Rajat Sharma

My Opinion

हर घर फहरायें तिरंगा, सामाजिक एकता और समरसता की जड़ें होंगी मजबूत

AKBदेश की आजादी के 75 वीं वर्षगांठ का जश्न मनाने से तीन दिन पहले शुक्रवार को अधिकांश शहरों में हजारों लोग पूरे गर्व के साथ हाथों में तिरंगा लहराते हुए सड़कों पर निकले। श्रीनगर की खूबसूरत डल झील से लेकर तमिलनाडु में धनुषकोडी के समुद्री किनारों तक, गुजरात के कच्छ से लेकर असम के कामरूप तक सिर्फ तिरंगा ही तिरंगा दिखाई दिया। सड़कों पर तिरंगे का सैलाब उमड़ पड़ा।हाथ में तिरंगा और जुबां पर देशभक्ति के नारे थे। हाथों में तिरंगा लिए लोगों ने वंदे मातरम, राष्ट्रगान जन गण मन और सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा गाया। देश के लगभग हर शहर और कस्बे में लोगों ने अपने घरों पर तिरंगा लहाराया।

चाहे दिल्ली हो या भोपाल, खरगोन, इंदौर, शाजापुर, पटना, कानुपर, लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, सहारनपुर, अहमदाबाद, सूरत, जामनगर, राजकोट, वडोदरा, मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, जम्मू, श्रीनगर, लेह, गुवाहाटी, गंगटोक, हैदराबाद या फिर चेन्नई, हाथों में तिरंगा लिए और देशभक्ति के गाने गाते आम लोगों की तस्वीरें हर तरफ दिखीं।

तिंरगा देश की एकता और अखंडता का प्रतीक है। यह अनेकता में एकता का प्रतीक है। पुरुषों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ तिरंगा रैली में हिस्सा लिया। सबसे खास और उत्साह बढ़ानेवाली तस्वीरें देश की विभिन्न मस्जिदों से आई जहां मुअज्जिन ने जुमे की नमाज के बाद तिरंगा लहराने का आह्वान किया था।

मदरसों में छोटे- छोटे बच्चों ने शान से तिरंगा लहराया। जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों में देशभक्ति के तराने बजे। मदरसों में बच्चों को तिरंगे का महत्व बताया गया। मौलवियों ने वतन परस्ती और वतन से मोहब्बत पर तकरीरें की। जिन लोगों को मुस्लिम भाइयों की देशभक्ति पर थोड़ा भी शक है उन्हें इन तस्वीरों को जरूर देखना चाहिए जिसे हमने शुक्रवार रात अपने प्राइम टाइम शो ‘आज की बात’ में दिखाया।

मध्य प्रदेश के छोटे से शहर शाजापुर में हजारों मुसलमान जुमे की नमाज के बाद तिरंगा थामे शहर की सड़कों पर निकल पड़े। बाजार में जुलूस निकाला और तिरंगे के सम्मान में नारे लगाए। पूरा बाजार हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे से गूंज उठा। बड़े-बड़े स्पीकर्स के जरिए दशभक्ति के गाने बजे तो पूरा माहौल देशभक्ति की भावना से लबरेज हो गया।

ये बात सही है कि आजादी में हर हिन्दुस्तानी की भूमिका थी।अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सब कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और आजादी हासिल की। कुछ महीने पहले खरगोन की हिंसा को लेकर मध्य प्रदेश में हिन्दू-मुसलमान की दूरियों की बहुत चर्चा हुई लेकिन शुक्रवार की तस्वीरों ने दिखा दिया कि जब सवाल देश की आन-बान-शान का हो तो हर हिन्दुस्तानी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होगा। मैं आपको बता दूं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील ने लोगों के दिलों में एक नया जोश भर दिया है।

पुराने लखनऊ के हैदरगंज इलाके में लोगों ने तिरंगा यात्रा निकाली।अबु बकर मस्जिद में जुमे की नमाज़ के बाद मुसलमान भाई इकट्ठा हुए और देशभक्ति के नारे लगाए। लखनऊ के इस्लामिक सेंटर में मौलाना खालिद रशीदी फिरंगी महली की संस्था में पढ़ने वाले सैकड़ों मुस्लिम छात्र भी भारत माता की जय बोलते हुए तिरंगा रैली में शरीक हुए। इन छात्रों ने गर्व से देशभक्ति के गीत गाए।

हरियाणा के गुरुग्राम की तस्वीरें तो वाकई में दिल को छूने वाली थीं। गुरुग्राम में जुमे की नमाज तिंरगे के सामने पढ़ी गई। नमाज से पहले मुस्लिम भाइयों ने तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान गाया। उसके बाद नमाज पढ़ी और फिर पूरे देश में भाईचारे और अमन के लिए दुआ की। मुंबई में भी मुसलमानों में ऐसा ही उत्साह दिखा। यहां लोगों के बीच तिरंगे बांटे गए और इमारतों पर फहराया गया। क्रॉफर्ड मार्केट में मुंबई की सबसे पुरानी जुम्मा मस्जिद में नमाजियों को तिरंगे दिए गए। सभी ने हाथों में तिरंगा लिए भारत माता की जय के नारे लगाए। वडाला में जुमे की नमाज के बाद तमाम नमाजी मस्जिद के सामने तिरंगा लेकर खड़े हो गए और देशभक्ति के तराने गाने लगे। इन लोगों ने तिरंगे को सलामी भी दी।

श्रीनगर की डल झील के पानी में सिर्फ तिरंगे दिख रहे थे। डल झील पर चल रहे शिकारों में जो तिरंगे लगे थे उनकी परछाई डल के पानी में भी तिरंगे की छाप छोड़ रही थी। लेह में ITBP की तरफ से स्कूल में तिरंगे बांटे गए और स्टूडेंट को देश की आज़ादी के संघर्ष के बारे में बताया गया। वहीं सिक्किम की राजधानी गंगटोक में एमजी रोड पर लगे विशाल तिरंगे पर ITBP ने हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए।

हमारा तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं है, यह सिर्फ एक झंडा नहीं है, देश के बाहर यही तिरंगा हर हिन्दुस्तानी की पहली पहचान है। यह तिरंगा वो छत्र है जिसकी छाया में हर हिन्दुस्तानी सुरक्षित है। तिरंगा वह प्रतीक है जो हर हिन्दुस्तानी को गर्व की अनुभूति कराता है। तिरंगा वो निशान है जिसकी शान की खातिर आजादी के लाखों परवानों ने हंसते-हंसते खुद को कुर्बान कर दिया। तिरंगा किसी कौम का नहीं है। यह किसी एक मजहब का नहीं है। यह तिरंगा किसी इलाके का नहीं है। तिरंगा हर हिन्दुस्तानी का है। हमारे पूर्वजों, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने तिरंगे को कभी झुकने नहीं दिया, कभी गिरने नहीं दिया, इसकी शान में कभी दाग नहीं लगने दिया। अब हम सबकी जिम्मेदारी है कि तिरंगे की शान को और बढ़ाएं।

आइए, हम आज से लेकर 15 अगस्त तक अपने घरों पर तिरंगा फहराएं। 15 अगस्त को देश आजादी की 75 वीं सालगिरह का जश्न मनाएगा जिसे हासिल करने के लिए हमारे पूर्वजों ने बड़ी कीमत चुकाई है। बेशक, कभी-कभी जब कुछ घटनाएं होती हैं तो लगता है कि देशप्रेम में कुछ कमी आई है और तिरंगे के कुछ रंग फीके पड़ने लगे हैं। लेकिन शुक्रवार को पूरे देश से जो तस्वीरें आईं, जो जज्बा सामने आया, वह सारे शक-सुबहे को मिट्टी में मिलाने के लिए काफी है।

मैं तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात के लिए धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की अपील करके देशवासियों को देश के प्रति अपने जज्बे को प्रकट करने का मौका दिया। इससे एकता और सामाजिक सद्भाव की जड़ें और मजबूत होंगी।

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Let us all wave our Tricolour flag, it will strengthen harmony

AKBThree days before the nation goes to celebrate the 75th year of independence, thousands came out in the streets in most of the cities of India on Friday proudly waving the national Tricolour, our beloved Tiranga.

From the beautiful Dal lake in Srinagar to the sea shores of Dhanushkodi in Tamil Nadu, from the marshland of Kutch in Gujarat to Kamrup in Assam, a sea of tricolour flags was seen on streets, held aloft by our proud citizens. People sang Vande Mataram, our national anthem Jana Gana Mana and Saare Jahan Se Accha Hindostan Hamara, while marching and holding the tricolour. The national flag was flown on housetops in almost every town and city.

Whether it was Delhi, Bhopal, Khargone, Indore, Shajapur, Patna, Kanpur, Lucknow, Varanasi, Prayagrah, Saharanpur, Ahmedabad, Surat, Jamnagar, Rajkot, Vadodara, Mumbai, Pune, Nagpur, Nashik, Jammu, Srinagar, Leh Guwahati, Gangtok, Hyderabad or Chennai, there were scenes of jubilation as people marched holding the tricolour.

The tricolour embodies the national aspirations of the Indian people. It reflects the ideals of unity in diversity. Men, women, aged persons and children enthusiastically took part in tiranga rallies. The most encouraging visuals came on Friday from different mosques spread across India, where the muezzin had given the call to devout Muslims to wave the tricolour after Jumma prayers.

In madrasas, small boys and girls proudly waved the tiranga. From the pulpits, moulvis gave sermons to those assembled about the need for nationalistic fervour and expression of love for the nation. Those who doubt the patriotic credentials of our minorities must watch the visuals that we showed on Friday night in my prime time show ‘Aaj Ki Baat’.

In the small town of Shajapur in Madhya Pradesh, thousands of Muslims came out after Friday prayers, holding the tricolour, and marched through the streets chanting Hindustan Zindabad. Loudspeakers in markets played patriotic songs to add zest to the fervour.

Such scenes underline the fact that Hindus, Muslims, Sikhs, Christians and all other minorities fought shoulder to shoulder to win freedom for India. Gone was the bitterness and rancour that showed up a few months ago in Khargone, Madhya Pradesh, when communal violence took place. Prime Minister Narendra Modi’s clarion call to every Indian to participate in Tiranga rallies has struck a chord in the hearts of people.

In Haiderganj of Old Lucknow, Muslims came out after Friday prayers in Abu Baqr mosque, waved tricolour and chanted patriotic slogans. At the Islamic Centre in Lucknow, hundreds of Muslim students studying in Maulana Khalid Rashidi Firangimahali’s institution, proudly sang patriotic songs.

In Gurugram, Haryana, there were touching scenes as Muslims offered Friday prayers in front of the national flag, and later sang patriotic songs. There was similar enthusiasm among Muslims in Mumbai too, where tricolour flags were distributed and hoisted on buildings. At Mumbai’s oldest Jumma mosque in Crawford Market, tricolour flags were distributed among the people. At the Wadala Masjid, devout Muslims, after Friday prayers, started singing patriotic songs and saluted the national flag.

The famous Dal Lake in Srinagar was practically decked with tricolour flags hoisted atop ‘shikaras’ (boats), and the shadows of the tricolour floated in the water of the lake. The ITBP personnel distributed tricolour flags in the schools of Leh, Laddakh, while in Gangtok, capital of Sikkim, an ITBP helicopter poured flower petals on a huge tricolour flag hoisted on M.G. Road.

Our national tricolour is not just a piece of cloth, it is not merely a flag, it is the core identity for every Indian outside India. Our tricolour is the umbrella under which every Indian finds solace and protection. It is the symbol which kindles pride in the heart of every Indian. It is the symbol for which millions of Indians gave their supreme sacrifice. The tricolour does not belong to one religion, or one region. It belongs to every Indian. Our ancestors, our brave freedom fighters never allowed the tricolour to bow in front of others in their fight for freedom. They never allowed any dark blot on our tricolour. It is now our collective responsibility to ensure that the dignity of our tricolour is enhanced.

Let us fly our beloved national tricolour from our homes from today till August 15, when we will be celebrating 75 years of ‘azadi’, which our ancestors won at a great cost. Of course, some incidents do took place in our country which occasionally dulls the colours of our tricolour, but the scenes that were witnessed across India on Friday, depict the limitless zest among our people to safeguard our national flag, our national ethos and above all, our independence. Such zest and enthusiasm is sufficient to drown all suspicions and doubts about national unity.

I would like to thank Prime Minister Narendra Modi for launching the Tiranga Abhiyan and allowing every Indian to express his or her love for the nation. The roots of national unity and social harmony will surely gain strength.

