Rajat Sharma

My Opinion

किसान आंदोलन : गतिरोध जल्द खत्म हो तो बेहतर

akbसंयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं ने साफ कर दिया है कि अब किसानों का आंदोलन लम्बा चलेगा. शुक्रवार को किसान संगठनों ने आक्रोश दिवस मनाया, अगले सोमवार को Highways पर ट्रैक्टर मार्च होगा, 14 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में किसान महापंचायत होगी. इस दौरान किसान संगठनों में आपसी दरार भी सामने आ गई. संयुक्त किसान मोर्चे ने पंजाब के किसान संगठनों के आंदोलन को समर्थन तो किया, खनौरी बार्डर पर हुई हिंसा की निंदा की, हरियाणा सरकार और पुलिस के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की, खनौरी में जिस नौजवान की मौत हुई है उसकी न्यायिक जांच कराने की मांग की, लेकिन साथ-साथ ये भी कह दिया कि फिलहाल पंजाब के संगठनों के आंदोलन में संयुक्त किसान मोर्चा शामिल नहीं हैं. अब आगे क्या करना है, सभी किसान नेताओं को एक साथ कैसे लाया जाए, इसके लिए कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाई गई है, लेकिन फिलहाल पंजाब के किसान संगठनों के साथ संयुक्त किसान मोर्चे का राब्ता नहीं हैं. दूसरी तरफ आंदोलन कर रहे पंजाब के किसान संगठनों ने एलान कर दिया कि फिलहाल वो सरकार से कोई बात नहीं करेंगे क्योंकि सरकार किसानों पर जुल्म कर रही है. किसान नेताओं का इल्जाम है कि हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा में घुसकर प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाईं, जिसमें चौदह किसान घायल हुए हैं, एक लड़के की मौत हुई है. किसान संगठनों का कहना है कि पंजाब सरकार भी डबल गेम खेल रही है. एक तरफ किसानों के साथ हमदर्दी दिखाती है, दूसरी तरफ प्रदर्शनाकरियों की मदद के लिए आ रहे ट्रैक्टर्स और राशन-पानी से भरे ट्रकों को रोका जा रहा है. किसान संगठनों ने कहा है कि भगवंत मान को अपना रुख साफ करना चाहिए. गुरुवार को हमने अपने शो ‘आज की बात’ में वीडियो दिखाया, जिसमें साफ नजर आ रहा है कैसे खनौरी में प्रदर्शनकारियों ने सडॉक की बजाय खेतों के रास्ते आगे बढ़ने की कोशिश की, पुलिस पर हमला किया, उनके हाथों में लाठियां थीं, कुछ लोग पुलिस पर पत्थर बरसा रहे थे. तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि पुलिस के जवानों के पास बंदूकें नहीं हैं, वे लाठियों से प्रदर्शनकारियों का मुकाबला कर रहे थे, इस वीडियो से ये तो साफ है कि किसान नेताओं की ये बात पूरी तरह सही नहीं है कि किसान शान्तिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे और उन्होंने पुलिस पर कोई हमला नहीं किया. कुछ और तस्वीरें भी मिली. खनौरी बॉर्डर के पास कई हज़ार क्विंटल पराली का ढेर लगा हुआ था, जब पुलिस ने किसानों को आगे बढ़ने से रोका, तो बहुत से किसान पराली के गट्ठर उठाकर आगे बढ़ने लगे. इसके पीछे बड़ी प्लानिंग थी. जब प्रदर्शनकारी पराली लेकर पुलिस के घेरे के क़रीब पहुंच गए, तो उन्होंने पराली में आग लगा दी, आग लगने के बाद किसानों ने पानी लगाकर बुझा दिया और फिर उसमें मिर्च पाउडर झोंक दिया. इससे अधजली पराली से भयंकर धुआं निकलने लगा. इस धुएं से पुलिसवालों की आंखों में जलन होने लगी, उनके लिए देखना मुश्किल हो गया, मिर्च मिश्रित धुएं की जलन से पुलिस वालों को भागना पड़ा. जब इस मिर्ची वाले धुएं में फंस गए तो किसानों ने पुलिसवालों पर हमला बोल दिया जिसमें 10 से 12 पुलिसवाले गंभीर रूप से जख्मी हो गए. गुरुवार को फोरेंसिक विभाग की एक टीम, खनौरी बॉर्डर पहुंची. इस टीम ने जली हुई पराली से नमूने इकट्ठे किए ताकि जांच करके ये पता लगाया जा सके कि पराली में क्या-क्या मिलाया गया था. पंजाब के किसान नेता बार बार दावा कर रहे हैं कि प्रदर्शनकारी शान्तिपूर्ण तरीके से दिल्ली की तरफ बढ़ना चाहते हैं, सरकार किसानों पर जुल्म कर रही है, लेकिन जो तस्वीरें हैं, वो दूसरी कहानी बयां करती हैं. मैंने कल भी कहा था कि किसान संगठनों ने जिस तरह की तैयारी की है, उससे लगता है कि वे जंग की तैयारी करके आए हैं. पुलिस अफसरों ने बार बार कहा है कि प्रदर्शनकारी गडांसे, तलवार लेकर आए थे. उन्होंने लाठियों के आगे नुकीले हथियार लगा रखे थे. किसानों के प्रोटेस्ट में वस्तुत: अंदर क्या हो रहा है, समझना और कहना काफी मुश्किल है. रिपोर्टरों को किसान नेताओं के खेमे के अंदर जाने नहीं दिया जा रहा. कई जगह रिपोर्टरों के साथ हाथापाई भी हुई. एक तरफ प्रदर्शन करने वाले किसान हैं, दूसरी तरफ पुलिस. दोनों के अपने-अपने दावे हैं. दोनों के अपने अपने videos हैं. दोनों का कहना है कि दूसरी तरफ से हमला हुआ. जैसे किसान नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने फायरिंग की जिसमें एक नौजवान की मौत हो गई. अब नौजवान की मौत हुई ये तो सही है, लेकिन पुलिस का दावा है कि उन्होंने गोली नहीं चलाई. किसान नेता कहते हैं कि कम से कम 14 किसान घायल हैं. पुलिस का दावा है कि उसके 12 जवान अस्पताल में हैं. एक जगह पर किसान आंदोलन में शामिल लोगों का दावा है कि जख्मी लोगों के शरीर से पैलेट्स निकले. पुलिस का कहना है कि उसकी तरफ से पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया गया. इन सब दावों और जवाबी दावों का मतलब है कि पुलिस और किसान नेता दोनों public perception को ठीक रखना चाहते हैं, जनता की सहानुभूति अपने साथ चाहते हैं. जितने वीडियो मीडिया को भेजे जा रहे हैं, सबकी हकीकत तुरंत जांच कर पाना संभव नहीं है. इसमें वक्त लगता है. जैसे एक वीडियो आज मैंने देखा जिसमें पुलिस ट्रैक्टर्स के टायरों की हवा निकाल रही है, टंकियां खोलकर डीजल सड़क पर बहा रही है ताकि ये ट्रैक्टर आगे न बढ़ सकें. पर ये कहना मुश्किल है कि ये वीडियो कहां का है, कब का है? राजनीतिक दल भी अपने अपने हिसाब से बयान दे रहे हैं. अकाली नेता सुखबीर सिंह बादल ने भगवंत मान को निशाना बनाया, तो मान ने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया. इस भ्रम की वजह से गतिरोध बना हुआ है और सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों का हो रहा है जिनकी आजकल बोर्ड के इम्तहान हैं. गुरुवार को जब एक किसान नेता ने ये कहा कि ये तकरार और ये टकराव इलेक्शन तक चलेगा, तो चिंता हुई, क्योंकि इस आंदोलन की वजह से इन इलाक़ों में काम करने वाले हजारों व्यापारियों का हर रोज करोड़ों का नुकसान हो रहा है.

