
खाड़ी में हालात फिर बिगड़ रहे हैं और युद्धविराम टूट सकता है. अमेरिका और ईरान के बीच जंग फिर शुरू हो सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के शांति प्रस्ताव को खारिज कर दिया है.
ट्रंप ने कहा है, अमेरिका अब और इंतज़ार नहीं करेगा और ईरान के खिलाफ कार्रवाई करेगा. इज़राइल ने भी कहा है कि जंग अभी खत्म नहीं हुई है और हमले फिर शुरू हो सकते हैं.
अगर जंग फिर शुरू होती है तो पूरी दुनिया पर इसका बहुत बुरा असर होगा.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस संकट को दशक की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती बताया है. मोदी ने कहा कि भारत भी इसके असर से बच नहीं पाएगा और जैसे देश कोरोना के संकट से लड़ा था, वैसे ही इस चुनौती से भी निपटेगा. इसमें लोगों के सहयोग की जरूरत होगी.
दुनिया भर में कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़कर एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई. इसका असर शेयर बाजार पर पड़ा जहां सेंसेक्स लगातार गिर रहा है.
दुनिया भर में तेल और गैस के सप्लाई चेन को लेकर चिंता है. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से दुनिया भर की 20 प्रतिशत ऊर्जा की सप्लाई होती है.
कच्चा तेल, LNG, डीज़ल और उर्वरक खाड़ी के देशों से पूरी दुनिया में जाते हैं. दो महीने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बंद है. कच्चे तेल की कीमत करीब 50 प्रतिशत बढ़ गई है.
क़तर पर ईरान के हमले की वजह से भारत और अन्य देशों को LNG की सप्लाई ठप है. अरब मुल्कों से उर्वरक और दूसरे पेट्रो-केमिकल सामानों का निर्यात लगभग बंद है. इसीलिए इन सब चीजों के दाम दुनिया भर में बढ़ रहे हैं.
भारत अपनी ऊर्जा की ज़रूरतों का 85 से 90 प्रतिशत तेल और गैस आयात करता है. उर्वरक, पेट्रो-रसायन के सामान और खाने में इस्तेमाल होने वाले तेल का भी एक बड़ा हिस्सा हम दूसरे देशों से ख़रीदते हैं. भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना पड़ता है. इसका असर हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ा है. इम्पोर्ट बिल बढ़ गया है.
अब तक सरकार ने आम जनता पर इसका ज़्यादा बोझ नहीं डाला, पेट्रोल-डीज़ल के दाम नहीं बढ़ाए, लेकिन खाड़ी में हालात फिर बिगड़ सकते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि मुश्किल की इस घड़ी में जितना संभव हो, लोग सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल करें, कार पूलिंग करें, माल ढुलाई के लिए ट्रक की बजाय रेलवे का इस्तेमाल करें, खेती में रासायनिक खाद की बजाय कंपोस्ट का उपयोग करें, नेचुरल फार्मिंग करें, खाना पकाने में तेल का इस्तेमाल कम करें, विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एक साल तक सोना न खरीदें और विदेश यात्राओं पर न जाएं.
भारत में हर साल 700 से 800 मीट्रिक टन सोने की खपत होती है और इसका 90 से 95 प्रतिशत हम विदेश से खरीदते हैं.
भारत हर साल दूसरे देशों से क़रीब 775 अरब डॉलर के सामान ख़रीदता है. इसका लगभग दस प्रतिशत हिस्सा, यानी 72 अरब डॉलर सिर्फ सोने का आयात करने पर खर्च होता है. भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है.
अगर भारत में सोने की खपत में 30 से 40 प्रतिशत की गिरावट आती है तो एक साल में हम 20 से 25 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं.
अगर भारत में सोने की खपत आधी रह जाए, तो 36 अरब डॉलर की बचत होगी. इस पैसे का इस्तेमाल तेल, गैस और उर्वरक जैसी ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने में हो सकेगा.
बहुत से लोग सोचेंगे कि मोदी ने खाने में कम तेल के इस्तेमाल की अपील क्यों की. मोदी ने जो अपील की उसके दो फायदे हैं.
पहला, कम तेल खाने से सेहत ठीक रहेगी, दूसरा, कम तेल खाएंगे तो देश के कम से कम 70 हजार करोड़ रूपए बचेंगे. भारत हर साल करीब एक करोड़ सत्तर लाख टन खाने के तेल का आयात करता है. इनमें पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सनफ्लॉवर तेल शामिल हैं.
