Rajat Sharma

My Opinion

इस बार चुनाव : मोदी बनाम विपक्ष

akb fullअब ये तो साफ हो गया है कि अगला चुनाव भारत बनाम इंडिया होगा, मोदी वर्सेस ऑल होगा. मोदी ने चैलेंज कबूल कर लिया है, और इस वक्त मोदी मजबूत ज़मीन पर खड़े दिख रहे हैं. विरोधी दलों का एक तर्क है कि 2019 के चुनाव में बीजेपी को 45 परसेंट वोट मिले थे, यानि 55 परसेंट वोट बीजेपी के खिलाफ था. अगर इस वोट को इक्कठा रखा जाए तो कामयाबी मिल सकती है, मोदी को हराया जा सकता है. लेकिन हकीकत ये है कि 2019 में 224 लोकसभा सीटें ऐसी थी, जिनमें बीजेपी को 50 परसेंट से ज्यादा वोट मिले थे. दूसरी बात, विपक्ष ने जो गठबंधन बनाया है, उसमें छह बड़ी पार्टियां बहुजन समाज पार्टी, तेलुगु देशम पार्टी, बीजू जनता दल, YSR कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति, और जनता दल-एस शामिल नहीं हैं. इन पार्टियों के लोकसभा में 57 सदस्य हैं. इन सभी पार्टियों का अपने अपने राज्यों में अच्छा खासा जनाधार है. इसलिए इन राज्यों में त्रिकोणीय मुकाबला होगा. अगर आंकड़ों को छोड़ दें, तो सबसे बड़ा सवाल ये है कि विपक्षी गठबंधन मोदी के खिलाफ किसका चेहरा आगे करेगा? कौन प्रधानमंत्री पद का दावेदार होगा? क्योंकि जैसे ही इस पर बात आएगी तो एकता तार-तार होगी क्योंकि दावेदार कई हैं और समझौते के लिए कोई तैयार नहीं हैं. नीतीश कुमार का मंगलवार की बैठक के बाद गायब होना, विपक्षी गठबंधन के लिए शुभ संकेत नहीं हैं, क्योंकि ये कहा जा रहा है कि नीतीश चाहते थे कि विपक्षी गठबंधन के लिए उन्होंने पहल की, मेहनत की, सबको एक साथ एक मंच पर लाए, इसलिए उन्हें संयोजक बनाया जाए और इसका ऐलान आज ही हो जाए लेकिन सिर्फ गठबंधन के नाम का ऐलान हुआ. गठबंधन के संयोजक के नाम पर चर्चा अगली बैठक के लिए टाल दी गई, इसीलिए नीतीश नाराज हो कर निकल गए. लालू को लगता है कि जब तक नीतीश केंद्र की राजनीति में नहीं जाएंगे तब तक तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ नहीं होगा, इसलिए लालू भी नीतीश के साथ हैं, वो भी प्रैस कॉन्फ्रैस से पहले ही निकल गए. विरोधी दल कह रहे हैं कि बीजेपी साम्प्रदायिक पार्टी है, वो सेक्युलेरिज्म को बचाने के लिए एक साथ आए हैं, लेकिन असद्दुदीन ओवैसी कह रहे है कि शिवसेना बीजेपी के साथ रही, नीतीश कुमार बीजेपी के साथ रहे, ममता बीजेपी के साथ रही, फारुक़ अब्दुल्ला बीजेपी के साथ रहे, आज कांग्रेस के लिए सब सेक्युलर हो गए और वो कभी बीजेपी के साथ नहीं गए लेकिन कांग्रेस उन्हें बीजेपी की ‘बी’ टीम बताती है, ये कैसा सेक्युलेरिज्म है? विपक्षी पार्टियां कहेंगी कि बीजेपी ने सिर्फ संख्या ज्यादा दिखाने के लिए ऐसी ऐसी पार्टियों को जोड़ लिया, जिनका नाम भी कोई नहीं जानता. ये बात सही है कि NDA में क्षेत्रीय दलों के बहुत से नेता शामिल हुए हैं. उनके नाम राष्ट्रीय स्तर पर लोग नहीं जानते लेकिन ये भी सही है कि ओमप्रकाश राजभर हों, उपेन्द्र कुशवाहा हों, चिराग पासवान हों, जीतनराम मांझी हों, अनुप्रिया पटेल हों, संजय निषाद हों, ये वो नेता हैं जिनकी जातियों का वोट जीत-हार पर असर डालता है और इन सब नेताओं का अपनी अपनी जातियों में अच्छा खासा प्रभाव है. अगर ऐसा न होता, तो नीतीश कुमार ने मांझी को मुख्यमंत्री क्यों बनाया था? कई बार बगावत करने के बाद भी उपेन्द्र कुशवाहा को मंत्री क्यों बनाया था? .इसी तरह अगर ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद का कोई वजूद न होता तो अखिलेश यादव ने उनके साथ गठबंधन क्यों किया था? एक बार गोरखपुर की सीट अखिलेश यादव ने संजय निषाद के साथ गठबंधन करके ही जीती थी. संजय निषाद बीजेपी के साथ आए और उपचुनाव में वो सीट समाजवादी पार्टी हार गई. इसलिए ये कहना तो ठीक नहीं है कि बीजेपी ने NDA में छोटी पार्टियों को शामिल किया है. उसका कोई मतलब नहीं हैं. हाँ, इतना जरूर है कि मोदी विरोधी दलों ने एकता दिखाई तो बीजेपी को भी मजबूर होकर अपने नए पुराने साथियों को गले लगाना पड़ा. इसमे दोनों का फायदा है.

क्या विपक्षी एकता टिक पायेगी ?

विपक्षी एकता कितनी मजबूत है और कब तक रहेगी, ये तो कोई नहीं कह सकता लेकिन इतना तो बैंगलुरू पहुंचे नेता भी मान रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी ने सभी विरोधियों को एक मंच पर आने के लिए मजबूर कर दिया. वरना जो कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को पानी पी-पी कर कोसती थी, जिन केजरीवाल ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस का सफाया कर दिया, आज वही कांग्रेस केजरीवाल का वीडियो, उनकी बाइट अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर रही थी. और जो केजरीवाल पहले कांग्रेस को ‘मदर ऑफ करप्शन’ कहते थे, आज वो भी पूरे मन से कांग्रेस को लोकतन्त्र का रक्षक बता रहे थे. जो उद्धव ठाकरे कभी अपने कार्यकर्ताओं से कहते थे कि राहुल गांधी अगर सामने आ जाएं तो चप्पल से पिटाई करना, आज वही उद्धव कह रहे थे कि अब कांग्रेस के साथ मिलकर देश को बचाना है. ममता पिछले हफ्ते तक कांग्रेस और बीजेपी को एक जैसा बता रही थीं, जिनकी पार्टी के लोगों ने पंचायत चुनाव में काँग्रेस के कार्यकर्ताओं पर बम चलाए, आज उन्ही ममता ने राहुल को अपना फेवरेट बताया. सोमवार रात के डिनर में शामिल होने से पहले ममता ने सोनिया गांधी से लंबी बात की, मंगलवार सुबह भी बात हुई , इसीलिए बैठक आधे घंटे देर से शुरू हुई. प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने एक दूसरे की तारीफ की लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि शरद पवार खामोश रहे. शरद पवार सोमवार की बजाए अगले दिन बैठक में पहुंचे थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में खामोशी से बैठे रहे और उसके बाद चुपचाप निकल गए. शरद राव की खामोशी बड़े सवाल पैदा करती है, क्योंकि इस बात की उम्मीद तो बैंगलुरू पहुंचे नेता भी कर रहे थे कि महाराष्ट्र में जो हुआ, उसके बाद शरद पवार सार्वजनिक तौर पर अपना स्टैंड साफ करेंगे. लेकिन शरद पवार ने कुछ नहीं कहा. शरद पवार को बैंगलूरू में बैठकर दिल्ली की टेंशन थी. जब बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेन्स चल रही थी, उसी वक्त 2,100 किलोमीटर दूर दिल्ली में पवार के भतीजे अजित पवार और उनके पुराने करीबी प्रफुल पटेल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गले मिल रहे थे. अजित पवार की एनसीपी एनडीए में शामिल हो चुकी थी.

