तेल संकट से निपटने की अपनी अपील पर सबसे पहले खुद अमल करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को अपने काफिले में चलने वाली गाड़ियों की संख्या अस्सी प्रतिशत घटा दी. अब प्रधानमंत्री के काफिले में सिर्फ दो गाड़ियां चलेंगी.
एक में वह खुद होंगे, दूसरी में सुरक्षाकर्मी. पहले प्रधानमंत्री के काफिले में कम से कम 12 से 15 गाड़ियां होती थीं.
एक गाड़ी प्रधानमंत्री के लिए होती थी, एक हूबहू Decoy Vehicle होता था, यानी प्रधानमंत्री की गाड़ी जैसी ही दूसरी कार, एक बख्तरबंद SUV होता था, एक Electronic Counter measures Vehicle होता था, जिसमें जैमर लगे होते थे, जो विस्फोटकों को नाकाम कर सकते थे.
इसके अलावा सिक्योरिटी, Advance Security Liaison, एंबुलेंस समेत कुल 12 से 15 गाड़ियां प्रधानमंत्री के काफिले में होती थीं, लेकिन अब ज्यादातर गाड़ियां हटा दी गई हैं.
गृह मंत्री अमित शाह के काफिले के आकार में भी कटौती की गई है.
अमित शाह के काफिले में अब चार या पांच गाड़ियां ही होंगी, जबकि इससे पहले काफिले में दस से ज्यादा गाड़ियां होती थीं. अमित शाह के पास जेड प्लस सिक्योरिटी कवर है लेकिन उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से कहा है कि जितनी कम से कम गाड़ियों से काम चल सके, उतनी ही गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाए.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत ज्यादातर मंत्रियों के काफिले भी छोटे हो गए हैं.
बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने भी अपने काफिले में चलने वाली गाड़ियों की संख्या आधी कर दी.
उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली समेत ज्यादातर बीजेपी शासित राज्य सरकारों ने भी पेट्रोल डीजल की बचत के उपाय शुरू कर दिए.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने काफिले की गाड़ियां कम करके एक अच्छा संदेश दिया है. उनकी सरकार के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने भी काफिले कम किए हैं.
खर्च में कटौती की शुरुआत जब सर्वोच्च स्तर पर होती है तो जनता को प्रोत्साहन मिलता है, आम लोग भी ईंधन की बचत में योगदान करते हैं.
हमारा देश इतना बड़ा है. अगर लोग ठान लें, तो पेट्रोल डीजल की खपत काफी कम हो सकती है और इनपर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बच सकती है.
इसी तरह PNG और LNG पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को भी बचाने की जरूरत है.
सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा फैसला किया है. बुधवार को केंद्र सरकार ने ‘कोल गैसीफिकेशन’ स्कीम को मंजूरी दी. ये एक ऐसी तकनीक है जिसमें कोयले को गैस में बदला जाता है.
एक हाईप्रैशर वाले चैंबर में कोयले को हाई टैंपरेचर पर गर्म किया जाता है. इससे कोयला गैस में तब्दील होता है. इसे सिनगैस कहते हैं. सिनगैस यानी SNG.
SNG एक तरह से PNG और LNG का विकल्प है. कोल गैसीफिकेशन स्कीम के तहत 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले के गैसीफिकेशन का लक्ष्य रखा गया है.
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि भारत के पास 200 साल तक काम आने वाला कोयला भंडार है. सरकार इस प्रोजैक्ट के लिए 37 हज़ार 500 करोड़ खर्च करेगी.
अगर कोयले से गैस बनती है तो हर साल लाखों करोड़ रूपए की विदेशी मुद्रा बचेगी.
फिलहाल भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा LNG, करीब 20 प्रतिशत यूरिया, 80 से 90 प्रतिशत तक मेथनॉल और शत प्रतिशत अमोनिया विदेशों से आयात करता है.
प्रधानमंत्री मोदी ने ऊर्जा और विदेशी मुद्रा की बचत के लिए जिन चार चीजों पर ज़ोर दिया है, वे हैं, कच्चा तेल, सोना, खाने का तेल और उर्वरक.
2025-26 में भारत का import bill 775 अरब डॉलर का था, इसमें से करीब ढाई सौ अरब डॉलर सिर्फ इन चार चीजों पर खर्च हुए. 138 अरब डॉलर यानी करीब सवा लाख करोड़ रूपए कच्चा तेल मंगवाने पर खर्च हुए.
सोने के आयात पर 72 अरब डॉलर यानी करीब 70 हजार करोड़ रूपए खर्च हुए. खाद्य तेल के आयात पर करीब 19 अरब डॉलर खर्च हुए और उर्वरकों के आयात पर 15 अरब डॉलर खर्च हुए.
इन चार चीजों में कच्चा तेल, खाने का तेल और उर्वरक को आवश्यक श्रेणी में रखा गया है, लेकिन सोने के मामले में प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है.
सरकार ने सोना और चांदी की खरीद को हतोत्साहित करने के लिए बुधवार को इन दोनों वस्तुओं पर इम्पोर्ट ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ा कर 15 प्रतिशत कर दी है.
हमारे देश में हर साल 700 से 800 मीट्रिक टन सोने की खपत होती है. इसका 90 से 95 प्रतिशत हम विदेश से आयात करते हैं.
अगर प्रधानमंत्री की अपील के बाद सोने की खपत में 30 से 40 प्रतिशत की गिरावट आई, तो एक साल में हम 20 से 25 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं.
इस धन का इस्तेमाल तेल, गैस और उर्वरक जैसी दूसरी ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने में कर सकते हैं.
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