Rajat Sharma

My Opinion

तेजस्वी चुनाव का बॉयकॉट करेंगे : लालू कैसे मानेंगे

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.47 PM (1) पहली बार वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण के मसले पर चुनाव आयोग ने सीधी-सीधी साफ बात की. तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को स्पष्ट जवाब दिए. तेजस्वी यादव बार बार पूछ रहे हैं आखिर बिहार में चुनाव से तीन महीने पहले वोटर लिस्ट में बदलाव की क्या जरूरत?

चुनाव आयोग ने कहा कि आज बिहार में वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण हो रहा है, इसके बाद पूरे देश में होगा, कहीं न कहीं से शुरूआत करनी ही थी. तेजस्वी आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग बीजेपी के इशारे पर बिहार के 51 लाख वोटरों का नाम काटना चाहता है. चुनाव आयोग ने कहा कि जिन लोगों की मौत हो गई, जो स्थायी तौर पर बिहार से अन्य राज्यों में जा कर बस गए, जिन वोटर्स के नाम दो-तीन जगहों पर वोट बना है, जिन विदेशी घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट में जुड गए हैं, क्या उन सबके नाम पर फर्जी वोटिंग होने दी जाए? क्या इससे लोकतन्त्र मजबूत होगा?

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना, फर्जी वोटरों के नाम काटना आयोग की जिम्मेदारी है. क्या चुनाव आयोग कुछ लोगों के शोर मचाने से अपनी जिम्मेदारी निभाना छोड़ दे ?

राहुल गांधी कह रहे हैं उनके पास कर्नाटक चुनाव में चुनाव आयोग की बेईमानी के सबूत हैं, वो सबूतों के साथ आयोग को expose करेंगे. इस पर आयोग ने कहा कि एक मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है, कोर्ट भी सबूत देखेगा, बेहतर होगा अदालत के फैसले का इंतजार किया जाए. चुनाव आयोग ने राहुल गांधी का नाम नहीं लिया, लेकिन इतना जरूर कहा कि अगर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी थी, तो इसके खिलाफ कोई अपील क्यों नहीं की गई? कांग्रेस के किसी भी हारे हुए फम्मीदवार क्यों नहीं अर्जी दी? और अब इसे लेकर चुनाव आयोग पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं.

तेजस्वी य़ादव ने एक बड़ा दांव चला. तेजस्वी ने कहा अगर वोटर लिस्ट से लाखों लोगों के वोट काटे जाएंगे, अगर इसी तरह बेईमानी होगी तो फिर चुनाव लड़ने का क्या मतलब? वह चुनाव का बॉयकॉट कर सकते हैं, इस पर सहयोगी दलों से भी बात करेंगे.

तेजस्वी और राहुल की शिकायत ये थी कि चुनाव आयोग जवाब क्यों नहीं देता. चुनाव आयोग ने ये स्पष्ट कर दिया कि किसके वोट काटे जाएंगे. वो जिनकी मौत हो चुकी, वो जो बिहार से बाहर shift हो चुके हैं, वो जो घुसपैठिए हैं, वो जो फर्जी voter हैं और वो लोग जिनके Voter List में नाम दो-दो बार हैं. ऐसे लोगों के नाम काटे जाने का विरोध किसी को नहीं करना चाहिए.

ऐसे लोगों के नाम काटना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है. अगर किसी ऐसे व्यक्ति का नाम कटे, जो जिंदा है, shift नहीं हुआ, घुसपैठिया नहीं है, तो फिर उसे आपत्ति दर्ज करने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा. अब चुनाव आयोग इससे ज्यादा और क्या कर सकता है ?

जहां तक बिहार चुनाव के Boycott का सवाल है, .मुझे नहीं लगता कि तेजस्वी चुनाव का बहिष्कार करेंगे. आज की परिस्थितियों में Election Boycott करने का मतलब होगा, प्रशांत किशोर को खुला निमंत्रण देना. PK को RJD की जमीन पर कब्जा करने का अवसर देना और ये लालू कभी नहीं होने देंगे.

मौलानाओं के साथ RSS : मुलाक़ात हुई, क्या बात हुई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली के हरियाणा भवन में देश भर से आए इमामों, मौलानाओं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों और विद्वानों के साथ बैठक की. इस बैठक में 60 से ज्यादा मौलानाओं ने हिस्सा लिया. संघ की तरफ से मोहन भागवत के अलावा सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, राम लाल और इंद्रेश कुमार ने हिस्सा लिया. करीब 3 घंटे तक चली इस बैठक में मौलानाओं ने अपने मन की आशंकाएं RSS प्रमुख के सामने रखीं.

मोहन भागवत ने मौलानाओं को बताया कि हिन्दू मुस्लिम भाइयों से क्या अपेक्षाएं रखते हैं, दूरियां खत्म करने के लिए क्या हो सकता है.

ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के चीफ इमाम उमेर अहमद इलियासी ने कहा कि मोहन भागवत लगातार सांप्रदायिक एकता की कोशिश कर रहे हैं, हिन्दू और मुसलमान दोनों ही चाहते हैं कि देश आगे बढ़े, विश्वगुरू बने. अच्छी बात ये रही है कि RSS के नेताओं के सामने मौलानाओं ने खुल कर बात की. चाहे बुलडोजर एक्शन हो, गोवध के नाम पर मॉब लिंचिंग का मुद्दा हो, मुसलमान कारोबारियों के बायकॉट का मसला हो, पहचान दिखाने की बात हो या फिर वक्फ का संशोधित कानून हो, मुस्लिम समाज के लोगों ने खुलकर अपनी शिकायतें रखीं. भागवत ने सुना और भरोसा दिलाया कि RSS अपनी तरफ से मुस्लिम भाइयों के मन की बात हर स्तर पर रखेगा.

मुसलिम नेताओं के साथ RSS की बात हो, ये एक सकारात्मक संकेत है. दोनों एक दूसरे से मिलें, एक दूसरे को समझने की कोशिश करें, एक दूसरे का संशय मिटाने की कोशिश करें, ये अच्छी बात है. ये dialogue उन नेताओं से भी होना चाहिए, जिनकी मुस्लिम समाज में ज्यादा पैठ है, ज्यादा मान्यता है, इसके साथ साथ दोनों तरफ के fringe elements पर रोक लगाने की कोशिश भी होनी चाहिए. मोहन भागवत की नीति ठीक है, नीयत साफ है, उनके प्रयास की सराहना होनी चाहिए.

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Boycotting Bihar polls : Lalu will never allow this extreme step

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.47 PM (1) For the first time, the Election Commission replied to allegations being made about the special intensive revision of electoral rolls in Bihar. The Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar said, “Should bogus votes be allowed in violation of the Constitution?..Should the Commission be swayed by attacks (by the opposition), and allow bogus votes to be cast in the name of electors who are deceased, permanently shifted, enrolled at two or more places…Some beginning had to be made from somewhere and this special intensive revision will be carried in all states in a phased manner.”
In Bihar, nearly 99 per cent of the total electors have been covered by this special intensive revision exercise, and over 91.3 per cent forms have been received and digitised.
On Congress leader Rahul Gandhi’s allegation that there was “vote theft” in Maharashtra and Karnataka, the Election Commission described it as “baseless and an afterthought”.
The EC said: “It is highly unfortunate that rather than filing an election petition as per law, or if filed, awaiting verdict of high court, he has not only made baseless allegations but also chosen to threaten EC, which is a constitutional body”.
The EC pointed out that defeated Congress candidates did not file a single election petition to challenge the result, despite the law allowing them to do so within 45 days of declaration of result. Other, however did file 10 election petitions in the High Court”.
On Thursday, RJD leader Tejashwi Yadav threatened to boycott Bihar assembly polls if the opposition’s voice on special intensive revision is not heard. He alleged that names of several lakh voters will be removed in Bihar, and if such a move takes place, there was no reason in contesting elections. Tejashwi Yadav said he would speak on this with like-minded opposition party leaders.
Till Thursday, Tejashwi Yadav and Rahul Gandhi’s complaint was that the Election Commission was not replying to their allegations.
When the Election Commission clarified that only names of those who are dead, or have shifted residence from Bihar, or who are illegal infiltrators, or who are fake voters or who have registered their names twice in the electoral list, will be removed, the picture is now clear. There should be no opposition to such a legally valid move.
It is the responsibility of the Election Commission to remove such names from the voters’ list. If any elector’s name is removed though he or she is alive, or has not shifted, or is not an infiltration, he or she will get 30 days’ time to file objections.
What more can the Election Commission do beyond this? As far as boycotting election is concerned, I don’t think Tejashwi Yadav will go to this extreme step.
Boycotting elections under present circumstances in Bihar will give a clean field to Prashant Kishore’s Jan Suraaj Party. PK will get the chance to occupy RJD’s base in Bihar and Lalu Yadav will never allow this to happen.