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तिरंगा लहराकर पाकिस्तान के प्रॉपेगैंडा की हवा निकाल रहे हैं कश्मीरी नौजवान

AKB30 भारत की आजादी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर गुरुवार को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में ‘हर घर तिरंगा’ रैली में 8,000 से भी ज्यादा छात्रों और नौजवानों ने हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम अवंतीपोरा के त्राल इलाके में आयोजित किया गया था, जो कभी आतंकवादियों का गढ़ हुआ करता था।

इससे पहले 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के खात्मे की तीसरी बरसी पर पुंछ जिले में सैकड़ों स्कूली छात्राओं ने एक रैली में हिस्सा लेते हुए तिरंगा लेकर मार्च निकाला था। आतंकियों के एक और गढ़, बांदीपोरा जिले में कश्मीरी स्कूली छात्राओं ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत राष्ट्रगान और ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा’ गाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘हर घर तिरंगा’ कैंपेन ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ (स्वतंत्रता के 75वें वर्ष) का हिस्सा है, जिसमें नागरिकों को अपने घरों पर तिरंगा लहराकर राष्ट्रव्यापी उत्सव में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

स्टेडियमों, स्कूलों और चौक-चौराहों पर तिरंगा लहराते कश्मीरी नौजवानों की तस्वीरें देखने लायक हैं, क्योंकि 3 साल किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि घाटी में देशभक्ति से भरपूर इस तरह का कोई आयोजन हो भी सकता है। इन तस्वीरों ने स्वाभाविक रूप से सीमा पार बैठे अलगाववादियों और उनके पाकिस्तानी आकाओं को हताश कर दिया है, और इसी हताशा में वे अब आर्मी के कैंप पर हमला कर रहे हैं और प्रवासी मजदूरों को निशाना बना रहे हैं।

गुरुवार तड़के दो पाकिस्तानी आतंकवादियों ने राजौरी जिले के दरहाल से 9 किलोमीटर दूर परघल गांव में 11वीं राजस्थान राइफल्स के एक आर्मी कैंप में घुसने की कोशिश की। अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने कॉम्बैट ड्रेस पहनी हुई थी और उनका ताल्लुक जैश-ए-मोहम्मद से था। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें पहली बार मंगलवार शाम को दरहाल बस स्टैंड पर देखा गया था, लेकिन पुलिस के मौके पर पहुंचने से पहले ही वे फरार हो गए थे।

गुरुवार तड़के करीब 2.10 बजे दोनों आतंकियों ने बाड़ पार करके चौकी के अंदर घुसने के लिए ग्रेनेड फेंका, लेकिन हमारे सतर्क जवानों ने जवाबी फायरिंग कर उन्हें चुनौती दी। आतंकवादी खराब मौसम का फायदा उठाकर अंदर घुसने में कामयाब रहे, और भारी गोलीबारी में स्टील कोर गोलियों का इस्तेमाल किया। दोनों आतंकियों को ढेर कर दिया गया, लेकिन 4 घंटे तक चली इस मुठभेड़ में सेना के 4 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। इन जवानों में राजस्थान के झुंझुनू के सूबेदार राजेंद्र प्रसाद, तमिलनाडु के मदुरै के राइफलमैन लक्ष्मणराव, हरियाणा के फरीदाबाद के राइफलमैन मनोज कुमार और हरियाणा के हिसार के राइफलमैन निशांत मलिक शामिल हैं। मारे गए आतंकियों के पास से 2 एके राइफल और भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक बरामद किए गए हैं।

एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि राजौरी और नौशेरा इलाकों में सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया गया है क्योंकि ऐसी खुफिया जानकारी मिली है कि पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस समारोह में खलल डालने के लिए बड़ी संख्या में ‘फिदायीन’ आतंकी भेज रहा है। उन्होंने कहा, ‘वे (आतंकवादी) यहां भी उरी जैसा हमला दोहराना चाहते थे, लेकिन हमारे जवानों ने बहादुरी से मुकाबला किया और उन्हें मार गिराया। नियंत्रण रेखा दरहाल से करीब 30 किमी दूर है और इसमें दो संभावनाएं निकलकर आ रही हैं। या तो आतंकवादी LoC पार कर दरहाल पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्ता अपना रहे हैं या फिर उन्हें जैश कमांडरों ने दक्षिण कश्मीर से भेजा है।

कश्मीर घाटी में अलगाववादी और आतंकवादी संगठन अब हताश हो गए हैं, क्योंकि ज्याद से ज्यादा कश्मीरी नौजवान अब स्वतंत्रता दिवस समारोह और तिरंगा रैलियों में हिस्सा ले रहे हैं। ये रैलियां उन इलाकों में निकल रही हैं जो कभी आतंकियों का गढ़ हुआ करते थे, जहां सुरक्षाबलों पर नौजवान पत्थर बरसाते थे। लेकिन अब कश्मीरी लड़कियां हिजाब पहनकर गर्व से तिरंगा लहरा रही हैं और राष्ट्रगान गा रही हैं। यह बदला हुआ कश्मीर है, पिछले 3 साल में घाटी की फिजा बदल चुकी है। पुलवामा जिले के डिप्टी कमिश्नर बशीर-उल हक चौधरी ने कहा कि इस बार कश्मीरी आवाम का जोश देखने लायक है। उन्होंने कहा, ‘लोग खुद ब खुद अपने घरों से तिरंगा लेकर निकल रहे हैं।’

पुंछ के उर्दू स्कूल में स्थानीय प्रशासन ने कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया था। यहां छोटे-छोटे बच्चों और बच्चियों ने स्कूल को तिरंगे के रंग में रंग दिया। हजारों छात्र एक साथ तिरंगा लेकर खड़े थे। खास बात यह है कि इन्हें तिरंगा किसी ने दिया नहीं था, मुफ्त में मिला नहीं था, ये अपने घर से तिरंगा लेकर आए थे। उन्हें स्कूल के टीचर्स ने प्रेरित किया था, और देशभक्ति के गीतों पर गाने और डांस का रिहर्सल करवाया था। गुरुवार की रात अपने प्राइम टाइम शो ‘आज की बात’ में हमने दिखाया था कि कैसे छोटी-छोटी बच्चियां पूरे जोश के साथ ‘सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’ गा रही थीं।

आतंकवादियों के एक और गढ़ अनंतनाग में सैकड़ों स्थानीय लोगों ने तिरंगा रैली में हिस्सा लिया और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए। श्रीनगर में BSF के जवानों ने पंथा चौक से डल झील तक तिरंगा बाइक रैली निकाली। हाल के महीनों में घाटी के हालात में काफी बदलाव आया है।

जाहिर सी बात है कि घाटी के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को हिलोरें लेता देखकर आतंकवादी हताशा से भर गए हैं। बांदीपोरा जिले के सुंबल के सोदनारा में गुरुवार की रात आतंकियों ने बिहार के प्रवासी मजदूर मोहम्मद अमरेज को गोली मार दी। वह घाटी के ही एक शख्स के घर पर रहता था। ‘सॉफ्ट टारगेट’ को निशाने पर लेकर ये आतंकी घाटी में रहने वाले बाहरी लोगों के बीच डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसा करके वे कश्मीरियों का समर्थन खोते जा रहे हैं।

कश्मीर में तिरंगा लहराते नौजवानों की तस्वीरें, तिरंगे के साथ देशभक्ति के गीत गाती बेटियों की तस्वीरें, महबूबा मुफ्ती जैसे उन नेताओं को करारा जवाब है जो कहते थे कि अगर अनुच्छेद 370 को हटाया तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। लेकिन उनकी यह आशंका बेबुनियाद साबित हुई और आज कश्मीर में हर हाथ में तिरंगा है, हर घर पर तिंरगा है, हर नौजवानों के दिल में तिरंगा है।

पिछले हफ्ते जम्मू कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उनसे घाटी के हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कैसे आज वाकई में कश्मीर की फिजा बदल गई है। सिन्हा ने कहा कि कश्मीर में अमन है, कश्मीर में चैन है, कश्मीर में नए हाईवे, नए अस्पताल, नए पावर प्रोजेक्ट और नए स्कूल बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि कश्मीर में मल्टीप्लेक्स बन रहा है, नए स्टेडियम बन रहे हैं, नौजवानों को स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग मिल रही है, रोजगार मिल रहा है और खौफ खत्म हो रहा है। अब अलगाववादियों की अपील पर रोज़-रोज़ घाटी में हड़तालें नहीं होती। पिछले एक साल में 1 करोड़ 60 लाख से ज्यादा सैलानी कश्मीर पहुंचे हैं। कश्मीर में इस साल अब तक 136 आतंकी मारे जा चुके हैं। अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से पिछले 3 सालों में 690 आतंकी मारे जा चुके हैं।

यह इस बात का सबूत है कि कश्मीर के हालात अब बदल चुके हैं। ज़ाहिर सी बात है कि आतंकवादी, अलगाववादी और उनके पाकिस्तानी आका इससे बेचैनी और हताशा महसूस कर रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि वे एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। सेना के कैंप पर गुरुवार को हुआ हमला इसी हताशा और बेचैनी का नतीजा था।

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क्या विपक्ष कभी नीतीश को अपना पीएम उम्मीदवार स्वीकार करेगा?

AKBबिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को ऐलान किया कि उनका नया मंत्रिमंडल 15 अगस्त के बाद शपथ लेगा, और 24 एवं 25 अगस्त को राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाएगा। नई महागठबंधन सरकार विधानसभा में अपना बहुमत साबित करेगी और एक नये विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भेजा जा चुका है। नए मंत्रियों को दिए जाने वाले विभागों के बारे में गठबंधन सहयोगियों के बीच एक व्यापक समझ बन गई है।

इस बीच, इस बात के साफ संकेत हैं कि नीतीश कुमार दिल्ली पर नजरें गड़ाए हुए हैं और राष्ट्रीय राजनीति में कदम रख सकते हैं। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी, जिन्होंने 10 साल तक नीतीश कुमार की सरपरस्ती में उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया, ने खुलासा किया कि नीतीश ने बीजेपी का साथ छोड़ने का फैसला इसलिए किया क्योंकि बीजेपी हाईकमान ने उपराष्ट्रपति बनाए जाने के उनके अनुरोध को नहीं माना था। सुशील मोदी ने कहा कि जेडीयू के नेताओं ने इस बारे में बीजेपी नेतृत्व से मुलाकात भी की थी, लेकिन ये बात नहीं मानी गयी। सुशील मोदी ने कहा, ‘अगर बीजेपी ने नीतीश को उपराष्ट्रपति बना दिया होता, तो वह एनडीए नहीं छोड़ते और बीजेपी का गुणगान कर रहे होते।’ नीतीश कुमार ने इन आरोपों को ‘बेकार की बातें’ करार दिया।

सुशील मोदी की इस बात में दम है कि नीतीश कुमार अब दिल्ली की राजनीति करना चाहते हैं। जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेने के साथ ही यह मुद्दा अब खत्म हो गया है। नीतीश कुमार की नजर पीएम पद पर है, और वह बीजेपी विरोधी ताकतों को लामबंद करने की योजना बना रहे हैं। नीतीश कुमार का दिल्ली की तरफ कूच करने का इरादा तेजस्वी यादव को भी सूट करता है। बिहार का मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना ऐसे ही पूरा हो सकता है।

सुशील मोदी ने एक और दिलचस्प खुलासा किया। उन्होंने कहा कि जब गृह मंत्री अमित शाह ने नीतीश कुमार को दो दिन पहले फोन किया था और उनसे पूछा था कि उनकी पार्टी के नेता ललन सिंह बीजेपी विरोधी बयान क्यों दे रहे हैं, तो नीतीश कुमार ने जवाब दिया था कि ‘हमारे ललन सिंह आपके गिरिराज जैसे हैं। उनके बयान को ज्यादा महत्व मत दीजिए, चिंता मत कीजिए।’ नीतीश कुमार ने अमित शाह को झांसे में रखा और अगले ही दिन गठबंधन को तोड़ दिया।

बीजेपी नेतृत्व को पूरा भरोसा है कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में नाकाम साबित होंगे। बीजेपी नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार, जो 2014 में बिहार से अपनी पार्टी के लिए 40 में से सिर्फ 2 लोकसभा सीटें जीत पाए थे, उन्हें अन्य विपक्षी दल कभी भी गंभीरता से नहीं लेंगे। हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि नीतीश कुमार के अचानक विपक्षी खेमे में घुसने से बीजेपी नेताओं को गहरी चोट लगी है, और इसका दर्द उनके बयानों में दिखाई भी दे रहा है। बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बुधवार को कहा कि ‘विपक्ष नीतीश कुमार को चने के झाड़ पर चढ़ा रहा है।’