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FARMERS AGITATION : END THIS STALEMATE SOON

akbFarmer leaders on Thursday gave clear indications that their agitation will be a long drawn one. On Friday, they observed ‘Black Day’ after a farmer, Subhkaran Singh, died of wounds. Punjab government has announced Rs 1 crore compensation and a government job for his family. The farmers will take out “tractor march” on highways on Monday (Feb 26) and a Mahapanchayat will be held at Delhi’s Ramlila Maidan on March 14. The farmers are demanding a law to guarantee minimum support price for their crops. Cracks have appeared in the unity among farmer outfits, when Rakesh Tikait-led Samyukta Kisan Morcha leaders said, though they supported the Punjab farmers’ agitation, they will not take part in the stir. The Punjab farmers’ agitation is being spearheaded by Samyukta Kisan Morcha (Non-Political) and Kisan Mazdoor Morcha (KMM). These organisations have refused to resume talks with the Centre alleging that the government was resorting to atrocities on protesters. The stand-off is on at Shambhu and Kanauri border points of Haryana-Punjab, where thousands of farmers are camping as part of the ‘Delhi Chalo’ call. Videos of clashes between security forces and protesters on Wednesday at Khanauri clearly show that the police were not armed with guns or pistols. They were trying to stop the protesters by using ‘lathis’ (sticks), while the protesters were pelting stones. These videos clearly belie the claims being made by farmer leaders that the protesters were trying to move forward peacefully. In one of the videos, protesters were seen setting fire to paddy stubble (parali), dousing it with water and then throwing chilli powder on the smoke, resulting in policemen rushing for cover to protect their eyes. In the melee, protesters attacked the police force, resulting in serious injuries to 12 policemen. Police officials alleged that some anti-social elements have joined the protesters and the attack on police was pre-planned. A forensic team on Thursday collected remains of burnt paddy stubble from the spot to check whether chilli powder was mixed. Union Agriculture Minister Arjun Munda has appealed to farmers to exercise restraint and come forward for talks to iron out all differences. On the other hand, farmer leaders have refused to join talks. They have alleged that the atmosphere is not right for holding talks. Meanwhile, reporters are having a difficult time to find out what it is going on in the minds of farmer leaders. Reporters are being barred from entering the area where the farmer leaders are camping. In several instances, reporters have been assaulted. Both the police and protesters have come up with separate videos and it has become difficult for reporters to ascertain the truth. Farmer leaders claim that at least 14 farmers have been injured, while police officials say, 12 policemen have been admitted to hospital. In one place, some injured protesters showed pellet injuries on their bodies, but police officials insist that pellet guns have not been used. Such claims and counter-claims indicate that both the police and farmer leaders are trying to take care about public perception. In one of the videos that I watched, policemen were shown deflating tractor tyres and opening fuel tanks to throw away diesel on the road. Their aim was to stop the tractors from proceeding forward. It is difficult to ascertain the date, time and place of recording of this video. Political parties are making statements in public that suit them. While Shiromani Akali Dal leader Sukhbir Singh Badal is targeting Chief Minister Bhagwant Mann, the latter is holding the Centre responsible for the present impasse. The present stalemate is because of this all-pervading confusion. Students are the hardest hit, because they have to appear in board examinations. On Thursday, when one of the farmer leaders clearly said that this confrontation would continue till the elections, it was cause for worry for common people. The longer this agitation continues, it will cause crores of rupees worth loss to thousands of traders and businessmen.

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किसान आंदोलन : हल केवल बातचीत से ही निकलेगा

