
काशी पहुंचने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया. स्वामी जी ने योगी के सनातनी हिन्दू होने पर सवाल उठा दिया. योगी से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने हिन्दू होने का प्रमाण मांगा.
स्वामी जी ने कहा कि योगी को चालीस दिन में ये साबित करना होगा कि वो हिन्दू हैं और गाय को माता मानते हैं.
पूछा गया कि इसके लिए योगी को क्या करना होगा, तो अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि योगी गाय को राज्य माता घोषित करें, गो हत्या और गोमांस के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएं, अगर वो ऐसा नहीं करते तो साबित हो जाएगा कि योगी हिन्दू नहीं हैं.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज में माघ पूर्णिमा के दिन (1 फरवरी को) संगम में स्नान करने की प्रशासन की अपील को ठुकरा दिया है. उनका कहना है कि वह मौनी अमावस्या को संगम पर स्नान नहीं कर पाए, इसलिए अब माघ पूर्णिमा को भी स्नान करने नहीं जाएंगे.
स्वामी का कहना है, मार्च में लखनऊ में संत समागम करेंगे और अगर इन चालीस दिनों में योगी ने गाय को माता घोषित नहीं किया, गोमांस के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया तो संत समागम में योगी को नकली हिन्दू घोषित कर दिया जाएगा.
अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के दिल में योगी के प्रति जबरदस्त गुस्सा है. उन्हें लगता है कि अगर योगी चाहते तो अफसरों को मांफी मांगने के लिए कह सकते थे लेकिन योगी ने ऐसा नहीं किया, इसीलिए अब वो बार-बार सनातन और हिन्दुत्व की बात करके योगी को निशाना बना रहे हैं.
गुरुवार को उन्होंने योगी को “कालनेमी, नकली संन्यासी और सनातन विरोधी”, न जाने क्या-क्या कह दिया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि योगी को अब हिन्दू होने का प्रमाण देना ही होगा.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की भाषा, उनके बयान, उनका आचरण देख कर दूसरे साधु संत हैरान हैं. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्र पुरी ने कहा कि उन्हें तो समझ नहीं आ रहा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को क्या हो गया, वह साधु संतों की मर्यादा को तोड़ रहे हैं, योगी के खिलाफ अविमुक्तेश्वरानंद ने जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया, वैसा कोई शंकराचार्य नहीं कर सकता.
अयोध्या में तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर आचार्य परमहंस ने कहा कि अविमुक्तश्वरानंद जी ने अपने व्यवहार और अपनी वाणी से संत परंपरा का अपमान किया है, अगर उन्होंने अपना आचारण नहीं सुधारा, अपने अहंकार और क्रोध पर काबू नहीं रखा तो उन्हें शंकराचार्य कौन मानेगा?
ज़मीनी हकीक़त देखें तो गोवध और गोमांस निर्यात पर पाबंदी लगाने की स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की मांग में कोई दम नहीं है. भारत में उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड में गाय और गोवंश की हत्या पर पूरी पाबंदी है. केवल आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में कुछ शर्तों के साथ पाबंदी है. केरल, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में गोवध पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है.
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ अक्सर न केवल गाय को माता कह कर संबोधित करते रहे हैं, बल्कि 2017 से 2020 के बीच गौशालाओं के निर्माण पर 764 करोड़ रु. खर्च किये हैं.
इस साल के यूपी के बजट में 2,000 करोड़ रु. का आवंटन गोवंश कल्याण और आवारा गायों के संरक्षण के लिए हुआ है. राज्य सरकार ने यह धन शराब, एक्सप्रेस वे टोल और कृषि मंडियों पर cow cess (अधिभार) लगा कर संग्रह किया है.
यूपी गोवध निवारण संशोधन अधिनियम, 2020 में गाय का वध करने पर तीन साल कैद और 3 लाख रु. जुर्माने का प्रावधान है, गोवंश को कम करने पर कम से कम एक साल कैद और 1 लाख रु. जुर्माने का प्रावधान है. यदि कोई व्यक्ति गोवंश को घातक चोट पहुंचाता है, तो उसे 1 साल से लेकर 7 साल कैद और 1 लाख से लेकर 3 लाख रु. जुर्माने का प्रावधान है.
यदि कोई व्यक्ति गायों की तस्करी में पकड़ा जाता है, तो उन गायों के रखरखाव के लिए एक साल का खर्च उसी आरोपी से वसूलने का प्रावधान है. दोबारा गोतस्करी में पकड़े जाने पर उसे दुगुनी सजा और 10 साल तक कैद का भी प्रावधान है.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धर्म की आड़ लेकर राजनीति के मैदान में उतर तो गए, पर कच्चे खिलाड़ी निकले.
योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के मुद्दे पर घेरना उनकी बड़ी गलती है, सनातन और गौमाता के प्रति योगी की निष्ठा पर सवाल उठाना मूर्खता होगी. देश दुनिया में योगी आदित्यनाथ की छवि सनातन के रक्षक की है.
अविमुक्तेश्वरानंद ने ऐसी गलती पहली बार नहीं की है. अविमुक्तेश्वरानंद ने पिछले साल राहुल गांधी को हिन्दू धर्म से बाहर करने की बात कही थी, पुजारियों से राहुल गांधी को मंदिरों में घुसने से रोकने का आदेश दिया था.
इससे पहले जब समाजवादी पार्टी के शासन के समय काशी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर पुलिस ने लाठियां बरसाई थीं. तब उन्होंने अखिलेश को सनातन का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था.
अविमुक्तेश्वरानंद दावा तो शंकराचार्य होने का करते हैं पर उनका आचरण एक मुफस्सिल सियासी नेता जैसा है. अगर उन्होंने अपने गुस्से पर काबू नहीं किया, बेसिर-पैर के बयान देना नहीं छोड़ा तो उनकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचेगी और लोग कहेंगे – “कौआ चला, हंस की चाल”.
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