राष्ट्रीय फलक पर इस समय विपक्षी खेमे में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व है, और यह खेमा नीतीश कुमार के हर कदम को गौर से देख रहा है। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने कहा, नीतीश कुमार ने बीजेपी की चाल को समझकर वक्त रहते जो फैसला किया, उसकी तारीफ की जानी चाहिए। पवार ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने इससे पहले भी अकाली दल और शिवसेना जैसे अपने पूर्व सहयोगियों को कमजोर किया, लेकिन नीतीश कुमार ने जैसे को तैसा जबाव दिया। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने भी नीतीश कुमार के इस कदम का स्वागत किया। शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने आरोप लगाया कि बीजेपी क्षेत्रीय दलों को कभी पनपने नहीं देना चाहती।

इसी तरह की प्रतिक्रियाएं ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और के. चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति की ओर से आईं। केसीआर की बेटी के. कविता ने कहा, ‘बिहार में हुआ सियासी घटनाक्रम पूरे देश के लिए एक शुभ संकेत है और नीतीश कुमार के इस कदम की तारीफ होनी चाहिए।’ AAP सुप्रीमो और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल से जब पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी पीएम पद के लिए नीतीश कुमार का समर्थन करेगी, तो उन्होंने कहा: ‘लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है। तब की तब देखी जाएगी।’

जितनी पार्टियों ने बिहार में हुए बदलाव को ‘देश में बदलाव की शुरूआत’ बताया, ‘बीजेपी की उल्टी गिनती की शुरूआत’ बताया, वे सभी पार्टियां पूरी ताकत के साथ नरेन्द्र मोदी का विरोध करती हैं। शरद पवार, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, के. चन्द्रशेखर राव और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता मोदी के खिलाफ बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

चूंकि नीतीश ने बीजेपी को झटका दिया है इसलिए अब सभी नीतीश की तारीफ कर रहे हैं, उन्हें देश को दिशा दिखाने वाला बता रहे हैं। नीतीश भी विरोधी दलों की एकता की बात कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही यह सवाल पूछा जाएगा कि क्या ये सारे नेता नीतीश को नेता मानने को तैयार हैं, क्या नीतीश को मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करने के लिए तैयार हैं, इस सवाल का जबाव मिलने से पहले ही विपक्षी एकता टूट जाएगी। यही आज विपक्ष की हकीकत है।

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Will the opposition ever accept Nitish as its PM candidate?

AKBBihar chief minister Nitish Kumar on Thursday announced that his new cabinet will take oath after August 15, and a special session of state assembly will be called on August 24 and 25. The new Mahagathbandhan government will prove its majority in the assembly and a new Speaker will be elected. A no-confidence motion notice has been moved against the Speaker. A broad understanding has been reached among alliance partners about the portfolios that would be given to the new ministers.

Meanwhile, there are clear indications that Nitish Kumar may step into national politics with his eyes set on Delhi. Senior BJP leader Sushil Modi, who served as deputy chief minister under Nitish Kumar for ten years, revealed that the JD-U supremo decided to ditch the BJP, after his request to be made the Vice President was not accepted by the BJP high command. Sushil Modi disclosed that JD-U leaders had met BJP leadership with this request, but it was not accepted. ‘Had BJP made Nitish the Vice President, he would not have left the NDA and would have been singing paeans for BJP’, Sushil Modi said. Nitish Kumar denied the allegation as ‘bogus’.

There is no doubt that Nitish Kumar wants to enter national politics. Now that Jagdeep Dhankhar has been sworn in as Vice President, the issue is over. Nitish Kumar is eyeing the PM’s post, and is planning to mobilize anti-BJP forces. Nitish Kumar shifting to Delhi politics will suit his deputy CM Tejashwi Yadav fine. The latter can then fulfil his dream to become the Bihar CM.

One more interesting disclosure was made by Sushil Modi. He revealed that Home Minister Amit Shah rang up Nitish Kumar two days and asked why his party leaders like Lallan Singh were making anti-BJP remarks. Nitish Kumar replied that “our Lallan Singh is just like your Giriraj Singh. Please do not give much importance to his remarks, please do not worry”. Nitish Kumar kept Amit Shah in the dark and snapped his alliance with the BJP.

BJP leadership is confident that Nitish Kumar will prove to be a dud in national politics. BJP leaders say, Nitish Kumar, who could not win two Lok Sabha seats for his party from Bihar in 2014, will never be taken seriously by other opposition parties. Of course, it cannot be denied that the sudden crossover by Nitish Kumar to the opposition camp has pained BJP leaders, and it is visible from their remarks. On Wednesday, BJP leader and Union Minister Giriraj Singh lashed out saying ‘the opposition is leading Nitish Kumar up a blind alley’.

The opposition camp in national politics, dominated by regional parties, is observing Nitish Kumar’s moves keenly. NCP supremo Sharad Pawar said, Nitish Kumar took a timely and correct decision, which is laudable. Pawar alleged that BJP had earlier weakened its former allies Akali Dal and Shiv Sena in a similar manner, but this time it was Nitish Kumar who paid BJP back in its own coin. The Uddhav Thackeray-led Shiv Sena also welcomed Nitish Kumar’s move, with party leader Arvind Sawant alleging that BJP will never allow regional parties to grow.

Similar reactions came from Mamata Banerjee’s Trinamool Congress and K. Chandrashekhar Rao’s Telangana Rashtra Samiti. KCR’s daughter K. Kavitha said, ‘the political development in Bihar is a good sign for the country and Nitish Kumar’s move must be praised’. AAP supremo and Delhi CM Arvind Kejriwal, when asked whether his party would support Nitish Kumar for the post of PM, said: “We will decide when the Lok Sabha elections will take place.”

All the opposition leaders who described the Bihar developments as “the beginning of change” and “beginning of countdown against BJP”, are already known for their staunch anti-Modi stand. Leaders like Sharad Pawar, Mamata Banerjee, Uddhav Thackeray, K. Chandrashekhar Rao and Arvind Kejriwal do not leave any opportunity to criticize Modi.

Since Nitish Kumar has given a shock to the BJP, these leaders are now praising him. Nitish Kumar is also giving call for opposition unity. But when questions will be asked whether these parties would accept Nitish as their leader to challenge Modi for the post of PM, the opposition unity will crash to pieces even before the answers are given. This, in a nutshell, is where the opposition stands today.

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नीतीश कुमार ने बीजेपी को छोड़ आरजेडी से क्यों मिलाया हाथ?

AKBनीतीश कुमार ने बुधवार को रिकॉर्ड आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जबकि उनके नए सहयोगी तेजस्वी यादव ने बतौर उपमुख्यमंत्री शपथ ली। सात पार्टियों के मेल वाली महागठबंधन सरकार का विस्तार बाद में किया जाएगा। शपथ लेने के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने पत्रकारों से बात करते हुए विपक्षी एकता का आह्वान किया।

नीतीश कुमार ने कहा, ‘जो लोग 2014 में सत्ता में आए, वे 2024 के आगे रह पाएंगे या नहीं? मैं चाहता हूं कि सभी (विपक्ष में) 2024 के लिए एकजुट हों। मैं ऐसे किसी पद (पीएम पद) का दावेदार नहीं हूं।’

बिहार के सियासी खेल में कितने पेंच हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर में कितनी बार सीएम पद की शपथ ली।

8 बार के सीएम नीतीश कुमार ने पहली बार 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, लेकिन उनका कार्यकाल सिर्फ एक हफ्ते का ही रह पाया था, क्योंकि वह बहुमत साबित नहीं कर सके। उन्होंने 2005 और 2010 में क्रमशः दूसरी और तीसरी बार शपथ ली, और दोनों बार उन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। 2014 में, नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन फरवरी 2015 में उन्होंने फिर वापसी की और चौथी बार सीएम के रूप में पदभार संभाला।

उसी साल नवंबर में, RJD के नेतृत्व वाले महागठबंधन के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पांचवीं बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। दो साल बाद, जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़ दिया और NDA से हाथ मिला लिया, और छठी बार सीएम पद की शपथ ली। 2020 में नीतीश कुमार ने NDA नेता के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा और सातवीं बार सीएम के रूप में शपथ ली। अब फिर से वह महागठबंधन में शामिल हुए और आज (10 अगस्त) आठवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने की आहट पिछले कई दिनों से सुनी जा रही थी। वह अपनी सहयोगी बीजेपी से नाखुश थे। मंगलवार को नीतीश कुमार ने पांच घंटे के भीतर अपना सियासी खेमा बदल लिया। उन्होंने अपने विधायकों की बैठक बुलाई, राजभवन गए, अपना इस्तीफा सौंपा और फिर सीधे RJD नेता तेजस्वी यादव के आवास पर गए, जहां उन्हें महागठबंधन का नेता चुन लिया गया। इसके बाद वह फिर तेजस्वी यादव, कांग्रेस के अजीत शर्मा और HAM पार्टी के जीतनराम मांझी के साथ नई सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए राजभवन गए। राज्यपाल फागू चौहान ने बुधवार को नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को शपथ दिला दी। मंत्रिमंडल का विस्तार बाद में होगा।

हर कोई यह सवाल पूछ रहा है कि नीतीश कुमार बीजेपी से नाखुश क्यों थे? बीजेपी के पास 77 विधायक थे, जबकि नीतीश के जनता दल (यूनाइटेड) के पास 45 एमएलए थे, फिर भी बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री का पद दिया? नीतीश कुमार को खुली छूट मिली थी, फिर रिश्तों में खटास क्यों आई?

नवंबर 2020 में चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही नीतीश कुमार के मन में बीजेपी को लेकर शंका के बीज पड़ गए थे। नीतीश कुमार को लगता है कि उनकी पार्टी को कम से कम 40 सीटों पर बीजेपी ने हरवाया.। चिराग पासवान पर पर्दे के पीछे बीजेपी का हाथ है। इसके बाद भी नीतीश कुमार, बीजेपी की मदद से मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन वह पहले दिन से ही अपना रास्ता तलाशने में लगे रहे। इसके बाद बीजेपी ने विजय कुमार सिन्हा को स्पीकर की कुर्सी पर बैठा दिया। सिन्हा से नीतीश की नहीं बन रही थी।

नीतीश को यह भी लगने लगा था कि अब बीजेपी उनकी पार्टी तोड़ने की कोशिश कर रही है। उनको शक अपने पुराने साथी आरसीपी सिंह पर था। नीतीश ने ही आरसीपी सिंह को जेडीयू का अध्यक्ष बनाया था, और नीतीश के कहने पर ही आरसीपी सिंह को केन्द्र में मंत्री बनाया गया। इसके बाद जब आरसीपी सिंह का राज्यसभा का टर्म खत्म हुआ तो नीतीश ने उन्हें टिकट नहीं दिया, उनका मंत्री पद भी चला गया। आरपीसी सिंह ने बगावती तेवर दिखाए तो नीतीश को लगा कि इसके पीछे बीजेपी है।

नीतीश कुमार के शक को दूर करने के लिए खुद गृह मंत्री अमित शाह पटना गए। शाह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के सामने खुलकर कहा कि अगला चुनाव बीजेपी और जेडीयू मिलकर लड़ेंगे, नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लडेंगे। लेकिन इसके बाद भी नीतीश के मन में शंका थी, और वह दूर नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने RJD नेता तेजस्वी यादव से संपर्क किया और राबड़ी देवी और उनके बेटे द्वारा आयोजित एक इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। JDU के नेताओं ने भी खुलकर कहा कि नीतीश कुमार का कद छोटा करने की कोशिश की जा रही थी, और इसे पार्टी के कार्यकर्ता कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

बीजेपी के प्रति नीतीश कुमार की चाल उसी दिन बदल गई थी जिस दिन उन्हें विधानसभा में खड़े होकर स्पीकर विजय कुमार सिन्हा पर खुलेआम नाराजगी जाहिर की थी। एक मामले में जांच को लेकर मुख्यमंत्री और स्पीकर के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी।