AKB30 हरियाणा-पंजाब सीमा पर बुधवार को किसान आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. अभी तक पंजाब-हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर तनाव था, लेकिन बुधवार को दाता सिंह खनौरी बॉर्डर पर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पुलिस पर पथराव हुआ, पराली में मिर्च का पाउडर डालकर आग लगा कर पुलिस की तरफ फेंका गया, गडांसों से हमला हुआ. इसमें 12 पुलिसवाले बुरी तरह घायल हो गए. किसानों का दावा है कि पुलिस ने उनके कैंप्स मे घुसकर फायरिंग की जिसमें एक नौजवान, भटिंडा के शुभकरण सिंह की मौत हो गई, कई लोग घायल हैं. पुलिस ने गोली चलाने के आरोप से इंकार किया. किसान नेता मांग कर रहे हैं कि शुभकरण के शरीर का पोस्टमॉर्टम एक मेडिकल बोर्ड से कराया जाय और उसके परिवार को फौरन मुआवज़ा दिया जाय. हिंसा के बाद किसान नेताओं ने दो दिन के लिए आंदोलन स्थगित कर दिया है. किसान नेताओं ने प्रदर्शनकारियों से कहा है कि वो टकराव के हालात पैदा न करें, जहां हैं, वहीं डटे रहें. अब दो दिन बाद किसान संगठनों के नेता अपनी नई रणनीति बताएंगे. किसान संगठनों की जिद के कारण पंजाब हरियाणा बॉर्डर और दिल्ली के चारों बॉर्डर्स पर टेंशन है. किसान नेता दिल्ली की तरफ बढ़ने पर अड़े हैं. हरियाणा की पुलिस उन्हें रोक रही है और पंजाब की पुलिस खामोशी से तमाशा देख रही है. पंजाब-हरियाणा बॉर्डर पर जंग जैसे हालात हैं. दोनों तरफ से तैयारी पूरी है. बॉर्डर पर दोनों तरफ भारी भरकम पोकलेन (Poclain) और JCB मशीनें खड़ी हैं. बॉर्डर की एक तरफ पुलिस के हजारों जवान हैं, दूसरी तरफ किसान संगठनों के हजारों प्रदर्शनकारी. एक तरफ पुलिस के हाथ में आंसू गैस के गोले छोड़ने वाली बंदूकें हैं और दूसरी तरफ आंसू गैस से बचने के लिए गैस मास्क, स्विमिंग ग्लासेज और लाठी डंडों से लैस किसान. सरकार कह रही है कि किसानों से हर मुद्दे पर बात करने को तैयार हैं लेकिन किसान नेता कोई जवाब नहीं दे रहे हैं. किसान आंदोलन के चक्कर में पंजाब और हरियाणा पुलिस भी आमने सामने हैं. हरियाणा पुलिस ने पंजाब पुलिस से कहा है कि पोकलेन, JCB मशीनें और मॉडीफाइड ट्रैक्टर्स को बॉर्डर तक पहुंचने से रोके. पंजाब पुलिस ने ऑर्डर तो जारी कर दिए लेकिन किसी को रोका नहीं. किसान आंदोलन की वजह से दो राज्यों की सरकारें परेशान हैं, आम लोगों को जबरदस्त दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं, रास्ते बंद हैं, इंटरनेट बंद हैं, बच्चों के माता पिता टेंशन में हैं लेकिन किसान नेता कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं. सवाल ये है कि आखिर किसान संगठन चाहते क्या हैं? सरकार से बातचीत के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? दिल्ली आकर किसान क्या हासिल करना चाहते हैं? बुधवार की रात को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया, दावा ये किया जा रहा है कि ये वीडियो खनौरी बॉर्डर पर हुई हिंसा का है. दावा किया गया है कि वीडियो में खनौरी बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच झड़प की तस्वीरें हैं. इसी दौरान एक नौजवान की मोत हुई. इस वीडियो में जिस तरह के हालात दिख रहे हैं, वो चिन्ता पैदा करने वाले हैं, फायरिंग की आवाज़ आ रही है, आंसू गैस के गोलों के फटने की आवाज़ सुनाई दे रही है, लोग इधर-उधर उधर भाग रहे हैं, चारों तरफ धुंआ ही धुंआ दिख रहा है. ये वीडियो सही है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है. वीडियो देखकर ये पता नहीं लगाया जा सकता कि फायरिंग कौन कर रहा है क्योंकि पुलिस ने दावा किया है कि उसकी तरफ से गोली नहीं चलाई गई. लेकिन किसान नेताओं ने पुलिस की बात को गलत बताया. सरवन सिंह पंढेर ने ऐरोप लगाया कि पुलिस ने गोली चलाई, गोली शुभकरण सिंह के सिर पर लगी और उसकी मौत हो गई. पंढेर ने आरोप लगाया कि शंभू बॉर्डर पर किसानों के बीच कुछ उपद्रवियों को शामिल कराया गया और ये आंदोलन को बदनाम करने की सरकारी कोशिश है. किसानों की अगुवाई कर रहे नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने कहा कि सरकार ने आज उनको फिर से बातचीत का प्रस्ताव तो दिया लेकिन सरकार की नीयत में खोट है, और वह किसानों को बातचीत में उलझाकर मामले को टालना चाहती है. असल में जो तस्वीरें शंभू बॉर्डर से आईं, उन्हें देखकर लगता है कि किसान संगठन बातचीत की मंशा से नहीं, पुलिस से जंग लड़ने की नीयत से आए थे और तैयारी भी उसी हिसाब से की गई थी. किसान नेताओं ने तीन दिन पहले सीज़फायर का एलान किया था और बुधवार को समझ में आया कि इन तीन दिनों में सरकार के साथ बातचीत भी हुई लेकिन इसके साथ साथ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के साथ टकराने की तैयारी भी कर ली. बड़ी बड़ी पोकलेन मशीनें बॉर्डर पर पहुंच गईं, ये मशीनें सौ सौ किलोमीटर दूर से लाई गईं हैं. शंभू बॉर्डर पर क़रीब 14 हज़ार प्रदर्शनकारी पहुंच चुके हैं. इनके पास बारह सौ से ज़्यादा ट्रैक्टर हैं, पोकलेन मशीनें हैं, जिसे मॉडिफाई किया गया है, मशीन में बख्तरबंद प्लेट्स लगाई गई थीं, इसके ड्राइवर को सुरक्षित रखने के लिए चारों तरफ़ से प्लेटिंग की गई है. पोक्लेन मशीन के ड्राइवर के केबिन को बुलेटप्रूफ बना दिया गया है. मशीन के टायर्स को शेलिंग से बचाने की व्यवस्था भी की गई है. पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़ने के लिए JCB मशीनें भी मंगा ली गई. इन मशीनों को लोहे की मोटी मोटी प्लेट्स लगाकर ज्यादा मजबूत बनाया गया है ताकि जब बैरीकेडिंग तोड़ने की नौबत आए, तो मशीनों को कोई नुक़सान न पहुंचे. JCB मशीनों के ड्राइवर की सीट के चारों तरफ़ मोटी मोटी मेटल प्लेट्स लगा दी गई है. मशीन के पहियों को सेफ़ बनाने के लिए भी प्लेट्स लगाई गई है. पंजाब के किसानों के आंदोलन की स्थिति बिलकुल साफ है – सरकार बातचीत से रास्ता निकालना चाहती है. किसान नेता अब बात करने के लिए तैयार नहीं हैं. पुलिस किसी भी तरह से ताक़त का इस्तेमाल नहीं करना चाहती, पर प्रदर्शनकारी पुलिस को बार बार ताकत का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. पुलिस पर हमला किया गया, वो जिस तरह से पोकलैन और जेसीबी लाए हैं, वो प्रोटेस्ट की नहीं, पुलिस को मात देने की तैयारी दिखाता है. ये लोग चाहते हैं कि पुलिस उत्तेजित हो, एक्शन लेने पर मजबूर हों और बात बिगड़ जाएं, ताकि वो सहानुभूति बटोर सकें. प्रोटेस्टर्स ने तय कर रखा है कि वे हरियाणा के बॉर्डर पर हालात नॉर्मल नहीं होने देंगे और सरकार के सामने ये स्टैंड रखा है कि बातचीत के लिए हालात नॉर्मल नहीं हैं. प्रदर्शनकारी किसान जानते हैं कि सरकार मजबूर है, वो न तो फोर्स का इस्तेमाल कर सकती है, न किसानों की खुलकर आलोचना कर सकती है, चुनाव सामने है. सरकार में बैठे लोग किसी तरह की जोखिम नहीं उठाना चाहते, जो लोग किसान नेताओं को गाइड कर रहे हैं, उनमें मोदी विरोधी मोर्चे के नेता भी है, वाम झुकाव वाले लोग भी हैं और इस सारी स्थिति का फायदा उठाने वाले यूट्यूबर भी हैं. सबको मोदी सरकार को परेशान करने का अच्छा मौका मिला है. वो उसे हाथ से नहीं देना चाहते. जब जब सरकार किसानों के साथ कोई पुल कायम करती है, तो परदे के पीछे बैठे ये लोग उस पुल को तोड़ देते हैं. बुधवार को जब सरकार ने बात करने के लिए कहा, तो यही लोग चिल्लाने लगे कि सरकार डर गई, झुक गई, अब और प्रेशर बनाओ. जब सरकार की तरफ से बातचीत का ऑफर नहीं आता, तो यही लोग कहते हैं कि ये सरकार बात तक करने के लिए तैयार नहीं हैं, दिल्ली कूच करो, बात करने का प्रेशर बनाओ. इसी वजह से इस बात की संभावनाएं कम हैं कि इस मसले का समाधान जल्दी निकलेगा. एक बात जरूर है कि पिछली बार किसान आंदोलन को जिस तरह से जनता की सहानुभूति मिली थी, वैसी सहानुभूति इस बार नहीं है. आम लोग इस बात का समर्थन तो करते हैं कि किसानों को अपनी बात कहने का, विरोध करने का अधिकार है लेकिन पोकलेन चलाने का, जेसीबी से बैरिकेडिंग गिराने का, ट्रैक्टर लाकर रास्ता बंद करने का कोई समर्थन नहीं करता. जहां बच्चों की परीक्षा हैं, वो परेशान हैं. इन इलाक़ों में जो दुकानदार हैं उनका कारोबार ठप है. दिल्ली एनसीआर के दफ्तरों में काम करने वालों को कई कई घंटे जाम में फंसना पड़ता है. इन सारी बातों का भी असर लोगों के मन पर होता है. लेकिन जो भी हो, किसानों की समस्याएं तो हैं और समाधान बातचीत से ही निकलेगा, मेज पर बैठकर निकलेगा. दोनों पक्षों को इसी दिशा में काम करना चाहिए. आज तक किसी भी समस्या का हल टकराव से नहीं निकला.

