMCs and minimum support price regime will continue, the only difference will be that farmers will get better options of selling their produce at a higher rate to buyers, both from inside or outside the state. The new farm laws will break the shackles put on farmers by middlemen and commission agents. Farmers will get maximum price for their labour and investment. Fears have been raised about corporates grabbing farmers’ land, but the new law clearly limits the corporates to purchase of produce only, they cannot buy, mortgage or take farmers’ land on lease. In Punjab, Pepsico is already into contract farming with farmers for supply of potatoes and this model will replicate in other states too.

Fears have been raised about farmers having to run after the corporates to get back their earnings. The new law clearly stipulates that farmers must get their money within three working days if they sell through e-commerce, and corporates that buy produces directly must pay the farmers on the spot.

Congress had promised these measures for farmers in its last election manifesto. In February 2011, when Dr Manmohan Singh was PM, he had called for modernizing delivery system in order to create a better marketing chain. He had then asked the private sector to enter the farm sector. But now, the Congress has down a complete U-turn and is now describing the bills as ‘anti-farmer’. It is clearly indulging in vote-bank politics. The Congress had activated its rumour mills even before the government could get time to explain the provisions of the bills to the farmers.

For the last six years, the opposition has been in the sidelines, but it has now come out with the farmers’ issue to corner the government. Elections are due in Bihar this year and elections in Punjab are due in 2022. In both these states, farmers as a bloc are the deciding factor during elections. It goes to Modi’s credit that he is trying his best to dispel the clouds of fear and doubt from the minds of farmers.

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चीन के साथ जारी संघर्ष में यूं ड्रैगन की मदद की कोशिश कर रहा है पाकिस्तान

अवंतीपोरा के पास गदिकल में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और CRPF के संयुक्त तलाशी अभियान में छापेमारी के दौरान विस्फोटक के ये पैकेट्स जब्त किए गए। इन पैकेट्स को एक जंगल के पास स्थित पौधों की एक नर्सरी में 250 लीटर के 2 बड़े प्लास्टिक टैंक्स के अंदर रखा गया था। हमारे जवान अंडरग्राउंड प्लास्टिक वॉटर टैंक्स के अंदर गए जहां उन्हें विस्फोटकों के 416 पैकेट मिले, जिनमें से हरेक का वजन 125 ग्राम था। साथ ही एक अन्य प्लास्टिक वॉटर टैंक में छिपाए गए लगभग 50 डेटोनेटर भी बरामद हुए।

akb 0909 कश्मीर में पुलवामा जैसे एक बड़े आतंकी हमले की साजिश गुरुवार को सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के चलते नाकाम हो गई। भारतीय सेना के जवानों ने गदिकल के पास स्थित कारेवा में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के पास से 52 किलोग्राम विस्फोटक जब्त करके उनके नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया। इन विस्फोटकों को 416 पैकेटेस में छिपाकर पानी की 2 टंकियों में डुबो दिया गया था। सेना के सूत्रों ने बताया कि आतंकवादियों ने ओवरग्राउंड वर्कर्स की मदद से विस्फोटकों के इन पैकेट्स को घाटी में डिस्ट्रिब्यूट किया था ताकि पुलवामा में एक बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया जा सके।

अवंतीपोरा के पास गदिकल में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और CRPF के संयुक्त तलाशी अभियान में छापेमारी के दौरान विस्फोटक के ये पैकेट्स जब्त किए गए। इन पैकेट्स को एक जंगल के पास स्थित पौधों की एक नर्सरी में 250 लीटर के 2 बड़े प्लास्टिक टैंक्स के अंदर रखा गया था। हमारे जवान अंडरग्राउंड प्लास्टिक वॉटर टैंक्स के अंदर गए जहां उन्हें विस्फोटकों के 416 पैकेट मिले, जिनमें से हरेक का वजन 125 ग्राम था। साथ ही एक अन्य प्लास्टिक वॉटर टैंक में छिपाए गए लगभग 50 डेटोनेटर भी बरामद हुए।