RSS chief’s meet with Muslim leaders : A positive step

RSS chief Mohan Bhagwat met Islamic scholars, maulanas and imams in Delhi’s Haryana Bhavan on Thursday. More than 60 Islamic scholars took part. Apart from Mohan Bhagwat, other RSS leaders Dattatreya Hosbale, Krishna Gopal, Ram Lal and Indresh Kumar also participated in the three-hour-long meeting. The maulanas aired their grievances before RSS leaders.
Bhagwat told the maulanas what Hindus expect from Muslim brethren and how the chasm could be narrowed between both communities. All India Imam Organisation chief Imam Umer Ahmed Ilyasi said, both the communities want to leave in peace and brotherhood and want India to become a world power.
The maulanas spoke openly in the presence of RSS leaders, like bulldozer action, mob lynching in the name of cow protection, boycott of Muslim traders, forcing minorities to prove their identities or the amended Waqf law. Bhagwat listened to their viewpoints and assured that the RSS would raise the voice of Muslims at all levels. He said, it would be better if religious leaders live in harmony and avoid giving hate speeches.
The RSS chief and its top leadership speaking to Muslim leaders is a positive sign. There should be more such meetings so that suspicious and grievances could be removed. This dialogue should continue with those Muslim leaders also, who have more recognition in their own community and who have a wider base. There must be efforts from both side to curb fringe elements that indulge in spreading hate.
Mohan Bhagwat’s policy is on the right path, his intentions are clear and such a move must be appreciated.

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विपक्ष को बिहार की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट का इंतज़ार करना चाहिए

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMबिहार में वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को लेकर पटना से लेकर दिल्ली तक ज़बरदस्त हंगामा हुआ. बिहार विधानसभा में तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के बीच नोंकझोंक हुई. RJD के विधायक और डिप्टी सीएम विजय सिन्हा आपस में भिड़ गए. तेजस्वी यादव ने कहा कि दावा किया जा रहा था कि बिहार में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी और रोहिंग्या वोटर बन गए हैं, इसलिए वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण जरूरी है, लेकिन अब तक एक भी ऐसा वोटर नहीं मिला.
तेजस्वी यादव ने पूछा कि 51 लाख लोगों का वोट क्यों काटा जा रहा है? क्या नागरिकों से वोट का अधिकार छीनना लोकतन्त्र की हत्या नहीं हैं? इस पर नीतीश कुमार भडक गए. संसद में भी विपक्ष के नेताओं ने खूब शोर मचाया. वोटर लिस्ट के रिवीज़न पर तुरंत बहस की मांग की, लेकिन सरकार की तरफ से साफ संकेत मिले हैं कि इस मुद्दे पर संसद में चर्चा नहीं होगी क्योंकि तुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था है, वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण करना उसका अधिकार है, संसद उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती.
लेकिन राहुल गांधी ने कहा कि उनके पास पक्के सबूत हैं कि महाराष्ट्र के साथ साथ कर्नाटक में भी वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई, इसके सबूत वो जल्दी ही सार्वजनिक करेंगे और चुनाव आयोग को जबाव देना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन सवाल ये है कि जब सुप्रीम कोर्ट में 28 जुलाई को इस मसले पर सुनवाई होनी है, तो फिर विपक्ष विधानसभा और संसद में हंगामा क्यों कर रहे हैं.
विपक्ष के सारे नेता चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं, आयोग के बहाने सरकार को घेर रहे हैं, लेकिन आयोग अपना काम करने में लगा है. चुनाव आयोग ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनमें बताया गया है कि बिहार में वोटर लिस्ट के रिवीजन का काम करीब करीब पूरा हो गया है. 98 प्रतिशत से ज्यादा वोटर्स के फॉर्म जमा हो गए हैं. अब तक वोटर लिस्ट में ऐसे बीस लाख नाम मिले हैं जिनकी मौत हो चुकी है. 28 लाख वोटर अपने पते पर नहीं मिले, वो दूसरी जगह जा चुके हैं. सात लाख लोग ऐसे मिले, जिनका वोट एक से ज्यादा जगह बना है. एक लाख लोगों का पता नहीं लगा.
चुनाव आयोग का कहना है कि 1 अगस्त तक वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा. फिर 1 सितंबर तक इसमें संशोधन होगा. अगर किसी को कोई आपत्ति या शिकायत है, तो चुनाव आयोग उसकी जांच करेगा. राजनीतिक दल भी वोटर लिस्ट को ग्राउंड पर जाकर क्रॉस चैक कर पाएंगे. एक महीने में सारी शिकायत दूर होने के बाद वोटर लिस्ट फाइनल होगी. मुझे लगता है कि विपक्ष को चुनाव आयोग पर कीचड़ उछालने के बजाए वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए.

जस्टिस यशवन्त वर्मा का मामला लम्बा खिंच सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवन्त वर्मा की तरफ से फाइल की गई अर्जी को सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया. जस्टिस वर्मा ने कैश-कांड की जांच करने वाली सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट को चुनौती दी है और भारत के पूर्व चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना की उस सिफारिश को भी ख़ारिज करने की मांग की है जिसमें उनके ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने की सिफ़ारिश की गई है.
जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल जैसे बड़े वकीलों को उतारा है. कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस बी आर गवई की बेंच में जस्टिस यशवंत वर्मा की अर्जी का जिक्र किया, और कहा कि जस्टिस वर्मा ने कुछ संवैधानिक सवाल उठाए हैं, इसलिए उनकी अर्जी पर जल्द सुनवाई की जाए. चीफ़ जस्टिस गवई ने इस केस की सुनवाई के लिए एक बेंच गठित करने की बात कही लेकिन ये भी साफ कर दिया कि वो ख़ुद बेंच का हिस्सा नहीं होंगे क्योंकि वह भी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य के तौर पर जस्टिस वर्मा के खिलाफ हुई जांच की प्रक्रिया का हिस्सा थे.
इसी साल मार्च में जस्टिस वर्मा के घर में आग लगी थी. इसके बाद नोटों से भरी, जली हुई बोरियों मिली थीं जो बाद में गायब कर दी गईं. इसके बाद उस वक़्त के चीफ़ जस्टिव संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया और मामले की जांच के लिए, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता में तीन जजों की कमेटी बनाई थी. इस कमेटी ने 55 गवाहों के बयान लिए, जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले का दौरा किया और जांच में पाया कि जो नोटों से भरी हुई बोरियां मिली थी, वो जस्टिस वर्मा की थीं.
जस्टिस वर्मा के केस में देरी होती जा रही है. मामला अजीब रुख लेता जा रहा है. शुरुआत से देखें. उनके घर पर नोट मिले, उसका सबूत वीडियो पर है, पुलिस ने देखा है, पर न तो पुलिस उनसे पूछताछ कर सकती है, न FIR कर सकती है, न पंचनामा कर सकती है क्योंकि कानून ही ऐसा है.
सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice के अधिकार भी ऐसे मामलों में सीमित हैं. वह भी जज को सिर्फ transfer कर सकते हैं जो उन्होंने कर दिया. दूसरा काम, वह इस पूरे मामले की जांच कर सकते हैं, जज की जो enquiry हुई, उसमें भी Justice वर्मा को दोषी पाया, तो भी मुख्य न्यायाधीश Justice वर्मा को सिर्फ इस्तीफा देने के लिए कह सकते हैं. उन्होंने कहा लेकिन Justice वर्मा ने इनकार कर दिया. इसके बाद Chief Justice of India ने सरकार से उन्हें impeach करने के लिए कहा.
महाभियोग की प्रक्रिय भी लम्बी है. ये process शुरू होता, इससे पहले Justice वर्मा ने Chief Justice के फैसले को ही Supreme Court में challenge कर दिया. बड़े-बड़े वकील उनकी तरफ से पेश होंगे. ये मामला लंबा खिंच सकता है. impeachment में भी समय लगेगा और जबतक कोई अन्तिम फैसला नहीं हो जाता, तबतक Justice यशवंत वर्मा High Court के Judge बने रहेंगे, उनका रुतबा बरकरार रहेगा.

