Rajat Sharma

My Opinion

किसानों को सियासी दलों का मोहरा बनने से बचना चाहिए

तोमर ने किसान नेताओं को समझाने की बहुत कोशिश की, वे न तो सुनने को तैयार थे, न समझने को। वे तीनों कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अड़े रहे। फिर ये मीटिंग पांच घंटे तक कैसे खिंच गई? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुछ किसान संगठनों के नेताओं ने मांग की कि हरियाणा और पंजाब में जिन किसानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं, वे वापस लिए जाएं। वहीं, कुछ किसान संगठनों ने आढ़तियों के खिलाफ चल रही ईडी की जांच को रोकने की मांग की।

AKB30 दिल्ली में शुक्रवार को केंद्र और किसान नेताओं के बीच 5 घंटे तक चली बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि किसान नेता कृषि कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अड़े रहे, जबकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उनसे इन कानूनों के एक-एक बिंदु पर चर्चा करने की बात कही थी।

यह मीटिंग तक शुरू होते ही खत्म हो गई जब केंद्र ने किसान नेताओं से उन प्रावधानों के बारे में पूछा जिनपर उन्हें आपत्ति थी। इसके जवाब में किसान नेताओं ने कहा कि वे कानून के प्रावधानों पर बात नहीं करेंगे और बल्कि उनकी मांग है कि तीनों कानूनों को रद्द किया जाए।

केंद्र सरकार के मंत्रियों ने किसान नेताओं से पूछा कि आपकी आशंका क्या है, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि सरकार ‘हां’ या ‘ना’ में बता दे कि वह कानून वापस ले रही है या नहीं। तोमर ने ये भी कहा कि अगर किसान नेताओं को कानून की बारीकियों पर बात नहीं करनी तो किसान सगंठन अपने एक्सपर्ट्स की कमेटी बना दें, इसके जरिए भी बात हो सकती है। लेकिन किसान संगठनों के नेताओं ने कहा कि न तो वे कोई कमेटी बनाएंगे, न ही सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से कोई बात करेंगे।

तोमर ने किसान नेताओं को समझाने की बहुत कोशिश की, वे न तो सुनने को तैयार थे, न समझने को। वे तीनों कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अड़े रहे। फिर ये मीटिंग पांच घंटे तक कैसे खिंच गई? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुछ किसान संगठनों के नेताओं ने मांग की कि हरियाणा और पंजाब में जिन किसानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं, वे वापस लिए जाएं। वहीं, कुछ किसान संगठनों ने आढ़तियों के खिलाफ चल रही ईडी की जांच को रोकने की मांग की।

किसानों ने साफ कह दिया कि वे सरकार से बात करने आए हैं और आगे भी आएंगे, लेकिन बात तभी बनेगी जब सरकार तीनों कृषि कानून वापस ले लेगी। अब अगले दौर की बातचीत 19 जनवरी को होगी और नरेंद्र सिंह तोमर को अभी भी उम्मीद है कि अगले राउंड में बात बन जाएगी। तोमर ने कहा कि सरकार को कड़ाके की ठंड में खुले में बैठे किसानों और उनके परिवारों की चिंता है।

नरेन्द्र सिंह तोमर बहुत पुराने नेता हैं, और बतौर किसान उनकी जड़ें मध्य प्रदेश के खेतिहर समुदाय से जुड़ी हुई हैं। वह अन्नदाता की मुश्किलें भी जानते हैं और किसानों के मुद्दे पर हो रही सियासत को भी समझते हैं। यही वजह है कि वह बार-बार काम बनने की उम्मीद जताते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि किसान संगठनों के कुछ नेता ये तय कर चुके हैं कि आंदोलन 26 जनवरी तक चले और इसके बाद ही कुछ रास्ता निकले। इसका अंदाजा भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की बात सुनकर हुआ जब उन्होंने कहा कि बात होती रहेगी और मीटिंग में भी आते रहेंगे, लेकिन सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़ेंगे और किसान गणतंत्र दिवस के मौके पर ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे।

किसान संगठन पूरी ताकत के साथ ट्रैक्टर रैली की तैयारी कर रहे हैं और इसमें हिस्सा लेने के लिए पंजाब और हरियाणा से सैकड़ों ट्रैक्टर दिल्ली की तरफ रवाना हो चुके हैं। 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च में हिस्सा लेने के लिए हरियाणा के फतेहाबाद-सिरसा से सैकड़ों की संख्या में ट्रैक्टरों का काफिला दिल्ली के लिए रवाना हुआ। सड़क पर चल रहे ट्रैक्टर्स का यह काफिला लगभग 2 किलोमीटर लंबा है। इस काफिले में तमाम ऐसे ट्रैक्टर्स भी शामिल हैं जिन्हें किसानों ने खासतौर से 26 जनवरी के की ट्रैक्टर रैली के लिए खरीदा गया है।

किसान दिल्ली के बाहरी इलाकों में बीते 51 दिनों से धरने पर बैठे हैं। अब तक लोगों की सहानुभूति किसानों के साथ रही है और इसकी एक बड़ी वजह ये है कि कड़ाके की सर्दी का सामना कर रहे किसानों का प्रदर्शन शान्तिपूर्ण है। दूसरी बात ये है कि अब तक किसानों ने नेताओं और राजनीतिक दलों को अपने आंदोलन से दूर रखा है। लेकिन अगर किसानों को भड़काने की बात हुई और उनके आंदोलन में सियासी लोग घुस गए, तो जाहिर है लोगों का सपोर्ट कम हो जाएगा।

गणतंत्र दिवस सेना के हमारे बहादुर अफसरों, जवानों और शहीदों को याद करने का दिन है। यह हमारे शूरवीरों की वीरता का, उनके शौर्य का पर्व है। यदि गणतंत्र दिवस समारोह में बाधा डालने की कोशिश की गई तो इससे सारे देश की बदनामी होगी और दुनिया में भारत का नाम खराब होगा। आंदोलनकारी किसान अपने प्रति लोगों की सहानुभूति और प्यार खो देंगे। मैं अभी भी हमारे किसान नेताओं से अपील करता हूं कि वे एक बार जरूर विचार करें कि उन्हें 26 जनवरी को ट्रैक्टर मार्च निकालना चाहिए या नहीं। हालांकि ऐसा मुश्किल ही लग रहा है क्योंकि तमाम सियासी ताकतें किसानों को भड़काने में लगी हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को थकाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि बीजेपी सरकार को तीन कृषि कानूनों को खत्म करना ही होगा। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी 4-5 उद्योगपतियों को फायदा पहुंचा रहे हैं और वे ही देश भी चला रहे हैं। उन्होंने मोदी को याद दिलाया कि किस तरह कांग्रेस ने भट्टा पारसौल आंदोलन के बाद एनडीए सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से पीछे हटने के लिए मजबूर किया था।

अब इस बात को सब समझते हैं कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट, ये दोनों सियासी दल अपने फायदे के लिए किसानो के आंदोलन का इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस और कम्युनिस्ट, दोनों ही पार्टियां किसानों के जरिए अपनी बंजर हो चुकी जमीन पर वोटों की फसल उगाना चाहती हैं। उनकी ख्वाहिश है कि राजनीतिक रूप से बंजर उनकी जमीन पर मेहनत किसानों की लगे, खून-पसीना किसान का बहे और उनके लिए बंपर सियासी फसल पैदा हो।

अगर राहुल गांधी को वाकई में किसानों की चिंता होती तो वह दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी में सड़क पर ठिठुर रहे किसानों को उनके हाल पर छोड़कर नए साल की छुट्टी मनाने इटली न जाते। अगर राहुल गांधी को किसानों की फिक्र होती तो विदेश में न्यू इयर मनाने की बजाए बारिश में सड़क पर भीग रहे किसानों के पास पहुंचते।

क्या ये बात सही नहीं है कि पंजाब के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने कृषि कानूनों में इसी तरह के बदलावों का वादा किया था जैसा कि मोदी सरकार ने किया है? क्या ये सही नहीं है कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा के इलेक्शन में अपने मैनिफेस्टो में APMC ऐक्ट में बदलाव करके कृषि क्षेत्र में प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देने का, और किसानों को कहीं भी और किसी को भी फसल बेचेने का हक देने का वादा किया था? अब अगर यही बदलाव नरेंद्र मोदी की सरकार ने कर दिए कांग्रेस नेता उन्हें ‘किसानों का दुश्मन’ और ‘अंबानी और अडानी का दोस्त’ करार दे रहे हैं। इसे कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है?

मुझे लगता है कि किसान भाइयों को विपक्षी दलों की सियासत का मोहरा नहीं बनना चाहिए? उन्हें अपना आंदोलन चलाने का और अपनी आवाज उठाने का पूरा हक है, लेकिन सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट की बात भी सुननी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा है कि रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, क्योंकि जब बातचीत के रास्ते बंद होते हैं तो दोनों पक्षों में दूरियां बढ़ती जाती हैं और फिर रास्ते अलग हो जाते हैं।

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Farmers must not become pawns in the hands of political parties

Tomar tried his best to persuade the farmer leaders, but the later stuck to their rigid stand for repeal of the three laws. Then why did the talks stretch for five hours? It was because some of the farmer leaders demanded that FIRs filed against them in Haryana and Punjab be withdrawn, while some others demanded that the ED probe against adhatiyas (commission agents) be stopped.

AKB30 The five-hour-long meeting between the Centre and farmer leaders in Delhi on Friday did not yield any breakthrough as the farmers’ representatives stuck to their single demand for scrapping of the three new farm laws, while the Agriculture Minister Narendra Singh Tomar offered clause-by-clause discussion on these legislations.

The meeting ended almost as soon as it began when the Centre asked farmer leaders to point out the clauses on which they had objections. The farmers’ representatives said they would not discuss the clauses and wanted the three laws to be scrapped.

The Union ministers asked what were their apprehensions, and the farmer leaders replied that the Centre must tell a clear-cut ‘yes’ or ‘no’ to their demand for repeal. Tomar even asked the farmer leaders to set up their own experts’ committee for discussing the legal clauses, but the farmer leaders said they would neither form a committee nor would appear before the experts’ committee set up by the Supreme Court.

Tomar tried his best to persuade the farmer leaders, but the later stuck to their rigid stand for repeal of the three laws. Then why did the talks stretch for five hours? It was because some of the farmer leaders demanded that FIRs filed against them in Haryana and Punjab be withdrawn, while some others demanded that the ED probe against adhatiyas (commission agents) be stopped.

The farmer leaders told the Centre that they would continue to come to the talks but any breakthrough can happen only if the Centre agrees to scrap all the three laws. The next round of talks will take place on January 19 and Tomar was still hopeful of a breakthrough. He said, the government was worried about farmers and their families sitting out in the biting cold in the open.