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FARMERS UNREST : NEGOTIATION IS THE ONLY WAY OUT

AKB30 The death on Wednesday of a young farmer Shubhkaran Singh, hailing from Punjab’s Bathinda district, during clashes between police and farmers at Khanauri on Haryana-Punjab border has fuelled tension. Protesters stoned police pickets and threw burning parali (crop stubble) at policemen, by mixing chilli powder. The protesters also attacked policemen with sickles, injuring 12 policemen. Farmers alleged that police fired bullets at them injuring several of them and Shubhkaran died of bullet wounds. Police rejected this charge as baseless. Farmers have demanded compensation and a government job for Shubhkaran’s sister, who is presently a student. After the clashes, farmer leaders on Wednesday night announced that their Delhi Chalo agitation will be halted for two days. Farmer leaders have demanded that Shubhkaran be declared a ‘martyr’ and a medical board should conduct post-mortem to find out the exact cause of his death. Already, there is growing tension on Punjab-Haryana and Haryana-Delhi border points, with the farmers bent on entering Delhi. Heavy duty Poclain machines and JCBs have been deployed by farmers and policemen on both sides of the border. Common people, including students and traders, are facing the brunt of the stand-off. Congress leader Rahul Gandhi posted a video of clashes at Khanauri depicting explosion of tear gas shells, sound of firing and people running for cover, with the entire area covered in smoke. The video is yet to be verified. Data Singh Khanauri border divides Jind (Haryana) and Sangrur (Punjab) districts. The atmosphere was peaceful on Wednesday, but in the afternoon, clashes began. Police alleged that protesters threw stones injuring several of them, but farmers alleged that central police force men entered Punjab border and fired at them. In Uttar Pradesh, Bharatiya Kisan Union farmers led by Rakesh Tikait staged protest in Shamli, Meerut, Greater Noida and Ghaziabad by taking out tractor march. All said, one must understand that the Centre wants to find a solution to the impasse through talks, but farmer leaders are not serious. Police does not want to use force on farmers, but the protesters are making things difficult by forcinhg the police to take strong measures. The manner in which Poclain and JCB machines were brought from Punjab clearly shows that the protesters had planned to overpower police and forcibly break the barriers. They wanted to provoke the police, force it to take action, so that their leaders can garner sympathy from the people. The protesters have ensured that they would not allow the situation to normalize on Haryana border and their leaders have clearly told the Centre that the situation is not normal for holding talks. Farmer leaders know that the government is caught in a bind. It can neither use force, nor criticize farmers openly, because parliamentary elections are due. Those sitting in the government do not want to take risks, and those guiding the farmer leaders are politicians belonging to anti-Modi front. Several of these politicians are Left-leaning. Some YouTubers are trying to take advantage of the situation and they are pillorying Modi government. They do not want the opportunity to go out of hand. Whenever the Centre and farmer leaders form a bridge during talks, those sitting at the back try to break that bridge. When the government appealed to farmer leaders to rejoin talks, these elements cried hoarse saying that the government has bowed before the farmers. They wanted more pressure to be brought on the government. When no offer for talks came from the government, the very same elements used to say that the Centre is not ready for talks, and farmers must march to Delhi now. There is little possibility of any solution emerging from this impasse. But, one thing is clear. This time, the farmer leaders are not getting the same measure of sympathy that they got two years ago from the common man. People of course do want that the farmers must be allowed to have their say, they have the right to protest, but bringing heavy-duty Poclain and JCB machines to break barriers set by the police, using tractors to block roads, cannot be supported by the common man. Already students are facing difficulties because they have to appear in exams, and business of traders has come to a standstill. Those working in Delhi NCR offices have to face huge traffic jams on highways. All such incidents do have some effect on the minds of people. The issues confronting the farmers can be ironed out only on the negotiation table. Both sides must work towards that end. No problem can be solved through confrontation.

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संदेशखाली में ज़ुल्म : ममता को जवाब देना पड़ेगा

akb पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार ने बुधवार को संदेशखाली इलाके का दौरा किया, जहां महिलाओं के यौन उत्पीड़न की खबरें आने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है. इंडिया टीवी के शो ‘आज की बात’ में मंगलवार की रात को हमने उन महिलाओं की बातें सुनाई, जो संदेशखाली में अपने ऊपर हुए जुल्म की दास्तां खुद बता रही हैं, तृणमूल कांग्रेस के नेता शाहजहां शेख और उसके गुंडों पर बलात्कार के आरोप लगा रही हैं. लेकिन ममता बनर्जी कहती हैं कि महिलाएं झूठ बोल रही हैं, बीजेपी के इशारे पर बंगाल को बदनाम कर रही हैं, लेकिन महिलाओं का कहना है कि ममता को सोचना चाहिए कि क्या कोई महिला किसी के राजनीतिक फायदे के लिए, थोड़े से पैसे के लालच में अपनी इज़्ज़त नीलाम कर सकती है? ममता कहती हैं कि पुलिस जांच कर रही है, आरोपियों को पकड़ा गया है, सच सामने आ जाएगा, लेकिन इन महिलाओं का कहना है कि बंगाल की जो पुलिस तृणमूल के भगोड़े नेता शाहजहां शेख के इशारे पर नाचती हो, जिस पुलिस के सामने महिलाओं के कपड़े उतारे गए हों, ममता की उस पुलिस से न्याय की उम्मीद क्या करें? अब तक तो संदेशखाली में महिलाओं पर हुए जुल्म के वीडिओ सामने आ रहे थे, संदेशखाली में पुलिस का पहरा था, किसी को वहां जाने की इजाज़त नहीं थी, इसलिए वीडिओ असली हैं या नकली, ये तय करना मुश्किल था. ममता भी वीडिओं को फर्जी बता रही थी, आरोप लगाने वाली महिलाओं को बाहरी बता रही थी. संदेशखाली में राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम पहुंची, SC, ST कमीशन की टीम पहुंची लेकिन ममता ने किसी की बात नहीं मानी. लेकिन मंगलवार को इंडिया टीवी की टीम संदेशखाली पहुंच गई, टीम ने संदेशखाली की महिलाओं से बात की तो हक़ीक़त सामने आ गई. ये सही है कि संदेशखाली के रौंगटे खड़े वाले खुलासों और शाहजहां शेख के जुल्म की दास्तां बाहर आने के बाद इस पर सियासत खूब हो रही है, बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के नेता एक दूसरे पर इल्जाम लगा रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच उन महिलाओं की आवाज़ दब रही है, जो जान की बाज़ी लगाकर, हिम्मत जुटा कर समाज के सामने आई हैं, न्याय की गुहार लगा रही हैं, सरकार से, नेताओं से, प्रशासन से और समाज से सम्मान की रक्षा की भीख मांग रही हैं, जुल्म ज्यादती से निजात दिलाने की गुहार लगा रही हैं. मंगलवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन को मजबूरन संदेशखाली से दफा 144 हटानी पड़ी, इसके बाद जैसे ही इंडिया टीवी की टीम वहां पहुंची, तो कुछ महिलाएं सामने आईं. उन्होंने बताया कि संदेशखाली में हर परिवार जुल्म का शिकार है, शाहजहां के गुंडे रोज़ लड़कियों को घर से उठाकर ले जाते हैं, कोई विरोध करे तो परिवार वालों को पीटा जाता है, रात भर लड़की को रखने के बाद सुबह उसे छोड़ दिया जाता है. महिलाओं ने कहा कि ये सिलसिला सालों से चल रहा है, संदेशखाली के लोग शाहजहां के इन जुल्मों को नियति मान चुके थे. महिलाओं ने कहा कि जब लगने लगा कि जिल्लत की जिंदगी जीने से अच्छा मर जाना है, तो हिम्मत करके शाहजहां के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन बंगाल की सरकार का जो रूख है, उससे नहीं लगता कि न्याय मिलेगा. जिन महिलाओं ने इंडिया टीवी से बात की, उनमें से कई ने अपना चेहरा नहीं छुपाया था लेकिन उन्होंने जिस तरह से सरकार, पुलिस और तृणमूल कांग्रेस के नेता शाहजहां के खिलाफ अपना दर्द बयां किया. इससे उनकी जान को खतरा हो सकता है, इसलिए हमने उनके चेहरे छुपाए हैं, ब्लर किए हैं. महिलाएं कह रही थी कि संदेशखाली में शाहजहां के लोग सरकारी योजनाओं का पैसा देने के लिए बुलाकर बलात्कार करते है, शहजहां के दो गुर्गों, उत्तम सरदार और शिबू हाजरा के नाम भी ये महिलाएं ले रही थी. संदेशखाली कोलकाता से सिर्फ 75 किलोमीटर दूर है. उत्तरी चौबीस परगना जिले के बशीरहाट अनुमंडल में दो ब्लाक हैं, संदेशखाली -1 और संदेशखाली -2. संदेशखाली-2 कालिंदी नदी के इस पार है और संदेशखाली -1 नदी के दूसरी तरफ. संदेशखाली-1 ब्लॉक एक तरह का द्वीप है. यहां पहुंचने के लिए नदी पार करनी पड़ती है, नाव से जाना पड़ता है. शाहजहां शेख संदेशखाली -2 ब्लाक में रहता तो है लेकिन नदी के उस पार संदेशखाली -1 ब्लॉक में उसके दो गुंडे, उत्तम सरदार और शिवप्रसाद हाजरा उर्फ शिबू हाजरा शाहजहां का कारोबार देखते हैं. ये दोनों संदेशखाली -1 के लोगों पर जुल्म करते हैं, महिलाओं का बलात्कार करते हैं, शाहजहां शेख के पास लड़कियों को भेजते हैं. जब मामला विधानसभा में उठा, बीजेपी के नेता संदेशखाली जाने की जिद करने लगे, दिल्ली से तमाम टीमें पहुंच गईं, तब जाकर पुलिस ने जमीन पर कब्जे की कुछ शिकायतों पर एक्शन लिया और उत्तम सरदार और शिबू हाजरा समेत कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन संदेशखाली की महिलाओं का कहना है कि जब तक शाहजहां शेख को नहीं पकड़ा जाएगा, तब तक आतंक का राज कायम रहेगा. संदेशखाली के लोग आज इसलिए खुलकर बोल रहे हैं क्योंकि हाई कोर्ट ने सख्त रूख अपनाया है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने संदेशखाली में लगी धारा 144 हटा दी, बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी और शंकर घोष को संदेशखाली जाने की इजाजत दे दी, सरकार ने उन्हें फिर रोकने की कोशिश की तो वो धरने पर बैठ गए. ममता बनर्जी की सरकार ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील की लेकिन जब वहां भी बात नहीं बनी तो मजबूरी में शुभेन्दु अधिकारी को संदेशखाली जाने की इजाजत दी गई. शुभेंदु अधिकारी जैसे ही संदेशखाली पहुंचे वहां की जनता ने उनका स्वागत किया, शुभेंदु पर फूलों की बारिश की गई, संदेशखाली की महिलाओं ने उन पर फूल बरसाए. शुभेंदु अधिकारी ने पूरे संदेशखाली में घूम-घूमकर वहां के लोगों से, महिलाओं से बात की. सीपीआई-एम नेता वृंदा करात भी संदेशखाली पहुंची, उन्होने महिलाओं से मुलाकात की, उन पर जो जुल्म हुए, उसकी दास्तां सुनीं. वृंदा करात ने कहा कि हैरानी की बात तो ये है कि इन लोगों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था लेकिन उसी पार्टी के लोग इन पर जुल्म कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने कहा कि शुभेंदु अधिकारी वहां पर फिल्म की शूटिंग करने गए थे, वृंदा करात फैशन परेड के लिए पहुंची थीं, दोनों को मकसद सिर्फ सीन क्रिएट करना था. कुषाल घोष की ये बात मान भी ली जाए कि बीजेपी, लैफ्ट और कांग्रेस के नेता राजनीतिक मकसद से संदेशखाली पहुंचे. लेकिन कुणाल घोष को ये भी बताना चाहिए कि क्या उनकी पार्टी का नेता शाहजहां शेख संदेशखाली में समाजसेवा कर रहा है? क्या संदेशखाली की महिलाएं झूठ बोल रही हैं? बेहतर तो ये होता कि जैसे ही महिलाओं के वीडियो सामने आए, ममता उसी वक्त खुद संदेशखाली जातीं, महिलाओं की बात सुनती और जुल्म करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करतीं, तो शायद ये मामला इतना बड़ा न होता और न बीजेपी को इस पर राजनीति करने का मौका मिलता.