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Opposition should wait for Bihar draft electoral list

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMThere was uproar by the opposition in both Patna and Delhi over Election Commission’s Special Intensive Revision (SIR) in Bihar. In the state assembly, RJD leader Tejashwi Yadav claimed, not a single Bangladeshi or Rohingya has been found as a voter in the electoral list. He asked why Election Commission is silent on this issue. Tejashwi Yadav questioned why names of 51 lakh voters are being removed. He described withdrawal of voting rights as “murder of democracy”.
In Parliament, most of the opposition parties created uproar and stalled proceedings in both Houses over the SIR issue. They carried placards opposing the EC’s move, but Speaker Om Birla did not allow a discussion on this issue. There are clear indications that the government is unwilling to allow a debate on this matter, because EC is a constitutional body which has the right to revise electoral lists.
Congress leader Rahul Gandhi claimed, he had concrete evidence of large-scale changes made in the voters’ lists in Karnataka and Maharashtra. He promised to make this public soon. Supreme Court is going to hear the SIR issue on July 28.
While the opposition is levelling charges against the EC on SIR issue, the Commission is carrying on with its work. Data released by Election Commission shows that the special intensive revision is almost complete. More than 98 per cent voters have submitted their enumeration forms. Nearly 20 lakh voters have died since the last revision took place. Nearly 28 lakh voters are not reachable at their known addresses. They might have shifted their residence elsewhere. Nearly seven lakh voters were found to have vote in more than one places. Nearly one lakh voters are untraceable.
Election Commission says, the draft electoral list will be ready by August 1, and one month’s time will be given to voters and political parties to file objections till September 1. Their objections will be taken up by the EC. Political parties can cross check the electoral lists by going to the ground level. After disposing all objections within a month, the final electoral list will be issued.
I think the opposition should wait for the EC’s draft electoral list and Supreme Court’s judgement instead of levelling baseless charges against the Election Commission.

Why Justice Yashwant Varma’s case will drag on

Supreme Court has decided to set up a bench to hear Justice Yashwant Varma’s petition challenging the report of the inquiry committee of judges set up by the apex court in the cash recovery case.
In the petition, the judge has sought to cancel the recommendation of the then Chief Justice Sanjiv Khanna calling for his impeachment. Justice Yashwant Varma has fielded top lawyers like Kapil Sibal, Mukul Rohatgi, Siddharth Luthra and Siddharth Agrawal in his defence.
In the Supreme Court, Kapil Sibal mentioned the judge’s petition and said some constitutional issues have been raised and there should be an urgent hearing. Chief Justice B R Gavai agreed to set up a special bench, but recused himself from the bench since he was part of the inquiry process as a member of the SC Collegium.
The three-judge inquiry committee, headed by Chief Justice of Punjab & Haryana High Court Sheel Nagu, had recorded the statements of 55 witnesses and had visited the judge’s bungalow where the cash was recovered in stacks.
On the basis of the inquiry committee report, the then CJI Sanjiv Khanna had written letters to President and Prime Minister on May 8 recommending impeachment of the judge. In his petition, Justice Varma has said that he was not given full opportunity to express his viewpoint.
Justice Varma’s case is not only being delayed but it becoming curiouser. It is a fact that currency notes were found from his official residence, there is a video of the notes, police had seen the bundles of cash, but neither police can question the change, nor can it file an FIR. Police cannot prepare a panchnama (statement of five persons).
The law forbids the police in doing so. The powers of Chief Justice of India are also limited. The CJI can transfer the judge, which he did. He can order an inquiry, which he did by setting up a committee of three senior judges who found Justice Varma guilty. The CJI can ask Justice Varma to resign, but the latter declined to do so.
The only option left for the CJI was to recommend to the government to initiate impeachment proceedings, which is long and time consuming. Before impeachment process could begin in Parliament, Justice Varma challenged the CJI’s decision in the Supreme Court. Top lawyers will appear for him. The matter can drag on.
The impeachment may take time. Unless the final decision comes, Justice Yashwant Varma will continue to be the judge of the High Court.

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धनखड़ ने इस्तीफा क्यों दिया ? अंदर की बात

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMउपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ ने क्यों इस्तीफा दिया, इसको लेकर अटकलें जारी है. जगदीप धनखड़ जितने गाजे-बाजे के साथ आए थे, उतनी ही खामोशी से उनकी विदाई हो गई. न कोई समारोह हुआ, न उनके कार्यकाल की तारीफ में कोई भाषण.

जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा क्यों दिया? मुझे लगता है कि वो सरकार के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे थे. परेशानियां पैदा करने लगे थे. इसीलिए उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया. मैं आपको अंदर की बात बताता हूं, टकराव कैसे शुरू हुआ, कहां तक गया, ये समझाता हूं.

पहली बात, जगदीप धनखड़ जब से राज्यसभा के सभापति बने, उन्होंने ये impression दिया कि वो सरकार के शीर्ष नेताओं के बहुत करीब हैं, जो भी करते हैं, वो उन्हीं के कहने पर करते हैं. आपको याद होगा, संसद के परिसर में उपराष्ट्रपति के झुके-झुके व्यवहार की mimicry की गई थी, जिसका वीडियो राहुल गांधी ने बनाया था. उसकी वजह ये थी कि चेयरमैन के तौर पर धनखड़ साहब विरोधी दलों के नेताओं से लगातार टकराते थे. विरोधी दलों के नेताओं को यकीन होने लगा था कि धनखड़ साहब सरकार के इशारे पर उन्हें बोलने नहीं देते, बार-बार उनका अपमान करते हैं. इस कारण सरकार और विरोधी दलों के बीच टकराव बढ़ता गया.

दूसरी बात, कुछ महीने पहले धनखड़ साहब ने न्यायपालिका पर सीधा हमला किया, Supreme Court पर वार किया, Parliament की supremacy की बात की. जजों को भी ये लगा कि Vice President साहब ये काम सरकार के इशारे पर कर रहे हैं. वो सरकार के करीबी हैं. न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव जैसी स्थिति पैदा हो गई.

तीसरी बात, इन मामलों पर जब उन्हें समझाने की कोशिश की गई, तो वह नाराज़ हो गए. उन्होंने याद दिलाना शुरू किया कि कैसे उपराष्ट्रपति होते हुए भी उन्होंने जगह-जगह सरकार का बचाव किया. अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी. ये सरकार से उनके सीधे टकराव की शुरुआत थी. बात बढ़ती गई..

चौथी बात, उन्होंने जगह-जगह सरकार के शीर्ष नेतृत्व की शिकायत करनी शुरू कर दी – RSS से लेकर मंत्रियों तक, विपक्षी दलों से लेकर मीडिया के सीनियर लोगों तक. उनकी शिकायत थी कि सरकार में उनसे कोई बात नहीं करता, उन्हें घुटन महसूस हो रही है और कोई उनकी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाए वरना मुझे कुछ करना पड़ेगा. ये एक तरह की धमकी थी, सरकार से सीधा टकराव था.

अंतिम दौर में धनखड़ साहब ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए. कांग्रेस के नेताओं से मिले, अरविंद केजरीवाल को मिलने का समय दिया. इन सबको बहुत कुछ कहा. जज यशवंत वर्मा के impeachment का केस अपने हाथ में लेने की कोशिश की.

जब सरकार को लगा कि अब वो राज्यसभा में भी परेशान पैदा कर सकते हैं, खुले टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है, तब उन्हें एक phone गया. ये convey किया गया कि अब ये खेल ज्यादा नहीं चलेगा. और ये भी बता दिया गया कि अगर धनखड़ साहब ने अपना रवैया नहीं बदला, तो उनका impeachment भी हो सकता है.

धनखड़ साहब को इस बात की उम्मीद नहीं थी. उन्होंने top leadership का assessment करने में गलती कर दी. दांव उल्टा पड़ गया. इसीलिए उन्होंने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा.

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Why did Dhankhar resign? The Inside Story

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMSpeculations continue about the exact reasons behind the abrupt resignation of Vice-President Jagdeep Dhankhar. The fanfare with which Dhankhar was elected as Vice-President was not there when he exited silently. There was neither a farewell function nor were there any speeches by top leaders extolling his tenure.

Why did Jagdeep Dhankhar resign abruptly? I have some inside information why he had to quit.

Actually, he was becoming an embarrassment for the government and he was creating hurdles because of which he had to resign.

Let me explain how the confrontation began.

One, since the time Dhankhar became Chairman of Rajya Sabha, he sought to give the impression that he was very close to the top leaders of the government and whatever he does has the blessings of the top leadership. You may remember, how a Trinamool Congress member made a mimicry of the Vice-President inside the parliament premises and Rahul Gandhi had circulated a video of that mimicry. The reason behind that incident was to project a narrative that as Chairman, Dhankhar used to regularly clash with opposition leaders. They were convinced that Dhankhar was not allowing them to speak in the House and insulting them at the behest of the government. This created regular confrontation between the government and opposition.

