Rajat Sharma

My Opinion

अडानी को लेकर राहुल गांधी के आरोपों में कुछ भी नया नहीं है

vlcsnap-error474लगातार चार दिनों तक चले हंगामे के बाद मंगलवार को संसद ने सामान्य रूप से काम करना शुरू कर दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अडानी मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक के बाद एक कई हमले किए। लोकसभा में राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर उद्योगपति गौतम अडानी की मदद करने के लिए किसी भी हद तक जाने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और इजरायल में कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में अडानी ग्रुप की मदद की।

राहुल गांधी ने अपने 51 मिनट के भाषण में करीब 45 मिनट अडानी पर बात की। उन्होंने आरोप लगाया कि अडानी को ठेके दिलाने में मदद करने के लिए CBI और ED का इस्तेमाल किया गया। बीजेपी ने राहुल के आरोपों को निराधार बताते हुए तुरंत खारिज कर दिया और उन्हें अपने आरोपों के पक्ष में सबूत पेश करने की चुनौती दी। कानून मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि राहुल गांधी को अपनी बातों को ऑथेंटिकेट करना चाहिए।

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने प्राइवेट प्लेन में बैठे मोदी और अडानी की तस्वीरें दिखाईं। उन्होंने पूछा कि 2014 में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की फोर्ब्स की लिस्ट में 609वें नंबर पर रहने वाले गौतम अडानी 8 साल के भीतर दूसरे नंबर पर कैसे पहुंच गए। उन्होंने पूछा कि अडानी ग्रुप को ही पोर्ट्स, एयरपोर्ट्स, पावर ट्रांसमिशन, ग्रीन एनर्जी और गैस जैसे अधिकांश सेक्टर में ठेके क्यों मिले। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने इसका जवाब देते हुए कहा कि जब UPA सत्ता में थी तब भी अडानी ग्रुप को तमाम प्रोजेक्ट दिए गए थे। उन्होंने बताया कि कैसे UPA शासन के दौरान अडानी ग्रुप का कारोबार 2 करोड़ रुपये से बढ़कर 87,000 करोड़ रुपये हो गया था।

राहुल द्वारा उठाए गए ज्यादातर सवाल मैंने पिछले महीने अपने शो ‘आप की अदालत’ में गौतम अडानी के इंटरव्यू के दौरान पूछे थे। उस समय अडानी ने जवाब दिया था कि उनका कारोबार नब्बे के दशक से ही फलने-फूलने लगा था, जब पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इकॉनमी को खोल दिया था। अडानी ने तब कहा था कि वह राहुल के आरोपों को ‘सियासी बयानबाजी’ से ज्यादा नहीं मानते।

मंगलवार को, राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अडानी ग्रुप को भारत में 6 एयरपोर्ट्स का कामकाज देने के लिए नियम बदले गए, जबकि ग्रुप को एयरपोर्ट के मैनेजमेंट का कोई एक्सपीरियंस नहीं था। इस बारे में मैंने ‘आप की अदालत’ में अडानी से पूछा था। उन्होंने कहा था कि उनके ग्रुप को सभी कॉन्ट्रैक्ट बिडिंग प्रोसेस को पूरा करने के बाद ही मिले हैं।

यह ठीक है कि अडानी को शेयर मार्केट में भारी नुकसान हुआ है, लेकिन उनके प्रोजेक्ट्स, और उनके असेट्स आज भी इंटैक्ट हैं।

दूसरी बात यह कि राहुल का ये कहना गलत है कि अडानी को मोदी ने बनाया। जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते हैं, मोदी के साथ काम करते हैं, वे आपको बता देंगे कि मोदी किसी को भी, चाहे वह कोई भी हो, इस तरह से सपोर्ट नहीं करते जैसे राहुल ने कहा। जहां तक राहुल द्वारा दिखाई गई उस तस्वीर की बात है जिसमें मोदी और अडानी साथ दिखाई दे रहे हैं, तो वह उस वक्त की है जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और कई बार अडानी के विमान का इस्तेमाल करते थे। मजे की बात यह है कि जब राहुल ने फोटो दिखाई तो बीजेपी ने भी उनके बहनोई रॉबर्ड वॉड्रा और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ अडानी की फोटो जारी कर दी।

मैं यह मानता हूं कि राजनीतिक बयानबाजी करना राहुल का हक है, लेकिन विदेशी नीति के मामलों में इस तरह से बोलने से बचना चाहिए। राहुल ने कह दिया कि मोदी, गौतम अडानी को विदेश ले जाते हैं और दूसरे देशों के ठेके भी अडानी को दिलवाते हैं। उन्होंने इजरायल, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका का हवाला दिया। तथ्य यह है कि अडानी ने विदेशों में कारोबार 2014 के बाद शुरू नहीं किया है। अडानी ने 2008 में इंडोनेशिया में सबसे पहले कारोबार शुरू किया और फिर ऑस्ट्रेलिया में 2010 में पहली खदान, और 2011 में ऑस्ट्रेलिया में पहला बंदरगाह लिया था। उस वक्त डॉक्टर मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे।

राहुल गांधी ने इल्जाम लगाया कि नरेंद्र मोदी की सरकार के वक्त सरकारी बैंकों और सरकारी कंपनियो ने खुलकर अडानी की मदद की, और उन्हें दिल खोलकर कर्ज दिया। उन्होंने कहा कि SBI ने अडानी की कंपनियों में 27 हजार करोड़ रुपये और LIC ने 36 हजार करोड़ रुपये का निवेश कर रखा है। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट सामने आने के बाद, SBI और LIC दोनों ने साफ किया है कि अडानी ग्रुप में उनका निवेश उनके कुल निवेश के एक प्रतिशत से भी कम है। ‘आप की अदालत’ में मैंने अडानी से इस बारे में पूछा था। उन्होंने कहा था, उनके ग्रुप ने पहले ही भारतीय बैंकों पर अपनी निर्भरता कम करना शुरू कर दिया है।

राहुल गांधी के आरोपों में कुछ भी नया नहीं है। गौतम अडानी ने मेरे शो ‘आप की अदालत’ में लगभग सभी आरोपों का जवाब दिया है। राहुल के सवाल वही हैं, और अडानी के जवाब भी वही हैं। सरकार जानती थी कि राहुल क्या आरोप लगाएंगे इसलिए उनका भाषण खत्म होते ही मंत्रियों और बीजेपी के नेताओं की तरफ से हर मुद्दे पर पॉइंट-टू-पॉइंट जवाब आए।

राहुल के इस आरोप पर कि कोई एक्सपीरियंस न होने के बावजूद अडानी ग्रुप को 6 एयरपोर्ट दिए गए, सरकार ने जवाब दिया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने एक्सपीरियंस से जुड़ी शर्तों को इसलिए हटा दिया था, क्योंकि अगर सिर्फ अनुभव के आधार पर बिडिंग कराई जाती तो कुछ कंपनियां कार्टेल बनाकर बोली लगाने के दौरान मनमानी कर सकती थीं।

पिछले महीने जब गौतम अडानी इंडिया टीवी के स्पेशल शो ‘आप की अदालत’ में आए थे तब मैंने भी उनसे यही सवाल पूछा था। अडानी ने कहा था कि भारत में कारोबार को लेकर होने वाले सियासी विवाद की जानकारी उनको भी है। उन्होंने कहा था कि यही वजह है कि उनके ग्रुप का यह क्लियर स्टैंड है कि उन्हीं कामों को अपने हाथ में लिया जाएगा, जो बिडिंग से हासिल किए गए हों।

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Adani: Nothing new in Rahul Gandhi’s allegations

AKB30 After four days of continuous uproar, Parliament on Tuesday started functioning normally with Congress leader Rahul Gandhi launching a series of attacks at Prime Minister Narendra Modi on the Adani issue. Speaking on the Motion of Thanks to the President in Lok Sabha, Rahul Gandhi accused Modi government of going out of its way to help industrialist Gautam Adani. He alleged that Prime Minister Modi helped Adani group in securing contracts in Bangladesh, Australia, Sri Lanka and Israel.

For nearly 45 minutes out of his 51-minute speech, Rahul Gandhi spoke on Adani. He alleged that CBI, ED were used to help Adani secure contracts. The BJP promptly rubbished Rahul’s allegations describing them as baseless and challenged him to substantiate his charges with proof. Law Minister Kiren Rijiju said, Rahul must authenticate each of the allegations that he was making.

During his speech, Rahul Gandhi displayed pictures of Modi and Adani sitting in a private plane. He questioned how Gautam Adani who was at the 609th number in the Forbes List of World’s Richest Persons in 2014 rose to second place within a span of eight years. He asked why Adani group got contracts in most of the sectors, like ports, airports, power transmission, green energy and gas. BJP leader Ravi Shankar Prasad pointed out that several of the projects were given to Adani group when the UPA was in power. He pointed out how Adani group’s turnover rose from Rs 2 crore to Rs 87,000 crore during the UPA regime.

I had asked most of these questions that Rahul raised, in my interview last month with Gautam Adani in ‘Aap Ki Adalat’ show. At that time, Adani had replied that his business began to prosper since the Nineties when the Congress government under P V Narasimha Rao opened up the economy. Adani had then said that he does not consider Rahul’s allegations more than ‘political statements’.