Tomar is an astute politician and an agriculturist who has his roots among the farming community in Madhya Pradesh. He knows the problems of ‘annadatas’(food providers). He is still hopeful of a breakthrough, but I think most of the farm leaders want the agitation to continue till January 26. Bharatiya Kisan Union leader Rakesh Tikait let the cat out of the bag when he said that the leaders would continue to attend talks, but the Centre must withdraw the laws and the farmers will take out a tractor rally on Republic Day.

Already preparations have started and hundreds of tractors have started moving towards Delhi from Punjab and Haryana to join the rally. A convoy of several hundred tractors started on its journey to Delhi from Haryana’s Fatehabad-Sirsa. The convoy was almost two kilometres long. Several of the tractors taking part were those which were bought by farmers for the January 26 tractor rally.

The farmers are sitting on dharna on Delhi’s outskirts for the last 51 days. They have gained sympathy among the common masses, the main reason being the dharna has so far been peaceful and the squatters have been braving the cold winter. Secondly, till now, the farmers have kept politicians and political parties at arm’s length from their agitation. But if efforts are made to incite farmers and if political activists infiltrate their ranks, the agitating farmers will lose people’s sympathy.

Republic Day is a day for remembering our brave army officers, jawans and martyrs. It is a day for celebrating the gallantry of our heroes and if any effort is made to disrupt the Republic Day celebrations, it will lower India’s prestige in the comity of nations. The agitating farmers will then lose the love and sympathy of the people. I still appeal to our farmer leaders to rethink whether they should bring out a tractor march on January 26 or not. This seems to be a tall order because political parties are already instigating the farmers.

On Friday, Congress leader Rahul Gandhi joined his party workers to demand repeal of the three farm laws. He alleged that the Prime Minister Narendra Modi was trying to tire out the farmers and asserted that the BJP government will have to scrap the three farm laws. Rahul Gandhi also alleged that Prime Minister Modi was benefiting four or five businessmen and they were running the country. He reminded Modi of how the Congress forced the NDA government to back out from amending land acquisition law after the Bhatta Parsol agitation.

It is no more a secret that the Congress and the Left parties have been trying to incite the agitating farmers. Both the Congress and Left are trying to harvest political crops on their fallow land as their mass base is shrinking fast. They want the agitating farmers to toil on their politically unfertile land and hand over a bumper political crop to them.

Had Rahul Gandhi been really worried about the demands of farmers, he would not have gone vacationing to Italy during New Year holidays and left the farmers to fend for themselves in the open in Delhi’s biting winter.

Is it not a fact that the Congress had promised the same laws during assembly polls that Modi government has enacted ? Is it not a fact that the Congress had promised private sector partnership in agriculture, right to sell their crops anywhere in India and amendment of APMC Act in its 2019 Lok Sabha poll manifesto? Now that Modi government has implemented those promises, the Congress leaders are describing him as ‘enemies of farmers’ and ‘friends of Ambanis and Adanis’. How can this be justified?

Farmers should not become political pawns in the hands of opposition parties. They have the right to agitate and let their voices be heard, but all parties must respect the Supreme Court’s order. Even the apex court has said that discussions are the only way out and if talks are discontinued, the gap between the two camps will become wider.

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कोरोना वायरस की उत्पत्ति के राज़ पर चीन क्यों डाल रहा है पर्दा?

डब्ल्यूएचओ टीम ऐसे वक्त में चीन पहुंची है जब वहां बड़े पैमाने पर कोरोना वायरस के ताजा मामले आने पर कई शहरों में लॉकडाउन लगा दिया गया है। करीब 22 मिलियन लोगों को लॉकडाउन के कारण घरों के अंदर रहने के लिए कहा गया है। 17 मिलियन जनसंख्या वाले 2 शहरों शिंजुआंग और जिंगताई में लॉकडाउन लगाया गया है जबकि लैंगफैंग (बीजिंग के पास) और वुहान से सटे हेबेई प्रांत में युद्धकालीन आपातकाल घोषित किया गया है। पूर्वोत्तर चीन के हेइलोंगजियांग प्रांत को भी एक ‘आपातकालीन राज्य’ घोषित किया गया है। ट्रांसपोर्ट के सभी साधनों बस और ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है। साथ ही शादियां रद्द कर दी गई है और अंतिम संस्कार को लेकर भी पाबंदिया लगाई गई हैं। चीन ने गुरुवार को आठ महीने के बाद अपने यहां कोरोना वायरस से पहली मौत की सूचना दी।

AKB30 कोरोना वायरस की उत्पत्ति के पीछे क्या राज़ है जिसे चीन छिपाने की कोशिश कर रहा है? पूरी दुनिया जानना चाहती है कि क्या कोरोना वायरस वुहान की हजारों साल पुरानी गुफाओं से निकला या इस वायरस को चीन की लैब में तैयार किया गया। पूरे विश्व के सामने सवाल है कि क्या ये वायरस चीन के चमगादड़ों ने फैलाया या फिर कोरोना वुहान के मार्केट से निकलकर पूरी दुनिया में फैला?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिसर्चर्स की एक ग्लोबल टीम इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए गुरुवार को चीन पहुंची। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, रूस, नीदरलैंड, कतर और वियतनाम के रिसर्चर्स की दस सदस्यीय टीम को काफी जद्दोजहद के बाद शी जिंनपिंग की सरकार ने चीन में घुसने की इजाजत दी थी। सिंगापुर के रास्ते चीन के वुहान पहुंचते ही डब्ल्यूएचओ की इस टीम को क्वारंटीन कर दिया गया। इनका स्वैब टेस्ट और एंटीबॉडी टेस्ट कराया गया।

अब अगले 14 दिन तक डब्ल्यूएचओ की टीम के सारे सदस्य अपने होटल के कमरों में कैद रहेंगे। अब ये लोग वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए चीनी एक्सपर्ट्स के साथ काम करेंगे। डब्ल्यूएचओ की टीम ये पता लगाना चाहती है कि कोरोना वायरस का ओरिजिन क्या है, ये वायरस कहां से पैदा हुआ? वुहान के जिस मार्केट से कोरोना वायरस के फैलने का शक है, अब उस मार्केट के हालात क्या हैं? अगर कोरोना वायरस वुहान की हजारों साल पुरानी गुफाओं से निकला तो अब इन गुफाओं में क्या हो रहा है? अभी तक यह तय नहीं है कि टीम के सदस्यों को गुफाओं में या वुहान के मार्केट या फिर वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी लैब जाने की इजाजत दी जाएगी, जहां से वायरस के पनपने और फैलने की आशंका जताई जा रही है।

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के पास कोरोना वायरस के जेनेटिक सीक्वेंस का एक विशाल संग्रह है जो 2003 SARS (बर्ड फ्लू) महामारी के मद्देनजर बनाया गया था। यह महामारी उस वक्त चीन से एशिया के अन्य देशों में फैली थी। डब्ल्यूएचओ की टीम इस लैब की लॉगबुक और डेटा देखना चाहती है। इसके साथ ही सीनियर और जूनियर चाइनीज रिसर्चर्स से बात करके सैंपल कलेक्शन, स्टोरेज और एनालिसिस के लिए इस्तेमाल होने वाले सेफ्टी प्रोटोकॉल के बारे में पता करना चाहती है।

डब्ल्यूएचओ टीम ऐसे वक्त में चीन पहुंची है जब वहां बड़े पैमाने पर कोरोना वायरस के ताजा मामले आने पर कई शहरों में लॉकडाउन लगा दिया गया है। करीब 2.2 करोड़ लोगों को लॉकडाउन के कारण घरों के अंदर रहने के लिए कहा गया है। 1.7 करोड़ की जनसंख्या वाले 2 शहरों शिंजुआंग और जिंगताई में लॉकडाउन लगाया गया है जबकि लैंगफैंग (बीजिंग के पास) और वुहान से सटे हेबेई प्रांत में युद्धकालीन आपातकाल घोषित किया गया है। पूर्वोत्तर चीन के हेइलोंगजियांग प्रांत को भी एक ‘आपातकालीन राज्य’ घोषित किया गया है। ट्रांसपोर्ट के सभी साधनों बस और ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है। साथ ही शादियां रद्द कर दी गई है और अंतिम संस्कार को लेकर भी पाबंदिया लगाई गई हैं। चीन ने गुरुवार को आठ महीने के बाद अपने यहां कोरोना वायरस से पहली मौत की सूचना दी।

डब्ल्यूएचओ की टीम जब वुहान एयरपोर्ट पर उतरी तो उसका पीपीई किट पहने चीनी अधिकारियों ने स्वागत किया। इस टीम सभी सदस्य पहले ही सिंगापुर में कोविड टेस्ट करा चुके थे और उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी। टीम के सदस्यों को चीनी अधिकारियों ने नए सिरे से स्वैब टेस्ट कराने के लिए कहा। चीन के अधिकारियों ने कहा कि वे किसी दूसरे देश की टेस्ट रिपोर्ट को नहीं मानते हैं। साथ ही ये भी कहा कि बाहर से चीन आनेवालों को 14 दिनों के क्वारंटीन में रहना होगा। डब्ल्यूएचओ टीम के सदस्यों को बताया गया कि चीन में कोरोना की स्थिति खराब हो गई है और कई शहरों में लॉकडाउन लगा दिया गया है।

डब्ल्यूएचओ टीम का नेतृत्व विश्व प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट डॉ. पीटर बेन एम्बरेक कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘टीम दो हफ्ते के बाद ही अहम जगहों का दौरा करेगी और चीनी रिसर्चर्स से मिल पाएगी। यह आइडिया कोरोना वायरस को लेकर उन स्टडीज को आगे बढ़ाने के लिए था, जो पहले से ही डिजाइन किए गए थे। इन्हें कुछ महीने पहले तय कर लिया गया था ताकि हमें इसकी बेहतर समझ हो कि आखिर हुआ क्या है।’

अपने प्राइम टाइम शो ‘आज की बात’ में हमने आपको डॉ. एम्ब्रेक का बयान दिखाया जिसमें वह कह रहे हैंः ‘हम जानते हैं कि कोरोना वायरस शायद चमगादड़ से आया। फिर दिसंबर 2019 में पता चला कि वुहान में ये इंसानों में फैल गया। लेकिन इन दोनों घटना के बीच के वक्त में क्या हुआ? कितने दूसरे जानवरों में ये पाया गया? कितना पाया गया? इन सब चीजों की डिटेल आना बाकी है। इसलिए हमें नहीं पता कि इस टाइम गैप में क्या-क्या हुआ। यही वजह है कि हम लोग इन सबकी जांच कर रहे हैं।’