हम देश की ज़रूरत का सिर्फ 40 प्रतिशत खाद्य तेल उत्पादन करते हैं, बाकी 60 प्रतिशत विदेश से मंगाते हैं. इस पर हर साल 18 से 19 अरब डॉलर ख़र्च होता है. खाने के तेल के इस्तेमाल में 20 से 30 प्रतिशत की कटौती से एक साल में 4 से 5 अरब डॉलर की बचत हो सकती है.
खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल के दाम 50 से 55 प्रतिशत बढ़ चुके हैं जबकि यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों की कीमतें क़रीब 25 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं. LNG का दुनिया में सबसे बड़ा सप्लायर क़तर है. ईरान के हमले के बाद से क़तर के गैस प्रोडक्शन प्लांट बर्बाद हो गए हैं. इनकी मरम्मत में तीन से चार साल तक लग सकते हैं. इसकी वजह से एशिया और यूरोप के लिए LNG की कीमतों में 140 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो चुकी है.
भारत में अभी पेट्रोल, डीज़ल और गैस की कोई कमी न हो, इसके लिए सरकार ने अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया और नाइजीरिया से तेल और गैस का आयात बढ़ाया है, ओमान से पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों की ख़रीद बढ़ाई है.
इन सभी कारणों से हमारा करेंट एकाउंट घाटा बढ़ रहा है. सरकार को दूसरे स्रोतों से सामान ख़रीदने में ज़्यादा विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ रही है.
आप इस तरह से समझें कि अगर भारत 100 रुपए का सामान विदेश से ख़रीदता है, तो उसमें से 31 रुपए कच्चा तेल ख़रीदने में जाता है और 9 रूपए सोना ख़रीदने में जाता है.
चूंकि हम अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत उर्वरक विदेश से मंगाते हैं और ये हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए ज़रूरी है, इसलिए सरकार इन सबके आयात में कोई कमी नहीं कर सकती. हां, अगर खपत में कमी की जाए तो देश का import बिल कम किया जा सकता है.
मौजूदा हालात पर सरकार की पैनी नज़र है रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एंपावर्ड ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स की मीटिंग हुई जिसमें पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, जहाजरानी मंत्री सर्वानंद सोनोवाल, संसदीय मंत्री किरण रिजिजू और उनके विभागों के सचिव शामिल हुए.
राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री ने जो अपील की है, वो जनता के मन में तनाव पैदा करने के लिए नहीं, पहले से सावधान करने और सहयोग के लिए की गई है, देश में तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है, सरकार ज़रूरी सामान की सप्लाई नॉर्मल रखने के लिए हर मुमकिन क़दम उठा रही है. इसलिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं.
दुनिया के तमाम देश खाड़ी के युद्ध के झटके से उबरने के लिए कदम उठा रहे हैं लेकिन हमारे यहां जैसे ही प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए आम जनता से अपील की तो विरोधी दलों ने मोदी पर हमला बोल दिया.
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और RJD से लेकर ममता बनर्जी की पार्टी तक, लगभग सभी विपक्षी दलों ने इसको लेकर सरकार को घेरा.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश आर्थिक संकट का सामना कर रहा है लेकिन प्रधानमंत्री ने अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है.
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा, “चुनाव ख़त्म होते ही, ‘संकट’ याद आ गया ! दरअसल देश के लिए ‘संकट’ सिर्फ़ एक है और उसका नाम है : ‘भाजपा’”
अरविंद केजरीवाल ने लोगों को डराने की कोशिश की और पूछा कि क्या भारत में आर्थिक संकट आने वाला है.
कांग्रेस के नेताओं ने मांग की कि प्रधानमंत्री को संसद की बैठक बुलानी चाहिए और मौजूदा हालात के बारे में जनता को सही तस्वीर बतानी चाहिए.
मेरा ये मानना है कि अगर प्रधानमंत्री ने तेल और गैस की बचत को लेकर अपील की तो कौन सा पहाड़ टूट गया?
मोदी ने अगर सोना कम खरीदने को कहा, विदेशों में सैर सपाटा कम करने को कहा तो इसमें इतनी हाय-तौबा मचाने की क्या ज़रूरत?
अमेरिका से ईरान पर हमला मोदी ने तो नहीं करवाया था. दुनिया में तेल का संकट मोदी के कारण पैदा नहीं हुआ.
जिन चीजों पर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होती है, उनकी खरीदारी में किफायत बरतने में किसी को क्या समस्या हो सकती है?
ये समस्या विरोधी दलों के कुछ नेताओं की है. इस तरह की बेसिर पैर की बातें करने के कारण ही उनकी विश्वसनीयता कम हुई है और उनको लोग ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते.
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