On Tuesday, Rahul Gandhi alleged that rules were changed to help Adani group secure six airports in India, even though the group had no previous experience in managing airports. In ‘Aap Ki Adalat’, I had questioned Adani about this. He had said that his group got all the contracts through proper bidding process.

Adani group may have faced turmoil in stock markets, but the fact remains that all his projects and assets remain intact.

Secondly, Rahul’s allegation that it was Modi who helped Adani is incorrect. People who know the style of working of Narendra Modi will tell you, Modi never goes out of his way to help any businessman, whosoever he may be. The picture displayed by Rahul Gandhi was when Modi was chief minister of Gujarat and he had used Adani’s plane several times. On its part, BJP also circulated pictures of Adani with Rahul’s brother-in-law businessman Robert Vadra, and also with Rajasthan CM Ashok Gehlot.

I agree Rahul Gandhi has the democratic right to make political statements, but in matters of foreign affairs, he must be careful with his choice of words. Rahul alleged that Modi took Adani with him in his plane when he visited foreign countries and helped his group in securing contracts. The fact is that Adani did not start his offshore business after 2014. He got his first foreign contract in 2008 in Indonesia, got his first mine in Australia in 2010, and a port in Australia in 2011. At that time Dr Manmohan Singh was the prime minister.

Rahul Gandhi has alleged that public sector banks and LIC helped Adani group by investing in his shares and gave him loans. He said, SBI gave Rs 27,000 crore loans to Adani group, while LIC invested Rs 36,000 crore. After the Hindenburg research report came to light, both SBI and LIC have clarified that their exposure in Adani group amounted to hardly less than one percent of their total investments. In ‘Aap Ki Adalat’, I had asked Adani about this. He said, his group has already started reducing its dependence on Indian banks.

There is nothing new in Rahul Gandhi’s allegations, and Gautam Adani has replied to almost all of them in my ‘Aap Ki Adalat’ show. Rahul’s questions are the same and Adani’s replies are the same. The government knew what allegations Rahul would make, and the ministers and BJP leaders were ready with their point-to-point replies soon after Rahul’s speech was over.

On Rahul’s allegation that six airports were given to Adani group despite having no prior experience, the government replied that Airport Authority of India had removed the experience related condition, because there was assumption that some companies who had experience, could form a cartel and make arbitrary biddings.

I asked the same question in Aap Ki Adalat show last month, and Gautam Adani had replied that he knew there could be political dispute once the airport contracts were secured. That is why, he said, his group had clearly decided that all contracts will be secured only after going through the bidding process.

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तुर्की में भयावह भूकंप : मोदी ने पीड़ितों के लिए भेजी मदद

AKBतुर्की मंगलवार को 5.6 और 5.7 तीव्रता के भूकंप के झटकों से एक बार फिर हिल गया। इससे पहले सोमवार को तुर्की और सीरिया में 7.8 और 7.5 तीव्रता के 3 बड़े भूकंप आए थे।

दोनों देशों में अब तक 5,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। आपदा में जान गंवाने वालों की संख्या 10 हजार से भी ज्यादा होने की आशंका है क्योंकि बचावकर्मी अभी भी मलबे को हटाने में जुटे हुए हैं। भूकंप के बाद दर्जनों ऑफ्टरशॉक्स आ चुके हैं जिससे आपदा में जीवित बचे लोग और बचावकर्मियों में दहशत है। विनाश इतने बड़े पैमाने पर हुआ है कि बचावकर्मियों को मलबे में से लोगों को निकालने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

भूकंप के झटके तुर्की, सीरिया, लेबनान, साइप्रस और इजरायल तक में महसूस किए गए। पहला झटका सोमवार को स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 4 बजे आया, जब ज्यादातर लोग सो रहे थे। अभी बचाव कार्य चल ही रहा था कि एक और बड़ा भूकंप आया, जिससे और ज्यादा तबाही हुई। दोनों ही बार 90 सेकेंड से भी ज्यादा समय तक धरती कांपती रही, जिससे न सिर्फ इमारतें बुरी तरह हिल गईं, बल्कि हाईवे और रनवे तक में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की 2 टीमों को तुर्की रवाना किया, जिसमें विशेष रूप से प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड और बचाव उपकरणों के साथ 100 कर्मचारी शामिल थे। प्रभावित इलाकों के लिए मेडिकल टीम भी भेजी गई है। मोदी ने ट्वीट किया, ‘तुर्की में आए भूकंप के कारण हुए जान-माल के नुकसान से दुखी हूं।’

मंगलवार की सुबह संसदीय दल की बैठक में बीजेपी के सांसदों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावुक हो गए। उन्होंने 2011 में गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप को याद किया जिसमें 20,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और 1.5 लाख से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस भूकंप ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया था। मोदी ने कहा, वह अच्छी तरह समझ सकते हैं कि तुर्की के लोग इस समय किन हालात से गुजर रहे होंगे।

सोमवार को आए भूकंप का केंद्र तुर्की के कहारनमारास शहर के पास था। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने कहा कि देश में भूकंप से इतनी बड़ी तबाही 1939 के बाद कभी नहीं हुई। बचाव कार्य के लिए सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस और आपातकालीन प्रतिक्रिया विभाग की टीमों को तैनात किया गया है। 2 जबरदस्त भूकंपों और 40 आफ्टरशॉक्स से तुर्की के 8 प्रांत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। भूकंप से कई इमारतों और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के साथ-साथ सैकड़ों साल पुराना किला भी क्षतिग्रस्त हो गया।

बुल्गारिया, रोमानिया, ग्रीस, क्रोएशिया, चेक रिपब्लिक, फ्रांस, हॉलैंड और पोलैंड समेत कई यूरोपीय देशों ने खोज एवं बचाव टीमें भेजी हैं। सीरिया में अलेप्पो, लातकिया और हमा शहरों में काफी तबाही हुई है।

तापमान में भारी गिरावट के कारण तुर्की के हैते में हजारों लोगों लोगों को स्पोर्ट्स सेंटर्स और मेले के इस्तेमाल होने वाले हॉल में रखा गया है। वहीं, तमाम लोगों ने आग के चारों तरफ कंबलों में दुबककर रात बिताई। राहत सामग्री की पहली खेप के साथ आज सुबह भारतीय वायु सेना की पहली C17 फ्लाइट तुर्की के अदाना पहुंची। विमान में NDRF के 50 खोज एवं बचाव कर्मी, विशेष रूप से प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड, ड्रिलिंग मशीन, राहत सामग्री, दवाएं और अन्य आवश्यक उपकरण थे।

भूकंप एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसके बारे में वैज्ञानिक आधार पर पहले से भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है। लेकिन तुर्की के भूकंप को लेकर एक ट्विटर मैसेज अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस मैसेज में एक डच एक्सपर्ट ने दावा किया है कि उसने 4 दिन पहले भूकंप की भविष्यवाणी कर दी थी। नीदरलैंड के एक रिसर्चर फ्रैंक हूगरबीट्स ने 3 फरवरी को ट्विटर पर भविष्यवाणी की थी कि तुर्की, जॉर्डन और सीरिया में 7.5 की तीव्रता का भूकंप आ सकता है। वैज्ञानिक उनकी भविष्यवाणी की जांच में लग गए हैं। फिलहाल, पूरी दुनिया का ध्यान तुर्की में आए विनाशकारी भूकंप से बचे लोगों तक तत्काल राहत और मदद पहुंचाने पर है।

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Earthquake in Turkey: Modi immediately sends rescue teams

AKB30 Turkey was again rocked by two fresh earthquakes of 5.6 and 5.7 magnitude on Tuesday, a day after three severe earthquakes of 7.8 and 7.5 magnitude devastated both Turkey and Syria.

More than 5,000 people have died so far, with the toll likely to go up to ten thousand, as rescue workers try to clear the rubble. There have been dozens of aftershocks causing panic among rescue workers and survivors. The scale of disaster is so huge that rescue workers are having a tough time removing critical survivors from the rubble.

The temblors were felt across Turkey, Syria, Lebanon, Cyprus and Israel. The first tremor occurred at around 4 am local time on Monday when most of the people were sleeping. Even as rescue operations were going on, another major temblor struck causing more devastation. Both the tremors continued for more than 90 seconds severely shaking buildings, causing huge crevices on highways and runways.

Prime Minister Narendra Modi dispatched two teams of National Disaster Response Force (NDRF), comprising 100 personnel with specially trained dog squads and rescue equipment. Medical teams have also been dispatched. Modi tweeted: “Anguished by the loss of lives and damage of property due to the earthquake in Turkey”.

While addressing BJP MPs at the parliamentary party meeting on Tuesday morning, Prime Minister Modi turned emotional and recalled the 2011 Bhuj earthquake of Gujarat in which more than 20,000 people were killed and over 1.5 lakh people were injured. The earthquake rendered thousands of people homeless. Modi said, he could very well understand what the people of Turkey might be going through at this moment.

The epicentre of Monday’s eathquake was near the town of Kahramanmaras in Turkey. Turkish President Tayyip Erdogan said that this was the most severe earthquake since 1939. Army, paramilitary force, police and emergency response department teams have been deployed for rescue work. Eight provinces of Turkey have been badly affected by two big earthquakes and 40 aftershocks. Buildings, commercial complexes, several hundred years old fort were damaged by the temblor.