डॉ एम्ब्रेक ने कहा, ‘हमारी टीम में महामारी से डील करनेवाले एक्सपर्ट्स हैं। कई और मेडिकल डॉक्टर्स मौजूद हैं। जानवरों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स भी टीम का हिस्सा हैं और वायरस पर काम करने वाले तो मौजूद हैं ही। चूंकि ये सब अपनी फील्ड में एक्सपर्ट है और इन्हें अपनी फील्ड की काफी जानकारी है, इसलिए हम जो जांच करनेवाले हैं उसमें ये काफी मददगार साबित रहेंगे। वैसे एक बात मैं कह दूं कि मुझे नहीं लगता कि इस पहले मिशन के बाद ही हमें सारे जानकारी मिल जाएगी। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस तरह के और मिशन, और दौरे करेंगे। काफी और रिसर्च की जरूरत है।’

डब्ल्यूएचओ के डॉक्टर और वैज्ञानिक बड़ी उम्मीद के साथ वुहान गए थे लेकिन अब वे चीन की चाल में फंस गए हैं। शुरुआत में चीन ने इस बात से साफ इनकार कर दिया था कि वायरस वुहान से उत्पन्न हुआ है। उसने इटली पर दोष मढ़ने की कोशिश की थी और सवाल उठने पर चीन ने अपने देश में बाहरी लोगों के आगमन पर प्रतिबंध लगा दिया। चीन ने तब यह दावा करना शुरू कर दिया था कि उसने महामारी को नियंत्रित कर लिया है, लेकिन उसने अन्य देशों को चीन में जाने और जांच करने की अनुमति नहीं दी थी। चीन ने एक वर्ष से ज्यादा अंतराल के बाद जांच की इजाजत दी है। इसके बाद अब उसने डब्ल्यूएचओ टीम को क्वारंटीन कर दिया है। चीन बार-बार अपना रुख बदल रहा है।

‘आज की बात’ शो में हमने दिखाया कि जब डब्ल्यूएचओ की टीम वुहान में एयरपोर्ट से बाहर निकल रही थी तो जहां से जहां से इस टीम को ले जाया गया उस पूरे कॉरिडोर को प्लास्टिक शीट्स से कवर किया गया था। एयरपोर्ट का पूरा स्टॉफ, सिक्युरिटी से लेकर बस के ड्राइवर तक सभी पीपीई किट में थे। ये दिखाने की कोशिश हो रही थी जैसे चीन के वुहान में वायरस का खतरा डब्ल्यूएचओ की टीम से ही है। और ये उस वुहान में हो रहा था जिसे चीन की सरकार कोरोना फ्री घोषित कर चुकी थी। लेकिन अचानक फिर वुहान में लोगों को घरों में कैद कर दिया गया।

मुझे इस बात को लेकर हैरानी हुई है क्योंकि कुछ दिन पहले यहां सब कुछ सामान्य था। सच तो ये है कि वुहान के कई इलाके ऐसे हैं जहां लोग अब भी घूम रहे हैं। किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है। दो हफ्ते पहले नए साल के मौके पर शी जिंनपिंग की सरकार ने खुद चीन में नए साल के जश्न की तस्वीरें जारी की थी। जब पूरी दुनिया कोरोना प्रोटोकॉल के साथ नए साल का स्वागत कर रही थी तब चीन में लोग जमकर जश्न मना रहे थे। चीन ने दुनिया को ये दिखाने की कोशिश की थी कि उसने कोरोना पर कंट्रोल पा लिया है। लेकिन जब डब्ल्यूएचओ की टीम वुहान पहुंची तो चीन की सरकार ने लॉकडाउन का एलान कर दिया।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चीन ने पिछले साल मई से कोरोना के नए, सक्रिय और मौत के मामलों के बारे में आंकड़े देना बंद कर दिया था। उस समय चीन ने दावा किया था कि कोरोना से केवल 4,000 लोगों की मौत हुई। इसके बाद से चीन के आंकड़ों में कोई बदलाव नहीं हुआ। लेकिन गुरुवार को जब डब्ल्यूएचओ की टीम पहुंची तो चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने दुनिया को बताने के लिए आंकड़े जारी किए। उन्होंने बताया कि चीन में कोरोना के 150 नए मामले सामने आए हैं और एक व्यक्ति की मौत हो गई है। चीन ने दुनिया को बताया कि उसने कई शहरों में लॉकडाउन लगा दिया गया है। कोई भी कोरोना के इन आंकड़ों के बारे में सही तथ्य नहीं जानता है।

असल में वायरस हो या वैक्सीन, चीन ने दुनिया को कभी भी सच बताने की कोशिश नहीं की। चीन ने ना इस बात की परवाह की कि वो दुनिया का विश्वास खो देगा। असल में सच पर पर्दा डालना चीन की आदत है। कोई भी चीन के दीवार के पार जाकर असलियत का पता नहीं लगा सकता। चीन ने कभी इस बात की भी परवाह नहीं की कि कोरोना के वायरस से पूरी दुनिया किस तरह परेशान हुई।

जिस तरह से चीन ने डब्ल्यूएचओ की टीम पर पाबंदियां लगाई उससे साफ है चीन कोरोना वायरस के ओरिजिन (उत्पत्ति) पर पर्दा डालना चाहता है। वैसे तो पूरी दुनिया जानती है और मानती है कि ये वायरस चीन से निकला और पूरी दुनिया में फैल गया। सवाल तो ये है कि ये वायरस चीन की गुफाओं से निकला या फिर लैब में बनाकर जानबूझ कर पूरी दुनिया में फैलाया गया? डब्ल्यूएचओ की जो टीम सबूत जुटाने वुहान पहुंची है उसे क्वारंटीन करके और वुहान में लॉकडाउन लगाकर चीन क्या छिपाना चाहता है? सवाल ये भी है कि जिस लैब इंटर्न ने ये बताया था कि ये वायरस चीन से निकला वो गायब क्यों हो गई? सवाल ये भी है कि जब इटली में लोगों ने दरियादिली दिखाते हुए चीनी टूरिस्ट को गले लगाया था तो उसके बाद ही इटली का इतना बुरा हाल क्यों हुआ? सवाल ये भी है कि ट्रंप ने कोरोना को चाइनीज वायरस क्यों कहा? सवाल तो ये भी है कि जिन लोगों ने इस वायरस की रिपोर्टिंग की वो कुछ दिनों के लिए गायब क्यों हो गए?

अच्छा तो ये होगा कि चीन डब्ल्यूएचओ की टीम को इस वैक्सीन के ओरजिन की तहकीकात करने दे। गुफाओं में जाने दे, वुहान मार्केट और लैब में जाने दे। लेकिन जो लोग चीन को जानते और समझते हैं उनका कहना है कि चीन से सच बाहर निकलेगा इसकी ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि चीन की दीवार बहुत मोटी है।

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How China has drawn the Bamboo Curtain over the mystery behind the origin of Coronavirus

aaj ki baatWhat is the mystery behind the origin of Coronavirus that China is trying to hide? The entire world wants to know whether the virus originated from the ancient caves near Wuhan or whether it was prepared in a Chinese lab. People across the world want to know whether the virus originated from a wet market in Wuhan or was it spread by bats that flew out from the caves.

A global team of researchers from the World Health Organization landed in Wuhan from Singapore on Thursday to probe the origin of the virus. The visit of the ten-member team from the US, Australia, Germany, Japan, Britain, Russia, the Netherlands, Qatar and Vietnam, was approved by Chinese government after months of diplomatic wrangling.

The team was immediately put under 14-day quarantine and the members underwent throat swab test and an antibody test. They will now work with Chinese experts via videoconferencing. The team members want to explore whether the virus was passed on to traders in the Huanan seafood market by wildlife poachers who may have visited the caves. It was in this seafood market where the first big cluster of Covid infection cases was noticed. As of this moment, there is no certainty whether the WHO team will be allowed to visit the caves or the seafood market or Wuhan Institute of Virology lab from where the virus was suspected to have originated.

The Wuhan Institute of Virology has a vast archive of genetic sequences of Coronaviruses that was created in the wake of 2003 SARS (bird flu) epidemic which had then spread from China to other countries of Asia. The WHO team wants to access lab logbooks and data, speak to both senior and junior Chinese researchers to find out about safety protocols that are used for sample collection, storage and analysis.

The WHO team’s visit to China comes at a time when nearly 22 million people in China have been asked to stay inside homes due to lockdowns enforced in several cities following fresh outbreak of Covid cases. Lockdown has been imposed in two cities having 17 million population, Shijuazhang and Xingtai, Langfang (near Beijing) and Heibei province adjoining Wuhan, where wartime emergency has been declared. Heilongjiang province in northeastern China has also been declared a an “emergency state”. All bus and train transport, weddings and funerals have been cancelled. On Thursday, China reported its first Covid death after a gap of eight months.

The WHO team that landed at Wuhan airport was welcomed by Chinese officials wearing hazmat suits (PPE kits). All the team members, who had already obtained negative Covid test reports in Singapore, were asked to undergo fresh throat swab tests by Chinese authorities who said they do not recognize Covid reports issued by other countries, and a 14-day quarantine was a must for all outsiders arriving in China. The WHO team members were told that the Covid situation has deteriorated in China and lockdowns have been imposed in many cities.

The WHO team is led by Dr Peter Ben Embarek, a world renowned virologist. He said, the team will be able to move around, visit important sites and meet Chinese researchers only after two weeks. “The idea was to advance the number of studies that were already designed and decided upon some months ago to give us a better understanding of what happened”, he added.

In my prime time show ‘Aaj Ki Baat’ on Thursday night, we showed Dr Embarek saying, “We have been told that the virus originated from bats and it spread to humans in December, 2019. We need to know what happened between this period. Details are yet to come about to which other animals did this virus spread. We don’t know what happened during this time gap. We are probing all this. We will probe what happened at the wet market in Wuhan and what were the conditions prior to that.”

Dr Embarek said, “In our team, we have experts who know how to deal with epidemics, there are doctors who can treat animals, and virologists. Since they are experts in their domains, it will help us in the probe. Let me say it now, we do not expect to reach conclusions in our first visit, this will require more such missions in the coming days, and need more research. Then only we can say anything about the origin of the virus.”

The WHO doctors and scientists had gone to Wuhan with high hopes but they have been trapped by China. In the beginning, China had flatly denied that the virus originated from Wuhan, it tried to shift the blame on Italy. When questions were raised about the origin, China banned arrivals of outsiders into its country. China then started claiming that it has controlled the pandemic, but it did not allow other countries to go to China and investigate. China has given the permission after a gap of more than a year, and now it has quarantined the WHO team of experts, citing fresh outbreak of pandemic and lockdowns. China is changing its stance like a lizard.

In ‘Aaj Ki Baat’ show, we showed how Chinese authorities covered the entire stretch of road where the WHO doctors boarded the buses from the airport with large plastic sheets, the entire airport staff, bus drivers and security personnel were wearing PPE kits, to show as if it was expecting virus to spread from the WHO team. And that too, in Wuhan, which China had declared Corona-free. People in Wuhan have been asked to stay in their homes.