बीजेपी से नाता तोड़ते हुए नीतीश की पार्टी जेडीयू ने निम्नलिखित कारण बताए: (1) नीतीश कुमार को खुली छूट नहीं दी गई (2) विधानसभा अध्यक्ष के साथ उनका तनाव, (3) जेडीयू के खिलाफ बीजेपी की साजिशें (4) बीजेपी आरसीपी सिंह का इस्तेमाल जेडीयू के खिलाफ कर रही है (5) पार्टी को बांटने के लिए चिराग पासवान मॉडल का इस्तेमाल कर रही है (6) केंद्र में अनुपात के मुताबिक मंत्री पद नहीं है (7) राज्य में बीजेपी के मंत्रियों पर नियंत्रण की कमी है (8) जाति आधारित जनगणना को लेकर केंद्र से मतभेद (9) बीजेपी ने जेडीयू को हमेशा छोटा दिखाने की कोशिश की (10) बीजेपी आलाकमान से सीधा संपर्क न हो पाना।

मंगलवार को महागठबंधन में दोबारा शामिल होने के बाद नीतीश कुमार ने कहा कि उन्हें विधानसभा में 164 विधायकों और एक निर्दलीय का समर्थन हासिल है। उन्होंने कहा, ‘हमारे महागठबंधन में 7 पार्टियां हैं। हम मिलकर के आगे काम करेंगे, सेवा करेंगे।’

RJD नेता तेजस्वी यादव पूरी मजबूती से नीतीश के साथ खड़े थे। तेजस्वी ने कहा कि बीजेपी के एजेंडे को अब बिहार में नहीं चलने देना है। जब रिपोर्ट्स ने पूछा कि वह तो नीतीश को पलटूराम, बेशर्म, ठग, बहरूपिया और न जाने क्या-क्या कहते रहे हैं तो तेजस्वी ने तुरंत जवाब दिया, ‘चाचा से लड़ाई-झगड़ा होता रहा है। हर परिवार में झगड़े-झंझट होते रहते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि कोई तीसरा पुरखों की विरासत को ले जाए। बीजेपी तो आपस में लड़ा कर अपना रास्ता बनाती है, लेकिन नीतीश कुमार ने बता दिया कि ये सब बिहार में नहीं चलेगा।’

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने नीतीश कुमार के आरोपों के जवाब दिए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बन पाते क्योंकि उनके नाम का उनकी ही पार्टी में विरोध हो रहा था, लेकिन बीजेपी ने उन्हें सीएम का पद दे दिया। प्रसाद ने पूछा, ‘बिहार विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा गया था, और खुद से आधी सीटें होने के बावजूद बीजेपी ने नीतीश कुमार को सीएम बनाया था। यह एहसान फरामोशी नहीं तो और क्या है?’

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे, लेकिन ‘पीएम पद पर कोई वैकेंसी नहीं है, इसमें बीजेपी की क्या गलती।’ उन्होंने कहा, ‘हकीकत यह है कि नीतीश कुमार मौकापरस्त हैं, और यह आज पूरे देश ने देख लिया।’ सोशल मीडिया पर ऐसे कई मीम्स ट्रेंड कर रहे थे जिनमें पाला बदलने के लिए नीतीश कुमार पर व्यंग्य किया गया था।

नीतीश कुमार की दिक्कत उस दिन शुरू हुई थी जब पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी उनसे बड़ी पार्टी हो गई। बीजेपी की सीटें जेडीयू के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई थीं। नीतीश को लगा कि बीजेपी ने उनका कद छोटा करने के लिए चिराग पासवान का इस्तेमाल किया। नीतीश कुमार को इस बात की भी तकलीफ थी कि बिहार के मामलों में एक जमाने में वह लालकृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली जैसे नेताओं के साथ सीधे बात करते थे, लेकिन अब उनसे बातचीत के लिए बीजेपी ने भूपेन्द्र यादव को नियुक्त कर दिया था। नीतीश चाहते थे उन्हें अगर मोदी नहीं तो कम से कम अमित शाह से सीधे डील करने का मौका मिले, लेकिन यह नहीं हो पाया।

नीतीश थोड़े इगो वाले नेता हैं। ये सब बातें उन्हें परेशान करती थीं। जब आरसीपी सिंह को केन्द्र में मंत्री बनाया गया, हालांकि वह नीतीश कुमार की पंसद से ही मंत्री बने थे, लेकिन नीतीश ने अपनी पार्टी में इंप्रेशन दिया कि आरसीपी को मंत्री बनाने का फैसला अमित शाह का था। इसकी वजह से आरसीपी सिंह की अपनी पार्टी में यह धारणा बनी कि वह तो बीजेपी के आदमी हो गए। नीतीश चाहते थे कि आरसीपी सिंह दिल्ली में उनकी तरफ से अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे नेताओं से संपर्क में रहें, लेकिन ये भी नहीं हो पाया।

अंतत: नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को भी किनारे कर दिया और बाद में पार्टी के बाहर कर दिया, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि आरसीपी सिंह के जरिए बीजेपी उनकी पार्टी को तोड़ देगी, और उनका हाल उद्धव ठाकरे की तरह हो जाएगा। उनके पास न पार्टी रहेगी, न सरकार। इस शक-ओ-शुबह ने नीतीश कुमार की रातों की नींद उड़ा दी, और उनको इतना परेशान कर दिया कि वह तेजस्वी यादव के पास चले गए।

मतलब साफ है बिहार में सरकार सिर्फ नीतीश कुमार के शक के कारण बदली है, वरना उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं था। अब सवाल यह है कि तेजस्वी ने अपने पास दोगुने विधायक होते हुए भी नीतीश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों बैठाया? नीतीश को अपना नेता मानकर फिर से उनके साथ सरकार क्यों बनाई?

असल में पटना में जो हुआ उसमें नीतीश और तेजस्वी दोनों का फायदा है। दोनों सत्ता के लिए व्याकुल थे। नीतीश कुमार अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं और तेजस्वी की पारी अभी शुरू ही हुई है। वे मानते हैं बिहार में पलटी मारने से, भ्रष्टाचार के इल्जाम होने से, अपनी बात बदलने से खास फर्क नहीं पड़ता। उनका विश्वास हैं कि बिहार में आज भी चुनाव जातिगत समीकरण के आधार पर जीता जाता है, और इस समय जाति के समीकरण नीतीश, तेजस्वी और उनके साथ आई पार्टियों के पक्ष में है। इसीलिए, बीजेपी को इस बात की चिंता है कि 2024 के चुनाव में अपनी सीटें कैसे कायम रखी जाएं।

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Why Nitish Kumar ditched BJP and joined hands with RJD

akbNitish Kumar was sworn in as Bihar Chief Minister for a record eighth time on Wednesday, while his new ally, Tejashwi Yadav took oath as Deputy Chief Minister. The seven-party Mahagathbandhan coalition government will be expanded later. Soon after taking oath, Nitish Kumar called for opposition unity, while speaking to reporters.

Nitish Kumar said, “Those who came to power in 2014, will they be victorious in 2024? I would like all (in the opposition) to be united for 2024. I am not a contender for any such post (PM post)”.

The topsy-turvy see-saw political game in Bihar can be gauged from a look at the times Nitish Kumar was sworn in as CM.

Eight-time CM Nitish Kumar was first sworn in as Bihar’s chief minister in 2000, but only for a week, as he could not prove his majority. He was sworn in for the second and third time in 2005 and 2010 respectively, when he completed his full tenures. In 2014, Nitish Kumar resigned as CM, made Jitan Ram Manjhi the chief minister, but returned for the fourth time to take over as CM in February, 2015.

In November the same year, he was sworn in as CM for fifth time after the RJD-led Mahagathbandhan won the assembly elections. Two years later, in July 2017, Nitish Kumar left the Mahagathbandhan and joined hands with NDA, and was sworn in CM for the sixth time. In 2020, Nitish Kumar fought assembly polls as NDA leader and was sworn in as CM for seventh time. Today (August 10), he joined Mahagathbandhan to be sworn in for the eighth time.

The possibility of Nitish Kumar leaving the NDA had become an open secret in recent months. He was unhappy with his ally BJP. On Tuesday, Nitish Kumar changed his political camp within a span of five hours. He called a meeting of his legislators, went to Raj Bhavan, handed over his resignation, and then went straight to RJD chief Tejashwi Yadav’s residence, where he was elected leader of Mahagathbandhan. He again went to Raj Bhavan along with Tejashwi Yadav, Ajit Sharma of Congress and Jeetan Ram Manjhi of HAM party, to stake claim to form a new government. The Governor Phagu Chauhan, on Wednesday administered the oath to both Nitish Kumar and his deputy Tejashwi Yadav. The expansion of cabinet will take place later.

The question that everyone has been asking is: Why Nitish Kumar was unhappy with BJP, which had 77 MLAs, while Nitish’s Janata Dal(United) had 45, and yet, BJP gave him the post of Chief Minister? Nitish Kumar was given a free hand, but why did the relationship sour?

In November, 2020, when the assembly poll results came, Nitish Kumar realized that his ally BJP was the main reason for the defeat of JD(U) candidates in at least 40 seats. BJP was supporting Chirag Paswan silently. Yet, Nitish Kumar became CM with the help of BJP, but from Day One he was trying to explore an escape route. BJP installed Vijay Kumar Sinha on the post of Speaker. This was not to his liking.

Nitish Kumar also felt that BJP was trying to break his party. His suspicion was on his old colleague Ram Chandra Prasad Singh (known as RCP Singh). Nitish Kumar had made RCP Singh the JD-U chief, and the latter was made a Union Minister in Modi’s cabinet. When RCP Singh’s Rajya Sabha term ended, Nitish Kumar denied him party ticket, and then the former revolted. Nitish Kumar suspected that BJP was helping RCP Singh silently.

Home Minister Amit Shah personally went to Patna to remove his doubts, and at a party workers’ meeting openly announced that the next Bihar assembly polls will be fought under the leadership of Nitish Kumar. But the chief minister still had doubts. He then made overtures to RJD leader Tejashwi Yadav, and attended an Iftaar party hosted by Rabri Devi and her son. JD-U leaders openly said that BJP was trying to cut Nitish Kumar to size, which the party workers would never tolerate.

Nitish Kumar’s anger towards BJP became evident the day he stood in the assembly and openly criticized the Speaker Vijay Kumar Sinha. The chief minister and the Speaker had a heated exchange over a probe.

While snapping its ties with BJP, Nitish’s party JD(U) gave the following reasons: (1) Nitish Kumar was not given a free hand (2) his tension with the Speaker, (3) BJP’s secret conspiracies against JD-U (4) BJP using RCP Singh against JD-U (5) using the Chirag Paswan model to divide the party (6) no proportionate representation in Union cabinet (7) Lack of control over BJP ministers in the state (8) Centre’s unwillingness to carry out caste-based census (9) BJP tried to lower JD-U’s image (10) Lack of direct contact with BJP high command.

After rejoining the Mahagathbandhan on Tuesday, Nitish Kumar said, he had the support of 164 MLAs plus an Independent with him in the assembly. “There are seven parties in our Mahagathbandhan. We will work and serve unitedly.”

RJD chief Tejashwi Yadav stood firmly with Nitish Kumar. When reporters pointed out that he had named Nitish Kumar as ‘Paltu Ram’, ‘shameless’, ‘thug’, ‘bahurupiya’, Tejashwi replied: “Chacha se ladhai jhagda hota raha hai. Har pariwaar me jhagde-jhanjhat hote rahte hain’ (Quarrels do take place between uncle and nephew in every family), but this does not mean a third force should take away our legacy. BJP has been making inroads by dividing us and Nitish Kumar has said clearly that he would not allow this.”

Senior BJP leader and former Union Minister Ravi Shankar Prasad replied to Nitish Kumar’s allegations. He said, Nitish Kumar would never have become chief minister, because there was opposition to his name from inside his own party, but BJP offered him the post of CM on a platter. “The Bihar assembly polls were fought in the name of Modi, and despite having half the strength of BJP, Nitish Kumar was made CM. If this is not ingratitude, what is ?”, asked Prasad.

Rural Development Minister Giriraj Singh said, Nitish Kumar has started dreaming of becoming the Prime Minister, but there is ‘no vacancy for the PM post’. “Nitish Kumar is an opportunist and the entire nation is today watching him”, Singh said. There were lots of memes trending on social media lampooning Nitish Kumar for changing his political boat.

