Rajat Sharma

खतरनाक मोड़ पर जंग : युद्धविराम, वार्ता एकमात्र रास्ता

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जंग के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करते ही शुक्रवार को इज़राइल ने तेहरान पर फिर बमबारी की, जबकि ईरान ने अमीरात और कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किये. जंग अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है.
पूरी दुनिया को मुसीबत में डालने वाली खबर एक दिन पहले आई. ईरान ने क़तर के सबसे बड़े नेचुरल गैस प्रोडक्शन प्लांट को तबाह कर दिया.
क़तर से ही यूरोपीय देशों को बीस प्रतिशत गैस की सप्लाई होती है. चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, इटली और सिंगापुर भी क़तर की गैस के बड़े ख़रीदार हैं.
ईरान ने क़तर के साथ साथ सऊदी अरब और कुवैत के गैस और तेल ठिकानों को निशाना बनाया. इसके कारण पूरी दुनिया में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है.
दुनिया भर के शेयर बाज़ार गिर गए. बॉम्बे स्टॉक एक्सेंज करीब ढाई हजार अंक गिरा. ये पिछले दो साल में सबसे बड़ी गिरावट थी. सोने और चांदी के दामों में भारी गिरावट आई. पूरी दुनिया में मंदी का संकट गहराने लगा.
ईरान के इन हमलों से पूरी दुनिया हिल गई. दरअसल एक दिन पहले इज़राइल ने ईरान में दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड साउथ पार्स पर अटैक किया था जिससे वहां गैस का उत्पादन और सप्लाई बंद हो गई. इसके जवाब में ईरान ने क़तर के सबसे बड़े गैस प्लांट पर हमला कर दिया.
साउथ पार्स की गैस फील्ड का कुछ हिस्सा ईरान में है और कुछ क़तर में. जो हिस्सा ईरान में है, उसे साउथ पार्स कहा जाता है. इसी गैस फील्ड का जो हिस्सा क़तर में है, उसे नॉर्थ डोम कहते हैं.
नॉर्थ डोम से जुड़ा हुआ कतर का सबसे बड़ा गैस प्लांट है, रास लफ्फन. इसी प्लांट पर बुधवार को देर रात ईरान ने एक के बाद एक कई मिसाइलें दाग़ीं जिससे गैस प्लांट में भयंकर आग लग गई.
क़तर, दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यातकों में से एक है और रास लफ्फन उसका ही नहीं, पूरी दुनिया का सबसे बड़ा LNG प्लांट है.
ईरान के इस हमले का असर भारत पर भी होगा क्योंकि भारत अपनी जरूरत का कुल 55 प्रतिशत LNG आयात करता है. इसमें से 47 प्रतिशत LNG अकेले कतर से आती है. यूरोपीय देशों को 20 प्रतिशत LNG सप्लाई क़तर से होती है. चीन, साउथ कोरिया, जापान, इटली और सिंगापुर भी क़तर की गैस के बड़े ख़रीदार हैं.
जैसे ही ईरान के हमले के बाद क़तर ने रास लफ्फन गैस प्लांट को बंद करने का एलान किया, पूरी दुनिया में कोहराम मच गया. यूरोपीय देशों में मंदी आने का ख़तरा जताया जाने लगा, एशिया और अफ्रीका के आर्थिक विकास पर ब्रेक लगने की आशंका जताई जाने लगी.
इज़राइल ने ईरान में दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड साउथ पार्स पर हमला किया, तो जवाब में ईरान ने क़तर, कुवैत, UAE, सऊदी अरब, जॉर्डन, बहरीन, ओमान, इराक़ और इज़राइल पर मिसाइलों और ड्रोन्स से हमले किए.
सऊदी अरब की राजधानी रियाद में ईरान ने एक बड़े ऑयल डंप पर मिसाइल्स फायर कीं. इस ऑयल डंप को सऊदी अरब की अरामको कंपनी चलाती है. यहां से अमेरिकी फाइटर जेट विमानों को ईंधन की सप्लाई होती है. इसीलिए, ईरान ने इस ऑयल डंप को टारगेट किया.
