Rajat Sharma

My Opinion

मोदी को सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट : असली ‘मौत के सौदागर’ कौन थे ?

rajat-sirमहाराष्ट्र में जारी नॉन स्टॉप सियासी ड्रामे के बीच शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी एक अच्छी खबर आई। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की उस जांच रिपोर्ट को सही माना है जिसमें नरेंद्र मोदी को 2002 के गुजरात दंगे में क्लीन चिट दी गई थी। कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट को चुनौती देनेवाली याचिका खारिज कर दी।

जस्टिस ए. एम. खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सी. टी. रविकुमार ने दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी ज़किया जाफरी और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि इस याचिका में कोई मेरिट नहीं है, कोई दम नहीं है। दरअसल, इस याचिका में गुजरात दंगों के पीछे एक ‘बड़े स्तर पर साजिश’ की जांच की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ सभी आरोपों का अध्ययन किया। सीबीआई के पूर्व निदेशक आर. के. राघवन की अगुवाई वाली एसआईटी की जांच रिपोर्ट का भी अध्ययन किया और इसके बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि इस बात के कोई सबूत नही हैं कि 2002 में दंगे भड़काने के लिए ‘बड़े स्तर पर’ कोई साजिश रची गई।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा-‘संक्षेप में हमारा विचार है कि एसआईटी की इस जांच में कोई दोष नहीं पाया जा सकता। इस मामले को बंद करने से जुड़ी आठ फरवरी 2012 की एसआईटी रिपोर्ट पूरी तरह से तथ्यों और मजबूत तर्कों पर आधारित है। साथ ही उस अवधि में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ आपराधिक साजिश (बड़े स्तर पर) के आरोपों को खारिज करने के लिए यह रिपोर्ट हर तरह से पर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी और अन्य लोगों पर आरोप लगाकर इस मुद्दे को सनसनीखेज बनाने और झूठी गवाही देने के लिए दो पूर्व आईपीएस अधिकारियों आर. बी. श्रीकुमार और संजीव भट्ट को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने यह सुझाव दिया कि पिछले 16 साल से इस मुद्दे को गरमाए रखने के पीछे जो लोग शामिल हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने इन लोगों को ‘असंतुष्ट’ करार दिया।

बड़े स्तर पर जांच कराने की ज़किया जाफरी की याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईटी ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी जांच की और उस रिपोर्ट पर सवाल उठाना न्याय का मजाक है। यह अदालत की बुद्धिमत्ता पर संदेह करने जैसा होगा।

नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तारीफ करते हुए बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा-‘आज मैं कांग्रेस, वामपंथियों और अन्य लोगों से पूछना चाहता हूं, आपकी पूरी दुकान पिछले 20 साल से नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान के दम पर चल रही थी। अब और कितने दिन आप इस तरह अपनी दुकान को चलाओगे? उन्होंने कहा कि आज जब राहुल गांधी से ईडी पूछताछ करती है तो कांग्रेस कार्यकर्ता आसमान सिर पर उठा लेते हैं। जब गुजरात दंगे की एसआईडी जांच हो रही थी, तो उस वक्त नरेंद्र मोदी ने पूरी मजबूती से जांच का सामना किया और सच्चाई सामने आ गई है।

गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘सत्य सोने की तरह चमकता बाहर आया है। मोदी जी ने पिछले 18-19 साल से बड़ी खामोशी के साथ इस दर्द को सहा है। देश का इतना बड़ा नेता एक शब्द बोले बगैर सभी दुखों को भगवान शंकर के विषपान की तरह गले में उतारकर सहन करता रहा। ‘

अमित शाह ने कहा, ‘मैंने मोदी जी को नजदीक से इस दर्द को झेलते हुए देखा है। क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया चल रही थी इसलिए सत्य के साथ होने के बावजूद उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला। बहुत मजबूत मन का आदमी ही ऐसा कर सकता है। उन्होंने यह दर्द चुपचाप सहा।

मुझे लगता है कि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने जो सबसे चौंकाने वाली बात कही वो ये कि इस केस की को-पेटिशनर तीस्ता सीतलवाड़ ने ज़किया जाफरी की भावनाओं का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया। किसी के दर्द से खेलना, किसी की पति की मौत का फायदा उठाना एक बड़ा अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को देखा, समझा और माना कि तीस्ता सीतलवाड़ ने नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए ज़किया जाफरी के दुख-दर्द का फायदा उठाया।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की भी जांच करवाने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा- ‘अंत में हमें ऐसा लगता है कि राज्य के कुछ असंतुष्ट अधिकारियों और अन्य लोगों ने सनसनी फैलाने के लिए संयुक्त रूप से कुछ खुलासा करना चाहते थे जो खुद उनकी नजर में भी झूठ था। एसआईटी ने उनके दावों के झूठ को पूरी तरह से उजागर कर दिया था।’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो प्रक्रिया का इस तरह से गलत इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके खिलाफ कानून के दायरे में कार्रवाई की जानी चाहिए।’

मेरे ख्याल से अब गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी का चैप्टर क्लोज़ होना चाहिए और तीस्ता सीतलवाड़ जैसी सामाजिक कार्यकर्ता की फाइल खोलनी चाहिए। अगर हम सुप्रीम कोर्ट की भावनाओं का सम्मान करते हैं तो गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने का खेल बंद होना चाहिए। जिन लोगों ने इन दंगों या दंगा पीड़ितों का इस्तेमाल अपनी सियासत चमकाने के लिए किया अब उनका नंबर आना चाहिए। देश की जनता को जानने का हक है कि असल में ‘मौत के सौदागर’ कौन थे।

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SC clean chit to Modi: Let people know who were the real ‘Maut Ke Saudagar’

rajat-sir In the midst of the ongoing non-stop political potboiler going on in Maharashtra, came good news for Prime Minister Narendra Modi on Friday, when a division bench of Supreme Court upheld the findings of the Special Investigation Team, which had given a clean chit to Modi in the 2002 Gujarat riots case.

Justice A M Khanwilkar, Justice Dinesh Maheshwari and Justice C T Ravikumar rejected the petition of Zakia Jafri, widow of former Congress MP Ehsan Jafri, who was killed by rioters, and activist Teesta Setalvad, seeking a probe into the “larger conspiracy” behind the Gujarat riots. The bench, after going through all allegations against the then CM Narendra Modi and other officials, and perusing the findings of the SIT headed by R K Raghavan, ex-CBI chief, came to the conclusion that there was no evidence to prove that the Gujarat riots of 2002 were the result of a criminal conspiracy hatched at the highest level, when Modi was chief minister.

The bench said: “To sum up, we are of the considered opinion that no fault can be found with the approach of the SIT in submitting final report dated 8.2.2012, which is backed by firm logic, expositing analytical mind and dealing with all aspects objectively for discarding the allegations regarding larger criminal conspiracy (at the highest level) for causing and precipitating mass violence across the state against the minority community during the relevant period.”

The Supreme Court took to task two former IPS officers R B Sreekumar and Sanjiv Bhatt for giving false testimonies to sensationalize the issue by incriminating Modi and others. The apex court suggested that those behind the ulterior deign for keeping the issue boiling for the last 16 years must be brought to book. The court termed them as ‘disgruntled’.

While rejecting Zakia Jafri’s plea for a larger probe, the apex court said that the SIT had conducted a thorough probe under the supervision of Supreme Court and questioning the findings of the report would amount to travesty of justice and doubting the wisdom of this court which had supervised/monitored the probe.

Hailing the SC verdict which has drawn a curtain over all allegations against Modi, BJP leader Ravi Shankar Prasad said: “Today I want to ask Congress, Left and others, your entire shop was running on the campaign against Narendra Modi for the last 20 years, how many more days will you run this shop now?”

Home Minister Amit Shah, in an interview to a news agency on Saturday, said, “the truth has come out shining like gold. Modi ji had silently endured pain for the last 19 years, like Lord Shiva who swallowed poison and held it in his throat….It was a battle for 19 years, and a great leader like Narendra Modi endured the pain like Lord Shiva.”

Amit Shah said, “I have closely seen Modiji enduring the pain, facing allegations despite being on the side of truth, and since the matter was in court, he never spoke on this issue. Only a man with a strong heart can do this….He endured it all silently.”

The most notable part of Friday’s Supreme Court verdict was that the bench said, co-petitioner Teesta Setalvad used the emotions of Zakia Jafri for her benefit. To play with the emotions and pain over the death of a lady’s husband is nothing short of crime. The Supreme Court clearly went through all the findings and evidences and found that Teesta Setalbad exploited Zakia Jafri’s pain to tarnish Narendra Modi’s image.

That is why the apex court has said, “At the end of the day, it appears to us that a coalesced effort of the disgruntled officials of the state, along with others, was to create sensation by making revelations which were false to their own knowledge. The falsity of their claims had been fully exposed by the SIT…All those involved in such abuse of process, need to be in the dock and proceeded with, in accordance with the law.”

In my opinion, enough is enough. The entire chapter relating to Narendra Modi and Gujarat riots must now be closed, and the file about the role of activists like Teesta Setalvad should be opened. If we truly respect the feelings of the Supreme Court, the game to defame Narendra Modi for Gujarat riots must now be brought to an end. Probe should begin against those who used the riots and the riot victims for their political vested interests. The people of India have the right to know who were the real ‘Maut Ke Saudagar’ (merchants of death).

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उद्धव ठाकरे के हाथ से बाज़ी निकल चुकी हैं

rajat-sir महाराष्ट्र में सियासी संकट जारी है। शिवसेना के एक और विधायक दिलीप लांडे शुक्रवार को गुवाहाटी जाकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले बागी गुट में शामिल हो गए। इसके साथ ही शिवसेना के बागी विधायकों की कुल संख्या 38 हो गई है। गुरुवार को शिवसेना के 3 विधायक शिंदे गुट में शामिल हुए। गुवाहाटी में 8 ऐसे निर्दलीय विधायक भी मौजूद हैं, जिन्होंने शिंदे गुट को अपना समर्थन दे रखा है।

शिवसेना के दो-तिहाई से ज्यादा विधायक अब बागी हो चुके हैं, और अगर पार्टी टूटती है तो ये भी बाग़ी विधायक संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्य घोषित होने से बच जाएंगे।

इसी बीच शिवसेना ने डिप्टी स्पीकर को लिखे पत्र में शिंदे सहित 16 विधायकों को विधायक दल की बैठक में भाग लेने के लिए चीफ व्हिप का आदेश न मानने के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की है। विधानसभा सचिवालय ने शिवसेना को लिखे एक पत्र में एकनाथ शिंदे की जगह अजय चौधरी को शिवसेना विधायक दल का नेता नियुक्त किया है।

उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे शुक्रवार को पार्टी मुख्यालय में शिवसेना के जिला प्रमुखों के साथ एक मीटिंग में शामिल हुए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवसेना शुक्रवार की शाम मुंबई के मरीन ड्राइव पर एक जनसभा कर सकती है।