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SANDESHKHALI ATROCITIES : MAMATA MUST REPLY

akb The Director General of West Bengal Police Rajiv Kumar, on Wednesday, visited Sandeshkhali in North 24-Pargana district, days after a political furore broke out over allegations of sexual abuse of women by local Trinamool Congress goons. This was his first visit since protests by BJP and Congress leaders against atrocities on women in the area with the Calcutta High Court rapping the Mamata Banerjee government about the whereabouts of local TMC strongman Sheikh Shahjahan, who has gone underground. In my prime time show ‘Aaj Ki Baat’ on Tuesday night, we showed the rape victims narrating the horrific ordeals that had to go through. The statements of these victims rubbish the claims being made by Chief Minister Mamata Banerjee that the entire matter is “stage managed” by the opposition. Mamata Banerjee had alleged that the women are “lying” and “are bringing Bengal a bad name at the behest of BJP”. On the other hand, these women are saying, Mamata must think why women will put their honour at stake by making false rape allegations for political ends. Mamata says, police is already investigating, the accused have been arrested and the truth will come out, but these women are questioning how they can expect justice from the state police, which was present when they were being disrobed and assaulted. Till now, people were watching videos of atrocities on women, the entire Sandeshkhali area was cordoned off by police, and it was difficult to establish whether the videos were real or fake. Even Mamata was alleging that the videos were fake, and the women who were levelling allegations were “outsiders”. Even the National Commission for Women and National SC/ST Commission members visited the area, but Mamata stood by her allegations. On Tuesday, India TV team reached Sandeshkhali and spoke to several women, who admitted on camera, that they, alongwith other women, were subjected to sexual abuse by Trinamool Congress goons. The women alleged on camera that TMC goons used to forcibly take away girls and women from their homes every night and subject them to sexual abuse. They said, this was going on for the last several years. The women did not cover their faces when they spoke to India TV, but since their lives are at risk both from local politicians and policemen, we blurred their faces so that they cannot be recognized. The women named two top goons of Shahjahan – Shibu Hajra and Uttam Sardar, as the main masterminds behind the sexual atrocities. Most of the women demanded Central intervention in Sandeshkhali. They alleged that policemen “were laughing when we were being forcibly disrobed…they asked our husbands to remain at home and forcibly took us away for the whole night….This reign of terror was there for the last several years, but the local villagers did not support us”. Now Mamata cannot allege that these videos are fabricated or given by BJP, nor can she say that the women were forced to make such allegations. The women were narrating the ordeals that they went through. They are demanding that Sheikh Shahjahan and his goons must be put behind bars immediately and the reign of terror must end. On Tuesday, BJP leader of opposition Suvendu Adhikari and CPI-M leader Brinda Karat visited Sandeshkhali separately and met the victims. TMC leader Kunal Ghosh said, “While Suvendu had gone there for film shooting, Brinda Karat had gone there for a fashion parade. Their only aim was to create a scene.” Even if we agree with Kunal Ghosh that BJP, Left and Congress leaders are visiting Sandeshkhali to score political brownie points, he must explain whether his own party leader Shahjahan Sheikh was doing social service in that area? Are the women of Sandeshkhali telling lies? It would have been better if Mamata Banerjee had personally visited Sandeshkhali, after the videos of these women surfaced. It would have been wiser if Mamata had listened to the victims and taken stringent action against the criminals. Had she done so, this issue would not have blown out of proportions and BJP could not have got the chance to politicize the issue.

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कांग्रेस का संकट : बड़े नेता पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं ?

