संसद में आज पेपर लीक को रोकने के लिए लाये गए बिल पर बहस शुरू हो गई. प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने बहस शुरू करते हुए साफ कहा कि सार्वजनिक परीक्षा में पेपर लीक करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.
जितेंद्र सिंह ने कहा कि दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये गए हैं ताकि अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा मिल सके. ख़ास बात ये है कि ये नया क़ानून सिर्फ़ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की परीक्षाओं पर ही नहीं, बल्कि, UPSC, SSC, रेलवे, सरकारी बैंकों और केंद्र सरकार की तमाम भर्ती परीक्षाओं पर भी लागू होगा. पेपर लीक के दोषी को पांच से दस साल तक क़ैद की सज़ा होगी और उस पर 50 लाख रु. तक का जुर्माना लगेगा.
पेपर लीक में कोई गिरोह लिप्त पाया गया तो गिरोह के लोगों को सात से दस साल क़ैद की सज़ा होगी और 10 करोड़ रु. तक का जुर्माना लगाया जाएगा. अगर बायोमेट्रिक चेकिंग, प्रश्नपत्र ले जाने जैसी सेवाएं देने वाली कंपनियां पेपर लीक में शामिल पाई गई तो उनको पांच से दस साल क़ैद की सज़ा होगी और पांच करोड़ रुपए तक का जुर्माना भी लगेगा.
नए कानून के तहत जांच एजेंसी को दो महीने में जांच पूरी करनी होगी, फास्ट ट्रैक कोर्ट को तीन महीने में मामले की सुनवाई पूरी करनी होगी, फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को तीस दिन के भीतर हाईकोर्ट में चैलेंज किया जा सकेगा और हाईकोर्ट को भी तीन महीने में अपना फ़ैसला सुनाना होगा. यानी अब “तारीख पर तारीख” वाला सिस्टम खत्म होगा.
जो लोग ये कह रहे हैं कि नए कानून की क्या जरूरत है, वो दो दिन पहले तक ये कह रहे थे कि पेपर लीक के खिलाफ कानून कमजोर है. जो लोग पेपर लीक में पकड़े जाते हैं, उन्हें आसानी से बेल मिल जाती है, लंबे वक्त तक कोर्ट में केस चलते रहते हैं, न फैसला आता है, न अपराधियों को सजा मिलती है. ये बात सही भी थी. अब सरकार ने कानून में बदलाव करने की पहल की है. .पेपर लीक के आरोपियों को आसानी से बेल नहीं मिलेगी. छह महीने के भीतर फाइनल फैसला हो जाएगा. सजा की अवधि और जुर्माने की राशि भी बढ़ाई गई है.
अगर विपक्षी दलों को लगता है कि नए कानून में कुछ और कड़े प्रावधान होने चाहिए तो उन्हें सुझाव देने चाहिए. सरकार भी दबाव में है. परीक्षा प्रणाली को लीक प्रूफ बनाने के लिए इन्फोसिस के co-founder नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स बनाया गया है. इस टास्क फोर्स का काम एक foolproof सिस्टम बनाने के लिए सुझाव देना है. ये परीक्षा प्रणाली में सुधारों के साथ साथ सरकारी भर्ती प्रणाली में सुधार के उपाय भी सुझाएगी.
ये सही है कि छात्रों के आंदोलन ने सरकार को जगाया. परीक्षा प्रणाली को foolproof बनाने के लिए नया कानून भी आया. Task Force भी बनाया गया जिसकी सूझबूझ पर भरोसा किया जा सकता है. लेकिन विरोधी दलों की तरफ से सारा झगड़ा खुद को सरकार से ज्यादा श्रेष्ठ साबित करना है. विपक्ष के नेताओं को लगता है कि उन्होंने इतना शोर मचाया, इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ और सरकार इसमें से निकल गई, अब वापस झमेला कैसे खड़ा किया जाए ?
अगर बिल पर बहस होगी, अगर टास्क फोर्स अपना काम करेगा तो कहीं सरकार को श्रेय न मिल जाए. इसलिए कोई न कोई बहाना ढूंढ कर सरकार को घेरने की कोशिश हुई, लेकिन इस चक्कर में अच्छी बात ये है कि एक चूकरहित परीक्षा प्रणाली बन जाएगी और पेपर लीक करने वाले माफिया के दिलोदिमाग में कानून का डर पैदा होगा. इस समय छात्रों और उनके मां-बाप को ये भरोसा दिलाना जरूरी है कि हमारे देश में एक सिस्टम से काम होता है और सरकार उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील है.
रही बात छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों की. पिछले हफ्ते जब “आज की बात” में पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे मुझ से बात कर रहे थे तो उन्होंने कहा था कि 45 साल के करियर में उन्होंने एक भी ऐसा केस नहीं देखा, जहां किसी आंदोलन करने वाले को सज़ा हुई हो. हरीश साल्वे की ये बात सही है. छात्र जीवन में मैंने कई आंदोलनों में हिस्सा लिया है, केस भी बने, पर आखिर में सारे मामले वापस ले लिए गए. इसलिए इस बार भी न तो कोई FIR बचेगी, न कोई केस चलेगा. ये सामान्य बात है. प्रोसेस पूरा होने में समय लग सकता है लेकिन आंदोलन करने वाले हमेशा निकल जाते हैं, पुलिस छोड़ देती है.