To sum up, Nitish Kumar’s problem began the day BJP became a bigger party than JD-U inside the assembly. BJP doubled the number of its seats compared to JD-U. Nitish felt that BJP used Chirag Paswan to cut down his party to size. Nitish Kumar felt sore that there was a time when he used to discuss Bihar issues directly with L. K. Advani and Arun Jaitley, but now the party had deputed Bhupendra Yadav to deal with him. Nitish wanted that Modi should have at least deputed Amit Shah for maintain direct contact with him, but this did not happen.

Nitish is a leader who has a bit of an ego. All these matters troubled him. When RCP Singh was made Union Minister, though he was his choice, Nitish gave the impression that the decision was Amit Shah’s. The impression then went among the party ranks that RCP Singh was a BJP appointee. Nitish Kumar wanted that RCP Singh, as his representative, should be in touch with Amit Shah and J.P. Nadda in Delhi, but this did not happen.

Finally, Nitish Kumar sidelined his old colleague RCP Singh and later expelled him, because he was now convinced that BJP would break his party, and he would face the same fate of Uddhav Thackeray. Nitish would then be without a government and a party. These doubts and suspicions robbed him of a sound sleep and he had no other option, but to join hands with Tejashwi Yadav.

In a nutshell, the government in Bihar has changed only because of Nitish Kumar’s suspicions, because there was no danger to his government. The question that arises now is: Why Tejashwi Yadav installed Nitish Kumar as chief minister, despite having twice the number of MLAs with him? Why did he accept Nitish as his leader and form a government again?

Whatever happened in Patna on Tuesday and Wednesday suited both Nitish Kumar and Tejashwi Yadav. Both were desperate for power. Nitish Kumar is playing his last innings, and Tejashwi’s political innings has just began. Both of them feel that changing political camps, facing corruption charges, or changing one’s political views, does not matter much because in Bihar, elections are won on the basis of caste equations. As of now, the caste equations favour both Nitish and Tejashwi and the alliance parties. Hence, BJP’s worry is how to keep its Lok Sabha seats in Bihar intact in the 2024 general elections.

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योगी की त्वरित कार्रवाई से कैसे घुटनों के बल आया एक छुटभैया नेता

akb full_frame_74900देशव्यापी आक्रोश के बाद यूपी पुलिस की एसटीएफ ने एक छुटभैये नेता श्रीकांत त्यागी को मंगलवार मेरठ से गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकरण से पता चलता है कि भारत के लगभग हर शहर में कैसे पैसा और सियासी ताकत के बल पर छुटभैये नेता अपनी धौंस जमाते हैं। त्यागी ने सोसायटी में रहने वाली एक महिला को गाली दी थी, उसके साथ हाथापाई की थी, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। वीडियो के वायरल होने के बाद स्थानीय पुलिस थाने के SHO सहित 6 पुलिसकर्मियों को ड्यूटी में लापरवाही के लिए सस्पेंड कर दिया गया, और नोएडा अथॉरिटी के साथ-साथ नोएडा पुलिस भी हरकत में आ गई।

पुलिस द्वारा छेड़छाड़ का मामला दर्ज किए जाने के बाद से ही त्यागी 5 अगस्त से फरार था। उस पर धारा 354 (महिला का शील भंग करना और मारपीट करना) के तहत मामला दर्ज किया गया था, और शनिवार को पुलिस द्वारा FIR में और धाराएं जोड़ी गईं। धारा 447 (आपराधिक अतिचार), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) को FIR में जोड़ा गया था।

नोएडा पुलिस ने कहा कि उसने 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, और अब तक त्यागी के 6 गुर्गों को गिरफ्तार किया जा चुका है। ये 6 लोग रविवार की शाम को सोसायटी में गए थे और महिला को धमकाने की कोशिश की थी। गिरफ्तार लोगों की पहचान गाजियाबाद के रहने वाले नितिन त्यागी, लोकेंद्र त्यागी, राहुल त्यागी, चर्चिल राणा, प्रिंस त्यागी और रवि पंडित के रूप में हुई है।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्यागी के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश दिया और राज्य के गृह विभाग से रिपोर्ट मांगई। सोमवार को नोएडा अथॉरिटी ने आवासीय सोसायटी में त्यागी द्वारा कराए गए अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला दिया। त्यागी के खिलाफ गैंगस्टर ऐक्ट के तहत कार्रवाई शुरू कर दी गई है और उसके ठिकाने की जानकारी देने पर 25 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया था, लेकिन मंगलवार की सुबह उसे मेरठ के कंकरखेड़ा के पास श्रद्धापुरी से उसके 3 साथियों के साथ पकड़ लिया गया।

पुलिस ने बताया कि पिछले चार दिनों में त्यागी पहले नोएडा से हरिद्वार भागा, फिर ऋषिकेश गया और सहारनपुर होते हुए मेरठ आ गया। उसकी पत्नी अनु त्यागी को, जिससे नोएडा पुलिस पूछताछ कर रही थी, उसकी गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद रिहा कर दिया गया।

यह पूरा मामला सोशल मीडिया पर एक वीडियो के सामने आने के साथ शुरू हुआ। वीडियो में त्यागी एक महिला को भद्दी गालियां देते हुए और उन्हें धक्का देते हुए नजर आ रहा है। दोनों के बीच बहस तब शुरू हुई जब महिला ने त्यागी को कॉमन एरिया में ताड़ का पेड़ लगाने से रोकने की कोशिश की। त्यागी ने महिला और उसके पति पर गालियों की बौछार करते हुए उन्हें धक्का दिया। त्यागी के पास ग्राउंट फ्लोर अपार्टमेंट है, लेकिन उसने अपने फ्लैट के आसपास अवैध निर्माण करवाकर आसपास की जगह हथिया ली थी। उसने बाहर स्थित पार्क के एक बड़े हिस्से पर भी पेड़ लगाकर कब्जा कर लिया था और जब लोगों ने इसका विरोध किया, तो उसने और उसके समर्थकों ने धमकाना शुरू कर दिया।

कौन है श्रीकांत त्यागी ? नोएडा के भंगेल इलाके में उसके परिवार की पुश्तैनी जमीन थी और जब नोएडा अथॉरिटी ने उसकी ज्यादातर जमीनों का अधिग्रहण किया तो परिवार को ढेर सारा पैसा मिला। परिवार के लोगों ने 80 से ज्यादा दुकानें बनवाईं, और उनके किराए से काफी आमदनी होने लगी। परिवार के पास गाजियाबाद के सिहानी गेट में ननिहाल की भी कई संपत्तियां भी थीं, जहां दुकानें बनवाकर किराए पर चढ़ाई गई थीं। चाचा के बीमार होने के बाद भंगेल का पूरा कारोबार श्रीकांत त्यागी के कंट्रोल में आ गया। भंगेल की अपनी प्रॉपर्टी में उसने अपना एक शानदार दफ्तर बनवाया, बाउंसर तैनात किए और सियासत में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी।

त्यागी ने सियासत की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी जॉइन करके की थी, और बाद में तब वह BSP में रहे स्वामी प्रसाद मौर्य का करीबी हो गया था। जब मौर्य बीएसपी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए, तो त्यागी भी उनके पीछे-पीछे आया और खुद को भाजपा किसान मोर्चा का नेता घोषित कर दिया। हालांकि सोमवार को बीजेपी के किसान मोर्चा ने त्यागी से किसी भी तरह के रिश्ते से इनकार किया। अपने राजनीतिक संपर्कों की मदद से त्यागी को सरकारी गनर भी मिल गए थे और एक समय तो उसके और उसकी पत्नी के साथ 7 गनर रहते थे।

त्यागी अक्सर लखनऊ आता जाता रहता था। उसने राज्य स्तर के नेताओं के साथ दोस्ती की, बड़े-बड़े नेताओं के साथ वीडियो बनवाए और तस्वीरें खिंचवाई, और सोसायटी में अपनी दबंगई दिखाई। नोएडा के सांसद डॉक्टर महेश शर्मा और नोएडा के विधायक पंकज सिंह ने श्रीकांत त्यागी से किसी भी तरह का रिश्ता होने की बात से इनकार किया। महेश शर्मा ओमैक्स सोसायटी भी गए थे और उन्होंने वहां रहने वाले लोगों को भरोसा दिया था कि त्यागी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

इससे पहले त्यागी ने नोएडा सेक्टर 92 में किराए पर एक बंगला लिया था, लेकिन जब उसने खुलेआम दबंगई दिखानी शुरू कर दी तो वहां के लोगों ने इसका विरोध किया। बंगले पर उसने ढेर सारे सिक्योरिटी गार्ड तैनात कर रखे थे, मेटल डिटेक्टर लगवा रखा था और वहां आने वाले हर शख्स को सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता था। त्यागी हमेशा कई गाड़ियों के काफिले के साथ चलता था, और उसके यहां देर रात तक लोगों का आना-जाना लगा रहता था जिससे उसके पड़ोसियों को अक्सर अपनी गाड़ी पार्क करने में दिक्कत होती थी।

त्यागी ने 4 महीने पहले किराए का बंगला खाली कर दिया था और Omaxe Grande आवासीय सोसायटी में रहने आया था, जहां उसने एक ग्राउंड फ्लोर अपार्टमेंट खरीदा था। त्यागी ने जल्द ही ग्राउंड फ्लोर पर अवैध अतिक्रमण शुरू कर दिया। उसने सोसाइटी के बेसमेंट तक में अवैध निर्माण करा रखा था। पार्किंग के लिए बने बेसमेंट से अपने फ्लैट में आने के लिए वह उस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करता था, जिससे सब आते-जाते थे। खुद को VIP जताने के लिए श्रीकांत ने बेसमेंट के रास्ते से सीधे अपने फ्लैट तक आने का रास्ता बनवा रखा था।

यह सोसायटी में रहने वालों के लिए बनाए गए नियमों का साफ उल्लंघन था। त्यागी ने सोसायटी की पार्किंग में भी अपना अवैध कब्जा फैला रखा था। आमतौर पर सोसायटी की तरफ से एक से दो गाड़ियों की पार्किंग दी जाती थी, लेकिन त्यागी सब पर धौंस जमाकर बेसमेंट में अपनी 4-5 गाड़ियां पार्क करता था। वह अपने साथ बाउंसर्स भी रखता था, जिससे अगर सोसाइटी का कोई मेंबर उसे टोके-टाके तो वह उसे धमका सके। सोमवार को अवैध निर्माण के तोड़े जाने के बाद सोसायटी के लोगों ने राहत की सांस ली है।

त्यागी खुद को नोएडा के एक दबंग बीजेपी नेता के तौर पर पेश कर रहा था। वह फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करता था। वह गाड़ियों के बड़े काफिले के साथ चलता था और सुरक्षा कर्मियों से घिरा हुआ रहता था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए उसने अपनी गाड़ियों में सायरन भी लगा रखे थे। वह अपने सिक्यॉरिटी गार्ड्स के साथ इसी सायरन वाली गाड़ी में आता-जाता था। सोसायटी के लोगों ने 3 साल पहले त्यागी द्वारा किए गए अवैध निर्माण की शिकायत की थी। 5 अक्टूबर 2019 को इन लोगों ने नोएडा के SSP को चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद त्यागी को नोटिस भेजा गया था। एक नोटिस त्यागी के फ्लैट पर भी चस्पा किया गया, लेकिन उसकी हरकतों में कोई सुधार नहीं आया।

नोएडा पुलिस ने बताया कि त्यागी के खिलाफ 9 मामले पहले ही दर्ज हैं। इनमें से 8 मामले तो सिर्फ नोएडा फेज 2 थाने से संबंधित हैं, जबकि एक मामला सेक्टर 39 थाने में दर्ज किया गया है। इनमें से ज्यादातर मामलो में त्यागी पर गुंडागर्दी करने, धोखाधड़ी करने जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

श्रीकांत त्यागी किसी स्वयंभू छुटभैये नेता का एक जीता-जागता उदाहरण है। सिर्फ यूपी में नहीं, हर राज्य में ऐसे दबंग होते हैं जो अपने आप को नेता कहते हैं, पर असल में ये किसी बड़े नेता का साया होते हैं। ये किसी एक नेता को पकड़ लेते हैं, उसके लिए कभी भीड़ जुटाने का, कभी चुनाव में दादागीरी करने का, कभी पैसे इकट्ठा करने का काम करते हैं, और बदले में उन्हें प्रोटेक्शन मिलता है। इस प्रोटेक्शन का इस्तेमाल ये लोग आम जनता को डराने-धमकाने के लिए करते हैं।