शिवसेना नेता संजय राउत ने एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से मुलाकात कर मौजूदा मुश्किल से बाहर निकलने के तरीकों पर चर्चा की। इसके बाद संजय राउत ने दावा किया कि महा विकास अघाड़ी सदन के पटल पर बहुमत साबित करेगी, और ‘अगर यह लड़ाई सड़क पर लड़नी है, तो हम इसके लिए भी तैयार हैं।’ संजय राउत ने कहा, ‘मैं उन्हें (बागी विधायकों को) सदन के पटल पर आने की चुनौती देता हूं।’

तमाम दावों के उलट हक़ीक़त यही है कि उद्धव ठाकरे के खेमे में अब शिवसेना के सिर्फ 12 विधायक रह गए हैं, और एकनाथ शिंदे के पास वह संख्याबल है जिससे वह बीजेपी की मदद से महा विकास आघाड़ी सरकार गिरा सकते हैं। बीजेपी के पास 106 विधायक हैं और उसे 7 निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी हासिल है।

गुरुवार को एकनाथ शिंदे ने गुवाहाटी के एक होटल में अपने समर्थक विधायकों की परेड कराई और कहा कि हमारे पीछे एक ‘महाशक्ति’ खड़ी है। एकनाथ शिंदे के खेमे का मनोबल इस वक्त बहुत ऊंचा है, और अब बागियों के मुंबई वापस लौटने और राज्यपाल से मिलने में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है। गुरुवार को बागी विधायकों ने शिंदे को अपना नेता घोषित कर ‘भारत माता की जय’ और ‘बालासाहेब ठाकरे की जय’ के नारे लगाए।

ठाकरे परिवार अब इस बात से भी परेशान है कि एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक 56 साल पहले 19 जून, 1966 को बालासाहेब ठाकरे द्वारा बनाई गई पार्टी पर भी कब्जा कर सकते हैं। शिंदे गुट इसके साथ ही चुनाव आयोग में भी याचिका दायर करके शिवसेना के चुनाव चिह्न ‘तीर और धनुष’ की मांग कर सकता है। एकनाथ शिंदे ने यह भी दावा किया है कि शिवसेना के 18 लोकसभा सांसदों में से कम से कम 14 सांसद उनके साथ हैं। शिंदे अपने गुट को असली शिवसेना बता रहे हैं।

उद्धव ठाकरे के सहयोगी शरद पवार और कांग्रेस अब मुश्किल में हैं। गुरुवार को, NCP सुप्रीमो शरद पवार ने कहा कि बहुमत का फैसला विधानसभा में होगा, और ‘विधायकों को पहले मुंबई वापस आना होगा।’

यह बात उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों जानते हैं कि बाजी हाथ से निकल चुकी है। शिवसेना के 38 विधायक बागी नेता एकनाथ शिंदे के साथ दिखाई दे रहे हैं। अब इस बात का कोई मतलब नहीं है कि इन विधायकों को डरा-धमकाकर गुवाहाटी ले जाया गया। बागी विधायक पिछले 4 दिनों से गुवाहाटी में डेरा डाले हुए हैं, लोगों से खुलेआम मिलजुल रहे हैं और नई सरकार बनाने की तैयारी कर रहे हैं। ये विधायक अभी से जीत के जश्न की बात कर रहे हैं।

वहीं, दूसरी तरफ उद्धव और उनके साथी हथियार डाल चुके हैं और खुद ही अपनी हार के संकेत दे रहे हैं। उन्हें आभास हो गया है कि शिवसेना के बागी विधायकों के समर्थन से देवेंद्र फडणवीस की सत्ता में वापसी होने जा रही है।

ये सारी बातें मुझे देवेंद्र फडणवीस के उस शेर की याद दिलाती हैं जो उन्होंने उद्धव सरकार बनने के बाद 2019 में विधानसभा में कही थी। फडणवीस ने तब कहा था, ‘मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना, मैं समंदर हूं, लौटकर वापस आऊंगा।’ और अब फडणवीस वाकई में सत्ता में वापसी की तैयारी कर रहे हैं।

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Uddhav Thackeray is fighting a losing battle

akb full_frame_74900The political imbroglio in Maharashtra continues with one more Shiv Sena MLA Dilip Lande landing in Guwahati on Friday, to join the Eknath Shinde-led camp taking the total number of Shiv Sena MLAs in the rebel fold to 38. Three Shiv Sena MLAs had joined the Shinde camp on Thursday. There are also eight independent MLAs in Guwahati, who have extended support to Shinde.

More than two-thirds of the Shiv Sena MLAs have now become rebels, and if a vertical split takes place, they will be saved from disqualification under the Tenth Schedule of the Constitution (anti-defection law).

In a related development, the Shiv Sena, in letters to the Deputy Speaker, has sought disqualification of 16 MLAs, including Shinde, for defying the Chief Whip’s order for attending legislative party meeting. The Assembly Secretariat has, in a letter to Shiv Sena, accepted the appointment of Ajay Choudhary as the leader of Shiv Sena legislative party replacing Eknath Shinde.

Uddhav Thackeray’s son Aditya Thackeray was huddled in a meeting with district Shiv Sena chiefs at a meeting in party headquarters on Friday. There are reports that a public meeting of Shiv Sena is planned Friday evening on Mumbai’s Marine Drive.

Shiv Sena leader Sanjay Raut met NCP supremo Sharad Pawar to discuss ways to come out of the present impasse. Later, Sanjay Raut claimed that the Maha Vikas Aghadi will prove majority on the floor of the House, and “if this battle is fought on the roads, we are ready for it too”. “I challenge them (rebel MLAs) to come to the floor of the House”, Sanjay Raut said.

Despite claims to the contrary, the fact remains that the Uddhav Thackeray camp is now left with only 12 Shiv Sena MLAs, and Eknath Shinde has the numbers to topple the MVA government, with BJP’s help. BJP has 106 MLAs and there are seven independents who are ready to support BJP.

On Thursday, Eknath Shinde paraded his supporter MLAs in a Guwahati hotel, and said that we have a ‘maha shakti’ which is behind us. The morale in Eknath Shinde’s camp now is very high, and it is just a matter of time before the rebels will return to Mumbai and meet the Governor. On Thursday, the rebel MLAs declared Shinde as their leader and chanted slogans ‘Bharat Mata Ki Jai’ and ‘Balasaheb Thackeray Ki Jai’.

The Thackeray family is now worried that Eknath Shinde and his supporters may also take control of the 56-year-old party, founded by Balasaheb Thackeray on June 19, 1966. Shinde group may also petition the Election Commission of India and seek the ‘bow and arrow’ election symbol of Shiv Sena. Eknath Shinde has also claimed that at least 14 out of 18 Shiv Sena MPs in Lok Sabha are in his camp. Shinde is going to declare his group as the real Shiv Sena.

Uddhav Thackeray’s allies, Sharad Pawar and Congress, are now in a fix. On Thursday, NCP supremo Sharad Pawar said that the majority will be decided on the floor of the House, and “let the MLAs first return to Mumbai”.

Both Uddhav Thackeray and Sharad Pawar know that they have lost the game, because 38 Shiv Sena MLAs are now with rebel leader Eknath Shinde. Nobody can say that these MLAs were intimidated and taken to Guwahati by force. The rebel MLAs have been camping in Guwahati for the last four days, freely mixing with people, and making preparations on how to instal a new government. These rebels are already in a celebratory mood.

On the other hand, Uddhav and his advisers are now fighting a losing battle with their back to the wall. They are already visualizing Devendra Fadnavis coming back to power with the support of rebel Shiv Sena MLAs.

It reminds me of the famous Urdu couplet (sher) that Fadnavis quoted in the Assembly in 2019, when the MVA government took over. Fadnavis had then said, “Mera paani utarta dekh, mere kinarey par ghar mat basa lena, Main samandar hoon, lout kar waapas aaoonga” (On seeing my water level recede, Do not build your home at my place, I am the sea, and I shall return). Fadnavis is ready to sweep back to power and make a grand comeback.

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क्या अब ठाकरे मुक्त शिवसेना ?

rajat-sir महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की महा विकास आघाड़ी सरकार अब अंतिम सांसें गिन रही है। विधायक एक-एक कर उनका साथ छोड़ते जा रहे हैं और उधर बागी नेता एकनाथ शिंदे का खेमा और मजबूत होता जा रहा है। उद्धव ठाकरे सरकार को जल्द इस्तीफा देना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा लग रहा है कि बागी विधायकों की शिवसेना में वापसी अब मुश्किल है। उनके वापस लौटने के संकेत नहीं के बराबर हैं। एकनाथ शिंदे का गुट गुवाहाटी के होटल में डेरा डाले हुए हैं जहां कुल 42 विधायक मौजूद हैं। इनमें निर्दलीय विधायकों की संख्या 8 है।

एकनाथ शिंदे गुट की ओर से गुरुवार दोपहर सोशल मीडिया पर उद्धव ठाकरे के नाम एक खुली चिट्ठी जारी की गई। इस चिट्ठी पर तारीख 22 जून लिखा है। यह चिट्ठी शिवसेना के बागी विधायक संजय शिरसाट के नाम से जारी की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले ढाई साल से पार्टी विधायकों के लिए मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ के दरवाजे बंद कर दिए गए थे।

शिरसाट ने आरोप लगाया कि उद्धव ने अपने बेटे आदित्य ठाकरे को अयोध्या जाने की इजाजत दी लेकिन शिवसेना विधायकों को अयोध्या जाने से रोक दिया गया। शिरसाट ने अपनी चिट्ठी में आरोप लगाया, ‘जब पार्टी के लिए हिंदुत्व और राम मंदिर का मुद्दा महत्वपूर्ण है तो फिर पार्टी नेतृत्व ने हमें अयोध्या जाने से क्यों रोका ? विधायकों को बुला लिया और फिर उन्हें कहा गया कि वे आदित्य ठाकरे के साथ अयोध्या नहीं जाएं।’

शिवसेना के बागी विधायक ने अपनी चिट्ठी में यह भी आरोप लगाया कि ‘मुख्यमंत्री कभी सचिवालय नहीं गए और वह मातोश्री में रहा करते थे। हमें उनके आसपास के लोगों को कॉल करना होता था। वे कभी हमारा फोन नहीं उठाते थे। हम सब इन बातों से तंग आ चुके थे और एकनाथ शिंदे से यह कदम उठाने का आग्रह किया।’

एकनाथ शिंदे के खेमे में बागी विधायकों की संख्या बढ़ती जा रही है। शिंदे का साथ दे रहे विधायकों और बीजेपी एवम् अन्य एनडीए समर्थक दलों को मिला दें तो विधायकों की कुल संख्या 164 हो जाती है जो बहुमत के आंकड़ों से 20 ज्यादा है। वहीं महाविकास अघाड़ी गठबंधन का संख्या बल घट चुका है क्योंकि शिवसेना के पास अब केवल 13 विधायक बचे हैं। इस तरह महाविकास अघाड़ी में विधायकों की कुल संख्या 124 के आंकड़े तक ही पहुंचती है जो कि बहुमत से काफी कम है। एकनाथ शिंदे ने कहा है कि वह शिवसेना को बंटने नहीं देंगे बल्कि उद्धव ठाकरे को पद छोड़ने और शिवसेना का नेतृत्व अपने खेमे को सौंपने के लिए मनाएंगे। शिंदे पहले ही कह चुके हैं कि वे बीजेपी के साथ गठबंधन करना पसंद करेंगे।

