Rajat Sharma

SIR : क्या अब सुप्रीम कोर्ट पर भी उंगली उठाई जाएगी?

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (SIR) को लेकर बहुत सारी बातें साफ कर दीं. पहले बिहार चुनाव के समय और फिर बंगाल चुनाव के दौरान SIR को लेकर चुनाव आयोग पर जबरदस्त हमले किए गए.

   चुनाव आयोग को ‘बिका हुआ’, ‘बीजेपी का दलाल’, ‘केन्द्र सरकार की कठपुतली’, न जाने क्या-क्या कहा गया लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, उसके बाद विपक्षी INDIA गठबंधन के नेताओं को सांप सूंघ गया.

  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए वोटर लिस्ट का शुद्धीकरण जरूरी है और ये आयोग की जिम्मेदारी है. इसलिए SIR करवा कर आयोग ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन किया है.

  सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता पर फैसला नहीं कर सकता और SIR का नागरिकता से कोई संबंध नहीं है.

   चूंकि बार-बार ये आरोप लगाया गया था कि SIR के बहाने चुनाव आयोग बड़े पैमाने पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट रहा है, ये विरोधी दलों को चुनाव में हराने की साजिश है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटे, उन्हें पूरा मौका दिया गया, नियमों के दायरे में रहकर ही चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट से नाम काटे.

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बीजेपी ने कांग्रेस के मुंह पर तमाचा कहा. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए SIR ज़रूरी है.

   यहां मैं बता दूं कि भारत-बांग्लादेश के हाकिमपुर बॉर्डर चेकपोस्ट पर बैठे बांग्लादेशियों ने जो बातें बताईं, उन्हें सुन कर साफ लगता है कि SIR क्यों ज़रूरी था.

बांग्लादेशी घुसपैठियों ने हैरान करने वाले खुलासे किये, कहा, वो बांग्लादेशी हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में वोट डालते थे, सीमा पार करके भारत में घुसे थे लेकिन उनके पास आधार कार्ड, पैन नंबर,  वोटर कार्ड भी है.

    जब पूछा गया कि आपके पास सब कुछ है तो वापस क्यों जा रहे हो, तो बताया कि SIR के चक्कर में सब गड़बड़ हो गई, वोटर लिस्ट से नाम कट गया, अब पकड़े जाने का डर है, इसलिए मजबूरी में अपने मुल्क लौट रहे हैं.

   एक बांग्लादेशी महिला महफूज़ा खातून ने बताया कि उसने पिछले कई चुनावों में ममता बनर्जी की पार्टी को वोट दिया, उन्हें बंगाल में सरकार की सारी योजनाओं के फायदे भी मिल रहे थे लेकिन बंगाल में सरकार बदली तो हालात बदल गए हैं.

    महफूजा खातून के बेटे रियाजुल शेख ने बताया कि वो 2024 में  18 साल का हुआ था, उसी साल उसका नाम वोटर लिस्ट में जुड़ गया, उसने पिछले लोकसभा चुनाव में वोट डाला.

    हैरानी की बात ये है कि SIR के दौरान उसका नाम वोटर लिस्ट से नहीं कटा. उसने पिछले महीने विधानसभा चुनाव में भी वोट डाला.  लेकिन उसके माता-पिता का नाम वोटर लिस्ट से कट गया है.

   इस तरह दर्जनों परिवार इस वक्त हाकिमपुर बॉर्डर चेक पोस्ट पर जमा हैं. अगर SIR न हुआ होता, तो ये घुसपैठिए आराम से हमारे देश में ही जमे रहते.

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि SIR के जरिये मनमर्जी से किसी का वोट न तो काटा गया और न काटा जा सकता है. इसका मतलब है राहुल गांधी का वोट चोरी का आरोप फर्जी है. ममता बनर्जी का ये कहना कि चुनाव आयोग BJP के इशारे पर वोट काटता है, गलत साबित हुआ.

  उल्टा ये साबित हो गया कि तृणमूल कांग्रेस ने बांग्लादेश से आए घुसपैठियों के वोटर कार्ड बनवाए, बांग्लादेशियों ने खुद बताया कि उनके आधार और पैन कार्ड किसने बनवाए और ममता बनर्जी की पार्टी की मदद से वो देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सके.

   अब SIR में पकड़े गए, बंगाल में सरकार भी बदल गई, इसलिए वो अपने वतन वापस लौट रहे हैं.

   सुप्रीम कोर्ट के फैसले और बांग्लादेशियों की बात सुनने के बाद कोई भी SIR पर सवाल कैसे उठा सकता है?  

     सवाल तो ये है कि राहुल गांधी अपनी हार के लिए अब किसे जिम्मेदार ठहराएंगे?

  इस बात का क्या जवाब देंगे कि SIR तो केरल में भी हुआ था, वहां कांग्रेस की सरकार कैसे बन गई? क्या अब सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठाए जाएंगे?

