हम बचपन से सुनते आए हैं, ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’. अयोध्या के राम मंदिर में इसका मतलब है, ‘दान पात्र की लूट है, लूट सके तो लूट’.
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र ने माना कि चढ़ावे में चोरी तो हुई है, पाप तो हुआ है, लेकिन ये महापाप करने वाले बचेंगे नहीं, योगी और मोदी किसी को छोड़ेंगे नहीं, जांच में सारी हकीकत सामने आएगी, चोर भी पकड़े जाएंगे और दोबारा ऐसा न हो, इसके इंतजाम भी किये जाएँगे.
नृपेन्द्र मिश्र ने कहा कि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की निष्ठा पर किसी को शक नहीं है, लेकिन उनकी निगरानी में चूक तो हुई है, SIT की जांच में व्यवस्था की सारी खामियां सामने आएंगी.
प्रभु श्री राम के मंदिर में दान की चोरी का काम कई साल से चल रहा था. इसमें सब मिले हुए थे, बैंक वाले, काउंटिंग करने वाले और निगरानी करने वाले.
नियम-कायदे तो बहुत थे, जैसे गिनती करने वाले बिना जेब के कपड़े पहनेंगे, CCTV से निगरानी होगी, पर इन सबकी किसी ने कोई परवाह नहीं की. मंदिर में जो आभूषण दान में आए, उनका भी कोई हिसाब-किताब नहीं है.
तिरुपति बालाजी मंदिर में जो आभूषण दान में आते हैं, उनकी पहचान और मूल्यांकन का काम Minting Corporation Of India करती है, पर राम मंदिर में Minting Corporation के साथ agreement sign होते होते क्यों रह गया?
जब मंदिर में लूट मची हुई थी, क्या मंदिर के मुखिया कुंभकर्ण की नींद सो रहे थे?
मेरी जानकारी ये है कि SIT के हाथ उन लोगों की गर्दन तक तो पहुंच गए हैं, जिन्होंने नोटों की गड्डियां और आभूषण चुराए. SIT की रिपोर्ट को FIR में convert किया जाएगा. इन सब पापियों को सज़ा मिलेगी लेकिन जिनके पास मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है, जिनकी लापरवाही और गैरजिम्मेदारी के कारण इतनी लूट हुई, क्या ये लोग भी इस पाप के भागीदार नहीं हैं?
इन लोगों के खिलाफ कौन एक्शन लेगा ? क्या इन्हें इसलिए माफ कर दिया जाए कि ये 30-35 साल से राम मंदिर आंदोलन से जुड़े हैं, खुद ईमानदार हैं, उनके पास न घोड़ा है, न गाड़ी.
मुझे लगता है जिसकी जिम्मेदारी निगरानी करने की थी, जिसने प्रभु राम की मर्यादा तोड़ी है, भक्तों की श्रद्धा का अपमान किया, ऐसे गुनाहों के देवताओं की छुट्टी होनी चाहिए.
उद्धव सेना में टूट: गालियां देने से क्या फायदा?
आज दूसरी बार उद्धव ठाकरे की पार्टी टूट गई. जो नौ सांसद बचे थे, उनमें से छह ने बगावत कर दी. अब सिर्फ तीन सांसद उद्धव ठाकरे के साथ बचे हैं.
संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने सांसदों की मीटिंग बुलाई, व्हिप भी जारी किया, लेकिन इस मीटिंग में सिर्फ अरविन्द सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे, सिर्फ तीन सांसद पहुंचे. जो बागी सांसद नहीं आए, उनको कारण बताओ नोटिस भेजा गया.
अरविन्द सावंत और संजय राउत जानते हैं कि इस नोटिस से होना कुछ नहीं है क्योंकि 6 बागी सांसद लोकसभा स्पीकर को लिखकर दे चुके हैं कि उन्होंने एकनाथ शिन्दे की पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है, इसलिए उनके अलग बैठने की व्यवस्था की जाय.
अरविन्द सावंत ने बागी सांसदों के बारे में एक दो अपशब्द कहे, लेकिन संजय राउत ने तो हद कर दी. उन्होंने भद्दी-भद्दी गालियां दीं.
राउत ने कहा, मैं ‘सामना’ का संपादक हूं, मुझे भाषा की मर्यादा मालूम है. इसके बाद उन्होंने फिर बागी सांसदों के लिए पांच बार वही गालियां दोहराईं.
संजय राउत ने अपने सांसदों के बारे में ऐसी गालियां दीं, जिन्हें हम सुनवा नहीं सकते. अरविंद सावंत चिट्ठियां लिखते रहे. चिट्ठियाँ ऐसी, जिनका कोई मतलब नहीं है. उद्धव ठाकरे मीटिंग बुलाते रहे, मीटिंग ऐसी जिसमें ज्यादातर लोग आए ही नहीं. पहले बागी सांसदों को प्यार से पुकारा, फिर गंदी गालियां दीं, 15-15 करोड़ रु. लेने का इल्जाम लगाया, फिर धमकी दी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.
नौ में से छह चले गए, सातवां कब फरार हो जाएगा, इसके पूरे-पूरे आसार हैं. शुक्रवार को शिवसेना का स्थापना दिवस है, सब डरे बैठे हैं, कहीं विधायक भी न खिसक जाएँ.
लगता है, इन सब ने शिंदे वाले विभाजन से कुछ नहीं सीखा. ये सब जानते हैं इस बर्बादी के लिए कौन सा बयान बहादुर जिम्मेदार है.