आमतौर पर लोग ऐसे गुंडों से दूर रहते हैं। अगर वे धमकी दें, डराएं, बेइज्जती कर दें तो शिकायत नहीं करते। लोग सोचते हैं कि ऐसे बदमाशों से कौन झगड़ा मोल ले। लोग जानते हैं कि पुलिस के पास जाने से भी कोई फायदा नहीं होता क्योंकि या तो पुलिस ऐसे लोगों की दोस्त होती है, या पुलिस वाले ही ऐसे लोगों से दुश्मनी करने से बचते हैं। इसका असर यह होता हैकि इन सड़कछाप गुंडों को वैधता मिल जाती है, उनकी हिम्मत बढ़ जाती है, और वे हर तरह के कुकर्म करते हैं।

मैं पूरे यकीन के साथ इतना जरूर कह सकता हूं कि उत्तर प्रदेश में पिछले 5 साल में हालात बेहतर हुए हैं। ऐसे लोगों की संख्या और ताकत पर काफी हद तक लगाम लगी । इसमें मीडिया का भी रोल है और सरकार की भी भूमिका है। श्रीकांत त्यागी का मामला इसका एक उदाहरण है। जब शिकायत हुई तो नोएडा की पुलिस ने तुरंत ऐक्शन लिया, दबाव बनाया और लोगों को भरोसा दिलाया कि ऐसे तत्व अब मनमानी नहीं कर सकते। दादागिरी करने वाले शख्स की अवैध संपत्ति पर बुलडोजर चला, इससे समाज में एक संदेश गया कि ऐसे लोगों को अब राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलता। हालांकि इस बीमारी को समाज से पूरी तरह दूर होने में अभी वक्त लगेगा।

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How timely action by Yogi brought a small-time politician to his knees

AKB30 The arrest of a small-time politician from Noida, Shrikant Tyagi by a special task force of UP Police from Meerut after a nationwide outrage, shows the clout that people with money, political and muscle power wield in almost every city of India. Six policemen, including the SHO of the local police station, were suspended for dereliction of duty, after a video of Tyagi abusing and manhandling a female resident became viral on social media, and Noida police along with Noida Authority swung into action.

Tyagi had been absconding since August 5, after police filed a molestation case against him. He was booked under Section 354 (outraging modesty of woman and assault), and on Saturday, more sections were added to the FIR by police. Section 447 (criminal trespass), section 323 (voluntarily causing hurt), section 504 (intentional insult with intent to breach peace) and section 506 (criminal intimidation) were added to the FIR.

Noida police said, they have booked ten persons and have so far arrested six of Tyagi’s supporters, who entered the housing society on Sunday evening, and created a ruckus by threatening the lady whom Tyagi had manhandled. Those arrested have been identified as Nitin Tyagi, Lokendra Tyagi, Rahul Tyagi, Churchill Rana, Prince Tyagi and Ravi Pandit, all residents of Ghaziabad.

On Monday, bulldozers were used by Noida Authority to raze the illegal constructions made by him in a residential society, after UP chief minister Yogi Adityanath ordered strict action against Tyagi and sought a report from the state home department. Proceedings have been initiated against Tyagi under Gangsters Act and a reward of Rs 25,000 was announced for information about his whereabouts, but on Tuesday morning he was nabbed from Shraddhapuri near Kankarkheda in Meerut, along with his three aides.

Police said, during the four days when he was underground, Tyagi fled from Noida to Haridwar, Rishikesh, Saharanpur and Meerut, before he was nabbed. His wife, Anu Tyagi, who was being questioned by Noida police, was released after report came about his arrest.

The controversy began with the surfacing of a video on social media in which the woman complainant was pushed by Tyagi, as the two argued over planting of palm trees by Tyagi in the common area. Tyagi showered abuses at the woman and her husband and pushed her aside. Tyagi owns the ground floor apartment, but he had encroached a large area outside by making extensions and additions to his flat. He had occupied a portion of the park outside by planting trees, and when other residents objected, he and his supporters intimidated the residents.

Who is Shrikant Tyagi? His family had ancestral land in Bhangel area of Noida, and when Noida Authority acquired most of his land, his family made a fortune. They built a row of more than 80 shops, and earned rent from them. The family also owned several properties from maternal side in Sihani Gate, Ghaziabad, where they built shops and rented them out. After his uncle became old, Shrikant Tyagi took control of the business in Bhangel, opened an office, hired bouncers and started taking interest in politics.

He first joined Bahujan Samaj Party, and got close to BSP leader Swami Prasad Maurya. When Maurya left BSP to join BJP, Tyagi followed suit and proclaimed himself as a leader of BJP Kisan Morcha, though the Morcha on Monday denied any such affiliation. With the help of his political contacts, Tyagi got gunners from state police, and at one point of time, he had seven gunners with him and his wife.

Tyagi frequently visited Lucknow, hobnobbed with state level politicians, got videos and pictures made with top politicians, and showed his clout in the residential society. Noida MP Dr Mahesh Sharma and Noida MLA Pankaj Singh denied that they had any links with Shrikant Tyagi. Dr Mahesh Sharma, who visited the residential society, assured residents that strong action would be taken against Tyagi for his acts.

Earlier, Tyagi took a bungalow in Noida Sector 92 on rent, but the residents opposed when he started to flaunt his clout in public. He had brought private security personnel, put a metal detector, carried out security checks on every person entering the society. He moved with a fleet of cars, and this caused problems for other residents who found it difficult for parking their vehicles.

Tyagi vacated the rented bungalow four months ago, and moved to Omaxe Grande residential complex, where he bought a ground floor apartment. He soon started illegal encroachments both on the ground floor and also broke a wall, to build a personal staircase from his apartment to the basement meant for car parking. This was in clear violation of the guidelines for society residents. Tyagi used to park four to five vehicles in the parking area, though only one or two vehicles were allowed for parking to each resident. Whenever other residents objected, he used his clout to intimidate them. After the illegal constructions were razed on Monday, residents of the society heaved a sigh of relief.

Tyagi’s modus operandi was to project himself as a popular BJP leader in Noida. He used to post pictures and videos with top BJP leaders on Facebook, Twitter and Instagram. There were videos of him moving with a fleet of cars, surrounded by security personnel. Flouting Supreme Court order, his vehicle used a hooter, whenever he moved around. Society residents had complained about illegal constructions made by Tyagi three years ago. On October 5, 2019, society residents had sent a letter to SSP, Noida, after which a notice was sent to Tyagi. A notice was pasted outside his apartment, but he continued with his encroachments.

Noida Police said, there are nine cases filed against Tyagi already. Out of them, eight cases relate to Noida Phase 2 police station, while one case has been filed in Sector 39 police station. Charges of hooliganism and fraud were made in most of these cases.

Shrikant Tyagi is a symbol of the typically vile, self-styled, small-time politician, not only in UP, but in most of the states of India. Such small-time functionaries survive by cultivating closeness to any top politician. They help in arranging crowds for politicians during elections, arm-twist businessmen and traders by collecting money in the name of political parties, and use political patronage to intimidate the general public.

Normally, law abiding citizens prefer to stay away from these musclemen and refrain from filing complaints when they intimidate them. Common citizens know that the local police will show reluctance in filing FIRs because more often than not, policemen have been found hobnobbing with them. Even policemen avoid taking action out of fear of political backlash. As a result, such street-type musclemen gain legitimacy and they get courage to commit illegal acts, like encroachments, land grabbing, molestation, kidnapping, extortion and violence.

I can say, with full confidence, that in the last five years, the situation has changed for the better in UP. The clout of such small-time politicians has been effectively eroded to a large extent. The role of media and government is vital in such a situation. Shrikant Tyagi’s case is one example. When the society residents complained of intimidation, Noida police took immediate action, and assured them that such musclemen cannot have their way. Bulldozers were brought to raze their illegal constructions. By taking such actions, the message has gone across that musclemen will no more get political protection, come what may. However, it may take some more time for the malaise to end in our society.

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क्या भारत में तानाशाही है ? राहुल गांधी से फिर पूछें

अगर मोदी ने चुनावों में धांधली की तो फिर राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस, दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी और बंगाल में टीएमसी कैसे जीती ?

rajat-sirकांग्रेस और बीजेपी के बीच शुक्रवार को जबरदस्त घमासान देखने को मिला। कांग्रेस के नेता महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ काले कपड़े पहनकर सड़कों पर उतरे। कांग्रेस ने इस विरोध प्रदर्शन का ड्रेस कोड ब्लैक रखा था। इसलिए सभी नेताओं से काले कपड़े पहनकर आने को कहा गया था। सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका भी काले कपड़े पहनकर इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं। पार्टी के सीनियर नेता मल्लिकार्जुन खड़गे तो काली लुंगी और काला साफा बांधकर आए थे।

सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कांग्रेस के सभी सांसदों को संसद से राष्ट्रपति भवन तक मार्च करना था लेकिन पुलिस ने उन्हें विजय चौक के पास रोक दिया। यहां कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया गया और किंग्सवे कैंप पुलिस लाइंस ले जाया गया। शाम में पुलिस ने इन नेताओं को छोड़ दिया।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक ग्रुप की आगुवाई पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी कर रहीं थी। इस ग्रुप को अकबर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय से पीएम आवास लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना था लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया और हिरासत में ले लिया। इस बीच प्रियंका गांधी आगे बढ़ीं और वो बैरीकेड्स को क्रॉस करने लगीं। पुलिस की तमाम मिन्नतों के बाद भी प्रियंका ने बैरीकेड्स को पार कर लिया और उसके बाद वह सड़क पर बैठ गईं। जब बातचीत से काम नहीं चला तो पुलिस ने प्रियंका गांधी को दूसरे कांग्रेस कार्यकर्ताओं की तरह उठाकर जबरदस्ती पुलिस की गाड़ी में बैठाया। कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया कि उनके कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस ने धक्कामुक्की और मारपीट की। वहीं दिल्ली पुलिस का कहना था कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कई पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की जिससे वे जख्मी हो गए।

विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से पहले राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें उन्होंने मोदी सरकार पर लोकतंत्र को खत्म करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आज हिंदुस्तान में लोकतंत्र की मौत हो रही है। पिछले 70 वर्षों में जिस लोकतंत्र की इमारत एक-एक ईंट रखकर खड़ी की गई थी उसे ध्वस्त किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष को उन सरकारी एजेंसियों के द्वारा निशाना बनाया जा रहा है जिस पर बीजेपी और आरएसएस का कंट्रोल है।

राहुल गांधी ने कहा कि पूरा भारत इस बात को जानता है कि जो कोई भी विरोध में आवाज उठाता है उसे सरकार प्रताड़ित करती है। उसे गिरफ्तार जा रहा है, जेल में डाल दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिटलर भी चुनाव जीतता था। क्योंकि उसने सभी संस्थानों पर कब्जा कर रखा था। राहुल गांधी ने मीडिया से कहा,’आप मुझे सारी संस्थाएं दे दीजिए, फिर बताउंगा कि चुनाव कैसे जीतते हैं।’

प्रियंका गांधी और अशोक गहलोत समेत कई नेता सिलेंडर के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। एक तरफ नेता गैस सिलेंडर लेकर चल रहे थे तो दूसरी तरफ 24 अकबर रोड के सामने कांग्रेस की कार्यकर्ताओं ने सड़क पर ईंट के चूल्हे बना दिए और वहां खाना बनाना शुरू कर दिया। कांग्रेस के नेताओं का कहना था कि गैस के दाम इतने बढ़ा दिए कि लोगों को मजबूरी में फिर चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। सब्जियां और तेल इतना मंहगा है कि अब सब्जी पानी में पकानी पड़ रही है।

बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा- ‘पूरा देश जानता है कि 1975 में इमरजेंसी के दौरान तानाशाही किसने थोपी थी।’संसदीय कार्य मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा, ‘राहुल गांधी को खुद अपनी पार्टी को देखना चाहिए जो एक परिवार की संपत्ति बनकर रह गई है।’

बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा, राहुल शायद भूल गए कि इमरजेंसी के दौरान पत्रकारों और संपादकों को सलाखों के पीछे उनकी दादी इंदिरा गांधी ने डाला था। उन्होंने कहा-‘कांग्रेस अब आम जनता का समर्थन खो चुकी है, लोगों ने कांग्रेस को वोट देना बंद कर दिया है, इसलिए राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि अब लोकतंत्र का अंत हो गया है।’ केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, ‘यह कांग्रेस ही थी जिसने अपने 60 साल लंबे शासन के दौरान सभी संस्थानों पर कब्जा कर रखा था।’

मोदी सरकार के खिलाफ राहुल गांधी की शुक्रवार को की गई टिप्पणी से उनके दृष्टिकोण का पता चलता है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिटलर भी चुनाव जीतता था, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि मोदी के आठ साल के शासन में पंचायतों से लेकर संसद तक के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष रहे हैं, हालांकि अधिकांश चुनावों में कांग्रेस हार गई। क्या यह कहना उचित है कि अगर कांग्रेस चुनाव जीतने में विफल रहती है तो तानाशाही है?