Several European countries including Bulgaria, Romania, Greece, Croatia, Czech republic, France, Holland and Poland have send search and rescue teams. In Syria, there has been widespread devastation in Aleppo, Latkia and Hama cities.

Thousands of people have been sheltered in sports centres, fair halls, with others spent the night outside, in Hatay, Turkey, huddled in blankets around fires, due to severe drop in temperature. The first Indian Air Force C17 flight reached Adana, Turkey this morning with the first batch of relief material. The plane carried 50 NDRF search and rescue personnel, specially trained dog squads, drilling machines, relief material, medicines and other necessary equipment.

Earthquake is a natural disaster that cannot be predicted in advance on scientific basis, nor can there be an early warning system. But one Twitter message about the Turkey earthquake is now going viral on social media in which a Dutch expert has claimed that he had predicted the temblor four days ago. Frank Hoogerbeets, a researcher in Netherlands, had predicted on February 3 on Twitter that a 7.5 magnitude temblor could strike Turkey, Jordan and Syria. Scientists are examining his prediction. At the moment, the focus of the entire world is on providing immediate relief and assistance to the survivors of Turkey earthquake.

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अडानी ग्रुप डूब नहीं रहा है: अपने वेल्थ क्रिएटर्स के पीछे न पड़ें

akbगौतम अडानी ग्रुप की कंपनियों के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में आज लगातार दूसरे दिन हंगामा हुआ। विपक्षी नेताओं ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के मद्देनजर सरकारी बैंकों से अडानी ग्रुप को लोन देने के मामले में कथित ‘वित्तीय अनियमितताओं’ पर चर्चा की मांग की। विपक्ष के इन आरोपों को अडानी ग्रुप पहले ही पूरी तरह नकार चुका है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता पूरे मामले की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने उन सभी बैंकों से ब्योरा मांगा है, जिन्होंने अडानी ग्रुप को लोन दिया है। गौतम अडानी ने साफ किया है कि उनकी कंपनियों ने कोई वित्तीय अनियमितता नहीं की है और इसके सभी लेन-देन पक्के हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी कंपनियों ने किसी भी भुगतान में चूक नहीं की है और न ही किसी को वित्तीय नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने यह भी ऐलान किया है कि बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव के कारण पूरी तरह से सब्सक्राइब होने के बावजूद अपना FPO वापस ले रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि क्या शॉर्ट सेलर फर्म हिंडनबर्ग के पास अडानी ग्रुप के शेयर हैं? क्या किसी विदेशी रिसर्च फर्म की रिपोर्ट को बिना जांचे परखे सच मान लेना सही है? या, क्या हमें RBI और SEBI पर भरोसा करना चाहिए?

कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि अडानी ग्रुप के शेयरों में LIC और SBI ने भारी निवेश क्यों किया। LIC और SBI दोनों ने कहा है कि उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है। क्या अडानी का मुद्दा विपक्ष के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने का एक बहाना भर है? इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि अडानी ग्रुप के कारोबार, उसके शेयर मूल्य और संपत्ति में वृद्धि तब भी हुई थी जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी।

यहां तक कि मोदी के पिछले 9 वर्षों के शासन के दौरान कांग्रेस शासित राज्य सरकारों ने भी अडानी ग्रुप को अपने राज्यों में परियोजनाओं में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया है।

अडानी को लेकर विपक्ष का हमला कोई नई बात नहीं है। जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट नहीं आई थी, तब भी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कहते थे कि अंबानी-अडानी की सरकार है, और आरोप लगाते थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दोनों बड़े उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं। शेयर बाजार में अडानी ग्रुप के शेयरों की कीमतों में भारी गिरावट के बाद अब विपक्ष को मोदी पर हमला करने के लिए एक नया बहाना मिल गया है।

यह तो साफ है कि अडानी की तरक्की उस जमाने में शुरू हुई जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और गुजरात में चिमनभाई पटेल की सरकार थी। इसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान, डॉक्टर मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते हुए अडानी ने नए-नए बिजनेस खड़े किए, ब्रैंड वैल्यू बनाई और जबरदस्त ग्रोथ हासिल की।

फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जमाने में जब इंफ्रास्ट्रक्चर ने रफ्तार पकड़ी तो गौतम अडानी ने भी रफ्तार पकड़ी और पोर्ट्स, पावर प्लांट्स समेत अन्य प्रॉजेक्ट्स में हाथ डाला। राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर अजय आलोक कहते हैं कि गौतम अडानी सक्सेज स्टोरी तो बच्चों के बतानी चाहिए, वह काफी प्रेरणादायक है। गौतम आडानी ने कांग्रेस के शासन के दौरान 2 करोड़ रुपये से कारोबार शुरू किया था और वह मनमोहन सिंह की सरकार के वक्त तक 80,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले कारोबारी बन गए थे।

यह बात सही है कि अडानी की कंपनी को राजीव गांधी, डॉक्टर मनमोहन सिंह, चिमनभाई पटेल, उद्धव ठाकरे, अशोक गहलोत और यहां तक कि केरल में पिनराई विजयन की सरकारों में काम मिला है। इन सरकारों ने कोई गलत काम नहीं किया, लेकिन जिस तरह गौतम अडानी को लेकर आरोप लग रहे हैं, जो बयान दिए जा रहे हैं, वे सुनने के बाद यह साफ है कि सारा मामला पॉलिटिकल ज्यादा है और फाइनेंशियल कम। गौतम अडानी का दावा है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में जो इल्जाम लगाए गए हैं, वे 15 से 20 साल पुराने मामले हैं और इनमें पहले ही अडानी ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट भी मिल चुकी है।

भारतीय जीवन बीमा निगम ने गुरुवार को साफ कर दिया कि अडानी ग्रुप की कंपनियों में उसका निवेश उसके कुल मार्केट इन्वेस्टमेंट का महज एक फीसदी है। अगर अडानी ग्रुप मार्केट वैल्यू जीरो भी हो जाती है, तो भी LIC के डूबने का कोई खतरा नहीं है। LIC ने कहा, उसने अडानी ग्रुप की कंपनियों में 30,127 करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट किया है, जिसकी मार्केट वैल्यू सोमवार को 56,142 करोड़ रुपये थी।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कहा कि उसने अडानी ग्रुप को 2.6 बिलियन डॉलर यानि करीब 21 हजार करोड़ रुपए का लोन दे रखा है, लेकिन अभी तक अडानी ग्रुप की तरफ से एक बार भी कोई किश्त डिफॉल्ट नहीं हुई है। बैंक ने कहा कि अडानी ग्रुप के जो एसेट गारंटी के तौर पर उसके पास हैं, उसके हिसाब से उसका इन्वेस्टमेंट सुरक्षित है।

पंजाब नेशनल बैंक ने कहा कि उसने अडानी ग्रुप को 7,000 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। कई प्राइवेट बैंकों ने भी अडानी ग्रुप को लोन दिया है। अगर सारे भारतीय और अंतरराष्ट्रीय बैंकों का कर्ज भी मिला लिया जाए, तो भी सिर्फ गौतम अडानी की अपनी निजी संपत्ति उससे ज्यादा है। अडानी की नेटवर्थ, बैंकों के कर्ज से ज्यादा है। उनकी कंपनियों में पर्याप्त कैश फ्लो है। पिछले कुछ साल के दौरान अडानी ग्रुप की आमदनी के मुकाबले लोन भी कम हुआ है, इसलिए डिफाल्ट होने का सवाल ही नहीं है।

मोटी बात यह है कि न तो मोदी के दुश्मनों की संख्या कम है, और न ही अडानी की तरक्की से जलने वाले लोगों की कमी है। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट तो मोदी और अडानी, दोनों को निशाने पर लेने का एक बहाना भर है। कुछ लोग ऐसा इंप्रेशन बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि अडानी की तरक्की सिर्फ एक बुलबुला है जो फूटने वाला है और उनका बिजनेस खत्म हो जाएगा, लेकिन वे बस लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अडानी ग्रुप डूबने वाला नहीं है।

मैं आपको बताता हूं कि आखिरकार गौतम अडानी के बिजनेस की वैल्यू क्या है, उनके असेट्स क्या हैं। अडानी ग्रुप के पास भारत में गंगावरम, मुंद्रा और हजीरा जैसे पोर्ट्स हैं। अडानी ग्रुप केरल के विंझिजम में सिंगापुर और कोलंबो जैसे डीप वाटर पोर्ट बना रहा है। देश भर में अडानी ग्रुप के थर्मल पावर यूनिट्स हैं जो 13 हजार 500 मेगावाट पावर जेनरेट होती है और इसमें से ज्यादातर क्लीन एनर्जी की कैटिगरी में आती है। अडानी ग्रुप के पास 650 मेगावाट सोलर पावर बनाने की क्षमता है। इसकी 18 हजार सर्किट किलोमीटर की ट्रांसमिशन लाइंस और 30,000 MVA की ट्रांसफर कैपिसिटी एशिया में सबसे ज्यादा है।