It is surprising that life in Wuhan was normal only a few days ago and there are many localities where people still move freely. Only two weeks ago, Chinese President Xi Jinping had released videos of people celebrating the New Year in China, at a time when the rest of the world was having subdued celebrations with people staying indoors. But when the WHO team came to Wuhan, China quickly drew the Bamboo Curtain by imposing lockdown in several cities to show that there was fresh outbreak of the epidemic.

You will be surprised to know China had stopped giving statistics about fresh and active Covid cases and fatalities since May last year. At that time, China had claimed that only 4,000 people died of Covid, and from then onwards there was no change in the death toll. But on Thursday, when the WHO team arrived, China’s National Health Commission issued figures to tell the world that there has been 150 fresh Covid cases and one person has died. China told the world that it has imposed lockdown in many cities and has asked nearly 40 million people to stay at home.

Nobody knows the true facts about these Covid statistics, only China can tell, but the truth may never come out.

From this entire drama, one thing is crystal clear: China wants to fool the world and is trying to put a curtain over the real cause of origin of Coronavirus. The whole world knows that the Coronavirus originated from China and it caused worldwide pandemic.

The moot question is whether the virus originated from ancient caves or was it developed in a Chinese lab and then deliberately spread across the world. What does China want to hide from the WHO team of scientists that has arrived in Wuhan? Why did the Chinese intern, who broke to the world the story of the virus spreading from the lab, vanish? Why Italy faced the brutal attack of the first wave of pandemic, when Italians graciously hugged Chinese tourists who were visiting Italy? Why did the US President Donald Trump deliberately called Coronavirus as ‘Chinese virus’? Why did those Chinese individuals vanish when they started reporting on the origin and spread of Coronavirus?

The only way out for China to show its bonafide intentions will be to allow the WHO team to investigate independently, without any fetters. China must allow the WHO team to go to the Wuhan caves, the seafood market and the virology lab, without any restraint. People who know deeply about how the Chinese government functions, say there is little hope of the truth emerging from China, because the Great Chinese Wall is the thickest.

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कैसे मोदी ने एक झटके में HAL पर राहुल के आरोपों को निराधार साबित किया

aaj ki baatआत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार ने बहुत बड़ा फैसला किया है। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा स्वदेशी तकनीकों से बने 83 तेजस विमानों की खरीद को बुधवार को मंजूरी दे दी। चौथी पीढ़ी के इन लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना के लिए खरीदा जाएगा। 46,898 करोड़ रुपये का यह अबतक का सबसे बड़ा स्वदेशी सैन्य सौदा है। सिंगल इंजन वाले तेजस मार्क 1-ए फाइटर जेट्स की डिलीवरी तीन साल में शुरू होगी।

सरकार के इस आदेश से स्वदेशी सैन्य उत्पादन क्षेत्र को एक बड़ा बढ़ावा मिलेगा। इस ऑर्डर को पूरा करने के लिए एचएएल करीब 500 अन्य कंपनियों के साथ काम कर रही है। इस फैसले से भारतीय वायु सेना में फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या भी बढ़ेगी। इस सौदे में भारतीय वायुसेना को 10 तेजस ट्रेनर विमानों की डिलीवरी भी शामिल है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सौदे का ऐलान करते हुए कहा-‘यह सौदा डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक गेम-चेंजर होगा। यह घरेलू एयरोस्पेस के इकोसिस्टम को बदलने के लिए एक उत्प्रेरक के तौर पर काम करेगा। एलसीए तेजस आने वाले समय में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े की रीढ़ बनने जा रहा है।’

तेजस का नया मार्क 1-ए वर्ज़न मौजूदा तेजस से 43 मामलों में बेहतर होगा। भारतीय वायुसेना की तरफ से एचएएल को पहले दिए गए 40 तेजस मार्क-1 के ऑर्डर की तुलना में इस नए वर्जन में 43 सुधार किए गए हैं। इसमें सबसे अहम चीज जो जोड़ा गया है वो है इसका आधुनिक एईएसए रडार। मौजूदा यांत्रिक रूप से संचालित रडार को हटाकर एईएसए रडार लगाया गया है जो कि बिल्कुल नया इल्केट्रॉनिक वॉरफेयर स्यूट होगा। यह दुश्मन के रडार और मिसाइलों को जाम करने की क्षमता से लैस होगा। इसके साथ ही हवा से हवा में ईंधन भरने की सुविधा, 80 किलोमीटर तक मार करनेवाली बीवीआर ( Beyond Visual Range) मिसाइल सिस्टम तेजस के नए वर्जन की खूबी होगी। यह लड़ाकू विमान एक हजार किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति तक उड़ान भर सकता है और 5,000 किलोग्राम से ज्यादा बम और मिसाइल ले जा सकता है। यह चौथी पीढ़ी के फाइटर जेट्स में सबसे छोटा और हल्का है।

बुधवार रात अपने प्राइम टाइम शो ‘आज की बात’ में हमने अपने डिफेंस एडिटर मनीष प्रसाद की एक रिपोर्ट दिखाई। मनीष ने बेंगलुरु में एचएएल की उस यूनिट का दौरा किया जहां तेजस लड़ाकू विमानों का निर्माण किया जा रहा है। एचएएल के चीफ टेस्ट पायलट ने बताया कि यह चौथी पीढ़ी की सीरीज में सबसे बेहतरीन लड़ाकू विमानों में से एक है। यह दुनिया के किसी भी फाइटर जेट से किसी मुकाबले में कम नहीं होगा। तेजस का नया मार्क 1-ए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट से लैस होगा। तेजस प्रोजेक्ट के जनरल मैनेजर पी जयदेवा ने हमारे डिफेंस एडिटर को बताया कि तेजस के मार्क1-ए वर्ज़न के बाद तेजस मार्क-2 का इंतज़ार होगा। इसमें ताकतवर इंजन, ज़्यादा बम ले जाने की क्षमता होगी और ये आधुनिक रडार और सेंसर होंगे। तेजस मार्क-2 का वजन 17 टन होगा जबकि मौजूदा तेजस विमान का वजन 12 टन है।

मौजूदा समय में भारतीय वायु सेना के पास केवल 30 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं। प्रत्येक स्क्वाड्रन में 16 से 18 लड़ाकू विमान हैं, लेकिन सीमा पर दोतरफा खतरों को देखते हुए जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है। इस नई खरीद के साथ ही भारतीय वायुसेना में तेजस लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़कर 123 हो जाएगी। फिलहाल वायुसेना में 20 तेजस फाइटर जेट हैं और 20 फाइटर जेट बनाने का काम चल रहा है।

वैसे आपको बता दूं कि तेजस बनाने की प्रक्रिया कोई हाल के दिनों में शुरू नहीं हुई है। पिछले 37 वर्षों के लंबे और जद्दोजहद भरे इंतजार के बाद तेजस की इतनी बड़ी खरीद को मंजूरी मिली है। केंद्र सरकार ने अगस्त, 1983 में 560 करोड़ रुपये के शुरुआती निवेश के साथ लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) परियोजना को मंजूरी दे दी थी। यह फैसला पुराने मिग 21 विमानों को बदलने के लिए लिया गया था। 18 साल बाद वर्ष 2001 में तेजस के पहले प्रोटटाइप विमान ने उड़ान भरी थी और इसके 12 साल बाद वर्ष 2013 में सिंगल इंजन तेजस को शुरुआती ऑपरेशनल क्लीयरेंस मिला था।

भारतीय वायु सेना को प्रोजेक्ट शुरू होने के 32 साल बाद जनवरी 2015 में पहला तेजस लड़ाकू विमान मिला। केवल दो विमानों के साथ वायुसेना ने अपनी पहली तेजस स्क्वाड्रन बनाई। फरवरी 2019 में तेजस को फाइनल ऑपरेशनल मंजूरी मिल गई और पिछले साल मई में भारतीय वायुसेना ने दूसरी तेजस स्क्वाड्रन बनाई। भारतीय वायुसेना में तेजस के 83 विमानों को शामिल करने के बाद अब एचएएल पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट जिसे एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) कहा जाता है, को डेवलप करने के लिए तैयार है। भारतीय वायु सेना अपने बेड़े में कम से कम 126 ऐसे स्टील्थ फाइटर जेट्स चाहती है।

एचएएल ऐसे एयरक्राफ्ट्स बनाएगा जो दुनिया में किसी भी आधुनिक एयरक्राफ्ट्स का मुकाबला कर सकते हैं, ये एक बड़ा कदम है और इस पर हर भारतवासी को गर्व होगा। क्योंकि ये आत्मनिर्भर भारत की तरफ एक बड़ा कदम है। लेकिन मुझे राहुल गांधी की बातें याद आ गईं। राहुल गांधी ने तो पार्लियामेंट में खड़े होकर जोर-जोर से कहा था कि नरेन्द्र मोदी एचएएल को खत्म करना चाहते हैं। वो सारे डिफेंस के ऑर्डर विदेशी कंपनियों को देना चाहते हैं। एचएएल बंद हो जाएगी और इसमें काम करनेवाले लोग बेरोजगार हो जाएंगे। उस समय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी की एक-एक बात को गलत बताया थाऔर ये कहा था कि एचएएल को बहुत सारा काम दिया जा रहा है। बुधवार को जब राजनाथ सिंह ने बताया कि एचएएल से तेजस फाइटर जेट्स 48 हज़ार करोड़ में खरीदे जाएंगे तो ये साबित हो गया कि राहुल गांधी ने उस समय जो कहा था वो बेबुनियाद था,उसका कोई सिर-पैर नहीं था।

मेरा मानना है कि राहुल गांधी को कभी-कभी अपनी कही बातों पर आत्मचिंतन करना चाहिए। उन आरोपों के बारे में आत्मनिरीक्षण करना चाहिए जो उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ लगाए थे। नरेन्द्र मोदी का सपना है ‘आत्मनिर्भर भारत’, अपने पैरों पर खड़ा भारत,अपनी रक्षा में सक्षम, समर्थ और सबल भारत। हर देशवासी भी यही चाहता है और तेजस उसी दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकार का यह फैसला देश के लिए गर्व की बात है। अब तक स्वदेशी हथियार तो छोड़िए, अपने साजो-सामान की मरम्मत के लिए भी सेना दूसरे देशों पर निर्भर थी। फाइटर जेट से लेकर ऑटोमौटिक राइफल्स और उनकी गोलियां तक, सब कुछ विदेशों से मंगाते थे। फौजियों के शरीर पर बुलेटप्रूफ जैकेट से लेकर जूते तक, सब कुछ दूसरे देशों से मंगाया जाता था। लेकिन अब फाइटर जेट, ऑटोमैटिक राइफल और बंदूकों की गोलियां भी स्वदेशी होंगी। ये गौरव की बात है और इसकी तस्वीरें 26 जनवरी की परेड में देखकर आपका सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाएगा। राहुल को इस वर्ष की गणतंत्र दिवस परेड को देखना चाहिए जिसमें सेना अपने स्वदेशी हथियारों का प्रदर्शन करेगी। मोदी ने देश को आत्मनिर्भर बनाने का वादा किया है और इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है, इसीलिए पूरी दुनिया मोदी की तारीफ कर रही है।

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How in a single stroke Modi rubbished Rahul’s charge of ‘winding up’ HAL

akbThe Cabinet Committee on Security on Wednesday approved the acquisition of 83 indigenously manufactured fourth-generation Tejas jet fighters from Hindustan Aeronautics Ltd for the Indian Air Force. This is the biggest ever indigenous military deal worth Rs 46,898 crore. Delivery of the single-engine Tejas Mark 1-A fighter jets will begin in three years.