देश में नरेन्द्र मोदी की सरकार के वक्त ही राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए और वहां कांग्रेस की सरकार बनी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने सरकार बनाई। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की सरकार दो-दो बार बनी। पंजाब में कांग्रेस की हार हुई और आम आदमी पार्टी की सरकार बन गई। क्या ये सारे चुनाव लोकतान्त्रिक तरीके से नहीं हुए? अपनी पार्टी की हार होने पर देश में तानाशाही की बात कहना, लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ परंपरा नहीं है।

राहुल की जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया वो थी जब उन्होंने कहा कि उन्हें चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या चाहिए। इस तरह की टिप्पणी को किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता। तीसरी बात उन्होंने ये कही कि आरएसएस के लोग सब जगह बैठे हैं। ऐसी बातों का ना तो कोई प्रमाण है और ना इसमें कोई सच्चाई। ऐसी बातों से ही राहुल गांधी की विश्वसनीयता कम होती है, लोगों का उनपर भरोसा कम होता है। राहुल गांधी ने जो बातें कहीं वो राजनीतिक हमले नहीं थे। उनमें मोदी के प्रति व्यक्तिगत नफरत दिख रही थी।

लेकिन शुक्रवार शाम को अमित शाह और सीएम योगी ने कांग्रेस को जो सियासी जवाब दिया, उसका जबाव देना कांग्रेस को मुश्किल दिख रहा है। कांग्रेस के सभी नेताओं को मालूम था कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का काम 5 अगस्त को शुरू हुआ था उसके बाद भी 5 अगस्त को काले कपड़े पहन कर पूरे देश में प्रदर्शन का फैसला राहुल गांधी ने क्यों किया ? अमित शाह ने इसी बात को पकड़ लिया। उन्होंने कहा-‘कांग्रेस ने जानबूझकर 5 अगस्त का दिन प्रदर्शन के लिए चुना, काले कपड़े पहने और ये दिखाने की कोशिश की कि कांग्रेस अब भी राम मंदिर के खिलाफ है। अमित शाह ने कहा कि तुष्टिकरण के चक्कर में कांग्रेस की ऐसी दुर्दशा हुई है, फिर भी कांग्रेस सबक सीखने को तैयार नहीं है। ईडी की छापेमारी और महंगाई तो महज बहाना था, कांग्रेस का असली दर्द राम मंदिर निर्माण को लेकर है।’

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘5 अगस्त हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है क्योंकि इस दिन राम जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन हुआ था।’ योगी ने कहा, ‘इस दिन काले कपड़े पहनकर विरोध प्रदर्शन भगवान राम के सभी भक्तों और मंदिर के पक्ष में अपना फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट का अपमान है।’अब कांग्रेस अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की गुगली में फंस कर रह गई।

ले-देकर कांग्रेस की तरफ से पवन खेड़ा ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा-‘कांग्रेस ने सवाल महंगाई, GST, बेरोज़गारी पर पूछे और बीजेपी ने जवाब में फिर वही मंदिर-मस्जिद कर दिया। लगता है जनता के सवाल साहिब के पाठ्यक्रम से बाहर के हैं।’ लेकिन अमित शाह और योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस से राम मंदिर को लेकर जो सवाल पूछे उसका जवाब तो कांग्रेस को देना होगा।

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Is India a dictatorship ? Ask Rahul Again!

If elections were rigged by Modi, how Congress won Rajasthan, Chhatisgarh, AAP Delhi, Punjab and TMC Bengal?

rajat-sirCongress leaders and workers came out in full force on the streets on Friday to stage protests over rising prices and unemployment. Most of them wore black dress to observe ‘Black Friday’ as per instructions from party leadership. Congress interim president Sonia Gandhi, her son Rahul Gandhi and daughter Priyanka joined the protests wearing black dress. Senior party leader Mallikarjun Kharge wore a black ‘lungi’ and black ‘pagri’.

From Parliament, Sonia Gandhi, along with Rahul and all Congress MPs marched to Rashtrapati Bhawan, but were stopped by police at Vijay Chowk, where they were detained and taken to Kingsway Camp Police Lines. They were released in the evening.

Another group of Congress workers led by party general secretary Priyanka Gandhi marched from party HQ on Akbar Road towards the Prime Minister’s residence on Lok Kalyan Marg, but were stopped and detained by police. There was drama when Priyanka tried to scale the police barricades and scuffled with police personnel, before she was pushed into a waiting police vehicle. While Congress leaders alleged that many of them were shoved and manhandled by police, Delhi Police said, several police personnel were manhandled and injured by Congress workers.

Before joining the protest, Rahul Gandhi while addressing a press conference, alleged that the Modi government was dismantling the edifice of democracy in India, which had been built brick by brick over the last 70 years. The opposition, he alleged, was being systematically targeted by law enforcement agencies, which, he said, were being controlled by BJP and RSS.

Rahul Gandhi said, the whole of India knows this, and anybody who raises the voice of dissent, is being persecuted by the government, put in jail, arrested and beaten up. Hitler, he said, also came to power after winning elections because most of the institutions were under his control. “You give me the entire institutional establishment, and I will show you how elections are won”, Rahul Gandhi told the media.

Priyanka Gandhi along with Rajasthan CM Ashok Gehlot and other party leaders took LPG cylinders on the streets to highlight the steep rise in the price of LPG. At one place outside the Congress HQ , some women activists started cooking rotis on a makeshift fireplace made of bricks.

BJP leaders hit out at Rahul Gandhi saying “the entire nation knows who imposed dictatorship in 1975 during Emergency. Parliamentary Affairs Minister Pralhad Joshi said, Rahul should look at his own party which has become the property of a dynasty.

BJP leader Ravi Shankar Prasad said, Rahul probably forgot that it was her grandmother Indira Gandhi who put top journalists and editors behind bars during Emergency. “Congress”, he said “has now lost the support of common people, the common man has stopped voting for Congress and that is why Rahul Gandhi is alleging that it is now the end of democracy.” Union Minister Giriraj Singh said, it was the Congress which took over control of all institutions during its 60 years-long-rule.

Rahul Gandhi’s remarks against Modi government on Friday reveals his outlook. He alleged that even Hitler used to win elections, but he should know that elections from panchayats to Parliament during the eight years of Modi’s rule have been free and fair, though in most of the polls the Congress lost. Is it justified to say there is dictatorship, if Congress fails to win elections?

During Modi’s rule, Congress won assembly elections in Rajasthan and Chhattisgarh and formed governments, Mamata Banerjee won elections in West Bengal and got a third term, Arvind Kejriwal won elections and formed his government in Delhi twice, Congress lost in Punjab and AAP swept to power. Where these elections a fraud committed on the people? Were these elections not held democratically? To blame dictatorship for the electoral debacle of his own party is not a healthy tradition in democracy.

Rahul’s remark that he needed the state machinery to win elections is indeed surprising. Such remarks cannot be justified in a healthy democracy. Thirdly, he alleged that RSS supporters were sitting in all major posts of state machinery, but he did not placed a shred of evidence to substantiate his allegation. By making such unfounded allegations, Rahul is eroding his own credibility, and losing the trust of people. Rahul Gandhi’s caustic remarks were not political, but displayed his personal hatred towards Modi.

By Friday evening, Home Minister Amit Shah and UP chief minister Yogi Adityanath gave a political reply, to which the Congress may find it difficult to respond. Amit Shah said, Congress chose the date August 5 for protest and wore black clothes because it wanted to give a subtle message in favour of appeasement politics on a day when Prime Minister Narendra Modi laid the foundation stone of Ram temple in Ayodhya. “ED raids and price rise were mere excuses, Congress’ real pain is about the construction of Ram temple. Today, Congress took one step further and its workers wore black clothes to stage protest”, Amit Shah said.

UP CM Yogi Adityanath said, August 5 is a day of pride for every Indian because on this day worship of Lord Shri Ram began at Ram Janmabhoomi for construction of Ram temple. “The protest by wearing black clothes on this day is a deliberate insult to all ‘bhakts’ of Lord Ram and the Supreme Court which gave its verdict in favour of the temple”, Yogi said.

It was left to Congress spokesman Pawan Khera to tweet that when the party raised issues of price rise and unemployment, BJP replied by raising temple-mosque issue. Congress leaders will have to give a cogent reply to the questions raised by Amit Shah and Yogi Adityanath.

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नेशनल हेराल्ड केस की ED जांच को लेकर कांग्रेस परेशान क्यों है ?

akb fullनेशनल हेराल्ड मामले को लेकर गुरुवार को संसद में कांग्रेस और बीजेपी के बीच जमकर वार-पलटवार हुआ । कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ED द्वारा पूछताछ और तलाशी को ‘डराने-धमकाने’ की रणनीति का हिस्सा बताया और कहा कि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी से नहीं डरती। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि ED के अधिकारियों ने दिल्ली में हेराल्ड हाउस के उस हिस्से को सील कर दिया है, जहां से अखबार निकाला जा रहा था, लेकिन ईडी के सूत्रों ने कहा कि कंपनी से जुड़े किसी भी शख्स के मौजूद न होने के चलते सिर्फ यंग इंडियन के दफ्तर में ताला लगाया गया था।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि इस समय जबकि संसद का सत्र चल रहा है, ED उन्हें समन कैसे जारी कर सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है। वाणिज्य मंत्री और सदन के नेता पीयूष गोयल ने जवाब दिया कि सरकार कानून प्रवर्तन अधिकारियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करती है। गोयल ने कहा, ‘शायद उनके (कांग्रेस) शासन में, ऐसा हुआ करता था। अब अगर कोई कुछ गलत करता है तो एजेंसियां अपना काम करेंगी। अगर किसी नेता को तलब किया गया है तो उसे जाना चाहिए. कानून सबके लिए बराबर है।’

खड़गे ने राज्यसभा में यह नहीं बताया कि उन्हें ईडी ने पूछताछ के लिए नहीं बुलाया था। चूंकि वह यंग इंडियन लिमिटेड के CEO थे, जिसके पास एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड का मालिकाना हक है, इसलिए उन्हें हेराल्ड हाउस में बुलाया गया था ताकि ED के अधिकारी उनकी मोजूदगी में अपनी तलाशी जारी रख सकें।

दूसरी बात, यंग इंडियन के दफ्तर को सील नहीं किया गया था। असल में हेराल्ड हाउस में उस समय कंपनी से जुड़ा कोई शख्स मौजूद नहीं था, इसलिए ED ने रिकॉर्ड्स और दस्तावेज सुरक्षित रखने के लिए ऑफिस में ताला लगा दिया था। यंग इंडियन कंपनी के CEO होने के नाते खड़गे को ED ने हेराल्ड हाउस बुलाया था। संसद से खड्गे सीधे हेराल्ड हाउस गए, ताला खोला गया और उनकी मौजूदगी में करीब 7 घंटे तक तलाशी चलती रही। इसके बाद खड़गे वापस लौट आए। ED के अधिकारियों ने उन्हें तलाशी के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज दिखाए।

संसद के बाहर राहुल गांधी ने पत्रकारों को बताया, ‘ये धमकाने की कोशिश है। ये सोचते हैं कि थोड़ा सा दबाव डालकर हमें चुप करा देंगे, लेकिन हम चुप नहीं होने वाले हैं। नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह जी इस देश में लोकतंत्र के खिलाफ जो कर रहे हैं उसके विरूद्ध हम खड़े रहेंगे, चाहे ये कुछ भी कर लें। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, हम डरने वाले नहीं हैं। हम नरेंद्र मोदी से नहीं डरते हैं। कर लें जो करना है। कुछ फर्क नहीं पड़ता। मेरा काम है देश की रक्षा करना, लोकतंत्र की रक्षा करना, देश में सद्भाव को बरकरार रखना, वह मैं करता रहूंगा।’

मौका कोई भी हो, मुद्दा कोई भी हो, जगह कोई भी हो, राहुल गांधी का एक डायलॉग फिक्स है, ‘मैं मोदी से नहीं डरता, मोदी मुझे नहीं डरा सकते।’ लेकिन मुझे लगता है कि जिस तरह राहुल गांधी अपना कर्नाटक दौरा बीच में छोडकर दिल्ली पहुंचे, वह कुछ और ही कहानी बयां करता है। कांग्रेस के नेता परेशान दिख रहे हैं और उनका डर साफ नजर आ रहा है।

मैंने कई अफसरों, नेताओं और कंपनी ऐक्ट एवं फाइनेंशल मुद्दों के एक्सपर्ट्स से बात की। मैंने राहुल और सोनिया गांधी के मालिकाना हक वाली यंग इंडियन कंपनी की संपत्तियों की जांच के लिए अलग-अलग शहरों में रिपोर्टर भेजे ।

इससे मुझे कई सवालों के जबाव मिल गए। एक बड़ा सवाल यह है कि नेशनल हेराल्ड अखबार कांग्रेस का था, कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कांग्रेस की थी, पार्टी ने अपनी ही कंपनी को कर्ज दिया, लेकिन उस कर्ज की वसूली के लिए दूसरी कंपनी बनाने की क्या जरूरत थी?