लेकिन ईरान ने सऊदी अरब पर सबसे बड़ा हमला लाल सागर के यानबू पोर्ट के पास समरेफ तेल रिफाइनरी पर किया. ये रिफाइनरी इस वक्त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से तेल लेकर जाने वाले टैंकर्स को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से नहीं गुजरना पड़ता. ये टैंकर्स लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब के तेल को दुनिया के दूसरे देशों में पहुंचाते हैं.
समरेफ तेल रिफाइनरी को सऊदी कंपनी अरामको और अमेरिका की ExxonMobil मिलकर चलाती हैं. इसीलिए ईरान ने यानबू पोर्ट पर हमला किया. हमले से रिफाइनरी में आग लग गई और सऊदी अरब ने रिफाइनरी को बंद करने का एलान कर दिया.
सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है. जंग की शुरुआत में ईरान ने सऊदी अरब के सबसे बड़े तेल फील्ड रास तनुरा पर हमला किया था जिसके बाद सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से तेल का निर्यात बढ़ा दिया था ताकि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ की ईरानी नाक़ेबंदी से बच कर तेल का निर्यात हो सके.
ईरान ने मध्यपूर्व के एक और बड़े तेल निर्यातक कुवैत की दो रिफाइनरियों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए. अल अहमदी पोर्ट रिफाइनरी को बैलिस्टिक मिसाइल से निशाना बनाया गया. ये मध्यपूर्व की सबसे बड़ी रिफाइनरियों में से एक है.
अब्दुल्लाह पोर्ट के पास कुवैत की एक और रिफाइनरी पर ड्रोन से हमला हुआ. दो रिफाइनरियों पर हमलों के बाद कुवैत ने तेल का उत्पादन बंद कर दिया.
ईरान ने दुबई में अमीरात और अमेरिका के ज्वाइंट एयरबेस को काफी नुक़सान पहुंचाया. ईरान के इन हमलों के असर पूरी दुनिया पर होगा और लंबे वक्त तक रहेगा.
ईरान के इस रुख़ से अरब जगत में तहलका मचा हुआ है. अरब मुल्कों ने ईरान को ख़तरनाक अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है.
सवाल ये है कि इतनी तबाही के बावजूद ईरान इस जंग को और लंबा क्यों खींचना चाहता है?
ईरान का सैनिक और राजनीतिक नेतृत्व लगभग खत्म हो चुका है. नौसेना और वायु सेना के साथ साथ पूरा इंटेलीजेंस सिस्टम तबाह हो गया लेकिन ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से हमले नहीं रोके.
उसकी वजह ये है कि अब ईरान के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है. ईरान ने पहले से ही एक लंबी लड़ाई की तैयारी की हुई थी. उसने अपनी रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर को विकेंद्रित किया और मध्यपूर्व के देशों पर हमले जारी रखे.
मध्यपूर्व के मुल्कों ने अमेरिका पर दबाव बनाया. अमेरिका अब युद्धविराम चाहता है लेकिन ईरान युद्धविराम नहीं, स्थायी समाधान चाहता है.
ईरान को लगता है कि अगर जंग रुकी तो उसके दुश्मनों को फिर से एकजुट होने का मौका मिलेगा, अपनी कमियों को दुरुस्त करने का मौका मिलेगा, जैसे, जो रेडार नष्ट हो गए हैं, उन्हें फिर से चालू करने का अवसर मिलेगा और वो फिर ईरान पर हमला करेंगे.
इसीलिए ईरान अब एक ऐसा समाधान चाहता है जिसमें अमेरिका और इजराइल फिर से इस तरह का हमला न करे.
ईरान इस संकट का इस्तेमाल अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भी करना चाहता है, जैसे स्ट्रेट ऑफ होरमुज़ को ईरान अब युद्ध के पूर्व की स्थिति पर नहीं लाना चाहता. वह एक नयी संधि चाहता है जिसमें वो होरमूज़ से गुजरने वाले हर जहाज से टोल वसूल सके.
असल में ईरान चक्रव्यूह में फंसे अमेरिका की मजबूरी का पूरा-पूरा फायदा उठाने के चक्कर में है. इसीलिए वो खाड़ी के देशों पर लगातार मिसाइल और ड्रोन से हमले करके पूरा दबाव बनाये हुए है.