मोदी को अपनी जीत पर भरोसा क्यों ?

बेंगलुरु में विपक्षी गठबंधन की बैठक शुरु होने से पहले ही मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विरोधी दलों पर करारा प्रहार किया. कहा, जो पार्टियां राज्यों में एक दूसरे के खून के प्यासे हैं, वो बैंगलूरू में गलबहियां कर रहे हैं, देश की जनता सब देख रही है, सब समझ रही है. मोदी ने कहा कि जो लोग उन्हें कोस रहे हैं, उनके लिए वो सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं. मोदी ने कहा कि बेंगलुरु में कट्टर भ्रष्टाचारियों का सम्मेलन हो रहा है. उन्होंने अवधी की एक कविता सुनाई और एक पुराने हिंदी गाने का जिक्र करते हुए कहा कि इन लोगों के चेहरे और है, लेबल कुछ और है, विपक्ष के लोगों ने जो दुकान खोली है, उसमें दो चीजों की गारंटी मिलती है – जातिवाद का जहर और असीमित भ्रष्टाचार. मोदी ने बैंगलुरू में जुटे नेताओं की hierarchy (पदानुक्रम) भी बता दी, कहा, जो जितना बड़ा भ्रष्ट है, गठबंधन में उसका सम्मान उतना ही ज्यादा है. जो भ्रष्टाचार के मामले में ज़मानत पर है, उनका सम्मान थोड़ा कम है और जो भ्रष्टाचार के मामले में सजा पा चुके हैं, उनका कद बड़ा है, उन्हें विशेष आमंत्रित के तौर पर बुलाया गया है. मोदी ने कहा कि बैंगलुरू में जो लोग जुटे हैं, उनका मकसद मोदी को हराना नहीं, खुद को बचाना है क्योंकि ज्यादातर के खिलाफ बड़े बड़े घोटालों में जांच चल रही है. इनकी बैठक का एक ही एजेंडा है – अपना परिवार बचाओ, भ्रष्टाचार बढ़ाओ. मोदी ने ठीक कहा कि विरोधी गठबंधन में ज़्यादातर वो पार्टियां हैं, जिनके नेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के केस दर्ज हुए हैं, लेकिन ये भी सही है कि CBI और ED के मामलों ने ही इन नेताओं को एक साथ, एक मंच पर आने को मजबूर किया. ये कोई सीक्रेट नहीं है. ये नेता ख़ुद कहते हैं कि उनकी लड़ाई BJP से कम, ED और CBI से ज़्यादा है. अगर मोदी ने विरोधी दलों के नेताओं पर इतने ज़्यादा केस नहीं किए होते, तो शायद केजरीवाल और ममता बनर्जी, कांग्रेस के साथ कभी हाथ न मिलाते. बैंगलुरू में कुछ पार्टियों के जो नेता इकट्ठे हुए, उन्हें लगता है कि मोदी ने हर संस्थान पर क़ब्ज़ा कर लिया है, विरोधियों को न मीडिया पर विश्वास है, न न्यायपालिका पर. न्यायपालिका के बारे में वो कुछ कह नहीं सकते, इसलिए सारा ग़ुस्सा मीडिया पर उतरता है. इसीलिए शाम को एनडीए की बैठक में मोदी ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि इस बार चुनाव में 50 परसेंट से भी ज्य़ादा वोट मिलेंगे और एनडीए तीसरी बार अपनी सरकार बनाएगी.

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IT’S MODI VERSUS THE REST

AKBThe line-up for 2024 Lok Sabha elections is now clear. This will be an electoral battle between Bharat versus INDIA (the new acronym for opposition alliance). In other words, it will be a battle between Modi versus The Rest. Modi has accepted the challenge, judging by his speech at the NDA meet on Tuesday evening. At present, Modi appears to be on a strong wicket. Opposition leaders argue that BJP had garnered 45 per cent votes in 2019 LS elections. In other words, 55 per cent votes went against Modi. They say, if these votes are mobilized, Modi can be defeated. But the ground reality is somewhat different. In 2019 LS elections, there were 224 Lok Sabha seats, where BJP had collected more than 50 per cent votes. On the other hand, six parties, Bahujan Samaj Party, Telugu Desam Party, Biju Janata Dal, YSR Congress, KCR’s BRS and Deve Gowda’s Janata Dal-S are not part of the opposition alliance. These parties have presently 57 members in Lok Sabha. All these six parties have good support base in their respective states. Consequently, these states, UP, Andhra Pradesh, Telangana, Odisha and Karnataka will be witnessing triangular contests. If we leave aside statistics, the biggest question is: who will be the face of opposition alliance to take on Modi? Who will be projected as the prime ministerial candidate? The moment this question crops up in the opposition camp, all unity efforts may go haywire. There are many claimants, and none of them is ready to give in. Nitish Kumar left soon after the meeting in Bengaluru on Tuesday, and this is not a good sign. Sources say, Nitish Kumar wanted to be named as convenor of the alliance, because it was he who initiated opposition unity moves by visiting different state capitals. It was he who brought leaders of all 26 parties on a single platform. He wanted the announcement of the name of convenor on Tuesday itself, but the issue was carried over to the next meeting in Mumbai. Nitish Kumar felt piqued and left the meeting venue in a huff. Lalu Prasad Yadav felt that so long as Nitish is not brought to the centre of national politics, the path will not open up for his son Tejashwi Yadav to take over as Bihar chief minister. So, Lalu, too, joined Nitish and did not attend the customary press conference after the meeting. Opposition leaders describe BJP as a communal party and claim that they have joined hands to protect secularism, but AIMIM chief Asaduddin Owaisi points out that Shiv Sena had always been with BJP, Nitish Kumar allied with BJP, even Mamata Banerjee and Dr Farooq Abdullah were in BJP-led government, but today, all these parties have become secular in the eyes of Congress. Owaisi says, he never went with the BJP, but Congress describes his party as the ‘B’ team of BJP. Opposition leaders say that BJP, in order to upstage opposition unity, added small and largely unknown parties to NDA to show that its alliance is bigger in number. It is true many small, regional parties joined NDA on Tuesday, and their leaders are not known on the national level. But it is also a fact that regional leaders like Om Prakash Rajbhar, Upendra Kushwaha, Chirag Paswan, Jitanram Manjhi, Anupriya Patel, Sanjay Nishad are leaders, who lead their caste voters who are vital in deciding election results for many seats. These leaders have a good support base among their caste voters. Had it not been so, why Nitish Kumar made Jitanram Manjhi the chief minister of Bihar? Why Upendra Kushwaha was made minister in Bihar despite revolting several times? If Om Prakash Rajbhar and Sanjay Nishad had no support base, why Akhilesh Yadav inducted them into his coalition? Akhilesh Yadav once won the Gorakhpur seat by allying with Sanjay Nishad. The latter joined BJP and in the byelection, Samajwadi Party was defeated. So, it will be incorrect to say that BJP leadership inducted small, insignificant parties in NDA to boost up the numbers. However, it is also a fact that once the opposition came together on a single platform, BJP was forced to accommodate its new and old friends in a win-win situation for both.