अडानी के पास देश के 6 एयरपोर्ट हैं, इसके अलावा मुंबई एयरपोर्ट में हिस्सेदारी है। 2025 में शुरू होने वाले नवी मुंबई एयरपोर्ट को भी अडानी की कंपनी ऑपरेट करेगी। टॉप सीमेंट कंपनी ACC और अंबुजा अडानी ग्रुप के पास हैं। मुंद्रा में स्थित भारत का सबसे बिजी स्पेशल इकनॉमिक जोन अडानी ग्रुप के पास है। इस ग्रुप के पास ऑस्ट्रेलिया में कोयले की खदान है जिससे भारत के पावर प्लांट्स में भी हाई ग्रेड कोयले की सप्लाई होती है। अडानी ग्रुप NTPC की अडंर कंस्ट्रक्शन सोलर और विंड एनर्जी प्लांट का पार्टनर भी है।

अपनी फ्लैगशिप कंपनी अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के तहत आने वाली कंपनियों जैसे अडानी पोर्ट्स, अडानी पावर, अडानी ग्रीन एनर्जी, अडानी विल्मर, अडानी टोटल गैस के जरिए अडानी ग्रुप ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट और इकॉनमिक ग्रोथ में भी काफी योगदान दिया है।

मैं अंत में एक बात कहना चाहता हूं कि अडानी एक उद्योगपति हैं। इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता की उनकी दौलत कम हो रही है या ज्यादा। लेकिन अडानी ने जो पोर्ट्स बनाए, थर्मल पावर स्टेशंस बनाए, एयरपोर्ट्स बनाए, ये अडानी ने अपने घर में इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाए। ये देश की संपति हैं।

उद्योगपति कोई भी हो, अगर राजनीतिक कारणों से हम उन पर हमला करेंगे तो इसमें देश का कितना नुकसान है, इसके बारे में भी एक बार जरूर सोचना चाहिए। पूरी दुनिया में लोग अपने वेल्थ क्रिएटर्स को सपोर्ट करते हैं, उनका सम्मान करते हैं, लेकिन हमारे यहां लोग किसी के भी पीछे पड़ जाते हैं, किसी पर भी शक करते हैं, विवाद पैदा करते हैं। मुझे लगता है कि इस सोच को बदलने की जरूरत है।

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अडानी ग्रुप डूब नहीं रहा है: अपने वेल्थ क्रिएटर्स के पीछे न पड़ें

AKB30 गौतम अडानी ग्रुप की कंपनियों के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में आज लगातार दूसरे दिन हंगामा हुआ। विपक्षी नेताओं ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के मद्देनजर सरकारी बैंकों से अडानी ग्रुप को लोन देने के मामले में कथित ‘वित्तीय अनियमितताओं’ पर चर्चा की मांग की। विपक्ष के इन आरोपों को अडानी ग्रुप पहले ही पूरी तरह नकार चुका है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता पूरे मामले की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने उन सभी बैंकों से ब्योरा मांगा है, जिन्होंने अडानी ग्रुप को लोन दिया है। गौतम अडानी ने साफ किया है कि उनकी कंपनियों ने कोई वित्तीय अनियमितता नहीं की है और इसके सभी लेन-देन पक्के हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनकी कंपनियों ने किसी भी भुगतान में चूक नहीं की है और न ही किसी को वित्तीय नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने यह भी ऐलान किया है कि बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव के कारण पूरी तरह से सब्सक्राइब होने के बावजूद अपना FPO वापस ले रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि क्या शॉर्ट सेलर फर्म हिंडनबर्ग के पास अडानी ग्रुप के शेयर हैं? क्या किसी विदेशी रिसर्च फर्म की रिपोर्ट को बिना जांचे परखे सच मान लेना सही है? या, क्या हमें RBI और SEBI पर भरोसा करना चाहिए?

कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि अडानी ग्रुप के शेयरों में LIC और SBI ने भारी निवेश क्यों किया। LIC और SBI दोनों ने कहा है कि उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है। क्या अडानी का मुद्दा विपक्ष के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने का एक बहाना भर है? इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि अडानी ग्रुप के कारोबार, उसके शेयर मूल्य और संपत्ति में वृद्धि तब भी हुई थी जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी।

यहां तक कि मोदी के पिछले 9 वर्षों के शासन के दौरान कांग्रेस शासित राज्य सरकारों ने भी अडानी ग्रुप को अपने राज्यों में परियोजनाओं में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया है।

अडानी को लेकर विपक्ष का हमला कोई नई बात नहीं है। जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट नहीं आई थी, तब भी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कहते थे कि अंबानी-अडानी की सरकार है, और आरोप लगाते थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दोनों बड़े उद्योगपतियों के लिए काम कर रहे हैं। शेयर बाजार में अडानी ग्रुप के शेयरों की कीमतों में भारी गिरावट के बाद अब विपक्ष को मोदी पर हमला करने के लिए एक नया बहाना मिल गया है।

यह तो साफ है कि अडानी की तरक्की उस जमाने में शुरू हुई जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और गुजरात में चिमनभाई पटेल की सरकार थी। इसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान, डॉक्टर मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते हुए अडानी ने नए-नए बिजनेस खड़े किए, ब्रैंड वैल्यू बनाई और जबरदस्त ग्रोथ हासिल की।

फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जमाने में जब इंफ्रास्ट्रक्चर ने रफ्तार पकड़ी तो गौतम अडानी ने भी रफ्तार पकड़ी और पोर्ट्स, पावर प्लांट्स समेत अन्य प्रॉजेक्ट्स में हाथ डाला। राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर अजय आलोक कहते हैं कि गौतम अडानी सक्सेज स्टोरी तो बच्चों के बतानी चाहिए, वह काफी प्रेरणादायक है। गौतम आडानी ने कांग्रेस के शासन के दौरान 2 करोड़ रुपये से कारोबार शुरू किया था और वह मनमोहन सिंह की सरकार के वक्त तक 80,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले कारोबारी बन गए थे।

यह बात सही है कि अडानी की कंपनी को राजीव गांधी, डॉक्टर मनमोहन सिंह, चिमनभाई पटेल, उद्धव ठाकरे, अशोक गहलोत और यहां तक कि केरल में पिनराई विजयन की सरकारों में काम मिला है। इन सरकारों ने कोई गलत काम नहीं किया, लेकिन जिस तरह गौतम अडानी को लेकर आरोप लग रहे हैं, जो बयान दिए जा रहे हैं, वे सुनने के बाद यह साफ है कि सारा मामला पॉलिटिकल ज्यादा है और फाइनेंशियल कम। गौतम अडानी का दावा है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में जो इल्जाम लगाए गए हैं, वे 15 से 20 साल पुराने मामले हैं और इनमें पहले ही अडानी ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट भी मिल चुकी है।

भारतीय जीवन बीमा निगम ने गुरुवार को साफ कर दिया कि अडानी ग्रुप की कंपनियों में उसका निवेश उसके कुल मार्केट इन्वेस्टमेंट का महज एक फीसदी है। अगर अडानी ग्रुप मार्केट वैल्यू जीरो भी हो जाती है, तो भी LIC के डूबने का कोई खतरा नहीं है। LIC ने कहा, उसने अडानी ग्रुप की कंपनियों में 30,127 करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट किया है, जिसकी मार्केट वैल्यू सोमवार को 56,142 करोड़ रुपये थी।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कहा कि उसने अडानी ग्रुप को 2.6 बिलियन डॉलर यानि करीब 21 हजार करोड़ रुपए का लोन दे रखा है, लेकिन अभी तक अडानी ग्रुप की तरफ से एक बार भी कोई किश्त डिफॉल्ट नहीं हुई है। बैंक ने कहा कि अडानी ग्रुप के जो एसेट गारंटी के तौर पर उसके पास हैं, उसके हिसाब से उसका इन्वेस्टमेंट सुरक्षित है।

पंजाब नेशनल बैंक ने कहा कि उसने अडानी ग्रुप को 7,000 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है। कई प्राइवेट बैंकों ने भी अडानी ग्रुप को लोन दिया है। अगर सारे भारतीय और अंतरराष्ट्रीय बैंकों का कर्ज भी मिला लिया जाए, तो भी सिर्फ गौतम अडानी की अपनी निजी संपत्ति उससे ज्यादा है। अडानी की नेटवर्थ, बैंकों के कर्ज से ज्यादा है। उनकी कंपनियों में पर्याप्त कैश फ्लो है। पिछले कुछ साल के दौरान अडानी ग्रुप की आमदनी के मुकाबले लोन भी कम हुआ है, इसलिए डिफाल्ट होने का सवाल ही नहीं है।

मोटी बात यह है कि न तो मोदी के दुश्मनों की संख्या कम है, और न ही अडानी की तरक्की से जलने वाले लोगों की कमी है। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट तो मोदी और अडानी, दोनों को निशाने पर लेने का एक बहाना भर है। कुछ लोग ऐसा इंप्रेशन बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि अडानी की तरक्की सिर्फ एक बुलबुला है जो फूटने वाला है और उनका बिजनेस खत्म हो जाएगा, लेकिन वे बस लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अडानी ग्रुप डूबने वाला नहीं है।