This will give a big boost to the indigenous military production sector with HAL working with nearly 500 other companies to meet the order. It will also boost the number of fighter squadrons in the Indian Air Force. The deal also includes delivery of 10 Tejas trainer aircraft to the IAF.

Defence Minister Rajnath Singh, announcing this acquisition, said “this deal will be a game changer for self-reliance in Indian defence manufacturing. It would act as a catalyst for transforming the domestic aerospace ecosystem. The LCA-Tejas is going to be the backbone of the IAF fighter fleet in the years to come.”

The new Tejas Mark 1-A jet fighters will have 43 improvements over the 40 Tejas Mark-1 fighter jets ordered by the Indian Air Force earlier. The crucial major additions are AESA (active electronically scanned array) radars to replace existing mechanically-steered radars, air-to-air refuelling facility, long-range BVR (Beyond Visual Range) missiles with a range up to 80 kilometres and advanced electronic warfare to jam enemy radars and missiles. It can fly up to a maximum speed of 1,000 kmph and carry more than 5,000 kg of bombs and missiles. It is the smallest and lightest among the fourth-generation fighter jets.

In my prime time show ‘Aaj Ki Baat’ on Wednesday night, we showed a report from our Defence Editor Manish Prasad who visited the HAL unit in Bengaluru where the Tejas fighter jets are being manufactured. The new Mark 1-A version will be equipped with electronic warfare suite, and the chief test pilot of HAL told our reporter that it is one of the finest fighter jet in the fourth generation series. Coming soon is the Mark 2 version which will be equipped with a more powerful engine, can carry more bombs and will be equipped with latest avionics like radar and sensor. The new version of the jet will weigh 17 tonnes, whereas the present version weighs only 12 tonnes, P. Jayadeva, general manager of Tejas project told our Defence Editor.

Presently, the Indian Air Force has only 30 fighter squadrons, each squadron having 16 to 18 jets, but the requirements are for 42 squadrons which can act as a deterrent to the twin threats on our borders. With the new acquisition, the number of Tejas fighter jets in the IAF will increase to 123. At present, the IAF has 20 Tejas fighters and 20 more are in different stages of production.

The acquisition of Tejas fighter jet has come after a 37-year-long torturous wait. The Centre had approved the Light Combat Aircraft (LCA) project way back in August, 1983 with an initial investment of Rs 560 crore. It was to replace the ageing MiG-21 jets. The first prototype of Tejas was flown after 18 years in January 2001, and 12 years later, in December,2013, the single-engine Tejas jet got the Initial Operational Clearance.

The Indian Air Force got the first Tejas jet in January 2015, 32 years after the project was launched. The first Tejas squadron was raised a year later with only two jets. Tejas got the final operational clearance in February 2019, and the second Tejas squadron was raised by the IAF in May last year. After the induction of 83 Tejas jets in the IAF, the HAL is set to develop the fifth-generation stealth fighter jet called the Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA). The Indian Air Force wants at least 126 such stealth fighter jets for its arsenal.

Every Indian should hold his head high in pride after the HAL achieves its aim of manufacturing stealth fighter jets. I am now reminded of the vicious allegations made by Congress leader Rahul Gandhi months before the 2019 Lok Sabha elections, in which he said that Narendra Modi wants to wind up the HAL to help foreign defence companies. Rahul had then said that thousands of HAL employees would be rendered unemployed if the 36 Rafale jets are acquired from France. I still remember how the then Defence Minister Nirmala Sitharaman rebutted each and every charge made by Rahul Gandhi. She had then promised that HAL would be given the entire Tejas project to complete. Her words have now come true today. The approval given by the CCS on Wednesday has proved how Rahul Gandhi made baseless charges inside Parliament.

I think Rahul Gandhi should sometimes introspect about the allegations that he levels against the Modi government. He should try to understand the connotations of Atmanirbhar Bharat (Self-Reliant India), an India which is capable of defending its borders with weapons manufactured on its own soil, a strong and capable India. Not only Tejas, there are many other indigenous weapons in the people. He should go and watch this year’s Republic Day parade in which the Indian Army will showcase Uzi-type ASMI machine pistols, universal bulletproof jackets, Switch drone vertical microcopters, and other indigenous weapons all developed by Indian army officers with the ‘Made in India’ label. Modi’s vision of ‘Atmanirbhar Bharat’ has made a spectacular beginning.

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कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट के कदम से लोग क्यों खुश नहीं हैं?

लोकतंत्र में सरकार कानून और संविधान के आधार पर काम करती है। ये तो नहीं हो सकता कि मेरे मन की नहीं हुई तो नहीं सुनेंगे। इस तरह के रुख से तो अराजकता पैदा हो सकती है। जिसका मन होगा वह सड़क पर बैठ जाएगा, और जब तक उसकी मांग पूरी नहीं होगी तब तक रोड को बंद रखेगा।

AKB30 तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो बड़े कदम उठाए: पहला तो यह कि अदालत ने तीनों कानूनों पर फिलहाल रोक लगा दी, और दूसरा एक एक्सपर्ट कमेटी भी बना दी, जो किसानों से बात करके 2 महीने में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट देगी।

अब मुसीबत ये है कि सरकार इस बात से खुश नहीं है कि कानूनों पर रोक लगा दी गई, और किसान इस बात से नाराज़ हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने उनसे बिना पूछे कमेटी बना दी। एक तरफ सरकार के समर्थकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पास किए गए कानून पर रोक लगाने का कोई हक नहीं है, लेकिन राष्ट्रहित में, सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानेगी। वहीं, दूसरी तरफ किसान कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई है वे उससे बात तक नहीं करेंगे। किसान नेताओं का आरोप है कि इस कमेटी में शामिल एक्सपर्ट्स नए कृषि कानूनों के समर्थक हैं। किसान नेता पूछ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को कमेटी के चारों मेंबर्स के नाम किसने सुझाए और यह कदम किसकी अपील पर उठाया गया।

किसान नेताओं ने साफ कह दिया है कि जब तक तीनों कानून वापस नहीं होंगे, तब तक वे सड़क पर जमे रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से अपील की है कि वे कम से कम सर्दी में सड़क पर बैठे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को वापस भेजें लेकिन किसानों ने एलान कर दिया कि कोई वापस नहीं जाएगा और आंदोलन जारी रहेगा। कल तक जो किसान नेता सुप्रीम कोर्ट की तारीफ कर रहे थे, आज वही आरोप लगा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट तो सरकार की मदद कर रहा है। पहले जो किसान नेता सरकार पर शक कर रहे थे, अब वही सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं।

किसान पहले सरकार की नहीं सुन रहे थे और अब कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं सुनेंगे, तो सवाल उठता है कि वे लोकतंत्र में फिर किसकी सुनेंगे?

लोकतंत्र में सरकार कानून और संविधान के आधार पर काम करती है। ये तो नहीं हो सकता कि मेरे मन की नहीं हुई तो नहीं सुनेंगे। इस तरह के रुख से तो अराजकता पैदा हो सकती है। जिसका मन होगा वह सड़क पर बैठ जाएगा, और जब तक उसकी मांग पूरी नहीं होगी तब तक रोड को बंद रखेगा।

क्या जिस संसद को देश की जनता ने चुना, वह कानून नहीं बनाएगी? क्या जिस सरकार को देश की जनता ने चुना उसको कानून लागू करने का हक नहीं दिया जाएगा? क्या अब सारे फैसले सड़क पर होंगे? क्या लोग अब सुप्रीम कोर्ट की अपील भी नहीं सुनेंगे?

यह बेहद दुखद है कि किसान कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका, किसी की भी सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। मंगलवार को किसान नेताओं ने साफ आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की मदद कर रहा है, और कमेटी का गठन भी सरकार को बचाने के लिए किया गया है। उन्होंने कहा कि कमेटी के सदस्य भी सरकार की मर्जी के हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने किसानों से बात करने के लिए जो कमेटी बनाई है, उसके चारों एक्सपर्ट्स के बारे में आपको बता देता हूं।

इस कमेटी के अध्यक्ष अशोक गुलाटी हैं, जो कि एक एग्रीकल्चर इकॉनमिस्ट हैं। वह भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) में एक प्रोफेसर थे और 1991 से 2001 तक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार काउंसिल के मेंबर रहे हैं। कमेटी के दूसरे मेंबर डॉक्टर प्रमोद कुमार जोशी हैं। वह अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) से जुड़े रहे हैं और इसके डारैक्टर भी रह चुके हैं। इनके अलावा बाकी के 2 मेंबर किसान संगठनों के नेता हैं, भूपिंदर सिंह मान राज्यसभा सांसद रह चुके हैं और भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हैं जबकि अनिल घनवट शिवकेरी संगठन से ताल्लुक रखते हैं जिससे महाराष्ट्र के लाखों किसान जुड़े हुए हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान भूपिंदर सिंह मान ने बीकेयू के अपने समर्थकों से कांग्रेस के समर्थन में मतदान करने के लिए कहा था क्योंकि उन्होंने किसानों के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र को बीजेपी के घोषणापत्र से बेहतर पाया था। अनिल घनवट और अशोक गुलाटी भी कभी किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे।

केंद्र और किसान नेताओं के बीच शुरुआती दौर की बातचीत के दौरान, सरकार से कृषि विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन किसान नेता इसके लिए तैयार नहीं हुए। अब सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाई है जिसमें कृषि के एक्सपर्ट हैं तो किसान नेता कह रहे हैं कि इस कमेटी के मेंबर्स से वे इसलिए बात नहीं करेंगे कि ये लोग नए कृषि कानूनों के समर्थक हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि किसान नेता पहले चरण में केंद्र के साथ बातचीत के लिए तैयार ही क्यों हुए यदि उनकी मुख्य मांग तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करना है?
भले ही सरकार कृषि कानूनों पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के कदम से खुश नहीं है, लेकिन फिर भी वह कमेटी के गठन के लिए सहमत हो गई है। सरकार का कहना है कि संसद में पास हुए कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह रोक लगाना ठीक नहीं है। कानून बनाने का काम संसद का है, विधानसभाओं का है और इन्हें लागू करने का काम सरकार का है। संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, सबकी भूमिकाएं सुनिश्चित की गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका तभी आती है जब या तो संविधान की अवहेलना की गई हो या मौलिक अधिकारों का हनन होता हो। इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये संकट तो कुछ किसान संगठनों द्वारा आर्टीफिशियली क्रिएट किया गया है।