इस बीच बुधवार रात उद्धव ठाकरे ने अपना आधिकारिक आवास ‘वर्षा’ खाली कर दिया और सामान के साथ अपने घर ‘मातोश्री’ में शिफ्ट हो गए। जिस वक्त उद्धव ‘मातोश्री’ जा रहे थे उस वक्त हजारों की तादाद में शिव सैनिक उमड़ पड़े और 9 किलोमीटर की यात्रा के दौरान उनके समर्थन में नारे लगाए। उद्धव ठाकरे ने अभी इस्तीफा नहीं दिया है लेकिन अपने आधिकारिक आवास को खाली कर अपने समर्थकों को एक संदेश देने की कोशिश की है।

वहीं दूसरी ओर बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस और उसके सहयोगी पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रखे हुए हैं और सही समय का इंतजार कर रहे हैं ताकि नई सरकार सत्ता संभाल सके।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बुधवार को अपने फेसबुक लाइव स्पीच में साफ तौर पर बचाव करते हुए नजर आए। वे डिफेंसिव थे। उन्होंने कई बार कहा कि वे इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं और (सीएम की) कुर्सी से चिपके रहना पसंद नहीं करेंगे। लेकिन उद्धव ने कहा कि जिन लोगों ने बगावत की है वे उनके पास आएं और उनके मुंह पर कहें कि वे चाहते हैं आप सीएम पद छोड़ दें। इससे साफ है कि उद्धव हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।

अपने भाषण में उद्धव ने कहा कि वह एनसीपी या कांग्रेस नेताओं की तुलना में शिवसैनिकों को तरजीह देते थे। उन्होंने कहा, ‘अगर किसी शिवसेना विधायक या नेता को ऐसा लगता है कि मैं मुख्यमंत्री बने रहने के लायक नहीं हूं, तो उन्हें मुंबई आकर मेरे सामने यह बताना चाहिए। मैं तुरंत इस्तीफा दे दूंगा।’

उद्धव ठाकरे को यह दिन इसलिए देखना पड़ा क्योंकि उन्होंने यह मान लिया था कि उनका कद बाला साहेब ठाकरे की तरह बड़ा है। लेकिन शिवसेना नेताओं को उनमें कभी बाला साहेब की छवि नजर नहीं आई। दशकों से ठाकरे परिवार के प्रति वफादार रहे एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं को उन्होंने लगातार दरकिनार किया। वे यह मान चुके थे कि शिंदे कहीं नहीं जाएंगे और उनकी सही कीमत नहीं पहचान सके।

उद्धव ने कभी-भी शिवसेना के सीनियर नेताओं को भी मिलने समय नहीं दिया और न ही उनके अनुरोध पर कोई विचार किया। उन्होंने इस झूठी धारणा को बरकरार रखा कि शिवसेना के नेताओं और कार्यकर्ताओं को उनके सिवा कहीं नहीं जाना है। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि शिवसेना के विधायक बगावत करेंगे।

वहीं दूसरी तरफ शिवसेना के नेता और कार्यकर्ता यह देख रहे थे कि गठबंधन की मजबूरियों के चलते उद्धव एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि जैसे उद्धव को शरद पवार और सोनिया गांधी से सर्टिफिकेट लेने में ज्यादा दिलचस्पी है। इसके बाद एकनाथ शिंदे जैसे पुराने और वफादार साथी ने यह फैसला लिया कि उद्धव का वक्त अब खत्म हो चुका है और उन्हें अपने समर्थकों के साथ विद्रोह करना चाहिए।

एकनाथ शिंदे अपनी पार्टी के विधायकों और समर्थकों से लगातार मिलते रहते थे। वे हिंदुत्व की विचारधारा के बारे में बोलते थे और तब शिवसेना के कार्यकर्ताओं को यह अहसास हुआ कि जब वे बीजेपी के साथ गठबंधन में थे तो उन्हें ज्यादा सम्मान मिलता था।

उद्धव मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने किंग मेकर शरद पवार को अपना बॉस मान लिया। एकनाथ शिंदे जैसे सीनियर नेताओं को जब ये दिखाई दिया कि उनके लिए आगे के रास्ते बंद हैं। उद्धव अपने बाद अपने बेटे आदित्य को सीएम बनाएंगे। किसी और को चांस मिलना मुश्किल है। शिवसैनिकों को लगा कि ये भी बाला साहेब के स्टाइल के खिलाफ है। इसीलिए उन्होंने तय किया कि अगर वो शिवसेना पर ही कब्जा कर लें और उद्धव को बाहर करके बीजेपी के साथ सरकार बना लें तो उनके अच्छे दिन वापस आ जाएंगे।

महाराष्ट्र में पिछला विधानसभा चुनाव बीजेपी और शिवसेना ने साथ मिलकर लड़ा था। शिवसेना के 99 फीसदी विधायक यह चाहते थे कि बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार बने लेकिन उद्धव और उनके बेटे आदित्य ठाकरे की उच्च व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण शिवसेना के 99 फीसदी विधायकों की भावनाओं को खारिज कर दिया गया।

पिछले ढाई साल से चल रही महाविकास आघाड़ी सरकार के शासन के दौरान शिवसेना के ज्यादातर विधायकों और मंत्रियों ने देवेंद्र फडणवीस सरकार और एमवीए सरकार के अंतर को लगभग हर रोज महसूस किया। इन विधायकों को लगा कि इस शासन में उनकी कोई भूमिका ही नहीं है। उद्धव ठाकरे अपने विधायकों की भावनाओं को समझने में नाकाम रहे। वे शरद पवार और सोनिया गांधी को खुश रखने में व्यस्त रहे और यही उनके राजनीतिक पतन का कारण बना।

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Is it going to be Thackeray-Mukt Shiv Sena now?

rajat-sirMaharashtra chief minister Uddhav Thackeray’s Maha Vikas Aghadi government is now on the brink, with more MLAs leaving his camp and joining rebel leader Eknath Shinde’s fast-increasing band of MLA supporters. Uddhav Thackeray’s government may have to resign soon, as there appears to be no sign of rebel MLAs walking back to the Shiv Sena fold. The Eknath Shinde camp has now 42 MLAs present at the hotel in Guwahati. These include 34 Shiv Sena and eight independent MLAs.

On Thursday afternoon, in an open letter addressed to Uddhav Thackeray dated June 22, and circulated on social media on Thursday by Shinde camp, a rebel Shiv Sena MLA Sanjay Shirsat alleged that the doors of the chief minister’s official residence ‘Varsha’ were closed to party MLAs for the last two and a half years.

Shirsat alleged, Uddhav allowed his son Aditya Thckeray to visit Ayodhya, but Shiv Sena MLAs were prevented from going to Ayodhya. “When Hindutva and Ram Mandir are crucial issues for the party, why did the party leadership prevented us from visiting Ayodhya? MLAs were called and were told not to accompany Aditya Thackeray to Ayodhya”, Shirsat alleged in his letter.

The rebel Shiv Sena MLA also alleged in his letter that “the Chief Minister never visited the Secretariat, and he used to be in Matoshri. We used to call people around him, but they never used to take our calls. We were fed up of all these things and requested Eknath Shinde to take this step.”

With the influx of more rebel MLAs, the Eknath Shinde camp, along with BJP, and other NDA supporters now claims to have the support of a total of 164 MLAs, 20 more than the required majority, while the MVA with a dwindled Shiv Sena camp of only 13 MLAs, has the support of only 124 MLAs. Eknath Shinde has said he would not split the Shiv Sena vertically, and would convince Uddhav Thackeray to quit and hand over the leadership to his camp. Shinde is already on record having said that he would prefer an alliance with the BJP.

Meanwhile, on Wednesday night Uddhav Thackeray vacated his official residence ‘Varsha’ and shifted with his bag and baggage to his own residence ‘Matoshri’, even as thousands of Shiv Sainiks chanted slogans in his support during his 9-km journey. Thackeray is yet to tender his resignation, but by vacating his official residence, he has sought to send a message to his supporters.

On the other hand, BJP leader Devendra Fadnavis and his associates are keenly watching the developments and are waiting for the right time to strike, so that a new government can take over.

In his Facebook Live speech on Wednesday, Chief Minister Uddhav Thackeray clearly was on the defensive. He said several times that he was ready to resign, and would not like to cling to the (CM’s) chair. But he said, those who have rebelled should come to him and tell him in his face that they wanted him to quit. Clearly, Uddhav is now fighting with his back to the wall.

In his speech, Uddhav said, he used to give preference to Shiv Sainiks compared to NCP or Congress leaders. “Even if any Shiv Sena MLA or leader feels that I am not capable of continuing as CM, they should come to Mumbai and tell this in front of me. I will immediately resign”, Uddhav said.

Uddhav Thackeray had to see this day because he assumed that he was as big in stature as the late Balasaheb Thackeray, but Shiv Sena leaders never saw the image of Balasaheb in him. Uddhav continuously sidelined leaders like Eknath Shinde, who were loyalist of Thackeray family for decades. He took them for granted.

Uddhav never gave appointments to even senior Shiv Sena leaders, never listened to their requests, and harboured the false assumption that Shiv Sena leaders and workers had nowhere to go except him. He never thought that Shiv Sena MLAs would revolt.

On the other hand, Shiv Sena leaders and workers were watching that Uddhav, because of ‘coalition compulsions’ was giving more preference to NCP and Congress leaders. It looked as if Uddhav was more interested in getting certificates from Sharad Pawar and Sonia Gandhi. It was then that old loyalist Eknath Shinde decided that Uddhav’s time was up and he must revolt with his supporters.

Eknath Shinde used to constantly meet his party MLAs and supporters. He used to speak about Hindutva ideology, and Shiv Sena workers then realized that they used to get more respect when they were in alliance with BJP.

Uddhav managed to become the chief minister, but in the process, he accepted Sharad Pawar, the king maker, as his boss. Leaders like Eknath Shinde saw that their political future was in jeopardy because Uddhav was anyhow going to anoint his son Aaditya Thackeray as the CM. That is when the rebels decided to take control of the party and force Uddhav to resign. They felt that their ‘acche din’ (good days) would come if they tied up in alliance with the BJP.

After the last assembly elections in Maharashtra, which the Shiv Sena fought in alliance with the BJP, 99 percent Shiv Sena MLAs wanted that a coalition government be formed with BJP, but because of high personal ambitions of Uddhav and his son Aaditya Thackeray, the feelings of 99 per cent Shiv Sena MLAs were overruled.

As the Maha Vikas Aghadi rule went on for two and a half years, most of the Shiv Sena MLAs and ministers felt almost everyday, the difference between the rule of MVA government and that of Devendra Fadnavis’ coalition government. These MLAs found that they had no say in governance. Uddhav Thackeray failed to gauge the sentiment of his MLAs. He was busy keeping Sharad Pawar and Sonia Gandhi happy, and that led to his political downfall.