Two, some months ago, Dhankhar Sahib made direct attacks on the judiciary. He targeted the Supreme Court and spoke about the ‘supremacy of Parliament’. Most of the judges began feeling that the Vice-President was doing this at the behest of the government, since he was projecting himself to be close to the top leadership. The situation came to a pass when a confrontation between the judiciary and the executive was about to begin.

Three, when Dhankhar Sahib was persuaded to tone down his stance, he reportedly became angry and started reminding ruling party leaders how, as Vice-President, he had been defending the government umpteen times and how he put the prestige of his post at stake because of this. The chasm began to widen.

Four, Dhankhar Sahib began carrying his grievances about the top leadership to RSS leaders and several top ministers. He also mentioned his grievances while meeting opposition leaders and senior media persons. His grievance was that nobody in the government was listening to him, he was feeling suffocated, and he wanted that his pleas be forwarded to the Prime Minister, otherwise he could take some extreme step. This was a sort of threat – a direct tussle with the government.

In the final phase, Dhankhar Sahib started throwing tantrums. He met senior Congress leaders and gave time to meet Aam Aadmi Party chief Arvind Kejriwal. He narrated his problems to them. He tried to take up the matter of impeachment of Justice Verma in his hands, knowing that the government was moving the same motion in Lok Sabha. When top leaders of the government felt that the Chairman could create an embarrassing situation in Rajya Sabha, a situation of open confrontation could arise, a final phone call was made.

Without mincing words, the message was conveyed that if Dhankhar Sahib did not change his attitude, the ruling party could even bring a motion of impeachment against him. Dhankhar Sahib did not, in his wildest dreams, think about this. He made a mistake in his assessment about the top leadership, his gamble fell flat, and as a final step, he decided to take the exit route.

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धनखड़ का इस्तीफा : क्या वाकई में सेहत कारण है?

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMउपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया. अपने त्यागपत्र में धनखड़ ने कहा कि वो डाक्टरों की सलाह पर तत्काल इस्तीफा दे रहे हैं. फिलहाल राजनीतिक गलियारों में अफवाहों और अटकलों का बाज़ार गर्म है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को X पर अपने tweet में लिखा कि “जगदीप धनखड़ जी को भारत के उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का अवसर मिला है । मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।“

धनखड़ को इसी साल मार्च में सीने में दर्द की शिकायत के बाद AIIMS में इलाज कराना पड़ा था. सोमवार को संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन धनखड़ स्वस्थ नज़र आए और दोपहर बाद 4.30 बजे तक राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन किया. पांच घंटे बाद उन्होने अपना इस्तीफा दे दिया.

उपराष्ट्रपति पद पर धनखड़ के कार्यकाल के अभी दो साल और बाकी थे. इसलिए अचानक उनका इस्तीफा चौंकाने वाला था. सोमवार को धनखड़ राज्य सभा में मौजूद थे, उन्होंने शाम छह बजे विपक्ष के नेताओं के साथ लंबी मीटिंग की. दिन में किसी को इस बात की भनक भी नहीं लगी कि वो इतना बड़ा फैसला ले सकते हैं.

सवाल ये है कि अगर स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देना था, तो पहले दिया जा सकता था. मॉनसून सत्र के पहले दिन सदन की कार्यवाही चलाने के बाद इस्तीफा देना, ये बताता है कि इस्तीफे की वजह कुछ और है.

धनखड़ के इस्तीफे की असली वजह क्या है, उनकी नाराज़गी की वजह क्या है, इसका खुलासा तो बाद में होगा लेकिन इतना तो साफ है कि सरकार में उच्च नेतृत्व जगदीप धनखड़ के व्यवहार और उनकी कार्यशैली से संतुष्ट नहीं था और धनखड़ अपने तौर तरीकों को बदलने के लिए तैयार नहीं थे. धनखड़ हर मुद्दे पर अपनी राय खुलकर जाहिर करते हैं. उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए राजनीतिक बयानबाज़ी करने से गुरेज़ नहीं करते थे. न्यायपालिका पर लगातर कमेंट कर रहे थे. विपक्ष के नेताओं के साथ ज़रूरत से ज़्यादा सख्ती से पेश आ रहे थे.

इससे आम लोगों में यह धारणा बन रही थी कि जगदीप धनखड़ जो कह रहे हैं, वो सरकार के इशारे पर कह रहे हैं. और सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती.

जगदीप धनखड़ किसी की सुनते कहां हैं? इसलिए उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. हालांकि जगदीप धनखड़ ऐसे शख्स नहीं हैं जो अपने मन की बात बहुत दिनों तक दिल में रख सकें. इसलिए देर सबेर वह इस्तीफे की वजह खुद उजागर कर देंगे.

शर्म की बात : बम फटे, 189 लोग मरे, पर ये नहीं पता कि गुनहगार कौन ?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट के सभी 12 आरोपियों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया. अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकीं, गवाहों के बयान भरोसे के काबिल नहीं हैं, पुलिस ने जिन हथियारों की बरामदगी दिखाई, उनको सीरियल ब्लास्ट से नहीं जोड़ा जा सकता. इसीलिए बेनेफिट ऑफ डाउट के आधार पर सभी आरोपियों को बरी किया जाता है.

हाईकोर्ट का ये फैसला हैरान करने वाला है. 19 साल पहले 11 जुलाई 2006 की शाम को 11 मिनट के भीतर मुंबई की अलग-अलग लोकल ट्रेन में सात बम विस्फोट हुए थे. इन बम धमाकों में 189 लोगों की जान चली गई थी, 827 लोग घायल हुए थे.

महाराष्ट्र ATS ने जांच की, 2015 में मुंबई की स्पेशल टाडा अदालत ने पांच आरोपियों, फ़ैसल शेख़, कमाल अंसारी, एहतेशाम सिद्दीक़ी और नवीद ख़ान को मौत की सज़ा सुनाई, सात आरोपियों मुहम्मद साजिद अंसारी, मुहम्मद अली, डॉक्टर तनवीर अंसारी, माजिद शफ़ी, मुज़म्मिल शेख़, सोहेल शेख़ और ज़मीर शेख़ को उम्र क़ैद की सज़ा दी थी. लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को खारिज कर दिया.

हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चंदक की बेंच ने कहा कि जांच एजेंसियां आरोपियों के ख़िलाफ़ मामला साबित कर पाने में पूरी तरह से नाकाम रही हैं. हाई कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने जो विस्फोटक, हथियार और नक़्शे बरामद किए, उनका इन धमाकों से कोई ताल्लुक़ नहीं है. जजों ने कहा कि अभियोजन पक्ष तो ये भी नहीं साबित कर सका कि धमाकों के लिए किस तरह के बम इस्तेमाल किए गए. इसलिए जो सबूत अदालत के सामने हैं, उनके आधार पर ये यक़ीन करना मुश्किल है कि इन्हीं आरोपियों ने बम धमाकों को अंजाम दिया. हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया.

जैसे ही हाईकोर्ट का फैसला आया तो जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सभी आरोपियों के बरी होने पर ख़ुशी जताई. मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है. ये फैसला जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बड़ी कामयाबी है. 19 साल के बाद सच्चाई और इंसाफ की जीत हुई है.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उनकी सरकार हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी.

ये तो तथ्य है कि 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में सीरियल धमाके हुए थे. ये भी एक दर्दनाक सच है कि इस हादसे में 189 बेकसूर लोगों की मौत हुई थी, 800 से ज्यादा निर्दोष घायल हुए थे. ये भयानक मंज़र कभी भुलाया नहीं जा सकता.

लेकिन दुख की बात ये है कि 19 साल बाद भी इस सवाल का जवाब नहीं है कि ये धमाके किसने किए, सैकड़ों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? जिन 12 लोगों को आज हाईकोर्ट ने बरी किया, अगर ये बेकसूर हैं तो उन्हें 18 साल तक जेल में क्यों रखा गया?

ये वाकई हमारी जांच एजेंसियों की बहुत बड़ी नाकामी है. निचली अदालत और हाई कोर्ट के बीच जिस तरह का contrast है, वो चौंकाने वाला है. निचली अदालत ने गवाहों के बयानों को सही माना, लेकिन उच्च न्यायालय़ ने उन्हीं गवाहों के बयानों को नकार दिया.

जांच के दौरान SIT ने बरामद किए गए RDX को पुख्ता सबूत बताया, निचली अदालत ने भी माना, लेकिन हाई कोर्ट ने RDX को Serial Blast का सबूत मानने से इनकार कर दिया.