AKB30 सियासत के मैदान में एक बार फिर राम का नाम आया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस नहीं चाहती थी राम मंदिर बने लेकिन मंदिर बनकर तैयार है, लाखों भक्त रोज रामलला के दर्शन कर रहे हैं, अब हालात ये है कि राम के अस्तित्व को नकारने वाले भी राम राम जप रहे हैं लेकिन राहुल गांधी ने राम मंदिर के बारे में बिल्कुल दूसरी तरह की बात की. राहुल ने कहा कि गरीब, दलित, आदिवासी, पिछड़े, हर जगह जय श्रीराम, जय श्रीराम चिल्लाते रहते हैं, क्या नारा लगाने से रोजगार मिलेगा? क्या नारा लगाने से रोटी मिलेगी? राहुल ने कहा कि लोगों ने अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा का समारोह देखा था,वहां बड़े बड़े लोग थे, कोई गरीब नहीं था. मोदी के रामराज में गरीबों के लिए कोई जगह नहीं है. राहुल गांधी के इस बयान को बीजेपी ने बड़ा इश्यू बना दिया क्योंकि राहुल गांधी ने इसी तरह की बात इससे पहले कोरबा में भी कही थी. प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि कांग्रेस की इतनी दयनीय हालत इससे पहले कभी नहीं थी, अब सहयोगी दलों को तो छोड़िए कांग्रेस के अपने नेता भी पार्टी छोड़ छोड़कर जा रहे हैं. मोदी की इस बात पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मुहर लगा दी. खरगे ने महाराष्ट्र में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से कहा कि बड़ी मुसीबत है, क्या कहें, समझ में नहीं आता, पार्टी ने जिनको सबकुछ दिया, वो भी ऐन मौके पर धोखा दे रहे हैं, पार्टी छोड़ रहे हैं. इस पर अशोक चव्हाण ने बता दिया कि उन्होंने कांग्रेस क्यों छोड़ी. अशोक चव्हाण ने कहा कि वो कभी पार्टी की कृपा से राजनीति में आगे नहीं बढ़े, जनता ने उन्हें चुनकर भेजा, चव्हाण ने कहा कि दिक्कत ये है कि कांग्रेस ने जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता बचे नहीं हैं, जो बचे हैं, उनकी सुनने वाला कोई नहीं हैं, महाराष्ट्र के कई जिलों में कांग्रेस के चुनाव लड़ने वाले नेता नहीं हैं, टिकट मांगने वाला कोई नहीं हैं. उन्होंने पार्टी हाईकमान को ज़मीनी हालत बताई लेकिन उनकी सुनी नहीं गई, इसके बाद वो क्या करते. चव्हाण ने कहा कि अब ज्यादा वक्त नहीं हैं लेकिन फिर भी उनकी आलोचना करने के बजाय कांग्रेस के नेता पार्टी की हालत सुधारने पर फोकस करें, तो उनका भला हो सकता है. दिलचस्प बात ये है कि जो बात अशोक चव्हाण ने मुंबई में कही, वही बात दूसरे शब्दों में रेवाड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कही. मोदी ने कहा कि कांग्रेस इस वक्त सबसे बुरे दौर में हैं, कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, कांग्रेस के साथी दल भी उसे छोडकर भाग रहे , इसकी एक ही वजह है, कांग्रेस एक ही परिवार के चक्र में फंसी है, एक नॉन स्टार्टर के स्टार्टअप को लॉंच में करने में लगी है. ये बात किसी से छुपी नहीं है कि पिछले कुछ वक्त में कांग्रेस के तमाम बड़े बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए. जब से राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो पुराने जनाधार वाले नेता साइडलाइन हो गए. गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरिन्दर सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, किरण ऱेड्डी, जितिन प्रसाद, विजय बहुगुणा, अशोक चव्हाण, मिलिंद देवड़ा, राव इन्द्रजीत सिंह, हिमंत विश्व शर्मा, पेमा खांडू……बहुत लंबी लिस्ट है, सब कांग्रेस छोड़ गए. कांग्रेस ने सबको चुका हुआ, धोखेबाज नेता बताया, लेकिन जिसने भी कांग्रेस छोड़ी उनमें से ज्यादातर ने राहुल गांधी की कार्यशैली को नाराजगी की वजह बताया. इसलिए अब कांग्रेस के नेताओं को इस बात पर आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या इसके लिए मोदी जिम्मेदार हैं. लेकिन अशोक चव्हाण की ये बात सही है कि कांग्रेस के नेताओं को फिलहाल आत्म मंथन के लिए फुर्सत नहीं हैं क्योंकि उनका फोकस सिर्फ राहुल गांधी की यात्रा पर है भले ही इस यात्रा के चक्कर में सीट शेयरिंग में देर हो जिसके कारण सहयोगी भी कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं. अब ज्यादातर राज्यों में तो एंटी- मोदी मोर्चा बिखर गया है. अब ले देकर सिर्फ बिहार में RJD ही कांग्रेस के साथ बची है.

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CONGRESS CONUNDRUM : WHY ARE SENIOR LEADERS QUITTING?

AKB30 The Ram temple issue figured in the speeches of Prime Minister Narendra Modi and Congress leader Rahul Gandhi on Friday with both leaders taking potshots at each other. In his rally at Rewari, Haryana, Prime Minister Modi said, Congress leaders who used to describe Lord Ram as ‘imaginary’ are now chanting ‘Jai Siya Ram’, while in Chandauli, UP, Rahul Gandhi alleged that only billionaries and celebrities were invited to the Ram Temple consecration event in Ayodhya, and the poor people were kept out. Modi said, Congress is now in such a sorry state that not only alliance partners, but even their own leaders are deserting the party. Congress President Mallikarjun Kharge, during a video conferencing with Maharashtra party leaders, remarked on Friday that he was wondering why senior leaders whom the party had given so much, are now deserting the party. He was referring to former CM Ashok Chavan, who left Congress, joined BJP and got the ticket for Rajya Sabha. Replying to Kharge, Ashok Chavan said, it was the people who elected him and not the party leadership. Chavan said, most of the grassroot level workers have deserted the Congress, and in several districts of Maharashtra, they are unable to find even ticket seekers for the elections. Chavan claimed that he conveyed this to the Congress leadership but his views were not heard. What Ashok Chavan said is almost similar to what Narendra Modi said in his Rewari rally. Modi said, “Congress is caught in a one-family trap, and is only busy launching its non-starter startup (Rahul Gandhi).” The ground reality is: after Rahul Gandhi took over the reins of the party, old leaders having mass base have left the Congress. These include Ghulam Nabi Azad, Capt Amarinder Singh, Jyotiraditya Scindia, Kiran Reddy, Jitin Prasada, Vijay Bahuguna, Ashok Chavan, Milind Deora, Rao Inderjit Singh, Rao Birender Singh, Himanta Biswa Sarma, Pema Khandu…the list is too long. The Congress described these leaders as spent cartridges and betrayers. The fact is, most of these leaders have described Rahul Gandhi’s whimsical style of working as the main reason for quitting the party. Congress should introspect whether Modi is responsible for the desertions by senior leaders. Ashok Chavan is right when he says that the party leadership has no time for introspection and it is solely focused on Rahul Gandhi’s ‘Bharat Jodo Nyay Yatra’. It is because of this Yatra, that the party leadership is delaying seat-sharing talks with other partners, and its own party men are quitting. The anti-Modi front, for all practical purposes, is now over. Only in Bihar, the RJD is with the Congress. On Friday, Tejashwi Yadav joined Rahul Gandhi’s Yatra. RJD supremo Lalu Yadav is ailing. There was a time when thousands of people used to gather in Bihar to watch Lalu speak. Lalu knew how to feel the pulse of the people, but his health is deserting him. Watching Lalu speak in a soft voice makes one said. Lalu is no more active in politics, and this is Tejashwi Yadav’s biggest challenge. Congress may somewhat gain from RJD in Bihar, but there is little chance of the RJD gaining from this alliance.

