Rajat Sharma

विपक्ष: जंतर मंतर पर एकता, राज्यों में खींचतान

akbदिल्ली में शुक्रवार को विरोधी दलों के गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेता एक बार फिर इकट्ठा हुए. जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट करके एक बार फिर एकता दिखाने की कोशिश की, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर विपक्ष की आवाज को दबाने, लोकतंत्र को खत्म करने और तानाशाही जैसे इल्जाम लगाए लेकिन जब दिल्ली में मोदी विरोधी मोर्चे के नेता मंच पर हाथ में हाथ डालकर बैठे थे, उस वक्त पटना, मुंबई और लखनऊ में इन्हीं पार्टियों के नेताओं के बीच खींचतान चल रही थी, प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर, सीटों के बंटवारे को लेकर, कौन किसके साथ होगा इसको लेकर. सब अपने अपने दावे करने में लगे थे. जैसे शुक्रवार को अचानक नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को अपने घर पर बुलाया. इसके थोड़ी ही देर बाद नीतीश के करीबी जेडी-यू विधायक गोपाल मंडल ने कहा कि ‘ये खरगे वरगे कौन हैं? उन्हें कौन जानता है? नीतीश कुमार की बदौलत सभी विरोधी दलों के नेता एक मंच पर आए हैं, नीतीश ने Fevicol का काम किया है, नीतीश को देश भर में सब जानते हैं, इसलिए INDI अलायंस की तरफ से नीतीश को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए… खरगे तो PM मैटेरियल नहीं हैं’. इसके बाद नीतीश की पार्टी के एक और नेता संजय झा ने कहा, ‘सबसे बेहतर उम्मीदवार नीतीश ही होंगे’. वहीं महाराष्ट्र में संजय राउत ने एलान कर दिया कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र में 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, बाकी बची सीटों पर कांग्रेस और NCP तय कर लें उन्हें कितनी-कितनी सीटों पर लड़ना है. यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच बड़ी खींचतान चल रही है, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, मायावती को गठबंधन में शामिल करना चाहिए, इससे अखिलेश यादव नाराज हैं.