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महाराष्ट्र संकट: फैसला अब उद्धव को करना है

AKb (1)महाराष्ट्र में चल रहा सियासी संकट अब और गहरा गया है। शिवसेना नेता संजय राउत ने मोटे तौर पर संकेत दे दिया है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार, जो अब अल्पमत में है, विधानसभा को भंग करने की सिफारिश करने के बारे में विचार कर रही है। ऐसे संकेत हैं कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस्तीफा दे सकते हैं।

अपने लोगों को एकजुट रखने की कवायद में शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे, 40 अन्य असंतुष्ट विधायकों के साथ एक चार्टर्ड फ्लाइट में सूरत से रवाना हुए और बुधवार की सुबह गुवाहाटी पहुंच गए। ये विधायक देर रात करीब 2.15 बजे सूरत में अपने होटल से 3 बसों में सवार होकर गुजरात पुलिस की सुरक्षा में एयरपोर्ट पहुंचे। असम से बीजेपी सांसद पल्लव लोचन दास ने गुवाहाटी एयरपोर्ट पर बागी विधायकों का स्वागत किया और उन्हें एक होटल में ले गए।

शिवसेना से बगावत का नेतृत्व करने वाले एकनाथ शिंदे और अन्य निर्दलीय विधायकों ने सूरत और गुवाहाटी में पत्रकारों को बताया कि वे अभी भी शिवसेना के साथ हैं, और सभी बागी विधायक चाहते हैं कि उद्धव ठाकरे महा विकास अघाड़ी से नाता तोड़कर बीजेपी के साथ गठबंधन करें और नई सरकार बनाएं।

मुंबई में बुधवार की सुबह हुई विधायक दल की बैठक में कांग्रेस के कई विधायकों के शामिल नहीं होने की खबरों के बीच NCP सुप्रीमो शरद पवार अपने सिपहसालारों के साथ कांग्रेस पर्यवेक्षक कमलनाथ से बातचीत कर रहे हैं। सीएम उद्धव ठाकरे ने दोपहर में अपनी कैबिनेट के साथ वर्चुअल मीटिंग की, जिसमें शिवसेना और सहयोगी दलों के 8 मंत्रियों ने हिस्सा नहीं लिया। शिवसेना ने बुधवार शाम को एक बैठक में शामिल होने के लिए पार्टी के सभी विधायकों को व्हिप जारी किया है। पार्टी ने धमकी दी है कि जो विधायक इस मीटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में सबसे पेचीदा सवाल यह है कि जब एकनाथ शिंदे 35 विधायकों के साथ सूरत गए तो मुख्यमंत्री ठाकरे और उनकी पुलिस इंटेलिजेंस को बगावत की खबर कैसे नहीं लग पाई। इस काम को बेहद सीक्रेट तरीके से अंजाम दिया गया और ठाकरे के सिपहसालारों को इसके बारे में कानों-कान खबर नहीं लगी। बुधवार को उद्धव द्वारा बुलाई गई बैठक में शिवसेना के 55 में से केवल 17 विधायक मौजूद थे। इनमें से भी 3 विधायकों को किसी तरह खींच-खांचकर उद्धव के सामने पेश किया गया। जब यह साफ हो गया कि 55 में से 35 विधायकों ने बगावत कर दी है, तो खतरे की घंटी बजी और दिल्ली में बैठे NCP सुप्रीमो शरद पवार से संपर्क किया गया।

ठाकरे ने शिंदे को मनाने के लिए अपने 2 भरोसेमंद नेताओं, मिलिंद नार्वेकर और रविंद्र फाटक को सूरत भेजा, लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली। इन दोनों नेताओं ने उद्धव और उनकी पत्नी रश्मि ठाकरे की शिंदे से फोन पर बात करवाई, लेकिन बागी नेता टस से मस नहीं हुए। उन्होंने उद्धव के सामने एक ही शर्त रखी कि वह NCP और कांग्रेस से नाता तोड़ लें, और बीजेपी से समझौता करके उनके साथ ही सरकार चलाएं। उद्धव ने एकनाथ शिंदे से 20 मिनट तक बात की, पुराने रिश्तों की दुहाई दी, लेकिन शिंदे अपने स्टैंड पर कायम रहे।

बगावत का ऐलान तो तभी हो गया था जब क्रॉस वोटिंग की वजह से अघाड़ी गठबंधन राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। एकनाथ शिंदे इस बात से नाखुश थे कि चुनावों के दौरान पार्टी नेतृत्व ने उनसे सलाह-मशविरा नहीं किया। चुनावों में हार के बाद जब शिवसेना नेताओं ने शिंदे और बाकी विधायकों से संपर्क की कोशिश की तो उनके फोन ‘अनरीचेबल’ थे। कुछ ही देर बाद पता चला कि शिंदे ने बगावत कर दी है और वह 35 विधायकों के साथ सूरत पहुंच गए हैं। एकनाथ शिंदे ने उद्धव और उनके दूतों से कहा कि शिवसेना एक कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी के रूप में जानी जाती है, और उसकी इस पहचान के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। शिंदे ने यह भी कहा कि बीजेपी ही शिवसेना की स्वाभाविक साझेदार है।

एकनाथ शिंदे की बगावत शिवसेना के लिए दोहरा झटका है। पहला तो यह कि उद्धव ठाकरे ने कभी ये उम्मीद नहीं की होगी कि जिस एकनाथ शिंदे को उन्होंने विधायक दल का नेता बनाया, शहरी विकास जैसा अहम मंत्रालय दिया, वह इस तरह पार्टी से बगावत करेंगे। दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब उन्हें पता चला कि पार्टी के अधिकांश विधायक एकनाथ शिंदे के साथ हैं, और अगर ये इसी तरह शिंदे के साथ रहे तो फिर सरकार का बने रहना मुश्किल होगा।

शिवसेना के असंतुष्ट विधायकों को वापस पार्टी में लाना एक बहुत बड़ा काम है। उद्धव के नेतृत्व वाले MVA गठबंधन सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 145 विधायकों की जरूरत है, लेकिन शिंदे के बागी होने के बाद उसके पास जरूरी आंकड़े नजर नहीं आ रहे।

बुधवार को NCP सुप्रीमो शरद पवार ने इस सियासी संकट को शिवसेना का अंदरूनी मामला बताया। शिवसेना, NCP और कांग्रेस के बीच महा विकास अघाड़ी गठबंधन बनने के वक्त से ही पवार इसके संकटमोचक की भूमिका में रहे हैं। पवार ने कहा, इस सरकार को गिराने की यह तीसरी कोशिश है। पवार इस बार उद्धव ठाकरे पर आए इस संकट को सुलझाने में दिलचस्पी लेते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

महा विकास अघाड़ी में जो हो रहा है, वह तो होना ही था। यह कहानी 3 साल पहले शुरू हुई थी, जब महाराष्ट्र की जनता ने बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन को वोट दिया था, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के लिए उद्धव ठाकरे ने बीजेपी को धोखा दे दिया, और कांग्रेस एवं NCP के साथ मिलकर सरकार बना ली। सरकार तो बन गई लेकिन शिवसैनिक हर दिन यह महसूस करते रहे कि उनकी विचारधारा कांग्रेस और NCP से मेल नहीं खाती।

तमाम शिवसैनिक खुलेआम कहते रहे हैं कि बालासाहेब ठाकरे होते तो कभी भी NCP और कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करते। इसके बाद शिवसेना के नेताओं में यह इंप्रेशन बना कि कहने को तो उद्धव मुख्यमंत्री हैं, पर सरकार शरद पवार चलाते हैं। शिवसेना के मंत्रियों को लगता था कि सरकार में NCP के मंत्रियों का ज्यादा दबदबा है।

दूसरी तरफ देवेंद्र फडणवीस कभी इस बात को बर्दाश्त ही नहीं कर पाए कि बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने उनके नाम पर चुनाव जीता, जबकि सूबे की सरकार शिवसेना-NCP-कांग्रेस गठबंधन चला रहा है। फडणवीस ने उम्मीद नहीं छोड़ी, वह लगे रहे और जब भी मौका मिला, उन्होंने गठबंधन सरकार पर जमकर निशाना साधा। पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने पहले राज्यसभा के चुनाव में और फिर विधान परिषद के चुनाव में उद्धव को मात दी। और फिर MLC चुनाव के तुरंत बाद एकनाथ शिंदे 35 विधायकों लेकर सूरत पहुंच गए और उद्धव सरकार को इसकी भनक तक नहीं लगी।

जितनी सफाई से इस रणनीति की योजना बनाई गई थी, उसी से पता चलता है फडणवीस और शिंदे मिलकर काम कर रहे थे। बाजी अब इन दोनों के हाथ में है, जबकि उद्धव ठाकरे अपनी डूबती नैया को बचाने में लगे हैं। उन्होंने लाख सिर पटका पर शिंदे इस बात पर अड़े हुए हैं कि शिवसेना बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चलाए। इस तरह देखा जाए तो बात 3 साल पहले जहां से शुरू हुई थी, अब वहीं पहुंच गई है। देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनना है, अब यह फैसला उद्धव को करना है कि यह काम करेगा कौन: वह खुद या शिंदे?

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Maharashtra crisis: Ball is now in Uddhav’s court

akb fullThe ongoing political crisis in Maharashtra has now deepened with Shiv Sena leader Sanjay Raut broadly hinting that the Uddhav Thackeray-led coalition government, now in a minority, is toying with the idea of recommending dissolution of the assembly. There are indications that Chief Minister Uddhav Thackeray may resign.

Rebel Shiv Sena leader Eknath Shinde, along with 40 other dissident MLAs, left Surat in a chartered flight and landed in Guwahati on early Wednesday morning, in order to keep his flock together. The MLAs boarded three buses from their hotel in Surat at around 2.15 am and were escorted to the airport by Gujarat police. At Guwahati airport, the rebel MLAs were welcomed by Assam BJP MP Pallab Lochan Das, and taken to a hotel.

Eknath Shinde, who led the rebellion and broke away with Shiv Sena and other independent MLAs told reporters in Surat and Guwahati that he was still with the Shiv Sena, and it was the wish of all rebel MLAs that Uddhav Thackeray should walk out from Maha Vikas Aghadi, join a coalition with BJP and form a new government.

In Mumbai, hectic talks are going on between NCP supremo Sharad Pawar with his party lieutenants and Congress observer Kamal Nath, amidst reports that several Congress MLAs did not attend a meeting of legislature party this morning. Uddhav Thackeray, down with Covid, held a virtual cabinet meeting in the afternoon, in which 8 ministers of Shiv Sena and allies did not take part. Shiv Sena has issued whip to all party MLAs to attend a meeting on Wednesday evening. The party has threatened to expel them if they failed to attend.

The most intriguing question in the Maharashtra political drama is how Chief Minister Thackeray and his police intelligence had no information about the rebellion, when Eknath Shinde with 35 MLAs went to Surat. This was done in total secrecy, and Thackeray’s lieutenants had no inkling about the unrest. On Wednesday, there were only 17 out of 55 Shiv Sena MLAs present at a meeting called by the CM. Out of them, three MLAs were practically forced to attend the meeting. When it was confirmed that 35 out of 55 MLAs have left the party, alarm bells started ringing, and NCP supremo Sharad Pawar, sitting in Delhi, was contacted.

Thackeray sent two of his confidantes, Milind Narvekar and Ravindra Phatak to Surat to persuade Shinde, but they failed. The two leaders persuaded Shinde to speak to Uddhav and his wife Rashmi Thackeray over phone, but the rebel leader was adamant. His only condition: Uddhav Thackeray must snap ties with NCP and Congress, and form a coalition government with BJP. Uddhav spoke to Eknath Shinde for 20 minutes, reminding him of how Balasaheb Thackeray used to help him in the past, but Shinde stuck to his stand.