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किसान आंदोलन : क्या इसके पीछे सियासी मक़सद है ?

rajat-sir हरियाणा-पंजाब सीमा पर कई हज़ार किसान तकरीबन एक हज़ार ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर दो दिन से डेरा डाले हुए हैं. वे सभी दिल्ली जाना चाहते हैं. मंगलवार को पुलिस ने उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े, रबड़ गोलियां चलाई और पानी की बौछारें डाली. किसानों ने ट्रैक्टर लेकर बैरीकेड तोड़ने की कोशिश की. झड़प में दोनों तरफ से दर्जनों घायल हुए. दिल्ली के चारों बॉर्डर सील हो चुके हैं. पंजाब-हरियाणा के बॉर्डर पर जबरदस्त टेंशन है. शंभू बॉर्डर पर किसानों ने पथराव किया जिसके कारण करीब दो दर्जन लोग घायल हुए. पुलिस की तरफ से भी आंसू गैल के गोले छोड़े गए. शंभू बॉर्डर पर दो हजार से ज्यादा जवान तैनात हैं. पुलिस के साथ साथ पैरामिलिट्री फोर्सेज को भी तैनात किया गया है. हालांकि सरकार ने किसान नेताओं से दो दौर की बात की है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. किसान संगठन चाहते हैं कि सरकार तुंरत MSP गांरटी कानून लागू करे, किसान मजदूरों को पेंशन दी जाए, किसानों का सारा कर्ज तुंरत माफ किया जाए और सरकार विश्व व्यापार संगठन से बाहर आ जाय, पिछली बार आंदोलन के दौरान जिन किसानों के खिलाफ केस दर्ज हुए वो सब वापस लिए जाएं. इस तरह की करीब बारह मांगे हैं. सरकार ने किसानों की कुछ मांगे मान लीं, बाकी मांगों पर विचार के लिए कुछ वक्त मांगा लेकिन किसान वक्त देने को तैयार नहीं हैं. किसान किसी भी कीमत पर दिल्ली को घेरने पर आमादा हैं लेकिन सरकार ये नहीं होने देना चाहती. बस यही तकरार है. पंजाब हरिय़ाणा हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि किसानों के साथ सख्ती आखिरी विकल्प होना चाहिए और किसानों से कहा कि उन्हें सरकार के साथ बातचीत करके कोई रास्ता निकालना चाहिए. हालांकि किसान कह रहे हैं कि उनका आंदोलन शान्तिपूर्ण है, लेकिन सड़कों पर जो हो रहा है, वो हिंसा है. अब सवाल ये है कि किसानों को कौन भड़का रहा है? क्या किसान आंदोलन के पीछे सियासत है? ये सवाल इसलिए पूछे जा रहे हैं क्योंकि मंगलवार को जैसे ही किसानों ने उग्र रूप दिखाया, उसके तुंरत बाद राहुल गांधी, अखिलेश यादव, भूपेन्द्र हुड्डा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, बृंदा करात से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक, सबने किसानों के कंधे पर बंदूक ऱखकर सरकार पर निशाना साधा. हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि किसानों के पास डेढ़ हजार से ज्यादा ट्रैक्टर हैं जिनमें कम से कम आठ महीनों का राशन पानी हैं, टेंट्स है, रजाई, गद्दे हैं. किसान बात करके, आंदोलन करके, वापस जाने के मूड में नहीं हैं. अगर प्रदर्शनकारी दिल्ली तक पहुंच गए तो फिर वैसे ही महीनों तक जमे रहेंगे जैसे पिछली बार रास्ता बंद करके उन्होंने दिल्ली के बॉर्डर बंद कर दिए थे. इसीलिए सरकार की कोशिश है कि प्रदर्शनकारियों को दिल्ली पहुंचने से रोका जाए. इसीलिए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और अर्जुन मुंडा ने चंड़ीगढ़ जाकर किसान नेताओं से बात की. सरकार ने भी तैयारी पूरी की है. अगर किसी तरह किसान हरियाणा से होते हुए दिल्ली के आसपास पहुंच भी गए तो दिल्ली में न घुस पाएं इसके लिए भी इंतजाम किए गए हैं. दिल्ली के टीकरी बॉर्डर, सिंघू बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर को सील किया गया है. पिछली बार किसान आंदोलन के दौरान भारत किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने गाज़ीपुर बॉर्डर पर ही खूंटा गाड़ा था, इसलिए इस पर पुलिस किसी तरह के चांस नहीं लेना चाहती. यूपी के किसान नेता राकेश टिकैत तो थोड़ा संयम दिखा रहे हैं लेकिन उनके बड़े भाई भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा कि सरकार ने अगर किसानों के साथ सख्ती की, तो हालात और ज्यादा बिगड़ेंगे, सरकार को वो वादे पूरे करने ही होंगे जो पिछले आंदोलन के वक्त किए गए थे. राकेश टिकैत तो किसान नेता हैं, इसलिए उनका बोलना बनता है लेकिन अचानक कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और लैफ्ट के नेता सक्रिय हुए. कांग्रेस नेता रांहुल गांधी से लेकर भूपेन्द्र हुड्डा, दीपेन्द्र हुड्डा, रणदीप सिंह सुरजेवाला और पवन खेड़ा तक सारे नेता बोलने लगे. राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा कि किसान भाइयों आज एतिहासिक दिन है, किसान अन्नदाता है, आप दिल्ली आ रहे हो, हम आपके साथ हैं. राहुल गांधी ने लिखा कि कांग्रेस की पहली गारंटी है किसानों को उनका हक देना, कांग्रेस किसानों को MSP की गरांटी देगी, चूंकि राहुल की न्याय यात्रा आजकल छत्तीसगढ़ में है इसलिए अंबिकापुर में राहुल गांधी ने कहा मोदी सरकार किसानों के साथ अन्याय कर रही है, कांग्रेस ही किसानों के साथ न्याय कर सकती है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि चुनाव जीतने के लिए मोदी ने किसानों से बढ़-चढ़कर वादे किए थे, लेकिन वादे पूरे नहीं हुए तो नतीजा भी मोदी को भुगतना पड़़ेगा. किसानों के आंदोलन से लैफ्ट के नेता भी खुश हैं. सीपीएम नेता बृंदा करात ने कहा कि शंभू बॉर्डर पर जो हुआ वो सिर्फ ट्रेलर था, असली पिक्चर तो 16 फरवरी के बाद दिखेगी. हैदराबाद में बैठे AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि किसान आंदोलन मोदी सरकार की नाकामी का नतीजा है, सरकार किसानों के साथ ऐसा सलूक कर रही है मानों वो किसी दूसरे देश के घुसपैठिए हों. सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि किसान अपनी मांगों में नए-नए मुद्दों जोड़ते जा रहे हैं, फिर भी सरकार सभी मसलों पर बात करने को तैयार है, इसलिए किसानों को भी शांति से काम लेना चाहिए. इस पूरे मामले में एक तीसरा पक्ष भी है जिनकी बात कहीं सुनाई नहीं दे रही. ये पक्ष है, आम लोगों का. किसान आंदोलन की वजह से लाखों लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के व्यापारी बहुत परेशान हैं. आंदोलन की वजह से रास्ते बंद हैं, इंटरनेट पर पाबंदी लगी है, कारोबार ठप हो रहा है. किसानों अपनी मांग उठाएं, विरोध करें, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन इसके पीछे मंशा क्या है, ये देखने की जरूरत है. क्या मंशा वाकई में किसानों की भलाई के लिए है? गरीब किसान को फायदा पहुंचाने के लिए है? या इस आंदोलन का मकसद चुनाव से पहले मोदी सरकार को बदनाम करना है? पिछली बार भी किसान नेताओं ने चुनाव से पहले दिल्ली में धरना दिया था, कई महीनों तक माहौल बनाया था, लेकिन उसका जनता के दिलोदिमाग पर कोई असर नहीं हुआ. उनकी अपेक्षाओं के बावजूद मोदी ने चुनाव जीता. इस बार जो लोग आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं, उनमें ज्यादातर लोग सियासी मसकद से आए हैं. पिछले दो दिन से सरकार के तीन मंत्री लगातार उनसे बात कर रहे हैं लेकिन किसान नेता रोज नई मांग रख देते हैं और ऐसी मांगें रख रहे हैं जो बातचीत की मेज पर बैठकर तुरंत नहीं मानी जा सकती. किसान कह रहे हैं कि सरकार WTO एग्रीमेंट से बाहर आ जाए. अब क्या इस मांग को चंड़ीगढ़ में बैठे मंत्री पूरा कर सकते हैं? किसान नेता कहते हैं कि पूरे देश के किसानों का कर्ज तुंरत माफ किया जाए. क्या इस मांग को पूरा करने का भरोसा मंत्री तुंरत दे सकते हैं? .इसीलिए ऐसा लग रहा है कि किसान नेता दिल्ली को घेरने का मन बनाकर और तैयारी करके ही निकले हैं और ये आज प्रोटेस्ट के वक्त दिखाई भी दिया. इस बार ज्यादातर किसान नेता पंजाब के हैं और ये सुनने में आया है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार इनको पूरी तरह हवा दे रही है.