बिहार

बिहार में JDU-RJD का कांग्रेस के साथ झगड़ा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और सीटों के बंटवारे दोनों मुद्दों पर है. एक-एक करके अब जेडीयू के नेता खुलकर नीतीश कुमार के नाम को आगे बढ़ा रहे हैं, और सिर्फ आगे नहीं बढ़ा रहे हैं, खरगे और कांग्रेस के खिलाफ भी बोल रहे हैं.. JDU के विधायक गोपाल मंडल ने कहा कि ” इंडिया गठबंधन जो नाम पड़ा, नीतीश कुमार ने संयोजक का काम किया, नीतीश कुमार चेहरा है..निर्विवादित है, सब कुछ है.. इनको ही प्रधानमंत्री चुनना चाहिए.. पब्लिक नहीं मानेगी..ये खरगे-फरगे का नाम नहीं जानता है..अभी नाम बोले हैं तो हम सुने हैं, जानते भी नहीं थे कि वो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं खरगे जी. आप बोले तो हम जान गए..उनको कोई नहीं जानता है. आम पब्लिक नहीं जानता है. आम पब्लिक नीतीश कुमार को जानता है. नीतीश कुमार प्राइम मिनिस्टर बनेंगे. सब कोई नीतीश कुमार को जानता है. पूरा हिंदुस्तान नीतीश कुमार को जानता है, ममता बनर्जी बोल दी और कोई बोल दिया, इसलिए बोल दिया. साथ ही में बैठे-उठे हैं. .मुख्यमंत्री को कोई तकलीफ नहीं हैं, वो निर्विवादित आदमी हैं..उनको प्रधानमंत्री बनाया जाय ये अभियान है..लालू का भी अभियान है..भाजपा को उखाड़ फेंको..भाजपा को भगाओ.” गोपाल मंडल गोपालपुर सीट से JDU के विधायक है. नीतीश कुमार के चहेते हैं. ये वही गोपाल मंडल है जो रिवॉल्वर लहराते हुए अस्पताल में जाते हैं, और सवाल पूछा जाता है तो कहते हैं कि रिवॉलवर पायजामा की जेब में रखने के लिए थोड़े है, कोई भी हमला कर सकता है, इसलिए हमेशा हाथ में रखते हैं. गोपाल मंडल बिहार के दबंग विधायक है. जेडीयू के एक और बड़े नेता संजय झा ने भी कहा कि नीतीश कुमार ने सबको एक साथ बैठाया, नीतीश कुमार ही गठबंधन के सूत्रधार हैं, इसलिए उन्हें संयोजक बनाया जाना चाहिए, प्रधानमंत्री का चेहरा कौन बनेगा, कौन नहीं, इसका फैसला तो बाद में हो जाएगा, इस वक्त तो प्राथमिकता ये है कि सीटों का बंटवारा हो जाए.” शुक्रवार को नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव में आधे घंटे की मीटिंग हुई. मीटिंग के बाद तेजस्वी ने कहा कि बात एलायन्स के बारे में हुई , सब इस बात पर सहमत हैं कि सीट बंटवारे को लेकर जितनी जल्दी फैसला हो जाए उतना बेहतर है. तेजस्वी ने कहा कि गठबंधन का मुख्य मकसद नरेंद्र मोदी को हराना है, बाकी बातें गौण हैं. ये तो सही है कि प्रधानमंत्री पद के लिए खरगे का नाम आगे बढ़ाने से नीतीश भी नाराज हैं और लालू यादव भी परेशान हैं. जहां तक सीट शेयरिंग का सवाल है तो पता ये लगा है कि ये मामला सुलझने में भी वक्त लगेगा क्योंकि जेडीयू 20 सीट मांग रहा है, आरजेडी 18 सीटें पर दावेदारी कर रही है, कांग्रेस 10 सीटें मांग रही है और वामपंथी पार्टियां 5 सीट चाहती हैं. लेकिन बिहार में कुल चालीस सीटें हैं. लालू JDU को RJD से ज्यादा सीटें देने को तैयार हैं क्योंकि उनकी दिलचस्पी फिलहाल दिल्ली की बजाय बिहार में हैं लेकिन लालू भी कांग्रेस औऱ लैफ्ट के साथ रियासत बरतने को तैयार नहीं हैं. अगर JDU ने 20 सीटें ले लीं और RJD ने 18 तो कांग्रेस और लैफ्ट के लिए कुल मिलाकर दो सीटें बचेंगी, इसीलिए मामला पेचीदा है. लालू चाहते हैं कि नीतीश कुमार दिल्ली की तरफ देंखे. बिहार की कुर्सी तेजस्वी के लिए खाली करें और ये काम लोकसभा चुनाव से पहले हो जाए तो बेहतर .इसीलिए शुक्रवार को जब नीतीश ने तेजस्वी को बुलिया तो मंत्रिमंडल में बदलाव की भी चर्चा शुरू हो गई. .वैसे भी बीजेपी के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा था कि लालू ने उनसे फ्लाइट में कहा कि अब तेजस्वी को लाए बगैर बिहार का भला नहीं होगा.
बिहार की राजनीति में क्या हो रहा है ये कोई सीक्रेट नहीं है. नीतीश कुमार जानते हैं कि अब बिहार में उनकी पारी खत्म हो चुकी है, वो किसी तरह समय काट रहे हैं. उन्होंने बड़े जोश से मोदी-विरोधी पार्टियों को इकट्ठा किया था.वो इस गठबंधन के नेता बनना चाहते थे लेकिन पहले कांग्रेस ने राहुल गांधी के लिए उनको आउट कर दिया, फिर ममता ने खरगे का नाम चलाकर रही सही कसर भी पूरी कर दी. दूसरी तरफ लालू की प्रबल इच्छा है कि तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने का उनका सपना जल्दी पूरा हो, इसके लिए जरूरी है कि नीतीश बिहार से बाहर निकलें. इस चक्कर में नीतीश कुमार अधर में लटके हुए हैं – न इधर के रहे, ना उधर के.