WILL OPPOSITION UNITY LAST?

Nobody can say how strong is opposition unity at present and how long will it last. None can predict this. One thing which all opposition leaders agreed in Bengaluru was that it was Narendra Modi who forced them to come together on a single platform. Just recollect some past events. Congress leaders used to berate Arvind Kejriwal, whose Aam Aadmi Party demolished the Congress in Delhi and Punjab. On Tuesday, the same Congress was posting video of Kejriwal’s speech on its Twitter handle. On the reverse side, Kejriwal used to describe Congress as ‘Mother of Corruption’. On Tuesday, he and his party leaders were accepting Congress as the protector of democracy. There was a time when Uddhav Thackeray used to tell his party workers to beat Rahul Gandhi with chappals, and on Tuesday, the same Uddhav Thackeray was saying that all should join hands with Congress to save democracy. Till last week, Mamata Banerjee used to describe Congress and BJP as two sides of the same coin and her party supporters threw bombs at Congress workers during Bengal panchayat elections. On Tuesday, Mamata Banerjee was saying Rahul is her favourite. Mamata had a long discussion with Sonia Gandhi over dinner on Monday night and continued her talks on Tuesday morning. It was because of their discussions that the opposition meeting started half an hour late. The most interesting part of the Bengaluru opposition meet was that NCP supremo Sharad Pawar remained silent. He reached the meeting on Tuesday, and throughout the press conference, he remained silent and later left quietly. Sharadrao’s silence raises a big question. After what happened in Maharashtra, opposition leaders who had reached Bengaluru wanted to hear Sharad Pawar make his political stand clear in public, but he did not. As the press conference was going on in Bengaluru, 2,100 kilometres away in Delhi, Pawar’s nephew Ajit Pawar and former confidante Praful Patel were being hugged by Prime Minister Narendra Modi, hours before the NDA meet was to begin. The Ajit Pawar faction of NCP had joined Modi-led NDA.

WHY MODI IS TOO CONFIDENT?

Prime Minister Narendra Modi fired on all cylinders at the opposition leaders both on Tuesday morning and evening, and set the agenda for 2024 elections: Corruption and Dynastic Politics. He said, ‘kattar’ (diehard) corrupt politicians are meeting in Bengaluru, and they were ‘marketing a product which was different from the label’. Modi recalled a Bollywood song ‘Ek Chehre Pe Kayi Chehre Laga Lete Hain Log’, penned by Sahir Ludhianvi. Modi said, the ‘shop’ opened by opposition leaders provides two guarantees: casteist poison and unlimited corruption. He then went on to put the leaders in a hierarchy, and said, those who were ‘big’ in corruption get ‘more’ respect in opposition ranks. Those out on bail, he said, have less respect, but those who have been convicted, come as special invitees. The barbs were pointed and there is no need to describe whom these were aimed at. Modi said, leaders have assembled in Bengaluru not to defeat him, but to save their skin, because most of them are facing probes in major scams. Their sole aim is: ‘save your family, do as much corruption as you can’, he said. Modi is right when he says that there are parties in the opposition alliance, whose leaders have corruption cases against them. Cases by CBI and ED have forced these leaders to come on a single platform, and this is no secret. These leaders themselves say that their fight is less against BJP and more against ED and CBI. Had Modi’s government not instituted cases of corruption against these leaders, leaders like Kejriwal, Mamata Banerjee and Congress would not have joined hands. These leaders feel that Modi has ‘occupied’ all institutions and they do not have faith in both media and judiciary. Since the leaders cannot say much against the judiciary, they vent their anger on the media. It was in this context that Modi, in his evening speech, was confident enough to claim that BJP’s vote share in 2024 elections will cross 50 per cent and NDA will form government for the third time.

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26 vs 38 : मोदी vs विपक्ष

AKb (1)बैंगलुरू में मंगलवार को 26 विपक्षी दलों के नेताओं ने एक बैठक के बाद ऐलान किया कि उनके नये गठबंधन का नाम INDIA (Indian National Developmental Inclusive Alliance) होगा, इसकी एक कोऑर्डिनेशन कमेटी अगले महीने मुंबई में होने वाली बैठक में बनेगी. यह गठबंधन समान न्यूनतम कार्यक्रम और चुनाव रणनीति तय करेगी. सोमवार की रात को बैंगलुरु में विपक्षी नेताओं की डिनर पर अनौपचारिक बैठक हुई थी, जबकि मंगलवार को औपचारिक बैठक चार घंटे तक चली. बैठक में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खर्गे, तमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, बिहार के सीएम नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, आरजेडी के संस्थापक लालू प्रसाद, एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार, शिव सेना (यूटी) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और अन्य नेता उपस्थित थे. बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष खर्गे ने कहा कि सभी विपक्षी दलों ने देश को बचाने के लिए एक मंच पर आने का फैसला किया है. मंगलवार को ही दिल्ली के अशोका होटल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में NDA की बैठक हो रही है, जिसमें 38 सहयोगी दलों के नेता हिस्सा ले रहे हैं. ऐसा लगता है कि बीजेपी ने 26 विपक्षी दलों के मोर्चे का जवाब 38 पार्टियों वाले NDA से दिया है. विरोधी दलों वाले मोर्चे में बड़े-बड़े नेता दिखाई दिये, लेकिन ममता बनर्जी, स्टालिन और केजरीवाल को छोड़ कर जो लोग दिखे, उनमें से ज़्यादातर का जनाधार खिसक चुका है. उद्धव ठाकरे गठबंधन में हैं, पर उनकी शिव सेना एकनाथ शिंदे के साथ NDA में है . शरद पवार मोदी विरोधी खेमे में हैं, पर उनकी पार्टी तो प्रफुल्ल पटेल और अजित पवार के पास है, जो मोदी के साथ बैठक में पहुंचे. नीतीश कुमार भी विरोधी दलों की एकता के पैरोकार तो बने, पर उनका अपना जनाधार खिसकता जा रहा है, उनकी पार्टी का कौन सा नेता उन्हें कब छोड़कर चला जाए, वो नहीं जानते. कई छोटी छोटी पार्टियों ने अभी अभी उनका साथ छोड़कर NDA में शामिल होने का फ़ैसला किया है. यही हाल उत्तर प्रदेश में है, जहां अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का सपना देखने वाली पार्टियों के नेता अब BJP के साथ हैं. BJP की रणनीति ये है कि बिहार और उत्तर प्रदेश की, जनाधार वाली पार्टियों को अपने साथ जोड़ा जाए. 2014 में ये प्रयोग सफल रहा था, इसलिए NDA की 38 पार्टियों वाले मोर्चे में भले ही बड़े-बड़े नेताओं के चेहरे दिखाई न दें, लेकिन वहां ऐसे लोग पहुंचे हैं, जिनके पास जन समर्थन है, अपना जनाधार है. यूपी और बिहार की 120 लोकसभा सीटों को ही अगर लें, तो इन छोटी-छोटी पार्टियों का कुल मिलाकर 8 से 9 परसेंट वोट होता है, जो कांटे की टक्कर वाली स्थितियों में चुनाव का नतीजा पलट सकता है.