मुझे इस बात पर भी हैरत हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस मामले को ठीक तरह से हैंडल नहीं किया। किसानों को धरने पर बैठे हुए 45 दिन हो गए और उन्होंने हाइवे को ब्लॉक कर रखा है। लेकिन सरकार ने कभी बल प्रयोग नहीं किया और पुलिस ने काफी संयम दिखाया है।

जब ऐसी अफवाह उड़ी कि पुलिस रातोंरात किसानों को लाठी और गोली के बल पर हटाएगी तो पुलिस अफसरों ने जाकर किसानों को समझाया और इस शक को दूर किया। सरकार के 3-3 मंत्रियों ने किसान नेताओं से कई-कई राउंड में बात की। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि सरकार ने संवेदना नहीं दिखाई, या इस मामले को ठीक से हैंडल नहीं किया।

सरकार तो अभी भी तीनों कृषि कानूनों में संशोधन करने के लिए तैयार है, लेकिन जिद पर कौन अड़ा है ये इस बात से साफ हो जाता है कि किसान संगठनों के नेता कह रहे हैं कि जब तक कानून वापस नहीं होगा तब तक घर वापसी नहीं होगी। एक और बात जो किसान नेताओं की जिद दिखाती है वो ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों पर रोक लगा दी, तो भी किसान 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े हुए हैं।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि वह 26 जनवरी को ट्रैक्टर पर तिरंगा लगाकर रैली निकालेंगे। वहीं, पंजाब के एक अन्य किसान नेता ने कहा है कि उनका आंदोलन गणतंत्र दिवस के बाद भी जारी रहेगा।

अब एक बात बिल्कुल साफ हो गई है कि किसानों का आंदोलन पूरी तरह शक और अविश्वास पर आधारित है।

पहले किसान नेता कहते थे कि सरकार एमएसपी और मंडियों को लेकर जो कह रही है उस पर उन्हें शक है। मंगलवार को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर यह कहते हुए शक जाहिर किया कि शीर्ष अदालत सरकार की मदद कर रही है। किसान नेताओं को सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी के मेंबर्स पर भी विश्वास नहीं है, और शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था।

जो कानून संसद ने पास किए हैं उनके बारे में सड़क पर टकराव करके फैसला कैसे हो सकता है? यदि आंदोलन कर रहे लोग सरकार की नहीं सुनेंगे, सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं सुनेंगे तो रास्ता कैसे निकलेगा? अगर देश में फैसले इस आधार पर होंगे कि किसने कितनी ज्यादा सड़क घेरी हुई है तो ये गलत परंपरा पड़ जाएगी। फिर एक बडा सवाल ये है कि जो लोग आंदोलन नहीं करेंगे, सड़कों पर नहीं उतरेंगे, लेकिन मेजॉरिटी में होंगे तो क्या उनकी बात भी नहीं सुनी जाएगी?

हमारे देश में बड़ी संख्या में वैसे किसान और उनके संगठन हैं जिन्हें लगता है कि इन कानूनों से उनका फायदा हुआ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया बल्कि ये कह दिया कि सरकार ने सलाह-मशविरा नहीं किया। नए कृषि कानूनों पर पिछले 20 साल से चर्चा चल रही है। कई कमेटियां बनीं, कई एक्सपर्ट्स ने अपनी राय दी, और कई किसान संगठनों ने ऐसे ही कानून बनाने की मांग की।

बीकेयू के राकेश टिकैत जैसे किसान नेता भी हैं, जिन्होंने पहले तो नए कृषि कानूनों का स्वागत किया था, लेकिन अब अपने समर्थकों के साथ उन्हीं कानूनों का विरोध कर रहे हैं और पिछले 48 दिनों से धरने पर बैठे हैं। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट कैसे कह सकती है कि बिना कंसल्टेशन के फैसला हुआ?

अब तो ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि न तो नए कृषि कानूनों का समर्थन करने वाले फैसले से खुश हैं और न ही कृषि कानूनों का विरोध करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ हैं। टकराव अभी भी जारी है और इसके चलते आखिरकार भारत का आम आदमी ही कष्ट झेल रहा है।

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Why Supreme Court’s steps on farm laws were not welcomed?

In a democracy, the government functions on the basis of laws and Constitution, and if people start claiming that the government will have to bow to their demands, come what may, then it is a sure recipe for anarchy. Any group can squat on highways, block road movements and insist that its demands are met.

AKB30 The Supreme Court on Tuesday took two major steps for breaking the present impasse over farmers’ protests: One, it stayed the implementation of the three new farm laws, and two, it set up a committee of four experts to examine the laws to see which provisions need to be amended and submit its report within two months.
This led to two consequences. One, the Centre is unhappy over the Supreme Court suspending the implementation of farm laws passed by Parliament, and two, the farmers are angry because the apex court set up the committee without consulting them.
On one hand, supporters of the government are of the view that the apex court has no right to stay legislations passed by Parliament, though in the national interest, the Centre has agreed to accept the Supreme Court’s order. On the other hand, farmer leaders have said they will not appear before the committee, because they allege that the experts in the committee are supporters of the new farm laws. The farmer leaders are raising questions on who suggested the names of these four experts for the committee and on whose appeal was this step taken.

The farmer leaders have made it clear that their agitation will continue till the three farm laws are not repealed. The farmer leaders who were till yesterday praising the Supreme Court, are now alleging that the apex court is helping out the government. The same leaders who were doubting the intentions of the government, are now casting doubts on the intentions of the Supreme Court.

Now that the farmers are unwilling to listen both to the elected government and the Supreme Court, the question arises: whom will they listen to in a democracy?

In a democracy, the government functions on the basis of laws and Constitution, and if people start claiming that the government will have to bow to their demands, come what may, then it is a sure recipe for anarchy. Any group can squat on highways, block road movements and insist that its demands are met.

Does not Parliament, elected by the will of the people, has the right to enact laws? Shouldn’t the government elected by the people be given the powers to implement laws? Will all decisions be allowed to be taken on the streets? Will people not even listen to the appeals of the Supreme Court?

It is sad to note that the farmers are unwilling to listen to either the executive, the legislature or the judiciary. On Tuesday, farmer leaders clearly alleged that the apex court was helping the government by picking “pro-government” experts for the committee.

Let us first check the credentials of the four experts selected by the three-judge bench of the Supreme Court headed by the Chief Justice of India.

The chairman of the committee is Ashok Gulati, an agriculture economist who was professor at ICRIER (Indian Council for Research on International Economic Relations) and who has been on the Prime Minister’s Economic Advisory Council from 1991 to 2001. Dr Pramod Kumar Joshi is a former director of International Food Policy Research Institute. The other two are farmers’ representatives, Bhupinder Singh Mann, former Rajya Sabha MP and president of Bharatiya Kisan Union and Anil Ghanwat of Shivkeri Sanghatana, which has a following among lakhs of farmers in Maharashtra. During the 2019 Lok Sabha elections, Bhupinder Singh Mann had asked his BKU supporters to vote in support of Congress because he had found the Congress’ manifesto for farmers better than that of the BJP. Anil Ghanwat was never aligned to any political party, nor was Ashok Gulati.

During the initial rounds of talks between the Centre and farmer leaders, the government had proposed to set up a committee of farm experts, but the farmer leaders rejected the offer. Now they have rejected the committee set up by the Supreme Court saying all the members have already supported the new farm laws. The question arises: Why the farmer leaders agreed for talks with the Centre in the first stage, if their core demand was repeal of the three laws?

Even though the government is not happy with the Supreme Court’s step to stay the implementation of the farm laws, it has agreed to the formation of the committee. The government has opined that it was improper on part of the apex court to put legislations passed by Parliament on hold. Making laws is in the domain of legislature, and it is the executive that implements them. The Constitution clearly demarcates the boundaries between the legislature, the executive and the judiciary.

The Supreme Court normally steps in only when the Constitution is subverted or weakened by enacting laws or when fundamental rights are curtailed. In the present case, there seems to be no such ground for the Supreme Court to put the new agricultural laws on hold. The crisis has been artificially created by farmers’ organizations.

I was surprised to find the apex court observing that the Centre did not handle the farmers’ agitation properly. Farmers are sitting on dharna for the last 45 days and they have blocked movement of vehicles on highways. The government did not use force to quell the protesters and police exercised utmost restraint.

When rumours were circulated that the police may remove the protesters during a midnight swoop, senior police officials went to the farmers and quashed such rumours as baseless. Three union ministers held several rounds of talks with the farmer leaders. Hence it was not correct for the apex court to remark that the Centre did not handle the agitation properly.

The Centre is still ready to amend provisions in the three farm laws, clause by clause, but the farmer leaders are insisting on nothing less than repeal. Their adamant attitude is reflected in a situation where even after the apex court stayed implementation of the farm laws, the farmer leaders are planning to take out a tractor parade on Republic Day.

BKU leader Rakesh Tikait has vowed to take out the tractor rally with national flag on January 26. Another farmer leader from Punjab has said that the agitation will continue even after Republic Day.

One thing is now crystal clear. The entire farmers’ agitation is based on mistrust and suspicions.

First, the farmer leaders said they were suspicious of the government’s intentions on the issue of continuing with agricultural ‘mandis’ and minimum support prices. On Tuesday, they expressed suspicions about the intent of Supreme Court by alleging that the apex court is helping the government. Obviously, there cannot be any treatment for people who have the habit of creating suspicions.

How can the fate of laws passed in Parliament be decided on the streets? How can a solution be explored if the protesters are unwilling to listen to either the government or the Supreme Court? It will be a wrong precedent if decisions are taken on the basis of road blockages and dharnas. Will the voice of the silent majority not be heard, if they do not come to the streets to voice their opinion?

There are a large number of farmers and their organizations who say they have benefited from the new farm laws. Even the Supreme Court did not hear them and observed that there was lack of consultation on part of the government. For the last 20 years, discussions have been going on for framing new farm laws. Several committees were set up, several experts gave their opinions, several farmer unions wanted these new farm laws.

Today we have the BKU leader Rakesh Tikait, who had welcomed the farm laws when they were enacted, but is now opposing the same laws with his supporters and has been sitting on dharna for the last 48 days. In such a situation, how can the apex court say that there was no consulation?

The situation has now come to such a pass that neither the supporters of new farm laws are happy with the Supreme Court’s order, nor are those who are opposing the laws. The impasse continues and the ultimate sufferers are the common people of India.