इन विस्फोटकों को संक्षेप में सुपर-90 या एस-90 कहा जाता है। आपको याद होगा कि पिछले साल फरवरी में पुलवामा में एक आतंकी द्वारा अंजाम दिए गए आत्मघाती हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हो गए थे, जिसके चलते देशव्यापी आक्रोश फैल गया था। बाद में भारतीय वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित आतंकी ठिकानों पर बम बरसाकर उन्हें तबाह कर दिया था।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने कुछ दिन पहले ही आगाह किया था कि पाकिस्तान लद्दाख में भारत के खिलाफ जारी सैन्य गतिरोध में चीन की मदद करने के लिए देश के अंदर एक बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की कोशिश कर सकता है। पुलवामा जैसे एक और हमले को अंजाम देने की यह साजिश उसी रणनीति का हिस्सा लगती है। जिस स्थान पर गुरुवार को विस्फोटक पाए गए थे, वह नेशनल हाइवे के करीब था और उस जगह से लगभग 9 किलोमीटर दूर था जहां पुलवामा में पिछले साल आत्मघाती हमला हुआ था।

जनरल बिपिन रावत की बात सही साबित हो रही है। यदि आतंकवादी भारतीय सेना के काफिले पर एक और बड़ा हमला करने में कामयाब हो जाते, तो भारत को जवाबी कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ता, जैसा कि उसने बालकोट में किया था। अपने ‘पक्के दोस्त’ चीन की मदद के लिए पाकिस्तान इस समय भारत के खिलाफ ‘दूसरा मोर्चा’ खोलने के लिए उकसावे की कार्रवाई करने पर तुला हुआ है। सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे नियंत्रण रेखा पर हमारी सेना की तैयारियों का आकलन करने के लिए गुरुवार को श्रीनगर में थे।

चाहे कुछ भी हो, यदि पाकिस्तान संघर्ष के लिए उकसाता है तो भारतीय सशस्त्र बलों में देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए 2 मोर्चों पर एक साथ लड़ने की क्षमता है। हमारी सेना का मनोबल ऊंचा है। हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को राज्य सभा को बताया कि धरती की कोई भी ताकत हमारी सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास पट्रोलिंग करने से नहीं रोक सकती। उन्होंने कहा है कि हमारी सेना लद्दाख में चीनी सेना की ओर से किए गए कुकृत्यों का मुंहतोड़ जवाब में सक्षम है। हमारे सैनिक LAC और LOC के पास किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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How Pakistan is trying to help China in ongoing tussle

In a joint search operation by J&K Police, army and CRPF in Gadikal near Avantipora, the explosive packets were seized during a raid. These were kept inside two big 250 litre plastic tanks in a plant nursery near a forest. Our jawans went inside the underground plastic water tanks and found 416 packets, each packet containing 125 grams of explosives. Nearly 50 detonators were found hidden inside the other plastic water tank.

akb1809 A major Pulwama-style terror attack was averted on Thursday in Kashmir when Indian army jawans seized 52 kg explosives from Jaish-e-Muhammad terrorists in Karewa near Gadikal area. The explosives were hidden in 416 packets and were kept submerged inside two water tanks. Army sources said that the explosive packets were distributed through overground workers in the Valley by terrorists with a plan to use them to carry out a major attack in Pulwama.

In a joint search operation by J&K Police, army and CRPF in Gadikal near Avantipora, the explosive packets were seized during a raid. These were kept inside two big 250 litre plastic tanks in a plant nursery near a forest. Our jawans went inside the underground plastic water tanks and found 416 packets, each packet containing 125 grams of explosives. Nearly 50 detonators were found hidden inside the other plastic water tank.

The explosives are called Super-90 or S-90 in short. It may be recalled that 40 CRPF jawans were martyred in a suicide attack by a terrorist in February last year in Pulwama, which caused nationwide outrage. Indian Air Force had to bomb terrorist hideouts in Balakot inside Pakistan in retaliation.

Chief of Defence Staff Gen. Bipin Rawat had cautioned a few days ago that Pakistan may try to carry out a big terror attack inside India in order to help China in the latter’s ongoing military standoff against India in Ladakh. This plot to carry out another Pulwama-style attack appears to be part of that strategy. The spot where the explosives were found on Thursday was close to the National Highway and nearly nine kilometre away from the spot where the Pulwama suicide attack took place last year.

Gen. Bipin Rawat’s words seem to be prophetic. Had the terrorists managed to carry out another major attack on Indian army convoy, India would have been forced to retaliate like it did in Balakot. Pakistan is bent on carrying out provocation, in order to start a “second front” against India to help its “iron friend” China. The Army chief Gen. M. M. Narwane was in Srinagar on Thursday to assess the preparedness of our forces on the Line of Control.