किस्सा पवार पार्टी का

मुंबई में रविवार और सोमवार को कई राजनीतिक घटनाएं हुई. लोगों को उस वक्त हैरानी हुई जब शरद पवार सोमवार दोपहर के वक्त अपने घर से पार्टी ऑफ़िस Y B चव्हाण सेंटर पहुंच गए. शरद पवार का Y B चव्हाण सेंटर पहुंचना बड़ी बात नहीं थी. बड़ी बात ये थी कि जिस वक्त शरद पवार वहां पहुंचे, उस वक्त अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल NCP के 37 विधायक और 6 MLC के साथ पहले से मौजूद थे, शरद पवार का इंतजार कर रहे थे. अब ये तो संभव नहीं है कि प्रफुल्ल पटेल और अजित पवार, शरद पवार से बात किए बग़ैर, सारे विधायकों को लेकर पहुंच गए होंगे. पहले बात हुई होगी, मुलाकात तय हुई होगी, उसके बाद ही अजित पवार विधानसभा से निकल कर Y B चव्हाण सेंटर पहुंचे थे. शरद पवार ने पहले अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे से अकेले में करीब पैंतालीस मिनट तक बात की, इसके बाद बाकी दूसरे विधायकों को शरद पवार से मिलने के लिए बुलाया गया. शरद पवार ने विधायकों से क्या कहा और विधायकों ने शरद पवार से क्या कहा, ये तो किसी ने नहीं बताया लेकिन वहां जो दृश्य दिखा, उससे ये बात स्पष्ट हो गई कि इस वक्त ज्यादातर विधायक और पार्टी के नेता अजित पवार के साथ हैं. अजित पवार के साथ 37 विधायक Y B चव्हाण सेंटर पहुंचे थे. अजित पवार ने सभी विधायकों को शरद पवार के सामने खड़ा करके अपनी ताकत दिखा दी और उनसे गुहार लगाई कि वो अब ज़िद छोड़ें, पार्टी का नेतृत्व करें, जो ज्यादातर विधायकों और पार्टी के लोगों की राय है, उसका समर्थन करें. तीन दिनों में अजित पवार और शरद पवार तीन बार मिल चुके हैं. पहले अजित पवार अकेले शरद पवार के घर गए, कहा कि अपनी चाची, यानी शरद पवार की पत्नी प्रतिभा को देखने गए थे, जिनका ब्रीच कैंडी अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था. अजित पवार अपने साथी मंत्रियों के साथ शरद पवार से रविवार को मिले. सोमवार को अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल और उनके गुट के सारे विधायक शरद पवार से मिलने पहुंच गए. तीन दिन में तीन बार शरद पवार से मुलाकात के कई मतलब निकाले जाएंगे. जो लोग अजित पवार को पसंद नहीं करते, वो कहेंगे कि महाराष्ट्र के गांव-गांव में आज भी शरद पवार का दबदबा है. प्रफुल्ल पटेल और अजित पवार, साहेब के इक़बाल से डरे हुए हैं, इसलिए माफ़ी मांगने साहेब के पास आ गए. अजित पवार के चाहने वाले कहेंगे कि प्रफुल्ल और अजित, दोनों ने पहले ही दिन से कहा है कि शरद राव हमारे भगवान हैं, वो तो NCP को एक रखने के लिए पवार साहेब के पास गए. अगर वो अपने नाराज़ भगवान को मनाने चले गए तो इसमें बुरा क्या है. लेकिन, सच ये है कि शरद राव और अजित दादा में राजनीतिक मतभेद चाहे जितने हों, व्यक्तिगत मतभेद कभी नहीं दिखाई दिए. अजित पवार पहले भी दो बार, शरद पवार से दूर होते नज़र आ चुके हैं, लेकिन दोनों बार वो घर वापस आ गए. इस बार तो अजित दादा जब गए, तो घर ही अपने साथ ले गए. फ़ैसला शरद पवार को करना है कि वो घर वापस आए या नहीं. शरद पवार की मुश्किल ये है कि घर वापस आने का मतलब है, मोदी के साथ जाना. फिर बड़े पवार साहेब की उन बड़ी-बड़ी बातों का क्या होगा, जो उन्होंने मोदी को उखाड़ फेंकने के लिए कही थीं? मुझे लगता है कि शरद पवार, इसे आसानी से मैनेज कर सकते हैं क्योंकि अजित पवार ने जो ऑफर दिया है वो बड़ा है. मेरी जानकारी ये है कि अजित पवार ने शरद पवार को ऑफर दिया है कि वो NCP के अध्यक्ष बने रहें, वही NCP का नेतृत्व करें, सुप्रिया सुले भी कार्यकारी अध्यक्ष रहें, NDA के साथ आ जाएं, सुप्रिया सुले केन्द्र सरकार में मंत्री बनें. अब सुप्रिया अगर केंद्र में मंत्री बनती हैं तो बेटी का भविष्य भी सुरक्षित हो जाएगा और इस उम्र में पवार साहेब को गांव-गांव भटकना भी नहीं पड़ेगा. लगता है कि अब पवार साहेब को कोई रास्ता तो निकालना पड़ेगा.