The rebellion took shape when the Aghadi coalition faced reverses in the Rajya Sabha and Legislative Council elections due to cross-voting. Eknath Shinde was unhappy that he was not consulted by the party leadership during the elections. After the electoral losses, when Shiv Sena leaders contacted Shinde and other MLAs, their phones were unreachable, and it then dawned that the rebel leader has landed in Surat with 35 MLAs. Eknath Shinde told Uddhav and his messengers that Shiv Sena was known as a staunch pro-Hindutva party, and no more compromises with its identity will be accepted. Shinde also said that BJP was Shiv Sena’s natural ally.

Shinde’s rebellion was a double shocker for the Shiv Sena leadership. Uddhav had anointed Eknath Shinde as the leader of Shiv Sena legislature party (from which he was removed on Wednesday), and had given him the Urban Development portfolio. He never imagined in his dreams that Shinde would revolt and bring down his government.

The task to bring back the dissident Shiv Sena MLAs back into the party fold is humungous. The Uddhav-led MVA coalition government needs 145 MLAs to prove its majority, but, after Shinde’s rebellion, it seems to be short of majority.

On Wednesday, NCP supremo Sharad Pawar described the political crisis as Shiv Sena’s internal matter. Pawar had been part of crisis management since the time the Maha Vikas Aghadi coalition was formed between SS, NCP and Congress. Pawar said, this is the third time that attempts are being made to topple the government. This time, Pawar does not seem to be quite eager to solve Uddhav Thackeray’s crisis.

The crisis in Maha Vikas Aghadi was expected. The story began three years ago, when the people of Maharashtra had voted Shiv Sena and BJP alliance to power, but Uddhav Thackeray, who wanted to become the Chief Minister, ditched the BJP, and joined hands with NCP and Congress to form the Aghadi (alliance) government. Though the government is now almost three years old, most of the Shiv Sainiks feel that their ideology does not gell with the ideologies of NCP and Congress.

There are many Shiv Sainiks who are openly saying that had Balasaheb Thackeray been alive, he would never have allowed this coalition with NCP and Congress. Moreover, the impression has gone among Shiv Sena cadre that though Uddhav Thackeray is the CM, the reins of power are firmly in the hands of Sharad Pawar. Shiv Sena ministers too felt that NCP ministers are getting more weightage in government.

On the other hand, former CM and BJP leader Devendra Fadnavis could not digest the fact that an SS-NCP-Congress coalition government was ruling the state, despite the people of the state giving the mandate to BJP-SS alliance during the assembly polls. Fadnavis did not lose hope and he targeted the coalition government at every opportunity. In the last few weeks, it was Fadnavis, whose strategy during the Rajya Sabha and Legislative Council elections paid off. Soon after the MLC elections, Eknath Shinde left for Surat with his flock of 35 MLAs, and the state government had no inkling about it.

The utmost secrecy with which this strategy was planned clearly indicates Fadnavis and Shinde were working in tandem. Both of them now hold the ace in their hands, while Uddhav Thackeray is busy trying to save his sinking boat. Uddhav tried his best to persuade, but Eknath Shinde did not budge an inch from his stand that Shiv Sena must ally with BJP. After a gap of three years, the story has now reached the same point, from where it began. Fadnavis may become the chief minister, and it is for Uddhav to decide who will take the initiative: he or Shinde?

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अग्निपथ: नौजवानों में भ्रम कौन फैला रहा है?

akbमध्य प्रदेश के ग्वालियर, राजस्थान के सीकर और महाराष्ट्र के सतारा में भर्ती की तैयारी करते नौजवानों की खबरों के आने के साथ ही अग्निपथ को लेकर नौजवानों के मन में उपजा आक्रोश कम होता दिख रहा है। भारतीय सेना ने सोमवार को भर्ती की नोटिफिकेशन जारी की, जिसके तहत जुलाई से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू हो जाएगा।

अग्निपथ योजना के तहत, इस साल कुल 46000 अग्निवीर भर्ती किए जाएंगे, जिनमें 40 हजार आर्मी और 3-3 हजार नेवी और एयरफोर्स में भर्ती किए जाएंगे। भारत के विभिन्न हिस्सों में अगस्त और नवंबर के बीच 83 रैलियों के जरिए अग्निवीरों के 2 बैच भर्ती किए जाएंगे। सूत्रों ने कहा कि लगभग 25,000 अग्निवीरों की ट्रेनिंग दिसंबर में शुरू हो जाएगी जबकि बाकियों की ट्रेनिंग अगले साल फरवरी में शुरू होगी।

सबसे बड़ी खबर यह रही कि सोमवार को भारत में कहीं भी नौजवानों द्वारा आगजनी या पथराव की एक भी रिपोर्ट नहीं आई। ऐसा लगता है कि उम्मीदवारों को यह स्पष्ट संदेश पहुंच गया है कि अगर पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट उनके खिलाफ जाती है तो वे फौज में भर्ती होने का मौका खो देंगे। उम्मीदवारों को एक एफिडेविट देना होगा कि वे ऐसी किसी हिंसा में शामिल नहीं थे।

राजनीतिक दलों ने तो अग्निपथ स्कीम का विरोध करके मौके का फायदा उठाने की कोशिश जारी रखी, लेकिन भारत के अधिकांश बड़े कॉरपोरेट्स ने इस स्कीम का स्वागत किया है और सेना से 4 साल के बाद रिटायर होने वाले अग्निवीरों को अपने यहां भर्ती करने का वादा किया है। इन कॉरपोरेट्स में टाटा ग्रुप, महिंद्रा, आरपीजी, बायोकॉन, जेएसडब्ल्यू ग्रुप और हिंदुस्तान यूनिलीवर शामिल हैं। कुछ संगठनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद का कुछ खास असर देखने को नहीं मिला। बिहार में ट्रैफिक कम रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा समेत अन्य राज्यों में जनजीवन सामान्य रहा।

बिहार में हिंसा को लेकर अब तक 159 FIR दर्ज की गई हैं, जबकि 877 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इसके अलावा पटना में 3 कोचिंग संचालकों पर भी FIR की गई है। बिहार के ही रोहतास में 2 कोचिंग सेंटर्स के कोऑर्डिनेटर गिरफ्तार किए गए हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में भी 9 कोचिंग सेंटर वाले पुलिस की गिरफ्त में हैं। तेलंगाना में भी पुलिस ने कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने वालों पर ऐक्शन लिया है, और एक कोचिंग संचालक पर FIR की गई है जबकि एक को गिरफ्तार किया गया है। पटना पुलिस ने उन 40 उपद्रवियों के पोस्टर जारी किए हैं जिन्होंने पालीगंज इलाके में तोड़फोड़ और आगजनी की थी, साथ ही थाने पर भी हमला किया था। पालीगंज के SDO और ASP ने स्थानीय नेताओं, कोचिंग सेंटर चलाने वालों और अभिभावकों से बात की और कहा कि वे अपने छात्रों और बच्चों को समझाएं कि इस तरह की हिंसा से कोई रास्ता नहीं निकलता।

बिहार पुलिस अब उन वॉट्सऐप ग्रुप्स के ऐडमिन को टारगेट कर रही है जो युवाओं को विरोध के लिए भड़का रहे थे। बिहार पुलिस की डेल्टा टीम उपद्रवियों का पता लगाने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट्स को खंगाल रही है। डेल्टा टीम 10 से ज्यादा टेलिग्राम ग्रुप, करीब 500 Facebook पेज के अलावा वॉट्सऐप ग्रुप और यूट्यूब चैनलों पर नजर रख रही है। विभिन्न सियासी दलों के मोदी विरोधियों ने भी नौजवानों के आक्रोश को भड़काया, और जब बिहार में आगजनी और हिंसा की घटनाएं होने लगीं, तो राजनीतिक कार्यकर्ता अभ्यर्थी बनकर मैदान में कूद पड़े। 100 से 300 नौजवानों को ट्रेनिंग देने वाले कोचिंग सेंटर्स में से अधिकांश का कोई न कोई राजनीतिक जुड़ाव होता है। कोचिंग सेंटर्स के मालिकों को लगा कि अगर अग्निपथ स्कीम लागू हो गई तो उनका कारोबार खत्म हो जाएगा।

जब सोमवार को भारत बंद के आवाह्न पर कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली के एक छोटे से स्टेशन पर एक ट्रेन को रोकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस के पहुंचते ही वे तितर-बितर हो गए। कांग्रेस के 2 मुख्यमंत्रियों और कुछ सांसदों ने दिल्ली में अपने ‘सत्याग्रह’ के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जमकर जहर उगला। उन नेताओं में पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय भी थे, जिन्होंने मोदी की तुलना हिटलर से कर दी। उन्होंने कहा, ‘मुझे तो लगता है कि मोदी ने हिटलर का सारा इतिहास पार कर लिया। हिटलर ने अपनी ‘खाकी’ आर्मी बनाई थी। मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा। यह याद कर लेना मोदी।’

मीडिया में इस वीडियो के आने के तुरंत बाद देशभर में उपजे आक्रोश को देखते हुए सहाय ने अपना बयान वापस लेने की कोशिश की। सुबोधकांत सहाय पूर्व प्रधानमंत्रियों वीपी सिंह और चंद्रशेखर की कैबिनेट में मंत्री रह चुके हैं। वह लंबे समय तक डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार में भी मंत्री रहे। सार्वजनिक जीवन में इतना लंबा वक्त बिताने के बाद उनको अंदाजा होगा कि सार्वजनिक मंच पर प्रधानमंत्री के लिए कैसी भाषा इस्तेमाल होनी चाहिए, फिर भी उन्होंने मंच से यह बयान दिया।

सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो यह थी कि उस समय मंच पर मौजूद कांग्रेस के एक भी सीनियर नेता ने सहाय को इस तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर नहीं टोका। BJP के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने आज कहा कि मोदी के बारे में अभद्र बयानों की शुरुआत 2007 में सोनिया गांधी ने ही की थी, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था।

कांग्रेस का मोदी को गाली देने का इतिहास रहा है। कांग्रेस नेताओं ने मोदी के लिए ‘लहू पुरुष’, ‘जहर की खेती करने वाला’, ‘जवानों के खून की दलाली करने वाला’, ‘नीच आदमी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। मोदी को हिटलर, मुसोलिनी, जनरल डायर, रंगा बिल्ला, हिंदू अतंकी और क्या-क्या नहीं कहा गया। गिनती करें तो पता चलता है कि अलग-अलग कांग्रेस नेता अब तक मोदी को कम से कम 80 गालियां दे चुके हैं।