मैं आपको बताता हूं कि आखिरकार गौतम अडानी के बिजनेस की वैल्यू क्या है, उनके असेट्स क्या हैं। अडानी ग्रुप के पास भारत में गंगावरम, मुंद्रा और हजीरा जैसे पोर्ट्स हैं। अडानी ग्रुप केरल के विंझिजम में सिंगापुर और कोलंबो जैसे डीप वाटर पोर्ट बना रहा है। देश भर में अडानी ग्रुप के थर्मल पावर यूनिट्स हैं जो 13 हजार 500 मेगावाट पावर जेनरेट होती है और इसमें से ज्यादातर क्लीन एनर्जी की कैटिगरी में आती है। अडानी ग्रुप के पास 650 मेगावाट सोलर पावर बनाने की क्षमता है। इसकी 18 हजार सर्किट किलोमीटर की ट्रांसमिशन लाइंस और 30,000 MVA की ट्रांसफर कैपिसिटी एशिया में सबसे ज्यादा है।

अडानी के पास देश के 6 एयरपोर्ट हैं, इसके अलावा मुंबई एयरपोर्ट में हिस्सेदारी है। 2025 में शुरू होने वाले नवी मुंबई एयरपोर्ट को भी अडानी की कंपनी ऑपरेट करेगी। टॉप सीमेंट कंपनी ACC और अंबुजा अडानी ग्रुप के पास हैं। मुंद्रा में स्थित भारत का सबसे बिजी स्पेशल इकनॉमिक जोन अडानी ग्रुप के पास है। इस ग्रुप के पास ऑस्ट्रेलिया में कोयले की खदान है जिससे भारत के पावर प्लांट्स में भी हाई ग्रेड कोयले की सप्लाई होती है। अडानी ग्रुप NTPC की अडंर कंस्ट्रक्शन सोलर और विंड एनर्जी प्लांट का पार्टनर भी है।

अपनी फ्लैगशिप कंपनी अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड के तहत आने वाली कंपनियों जैसे अडानी पोर्ट्स, अडानी पावर, अडानी ग्रीन एनर्जी, अडानी विल्मर, अडानी टोटल गैस के जरिए अडानी ग्रुप ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट और इकॉनमिक ग्रोथ में भी काफी योगदान दिया है।

मैं अंत में एक बात कहना चाहता हूं कि अडानी एक उद्योगपति हैं। इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता की उनकी दौलत कम हो रही है या ज्यादा। लेकिन अडानी ने जो पोर्ट्स बनाए, थर्मल पावर स्टेशंस बनाए, एयरपोर्ट्स बनाए, ये अडानी ने अपने घर में इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाए। ये देश की संपति हैं।

उद्योगपति कोई भी हो, अगर राजनीतिक कारणों से हम उन पर हमला करेंगे तो इसमें देश का कितना नुकसान है, इसके बारे में भी एक बार जरूर सोचना चाहिए। पूरी दुनिया में लोग अपने वेल्थ क्रिएटर्स को सपोर्ट करते हैं, उनका सम्मान करते हैं, लेकिन हमारे यहां लोग किसी के भी पीछे पड़ जाते हैं, किसी पर भी शक करते हैं, विवाद पैदा करते हैं। मुझे लगता है कि इस सोच को बदलने की जरूरत है।

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Adani group is not sinking: Let us not deride our wealth creators

AKB30 Both Houses of Parliament were rocked for the second consecutive day today on the issue of Gautam Adani’s group of companies. Opposition leaders demanded discussion on what they called ‘financial irregularities’ in sanction of loans from public sector banks to Adani group in the light of Hindenburg research report, whose allegations have been comprehensively denied by the group.

Congress and other opposition leaders are pressing for setting up a Joint Parliamentary Committee to probe into the entire issue. Reserve Bank of India has sought details from all banks which have sanctioned loans to Adani group. Gautam Adani has clarified that his companies have not committed any financial irregularities, and all its transactions are in black and white. He has also clarified that his companies have not defaulted on any payment nor have caused financial loss to anybody. He has also announced that he was withdrawn his FPO (Follow on Public Offer) due to current market volatility, though it has been fully subscribed.

The questions that arise now is whether the short seller firm Hindenburg has Adani group shares? Will it be right to accept a foreign research firm’s report as authentic? Or, should we repose our trust in RBI and SEBI?

Congress has raised questions on why LIC and SBI heavily invested in Adani group shares. Both LIC and SBI have said that they have not faced any loss. Is the Adani issue a mere façade for the opposition to target Prime Minister Narendra Modi? One must understand that Adani group’s business, its share value and wealth increased when the UPA government was in power.

Even during the last nine years of Modi’s rule, Congress-ruled state governments went out of their way to invite Adani group to invest in projects in their states.

The attack by opposition on Adani issue is not new. Years before the Hindenburg research report came before public, Congress leader Rahul Gandhi had been harping on the Adani-Ambani theme, and alleging that Prime Minister Modi was working to favour these two top industrialists. With the steep drop in prices of Adani group shares in the stock market, the opposition has got a fresh weapon to attack Modi.

The fact remains that Adani group’s fortunes took a meteoric rise when Prime Minister Rajiv Gandhi was in power and Chimanbhai Patel was the chief minister of Gujarat. During P V Narasimha Rao’s rule, when the new economic era dawned, Adani opened new businesses, created brand values and achieved tremendous growth.

When infrastructure picked up during Prime Minister Modi’s rule, Gautam Adani’s group took wings, setting up ports, power plants and other projects. Political analyst Dr Ajay Alok says, Gautam Adani’s success story is an inspiring one which should be taught to students. From Rs 2 crore net worth during Congress rule, Adani’s turnover rose to Rs 80,000 crore during Dr Manmohan Singh’s UPA rule.

It is a known fact that Adani group got projects when Rajiv Gandhi, Dr Manmohan Singh, Chimanbhai Patel, Uddhav Thackeray, Ashok Gehlot and even Kerala’s CPI-M leader Pinarayi Vijayan were in power. The entire hullaballoo that is now being created is more political, and less financial. Gautam Adani says, the allegations that have been made in Hindenburg report were 15 to 20 years old, and his group has already got a clean chit from Supreme Court.

Life Insurance Corporation of India, on Thursday, clarified that its investment in Adani group companies is merely one per cent of its total capital market investment. Even if Adani group’s market capitalization declines to zero, LIC will not face a financial loss. LIC said, it invested Rs 30,127 crore in Adani group companies, whose market value was Rs 56,142 crore as on Monday.

State Bank of India said, it has given $ 2.6 billion ( Rs 21,000 crore) loan to Adani group companies, but till now, Adani group has not made any default in loan repayments. On the basis of Adani group’s capital assets pledged as guarantee, SBI’s investments are secure.

Punjab National Bank said, it gave Rs 7,000 crore loan to Adani group. Several private banks have also given loans to the group. Even if all the loans of Indian and international banks are clubbed together, it is lesser than the total value of Adani’s personal properties. Adani’s net worth is more than the bank loans, it has adequate cash flow, and in the last several years, the group’s earnings have been more than its loans. So, there is no question of default in servicing debts.

Overall, neither Prime Minister Modi has fewer enemies, nor Gautam Adani has fewer people who are jealous about his meteoric growth. The Hindenburg research report has come as an excuse to target both Modi and Adani. People are trying to create an impression that Adani’s miraculous growth is just a bubble about to burst and his business will wind up, but they are misleading people. Adani group is not sinking.

Let me tell you the value of Gautam Adani’s businesses and assets. His group owns Gangavaram, Mundhra and Hazira ports. In Vizhinjam, Kerala, Adani group is building a deep water port comparable to Singapore and Colombo. Adani group’s thermal power units generate 13,500 MW, most of which come under clean energy category. The group has capacity to generate 650 MW solar power. Its 18,000 circuit km transmission lines and 30,000 MVA transfer capacity is Asia’s largest.

Adani group owns six airports, apart from partnership in Mumbai airport. Navi Mumbai airport to be opened in 2025 will be operated by Adani group. It owns two top cement companies, ACC and Ambuja Cement. India’s busiest special economic zone port in Mundra belongs to Adani group. It owns coal mines in Australia that supply high-grade coal to power plants in India. It is partner in NTPC’s under construction solar and wind energy plant.

Adani Ports, Adani Power, Adani Green Energy, Adani Wilmar, Adani Total Gas, all these companies that come under the flagship Adani Enterprises Ltd make immense contribution to India’s infra development and growth.

In conclusion, let me say, Gautam Adani is an industrialist. It does not matter if his net worth rises or declines, but the ports, thermal power stations, airports and power transmission lines that his group has built, are not meant for his personal use. They are national assets.

If we make political attacks on any industrialist, whosoever he may be, it will only cause harm to our national interest. We must remember one point: All over the world, people support their wealth creators, they give them due respect, but there are people in India, who raise doubts, create scares and controversies and deride our wealth creators. I think such a mindset needs to be changed.