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26 VS 38 : MODI VS OPPOSITION

akbTop leaders of 26 opposition parties, in their meeting in Bengaluru on Tuesday, decided to form an alliance named Indian National Developmental Inclusive Alliance, with the acronym INDIA, to take on Prime Minister Narendra Modi-led National Democratic Alliance (NDA) in the run-up to Lok Sabha elections next year. The name was accepted after much deliberations on the second day of the conclave. In Delhi, the National Democratic Alliance consisting of 38 parties met on Tuesday to chalk out its future plans. On Monday evening, the opposition leaders met informally at a dinner. This was followed by a closed door meeting on Tuesday which continued for nearly four hours. A coordination committee will be set up, and it has been decided to hold the next opposition meeting in Maharashtra, Congress president Mallikarjun Kharge announced. The opposition meeting was attended by Congress leaders Sonia Gandhi, Rahul Gandhi, Kharge, Tamil Nadu CM M K Stalin, Bihar CM Nitish Kumar, Delhi CM Arvind Kejriwal, Jharkhand CM Hemant Soren, West Bengal CM Mamata Banerjee and RJD supremo Lalu Prasad, NCP supremo Sharad Pawar, former CM Uddhav Thackeray and leaders of other parties. After the meeting, Kharge said, all the opposition parties have decided to come together “to save the country” because of alleged misuse of CBI, ED and other agencies. One thing to note is that, while the opposition alliance has regional leaders like Mamata Banerjee, M K Stalin and Arvind Kejriwal who run the states where their parties are in power, most of the other leaders attending the Bengaluru meet have lost their political support base. For example, Shiv Sena (UT) chief Uddhav Thackeray is in the alliance, but most of his party MLAs led by Eknath Shinde are now part of NDA. Sharad Pawar attended the Bengaluru meeting, but a large section of his party led by his nephew Ajit Pawar and Praful Patel is now in the NDA. Nitish Kumar, who was the original initiator of the campaign for opposition unity, has his political base slipping. Nobody knows which leader in his party Janata Dal (U) may leave. Several small parties from Bihar have left his Mahagathbandhan and have joined NDA. Similarly, from UP, leaders who had dreamed of making Akhilesh Yadav the chief minister, are now in the BJP camp. Overall, BJP’s strategy is to accommodate as many local parties with mass base from UP and Bihar in the NDA. This experiment proved successful in 2014 Lok Sabha elections. Though one may not find big political leaders in the 38-party NDA, there are leaders who have their own support bases. If one adds the LS seats from UP and Bihar, it comes to 120, and small parties command 8 to 9 per cent votes. These parties can change the final result in close fights.

KISSA PAWAR PARTY KA
There were fast-paced developments in Mumbai on Sunday and Monday, when breakway NCP legislators led by Ajit Pawar met NCP supremo Sharad Pawar, and implored him to join NDA camp, but the patriarch was unwilling. The initial reason cited was, the legislators wanted to meet Sharad Pawar, whose wife Pratibha underwent hand surgery in Breach Candy Hospital. Soon after, the real reason for meeting the patriarch was revealed. Sharad Pawar went to Y B Chavan Centre on Monday where he met his old associates Praful Patel, Ajit Pawar, Sunil Tatkare, Chhagan Bhujbal, along with 37 MLAs and 6 MLCs. Nephew Ajit Pawar has met his uncle thrice in the last three days. Naturally, these meetings will be analysed minutely. Sharad Pawar camp may be saying that since the patriarch’s political dominance spans almost the whole of Maharashtra, both Ajit Pawar and Praful Patel met him to offer apology. On the other hand, those from Ajit Pawar camp may say that both Praful and Ajit had said from Day One, that for them, Sharadrao is God, and that they had gone to Saheb to help keep unity in the party. The ground reality is different: Sharadrao and Ajit Dada may have political differences, but they do not have any personal differences. In the past too, Ajit Pawar distanced himself from his uncle, but in both situations, he returned home. But this time, Ajitdada, while leaving, has taken almost the entire party with him. It is for Sharad Pawar to decide whether to allow his nephew to return. For Sharad Pawar, this will mean, joining hands with Modi. According to insider information, Ajit Pawar made on offer to his uncle on Monday. The offer was: his uncle may continue as NCP president and lead the party, Supriya Sule may continue as executive president and join NDA, and she may also join the Modi government as minister. This will ensure a secured future for her and Pawar Saheb will not have to visit each and every village at the age of 82 to garner votes. The ball is now in Sharad Pawar’s court: whether to take up the offer or leave it.

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दिल्ली में बाढ़ : ड्रेनेज प्रणाली में सुधार ज़रूरी

akbदिल्ली और आसपास के राज्यों में मौसम विभाग ने अगले दो दिन हल्की से तेज़ बारिश होने का संकेत दिया है, लेकिन अभी राजधानी में बाढ़ की स्थिति चिंताजनक है. दिल्ली में बाढ़ के पुराने सारे रिकॉर्ड टूट गए. बसें, ट्रक, गाड़ियां पानी में डूबी हैं, सड़कों पर नाव चल रही है. दिल्ली का करीब बीस प्रतिशत इलाका पानी में डूबा हुआ है. NDRF की 12 टीमें तैनात हैं. यमुना खतरे के निशान से साढ़े तीन मीटर ऊपर बह रही है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं कि इन्द्रप्रस्थ ड्रेन रेगुलेटर बाढ़ में टूट गया जिसकी वजह से यमुना का पानी शहर के कई इलाकों में घुसा. उनकी सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने शिकायत की कि NDRF टीम को बुलाने की मांग करने के बावजूद डिप्टी कमिशनर ने उनकी बात नहीं सुनी. उपराज्यपाल वी. के. सक्सेना ने कहा कि ये समय एक दूसरे पर आरोप लगाने का नहीं है. सबको मिलकर काम करना चाहिए. लेकिन आखिर बाढ़ की ये हालत कैसे हुई. मैंने अपना बचपन पुरानी दिल्ली के इन्ही इलाकों में गुजारा है, मैंने पहले कभी इस तरह के हालात नहीं देखे. 1978 की बाढ़ भी मैंने देखी है. उस वक्त तो लालकिले से आगे का इलाका इतना डेवलप नहीं हुआ था, पुरानी दिल्ली में पानी भरा था. राजघाट पर भी पानी था. लेकिन आज हालात काफी खराब हैं. आमतौर पर यमुना खादर, यमुना बाजार, निगम बोध घाट, मॉनेस्ट्री मार्केट जैसे इलाकों में तो हर साल पानी आता है, लेकिन यमुना का पानी सड़क और तटबंधों को पार करके रिहाइशी इलाकों में घुस गया है, इसलिए स्थिति चिंताजनक है. सरकार की तरफ से कहा गया कि यमुना का जल स्तर एक-दो दिन में कम हो जाएगा. दिल्ली में तीन बड़े वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट बाढ़ के कारण बंद कर दिये जाने से पूरी दिल्ली में पीने के पानी की समस्या पैदा हो गई है. केजरीवाल कह रहे हैं जब तक बाढ़ का पानी नहीं उतरता, प्लांट को फिर से चालू नहीं किया जा सकता. दिल्ली में बाढ़ के जो हालात बने हैं, उसके लिए हथिनीकुंड बैराज से छोड़े गए पानी को जिम्मेदार बताया जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि हथिनीकुंड बैराज से पानी का बहाव कम हुआ है, इसलिए दिल्ली में यमुना का जलस्तर स्थिर हुआ है. इस बात में थोड़ी सच्चाई है. लेकिन अगर उत्तराखंड और हिमांचल में तेज बारिश होती है, तो दिल्ली वालों को मुसीबत के लिए तैयार रहना चाहिए. मैंने कई विशेषज्ञों से, टाउन प्लानर्स से बात की. मौसम वैज्ञानिकों से पूछा कि आखिर दिल्ली में इस तरह के हालात की वजह क्या है. सबने कहा कि हथिनीकुंड बैराज से छोड़ा गया पानी सिर्फ एक वजह है. लेकिन दूसरे कारण भी हैं. दिल्ली में जो ड्रेनेज सिस्टम है, वो अंग्रेजों के ज़माने का है, खासतौर पर पुरानी दिल्ली का तो ड्रैनेज सिस्टम इस तरह के हालात का सामना करने के लिए बिल्कुल नहीं हैं. जो नाले हैं, उनकी कभी ठीक से सफाई नहीं होती. दिल्ली की आबादी जिस हिसाब से बढ़ी है, उसके हिसाब से ड्रेनेज सिस्टम को सुधारा नहीं गया है. दूसरी बात, यमुना की डीसिल्टिंग नहीं होती, इसलिए नदी की जल वहन क्षमता कम होती जा रही है. तीसरी बात, यमुना के रिवर बैड पर कब्जा करके लोग बस गए हैं, घर बन गए हैं. जिन इलाकों में बाढ़ के हालात हैं, वो ज्यादातर रिवर बैड पर हैं. इसलिए नदी शहर में नहीं आई है, शहर नदी में पहुंच गया है. जब तक ये हालात नहीं बदलेंगे, इस तरह की समस्याओं का सामना करना ही पड़ेगा. मेंने कल ही आपको IIT गांधीनगर के प्रोफेसर की बात सुनवाई थी, जो कह रहे थे कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण इस तरह की extreme weather conditions हर साल होंगी. इसका मतलब ये है कि दिल्ली वालों को भी इस तरह की मुसीबतें झेलने की आदत डालनी पड़ेगी.