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कोविड टीकाकरण की मुहिम में रोड़े अटकाने की कोशिश करने वालों से सावधान रहें

अस्पतालों, राज्य सरकारों, लॉजिस्टिक फर्मों ने कोविड वैक्सीन को चोरी या उठाईगीरी से बचाने के लिए अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त कर लिया है। वैक्सीन के निर्माता भी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि कोई कोविशील्ड वैक्सीन की जाली शीशियां बनाने की कोशिश न करे। केंद्र सरकार ने सोमवार को कहा कि कोविशिल्ड और कोवैक्सिन, जिसे भारत बायोटेक ने निर्मित किया है, दोनों ही टीकों को टीकाकरण कार्यक्रम के शुरुआती चरण में लगाया जाएगा। इसके अलावा 4 और वैक्सीन ऐसी हैं जिन्हें मंजूरी मिलने पर बाद के चरणों में शामिल किया जा सकता है।

AKB30 भारत में कोविड-19 महामारी के खिलाफ आखिरी जंग का आगाज हो गया है। नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप पुरी ने बताया कि मंगलवार को 4 विमानन कम्पनियों, एयर इंडिया, स्पाइसजेट, गोएयर और इंडिगो की मदद से हवाई मार्ग के जरिए पुणे से देश के 13 प्रमुख शहरों में कोविशील्ड वैक्सीन की 56.5 लाख खुराकें भेजी गईं। उन्होंने बताया कि इनमें दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, गुवाहाटी, शिलॉन्ग, हैदराबाद, अहमदाबाद, विजयवाड़ा, भुवनेश्वर, पटना, लखनऊ और चंडीगढ़ जैसे शहर शामिल हैं।

राष्ट्रव्यापी कोविड टीकाकरण मुहिम की औपचारिक शुरुआत 16 जनवरी को होगी। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को सोमवार को केंद्र सरकार की तरफ से कोविशील्ड की एक करोड़ 10 लाख डोज का शुरुआती ऑर्डर मिल गया है। सोमवार की शाम को ही 6 रेफ्रिजरेटेड ट्रक पुलिस की कड़ी सुरक्षा में वैक्सीन की डोज ले जाने के लिए पुणे में स्थित SII के प्लांट में पहुंच गए थे। वैक्सीन की डोज देश भर में हवाई जहाज के जरिए भेजने के लिए ये ट्रक मंगलवार की सुबह SII की प्लांट से वैक्सीन लेकर निकल गए थे।

अस्पतालों, राज्य सरकारों, लॉजिस्टिक फर्मों ने कोविड वैक्सीन को चोरी या उठाईगीरी से बचाने के लिए अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त कर लिया है। वैक्सीन के निर्माता भी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि कोई कोविशील्ड वैक्सीन की जाली शीशियां बनाने की कोशिश न करे। केंद्र सरकार ने सोमवार को कहा कि कोविशिल्ड और कोवैक्सिन, जिसे भारत बायोटेक ने निर्मित किया है, दोनों ही टीकों को टीकाकरण कार्यक्रम के शुरुआती चरण में लगाया जाएगा। इसके अलावा 4 और वैक्सीन ऐसी हैं जिन्हें मंजूरी मिलने पर बाद के चरणों में शामिल किया जा सकता है।

देश के सभी मुख्यमंत्रियों के साथ सोमवार को हुई एक वर्चुअल बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ऐसे ‘शरारती तत्वों’ के खिलाफ सतर्क रहने के लिए आगाह किया, जो अफवाह और गलत जानकारियां फैलाकर टीकाकरण की मुहिम में रोड़े अटकाने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने कहा, लगभग 3 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम मोर्चे पर कार्यरत कर्मचारियों को पहले चरण में मुफ्त टीके दिए जाएंगे। इसके बाद 50 वर्ष से अधिक आयु के और गंभीर बीमारियों से ग्रसित 50 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों का टीकाकरण किया जाएगा।

मोदी ने कहा फ्रंटलाइन वर्कर्स में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान, होमगार्ड, आपदा प्रबंधन के स्वयंसेवक और नागरिक सुरक्षा में लगे अन्य जवान शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि कुछ देशों द्वारा पहले ही टीकाकरण शुरू किए जाने के बावजूद दुनिया भर में अब तक केवल 2.5 करोड़ लोगों को ही टीका लगाया जा सका है, जबकि भारत का लक्ष्य अगले कुछ महीनों में 30 करोड़ लोगों को टीका लगाना है।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘भारत में टीकों की लॉन्चिंग में देरी को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। कुछ लोग चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे कि जहां अन्य देशों ने टीकाकरण की मुहिम शुरू कर दी थी, वहीं भारत पिछड़ गया था। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मैंने हमेशा कहा है कि इस विषय पर साइंटिफिक कम्युनिटी जो कहेगी, वही हम करेंगे, उसी को हम फाइनल मानेंगे और उसी प्रकार चलते रहेंगे।’ मुख्यमंत्रियों को अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ आगाह करते हुए मोदी ने कहा, ‘हमें धार्मिक और सामाजिक संगठनों और पेशेवर निकायों के जरिए देश के प्रत्येक नागरिक तक सही जानकारी पहुंचाकर इस तरह की सभी साजिशों को नाकाम करना होगा।’

प्रधानमंत्री ने सभी मुख्यमंत्रियों को अपने जिलाधिकारियों के साथ संपर्क में रहने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि जिस तरह चुनावों को लेकर बूथ लेवल तक तैयारी होती है, पोलिंग बूथ वर्कर्स को गाइड किया जाता है, उसी तरह की तैयारी कोरोना वैक्सीन को लेकर हुई है और अब पूरे प्लान को एक्जिक्यूट करने की जिम्मेदारी लोकल एडमिनिस्ट्रेशन की है।

मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की मीटिंग के फौरन बाद महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक ने एक बयान में कहा कि वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं इसलिए अच्छा यही होगा कि पहले प्रधानमंत्री खुद टीका लगाकर इस मिशन की शुरुआत करें। नेताओं द्वारा दिए गए ऐसे हल्के बयान लोगों के मन में अनावश्यक भय पैदा करते हैं। ऐसे बयान उन आशंकाओं की भी पुष्टि करते हैं जो प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जताई थीं।

वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में भ्रम पैदा करना टीकाकरण मुहिम को सफल बनाने के हमारे संकल्प को कमजोर कर सकता है। ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि फिलहाल हमारे देश में 9 अलग-अलग कोविड वैक्सीन पर काम चल रहा है। मैंने ‘आज की बात’ के अपने पिछले शो में कहा था कि दुनिया की आधी आबादी जब कोविड के टीके लगवाएगी तो उसके लेबल पर ‘मेड इन इंडिया’ लिखा होगा। यह हर भारतीय के लिए गर्व की बात होनी चाहिए।

ऐसे समय में जब पूरी दुनिया हमारे देश पर, हमारे वैज्ञानिकों पर, हमारे डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों पर यकीन कर रही है, तो हमारे देश के कुछ अपने लोग स्वदेशी वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे ज्यादा दुख की बात और क्या हो सकती है। हम आखिरकार कोविड महामारी खिलाफ चल रही जंग जरुर जीतेंगे, लेकिन साथ ही हमें उन शरारती तत्वों से सावधान रहना चाहिए जो कोविड टीकाकरण की ऐतिहासिक मुहिम में रोड़े अटकाने की कोशिश कर सकते हैं।

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Beware of elements who may try to sabotage Covid vaccination drive

Hospitals, state governments, logistic firms have put their infrastructure in place to protect the Covishield vaccines from pilferage or burglary. The vaccine makers are also alert about any attempt at counterfeiting the Covishield vaccine vials. The Centre said on Monday that both Covishield and Covaxin, manufactured by Bharat Biotech, will be administered in the initial phase of vaccination programme. Four more vaccines are also being readied for induction after approval in the later stages.

AKB30 The final battle against Covid-19 pandemic has begun in India. On Tuesday, consignments of 56.5 lakh doses of Covishield vaccine were transported by air from Pune to 14 major cities like Delhi, Kolkata, Chennai, Bengaluru, Guwahati, Shillong, Hyderabad, Ahmedabad, Vijaywada, Bhubaneswar, Patna, Lucknow and Chandigarh, with the help of four airlines, Air India, SpiceJet, GoAir and IndiGo, Civil Aviation Minister Hardeep Puri said.

The formal launch of nationwide Covid vaccination drive will begin from January 16. On Monday, Serum Institute of India received the Centre’s initial purchase order for 1.1 crore Covishield doses. The same evening, six refrigerated trucks reached the SII plant in Pune to transport the vaccine doses under tight police security. The trucks left the SII plant on Tuesday morning to be dispatched across the country by air.

Hospitals, state governments, logistic firms have put their infrastructure in place to protect the Covishield vaccines from pilferage or burglary. The vaccine makers are also alert about any attempt at counterfeiting the Covishield vaccine vials. The Centre said on Monday that both Covishield and Covaxin, manufactured by Bharat Biotech, will be administered in the initial phase of vaccination programme. Four more vaccines are also being readied for induction after approval in the later stages.

In a virtual interaction with all chief ministers of Monday, Prime Minister Narendra Modi, cautioned them to be on the vigil against “mischievous elements” who may try to sabotage the vaccination drive through rumour mongering and spreading disinformation. He said, nearly three crore health care and frontline workers will get free vaccines in the first stage, to be followed by priority groups of people aged above 50 years and those with critical diseases under the age of 50 years.

Modi said the frontline workers will include police and paramilitary personnel, home guards, disaster management volunteers and other jawans in civil defence. He pointed out that while only 2.5 crore people across the world have been vaccinated so far despite an early start by certain countries, India plans to vaccinate 30 crore people in the next few months.

The Prime Minister said, “Questions were raised about the delay in the launch of the vaccines in India. There was screaming and shouting by certain people who said that while other countries had launched the vaccination drive, India was lagging behind. I want to tell them that we decided to go by the opinion of experts and scientists who, for us, are the last work on this issue”.

Cautioning chief ministers against rumour mongers, Modi said, “We have to frustrate all such machinations by reaching out to each individual through religious and social organisations and professional bodies”.

The Prime Minister asked all chief ministers to remain in touch with their district officials and ensure that the local administration execute the vaccination plan successfully in a manner similar to the polling exercise, where polling officials right up to the polling booths are trained.

Soon after the Prime Minister spoke to the chief ministers, a minister from Maharashtra Nawab Malik gave a statement saying that there were reservations in the minds of some people about the vaccines, and the PM should lead the nation in taking the vaccine first. Such loose remarks by politicians creates unnecessary fear in the minds of people and it confirms the worst apprehensions which the PM reflected in his speech.

Creating confusion in the minds of people about vaccines can ultimately weaken our resolve to make the vaccination drive a success. Such naysayers should know that as of this moment, nine different types of Covid vaccines are being manufactured in India. I had said in my previous ‘Aaj Ki Baat’ show that half of the world’s population will be taking the Covid vaccines which will carry the label ‘Made in India’. This should be a matter of pride for every Indian.