Come what may, if Pakistan provokes a conflict, Indian armed forces have the capability to fight simultaneously on two fronts in order to protect national sovereignty and territorial integrity. The morale of our armed forces is high. Our Defence Minister Rajnath Singh told the Rajya Sabha on Thursday that no power on earth can stop our army from patrolling near the Line of Actual Control. He has said that our forces are capable of repelling misadventure on part of Chinese army in Ladakh. Our troops are in a state of full preparedness both near the LAC and LoC.

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सीमा पर बेमन से तैनात हैं चीनी सैनिक

चीन में सभी युवाओं के लिए सेना में शामिल होना अनिवार्य है। इनमें ऐसे भी युवा शामिल हैं जो चीन के अमीर परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और विलासिता का जीवन जीने के आदी है। फिर भी उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए सेना में अपनी सेवाओं देनी पड़ती हैं।

akb0409 2आधिकारिक सूत्रों ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भारतीय और चीनी सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पैंगोंग झील और चुशुल के पास 7 से 11 सितंबर के बीच कई बार चेतावनी के तौर पर 100 से 200 राउंड गोलियां दागी थीं। यह घटना विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच मॉस्को में हुई मुलाकात के कुछ दिन पहले हुई थी। इस मुलाकात में दोनों ने तनाव को कम करने के लिए एक पांच सूत्री योजना पर सहमति व्यक्त की थी जो अभी भी कागजों पर ही है।

गोलीबारी की यह घटना तब हुई जब चीनी सैनिकों ने 7 और 8 सितंबर को भड़काऊ तरीके से पहले फायरिंग की, जिसके बाद भारतीय सैनिकों ने भी जवाबी फायरिंग करते हुए वॉर्निंग शॉट्स लगाए। भारतीय सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने हमारे डिफेंस एडिटर मनीष प्रसाद को घटना के बारे में बताते हुए इस बात की पुष्टि की है। वरिष्ठ अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय जवानों ने चीनी पक्ष को निशाना बनाकर वॉर्निंग शॉट्स नहीं दागे थे, लेकिन संदेश साफ था। यदि दुश्मन गोलीबारी करने का ठान ही लेता है, तो हमारी सेना के जवान उसे मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं।

सेना के अधिकारियों ने खुलासा किया कि चीनी सैनिकों ने पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे से हवा में फायरिंग की क्योंकि वे कम से कम 24 फीचर्स (पहाड़ की चोटियों) से भारतीय जवानों को किसी भी कीमत पर पीछे हटाना चाहते थे। 1962 के बाद पहली बार हमारे जवानों रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण उन चोटियों पर अपनी पोस्ट बना ली है, जहां वे पहले पट्रोलिंग नहीं किया करते थे। इन चोटियों पर तैनात हमारे सैनिक अब चीनी टुकड़ी की हरकतों पर लगातार नजर रख सकते हैं।

इंडिया टीवी को पता चला है कि जब हमारे जवान फिंगर थ्री के पश्चिमी हिस्से की तरफ बढ़ रहे थे, तो उसी दौरान चीनी सैनिक फिंगर 3 और फिंगर 4 के बीच के इलाके को कब्जा करने, उसको डॉमिनेट करने की नीयत से आगे बढ़ रहे थे। इस उकसावे वाली कार्रवाई के चलते लगभग 100-200 राउंड गोलियां हवा में दागी गईं। पहले चीन की तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग की गई, जिसका मुंहतोड़ जवाब देते हुए हमारे जवानों में भी वॉर्निंग शॉट्स दागे।

हमारे डिफेंस एडिटर के मुताबिक, पहली बार 7 सितंबर को चुशूल सब सेक्टर में गोलियां चलीं, जबकि पैंगोंग झील पर फायरिंग की घटना 8 सितंबर को हुई थी। हमारे जवानों को अतिक्रमण के लिए आगे आ रहे चीनियों को पीछे धकेलने के लिए फायरिंग करनी पड़ी। इस घटना के 2 दिन बाद 10 सितंबर को दोनों विदेश मंत्री मॉस्को में मिले थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमारे सशस्त्र बलों को जवाबी कार्रवाई के लिए हालात के हिसाब से फैसले लेने की छूट दे रखी है। शर्त सिर्फ इतनी है कि: हमारे जवानों पहले फायर नहीं करेंगे, वे एलएसी क्रॉस नहीं करेंगे, लेकिन अगर दुश्मन गड़बड़ी करता है तो ऐक्शन लेने में देरी भी नहीं करेंगे। चीन के जनरलों को यह अंदाजा हो गया है कि उनकी कोई भी चाल काम नहीं आ रही है। इसलिए वे अब युद्धाभ्यास के पुराने वीडियो जारी करके प्रॉपेगेंडा वॉर का सहारा ले रहे हैं।