निचली अदालत ने आरोपियों के इकबालिया बयानों को सही माना लेकिन हाईकोर्ट का कहना है कि बयान दबाव में लिए गए.

सोचने वाली बात ये है कि निचली अदालत जिस जांच के आधार पर, जिन गवाहों के बयानों पर यकीन करके, जिन सबूतों को सच मान कर Serial Blast के लिए 12 लोगों को दोषी ठहराती है, हाई कोर्ट 10 साल बाद उन्हीं गवाहों के बयान और उन्हीं सबूतों को रद्दी की टोकरी में फेंक कर सभी आरोपियों को बरी कर देती है.

अब जो लोग मारे गए उनके परिवार वालों को देश क्या जवाब दें? अब मामला Supreme Court में जाएगा. फिर कई साल लगेंगे. ये शर्म की बात है कि बम फटे, 189 लोग मारे गए लेकिन ये नहीं पता कि गुनहगार कौन हैं?

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Dhankar’s resignation: Is health the real reason?

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMThe sudden exit of Vice-President Jagdeep Dhankhar has come as a surprise for political circles with many speculating about the reasons behind his resignation. He had two years before his term was to end in August, 2027.
In his eight-paragraph resignation letter sent to President Droupadi Murmu at around 9.20 pm on Monday, Dhankhar has written: “To prioritise health care and abide by medical advice, I hereby resign as Vice-President of India, effective immediately, in accordance with Article 67(a) of the Constitution.”
Prime Minister Narendra Modi on Tuesday tweeted on X: “Shri Jagdeep Dhankhar Ji has got many opportunities to serve our country in various capacities, including as the Vice President of India. Wishing him good health.”
Dhankhar underwent a cardiac procedure at AIIMS in March this year after he complained of uneasiness. On June 25, he fainted while delivering a speech in Nainital. On Monday, he appeared to be cool while presiding over the Rajya Sabha proceedings till 4:30 pm. Dhankhar had a meeting with opposition leaders on Monday at 6 pm. Two hours later he called on President Murmu in an unscheduled meeting to tender his resignation.
Though Dhankhar cited health as the reason for his exit, there are few takers for this theory. Some say, he could have sent his resignation on health grounds earlier too, but why did he choose the first day of Monsoon session?
Speculations are rife about the real reason behind his exit. There are reports that the top leadership in the government was not satisfied with his style of working and Dhankhar was unwilling to change his stance. He had been openly expressing his opinion on almost every major topic. He did not even desist from making political remarks. He had been consistently saying about the ‘supremacy of Parliament’ vis-à-vis the judiciary, particularly after the cash recovery incident.
On Monday, Dhankhar had accepted a notice from opposition members for a motion to remove Justice Yashwant Varma, who was transferred from Delhi HC to Allahabad HC, after a massive cash recovery at his residence in Delhi. As Chairman of Rajya Sabha, Dhankhar accepted the notice and asked the secretary general of Rajya Sabha to take necessary steps.
Apart from this, Dhankhar had been making acerbic remarks against some opposition leaders inside the House and this was not taken well in political circles.
A perception was building among the public that whatever remarks Dhankhar was making, was at the behest of the government. This was not acceptable to the government. It did not want such a perception to be built. Dhankhar was unwilling to listen to advice, and finally he gave his resignation.
Dhankhar is not a person who can keep his views close to his chest. Sooner or later, he will himself reveal the real reasons behind his exit.

Nobody killed 189 people in Mumbai

Bombay High Court on Monday quashed the conviction of all 12 accused found guilty nearly 10 years ago for the serial train blasts that took place in 2006 killing 189 and injuring 824 people in a matter of six minutes.
The special bench of Justice Anil Kilor and Justice Shyam Chandak severely criticized the prosecution for the ham-handed way in which the probe was conducted. The High Court refused to confirm the death sentence given to five convicts and life imprisonment sentence given to seven others by the special court. The High Court acquitted all the twelve while directing their immediate release.
Maharashtra ATS had conducted the inquiry. In 2015, a Special TADA court of Mumbai had given death sentence to Faisal Sheikh, Kamal Ansari, Ahtesham Siddiqui and Naveed Khan (the fifth died during appeal). Seven convicts, Muhammad Sajid Ansari, Amuhammad Ali, Dr Tanveer Ansari, Majid Shafi, Muzammil Sheikh, Sohail Sheikh and Zameer Sheikh, who were given life terms, were acquitted.
In its judgement, the High Court said, “confessions obtained from accused by ATS are unreliable and inadmissible”. The High Court went through 44,000 pages of documents and delivered the judgement, saying the reliability of prosecution witnesses was questionable.
Maharashtra Chief Minister Devendra Fadnavis said, the state government would appeal against the HC verdict in Supreme Court.
It is a painful truth that 189 innocent people lost their lives and more than 800 people were injured because of the serial train blasts. The scary visuals of that day still remain etched in the memory of people living in Mumbai.
It is sad that even after 19 years, there is no answer to the question: Who carried out those blasts? Who are responsible for the death of more than 180 people? If those who were acquitted today were innocent, then why were they kept in jails for 18 years?
This is gross incompetence on part of our investigation agencies. The contrasts in the judgements of the trial court and High Court are shocking.
The trial court considered statements of prosecution witnesses as correct, but the High Court rejected them.
The prosecution provided concrete evidence about the RDX used for the blasts. This was accepted by the trial court, but the High Court refused to accept them as admissible evidence.
The trial court found the confessional statements of the accused as admissible, but the High Court said, the accused were tortured to extract confessions and hence the statements are inadmissible.
One must ponder why the trial court and high court completely differed as far as confessional statements, evidences and witnesses’ statements are concerned.
How can it be that the 12 accused persons who were convicted by the trial court 10 years ago, have now been given a clean chit by the High Court, and all statements and evidences produced by the prosecution were thrown into the waste basket?
What reply will the nation give to the families of those innocent people who were killed in the blasts?
The matter will now go to the Supreme Court and the matter will remain in limbo for another few years. It is a matter of shame that nobody knows who is guilty for the death of 189 innocent people.

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क़िस्सा रॉबर्ट का : चोरी और सीनाज़ोरी

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMरॉबर्ट वाड्रा के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटका दी गई है। छह दिन बाद वाड्रा के खिलाफ ED की चार्जशीट पर कोर्ट में सुनवाई होगी। खतरा देखकर पहली बार राहुल गांधी अपने जीजा जी के बचाव में उतरे। कांग्रेस ने नेताओं की पूरी फौज रॉबर्ट वाड्रा के बचाव के लिए मैदान में उतार दी।

दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने वाड्रा के ख़िलाफ़ दायर ED की चार्जशीट पर सुनवाई करने के बाद, कोर्ट के स्टाफ को पांच दिन में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। अब 24 जुलाई को कोर्ट ये फैसला करेगी कि वाड्रा के खिलाफ दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेना है या नहीं।

रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ ये मामला गुरुग्राम के शिकोहपुर गांव में साढ़े तीन एकड़ ज़मीन के सौदे का है। ED का आरोप है कि इस सौदे में रॉबर्ट वाड्रा ने ग़लत declaration दिए और करोड़ों रुपए का फायदा कमाया।

ये लैंड डील उस वक्त हुई थी जब हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री थे। फरवरी 2008 में रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने गुरुग्राम के शिकोहपुर में 3.53 एकड़ ज़मीन ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज़ से साढ़े सात करोड़ रुपए में ख़रीदी। चौबीस घंटे बाद अगले ही दिन ये प्रॉपर्टी स्काईलाइट ने रॉबर्ट वाड्रा के नाम कर दी जबकि इस प्रॉसेस में आम तौर पर तीन महीने लग जाते हैं। इसके बाद दो महीने के भीतर वाड्रा की इस ज़मीन का लैंड यूज़ बदल दिया गया और यहां कॉमर्शियल डेवेलपमेंट की अनुमति दे दी गई।

चार साल बाद रॉबर्ट वाड्रा ने साढ़े सात करोड़ रु. में खरीदी गई जमीन DLF को 58 करोड़ रुपए में बेच दी। ED का आरोप है कि वाड्रा ने इस ज़मीन पर कोई निर्माण नहीं किया और DLF को बेच दिया। चार साल में वाड्रा ने 700 परसेंट का मुनाफ़ा कमाया।

इस मामले में एक FIR हरियाणा पुलिस ने सितंबर 2018 में दर्ज की थी जिसमें भूपिंदर सिंह हुड्डा को भी आरोपी बनाया गया था। ED ने इसी FIR के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच शुरू की। रॉबर्ट वाड्रा को तीन बार पूछताछ के लिए बुलाया और 16 जुलाई को रॉबर्ट वाड्रा और उनकी कंपनी से जुड़ी 37 करोड़ से ज़्यादा की 43 properties को ज़ब्त कर लिया। 17 जुलाई को इस मामले में चार्जशीट दाख़िल की गई।