महाराष्ट्र

झगड़ा महाराष्ट्र में भी है. महाराष्ट्र में बिहार की तरफ दबे छुपे बात नहीं हो रही है.वहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने साफ साफ कह दिया वो 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. महाराष्ट्र में कुल 48 सीटें हैं. अब बची 25 , यानि कांग्रेस और NCP आपस में 25 सीटें बांट ले. संजय राउत ने कहा कि शिवसेना 23 सीटों पर शुरू से चुनाव लड़ती आई है, इसलिए इस बार भी 25 सीटों पर लडेगी. संजय राउत कह रहे हैं कि सीट बंटवारे पर महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं से बात नहीं होगी, सीधे कांग्रेस हाईकमान से चर्चा होगी. लेकिन महाराष्ट्र कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष नसीम खान ने कहा कि इतनी जल्दी सीटों की संख्या को लेकर बात करना ठीक नहीं है, विनेबिलिटी के हिसाब से सीटों का बंटवारा हो और सारी पार्टियां एक-दूसरे को समर्थन करें. शरद पवार की एनसीपी की नेता विद्या चव्हाण ने कहा कि सीटों की संख्या को प्रतिष्ठा का विषय बनाने की जरूरत नहीं है, अलायंस में शामिल पार्टियों का मकसद ये होना चाहिए बीजेपी और मोदी को कैसे हराया जाए. संजय राउत ने 23 सीटों पर लड़ने की बात कहते हुए ये कहा था कि शिवसेना हमेशा से 23 सीटों पर लड़ती आई है और उनकी बात सही भी है. 2019 से पहले जब शिवसेना NDA में थी, उस वक्त और उसके बाद 2019 के चुनाव में भी शिवसेना ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा और 18 सीटों पर जीती जबकि कांग्रेस 25 और एनसीपी 19 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. अब शिवसेना और एनसीपी दोनों ही पार्टियां टूट चुकी हैं. शिवेसना का एक गुट एकनाथ शिंदे के साथ है और एनसीपी के एक गुट पर अजित पवार को कब्जा है. कांग्रेस को लगता है कि वो अब ज्यादा मजबूत स्थिति में है. उसकी बार्गेनिंग पावर ज्यादा है लेकिन उद्धव ठाकरे और शरद पवार अब उल्टा कांग्रेस पर प्रैशर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस इस प्रैशर में बहुत ज्यादा एडजस्ट करेगी, ये मुश्किल लगता है.

उत्तर प्रदेश
यही हाल उत्तर प्रदेश में है. यूपी में समाजवादी पार्टी कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है. पता ये लगा है कि अखिलेश यादव ने यूपी की 80 में से 76 सीटों पर दावा कर दिया, कुल मिलाकर चार सीटें बचती हैं. इनमें से दो RLD को, और रायबरेली और अमेठी, दो सीटें कांग्रेस के लिए बचती हैं. समाजवादी पार्टी के इस रुख के जबाव में कांग्रेस ने नई चाल चली है. यूपी कांग्रेस के नेताओं ने ये कहना शुरू कर दिया है कि गठबंधन में मायावती को भी आना चाहिए क्योंकि मायावती के बगैर यूपी में बीजेपी का मुकाबला मुश्किल है. पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था, नतीजा सबने देखा. दो दिन पहले एलायन्स की मीटिंग में कांग्रेस ने ये प्रस्ताव रखा था, लेकिन रामगोपाल यादव ने साफ कह दिया था कि अगर मायावती गठबंधन में आती हैं तो समाजवादी पार्टी एलान्यस का हिस्सा नहीं रहेगी. शुक्रवार को शिवपाल यादव ने कहा कि मायावती तो बीजेपी की मदद कर रही हैं, पर्दे के पीछे वो बीजेपी के साथ हैं, पहले वो बीजेपी से दूरी बनाएं, इसके बाद बाकी बातें होंगी. आज समाजवादी पार्टी मायावती के नाम से भाग रही है लेकिन सबको पता है कि पिछला लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव ने मायावती के साथ मिलकर ही लड़ा था. इस अलायन्स से मायावती को फायदा हुआ और समाजवादी पार्टी को नुकसान. इसलिए अब अखिलेश मायावती के साथ एलायन्स नहीं चाहते. दूसरी बात ये है कि कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि समाजवादी पार्टी कांग्रेस को वोट ट्रांसफर नहीं करा सकती. BSP का वोट मायावती की कॉल पर ट्रांसफर हो सकता है, इसलिए एलायन्स में मायावती को शामिल करना चाहिए. अगर समाजवादी कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटें छोड़ने को तैयार नहीं होती और कांग्रेस भी अपने रूख पर अड़ी रही तो फिर वैसा ही होगा जैसा मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हुआ था. विरोधी दलों के एलायन्स में बिहार, महाराष्ट्र, यूपी के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पंजाब में भी सीटों को लेकर झगड़ा है लेकिन दिल्ली में इन पार्टियों के नेता एकजुटता दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