पुराने जमाने की कांग्रेस में यह संस्कृति नहीं थी। आज भी कांग्रेस के पुराने नेता राजनीति में गाली-गलौज को उचित नहीं मानते। हालांकि, कांग्रेस में अब कुछ चले हुए कारतूसों के अलावा एक नई पीढ़ी है जो इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना पसंद करती है। मुझे लगता है कि किसी भी नेता को हिटलर जैसी मौत जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे नेता हैं जो लोगों को गुमराह भी कर रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को आरोप लगाया कि सेना में ‘अग्निपथ’ स्कीम को शुरू करके बीजेपी ‘RSS की एक सेना बनाने की कोशिश कर रही है, जिसमें जिसमें हथियारबंद गिरोह होंगे ओर वे चुनाव के दौरान उनके काम आएंगे।’ हैरानी की बात यह है कि ममता बनर्जी ने यह आरोप विधानसभा में लगाया, जहां कार्यवाही की हर बात को दर्ज किया जाता है। इसके बाद बीजेपी ने तुरंत ममता से माफी की मांग की और कहा कि उन्होंने सेना का अपमान किया है।

कुछ दूसरे नेता भी ऐसी भ्रामक बातें फैला रहे हैं। पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने ट्वीट किया, ‘यदि आप ड्राइवर, धोबी या नाई की ट्रेनिंग लेना चाहते हैं, तो अग्निवीर बनें, यदि आप चौकीदार बनने की ट्रेनिंग लेना चाहते हैं, तो अग्निवीर बनें, यदि आप पकोड़े तलना सीखना चाहते हैं, तो अग्निवीर बनें। अगर आप सैनिक बनना चाहते हैं, तो अप्लाई न करें।’ एक YouTube वीडियो में यह दावा किया गया कि आने वाले समय में अग्निपथ स्कीम की भर्ती प्राइवेट एजेंसी करेगी। एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया कि सेना के जिन जवानों को 2019 तक प्रमोशन नहीं दिया गया, वे अब अग्निवीर रैंक में ही शामिल होंगे।

AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने एक के बाद एक कई ट्वीट्स कर मोदी को संबोधित करते हुए पूछा, ‘आप यह क्यों चाहते हैं कि 4 साल तक देश की रक्षा करने के बाद, यही युवा पूर्व सैनिक या तो अडानी और अम्बानी के घर के बाहर नौकरी की लाइन में खड़ा हो, या बीजेपी के दफ्तरों के बाहर चौकीदारी करे। मोदीजी, युवा भारत का भविष्य हैं, आप और आप के साथ बार-बार एक्सटेंशन लेने वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर नहीं। आप इस युवा वर्ग की आवाज सुनिए और उनकी मांग पर अमल कीजिये, इस अग्निवीर योजना को तुरंत वापस लीजिये।’ मैं तो तब हैरान रह गया जब आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार अग्निपथ स्कीम के तहत भर्ती नौजवानों को न तो सैनिक मानेगी और न उन्हें शहीद का दर्जा देगी।

आर्मी के सीनियर अफसर ऑन रिकॉर्ड कह चुके हैं कि सेना के आधुनिकीकरण का प्लान 1989 से पाइपलाइन में था, और अग्निपथ स्कीम का ड्राफ्ट तैयार होने से पहले कई बार चर्चा हुई थी। सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘सुधारों की राह आसान नहीं होती है। कई फैसले, कई रिफॉर्म तात्कालिक रूप से अप्रिय लग सकते हैं, लेकिन समय के साथ उन रिफॉर्म्स का लाभ आज देश अनुभव करता है। रिफॉर्म का रास्ता ही हमें नए लक्ष्यों, नए संकल्पों की तरफ ले जाता है।’

मोदी की यह बात सही है कि रिफॉर्म होने चाहिए। अग्निपथ योजना के पीछे भी मकसद यही है कि इससे सेना पहले से ज्यादा युवा और ऊर्जावान होगी। दुनिया भर में जंग का तरीका बदल रहा है और और हमारी सेना का आधुनिकीकरण समय की मांग है।

अग्निपथ योजना को लेकर पहले बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के नौजवानों में कुछ कन्फ्यूजन था, जो अब दूर होता दिख रहा है। कोचिंग सेंटर वालों ने, कुछ सियासी दलों ने इसी कन्फ्यूजन का फायदा उठाकर युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया था। अब जब सरकार ने भर्ती के बारे में नोटिफिकेशन जारी कर दी है, तो अधिकांश नौजवानों को अब लग रहा है कि अग्निपथ योजना उनके लिए एक सुनहरे भविष्य का रास्ता खोल सकती है।

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Agnipath: Who is spreading confusion among youths ?

rajat-sir The unrest among youths over the Agnipath scheme appears to be petering out, with reports coming from Gwalior (MP), Sikar (Rajasthan) and Satara (Maharashtra) about many aspirants preparing for the forthcoming recruitments. The Indian Army on Monday issued the recruitment notification and online registration will begin from July.

Under Agnipath scheme, 46,000 Agniveers will be inducted this year. Out of this, 40,000 Agniveers will be recruited by the Army and 3,000 each by the Navy and Air Force. Agniveers will be inducted in two batches through 83 recruitment rallies between August and November in different parts of India. Training of 25,000 Agniveers will begin in December, and for the remaining 15,000, training will begin in February, sources said.

The most positive development is that not a single incident of arson or stoning by youths took place anywhere in India on Monday. A clear message seems to have gone out to the aspirants that they would lose out on recruitment, if there are police verification reports against them. Aspirants will have to file affidavit saying that they never indulged in violence.

Political parties however continued to grind their axe by opposing the Agnipath scheme, but most of the top corporates in India have welcomed this scheme and have promised to induct Agniveers who retire from armed forces after four years. These include Tata group, Mahindra, RPG, Biocon, JSW group and Hindustan Unilever. The Bharat Bandh call given by some organisations on Monday had practically no impact across India. There was fewer traffic on the roads in Bihar, but life continued to be normal in UP, MP, Rajasthan, Haryana and other states.

A total of 159 FIRs have been filed in Bihar, which bore the brunt of violence. 877 persons were arrested, and FIRs were filed against three coaching centre owners in Patna. Coordinators of two coaching centres in Rohtas, Bihar have been arrested. In Aligarh, UP, nine coach centre owners have been taken into custody. Telangana police has also taken action against two coaching centre owners.

Patna Police has issued poster of 40 miscreants who had indulged in arson and stoning, and had attacked a police station in Paliganj. The SDO and Additional SP of Paliganj spoke to local leaders, coaching centre owners and parents to persuade job aspirants to refrain from violence.

Bihar Police is now targeting the admins of WhatsApp groups who were inciting the youths to protest. Delta Team of Bihar Police is going through social media accounts to trace the inciters. Delta Team is keeping a watch on more than 10 Telegram groups, nearly 500 Facebook pages, WhatsApp groups and YouTube channels.

Modi baiters from different political parties also incited passions of youths, and when incidents of arson and violence petered out in Bihar, political activists jumped into the fray, posing as army job aspirants. Most of the coaching academies who train 100 to 300 youths each, are politically connected. The coaching centre owners felt their business would wind up if the Agnipath scheme was implemented.

When the Bharat Bandh call on Monday did not elicit any response, Congress workers tried to stop a train at a small station in New Delhi as a token measure, but quickly dispersed when police stepped in. Their leaders, including two chief ministers and several MPs, spewed venom against Prime Minister Narendra Modi at their ‘satyagraha’ in Delhi, with a former minister Subodh Kant Sahay comparing Modi with Hitler.

Subodh Kant Sahay said, “I feel that Prime Minister Modi has gone beyond all that was done by Hitler. Hitler had created his ‘khaki’ army. I think if Modi continues to walk on Hitler’s path, he will die Hitler’s death. Remember this, Modi.”

Soon after this video was splashed over media causing nationwide outrage, Sahay tried to retract his remark. Subodh Kant Sahay has been a minister in the cabinets of former PMs V P Singh and Chandrasekhar. He also worked as minister in Dr Manmohan Singh’s government for a long time. After spending a long time in public life, it was expected that he would know the type of language that should be used about a Prime Minister.

The most surprising was that not a single senior Congress leader present on the dais at that time, did not try to stop Sahay from using such crass language. BJP spokesperson Sudhanshu Trivedi reminded that Congress president Sonia Gandhi had used similar language against Modi in 2007, when she described him as a “maut ka saudagar” (merchant of death).

Congress has a history of using abusive language against Modi in the past. Congress leaders used epithets like “Lahu Purush” (Man of Blood), ‘Zehar Ki Kheti karne waala’ (one who cultivates hate), ‘jawanon ke khoon ki dalaai karne wala’ (merchant of the blood of jawans), ‘neech aadmi’ (rogue), and also compared him with Hitler, Mussolini, General Dyer, Ranga Billa, Hindu Aatanki (Hindu terrorist). There are many more, and if one counts the number of abuses, it could reach 80.

This was not the culture of Congress in the old days. Even today, senior, veteran Congress leaders dislike such abusive epithers. However, there is now a new generation of leaders, apart from failed political leaders in the Congress who prefer to use such language. I think, no political leader should be allowed to say that so-and-so deserves to die a Hitler’s death. There are political leaders who are also spreading disinformation.

Trinamool Congress supremo and West Bengal chief minister Mamata Banerjee on Monday alleged that by introducing ‘Agnipath’ scheme in the armed forces, BJP is trying “to create an RSS army, which will have armed groups that will be active during election”. The surprising part is that Mamata Banerjee levelled this allegation inside the state assembly, where the proceedings are recorded. The opposition BJP immediately demanded apology from the CM saying that she has insulted the army.

There are some other leaders too, who are spreading disinformation. Former Finance Minister and senior Congress leader P. Chidambaram tweeted: “If you wish to be trained as a driver, washerman or barber, become an Agniveer, If you wish to be trained as a chowkidar, become an Agniveer, If you wish to learn to fry pakoras, become an Agniveer. If you wish to become a soldier, do not apply.”

Several misleading claims and allegations are being made on social media by others. One YouTube channel claimed that in the coming years, private agencies will hire Agniveers, while another social media post said, army jawans who did not get promotions till 2019, will now be sent to Agniveer ranks.

AIMIM chief Asaduddin Owaisi in a series of tweets, addressed to Modi, asked: “Why do you want that our youths after serving in the army for 4 years, will stand outside the homes of Adani and Ambani, or in BJP offices as ex-servicemen seeking jobs?…Modiji, youths are the future of our country, they are not retired IAS officers who are with you and are on frequent extension. Listen to the voice of youths, accept their demand, and withdraw Agniveer scheme immediately.”

I was surprised when AAP leader Sanjay Singh alleged that the government, under Agnipath scheme, will not regard Agniveers as soldiers and will not give them the status of martyrs, if they died during operations.

Senior army officials are on record having said that the army modernization scheme was in the pipeline since 1989, and there were many series of discussions, before the Agnipath scheme was drafted. On Monday, Prime Minister Modi said, “the path of reforms is not easy. Several decisions and reforms may be temporarily unpleasant, but with the passage of time, their benefits will be known.”

Modi is right when he says, the path of reforms is not easy. The Agnipath scheme is also aimed at reforming and modernizing our armed forces to make it younger and energetic. Wars across the world have undergone transformational change, and modernization of our armed forces is the need of the hour.

The confusion that was spread among youths of Bihar, UP, MP, Rajasthan and Haryana, when the scheme was launched, appears to have been more or less cleared. Coaching centres, political parties, misused this opportunity to grind their own axes, and incited youths to resort to arson and violence. Now that the Centre has published details of recruitment in its notification, most of the young aspirants have realized that Agnipath scheme can open up the path for a golden future.