At a time when the entire world trusts the capabilities of our scientists, doctors and drugs companies, it is a matter of sadness that some vested interests are trying to sow seeds of confusion in the minds of Indians about the vaccines. We will ultimately win the war on Covid pandemic, but at the same time, we must be wary of mischievous elements who may try to sabotage the historic Covid vaccination drive.

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किसान नेता कोई भी बात सुनने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?

akbअब यह बिल्कुल साफ हो गया है कि दिल्ली के बॉर्डर पर बीते 45 दिनों से धरना दे रहे किसान यूनियनों के नेता कोई भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं और टकराव के रास्ते पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। शुक्रवार को केंद्र ने भी अपने रुख को सख्त करते हुए तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की किसी भी संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने किसान नेताओं को साफ-साफ कहा कि कानून निरस्त नहीं होंगे और यदि किसान संगठनों को सरकार की बात पर यकीन नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट की बात मानें। कानूनों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की राय भी 11 जनवरी यानी कि सोमवार को सामने आ जाएगी।

किसान यूनियनों के नेताओं ने केंद्र की तरफ से रखे गए हर प्रस्ताव को खारिज कर दिया: उन्होंने कृषि कानूनों में संशोधन करने के तोमर के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जब तक ‘कानून वापसी’ नहीं होगी तब तक ‘घर वापसी’ नहीं होगी। उन्होंने केंद्र से कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट भी उनसे धरना खत्म करने के लिए कहता है तो वे ऐसा नहीं करेंगे। उन्होंने यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा नियुक्त पैनल के सामने भी अपनी बात रखने से इनकार कर दिया कि इस मसले पर अदालत नहीं बल्कि चुनी हुई सरकार फैसला करेगी। उन्होंने तोमर के बाबा लक्खा सिंह को मध्यस्थता करने देने के तीसरे प्रस्ताव को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह कोई धार्मिक मसला नहीं है।

तोमर ने किसान नेताओं से कहा कि चूंकि सरकार ने उनकी चार मांगों में से दो मांगें पहले ही मान ली हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य को जारी रखने के लिए लिखित गारंटी देने को तैयार है, इसलिए कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग ही एकमात्र ऐसा विवादित मुद्दा रह जाता है जिसका समाधान निकलना बाकी है। तोमर ने कहा कि सरकार तीनों कृषि कानूनों को किसानों द्वारा बनाई गई किसी कमिटी के सामने रखने के लिए भी तैयार है ताकि वह इनमें संशोधन के लिए सुझाव दे सके, लेकिन किसान नेताओं ने इस प्रस्ताव को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि तीनों कानूनों की वापसी के अलावा उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है।

बातचीत के दौरान दोनों पक्षों के बीच थोड़ी गरमा-गरमी भी हुई। आखिर में नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों से साफ कह दिया कि नए कृषि कानून पूरे देश के लिए बनाए गए हैं ना कि एक या दो राज्यों के लिए। उन्होंने कहा कि सरकार दूसरे राज्यों के उन तमाम किसानों की भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती है जो इन नए कानूनों का पूरी तरह समर्थन करते हैं। ढाई घंटे तक चली बताचीत के बाद 15 जनवरी को एक बार फिर से बात करने का फैसला किया गया।

शुक्रवार की बातचीत खत्म होने के बाद ऑल इंडिया किसान सभा के नेता हन्नान मोल्लाह ने कहा कि अब एकमात्र रास्ता यही बता है कि आंदोलन को और तेज किया जाए क्योंकि क्योंकि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के तैयार नहीं है। एक और किसान नेता, क्रान्तिकारी किसान यूनियन के दर्शन पाल ने कहा कि उन्हें अब केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है और आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है। इस बारे में किसान नेताओं की राय भी अलग-अलग है कि क्या वे 15 जनवरी को होने वाली अगले दौर की बातचीत में शामिल होंगे या नहीं। जहां भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि वह बातचीत में शिरकत करेंगे, वहीं एक अन्य किसान नेता कुलवंत सिंह ने कहा कि इस तरह व्यर्थ की बातों में वक्त बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है।

किसान नेता अब रविवार को तय करेंगे कि 15 जनवरी को बातचीत में शामिल होना है या नहीं। उनमें से एक बड़ा तबका अपने आंदोलन को 26 जनवरी, जब वे एक ‘ट्रैक्टर परेड’ की प्लानिंग कर रहे हैं, तक जारी रखकर सरकार पर दबाव बनाना चाहता है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे इस परेड के दौरान अपने साथ लाए गए झंडों को दान कर दें।

किसान नेताओं ने कानूनों की वापसी को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है, और इसलिए वे किसी की भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। वे कानूनों में संशोधन नहीं चाहते, वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं, और न ही वे किसी की मध्यस्थता चाहते मोदी का विरोध करने वाले विपक्षी दल इसका पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार हैं। वामपंथी नेता अपने कैडर के साथ पहले से ही पूरी तरह ऐक्टिव हैं और आपने लाल झंडे के साथ किसानों के नाम पर आंदोलन चला रहे हैं।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने शुक्रवार को अपनी पार्टी के सभी सांसदों से मुलाकात की और उनसे कहा कि पार्टी अब आंदोलन कर रहे किसानों के साथ खुलकर सामने आएगी। यह बैठक राहुल गांधी के आवास पर आयोजित की गई थी। राहुल गांधी इन दिनों इटली में छुट्टियां मना रहे हैं। कांग्रेस और वामपंथी दल अब मिल गए हैं और सरकार को मजबूर करने के लिए किसानों को मोहरा बना रहे हैं। अब किसान नेताओं को यह तय करना होगा कि वे एक चुनी हुई सरकार को, संसद को, सुप्रीम कोर्ट को उचित सम्मान देना चाहते हैं या नहीं।

देश कानून से चलता है, संविधान से चलता है, संसद से चलता है, सुप्रीम कोर्ट से चलता है और अगर कोई इनमें से किसी की भी बात नहीं सुनेगा तो फिर अराजकता पैदा हो जाएगी। लोकतंत्र में बातचीत जरूरी है और यदि दो पक्षों में में बात नहीं बन रही तो अदालत का रास्ता है। यदि एक पक्ष कोर्ट-कचहरी से भी बचना चाहता है तो सामान्य परंपरा पंचायत की है, जिस पर दोनों पक्षों का भरोसा हो। ऐसी पंचायत या मध्यस्थों से फैसला कराया जा सकता है। एक चुनी हुई सरकार को सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारियों की धमकी में नहीं आना चाहिए। आज कांग्रेस आंदोलन कर रहे किसानों ने हमदर्दी दिखा रही है, नरेंद्र मोदी को ‘क्रूर’ और ‘निरंकुश’ कह रही है, लेकिन उसे याद रखना चाहिए कि कैसे उसने 2011 में रामलीला मैदान में स्वामी रामदेव और उनके समर्थकों द्वारा दिए जा रहे धरने को खत्म करने के लिए आधी रात को पुलिस से लाठियां चलवाई थीं।

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Why farmer leaders are unwilling to listen to reason ?

akbIt has now become amply clear that the farmer union leaders, who have been staging a dharna for the last 45 days on Delhi’s outskirts, are unwilling to listen to reason and are raring for a confrontation. On Friday, the Centre, too, hardened its stance by ruling out any possibility of repeal of the three farm laws. Union Agriculture Minister Narendra Singh Tomar and Commerce Minister Piyush Goyal bluntly told the farmer leaders that the laws would not be repealed and it is ready to leave it to the Supreme Court to resolve the dispute. The Supreme Court will be hearing the matter on Monday January 11.

The farmer union leaders rejected each and every suggestion that the Centre put on the table: They rejected Tomar’s offer to amend the farm laws by saying that there would be no ‘ghar wapsi’ (homecoming) till there is ‘kanoon wapsi’ (repeal of laws); they told the Centre that they would not end to the stir even if the Supreme Court asked them to do so; they were unwilling to go before a Supreme Court appointed panel saying that this was a matter to be decided by the government and not the court; they rejected Tomar’s third suggestion to allow Baba Lakha Singh to mediate, saying this was not a religious matter.

Tomar told the farmer leaders that since the government has already accepted two out of four demands, and that was ready to give written guarantee to continue with minimum support prices, the only contentious point that remains to be resolved is the demand for repeal of farm laws. He said the Centre was ready to place the three farm laws before a panel to suggest amendments, but the farmer leaders outrightly rejected this, saying nothing short of a repeal was acceptable to them.

There were heated discussions during the talks. Tomar told the farmer leaders that the new farm laws were applicable to the entire country and not to one or two states. The government, he said, cannot ignore the sentiments of farmers from other states who fully support the new laws. After two and a half hours of discussions, it was decided to hold the next round of talks on January 15.

After the end of Friday’s round of talks, All India Kisan Sabha leader Hannan Mollah said, intensifying the stir was now the only way left since the Centre does not want to repeal the three farm laws. Another farm leader Darshan Pal of Krantikari Kisan Union said they have lost all faith in the Centre and agitation was the only way out. The farmer leaders were divided among themselves over whether to join the next round of talks on Jan 15. While Rakesh Tikait of Bharatiya Kisan Union said that they would join the talks, another farm leader Kulwant Singh said, there seems to be no logic in wasting time over what he called pointless talks.

The farmer leaders will decide on Sunday whether to join the talks on January 15 or not. A large section among them want to exert pressure on the government by continuing their stir till January 26, when they plan to bring out a ‘tractor parade’. They have appealed to people to donate flags which they would carry during the parade.

The farmer leaders have now made the demand for repeal of laws an issue of prestige, and are therefore unwilling to listen to reason. They do not want the laws to be amended, they do not want to follow the Supreme Court’s directions, and they also do not want mediation from any corner. The opposition parties, which are blindly opposed to Narendra Modi, are waiting to take advantage of the present impasse. The Left leadership along with its cadre is already working full time using its red flags among the ranks of agitating farmers.

On Friday, Congress general secretary Priyanka Gandhi met her party MPs and told them that the party will now come out in the open in support of the agitating farmers. The meeting was held at Rahul Gandhi’s residence. Rahul Gandhi is presently holidaying in Italy. The Congress and the Left have joined hands to embarrass the ruling party. The farmer leaders will now have to take a call whether they want to give due respect to an elected government, to the Parliament, to the Supreme Court, or not.

A country is run by rule of law and Constitution, and if the pillars of Constitution are ignored, it may lead to anarchy. In a democracy, if there is no consensus after talks, the two sides should listen to the judiciary. Even if one side is unwilling to listen to the court’s views, then mediators or arbitrators can be appointed. An elected government must not be browbeaten by street protesters. The Congress, which is egging on the protesting farmers, and labelling Narendra Modi as ‘cruel’ and ‘despotic’ must remember how it used brutal police force in a midnight crackdown to disrupt a dharna by Swami Ramdev and his supporters at Ramlila Maidan in 2011.

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