पटना लाठीचार्ज : दोषियों पर कार्रवाई हो

बिहार की राजधानी पटना में गुरुवार को पुलिस लाठीचार्ज में बीजेपी के एक जिला पदाधिकारी की मौत हो गई. एक सांसद को भी लाठियां पड़ी. दर्जनों कार्यकर्ता घायल हो गए, किसी का हाथ टूटा, सिर फूटा, किसी की टांग टूटी. बीजेपी ने कहा है कि वो कार्यकर्ता की मौत के लिए नीतीश कुमार के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करवाएगी जबकि पुलिस का दावा है कि बीजेपी कार्यकर्ता की मौत लाठीचार्ज से नहीं हुई, भगदड़ में वो बेहोश हो गया था. पटना में बीजेपी ने नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट मार्च निकाला था. शिक्षक भर्ती के नियमों में बदलाव, दस लाख नौकरियां देने के वादे और तेजस्वी यादव के खिलाफ चार्जशीट को लेकर प्रदर्शन गांधी मैदान में था. बीजेपी कार्यर्ताओं को डाक बंगला चौराहे तक जाना था. लेकिन डाक बंगला चौराहे से पहले पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोक दिया. बैरीकेड फांदने की कोशिश में धक्का मुक्की हुई. बीजेपी सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल पुलिस वालों से बात करना चाह रहे थे लेकिन पुलिस ने लाठियां चलानी शुरू कर दी. जो सामने आया, उस पर लाठियां बरसाईं. दौड़ा- दौड़ा कर कार्यकर्ताओं को पीटा, न बुज़ुर्गों का ख़याल किया, न महिलाओं का. बीजेपी सांसद सिग्रीवाल पर भी पुलिस ने लाठी से कई वार किए. जहानाबाद के बीजेपी ज़िला महामंत्री विजय कुमार सिंह लाठी लगने के कारण बेहोश हो गए. अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई. पटना में पुलिस ने जो बर्बरता की, उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है. पुलिस ये कहकर नहीं बच सकती कि बीजेपी कार्यकर्ता की मौत लाठी खाने से नहीं हुई. कैमरों में साफ़ दिखाई दे रहा है कि पुलिस ने जमकर लाठियां चलाईं. किसी का सिर फूटा, किसी के हाथ-पैर टूटे, कितनों का ख़ून बहा, और कितने लोग चोट खाकर अस्पताल पहुंचे. जब ऐसे प्रदर्शन होते हैं, तो थोड़ी बहुत ज़ोर ज़बरदस्ती तो होती है. आगे बढ़-चढ़कर वर्कर, बैरीकेड फांदने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पुलिस क्रूरता पर उतर आए, प्रदर्शन करने वालों को बेरहमी से कुचला जाए. ऐसा लगता है कि जैसे पुलिस को पहले से निर्देश दिए गए थे कि प्रोटेस्ट करने वालों की पिटाई करनी है. अब कम से कम नीतीश कुमार को अपनी पुलिस का बचाव करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जो पुलिसवाले दोषी हैं, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए.

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DELHI FLOODS : DRAINAGE SYSTEM NEEDS OVERHAUL

rajat-sirWith the Met department forecasting light to moderate rains in Delhi and surrounding areas, the flood situation in North and East Delhi has become grim with Chief Minister Arvind Kejriwal asking his chief secretary to call in the army. A war of words erupted between Delhi minister Saurabh Bharadwaj and Lt Governor V K Saxena over relief work, with Saxena saying, this was not the time for blame game. Kejriwal said, the Indraprastha drain regulator of Delhi Jal Board has been damaged, and the breach has resulted flood in many localities. Already the capital is facing drinking water shortage after closure of three water treatment plants. By evening, work in one water treatment plant resumed. Three crematoriums, Nigam Bodh Ghat, Wazirabad and Geeta Colony have been shut after water entered the premises. On Thursday, more water was released in Yamuna from Hathni Kund barrage in Haryana. Nearly 20 per cent areas in Delhi are presently under water. Yamuna water level is flowing more than 11 feet above danger level. As a teenager, I spent most of my life in the localities of Old Delhi, but I never saw such a deluge. I had seen the floods of 1978. At that time too, the areas around Red Fort were not so well developed. Only parts of Old Delhi and Rajghat were submerged, but today’s situation is really grim. Any fall in Yamuna water level in Delhi can happen only after low release of water from Hathni Kund barrage. Presently, the barrage is overflowing because of huge flow of water from Himachal Pradesh. I spoke to several experts including town planners and weather scientists. I asked them the exact reasons for the deluge in Delhi. All of them said, while release of water from Hathni Kund barrage could be one of the reasons, the main culprit is Delhi’s drainage system, built by the British. The drainage system in Old Delhi cannot handle a deluge of this magnitude. Drains are never cleaned, and with uncontrolled rise in population density, the drainage system has not improved. Secondly, desilting of Yamuna is not done properly. The water carrying capacity of the river has become low. Thirdly, lakhs of people have occupied the Yamuna riverbed. They have built houses on the riverbed itself. In other words, the river has not entered the city, the city has reached the river. Until and unless the situation is not changed, such problems will exist. I have already told you the opinion of a professor from IIT, Gandhinagar. He was saying that extreme weather conditions due to global warming will now be the new norm every year. Delhiites will have the bear the consequences accordingly.

