देशभर में पुरअमन तरीके से बकरीद का त्योहार मनाया गया. बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली समेत ज्यादातर राज्यों में कहीं सड़क पर नमाज नहीं हुई, कहीं खुले में कुर्बानी नहीं दी गई, कहीं कोई झगड़ा नहीं हुआ.
बंगाल में पचास साल के बाद पहली बार बकरीद के दिन सड़कों पर ट्रैफिक नहीं रुका. शुभेन्दु अधिकारी की सरकार ने सड़क पर नमाज पढ़ने पर रोक लगाई लेकिन नमाजियों के लिए खास इंतजाम किए.
अमूमन हर साल कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज़ होती है, लेकिन इस बार ब्रिगेड परेड ग्राउंड में नमाज़ हुई.
बंगाल के दूसरे शहरों में भी यही हुआ. मुसलमानों ने सहयोग किया, न पुलिस को सख्ती करनी पड़ी, न नमाजियों को दिक्कत हुई.
जो लोग ये कह रहे थे कि बीजेपी की सरकार आएगी तो मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने से रोका जाएगा, बंगालियों का माछ-भात खाना बंद हो जाएगा, आज उन लोगों को जवाब मिल गया होगा.
नमाज भी हुई, ट्रैफिक भी नहीं रुका. शुभेन्दु अधिकारी ने बिना किसी सख्ती के जो काम सिर्फ बीस दिन में कर दिखाया, वह काम बंगाल में पचास साल के दौरान CPM और तृणमूल कांग्रेस की सरकारें क्यों नहीं कर पाईं?
सवाल ये है कि जब कोलकाता में 1978 तक ईद की नमाज ग्राउंड में होती थी तो फिर उस वक्त वाम मोर्चा सरकार ने रोड पर नमाज की अनुमति क्यों दी?
फिर पन्द्रह साल के राज में ममता बनर्जी ने नमाज के लिए ट्रैफिक जाम करने वालों को क्यों नहीं रोका?
सब जानते हैं इसी को तुष्टीकरण कहते हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी ने बंगाल में चुनाव प्रचार के समय कहा था, बीजेपी आएगी तो तुष्टीकरण किसी का नहीं होगा, सबके संतुष्टीकरण के लिए काम होगा.
आज मुस्लिम भाइयों की बात सुनकर लगा कि शुभेन्दु अधिकारी इसी मंत्र पर चल रहे हैं.
अब तो ममता बनर्जी की पार्टी के नेता भी शुभेन्दु अधिकारी की तारीफ कर रहे हैं. आज सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि शुभेन्दु अधिकारी जैसा मेहनती और सुलझा हुआ मुख्यमंत्री बंगाल को पहली बार मिला है और इसका असर क्या होता है, वो बंगाल की जनता देख रही है.
ममता : बुरे वक्त में परछाई भी छोड़ गई
सुखेंदु शेखर रॉय तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं. 2024 में आर जी कर अस्पताल में बलात्कार और हत्या की घटना के बाद वो तृणमूल कांग्रेस के पहले नेता थे जो पीड़ित डॉक्टर के लिए न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठे डॉक्टर्स के समर्थन में बोले. खुद भी धरने पर बैठे.
आज सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि अगर ममता ने उस वक्त जनता के गुस्से को समझा होता और कड़ी कार्रवाई की होती, तो इतना बुरा वक्त न देखना पड़ता.
सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि अब इधर उधर की बातें करने के बजाए ममता को पार्टी बचाने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जो हालात हैं उससे तो तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व ही खतरे में दिख रहा है.
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता शांतनु सेन ने कहा अब वो पब्लिक फोरम पर पार्टी का बचाव नहीं कर सकते, इसलिए प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे रहे हैं.
ममता बनर्जी के करीबी नेताओं को सुखेंदु शेखर रॉय और शांतनु सेन जैसे लोगों की बातें बुरी लग रही हैं. पार्टी के वरिष्ठ सांसद सौगत राय ने कहा कि जो लोग आज ममता बनर्जी की आलोचना कर रहे हैं, उनकी हैसियत पंचायत चुनाव जीतने की नहीं है लेकिन राजनीति में ये सब होता है, आज ममता का बुरा वक्त है, लेकिन वक्त बदलने में देर नहीं लगती.
तृणमूल कांग्रेस की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी मोर्चा खोल दिया है. काकोली ने तृणमूल महिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद और बारासात जिला अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया.
काकोली ने तृणमूल कांग्रेस के चीफ व्हिप कल्याण बनर्जी के खिलाफ शिकायत करते हुए लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजा है. इसमें आरोप लगाया गया है कि कल्याण बनर्जी ने सदन के अंदर उनके खिलाफ भद्दे कमेंट्स किये. साथ में ये भी कहा कि कल्याण बनर्जी महिला सांसदों के खिलाफ भद्दी टिप्पणियां करते हैं.
कल्याण बनर्जी ने काकोली घोष के आरोपों को विधानसभा चुनाव नतीजों का आफ्टर इफैक्ट बताया. कल्याण बनर्जी ने कहा कि सब अपना अपना रास्ता देख रहे हैं, काकोली को भी कहीं मौका दिख रहा होगा वरना उन्होंने पहले शिकायत क्यों नहीं की.
कहावत है बुरे वक्त में तो परछाई भी साथ छोड़ जाती है. ममता की पार्टी में वही हो रहा है.
तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मची है. पार्टी के सांसद भागने का रास्ता खोज रहे हैं. छह विधायक शुभेन्दु अधिकारी के साथ आ चुके हैं.
डायमंड हार्बर में तृणमूल कांग्रेस के 16 में से 6 पार्षद पार्टी छोड़ चुके हैं, भाटपाड़ा में चेयरमैन समेत 30 पार्षदों ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी. हालीशहर, कांथी, उत्तर बैरकपुर और गारूलिया में भी तृणमूल कांग्रेस के पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफा दिया है.
ये ममता के लिए अच्छा संकेत नहीं है. 2011 में जब वाम मोर्चा हारा था तो CPI-M और CPI के लोग भी इसी तरह पार्टी छोड़कर ममता की तरफ भागे थे लेकिन सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि 2011 में जो हुआ और आज जो हो रहा है, उसमें फर्क है.
तृणमूल कांग्रेस के लोगों में ममता के प्रति नाराजगी नहीं है, गुस्सा ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर है और अगर ममता ने इस बात को नहीं समझा तो तृणमूल कांग्रेस खत्म हो जाएगी.
छात्रों की परेशानी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने CBSE परीक्षा को लेकर कहा कि OSM सिस्टम पूरी दुनिया में इस्तेमाल होता है, इसे पहली बार CBSE बोर्ड परीक्षा की कॉपियों की जांच में इस्तेमाल किया गया, इसलिए कुछ खामियां रह गईं, जो कमियां सामने आईं, उन्हें जल्द ठीक किया जा रहा है.
धर्मेंद्र प्रधान ने CBSE के अधिकारियों को आदेश दिया कि छात्रों की शिकायतें जल्द दूर की जाएं, जिन बच्चों ने अपनी answer-sheet रि-चेक करने की मांग की है, उनको scanned आंसरशीट जल्द भेजी जाएं.
इस साल CBSE ने बारहवीं की answer-sheets को ऑनस्क्रीन मार्किंग सिस्टम से चेक कराया था जिसमें बच्चों की कॉपी को स्कैन करके एक पोर्टल पर अपलोड किया गया.
इस पोर्टल पर ही examiners ने कॉपी जांची और बच्चों को marks दिए लेकिन रिज़ल्ट आने के बाद बहुत से बच्चों ने उम्मीद से कम मार्क्स मिलने की शिकायत की.
ख़ुद CBSE के डेटा के मुताबिक़, पिछले साल जहां बारहवीं क्लास के एवरेज मार्क्स 88 परसेंट से ज़्यादा थे, वहीं इस बार औसत नंबर घटकर 85 परसेंट रह गए. 90 परसेंट से ज़्यादा मार्क्स लाने वाले छात्र भी 16 परसेंट घट गए.
जब CBSE ने आंसरशीट के रि-इवैल्यूएशन के लिए पोर्टल खोला, तो छात्रों को उसमें दिक़्क़तें आईं.
पहली बार लगभग 25 परसेंट स्टूडेंट्स ने अपनी आंसरशीट re-check करने की रिक्वेस्ट की. इस साल 18 लाख से ज़्यादा छात्रों ने CBSE की बारहवीं की परीक्षा दी थी.
चार लाख से ज़्यादा छात्रों ने अपनी copy रि-चेक करने की request CBSE से की.
धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि छात्रों ने अलग अलग विषयों की 11 लाख से ज़्यादा कॉपियां मांगी हैं, 8 लाख से ज़्यादा digital copies भेज भी दी गई हैं, बाक़ी भेजी जा रही हैं.
आरोप ये लगाया जा रहा है कि CBSE की गवर्निंग बॉडी ने बिना किसी तैयारी के OSM सिस्टम लागू किया. शिक्षकों की शिकायत है कि उन्हें ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की ट्रेनिंग नहीं दी गई.
CBSE ने OSM का ठेका हैदराबाद की कंपनी को दिया जिसकी छवि पहले से खराब है. ये भी आरोप है कि CBSE की तरफ़ से परीक्षा की कॉपियों की स्कैनिंग के लिए जो मशीनें लगाई गई थीं, उन मशीनों से बहुत सी कॉपियां स्कैन ही नहीं हुईं, कई ऐसे पन्नों को ब्लैंक बता दिया, जिन पर बच्चों ने जवाब लिखे थे. इससे उनको कम अंक मिले.
जब CBSE ने पुनर्मूल्यांकन के लिए छात्रों को आवेदन करने का मौक़ा दिया तो उसका portal ठीक से चल नहीं रहा था.
धर्मेंद्र प्रधान की बात सुनकर लगता है कि नीयत ठीक थी. उन्होंने CBSE का सिस्टम सुधारने की कोशिश की लेकिन अफसरों ने बिना पूरी तैयारी के OSM लागू कर दिया. जब छात्रों को समस्या हुई तो Portal की कमियों को दूर करने की बजाए CBSE ने cover-up करने की कोशिश की. जब पकड़े गए तो सिस्टम की कमियों को स्वीकार किया.
किसी भी नये सिस्टम को लागू करने से पहले ये सोचना चाहिए कि जब इतनी बड़ी संख्या में छात्र revaluation के लिए apply करेंगे, तो क्या वो इतना load ले पाएगा?
इसलिए सवाल पैदा होता है कि ऐसा सिस्टम बनाया ही क्यों जिसे हर पैमाने पर चैक नहीं किया गया था?
छात्रों को जो परेशानी हुई, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