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नरेंद्र मोदी ने कैसे बजट की परिभाषा बदल डाली

akbअब जबकि केंद्रीय बजट का पूरा ब्यौरा सामने आ चुका है और अर्थशास्त्री, आयकर विशेषज्ञ एवं पूंजी बाजार के विश्लेषक बजट प्रस्ताव के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने में जुटे हैं, इस बजट पर एक विहंगम दृष्टि डालने की जरूरत है। देश का मध्यम वर्ग इनकम टैक्स में दी गई राहत से खुश है, अमीर करदाता भी खुश हैं, जबकि महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, युवाओं और किसानों ने नई योजनाओं का स्वागत किया है।

बजट के पूरे विवरण में न जाकर हमें निर्मला सीतारमण के इस बजट की दो बातें समझनी होंगी।

पहला : कोरोना की महामारी ने पूरी दुनिया में हर मुल्क की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है। आज अमेरिका और यूरोप के बड़े-बड़े मुल्क इस मार से उबर नहीं कर पाए हैं। वहां महंगाई और बेरोजगारी से लोग परेशान हैं। लोगों को नौकरियों से निकाला जा रहा है। हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में तो लोग दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। लेकिन भारत कोरोना महामारी की मार से पूरी तरह उबर गया है। आज हम कोरोना से पहले वाली स्थिति में पहुंच गए हैं। पूरी दुनिया भारत को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था मानती है।

दूसरी बात,अब ये समझने की जरूरत है कि भारत ऐसा क्यों कर पाया ? ऐसा इसलिए हुआ कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमेशा देश की अर्थव्यवस्था के बारे में एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण से काम किया। 2014 में अरुण जेटली ने मोदी सरकार का पहला बजट पेश किया था। अगर आप गौर से देखें तो तब से लेकर इस साल तक के सभी सालाना बजट आपस में जुड़े हुए हैं। इससे पहले बजट एक साल के लिए होते थे। वे साल की आर्थिक और राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए होते थे। नरेंद्र मोदी ने इस सोच को बदला। उन्होंने बजट की परिभाषा और शब्दावली को ही बदल दिया। इसलिए हमें भी मोदी के बजट को देखने का तरीका बदलना होगा।

मोदी से पहले बजट का मतलब होता था क्या सस्ता हुआ, क्या मंहगा हुआ, किस चीज पर ज्यादा एक्साइज या कस्टम ड्यूटी लगी और कौन सा प्रोडक्ट बच गया। मुझे याद है बजट के महीनों पहले औद्योगिक घरानों की तरफ से लॉबिंग होने लगती थी। हर व्यापारी सिर्फ अपने फायदे के लिए अपने उत्पाद या अपनी वस्तुओं पर ड्यूटी (शुल्क) कम करने के लिए दौड़ता था, लॉबिंग करता था। लेकिन अब ये नहीं होता।

पिछले नौ साल से बजट में ओवर ऑल डेवलपमेंट (समग्र विकास) और ग्रोथ की बात होती है। निर्मला सीतारामन ने भी लगातार पांचवें साल इसी रास्ते को फॉलो किया। देश जब 2047 में आजादी की 100 वीं वर्षगांठ मना रहा होगा (जिसे ‘अमृत काल’ का नाम दिया गया है ), तब हमारी अर्थव्यवस्था कैसी होगी, निर्मला सीतारामन ने इसकी बात की।

कुछ लोगों का कहना है कि यह चुनावी बजट है। मेरा कहना है कि अगर मोदी की नीतियों से लोगों को घर मिले, बिजली मिली, नल से जल मिला, शौचालय मिले, गैस मिली, दो वक्त की दाल रोटी मिली तो इसमें बुरा क्या है? अगर सरकार ऐसे बजट और ऐसी योजनाएं बनाए, जिसका सीधा लाभ लोगों तक पहुंचे तो इसे अच्छा संकेत मानना चाहिए।

बुधवार को पेश बजट में जो आंकड़े सामने आए उससे पता चला कि पिछले नौ साल में भारत की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई है। भारत की अर्थव्यवस्था पहले दुनिया में दसवें नंबर पर थी लेकिन अब यह पांचवें नंबर पर आ गई है। यह अच्छा संकेत है और उम्मीद करनी चाहिए कि 2047 में हम दुनिया की पहली दो अर्थव्यवस्थाओं में से एक होंगे।

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How Narendra Modi changed the very definition of Union Budget

AKb (1)Now that full details of the Union Budget are out, and economists, income tax experts and capital market analysts continue to grapple with figures and minutely go through the fine print in Finance Bill proposals, it is time to take an overall view. The Indian middle class is elated over Income Tax relief, rich taxpayers are also happy, while women, senior citizens, youths and farmers have welcomed the new schemes.

Without going into details of the Budget, one must understand two points from Nirmala Sitharaman’s Budget.

One: At a time when Covid pandemic has devastated the economies of most of the countries of the world, with the US and other big nations of Europe yet to recover fully from recession, inflation and unemployment, at a time when neighbouring Pakistan is struggling to keep afloat due to sinking economy, with poor Pakistanis clamouring for two decent meals a day, India, under Prime Minister Narendra Modi, recovered fully from the effects of pandemic. We can say today with confidence that Indian economy has almost reached the pre-Covid situation. The entire world recognises India as the fastest growing economy.

Two: One must try to understand how India managed this miraculous recovery. I have no hesitation in saying that it was Prime Minister Narendra Modi, who, throughout his tenure, brought about changes in the economy with a long-term vision.

Arun Jaitley as Finance Minister had prepared the first Budget of Modi government in 2014. If you look thoroughly, all the annual Budgets since then till this year, are inter-linked. They appear to be in continuation. Earlier, Union Budget used to be prepared only for that fiscal year: to fulfil economic and political needs. Narendra Modi changed this way of thinking. He completely changed the definition and lexicon of the Union Budget. We should, therefore, change our manner of looking at annual budgets of the Union government.

During pre-Modi years, the man on the street and the industrialists sitting in their offices, used to be curious about which goods have become cheaper, or costlier. Which product faced higher excise or custom duties, and which products were left out. I remember those days when industrial houses used to engage in lobbying months before the preparation of Budget, and big industrialists and businessmen used to lobby for lowering of duties for particular goods. No such lobbying now.

In the last nine years, the Budget had been focussing more on overall development and growth. Nirmala Sitharaman, as Finance Minister, followed this path for the fifth consecutive year. She spoke about how our economy will be in the year 2047, when India will complete 100 years of independence, known as ‘Amrit Kaal’.

Some have described Wednesday’s budget as an ‘election budget’. My argument is simple: What’s the harm if millions of Indians get concrete houses, electricity, drinking water from taps, toilets, LPG, and free monthly foodgrains for sustenance? If the government prepares a budget incorporating such schemes that deliver direct benefits to the people, it should be accepted as a positive indicator.

The figures that were mentioned in Wednesday’s Budget reveal that India’s per capital income has doubled in the last nine years, and Indian economy has jumped from tenth place to fifth place in the world order. These are good indicators and all of us must hope that in the year 2047, India will be among the top two biggest economies of the world.

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राहुल की भारत जोड़ो यात्रा: क्या विपक्षी दल उन्हें नेता के रूप में स्वीकार करेंगे ?

AKBकांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की समापन रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पर जमकर निशाना साधा। इसके साथ ही उन्होंने आरएसएस को भी जोड़ा और कहा कि ये लोग हिंसा भड़काते हैं।

शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में लगातार हो रही बर्फबारी के बीच राहुल गांधी ने कहा, ‘मुझे पता है कि हिंसा क्या होती है। मैंने इसे देखा है और इसे झेला है। जिन्होंने हिंसा नहीं देखी या हिंसा को नहीं झेला है, वे इसे नहीं समझ पाएंगे। जैसे मोदीजी, अमित शाहजी, भाजपा और आरएसएस – वे इस दर्द को कभी नहीं समझेंगे…मोदी, अमित शाह, अजीत डोभाल, आरएसएस के लोग जो हिंसा भड़काते हैं, वे इस दर्द को नहीं समझेंगे। सेना के किसी जवान का परिवार यह समझेगा, पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ जवानों का परिवार यह समझेगा, कश्मीर के लोग समझेंगे कि वह दर्द क्या होता है।

लोगों की भावनाओं की रग को छूने की कोशिश करते हुए राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की हत्याओं का जिक्र किया। उन्होंने याद किया कि कैसे जब वे 14 साल के थे तो स्कूल में पढ़ाई के दौरान और फिर जब वे अमेरिका के एक कॉलेज में थे तब उन्हें इन हत्याओं के बारे में फोन कॉल मिली थी। राहुल गांधी ने कहा, दोनों फोन कॉल उसी तरह की थी, जिस तरह की कॉल परिवार के किसी सदस्य के मरने पर कश्मीर के लोगों को और पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों के परिवारों को मिली थी।

समापन रैली में कांग्रेस ने 23 विपक्षी दलों को न्योता भैजा था, लेकिन केवल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख उमर अब्दुल्ला और सीपीआई नेता डी. राजा ने इस रैली में हिस्सा लिया। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, जद (यू), आरजेडी समेत ज्यादातर पार्टियों ने राहुल की रैली से किनारा कर लिया। वहीं जीएमके, झामुमो, आरएसपी, आईयूएमएल और बसपा ने रैली में शामिल होने के लिए अपने प्रतिनिधियों को भेजा । हालांकि, कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि ज्यादातर पार्टियों के नेता मौसम की खराबी के कारण नहीं पहुंच पाए। रैली के बाद राहुल ने प्रियंका गांधी के साथ मजेदार ‘स्नोबॉल फाइट’ (एक-दूसरे पर बर्फ के गोले फेंकना) की। राहुल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ 7 सितंबर को कन्याकुमारी से शुरू हुई और 22 राज्यों से होते हुए 145 दिनों की यात्रा के बाद श्रीनगर पहुंची।