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अग्निपथ: कोचिंग सेंटर चलाने वाले कुछ लोग कैसे भड़का रहे हैं हिंसा

akbअग्निपथ स्कीम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के चौथे दिन बिहार और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आगजनी और पथराव की घटनाएं देखने को मिलीं। जहानाबाद, तारेगना, मसौढ़ी और अन्य जगहों से ट्रक, बस और अन्य गाड़ियों को जलाने, पथराव और तोड़फोड़ की खबरें आईं।

बिहार के तारेगना स्टेशन पर RPF दफ्तर में आग लगा दी गई और बाहर खड़े एक दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने शनिवार को मसौढ़ी रेलवे स्टेशन में आग लगाने की कोशिश की। जहानाबाद में एक पुलिस चौकी के पास करीब एक दर्जन गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया और बाद में एक बस और एक ट्रक को भी फूंक दिया गया।

दानापुर मंडल रेल प्रबंधक ने बताया कि रेलवे की संपत्तियों को 200 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि 50 डिब्बे, 5 इंजन पूरी तरह जल गए हैं और प्रदर्शनकारियों ने प्लैटफॉर्म, कंप्यूटर और कई टेक्निकल डिवाइसेज को तोड़ दिया है। हिंसा को बढ़ने से रोकने के लिए बिहार के 12 जिलों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, और RJD एवं लेफ्ट पार्टियों ने शनिवार को बिहार बंद का आह्वान किया।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर, कन्नौज और गौतम बुद्ध नगर में विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने कन्नौज के पास आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे को जाम करने की कोशिश की। चेन्नई में, प्रदर्शनकारियों ने योजना के विरोध में युद्ध स्मारक तक मार्च निकाला।

एक ताजा खबर के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सेना में 4 साल की सेवा पूरी करने वाले सभी अग्निवीरों के लिए अर्धसैनिक बलों और असम राइफल्स की वैकेंसी में 10 प्रतिशत कोटा देने की घोषणा की है। साथ ही अग्निवीरों के लिए निर्धारित ऊपरी आयु सीमा से 3 वर्ष की छूट की घोषणा की गई है, जबकि पहले बैच के लिए निर्धारित ऊपरी आयु सीमा से 5 साल ज्यादा छूट देने का ऐलान किया गया है।

भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने कहा, ‘हिंसा और आगजनी समाधान नहीं है। यदि उम्मीदवारों को कोई संदेह है, तो मिलिट्री स्टेशन, एयरफोर्स और नेवी के बेस हैं, जहां जाकर वे अपनी शंकाओं को दूर कर सकते हैं। यदि आप योजना को समग्र रूप से देखें, तो कई फायदे हैं जिन पर प्रकाश डालने की जरूरत है। युद्ध के क्षेत्र बदल रहे हैं, हमें सेना में युवा और ज्यादा टेक-सेवी लोगों की जरूरत है। IAF में हमें तकनीकी रूप से ज्यादा योग्य लोगों के चयन का फायदा मिलेगा।’

बिहार में शुक्रवार को सबसे ज्यादा हिंसा हुई, सबसे ज्यादा आग यहीं लगी। सूबे के बेतिया, आरा, बक्सर, समस्तीपुर, दानापुर, हाजीपुर, गया, सुपौल, बेगूसराय, बक्सर, नालंदा, नवादा, लखीसारी, भागलपुर, सासाराम, मुजफ्फरपुर, औरंगाबाद, भोजपुर, मुंगेर, अरवल, जहानाबाद, पटना, वैशाली, खगड़िया, जमुई, रोहतास, शेहपुरा, सीवान, बगहा और मधेपुरा, हर जगह से दिल दहलाने वाली तस्वीरें आईं। जलती हुई ट्रेनें, चीखते-चिल्लाते मुसाफिर, डरे हुए बच्चे, पानी के पाइप लेकर आग बुझाने की कोशिश करते रेलवे के कर्मचारी और बेबस खड़े जीआरपी के जवान, दिन भर यही सब दिखा। पड़ोस के सूबे यूपी में भी आगरा, मथुरा, वाराणसी, अलीगढ़, बांदा और बस्ती में विरोध प्रदर्शन हुए।

अग्निपथ के विरोध का सबसे खतरनाक मंजर आरा जिले में देखने को मिला। यहां के कुल्हड़िया रेलवे स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी। जैसे-जैसे आग डिब्बों की तरफ बढ़ी, वैसे-वैसे रेलवे के कर्मचारी डिब्बों को अलग करके बाकी बोगियों को बचाने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। पूरी ट्रेन जलकर खाक हो गई। कुछ यही स्थिति समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर देखने को मिली, जहां दरभंगा से दिल्ली जा रही बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया गया। इससे पहले उपद्रवियों ने ट्रेन में तोड़-फोड़ की, सामान भी लूटा, और फिर ट्रेन के डिब्बों में आग लगा दी।

लखीसराय स्टेशन पर खड़ी एक ट्रेन को भी प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। यह ट्रेन वहां आकर रुकी ही थी, इसमें यात्री भी सवार थे, लेकिन उपद्रवियों ने इसका भी ख्याल नहीं किया। इसी दहशत में एक यात्री की जान चली गई। नालंदा जिले के इस्लामपुर रेलवे स्टेशन पर खड़ी मगध एक्सप्रेस की 4 बोगियों में भी आग लगा दी गई।

यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि बिहार अग्निपथ विरोधी प्रदर्शनों का केंद्र क्यों नजर आ रहा है। बिहार में शुक्रवार को एक दिन में 12 ट्रेनों को जला दिया गया और 234 से ज्यादा ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। 24 जगहों पर हिंसा हुई। हजारों मुसाफिर भूखे प्यासे ट्रेनों में फंसे रहे और पटरियों पर, सड़कों पर अग्निपथ स्कीम से नाराजगी के नाम पर छात्र आग लगाते रहे, तोड़फोड़ करते रहे। मैंने बिहार के कई एक्सपर्ट्स से बात की और उनके जवाबों ने काफी कुछ साफ कर दिया।

ऐसा लगता है कि दूसरे राज्यों की तुलना में बिहार में सरकारी नौकरी के प्रति लोगों का आकर्षण बहुत ज्यादा है। फौज में भर्ती हो, अर्धसैनिक बलों में भर्ती हो, रेलवे में भर्ती हो या शिक्षा विभाग में, बिहार के बच्चे सबसे आगे रहते हैं। एक बार किसी की सरकारी नौकरी लग जाए तो पूरे परिवार की जिंदगी बदल जाती है। सेना में बिहार का कोटा 5 पर्सेंट का है, लेकिन सेना की नौकरियों की डिमांड इस कोटे से कई गुना ज्यादा होती है। अगर किसी की सरकारी नौकरी लग जाती है, भले ही वह चतुर्थ श्रेणी (चपरासी) की हो, तो अच्छी जगह शादी हो जाती है, दहेज मिल जाता है। बहनों की शादियां अच्छे परिवारों में हो जाती है।

जो नौजवान फिटनेस टेस्ट पास करने के बाद पिछले 2 साल से जॉइनिंग का इंतजार कर रहे थे, वे ज्यादा परेशान हैं क्योंकि अब उन्हें लगता है कि उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। यही उनके गुस्से और हताशा का एकमात्र कारण है। उनमें से कई की शादी भी तय हो चुकी थी, लेकिन अग्निपथ स्कीम के ऐलान के बाद एग्जाम के पिछले सभी नतीजों का कोई मतलब नहीं रहा। मुझे इस बारे में एक और हैरान करने वाली बात पता चली जिससे थोड़ा सुराग मिला कि इन सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों के पीछे कौन हैं।

पूरे बिहार में ऐसे तमाम कोचिंग सेंटर्स हैं, जहां ये युवा सेना में भर्ती होने के लिए फिजिकल ट्रेनिंग और लिखित परीक्षा की प्रैक्टिस करते हैं। ये कोचिंग सेंटर सेना में नौकरी का सपना देखने वाले नौजवानों के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बिहार में सेना की नौकरी के लिए काफी ज्यादा क्रेज है, और इसीलिए यह राज्य भर्ती की तैयारी कर रहे नौजवानों की कोचिंग का हब बन चुका है। आज वही नौजवान बिना-सोचे समझे सड़क पर उतर कर आग लगा रहे हैं।

अग्निपथ स्कीम आने के बाद कोचिंग सेंटर चलाने वाले अधिकांश लोगों को अपनी दुकान बंद होने का डर सता रहा है। बताया जा रहा है कि इनमें से ही कुछ कोचिंग सेंटरों के मालिकों ने, जिन्हें सेना में भर्ती की तैयारी करने वाले नौजवान अपना ‘गुरु’ मानते हैं, ने अग्निपथ स्कीम की आलोचना करते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो डालना शुरू कर दिया। ऐसे तमाम वीडियो मुझे भेजे गए। उनमें से कुछ वीडियो साफतौर पर राजनीति से प्रेरित हैं।

पटना में ही एक कोचिंग सेंटर चलाने वाला शख्स नौजवानों से कह रहा है कि ‘विरोध का कोई तरीका छोड़ना नहीं है।’ यह शख्स झूठा दावा कर रहा है कि अब तक इस स्कीम के खिलाफ 63 लड़के जान दे चुके हैं। इसी तरह सोशल मीडिया के जरिए नौजवानों को भड़काया जा रहा है। नौजवानों से कहा जा रहा है कि 4 साल सेना की सेवा करने के बाद उन्हें कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी।

एक वीडियो में, पटना में एक कोचिंग सेंटर चलाने वाला कह रहा है, ‘सबसे पहले TOD के खिलाफ विद्रोह करो। जितने लेवल तक हो सकता है, पूरा का पूरा विद्रोह करो, एक भी लेवल नहीं छोड़ना है। हिम्मत, जोश और जुनून अगर दिखाना है,तो सरकार के सामने दिखाएंगे, मम्मी पापा के सामने नहीं। कल तक 42 लोगों की मौत हुई थी और आज आत्महत्या का रिपोर्ट 63 पहुंच चुका है। ये हमें मिली जानकारी पर आधारित हैं। न जाने कितने सारे गांवों में बच्चे ऐसा किए होंगे। आत्महत्या बेकार है, इस चीज को मत करो। किसी भी गांव से आत्महत्या की जानकारी मिले तो वहां जाकर नौजवानों से कहो कि आत्महत्या न करें। उन्हें अच्छी बातें समाझाओ। TOD को जबरन लागू किया गया है।’

ऐसे एक नहीं, दर्जनों कोचिग सेंटर हैं। हर कोचिंग सेंटर में फौज में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले 200-400 नौजवान ट्रेनिंग ले रहे हैं। कुल मिलाकर ऐसे बच्चों की संख्या हजारों में है, और कोचिंग सेंटर चलाने वालों की इससे काफी कमाई होती है। कोचिंग देने वालों को छात्र अपना ‘गुरू’ मानते हैं, और उनकी हर बात पर यकीन करते हैं।