ईरान ने अपना रुख अचानक नहीं बदला. उसने पहले से ही रमज़ान के महीने में, अरब और इस्लामिक मुल्कों को निशाना बनाने की प्लानिंग की थी. इजराइल ने ईरान के तेल ठिकानों पर हमला करके उसे बहाना भी दे दिया.
कतर के जिस गैस प्लांट पर ईरान ने हमला किया, वो उसके गैस उत्पादन की धुरी है. इसीलिए ईरान की चोट वहां लगी जहां सबसे ज्यादा दर्द होता है.
ईरान के हमलों की वजह से कतर के गैस प्लांट को जो नुकसान हुआ है, उसकी मरम्मत करने में लंबा समय लगेगा और इस संकट का असर पूरी दुनिया पर दिखाई देगा.
अब सवाल है कि इस संकट के लिए कौन ज़िम्मेदार है? ईरान का दावा है कि अमेरिका ने पूरी दुनिया को मुसीबत में डाला, अब ट्रंप को इसका ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ेगा. लेकिन ट्रंप ने बुधवार को कह दिया कि सारी मुसीबत की जड़ इज़राइल है, इजराइल ने उनसे बिना पूछे ईरान की गैस फील्ड को निशाना बनाया.
ट्रंप का रवैया हैरान करने वाला है क्योंकि एक दिन पहले जब इज़राइल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया तब ट्रंप चुप रहे.
लेकिन जब ईरान ने क़तर, सऊदी अरब, कुवैत और अमीरात पर जवाबी हमले किए तो ट्रंप को हालात की गंभीरता का अंदाजा हुआ और उन्होंने कह दिया कि इज़राइल ने बहुत गलत किया, अमेरिका को बिना बताए ईरान की गैस फील्ड पर हमला किया.
ट्रंप ने ईरान को धमकी दी और कहा कि अगर ईरान ने क़तर के गैस फील्ड्स पर फिर से हमला किया तो अमेरिका ईरान के तमाम तेल और गैस ठिकानों को नेस्तनाबूद कर देगा.
ट्रंप ने ये सारी बातें सोशल मीडिया पर लिखीं. इसके कुछ ही देर के बाद इज़राइल और अमेरिकी मीडिया ने दावा किया कि ट्रंप झूठ बोल रहे हैं, इजराइल ईरान की गैस पर फील्ड पर हमला करने वाला है, इसकी पूरी जानकारी ट्रंप को थी.
साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले से पहले इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रंप से बात की थी, उनको विश्वास में लेकर ही इज़राइल ने ईरान के गैस फील्ड पर हमले किए थे.
ट्रंप का ये कहना कि इजराइल ने उन्हें बताए बिना ईरान की गैस फील्ड पर हमला किया, ये दिखाता है कि अमेरिका और इजराइल के बीच एक दरार है, अविश्वास है.
दोनों में से एक दुनिया को गुमराह कर रहा है. मध्यपूर्व के देश तो पहले से ही कह रहे थे कि ट्रंप ने ईरान पर हमला इजराइल के कहने पर किया लेकिन अब ये दोनों आपस में एक दूसरे को चकमा देने में लगे हैं.
मध्यपूर्व के देश अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा से अमेरिका पर निर्भर रहे है लेकिन ईरान के हमलों ने ये साबित कर दिया कि अमेरिका उनको शत प्रतिशत सुरक्षा कवच नहीं दे सकता.
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को एक बड़ा हथियार बनाया है लेकिन यूरोप के देश होर्मुज में नाकेबंदी को हटवाने के लिए ट्रंप का साथ देने को तैयार नहीं हैं.
ये एक और दरार है जो ट्रंप के रास्ते में खड़ी है. ये सारी बातें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि ईरान को अब धमकियां देने से काम नहीं चलेगा. अब किसी भी तरह युद्धविराम करके ईरान को बातचीत की मेज पर लाने से ही रास्ता निकलेगा.
इस युद्ध की आग अब उन देशों को भी जलाने लगी है जिनका इस लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है.
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