राहुल गांधी ने कहा कि इस यात्रा का मकसद राजनीतिक नहीं था । ‘यह कांग्रेस की यात्रा नहीं है । इसका उद्देश्य भारत को एकजुट करना है।’ इसके साथ ही उन्होंने यह आरोप लगाकर कि बीजेपी और आरएसएस नफरत फैला रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घेरने की कोशिश की। राहुल गांधी ने कहा-‘मोदी और अमित शाह डरते हैं। वे कश्मीर में पैदल नहीं चल सकते हैं। लोगों ने मुझे भी डराने की कोशिश की लेकिन मैं डरा नहीं। राहुल ने इल्जाम लगाया कि बीजेपी के लोग उनकी सफेद टी-शर्ट को लाल रंग में रंगना चाहते थे। अफसरों ने उनसे कहा था कि अगर पैदल चलेंगे तो उन पर हैंड ग्रेनेड फेंके जा सकते हैं। राहुल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर उनका घर है और यहां के लोगों से उन्हें ग्रेनेड नहीं, प्यार मिला।

अपने भाषण में महबूबा मुफ्ती ने कहा, ‘गोडसे की विचारधारा ने जम्मू-कश्मीर से जो छीना है, राहुल की यह यात्रा उसे वापस लौटाएगी। राहुल गांधी ने कश्मीर के लोगों में उम्मीद की रोशनी जगाई है।’ नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा, ‘इस यात्रा ने यह साबित किया है कि भारत में अब भी संघ की विचारधारा से अलग विचारधारा के लोग मौजूद हैं। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अभी तो राहुल कन्याकुमारी से कश्मीर तक चले हैं। अब उन्हें गुजरात से असम की यात्रा भी करनी चाहिए और वो भी राहुल के साथ इस यात्रा में शामिल होंगे।

बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल के आरोपों का जवाब देते हुए कहा, ‘ये कश्मीर की बदली हुई फिजा का ही सबूत है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी कश्मीर में बेखौफ होकर बर्फ से खेल रहे हैं। राहुल गांधी ने अपनी यात्रा को भारत जोड़ो का नाम दिया था लेकिन उन्होंने देश को ये नहीं बताया कि देश जितनी बार टूटा वो सब कांग्रेस के कारण टूटा।’

मैंने जब राहुल गांधी का भाषण सुना तो पहले दस- बारह मिनट तो ये समझना मुश्किल था कि वो कहना क्या चाहते हैं। आपने देखा होगा कि कांग्रेस के नेता ये कह-कह कर थक गए कि भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी की छवि बनी है। पर राहुल ने सोमवार को कहा कि यह यात्रा उन्होंने अपने लिए नहीं की। राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं लेकिन वो कहते हैं कि ये यात्रा उन्होंने अपनी पार्टी के लिए भी नहीं की। फिर उन्होंने यह भी कह दिया कि उनकी यात्रा राजनीति के लिए नहीं है। लेकिन उन्होंने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर जो हमला किया वो पूरी तरह राजनीतिक था। इसलिए वो क्या कहते हैं और क्या करते हैं, ये समझना जरा मुश्किल है।

राजनीति को समझने वाले कहते हैं कि राहुल ने यह यात्रा अपने करीबी लोगों के कहने पर की। उनके सलाहकारों ने कहा कि लोगों में यह धारणा पनपने लगी कि राहुल राजनीति में ज्यादा रुचि नहीं रखते हैं और वे अनिच्छुक हैं। उनकी यह छवि बनने लगी कि मेहनत नहीं करते हैं और छुट्टी पर रहते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री पद के नए-नए दावेदार सामने आने लगे। कांग्रेस के नेता खुश हैं कि यात्रा की वजह से राहुल ने अपने आप को नीतीश कुमार और के चंद्रशेखर राव जैसे नेताओं के मुकाबले बड़ा नेता साबित कर दिया।

अब कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि उन्हें एक नया राहुल गांधी मिल गया है जो उनकी नैया पार लगाएगा। जो काम पहले वाला राहुल नहीं कर पाया वो नया राहुल करके दिखाएगा। लेकिन चाहे ममता बनर्जी हों या फिर केसीआर, चाहे नीतीश कुमार हों या तेजस्वी यादव या फिर अखिलेश यादव, ये सारे नेता कांग्रेस का प्लान पंचर करने में लगे हैं। नीतीश कुमार, तेजस्वी और अखिलेश यादव मजहब के बाद अब सियासत को जाति के लेबल पर लाने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए पहले जातिगत जनगणना और अब रामचरित मानस को मोहरा बनाया गया है। कुल मिलाकर विपक्षी दलों की एकता अभी एक मृगतृष्णा बनी हुई है।

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Rahul’s Yatra: Will opposition parties accept him as the leader?

akbAt the culmination rally of ‘Bharat Jodo Yatra’ in Srinagar on Monday, Congress leader Rahul Gandhi lashed out at Prime Minister Narendra Modi, Home Minister Amit Shah and National Security Adviser Ajit Doval. He clubbed them along with RSS and said, they were “instigators of violence”.

Amidst a steady drizzle of snow at Sher-e-Kashmir stadium, Rahul Gandhi said, “I know what is violence. I have seen it and suffered it. Those who have not seen or suffered violence, will not understand it. Like Modi, Shah, RSS, they have not suffered violence….Those who instigate violence like Modi, Amit Shah, Ajit Doval, people of RSS, they will not understand pain. But the people of Kashmir, the people of CRPF, BSF and the Army, and their families will understand.”

Trying to touch an emotional chord, Rahul Gandhi referred to the assassinations of his grandmother Indira Gandhi and father Rajiv Gandhi. He recalled how he received phone calls when he was a 14-year-old in school, and then as a college student in the US, informing him about the assassinations. Rahul said, the two phone calls were similar to the phone calls received by families of people of Kashmir and of security personnel, like those who died in Pulwama terror attack.

The Congress had invited 23 opposition parties to attend the culmination rally, but only JKPDP chief Mehbooba Mufti, National Conference chief Omar Abdullah and CPI leader D. Raja attended. None of the top opposition leaders from Samajwadi Party, Trinamool Congress, JD(U), RJD attended, while DMK, JMM, RSP, IUML and BSP sent their representatives. Congress leaders cited bad weather as the reason. After the rally, Rahul and his sister Priyanka Gandhi played with snow, to the amusement of onlookers. Rahul’s Bharat Jodo Yatra began on September 7 from Kanyakumari and after 145 days of travel through 22 states, reached Srinagar.

Rahul Gandhi, said the aim of this yatra was not political. “This is not the yatra of Congress. Its aim is to unite India”, said Rahul Gandhi, but in the same breath, he lambasted Prime Minister Modi and his government, alleging that the BJP and RSS were spreading hate.

Rahul Gandhi said, “Modi and Amit Shah are afraid. They cannot muster the courage to travel in Kashmir on foot. People tried to strike fear in me. Some wanted to colour my white T-shirt in red. Officers told me that if you walk on foot, hand grenade can be thrown. Jammu Kashmir is my home. No grenade was thrown at me, but the people gave me their affection.”

In her speech, Mehbooba Mufti said, “Rahul’s Yatra will bring back the affection that was snatched away from Kashmiris by people who follow Godse’s ideology. Rahul has kindled a ray of hope among the people of Kashmir.” National Conference chief Omar Abdullah said, “this yatra has proved that there exists in India a vast majority of people who do not follow the RSS ideology. Rahul must now travel from Gujarat to Assam also, and I will accompany him.”

BJP spokesman Sudhanshu Trivedi replied to Rahul’s allegations and said, “the return of peace in the Kashmir Valley has made it possible for Rahul and Priyanka Gandhi to play with snow. Rahul named his yatra ‘Bharat Jodo’, but he did not tell the nation that it was Congress which partitioned India. ”

After watching Rahul Gandhi speaking at the rally on Monday, I could not understand for the first 10 to 12 minutes what exactly he wanted to convey. You must have noticed Congress leaders claiming that ‘Bharat Jodo Yatra’ has refurbished rahul’s image, but on Monday, Rahul Gandhi said, he did not go on this yatra for his own interest. Rahul Gandhi is the tallest leader in the Congress, but he said, this yatra was not for the Congress too. He also said, this yatra was not for political objectives. But his attacks on Narendra Modi and Amit Shah were purely political. It is difficult to understand the meaning behind what Rahul speaks and does in practice.

Those who know politics say, Rahul undertook this yatra on the advice of his close confidantes. His advisers told him that a common impression has gained currency among people that Rahul is not very much interested in politics, and is reluctant, that he is unwilling to put in hard work, and often goes out of the country on vacation. Because of this, fresh contenders for the post of PM have come forward. Congress leaders are now happy that the yatra has put Rahul on a higher pedestal compared to those of Nitish Kumar and K Chandrashekhar Rao.

Congress leaders feel that they have got a new avatar of Rahul, who will regain the grand old party’s lost glory. They believe the new avatar of Rahul will deliver what the earlier avatar could not. But leaders like Mamata Banerjee, KCR, Nitish Kumar, Tejashwi Yadav and Akhilesh Yadav, are out to puncture the plans of Congress.