पटना में ही एक और कोचिंग सेंटर चलाने वाला शख्स साफतौर पर नौजवानों को बसों और ट्रेनों में आग लगाने के लिए उकसा रहा है। एक वीडियो में वह कहता दिख रहा है, ‘देश की स्थिति युवाओं के हाथ में है, लेकिन युवाओं के बारे में सोचा नहीं जा रहा है। युवा आहत होकर सुसाइड कर रहे हैं। कोई भी ऐसा कदम न उठाए। अपना हक मांगने का अधिकार सभी नौजवानों के पास है। कई ऐसे शहर हैं जहां ट्रेनों में आग लगाई जा रही है। आपके पास विरोध करने का अधिकार है। विरोध कर सकते हैं,लेकिन जो आत्महत्या वाला सिस्टम है, उसको बहुत जल्दी बंद करना होगा। अगर मरना ही है तो सिस्टम से लड़कर मरेंगे। जब जिंदा रहेंगे तो लड़ सकते हैं,मगर मरने के बाद कौन लड़ेगा, कोई नहीं लड़ेगा। सरकार का झुकना तय है। यह मैसेज मोदी जी तक पहुंचना चाहिए।’

ये वीडियो मैसेज Facebook, YouTube और Telegram जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के जरिए फॉरवर्ड किए जा रहे हैं। लाखों नौजवानों को ये वीडियो मैसेज मिल रहे हैं और वे आगजनी, पथराव और हिंसा का सहारा ले रहे हैं। कोचिंग सेंटर चलाने वाले लोगों द्वारा नौजवानों को भड़काया जा रहा है। शुक्रवार रात इंडिया टीवी पर अपने प्राइम टाइम शो ‘आज की बात’ में मैंने इनमें से कुछ वीडियो दिखाए। ये वीडियो लाखों नौजवानों तक पहुंचाए गए हैं। इसीलिए सरकार ने बिहार के 12 जिलों में अगले 48 घंटों के लिए इंटरनेट सर्विसेज बंद कर दी हैं, और तमाम ऐप्स को ब्लॉक कर दिया गया है।

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में कानपुर पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर एपी तिवारी ने शुक्रवार को कहा कि ‘Boycott TOD’ नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप बनाया गया है जिसके जरिए युवाओं को सड़कों पर उतरकर विरोध करने के लिए उकसाया जा रहा है। पुलिस ने इस ग्रुप से जुड़े कई लोगों की पहचान कर ली है और उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

पुलिस के लिए इस तरह के मैसेज को ट्रैक करना, उनके मेंबर्स की पहचान करके उन्हें पकड़ना, और फिर सर्कुलेट हो चुके मैसेज को वायरल होने से रोकना एक बड़ी चुनौती है। राजनीतिक दल पहले ही मैदान में उतर चुके हैं क्योंकि उन्हें नौजवानों के विरोध में सियासी फायदा दिख रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खामोशी हैरान करने वाली है। उनकी पार्टी जनता दल (युनाइटेड) इन विरोध प्रदर्शनों को मौन समर्थन देती दिख रही है।

नौजवानों के लिए मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि उन्हें अपनी बात कहने का, प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका तरीका शांतिपूर्ण होना चाहिए। विरोध का मतलब ट्रेनों में आग लगाना नहीं हैं, विरोध का मतलब हाइवे को जाम करके बसों पर पथराव करना नहीं है। जो नौजवान देश की सेवा करने का दावा कर रहे हैं, वे देश की संपत्ति को आग लगाकर खाक कैसे कर सकते हैं।

उन्हें पता होना चाहिए कि सेना में अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। जो नौजवान इस तरह से उपद्रव कर सकते हैं, वे सेना का हिस्सा बनने का सपना कैसे देख सकते हैं। मुझे लगता है कि नौजवानों को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए, और किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए।

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Agnipath: How some coaching centre owners are instigating violence

rajat-sirThe fourth day of protests against Agnipath scheme witnessed fresh arson and stone pelting in several districts of Bihar and in neighbouring Uttar Pradesh. Reports of burning of trucks, buses and other vehicles, stone pelting and vandalization came from Jehanabad, Taregana, Masaurhi, and other places.

At Taregana station in Bihar, the RPF office was set ablaze and more than a dozen vehicles parked outside were set on fire. Protesters tried to set the Masaurhi railway station on fire on Saturday. In Jehanabad, nearly a dozen vehicles were torched near a police post, and later a bus and a truck were set on fire.

The Danapur Divisional Railway Manager put the losses to railway properties at over Rs 200 crore. 50 coaches, five engines have been completely burnt, and platforms, computers and technical devices were smashed by protesters, he said. Internet services were blocked in 12 districts of Bihar to prevent escalation of violence, even as RJD and Left parties gave a Bihar Bandh call on Saturday.

There were protests in Jaunpur,Kannauj and Gautam Buddha Nagar in UP. Protesters tried to block the Agra-Lucknow expressway near Kannauj. In Chennai, protesters marched to the War Memorial to stage protest against the scheme.

In a fresh development, the Union Home Ministry announced 10 per cent quota in vacancies in all para-military forces and Assam Rifles for demobilized Agniveers who complete four years of service in the army. Three years’ age relaxation has been announced beyond the prescribed upper age limit for Agniveers, while, for the first batch, five years’ relaxation beyond the prescribed upper age limit has been announced.

Indian Air Force chief Air Chief Marshal V R Chaudhary said, “violence and arson is not the solution. If the aspirants have any doubts, there are military stations, Air Force and Naval bases, where they can go and get their doubts clarified….If you look at the scheme in totality, there are many advantages that need to be highlighted. The domains of warfare are changing, we need younger and more tech-savvy people in the Services. In IAF, we will have the benefit of selecting more technically qualified people.”

On Friday, Bihar bore the brunt of most of the arson and violence in Bettiah, Arah, Buxar, Samastipur, Danapur, Hajipur, Gaya, Supaul, Begusarai, Buxar, Nalanda, Nawada, Lakhisari, Bhagalpur, Sasaram, Muzaffarpur, Aurangabad, Bhojpur, Munger, Arwal, Jehanabad, Patna, Vaishali, Khagaria, Jamui, Rohtas, Shehpura, Siwan, Bagaha and Madhepur. There were disturbing scenes of trains burning, passengers screaming, children cowering in fear, railway fire staff trying to douse flames with water pipes, and GRP jawans standing helplessly. In neighbouring UP, there were protests in Agra, Mathura, Varanasi, Aligarh, Banda and Basti.

The most disturbing visuals came from Kulharia railway staton in Arrah, Bihar, where a stationary train was set on fire. As the flames spread, firemen scrambled to control, but, by that time, the train was reduced to ashes. In Samastipur, the Darbhanga-Delhi Bihar Sampark Kranti Express was set on fire. The protesters first looted belongings left by passengers, and then set fire to the coaches. At Lakhisarai station, a train was torched even before the passengers alighted, leading to the death of a passenger. At Isampur station in Nalanda, four coaches of Magadh Express were torched by protesters.

Questions naturally arise as to why Bihar seems to be epicentre of anti-Agnipath protests. On a single day (Friday), 12 trains were torched in Bihar and more than 234 trains had to be cancelled. Violence took place at 24 places. Thousands of passengers had to face food and water shortage both on rail tracks and highways. I spoke to several experts in Bihar and their replies were revealing.

It seems that in Bihar, there is much attraction among youths for government jobs, whether in armed forces, or para-military forces, railway or education department. A member of a family, after getting a government job, immediately gains social status. In army, Bihar had a five per cent reservation, but the craze for army jobs was several times more than the reservation quota. A young person who get a government job, even in Class 4 (peon) category, immediately gets marriage proposals, tagged with offers for dowry, and the marriage of sisters becomes easier.

The youths who had cleared physical fitness and medical tests, and were waiting to join the armed forces, are the most worried lot, because they now feel that their hopes have been dashed to the ground. This is the sole reason behind their anger and desperation. Several of them had already marriages lined up, but after the Agnipath scheme was announced, all previous test results became obsolete. I got another important clue about who are behind these street protests.

There are scores of coaching centres spread across Bihar, where these youths were undergoing physical training and written tutorials for the armed forces.. These coaching centres play a crucial role in shaping the future of these youths who aspire for army jobs. Since the craze for defence jobs is high in Bihar, the state has emerged as a coaching hub for thousands of aspirants, who are now out on the streets.

With the Agnipath scheme being launched, most of these coaching centre owners feel that they might have to wind up their business. There are reports that some of these coaching centre owners, whom these aspirants consider as ‘guru’, started posting videos on social media criticizing Agnipath scheme. Several such videos were sent to me. Some of them are clearly politically motivated.

One Patna coaching centre owner is telling youths “do not lose any opportunity to stage protest”. He was peddling fake news about 63 youths already having committed suicide, which is completely baseless. This is how the youths are being incited through social media. They are being told that they would not get any government job after serving four years in the armed forces.

In one of the videos, a Patna coaching centre owner is shown as saying: “First of all, you revolt against TOD (Tour of Duty) at every level possible. Revolt completely. Do not spare any level. If you want to show your ‘josh’, your courageand motivation, show it to the government, and not to your mummy or papa. Till yesterday, 42 died and today the suicide tally has reached 63. These are based on information that we got. There could be many such villages. Suicide is useless, do not do it. If you get report of suicide from any village, go there and tell the youths, do not commit suicide Give them good thoughts. TOD has been forcibly implemented.”

There are dozens of such coaching centres, each training nearly 200 to 400 youths. Their number runs into thousands, and the coaching centre owners are raking in money. These youths believe every word imparted by these owners, whom they consider as their ‘guru’.

Another Patna coaching centre owner is clearly instigating the youths to set buses and trains on fire. In one of the videos, he is shown as saying: “The future of the country is in the hands of youths, but their interests are not being looked after. Youths are committing suicide. None of you must do that. Every youth has the right to voice his demand. In several cities, trains are being torched. You have the right to protest. Do that, but do not resort to suicide. If you want to die, die while fighting this system. If you remain alive you can fight, but who will fight if you die. The government is bound to bow to your will. …This message must reach Modi Ji.”

These video messages are being forwarded through social media platforms like Facebook, YouTube, and Telegram. Thousands of youths are getting these video messages, and are resorting to arson, stoning and violence. They are being instigated by coaching centre owners. In my prime time show on India TV ‘Aaj Ki Baat’ on Friday night, I showed some of these videos. These videos have reached millions of youths and the government has suspended internet services for the next 48 hours in 12 districts of Bihar. All apps have been blocked.

In neighbouring UP, the Kanpur Police Joint CP A P Tiwari said on Friday that a ‘Boycott TOD’ Whatsapp group has been created where youths are being incited to come out on the streets and protest. Police have identified the admins of this group and is taking action against them.

For the police, tracking such messages, identifying members and rounding them up to stop their message going viral is a big challenge. Political parties have already entered the fray to grind their own axe, but the silence of Bihar chief minister Nitish Kumar on this issue is surprising. His party JD(U) appears to be giving silent support to these protests.

For the youths, I can only say, they have the right to voice their protest, but they can do it only in a peaceful manner. Setting fire to railway engines and coaches, which cost several crores of rupees each, cannot bring a solution for them. Stoning buses and vehicles on highways is not the solution. Youths who dream of serving the nation and are born patriots, cannot be expected to cause irreparable losses to the nation’s properties.

They must know that discipline is the topmost requirement in armed forces. Youths who are pelting stones and torching trains, can never realize their dreams of becoming a soldier. Youths should sit down and think calmly, and should refrain from being incited by elements who have vested interests.

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