सोलह महीने बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच मुलाकात हुई, बातचीत हुई. ट्रंप ने मोदी को angel कहा, great friend बताया.
ट्रंप ने कहा, मोदी देखने में शांत लगते हैं, लेकिन सख्त प्रशासक हैं, tough negotiator हैं, मोदी को झुकाना आसान नहीं है.
ट्रंप ने कहा कि अगर कभी भारत पर हमला होता है, अमेरिका भारत का साथ देगा. लेकिन मोदी ने ट्रंप से साफ लफ्ज़ों में कहा कि समुद्र में जिस तरह भारतीय नाविकों को निशाना बनाया गया, वह गलत था, भारत को इस पर सख्त आपत्ति है.
मोदी ने कहा कि कोई कितना भी बड़ा और शक्तिशाली देश हो, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सम्मान सबको करना होगा.
ट्रंप ने कहा, उन्हें उम्मीद है भारत के साथ जल्द व्यापार समझौता हो जाएगा.
ट्रंप ने माना कि मोदी शांत और cool हैं, nice हैं, पर tough negotiator हैं, क्योंकि ट्रंप को इस बात का एहसास है कि उन्होंने मोदी के बारे में क्या-क्या नहीं कहा लेकिन मोदी ने पूरी मर्यादा के साथ उनके साथ डील की.
हमारे यहां कई लोग मोदी और ट्रंप की आपसी कैमिस्ट्री पर सवाल उठा रहे थे, ट्रंप की टिप्पणियों पर मोदी की खामोशी को कमजोरी बताते थे, उन्हें आज ट्रंप ने जवाब दे दिया.
अब उन लोगों को सोचना चाहिए कि क्या मोदी को ट्रंप के साथ तू-तू मैं-मैं में पड़कर वाहवाही लूटनी चाहिए थी ? या शांत और सौम्य रहकर संयम के साथ भारत के हितों पर फोकस करना चाहिए था ?
जहां तक ट्रंप का सवाल है, उन्होंने किसको छोड़ा ? अपने best friend इज़रायल के पीएम नेतन्याहू के बारे में क्या-क्या कहा ? फ्रांस के प्रधानमंत्री मैक्रों का मज़ाक उड़ाया. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बारे में किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया.
ट्रंप diplomacy में niceties में यकीन नहीं रखते, इसलिए उनके साथ डील करने का अलग तरीका है.
संयम बरतना सरेंडर नहीं होता. चापलूसी करना सरेंडर होता है और जो लोग मोदी को जानते हैं, वो इस बात की गारंटी देंगे कि चापलूसी करना मोदी की फितरत में नहीं है..
मोदी ने जता दिया कि वो cool दिखते हैं पर आँख में आँख डाल कर बात करना जानते हैं.
अब G7 summit के बारे में एक बात बता दूं.
भारत का मज़ाक उड़ाने वालों को समझना होगा कि इस बार के G-7 summit में भारत को full access दी गई है. full access का मतलब होता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के top leaders के साथ Real Power Room का हिस्सा हैं. भारत की उपस्थिति हर room में, हर Discussion में हो सकती है.
भारत को full access देने का फैसला मेज़बान फ्रांस ने किया. इसका अमेरिका समेत सभी देशों ने समर्थन किया.
नरेंद्र मोदी दुनिया के top leaders के साथ high table पर थे, ट्रंप के बगल में बैठे थे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और EU के नेता back seat पर थे.
मोदी न Observer हैं, न Outsider हैं. वो real decision making का हिस्सा हैं. इसके पहले non G-7 members को partial access दिया जाता था, limited power दी जाती थी.
इस समय भारत के पास unlimited access है. G-7 के लिए भारत एक preferred nation है. इसलिए इस बार लोग कह रहे हैं कि ये G-7 नहीं, भारत की मौजूदगी के कारण G-8 है.
उद्धव सेना : शांतता, बगावत चालू आहे!
तृणमूल कांग्रेस के बाद अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना टूट की कगार पर है. शिवसेना UBT के 9 में से 6 सांसद एकनाथ शिन्दे के साथ जाने को तैयार हैं.
पता तो ये लगा है कि 6 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को ये बता दिया है कि वो पार्टी से अलग होना चाहते हैं और एकनाथ शिंदे गुट वाली शिवसेना में विलय होना चाहते हैं.