जंतर मंतर पर एकता

शुक्रवार को जंतर-मंतर पर विपक्षी गठबंधन की सभी पार्टियों के नेता पहुंचे, सबने मंच पर एकजुटता दिखाई. विपक्ष के 146 सासंदों के सस्पेंशन के खिलाफ ये प्रदर्शन था. जंतर मंतर प्रोटेस्ट से दो बातें सामने आईं. एक थी, सांसदों का निलम्बन. इस मामले में एक बात जानना जरूरी है. जब संसद नये भवन में शिफ्ट हुई तो सारी पार्टियों के नेताओं ने स्पीकर और चेयरमैन के सामने वादा किया था कि अब Decorum का पालन किया जाएगा. सबने माना कि 75 साल में जो हुआ सो हुआ, अब नई बिल्डिंग में सांसद वेल में नहीं आएंगे और प्लेकार्ड लेकर तो बिलकुल ही कोई नहीं आएगा. सब इस बात पर सहमत हुए कि जिसको प्रोटेस्ट करना होगा वो अपनी सीट पर खड़े होकर शोर मचाएगा. सभी नेताओं ने ये भी माना कि अगर कोई एमपी इस सहमति का उल्लंघन करेगा तो उसके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा. इसके बाद भी अगर राजनीतिक दलों के नेता अपनी बात से मुकर जाएं और मुकरने के बाद एक्शन न हो, तो फिर इन सब मीटिंग्स का, इन सब संकल्पों का क्या मतलब ? दूसरी बात संसद की सुरक्षा से जुड़ी है. ये बात सही है कि संसद की सुरक्षा में भारी चूक हुई है, कोई भी अनहोनी हो सकती थी, ये पूरी तरह सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन सुरक्षा में सेंध लगाने वाली हरकत को बेरोजगारी से जोड़ना कैसे जायज हो सकता है? उदाहरण के तौर पर लोकसभा में कूदने वाला एक लड़का 12वीं पास है. उसकी मां ने बताया कि वो नौकरी नहीं करना चाहता था, वो ई-रिक्शा चलाता था. तो ये बेरोजगारी से जुड़ा मसला कैसे हो सकता है? आज जो जानकारी सामने आई, उसके मुताबिक संसद में धुआं उडाने वाले असल में राजनीतिक दल बनाना चाहते थे. उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनके खिलाफ UAPA कानून लगाया जाएगा. वो तो ये सोचकर संसद में कूदे थे कि 4-6 महीने में जमानत मिल जाएगी, फिर वो हीरो बनकर बाहर निकलेंगे. उन्हें ये सपना दिखाया गया था कि फिर वो बड़े नेता बन जाएंगे. हो सकता है ये जानकारी मिलने के बाद अब राहुल गांधी को कोई ये समझा दे कि ये वो नौजवान नहीं हैं जिनकी किसी ने नौकरी छीन ली. ये तो सियासत की दुनिया में काम ढूंढने आए थे और इस चक्कर में इन्होंने गंभीर अपराध कर दिया.

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