ED का आरोप ये है कि जब हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त रॉबर्ट वाड्रा ने राजनीतिक पहुंच का फायदा उठाते हुए मानेसर, नौरंगपुर, लखनौला, सीही और शिकोहपुर गांवों में औने-पौने दामों में ज़मीनें ख़रीदीं और इनको मोटे मुनाफ़े पर बिल्डरों को बेचा। इन सौदों में बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग हुई।

पहली बार राहुल गांधी अपने जीजा जी के बचाव में खुलकर सामने आए। राहुल गांधी ने X पर लिखा कि उनके जीजा को पिछले दस साल से राजनीतिक साजिश का शिकार बनाया जा रहा है, ED की ये चार्जशीट भी उसी साजिश का हिस्सा है, सरकार रॉबर्ट वाड्रा, प्रियंका और उनके बच्चों को परेशान कर रही है, लेकिन वह पूरी मज़बूती के साथ अपनी बहन और उनके परिवार के साथ खड़े हैं। पूरा परिवार अपने आत्मसम्मान के साथ इस चुनौती का सामना करेगा।

सवाल ये है कि लैंड डील के केस में मनी लॉन्ड्रिंग की बात कहां से आई? ED का आरोप है कि रॉबर्ट वाड्रा को गुरुग्राम की लैंड डील में जो मोटा पैसा मिला, वो उन्होंने लंदन में दो फ्लैटों की खरीद पर निवेश किया।

ED के मुताबिक, इसके लिए आर्म्स डीलर संजय भंडारी को front बनाया। ED ने संजय भंडारी के ख़िलाफ़ 2020 में पहली और 2023 में दूसरी चार्जशीट दायर की थी, जिसमें एक आरोप ये भी है कि संजय भंडारी ने लंदन में बोर्डन स्ट्रीट और ब्रायनस्टन स्क्वॉयर में दो फ्लैट ख़रीदे थे लेकिन ये दोनों प्रॉपर्टी असल में रॉबर्ट वाड्रा की हैं। इनके renovation के लिए पैसे भी रॉबर्ट वाड्रा ने संजय भंडारी को दिए थे।

संजय भंडारी के ख़िलाफ़ 2016 में आयकर विभाग ने जांच शुरू की थी जिसके बाद वो लंदन भाग गया था। इसी महीने पांच जुलाई को दिल्ली की एक अदालत ने संजय भंडारी को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया था और 14 जुलाई को ED ने संजय भंडारी के साथ कारोबारी रिश्तों को लेकर रॉबर्ट वाड्रा से भी पूछताछ की थी। अब सरकार संजय भंडारी के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रही है।

रॉबर्ट के बचाव में जो सवाल उठाए जा रहे हैं, वो हैं – property का sale और purchase illegal कैसे हो सकता है? जमीन खरीदने बेचने में criminal offence कैसे हो सकता है? क्या change of land use का license रॉबर्ट वाड्रा को दिया गया? क्या रॉबर्ट वाड्रा ने stamp duty का कोई evasion किया?

रॉबर्ट वाड्रा का कहना है कि इन सारे सवालों के जवाब ना में हैं। Land और license दोनों DLF के पास है तो इसमें फिर रॉबर्ट वाड्रा का crime क्या है?

लेकिन रॉबर्ट वाड्रा ने ये नहीं बताया कि उनके और DLF के बीच क्या connection है? DLF ने रॉबर्ट वाड्रा पर इतनी मेहरबानी क्यों की कि वाड्रा ने सिर्फ चार साल में जमीन बेचकर 700% मुनाफा कमाया? क्या ये सच नहीं कि रॉबर्ट वाड्रा ने धोखे से जमीन खरीदी फर्जी दस्तावेज दिए? सरकार में अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके Land use change करवाया और DLF ने बड़े प्यार से साढ़े 7 करोड़ की जमीन 58 करोड़ रु. में खरीद ली।

क्या ये सच नहीं है कि लंदन के दो flat रॉबर्ट वाड्रा के हैं? बेनामी हैं? अगर नहीं हैं तो इन flats के renovation का खर्चा रॉबर्ट वाड्रा ने क्यों उठाया? अब ये कहने का क्या मतलब कि ये राजनीतिक बदले की कार्रवाई है? अब तो जांच पूरी हो चुकी। मामला कोर्ट के सामने है। crime के घेरे में राहुल के जीजा जी रॉबर्ट वाड्रा भी हैं और DLF भी, और तलवार दोनों के सिर पर लटकी है।

शराब घोटाला : क्या भूपेश बघेल का बेटा दोषी है?

कांग्रेस के लिए दूसरी बुरी खबर छत्तीसगढ़ से आई। 2000 करोड़ रु. के शराब घोटाले के आरोप में ED ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को गिरफ़्तार कर लिया। कोर्ट ने चैतन्य बघेल को 5 दिन के लिए ED की कस्टडी में भेज दिया।

ED का आरोप है कि 2018 से 2023 के दौरान जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री थे तब राज्य में दो हज़ार करोड़ से ज़्यादा का शराब घोटाला किया गया। इस घोटाले में भूपेश बघेल की सरकार में आबकारी मंत्री रहे कवासी लखमा, कारोबारी अनवर ढेबर और पूर्व IAS अधिकारी अनिल टुटेजा शामिल थे। ईडी का आरोप है कि शराब घोटाले की काली कमाई को चैतन्य बघेल की रियल एस्टेट कंपनियों के जरिए white money में बदला गया।

ED का आरोप है कि भूपेश बघेल की सरकार के वक्त स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन जो शराब खरीदता था, उसके एवज़ में शराब बनाने वाली कंपनियों से मोटा कमीशन लिया जाता था। ED का ये भी इल्ज़ाम है कि उस दौरान छत्तीसगढ़ की सरकारी शराब की दुकानों से कच्ची शराब बेची जाती थी जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था और सारा पैसा शराब सिंडीकेट के हाथ में चला जाता था। शराब कंपनियों से रिश्वत लेकर उनको fixed मार्केट शेयर दिए जाते थे, जिससे वो कार्टेल बनाकर मनमानी क़ीमत पर शराब बेचते थे। ईडी का आरोप है कि विदेशी शराब के धंधे में एंट्री के बदले में भी रिश्वत ली जाती थी।

इस मामले में पहली FIR छत्तीसगढ़ के एंटी करप्शन ब्यूरो ने दर्ज की थी जिसमें पूर्व आबकारी मंत्री समेत 70 लोग आरोपी बनाए गए थे। इसी के बाद इस मामले में ED की एंट्री हुई। इस केस में ED अब तक 205 करोड़ रुपए की संपत्ति ज़ब्त कर चुकी है और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से भी कई बार पूछताछ की गई है।

छत्तीसगढ़ में शराब घोटाला 2022 में सामने आया था। पिछले विधानसभा चुनाव में भूपेश बघेल के खिलाफ ये बड़ा मुद्दा बना। उस वक्त भूपेश बघेल ने कहा था कि ये सारा ड्रामा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए रचा गया। चुनाव हुए, सरकार बदल गई, फिर पिछले डेढ़ साल से भूपेश बघेल हर दूसरे दिन ये बयान देते थे कि शराब घोटाले का क्या हुआ? अब तक उसमें कुछ निकला क्यों नहीं? अगर कोई सबूत था तो कोई एक्शन क्यों नहीं हुआ?

अब एक्शन हो गया, बेटे की गिरफ्तारी हो गई, तो भूपेश बघेल कह रहे हैं, ये सब बदले की कार्रवाई है। अब मामला कोर्ट में है और अदालत में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

ज़मीन के बदले नौकरी : क्या लालू ने घोटाला किया?

ज़मीन के बदले नौकरी के मामले में लालू यादव की मुश्किलें बढ़ी हैं। लालू ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले के ट्रायल पर रोक लगाने की गुजारिश की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में चल रही है, इसलिए फिलहाल वो इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा, यानि कि ट्रायल चलता रहेगा।

हालांकि लालू की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई तेजी से करने और जल्द केस का निपटारा करने का निर्देश जरूर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव को उम्र और स्वास्थ्य के कारण ट्रायल कोर्ट में पेशी से छूट भी दी।

लालू को भले ही कोर्ट में पेशी से छूट मिल गई हो, लेकिन कोर्ट में केस लगेगा और जब-जब सुनवाई होगी, तो लैंड फॉर जॉब की चर्चा भी होगी। बिहार में चुनाव सिर पर हैं, भ्रष्टाचार के इस केस की चर्चा होगी, तो नुकसान तेजस्वी को होगा। लालू यादव इसी सियासी नुकसान से बचना चाहते थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

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Kissa Robert Ka : Is he guilty of money laundering?