PATNA LATHICHARGE : CONDEMNABLE

The brutal lathicharge by Patna police on Thursday on BJP protesters needs to be condemned in unequivocal terms. Even women and MPs were not spared from police lathicharge. Several of them suffered with broken legs, heads and shoulders. Vijay Kumar Singh, district BJP general secretary of Jehanabad, fell unconscious after being hit by a police lathi. He was rushed to hospital, where he was declared dead. BJP leaders said, they will file a case against Chief Minister Nitish Kumar for the death of their worker. Patna Police said, Singh died not due to lathicharge, but because of the stampede that took place. The protest was organized by BJP to oppose the change made in domicile rule for hiring of teachers, non-completion of one million jobs promise made by RJD, and demand for resignation of Deputy CM Tejashwi Yadav charge sheeted by CBI in railway job scam. Patna Police cannot absolve its responsibility by saying that the BJP worker did not die because of lathicharge. Visuals clearly show police using lathis indiscriminately on the crowd, breaking people’s heads and legs, and blood flowing on the street. The lathicharge, BJP alleged, was all of a sudden. Whenever political parties organize protest marches, some amount of use of force happens, when workers try to cross barricades. But this cannot be the reason for police using brutal force indiscriminately. It seems, police were given instructions in advance to beat up the protesters. At least, Nitish Kumar should not try to defend his police. He must take action against the guilty police officers.

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दिल्ली में अभूतपूर्व बाढ़

akb fullहिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बाद अब दिल्ली में बाढ़ आई है. इस बार की बाढ़ अभूतपूर्व है. यमुना खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही है. पैंतालीस साल का रिकॉर्ड टूट गया है. 1978 में इस तरह की बाढ़ आई थी, जब यमुना का जलस्तर 207.49 मीटर तक पहुंचा था….लेकिन इस वक्त यमुना का जलस्तर 208.62 मीटर पर है. चिंता की बात ये है कि हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से लगातार पानी छोड़ा जा रहा है, जिसके कारण दिल्ली में बाढ़ आ गई है. लाल किले के पास रिंग रोड पर, आई टी ओ पर, और यमुना के आसपास तमाम इलाकों में पानी भर गया है. मुख्यमंत्री निवास सिविल लाइन्स में है और वहां भी बाढ का पानी पहुंच गया है. यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया है. दिल्ली में स्कूल-कॉलेज रविवार तक बंद कर दिये गये हैं. दिल्ली में यमुना का स्ट्रेच करीब 22 किलोमीटर का है, इसलिए यमुना के आसपास बसे इलाके, जैसे, यमुना बाजार, मॉनेस्ट्री मार्केट, उस्मानपुर, यमुना खादर, ISBT, मयूर विहार, गढ़ी मांडू, ओखला, वजीराबाद, मजनूं का टीला और पूर्वी दिल्ली में यमुना के किनारे बसे तमाम गांव डूब चुके हैं. कई जगह घरों में कमर तक पानी भरा है, कहीं कहीं दस फीट तक पानी है. सवाल ये है कि देश की राजधानी में ऐसे हालात कैसे बने? क्या सिर्फ हथिनीकुंड बैराज से छोड़ा गया पानी इसके लिए जिम्मेदार है? या फिर सिस्टम की कमियों का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है? ये अच्छी बात है कि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल आपसी समन्वय के साथ काम कर रहे हैं. केन्द्र और दिल्ली सरकार मिलकर काम कर रही है, लेकिन सवाल ये है कि दिल्ली में यमुना का जल स्तर हर साल खतरे के निशान को पार करता है, हर साल हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से पानी छोड़ा जाता है, फिर इस समस्या से निपटने के पुख्ता और स्थायी इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? ये सही है कि इस बार हिमाचल में ज्यादा बारिश हुई है, उसकी वजह से भी यमुना में भी ज्यादा पानी आया, लेकिन यमुना खादर, यमुना बाजार से लेकर ओखला बैराज तक पानी तो हर साल भरता है. इसकी एक ही वजह है – नालों की सफाई न होना, यमुना की डीसिल्टिंग न होना, यमुना की गंदगी को साफ न करना. अगर नदी की डीसिल्टिंग की जाती तो यमुना की जल वहन क्षमता बढ़ती. नदी का पानी आसपास के इलाकों में न जाता. इस मुद्दे पर दावे हर साल होते हैं. 1993 में यमुना एक्शन प्लान बना था, जिसे 2003 में पूरा होना था. नहीं हुआ. फिर 2003 में यमुना एक्शन प्लान का फेज टू आ गया, जिसे 2020 में पूरा होना था. वो भी नहीं हुआ. पहले बीजेपी और कांग्रेस एक दूसरे पर इल्जाम लगाते रहते थे, फिर केजरीवाल आए. उन्होंने पांच साल में यमुना को साफ करने, डीसिल्टिंग करने का वादा किया, लेकिन वो भी बार बार समय सीमा बढ़ाते रहे. इसी चक्कर में दिल्ली में यमुना के आसपास रहने वालों को हर साल बाढ़ की मुसीबत का सामना करना पड़ता है.