बुधवार को जारी किए गए युद्धाभ्यास के वीडियो में से एक के बारे में दावा किया गया कि ये वीडियो वेस्टर्न सिचुआन प्रोविंस का है जहां पर चीनी PLA की 77वीं ग्रुप आर्मी ने आर्मर यूनिट, एयर डिफेंस और आर्टिलरी यूनिट के साथ लाइव फोर्स कंफ्रंटेशन एक्सरसाइज को अंजाम दिया। इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी कि यह युद्धाभ्यास कब हुआ। चीनी सेना के फाइटर एयरक्राफ्ट और अटैक हेलिकॉप्टर्स के अधिकांश वीडियो एडिटेड होते हैं।

चीनी सेना इस बात पर भी फर्जी प्रॉपेगेंडा फैला रही है कि भारत के जवान सब जीरो टेंपरेचर के साथ-साथ कोरोना वायरस की चुनौती का भी सामना करेंगे। हमारे डिफेंस एडिटर ने चीन के इस झूठ का पर्दाफाश करते हुए विजुअल्स भेजे हैं कि भारतीय सेना किस तरह प्रभावी तरीके से फॉरवर्ड बेस पर सभी जवानों और अफसरों की स्क्रीनिंग को अंजाम दे रही है। एक स्पेशल ट्रांजिट फैसिलिटी का निर्माण किया गया है जहां अफसरों और जवानों की फिजिकल स्क्रीनिंग के साथ-साथ उनके सामान की भी जांच होती है। पूरी तरह से मेडिकली सर्टिफाई होने के बाद ही इन जवानों को फॉरवर्ड पोस्ट पर आगे जाने की इजाजत दी जाती है।

कुल मिलाकर हालत कुछ ऐसी दिखती है: चीन की सेना आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए है, हम कोरोना वायरस महामारी से लड़ रहे हैं, और हमारे अफसरों और जवानों को सब-जीरो टेम्परेचर में लड़ाई के लिए तैयारी करनी पड़ रही है। यह सब आसान नहीं है लेकिन हमारे उन अफसरों और जवानों के जज्बे को सलाम है जो दुश्मन से टकराने के लिए बेताब हैं।

मैंने कई ऐसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से बात की जो लद्दाख के बर्फीले इलाकों में काम कर चुके हैं। उनमें से एक ने बहुत ही दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा कि चीन भले ही कितना भी प्रॉपेगेंडा कर ले, लेकिन उनके जनरल्स यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उनके युवा अफसरों और जवानों में वह जज्बा नहीं है जो पहाड़ की चोटियों पर लड़ाई लड़ने के लिए जरूरी है। उनके अंदर अपने देश, अपनी सेना के लिए लड़ने-मरने का जज्बा ही नहीं है।

सेना के रिटायर्ड अफसर ने इसकी वजह भी बताई कि युवा चीनी अफसरों और जवानों में अपने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने का जज्बा क्यों नहीं है। उन्होंने कहा कि चीन में ज्यादातर युवा अफसर और जवान मजबूरी के चलते सेना में शामिल होते हैं। चीन में सभी युवाओं के लिए सेना में शामिल होना अनिवार्य है। इनमें ऐसे भी युवा शामिल हैं जो चीन के अमीर परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और विलासिता का जीवन जीने के आदी है। फिर भी उन्हें एक निश्चित अवधि के लिए सेना में अपनी सेवाओं देनी पड़ती हैं। ये युवा अफसर और जवान अपनी जल्दी-जल्दी अपना कंपलसरी पीरियड पूरा करके ऐशो-आराम की अपनी उस जिंदगी में वापस लौटना चाहते हैं जिसके वे आदी हैं।

यही वजह है कि उनके अंदर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने का जज्बा ही नहीं है। दूसरी ओर, हमारे युवा अफसरों और जवानों का मनोबल हमेशा ऊंचा रहता है। वे अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मौत से भी लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। ये जोश, ये हौसला, ये जज्बा हमारी फौज की सबसे बड़ी ताकत है। देश अपने उन बहादुर अफसरों और जवानों को सलाम करता है जो हमारी सीमाओं की रक्षा के लिए वहां तैनात हैं।

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