Nitish Kumar, Tejashwi Yadav and Akhilesh Yadav, have now started rejigging their political gambit on the basis of caste instead of religion. That is why, caste census has been ordered in Bihar and Ramcharit Manas is also being targeted to reignite the caste cauldron. Opposition unity still continues to be a mirage.

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कश्मीर में राहुल की यात्रा के दौरान सुरक्षा में चूक क्यों हुई?

AKB30 राहुल गांधी ने शनिवार को एक बार फिर से अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू कर दी। इससे पहले शुक्रवार को सुरक्षा में चूक का आरोप लगाकर उन्होंने अपनी पदयात्रा को स्थगित कर दिया था। आज अंवतीपोरा में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी राहुल की इस यात्रा में शामिल हुईं।

राहुल की यात्रा टी ब्रेक के लिए पम्पोर में रुकी। इसके बाद यह यात्रा श्रीनगर के बाहरी इलाके पंथा चौक की ओर जाएगी जहां रात्रि विश्राम करने की योजना है। प्रियंका गांधी भी श्रीनगर पहुंच चुकी हैं और वे भी राहुल की पदयात्रा में शामिल होंगी। रविवार को भारत जोड़ो यात्रा पंथा चौक से शुरू होकर बुलवार्ड रोड स्थित नेहरू पार्क पहुंचेगी।

शुक्रवार को राहुल गांधी ने जम्मू के बनिहाल से अपनी यात्रा शुरू की थी और बुलेटप्रूफ वाहन के जरिए काजीगुंड में जवाहर टनल को पार किया। इसके बाद यात्रा में भीड़ इतनी ज्यादा हो गई कि वे मुश्किल से 500 मीटर और चल पाए। दरअसल, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला बड़ी संख्या में राहुल गांधी का स्वागत करने पहुंचे। उमर अब्दुल्ला भी राहुल के साथ-साथ यात्रा में पैदल चलने लगे।

सुरक्षा एजेंसियों ने राहुल गांधी के चारों तरफ जो बाहरी सुरक्षा घेरा बनाया था वह भीड़ बढ़ने के चलते टूट गया। सुरक्षा बलों के लिए भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया। सुरक्षा घेरे से बाहर चल रहे लोग भी राहुल गांधी के सुरक्षा घेरे के भीतर आ गए। जिसके चलते यात्रा रोकनी पड़ी।

बाद में राहुल गांधी ने कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिस फोर्स मौजूद नहीं रहने के चलते उनकी सुरक्षा टीम से जुड़े लोगों ने यात्रा को स्थगित करने को कहा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया-‘भीड़ को संभालने वाले पुलिसकर्मी कहीं नजर नहीं आ रहे थे…प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा मुहैया कराए। मेरे लिए बहुत मुश्किल है कि मैं अपनी सुरक्षा में लगे लोगों के सुझावों के खिलाफ जाऊं।’

कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन राहुल गांधी की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा है। यात्रा के मैनेजर और कांग्रेस नेता जीतू पटवारी ने कहा, मैंने पार्टी नेताओं के साथ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित कराने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर से भी मुलाकात की थी। इसके बाद भी पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नही किए गए। ऐसा लगता है कि यह प्रशासन की ओर से जानबूझकर किया गया है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ट्वीट किया, ‘ राजनीति अपनी जगह है पर कश्मीर घाटी में राहुल गांधी की सुरक्षा से खिलवाड़ करके सरकार ने अपने निम्नतम से भी निम्नतम स्तर का प्रदर्शन किया है। भारत पहले ही इन्दिरा गांधी जी और राजीव गांधी जी को खो चुका है, किसी भी सरकार या प्रशासन को ऐसे मामलों पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए।’

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर उनसे इस मामले में दखल देने और भारत जोड़ो यात्रा को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध किया। उन्होंने लिखा, ‘यदि आप व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं और संबंधित अधिकारियों को यात्रा समाप्ति और 30 जनवरी को श्रीनगर में होनेवाले समारोह तक पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने की सलाह दे सकते हैं, तो मैं आपका आभारी रहूंगा।’

जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) आर के गोयल ने यात्रा आयोजकों को अचानक बढ़ती भीड़ के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, केंद्रीय अर्धसैनिक बल की 15 कंपनियां और जम्मू-कश्मीर पुलिस की 10 कंपनियां यात्रा के लिए तैनात की गई थीं, लेकिन आयोजकों को इस बात की पहले से कोई जानकारी नहीं थी कि यात्रा में शामिल होने के लिए बनिहाल में भारी भीड़ जमा होगी। उन्होंने कहा कि सुरक्षा अधिकारियों को जानकारी दिए बिना अचानक से यात्रा को रोक दिया गया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।

गोयल ने कहा, यात्रा में भीड़ इसलिए बढ़ गई क्योंकि टनल में दाखिल होने के बाद समर्थकों के वापस लौट जाने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बड़ी संख्या में लोग काफिले के साथ चलने लगे। इससे सुरक्षा घेरा टूट गया। वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर बीजेपी प्रमुख रविंद्र रैना ने दावा किया कि यात्रा में भीड़ नहीं जुटी थी इसलिए राहुल गांधी ने सुरक्षा का बहाना बनाकर इसे कैंसिल किया।

सियासी बयानों की बात अलग है, लेकिन सुरक्षा का मामला बिल्कुल अलग है। राहुल गांधी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने ही चाहिए। यह बात सही है कि सिक्यॉरिटी एजेंसीज ने राहुल गांधी को जम्मू कश्मीर में पैदल यात्रा न करने की सलाह दी थी, लेकिन राहुल जिद पर अड़े रहे। सुरक्षा में लगे अफसर ये कह कर नहीं बच सकते कि उन्हें आयोजकों ने भारी भीड़ के बारे में नहीं बताया था। सिक्यॉरिटी एजेंसी का काम तो हर हाल में पूरी सुरक्षा देना होता है। जहां तक प्रोटोकॉल और तय नियम कायदों के पालन का सवाल है, तो राहुल गांधी के लिए प्रोटोकॉल को तोड़ना कोई नई बात नहीं है।

24 दिसंबर को जब दिल्ली में राहुल गांधी की सुरक्षा में चूक का मामला उठा था, उस वक्त भी CRPF ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि राहुल गांधी ने 113 बार खुद सिक्यॉरिटी प्रोटोकॉल तोड़ा है। जब सुरक्षा एजेंसियों को मालूम है कि राहुल गांधी सुरक्षा के साथ खुद खिलवाड़ करते हैं तो उन्हें ज्यादा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि अब वह कश्मीर में हैं। तमाम देशविरोधी ताकतें मौके की तलाश में हैं जिससे कश्मीर को एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा में लाया जा सके।

शुक्रवार को नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जैसे-जैसे यात्रा घाटी में आगे बढ़ेगी, भीड़ भी बढ़ती जाएगी। उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि ‘मोदी सरकार ने मुसलमानों को उनके हक से महरूम कर दिया है। 15 फीसदी आबादी होने के बावजूद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में एक भी मुसलमान नहीं है। न ही सत्ताधारी पार्टी में एक भी मुस्लिम सांसद है। मोदी सरकार ने मुसलमानों से सत्ता में भागीदारी छीन ली है।’

उमर अब्दुल्ला हिंदू-मुसलमानों के आधार पर लोगों को बांटने की बात कह रहे हैं, और इसे ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का नाम दे रहे हैं। यही सियासत है। अगर पुरानी बातें याद दिलाई जाएंगी तो शायद उमर अब्दुल्ला को जवाब देते न बने। महबूबा मुफ्ती हों या उमर अब्दुल्ला, दोनों ने अब तक कश्मीर को हिन्दू-मुसलमानों के आधार पर बांट कर ही राज किया है। जम्मू को उसका हक इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि जम्मू में हिंदुओं और सिखों की संख्या ज्यादा थी।

उमर अब्दुल्ला को यह भी याद करना चाहिए उनकी सरकार में, उनके वालिद (फारूक अब्दुल्ला) की सरकार में और उनके दादा (शेख अब्दुल्ला) की सरकार में कितने हिंदू मंत्री थे। उमर को यह भी बताना चाहिए कि जब कट्टरपंथियों और जिहादियों की वजह से कश्मीरी पंडितों को घाटी से घर, मकान, दुकान छोड़कर भागना पड़ा, उससे एक दिन पहले तक जम्मू कश्मीर में किसकी सरकार थी।

असल में PDP हो, नेशनल कॉन्फ्रेंस हो या कांग्रेस, इन सभी दलों की यही सियासत रही है कि कश्मीरियों को हिंदू और मुसलमान में, गद्दी और नॉन गद्दी में बांटते रहो, दूरियां बढ़ाते रहो और सरकारें चलाते रहो। लेकिन अब वक्त बदल गया है। कश्मीर बदल गया है। कश्मीर में अब सब कश्मीरी हैं, सबके हक बराबर हैं। यह बात उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं को पच नहीं रही है। अब आर्टिकल 370 की दीवार गिर चुकी है।

इसलिए ये नेता एक बार फिर मजहब की दीवार खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अब कश्मीर के लोग असलियत जान चुके हैं। अगली बार जब भी चुनाव होंगे तो पहले की तरह 7 फीसदी वोटों से सरकार नहीं बनेगी। यहीं चिंता उमर को खाए जा रही है।

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