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FARMERS’ PROTEST : IS IT POLITICALLY MOTIVATED?

akb Several thousand farmers from Punjab, with nearly 800 tractor-trolleys are camping near multiple layers of barricades set up by police on the Haryana-Punjab border at Shambhu and Kanauri points since Tuesday. Police fired tear gas shells, rubber bullets and water cannons to disperse farmers trying to break through the barriers. More than 12 farmers and 24 policemen including the DSP of Ambala were injured in the clashes that took place. Internet services have been shut down in 15 districts of Haryana and Rajasthan. Singhu and Tikri points on Delhi-Haryana and Ghazipur on Delhi-UP border have been heavily barricaded. The agitating farmers, who have given a ‘Delhi Chalo’ call, have come fully prepared to engage in a long drawn confrontation with the Centre. The farmer leaders are insisting on the Centre providing legal guarantee for procurement of all crops at minimum support prices. Samyukta Kisan Morcha (Non-Political) and Kisan Mazdoor Morcha are leading this agitation. Two marathon rounds of talks between three ministers from the Centre with the farmer leaders in Chandigarh have failed, though the government has accepted most of their demands. While opposition leaders are busy politicizing the issue, lakhs of traders in Delhi, Haryana and Punjab are facing serious problems because of the roadblocks. Their business has been badly affected due to closure of mobile internet, bulk SMS and dongle services. Farmers have the right to protest, but one must see the motive behind this agitation. Questions must be asked whether this agitation is really meant for the betterment of farmers, particularly the poor peasants, or whether the main objective is to tarnish the image of Modi government. Several years ago, farmers had staged similar protests on Delhi-Haryana and Delhi-UP border, but it had little impact on the minds of common people. Despite these protests, Modi won elections, and this time too, those leading the agitation have come with political motive. Three ministers from Modi government have been engaged in several rounds of talks with farmer leaders for the last two days, but the farmer leaders are coming out with fresh demands every time. They are placing demands that cannot be accepted on the table. One of the demands is for India to come out of the World Trade Organization and from free trade agreements. How can three central ministers sitting at a table in talks with the farmers accept such a demand? Farmer leaders are demanding complete loan waiver scheme to free all farm households from indebtedness. Can the ministers promise to implement this without taking all stakeholders into confidence? It seems the farmer leaders have come with the sole aim to encircle the national capital borders by staging a sit-in for a longer period. They have come with six months’ ration for staging their sit-in. Most of the leaders are from Punjab, and there are reports that the Aam Aadmi Party government in Punjab is indirectly helping them.

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नौसेना के पूर्व अफसरों की रिहाई : मोदी को बधाई

AKB30 सोमवार को एक अच्छी खबर आई. क़तर में जासूसी के आरोप में उम्र कैद की सज़ा काट रहे भारतीय नौसेना के 8 पूर्व अधिकारी अपने वतन लौट आए. इनमें से सात लोग सोमवार सुबह भारत लौटे, जबकि कमांडर पूर्णेंदु तिवारी, जो कि रिहा हो चुके हैं, अबी कुछ कानून ओपचारिकताएं पूरी करने के लिए क़तर में रुके हुए हैं. दिल्ली में एयरपोर्ट से बाहर निकलने के बाद नौसेना के इन पूर्व अफसरों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए. दरअसल इन लोगों को यकीन ही नहीं था कि वो कभी अपने घर वापस लौट पाएंगे. ये सभी पूर्व कतर की नौसेना को ट्रेनिंग देने वाली एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे लेकिन जासूसी के इल्जाम में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था और मौत की सज़ा सुना दी गई थी. हालांकि भारत सरकार के दखल के बाद उनकी सज़ा को उम्र कैद में तब्दील कर दी गई थी लेकिन इसके बाद भी सरकार ने इनकी रिहाई के लिए कोशिशें जारी रखीं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद कतर के अमीर से बात की. इसके बाद क़तर सरकार सात भारतीयों को वापस भेजने पर तैयार हो गई. सोमवार को जब ये लोग दिल्ली एयरपोर्ट से बाहर आए तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया. सबने एक ही बात कही कि अगर प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले में हस्तक्षेप न किया होता, व्यक्तिगत दिलचस्पी न ली होती, तो उनकी रिहाई संभव नहीं थी. नौसेना के पूर्व अधिकारियों पर जिस तरह के आरोप थे, जिस तरह के सबूतों के आधार उन्हें सज़ा-ए-मौत दी गई थी, उसे देखते हुए उनकी सज़ा माफ करवाना, उन्हें रिहा करवाकर भारत वापस लाना बहुत बड़ी बात है. ये काम नरेंद्र मोदी के अलावा कोई नहीं कर सकता था. मोदी के क़तर के अमीर से बनाए गए निजी संबंध काम आए. पिछले कुछ सालों में दुनिया में भारत की जो साख बढ़ी है उसका असर भी इस फैसले पर दिखाई दिया. अब मोदी इस दोस्ताना कदम के लिए शुक्रिया अदा करने खुद क़तर जाएंगे. मोदी 14 फरवरी को अबु धाबी में बने BAPS मंदिर का उद्घाटन करेंगे. इसके बाद अगले दिन कतर का दौरा करेंगे और क़तर के अमीर से मिलेंगे. ये उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो पिछले कई दिन से इस मसले पर नरेंद्र मोदी को चुनौती दे रहे थे और इस सवाल पर जनता की भावनाओं को भड़काने की कोशिश कर रहे थे.

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RELEASE OF EX-NAVY MEN IN QATAR: THREE CHEERS FOR MODI !

AKB30 The release of eight Indian Navy veterans from jail in Qatar is a big diplomatic success for India. All the eight former Navy men were sentenced to death by a Qatar court, but after the Indian government intervened, it was later commuted to imprisonment. On early Monday morning, seven out of the eight ex-Navy men arrived in India, while Commander Purnendu Tiwari is still in Qatar after release. His return was delayed because of some legal formalities which are to be completed. Foreign Secretary Vinay Kwatra thanked the Emir of Qatar Tamim bin Hamad al-Thani. Kwatra said that the Prime Minister Narendra Modi had personally supervised the developments in this case and he undertook initiative in securing the release of the veterans. The seven ex-Navy men who returned are Captains Navtej Gill and Saurabh Vashisht, Amit Nagpal, S K Gupta, V K Verma and Sugunakara Pakala and ex-sailor Ragesh. All of them were working for a now-defunct Qatar company Al Dahra Global and were facing espionage charges. They were arrested in August, 2022 and spent 18 months in jail. A court in Qatar handed them death sentence in October last year, while a higher court, two months later, upheld the conviction but reduced the death sentence to imprisonment. On their return to India, all the former Navy men said, their release would not have been possible without the personal intervention of Prime Minister Modi. Looking at the espionage charges against our former Navy men and the capital punishment given to them based on facts and evidence, it was a great success for India in ensuring that all of them returned safely. None else except Narendra Modi could have achieved this impossible objective. Modi’s personal relationship with the Emir of Qatar came in handy. India’s image across the world has risen several notches higher in the last several years. It is reflected in the release of our ex-Navy men. Modi will be visiting Qatar on Wednesday to thank the Emir for this humanitarian act. It is also a slap in the face of those who were challenging Modi’s standing in the Middle East after the Qatar court gave the death sentence. These naysayers were trying to incite the feelings of the people, but now they have been effectively silenced.

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