दूसरा सवाल यह है कि क्या वाकई में नेशनल हेराल्ड की हालत ऐसी थी कि उसे कर्ज़ लेना पड़ा, वह भी ऐसे समय में जब उसके पास तमाम शहरों में करोड़ों की संपत्तियां थीं? क्या वाकई में नेशनल हेराल्ड की हालत ऐसी नहीं थी कि वह 90 करोड़ रुपये का लोन वापस करने की हैसियत रखता था?

नेशनल हेराल्ड के स्वामित्व वाली संपत्तियों की हालत जांचने के लिए मैंने अपने रिपोर्टर्स को लखनऊ, भोपाल, मुंबई और पंचकूला भेजा। उन्होंने पाया कि अभी भी नेशनल हेराल्ड के पास सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्तियां हैं।

हमारे संवाददाता अनुराग अमिताभ ने बताया कि भोपाल में नेशनल हेराल्ड के नाम पर जो जमीन AJL को एलॉट की गई थी, उस जमीन पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाकर दुकानें बेच दी गईं। असल में भोपाल के एमपी नगर प्रेस कॉम्प्लेक्स में 1981 में नेशनल हेराल्ड को एक रुपये प्रति स्क्वेयर फीट के हिसाब से एक एकड़ से ज्यादा जमीन 30 साल की लीज पर दी गई थी।

2011 में लीज खत्म होनी थी लेकिन इससे पहले ही इस प्लॉट पर एक कमर्शल कॉम्प्लेक्स बनाकर दुकानें बेच दी गईं। लीज रद्द कर प्रॉपर्टी को कब्जे में लेने की कार्रवाई शुरू हुई तो नेशनल हेराल्ड के साथ-साथ वे दुकानदार भी कोर्ट चले गए, जिन्होंने यहां दुकानें खरीदी हैं, और मामला फिलहाल कोर्ट में है। भोपाल में नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज का पब्लिकेशन 1992 में ही बंद हो गया। पिछले 30 साल से अखबार तो नहीं छपा लेकिन अखबार छापने के लिए बनी प्रॉपर्टी पर AJL का कब्जा बरकरार रहा।

मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश सारंग ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने राज्य सरकार और आम लोगों, दोनों को गुमराह किया है। राज्य के शहरी विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कहा, कांग्रेस ने लीज एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन किया है और कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि इसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।

कांग्रेस सांसद विवेक तनखा ने कहा कि शायद ही कोई मीडिया हाउस होगा जिसने सरकार से मिली जमीन पर बनी प्रॉपर्टी को किराये पर नहीं दिया होगा, उसका व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं किया होगा। उन्होंने कहा, ‘इसमें कुछ भी गलत नहीं है। नेशनल हेरल्ड को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि सराकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को बेवजह परेशान करना चाहती है, और कुछ नहीं।’

यह बात सही है कि अखबारों को राज्य सरकारों से जो जमीन मिलती है, उस पर वे बिल्डिंग बनाते हैं और उसका कुछ हिस्सा किराये पर देते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं हैं क्योंकि अखबार निकालना आसान नहीं है, उसे चलाना मुश्किल है। इसलिए अगर प्रॉप्रटी के व्यावसायिक इस्तेमाल से अखबार चलाने में मदद मिलती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन पहली शर्त यह है कि अखबार निकलना चाहिए, अखबार छपना चाहिए, लोगों के पास पहुंचना चाहिए। भोपाल में तो नेशनल हेराल्ड और नवजीवन का पब्लिकेशन 1992 में ही बंद हो गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि किसके फायदे के लिए प्रॉपर्टी को शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाकर बेचा गया? जो पैसा मिला था, वह कहां गया?

ऐसा नहीं है कि प्रॉपर्टी सिर्फ भोपाल में बेची गई, आपको मुंबई की तस्वीर दिखाता हूं। मुंबई में नेशनल हेराल्ड अखबार के लिए प्राइम लोकेशन बांद्रा ईस्ट में जमीन दी गई थी। यह जमीन वेस्टर्न एक्सप्रेसवे के पास है। 1983 में महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी, और सूबे के मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने यह जमीन अलॉट की थी। आज की तारीख में इस जमीन की कीमत 300 करोड़ रुपये से ज्यादा है। अब इस जमीन पर एक बड़ी बिल्डिंग बनकर तैयार है और इस पूरी प्रॉपर्टी की कीमत 500 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इस प्रॉप्रटी 2 फ्लोर किराये पर दिए गए हैं, और बाकी के फ्लोर के लिए किराएदार ढूंढे जा रहे हैं।

बांद्रा ईस्ट में यह जमीन नेशनल हेराल्ड के नाम पर मिली थी, लेकिन अखबार का यहां भी कोई नामोनिशान नहीं है। वहीं दूसरी ओर कंपनी को हर महीने करीब 15 लाख रुपये किराया मिल रहा है। किराये की कैलकुलेशन 5,000 रुपये प्रति स्क्वेयर फुट की दर से की गई है, और हर फ्लोर का कार्पेट एरिया 6,500 स्क्वेयर फुट है। AJL कंपनी ने एक मल्टीनेशनल कंपनी JLL रियल एस्टेट को इस बिल्डिंग को किराये पर उठाने का ठेका दिया है। बिल्डिंग के बाहर इस ‘किराये के लिए उपलब्ध’ का बोर्ड लगा था, लेकिन जैसे ही इंडिया टीवी की कैमरा टीम बिल्डिंग से सामने पहुंची, कुछ लोग आए और बोर्ड को हटा दिया।

जिस कंपनी के पास 500 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी सिर्फ मुंबई में हो, 90 करोड़ रुपये का लोन न चुकाने की एवज में उस कंपनी की सारी प्रॉपर्टी को दूसरी कंपनी के हवाले कर दिया जाए जिसमें 76 फीसदी शेयर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास हैं, तो इसे क्या कहेंगे?

लखनऊ में हेराल्ड हाउस है, जिसमें एक बड़ा-सा शॉपिंग कॉप्लैक्स भी बना, लेकिन इसकी सारी दुकानें बिक पाती या किराए पर दी जातीं, इससे पहले ही मामला बिगड़ गया। लखनऊ के कैसरबाग इलाके से ही 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज अखबार का पब्लिकेशन शुरू किया। 1999 तक अखबार निकलते रहे, लेकिन इसके बाद इन तीनों अखबारों का छपना बंद हो गया। यानी करीब 23 साल से अखबार नहीं छप रहा है। हमारी संवाददाता रुचि कुमार लखनऊ के हेराल्ड हाउस कॉम्प्लैक्स में गईं, जहां प्रशासन ने काम रुकवा दिया था। अब इस शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की हालत खराब है। कॉम्प्लेक्स में 6 अन्य दुकानों के साथ एक बीयर की दुकान भी खोली गई है।

हमारी रिपोर्टर ने दुकान के मालिकों से बात की। दुकानदारों ने बताया कि उन्होंने 2007 में AJL से दुकानें खरीदी थीं और कंपनी के चेयरमैन मोतीलाल वोरा थे। उन्हीं के अथॉरिटी लेटर से दुकान की रजिस्ट्री हुई। कुछ दुकानदार ऐसे भी थे जिन्होंने किराए पर दुकानें ली थीं। उनका भी कहा है कि दुकान का किराया सीधे AJL के बैंक अकाउंट में जाता है। कांग्रेस के नेता प्रमोद तिवारी ने कहा, ‘आज कौन-सी कंपनी है जो अपनी बिल्डिंग से सिर्फ अखबार निकालती है? अखबार चलाना बहुत महंगा काम है। अगर आय के अतिरिक्त साधन न हों तो अखबार निकालना मुश्किल हो जाएगा।’

ये तीनों अखबार पिछले 23 साल से नहीं छप रहे, लेकिन अखबार को चलाने के लिए दुकानें बनाकर बेचने, उन्हें किराए पर देने को कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है? अखबार तो 1999 में प्रिंट होना बंद हो गया, और दुकानें 2007 में बेची गईं। पैसा किसकी जेब में गया?

2005 में जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने पंचकूला के सेक्टर-6 में ‘द एसोसिएट जर्नल लिमिटेड’ को करीब 3,500 स्क्वेयर मीटर का प्लॉट दिया था। यह एक पॉश लोकेशन है, इसके सामने पुलिस हैडक्वार्टर है। यहां शानदार बिल्डिंग बनी है, लेकिन यहां एक भी अखबार नहीं छपता। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि उनकी सरकार इस मामले की जांच करवाएगी।

अब हम सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं कि AJL की संपत्ति सोनिया और राहुल गांधी के स्वामित्व वाली यंग इंडियन को कैसे दी गई। एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड यानी कि AJL को 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेरल्ड नाम का अखबार चलाने के लिए बनाया था। 1999 से लेकर 2008 के नेशनल हेरल्ड के सारे पब्लिकेशन भारी घाटे की वजह से बंद हो गए। कांग्रेस, जो कि तब केंद्र में सत्ता में थी, ने इसे चलाने की कोशिश शुरू की। पता चला कि कांग्रेस ने AJL को 90 करोड़ रुपया का लोन दिया हुआ था, और वह चुका नहीं सकी। इसके बाद AJL ने अपने सारे शेयर यंग इंडियन कंपनी को 50 लाख रुपये में बेच दिए। यंग इंडियन AJL से जुड़ी 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की प्रॉपर्टी का मालिक बन गया।

जब कांग्रेस के नेताओं से सवाल पूछे गए तो उन्होंने बड़ा सीधा-सा जवाब दिया। AJL और यंग इंडियन के बीच जो डीलिंग हुई, जो भी ट्रांजैक्शन हुए, उनकी जानकारी सिर्फ मोतीलाल वोरा के पास थी। अब मोतीलाल वोरा दुनिया में रहे नहीं तो कौन किसको क्या बताए। कांग्रेस के तरफ से दूसरी बात यह कही गई कि यंग इंडियन तो सेक्शन 25 की नो प्रॉफिट कंपनी है, इससे सोनिया गांधी और राहुल गांधी को एक रुपये का भी फायदा नहीं हुआ।

इस पर सवाल उठा कि अगर कोई फायदा नहीं था तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने कंपनी बनाई क्यों? अगर बनाई भी तो नेशनल हेरल्ड की मिल्कियत क्यों ली? अगर नेशनल हेरल्ड के पास अलग-अलग शहरो में 3,000 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी है तो इस ट्रांजैक्शन से किसका फायदा होगा? जानकार कहते हैं कि जिनके पास शेयर होंगे, प्रॉपर्टी का कंट्रोल भी उन्हीं के पास होगा। अगर कंट्रोल यंग इंडियन के पास है और इसके 76 फीसदी शेयर राहुल और सोनिया गांधी के पास हैं, तो फिर फायदा किसका होगा? ये सारी बातें जांच का विषय है।

व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि आजादी की लड़ाई लड़ने वाले प्रमुख राजनीतिक दल होने के नाते, और देश पर 60 साल तक राज करने के नाते कांग्रेस को कंपनी खरीदने, उधार देने जैसे काम करने की कोई जरूरत नहीं थी। यह सब एक राजनीतिक पार्टी का काम नहीं है। अब न मोतीलाल वोरा रहे, और न ऑस्कर फर्नांडीज, इसीलिए सोनिया और राहुल गांधी पर इतने सारे सवाल खड़े हुए जिनका जवाब कांग्रेस को देना है।

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