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMThe sword of arrest appears to be dangling overe Robert Vadra’s head, with a Delhi court slated to hear a chargesheet filed by Enforcement Directorate after six days. Realizing the danger, Congress leader Rahul Gandhi, for the first time, came out in defence of his Jija Ji (brother-in-law). The Congress party deployed its full army to defend Vadra.
Rahul Gandhi tweeted: “My brother-in-law has been hounded by this government for the last ten years. This latest chargesheet is a continuation of that witch hunt. I stand with Robert, Priyanka and their children, as they face yet another onslaught of malicious, politically motivated slander and harassment. I know that they are all brave enough to withstand any kind of persecution and they will continue to do so with dignity. The truth will eventually prevail.”
On Friday, the Rouse Avenue Court in Delhi directed court staff to go through the ED chargesheet and submit its report within five days. On July 24, the court will decide whether to take cognizance of the chargesheet.
The matter relates to a 3.5 acre land deal in Shikohpur, Gurugram. ED’s charge is that when Bhupinder Singh Hooda was CM of Haryana, Vadra’s company Skylight Hospitality bought this land from Onkareshwar Properties for Rs 7.5 crore, and within 24 hours, Skylight registered it is Robert Vadra’s name, while normally this process takes three months.
Within two months, the land use of this parcel of land was changed and permission was granted for commercial development. Four years later, this land purchased for Rs 7.5 crore by Vadra was sold to DLF at a clean profit of 700 per cent.
Police had filed an FIR in September, 2018 in which Hooda was made one of the accused. ED started the money laundering angle, summoned Vadra thrice for questioning and on July 16 this year, ED seized 43 properties worth more than Rs 37 crore belonging to Vadra and his company. The next day, ED filed its chargesheet.
ED’s charge is that Vadra bought land in Manesar, Naurangpur, Lakhnaula, Sihi and Shikohpur villages at throwaways prices and sold them to realty companies.
Congress spokesperson Supriya Shrinate alleged that the government has been persecuting Robert Vadra for the last 11 years, this is the first chargesheet that has been filed and ED will not be able to prove its charges.
It is for the court to decide now, but the question is, how money laundering took place?
ED’s allegation is that Vadra made a big profit in the land deal and invested in purchasing two flats in London. ED says, arms dealer Sanjay Bhandari was the frontman for Vadra.
In its chagesheets filed in 2020 and 2023, ED had alleged that Sanjay Bhandari had purchased two flats on Bourdon Street and Bryanston Square in London, but the real owner of these houses was Robert Vadra.
Sanjay Bhandari fled to London from India in 2016 and on July 5 this year, a Delhi court declared him as a proclaimed economic offender. The Centre is now trying to extradite Sanjay Bhandari to India.
In defence of Robert Vadra, the questions that are being raised are: Can buying and selling of properties be treated as illegal? Can sale and purchase of land be called a criminal offence? Was Vadra given the licence for change of land use? Did Vadra made any stamp duty evasion?
Robert Vadra’s reply to all these questions is ‘No’. His supporters say, both land and land use licence are with DLF, then what is Robert Vadra’s crime?
But Vadra did not disclose his connection with DLF. Why DLF was so generous towards Vadra and made him earn 700 per cent profit on land in four years?
Questions that are being asked are: Is it not true that Vadra purchased land through fake documents? Did he not get the land use changed by misusing his clout with the state government? Is it not a fact that DLF lovingly bought Rs 7.5 crore worth land for Rs 58 crore? Is it not a fact that the real owner of both the flats in London is Robert Vadra? If the flats are not part of benami transactions, why did Vadra foot the bills for renovation of these flats? Why is the probe being called a political vendetta?
The probe is practically over and the matter is before the court. Rahul Gandhi’s ‘Jija Ji’ Robert Vadra and DLF are both accused in the case, and the swords continue to hand over both of them.

Chhattisgarh liquor scam : Is Baghel’s son guilty?

There is bad news for Congress from Chhattisgarh too. Former CM Bhupesh Baghel’s son Chaitanya Baghel was arrested on Friday by ED. He has been remanded in ED custody for five days. ED’s charge is that between 2018 and 2023, when Bhupesh Baghel was CM, a Rs 2,000 crore liquor scam took place in which his excise minister Kawasi Lakhma, businessman Anwar Dhebar and former IAS officer Anil Tuteja were involved. Black money earned as commission from this scam was converted into white through real estate companies owned by the CM’s son.
ED’s charge is that commission was taken from liquor manufacturers who supplied liquor to state marketing corporation. No records were kept about country liquor sold through government outlets and most of the money went in the hands of ‘liquor syndicate’. Liquor companies had formed cartel and got fixed market share in lieu of bribes. Till now, ED ha seized Rs 205 crore worth properties belonging to the accused and former CM Bhupesh Baghel was also interrogated.
On Friday, Bhupesh Baghel alleged that his son was arrested on his birthday because he was opposing clearing of forests meant to favour Adani group. Congress workers staged protest in Raipur.
The Chhattisgarh liquor scam surfaced in 2022 and it had become a big issue during the last assembly elections. At that time, Bhupesh Baghel had alleged that this was a drama to help BJP in the elctions.
After BJP came to power, Baghel had been asking what happened to the liquor scam. Now that action has been taken and his son has been arrested, Bhupesh Baghel is describing this as political vendetta. The matter is in court which will decide whether the accused are guilty or not.

Land for job scam : Trial of Lalu will continue

Former Bihar chief minister Lalu Yadav failed to get relief from Supreme Court on Friday in the ‘land for job’ scam. The apex court refused to stay trial in this case, but exempted Lalu Yadav from appearing in court during trial because of health and old age.
The apex court directed the trial court complete its proceedings at the earliest. Lalu Yadav may have got exemption, but when the trial will continue, corruption will become an issue for debate during Bihar assembly elections. This can harm Tejashwi Yadav’s electoral prospects. Lalu Yadav wanted to avoid this political loss, but the apex court poured cold water on his plans.

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बिहार में अपराधी मस्त, पुलिस पस्त, मुख्यमंत्री चुप

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMबिहार में अपराधियों ने फिर मौत का तांडव मचाया. पटना के एक अस्पताल में घुसकर पांच हत्यारों ने उम्र कैद की सज़ा काट रहे एक शख्स को गोलियों से भून दिया. हत्यारे फिल्मी स्टाइल में बड़े इत्मीनान से आए, हत्या करके आराम से चले गए. रोहतास में JD-U के नेता के पिता की हत्या कर दी गई. दानापुर में बीस साल के लड़के को काटकर उसके घर के सामने फेंक दिया गया.

लेकिन बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कुन्दन कृष्णन का कहना है कि ये कोई बड़ी बात नहीं है, हर साल अप्रैल से जून के बीच सुपारी किलिंग का सीज़न चलता है, किसान खाली होते हैं, सुपारी किलिंग करते हैं, बारिश के बाद फिर काम पर लग जाते हैं, इसलिए अब ये सिलसिला बंद हो जाएगा. ADG साहब कह रहे थे कि माता-पिता को अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए, समाज अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा, इसलिए नौजवान जल्द पैसे कमाने के चक्कार में अपराध कर रहे हैं.

बिहार के पुलिस महानिदेशक ने कहा कि पटना में जो हत्या हुई, वह गैंग वॉर का नतीजा है, एक अपराधी को दूसरे अपराधियों ने मार दिया, मरने वाले पर भी दर्जनों केस हैं.

JD-U के नेता केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह ने भी अजीब तर्क दिया. कहा, गैंग वॉर और आपसी दुश्मनी में हत्याएं हो रही हैं, हर जगह, हर राज्य में होते है, अब दो आदमी आपस में झगड़ जाएं, एक दूसरे को मार दें, तो इसमें पुलिस क्या कर लेगीं? इसमें कानून और व्यवस्था की बात कहां से आई?

सवाल ये नहीं है कि लालू के राज में ज्यादा हत्याएं होती थी या नीतीश के शासन में ज्यादा हत्याएं हो रही हैं. ये कोई अपराधों का T-20 match नहीं चल रहा. सवाल तो ये है कि मुख्यमंत्री ने पुलिस को क्या निर्देश दिए ? सवाल तो ये है कि क्या बिहार की पुलिस ने अपराधियों के सामने घुटने टेक दिए हैं? सवाल तो ये है कि बिहार में अपराधी इतने बेखौफ क्यों हैं ?