   अच्छा तो ये होगा कि दोनों तरफ से संवैधानिक संस्थाओं को राजनीति में न घसीटा जाए.

बंगाल में 30 लाख महिलाएं फर्जी पाई गईं

      SIR का एक असर तो बॉर्डर पर दिख रहा है,  दूसरा असर पश्चिम बंगाल पर दिखा. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि ममता बनर्जी की सरकार घुसपैठियों को सरकारी योजनाओं का फायदा दे रही थी, घर बनाने के लिए पैसे दे रही थी, लक्ष्मी भंडार योजना के तहत हर महीने 1500 रुपये दे रही थी, मुफ्त राशन दे रही थी.

   बुधवार को शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने अन्नपूर्णा योजना के लिए आवेदन फॉर्म जारी किये. 1 जून से 30 अगस्त तक महिलाएं ये फॉर्म भर पाएंगी. इस स्कीम के तहत 25 साल से 60 साल तक की उम्र की सभी महिलाओं को हर महीने 3 हज़ार रुपये मिलेंगे. ये पैसा सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर होगा.

      शुभेंदु अधिकारी ने खुलासा किया कि लक्ष्मी भंडार योजना में 30 लाख ऐसी महिलाओं को पैसा दिया जा रहा था जिनके नाम SIR में वोटर लिस्ट से कट गए, इनमें ज्यादातर बांग्लादेशी हैं.

     सोचिए घुसपैठिए हमारे देश के लिए कितनी बड़ी समस्या हैं, वे किस तरह हमारे संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं.

    अभी तो सिर्फ ये पता लगा है कि तीस लाख बांग्लादेशी लक्ष्मी भंडार योजना के तहत हर महीने 1500 रु. ले रहे थे, लेकिन मुफ्त राशन, मुफ्त इलाज, मुफ्त में घर, विधवा पेंशन, छात्रों की स्कॉलरशिप जैसी दर्जनों योजनाएं सरकार चलाती हैं.

  ये सारी स्कीम्स हमारे देश के गरीबों की मदद के लिए हैं, लेकिन घुसपैठिए गरीबों का हक मार रहे हैं.

   ये समस्या सिर्फ बंगाल की नहीं है, घुसपैठिए तो सारे देश में फैल चुके हैं और ये संख्या इतनी ज्यादा है कि कई इलाकों में तो घुसपैठियों के कारण डैमोग्राफी बदल गई. इसलिए नरेन्द्र मोदी ने डैमोग्राफी में बदलाव पर विचार करने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई है.

   उम्मीद करनी चाहिए कि ये कमेटी जल्द काम शुरू करेगी और घुसपैठ की समस्या पर फुल स्टॉप लगेगा.

बकरीद : मुंबई में कुर्बानी पर विवाद क्यों उठा?

   बकरीद से पहले मुंबई के घाटकोपर और गोरेगांव में हंगामा हुआ. BMC ने बकरीद पर सोसायटीज में या खुली जगह में कुर्बानी पर रोक लगाई थी, लेकिन कुछ लोग कुर्बानी के बकरे लेकर सोसायटीज में पहुंच गए तो हंगामा शुरू हो गया.

     दो सोसायटीज में ज्यादातर लोग मुस्लिम थे इसलिए BMC ने सोसायटी में कुर्बानी की अनुमति दे दी, लेकिन जब विवाद बढा तो BMC को अनुमति वापस लेनी पड़ी. घाटकोपर की सागर पार्क सोसायटी में कुर्बानी के बकरों के लिए शेड बनाया गया था, 30 से ज्यादा बकरे लाये गये थे, लेकिन हिंदुओं ने जब विरोध किया तो मंगलवार रात BMC ने कु्र्बानी की अनुमति वापस ले ली.

   गोरेगांव के गोकुलधाम इलाके की आजाद पार्क सोसायटी में बीएमसी ने मुसलमानों को कुर्बानी की इजाज़त दी थी, लेकिन स्थानीय पार्षद और सोसायटी के लोगों ने विरोध किया, तो यहां भी अनुमति वापस ले ली गई.

    बीएमसी के डिप्टी मेयर ने कहा कि कुर्बानी के लिए 119 जगह तय की गई है और वहीं कुर्बानी होनी चाहिए.

     सबको पता था कि ईद आने वाली है. ये भी मालूम था कि बकरीद पर कुर्बानी दी जाती है, इसलिए कुर्बानी कहां दी जा सकती है इसकी जगह का फैसला पहले से हो सकता था. आखिरी वक्त पर परमिशन रद्द करने या जगह बदलने से समस्या होती है.

  अगर पहले ही बातचीत करके कुछ हल निकाल लिया जाता तो बेहतर होता. उम्मीद है ईद का त्योहार खुशी से मिलजुल कर शांति से मनाया जाएगा. सभी को ईद मुबारक.

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