चूंकि दो तिहाई सांसदों ने बगावत की है, इसलिए दल बदल कानून के तहत कोई एक्शन इन सांसदों पर नहीं हो सकता. इन 6 सांसदों में कोई भी अभी तक खुलकर सामने नहीं आया है, इसलिए उद्धव ठाकरे ज्यादा टेंशन में हैं.
पार्टी तोड़ना, सांसद-विधायकों को इधर से उधर करना, ये कोई नई बात नहीं है. Agencies का इस्तेमाल, पैसे का प्रलोभन, ये कोई पहली बार नहीं हो रहा.
एक ज़माने में कांग्रेस इस खेल की master हुआ करती थी. भजनलाल कैसे पूरी की पूरी पार्टी तोड़कर ले गए, अजीत जोगी ने कैसे विधायकों को तोड़कर एक पार्टी में विलय करवाया, ये सब तो रोज़ दिखाई देता था.
1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी और संजय गांधी हार गए थे, लेकिन दो साल बाद जनता पार्टी को तोड़कर चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने और फिर गिराने में संजय गांधी का रोल था.
1990 में चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाने और हटाने में राजीव गांधी का रोल था, जोड़-तोड़ का लेवल बहुत हाई था.
अब फर्क इतना है कि BJP ये काम पूरी शिद्दत के साथ करती है, scientific तरीके से पूरी प्लानिंग के साथ करती है.
BJP ने चुनाव लड़ने-लड़ाने और सरकारें बनाने के art को master कर लिया है, जबकि राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी जैसे नेता अभी पुराने परंपरागत तरीके पर चल रहे हैं.
उनके सामने परिवार को आगे बढ़ाने की मजबूरी है. वो अपने सांसदों-विधायकों से मिलना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. उनकी बात सुनना insult मानते हैं.
उनके लिए राजनीति full time job भी नहीं है. उन्हें छुट्टी भी चाहिए, आराम भी चाहिए, इसलिए इन पार्टियों में रहने वाले नेता बेचैन हैं और BJP इस बेचैनी का पूरा-पूरा फायदा उठा रही है और जो पार्टियां टूट रही हैं उनके नेता वोट चोरी और ED-CBI को दोष देते रह जाते हैं.
बचा हुआ टाइम वो रील बनाने में लगाते हैं और MP-MLAs नीचे से निकल जाते हैं. इसलिए इनका कोई इलाज नहीं है.
ममता, उद्धव के बाद अब क्या अखिलेश की बारी?
महाराष्ट्र और बंगाल के बाद यूपी में समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश का साथ छोड़ने को बेताब हैं, ऐसी खबरें आई हैं.
राज्य के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि रामगोपाल यादव ही समाजवादी पार्टी के MPs को एनडीए के पाले में धकेल रहे हैं.
यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी कह दिया कि सपा के 20-25 सांसद टूटने को तैयार हैं, लेकिन बीजेपी ने अपने दरवाजे नहीं खोले हैं.
अखिलेश यादव ने इन सारी अटकलों को बेबुनियाद बताया. कहा, कि ये सही है कि बीजेपी ने पहले सपा के कई नेताओं को तोड़ा, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.
सांसद तोड़ने के मामले में अखिलेश यादव को केशव प्रसाद मौर्य से शिकायत करने का हक नहीं है. वह कितनी बार मौर्य से योगी के खिलाफ बगावत करके 100 विधायक लाने को कह चुके हैं, उन्हें सीएम बनाने का लालच दे चुके हैं.
आज केशव प्रसाद मौर्य ने हिसाब बराबर कर लिया.
वैसे तो मौर्य और राजभर की इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि सपा के सांसद बगावत करने को तैयार बैठे हैं, लेकिन कौन सोच सकता था कि चुनाव के एक महीने के भीतर ममता के 78 में से 64 विधायक बगावत कर देंगे और 20 सांसद NDA के साथ चले जाएंगे ?
ममता तो ये मानकर बैठी थीं कि ऐसा नहीं हो सकता. उद्धव ठाकरे कल रात तक दावा कर रहे थे कि उनके सांसदों ने कसम खाई है कि कोई पार्टी नहीं छोड़ेगा, लेकिन कसम खाकर उनके सांसद private plane में बैठे और आज उनकी चिट्ठी लोकसभा के दफ्तर में land कर गई.
इस नजरिये से देखें तो कुछ भी हो सकता है.