सवाल तो ये है कि बिहार की पुलिस अपराधियों के सामने इतनी मजबूर, इतनी नाकारा क्यों है? पुलिस की विवशता उसके बहानों में झलकती है. ADG रैंक का officer ये कहे कि किसान हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं, ये अपराध का season चल रहा है और बारिश शुरू होने के साथ खत्म हो जाएगा.

तो क्या ये पुलिस के मानसिक दिवालियापन का सबूत नहीं है?

एक अफसर ने कहा कि किसान जिम्मेदार है, फिर कहा कि समाज अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा. यानी जो हत्याएं, जो लूटपाट हो रही हैं, इसके लिए या तो समाज जिम्मेदार है या किसान. अपराधी आराम से हत्या करके निकल जाते हैं और पुलिस अफसर कह रहे हैं कि वो shooters का Data Bank बनाएंगे.

अब तक पुलिस क्या कर रही थी ? 20 साल से गृह विभाग नीतीश कुमार के पास है. कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी नीतीश कुमार की है. और नीतीश कुमार scene से गायब हैं. पुलिस की इस तरह की बेसिरपैर की बातों का खामियाज़ा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भुगतना पड़ेगा. अगर तेजस्वी यादव इसे मुद्दा बनाते हैं, तो इसमें गलत क्या है?

नीतीश कुमार ने पलटी मारी : मुफ्त बिजली मिलेगी

नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले फिर एक नया दांव चला. बिहार में 125 यूनिट बिजली मुफ्त देने का एलान कर दिया. जुलाई का बिजली का जो बिल आएगा, उसमें 125 यूनिट से कम बिजली इस्तेमाल करने वालों का बिल जीरो होगा और बाकी लोगों के बिल में 125 यूनिट बिजली का पैसा कम किया जाएगा. सरकार का दावा है कि इस फैसले से बिहार के एक करोड़ 82 लाख परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा.

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि उनकी सरकार के इस फैसले से गरीबों को काफी राहत मिलेगी क्योंकि ज्यादातर गरीब परिवार हर महीने 125 यूनिट से कम बिजली खर्च करते हैं.

बिहार के मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि सरकार पहले भी बिजली में 80 परसेंट सब्सिडी दे रही थी लेकिन caste census के बाद पता चला था कि 94 लाख ऐसे परिवार हैं, जो बेहद गरीब हैं, बिजली का खर्च उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है, इसलिए उन्हें राहत देने के लिए ये फैसला लिया गया है.

RJD के नेता मनोज झा ने कहा कि तेजस्वी ने 200 यूनिट बिजली फ्री देने का वादा किया था, इसलिए नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले 125 यूनिट बिजली मुफ्त कर दी. तेजस्वी ने बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने का वादा किया, नीतीश कुमार ने उसे लागू कर दिया. मनोज झा ने कहा कि नीतीश कुमार तेजस्वी की लाइन पर चल रहे हैं, इसलिए अब तो उन्हें भी मान लेना चाहिए कि तेजस्वी में मुख्यमंत्री बनने के सारे गुण हैं.

नेता कुछ भी कहें, लेकिन ये तो सही है कि यही नीतीश कुमार पहले मुफ्त की योजनाओं का विरोध करते थे. उन्होंने मुफ्त बिजली देने को भी गलत बताया था लेकिन अब वही नीतीश कुमार 125 यूनिट बिजली मुफ्त दे रहे हैं.

इसीलिए अगर JD-U के नेता ये मान लें कि ये फैसला चुनाव को देखकर किया गया है, तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा. आज कल सारे नेता, सारी पार्टियां चुनाव से पहले इस तरह के फैसले करती हैं. तेजस्वी यादव मुफ्त बिजली, बुजुर्गों, विधवाओं और बेरोजगारों को पेंशन के जो वादे कर रहे हैं, वो भी तो चुनावी रणनीति का हिस्सा है. जनता सब जानती है. इसलिए नेताओं को इधर-उधर की बातें करने के बजाए सीधी-सीधी साफ-साफ बात करनी चाहिए.

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Bihar’s helpless police and hopeless Chief Minister

WhatsApp Image 2025-04-29 at 3.16.49 PMBihar witnessed another round of terror by hardcore criminals. Five gunmen, carrying pistols, entered Paras Hospital in Patna, and pumped bullets into a life term convict undergoing treatment and fled.
The convict, Chandan Mishra, a criminal from Buxar, was facing 24 cases of murders, robberies and kidnappings. He was convicted in one case for life term imprisonment, and had come out of Beur jail on parole for treatment.
The cctv footage of the killers leaving hospital after committing murder looks like a film scene, but sadly, this is a real-life incident, not a reel-life one.
The killers had made a reel outside the hospital a month ago threatening to kill Mishra. They posted it on social media, but Patna police was caught napping.
The worrying part of this sordid episode is the remark of Bihar police chief Vinay Kumar, who said, Chandan Mishra should have taken care about his security and police had advised him to be careful. The DGP did not say what the police was doing.
Police have identified the shooters. One of them is Tauseef Badshah ‘Sheru’, of Phulwari Sharif, who has more than a dozen cases of murder, etc. against him. Police went to his home and, as expected, he was not there. Police went to the school where his mother is a teacher and enquired about his whereabouts. The police chief described this murder as an outcome of a gang war.
In Danapur near Patna, a 20-year-old youth Shivam’s throat was slashed by killers. His body was found in his grandfather’s village. In Rohtas, a JD(U) leader’s father Paras Nath Singh’s blood-stained body was found in the ‘gaushala’ where he used to sleep. Police attributed the motive to a land dispute.
The most surprising remark came from Additional DGP (STF) Kundan Krishnan, who blamed parents for not paying attention to the youths, who take to crime to earn quick money through ‘supari killing’. He also said, April to June is the lean farming season, when the number of supari killings spirals.
RJD leader Tejashwi Yadav lambasted the police official for saying that this was the crime season. JD(U) leader Lallan Singh reminded reporters about the terror of criminals during Lalu Yadav’s ‘jungle raj’. He said, most of the murders that have taken place were due to personal quarrels or land disputes, and police must not be blamed.
The main question is not that there used to be more killings during Lalu Yadav’s rule compared to Nitish Kumar’s reign. Theis not a T20 match for crimes.
The questions that people are asking: What order has Nitish Kumar given to the police to curb crimes? Has Bihar Police conceded defeat as far as criminals are concerned? Why have the criminals become fearless? Why is the police finding itself helpless in the face of spiralling crimes?
The compulsion of police can be gauged from the remarks of its Additional DGP, when he says that since it is a lean farming season, crimes are on the rise, and the spiral will stop with the advent of monsoon. Is it not a reflection of mental bankruptcy?
One official says, farmers who have no work to do are responsible for crimes, another official says, society and family elders are not doing their job. Do they want to say that society or farmers are responsible for the recent spurt in crimes?
Criminals calmly leave a hospital after pumping bullets into a man lying on a bed and the police official says, we will create a data bank of all such shooters.
For the last 20 years, the chief minister Nitish Kumar has been holding the Home portfolio. He is ultimately responsible for ensuring law and order, and he is absent from the scene.
Nitish Kumar will have to bear the consequences for such irresponsible remarks of his police officials. If Tejashwi Yadav goes to town and makes it an issue, there is nothing wrong in it.

Nitish Kumar’s role reversal : pre-poll freebie

Bihar CM Nitish Kumar on Thursday announced a freebie ahead of assembly elections. He announced free electricity up to 125 units a month for all consumers, and this will be reflected in the July bill from August 1 onwards. Consumers who use more units, will have their bill reduced for the first 125 units.
State minister Ashok Chaudhary said, the government was already footing 80 per cent subsidy on power, and after the caste census was carried out, it was found that there are 94 lakh families which are extremely poor and they need relief.
RJD leader Manoj Jha said, Tejashwi Yadav had promised 200 units free electricity, and Nitish Kumar has copied the idea by announcing free power up to 125 units. Similarly, Nitish Kumar had copied Tejashwi ‘s idea of giving old age pension.
One should remember it was Nitish Kumar who had been opposing election freebies in the past. He had then opposed free electricity. The same leader has now announced 125 units free electricity.
Heavens will not fall if leaders of Nitish’s party JD(U) admit that this freebie has been announced in view of forthcoming elections.
All leaders of political parties announce freebies before elections. This has been the practice in the last two decades. Tejashwi Yadav had promised free electricity, pension for old people and widows, and allowances for unemployed youths. That was also part of election strategy.
The people know this. Instead of trying obfuscate the issue, leaders should clearly admit that this is a freebie announced ahead of elections. Period.

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