हिमाचल, उत्तराखंड में खतरा अभी टला नहीं

हिमाचल प्रदेश के शिमला, कुल्लू और सोलन में मौसम विभाग ने फिर भारी बारिश का रेड एलर्ट जारी किया है, जिसके कारण लोगों में दहशत है. कई इलाकों में हल्की हल्की बारिश अभी भी हो रही है लेकिन अब नदियों का पानी उतर गया है. राज्य सरकार का कहना है कि अब तक 88 लोगों की जानें गई, 16 लोग अभी भी लापता हैं, 873 सड़कें अभी भी बंद हैं, 1193 रूटस पर सरकारी बस सेवा बंद है. चूंकि नदियों का जलस्तर कम हो गया है, इसलिए अब तबाही के निशान साफ दिख रहे हैं. कई-कई किलोमीटर तक सड़क गायब है. मनाली को जोडने वाली सड़क नदी के दोनों तरफ से बह गई है, इसलिए न कोई शहर से बाहर आ सकता है, न कोई शहर में जा सकता है. लोग एक पुराने लकड़ी के पुल के जरिए अपनी जान खतरे में डालकर मनाली से निकल रहे हैं. लोगों ने कहा कि उन्होंने पिछले तीन दिन में जो कुछ झेला, वो किसी बुरे सपने जैसा था. हमारे संवाददाता पवन नारा टीचर्स के एक ग्रुप से मिले. ये लोग अपने होटल में फंस गए, तीन दिन के बाद बुधवार को निकल पाए तो राहत की सांस ली. इन टीचर्स ने बताया कि वहां न बिजली है, न खाना है, न पानी है, और सबसे बड़ी बात, इन लोगों के पास पैसे भी नहीं है. .इन लोगों ने कहा कि कुदरत ने जरूर इम्तेहान लिया, लेकिन मनाली के लोगों ने सैलानियों की जिस तरह मदद की, उसे वे जिंदगी भर नहीं भूलेंगे. होटल वाले ने किराया नहीं लिया, आस पास के लोगों ने खाने पीने का इंतजाम किया और चलते वक्त रास्ते के लिए होटल वाले ने बीस हजार रूपए भी दिए . लाहौल-स्पीति जिले के चंद्रताल में अभी भी 300 लोग फंसे हैं, यहां तीन से चार फीट बर्फ है, प्रशासन ने 12 किलोमीटर का रास्ता तो क्लीयर कर लिया है, लेकिन जहां टूरिस्ट के कैंप हैं, उसमें अभी 25 किलोमीटर का फासला है. मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने हवाई सर्वे किया. चन्द्रताल में बर्फ के बीच टूरिस्ट के टैंट आसमान दिख रहे हैं, लेकिन मौसम खराब होने के कारण उन्हें एयरलिफ्ट नहीं किया जा सकता. प्रशासन इन लोगों तक खाने पीने का सामान और गर्म कपड़े पहुंचा रहा है, लेकिन इन टूरिस्ट को वहं से हटाने में अभी वक्त लगेगा. उत्तराखंड में बीते 24 घंटे में कुल 341 सड़कें बंद हुई हैं। इनमें से 193 सड़कें एक दिन पहले से बंद थीं, जबकि 148 सड़कें सोमवार को बंद हुईं। रविवार देर शाम तक 68 सड़कों को खोला जा सका था, जबकि 273 सड़कें अब भी बंद हैं।
26 राज्य मार्ग बंद हैं … इससे यात्री जगह-जगह फंसे हुए बताए जा रहे हैं। मौसम विभाग ने 13 जुलाई का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही है, कई जगह भूस्खलन और भूधंसाव की वजह से मार्ग बंद हो गए हैं। उत्तराखंड के 11 जिलों में भारी बारिश की आशंका जताई गई है। इनमें रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़, उत्तराकाशी, टिहरी, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार समेत जिलों में अलर्ट जारी किया गया है। सुखविन्दर सिंह सुक्खू का दावा है कि सरकार मुश्किल में लोगों की मदद कर रही है, लेकिन हर टूरिस्ट ने कहा कि हिमाचल में प्रशासन नाम की चीज नहीं दिखी, कोई सरकारी मदद नहीं मिली, लेकिन इन्ही लोगों ने हिमाचल के आम लोगों की तारीफ की. कहा, आम लोगों ने उन्हें सिर छुपाने की जगह दी, खाना पीना दिया, और सबसे बड़ी बात मुश्किल वक्त में हौसला दिया. ये हिमाचल की सरकार के लिए शर्मनाक है. मैं हिमाचल के लोगों के जज्बे की तारीफ करना चाहता हूं क्योंकि जो काम सरकार का था, वो आम लोगों ने करके दिखाया, इंसानियत की मिसाल पेश की. उत्तराखंड में हालात अभी भी ठीक नहीं हैं. कई इलाकों में जोरदार बारिश हो रही है, भूस्खलन का खतरा बना हुआ है. अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है. भारी बारिश की वजह से पहले ही कई नदियां और पहाड़ी नाले उफान पर हैं, टौंस और यमुना नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं. हरिद्वार में सोलानी नदी के खतरे के निशान से ऊपर पहुंचते ही कई गांवों में पानी घुस गया. धौली और काली नदी का बहाव इतना तेज है, इसका अंदाज़ा पिथौरागढ़ के धारचूला से आई तस्वीरों को देखकर लगाया जा सकता है. उत्तराखंड में 341 सड़कें बंद हैं, इसकी वजह से जगह-जगह टूरिस्ट फंसे हुए हैं. लोग जान जोखिम में डालकर वहां से गुजर रहे हैं क्योंकि वो जल्द से जल्द वहां से निकलना चाहते हैं.

वैज्ञानिकों की चेतावनी

अब सवाल ये है कि इतनी भारी बारिश क्यों हुई? क्या ये सिलसिला हर साल होगा? क्या इस बारिश का ग्रीन हाउस इफैक्ट से कोई लेना देना है? क्या ये मौसम में हो रहे बदलाव का सबूत है? ये सवाल हमारे संवाददाता निर्णय कपूर ने IIT गांधीनगर के वैज्ञानिकों से पूछे. प्रोफेसर विमल मिश्रा ने कहा कि IIT गांधीनगर ने इस विषय पर शोध किया है. नतीजा ये आया कि इस तरह के extreme weather conditions के लिए अब देश के लोगों को तैयार रहना चाहिए. ये हर साल होगा, बार बार होगा. विमल मिश्रा ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से बचने के लिए दुनिया भर के मुल्क मिलकर कोशिश कर रहे हैं, कदम उठा रहे हैं, लेकिन उनका असर तीस चालीस साल के बाद दिखेगा. इसलिए अभी कई सालों तक तो इसी तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने की आदत डालनी होगी. सरल भाषा में समझे तो वैज्ञानिक ये कह रहे हैं कि अब गर्मी में बहुत ज्यादा गर्मी होगी और बारिश में बहुत ज्यादा बारिश होगी. सर्दी भी ज्यादा पड़ेगी. इसका मतलब ये हुआ कि गर्मी में सूखा और बारिश में बाढ का सामना करना होगा. ये बात सुनने में छोटी लग सकती है लेकिन ये खतरा बहुत बड़ा है क्योंकि इससे फसलों का चक्र गड़बड़ाएगा, न रबी की फसल होगी, न खरीफ की. इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर होगा, खाने का संकट होगा, बीमारियां बढ़ेंगी. इसलिए वैज्ञानिक कह रहे हैं कि कुदरत तो बार बार संदेश दे रही है, संभल जाओ, अगर पूरी दुनिया ने मिलकर कदम न उठाए, तो कुदरत का क़हर सहने के लिए तैयार रहना पड़ेगा ….

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UNPRECEDENTED FLOOD IN DELHI

AKBDelhi is witnessing unprecedented flood with the river Yamuna flowing at a historic high level of 208.62 metres, surpassing the 1978 record of 207.47 metrs. Ring Road near ITO was flooded on Thursday, even as water flowed on the main road in the posh Civil Lines of Old Delhi. Yamuna water level continued to rise as more water was released from Hathnikund barrage in Haryana. One side of GT Karnal Road has been flooded and only one carriageway is being used for traffic. Flood water reached the Delhi Chief Minister’s residence on Thursday morning. Yamuna Bank Metro station had to be closed, while schools and colleges have been closed till Sunday. Thousands of people living near the Yamuna banks have been rendered homeless. Several teams of NDRF are working round-the-clock to evacuate people. The localities worse affected are: Yamuna Bazar, Monastery Market, Usmanpur, Yamuna Khadar, ISBT, Mayur Vihar, Garhi Mandu, Okhla, Wazirabad, Majnun Ka Tila and several parts of East and South-East Delhi. It is good that both the Lt. Governor and Delhi government are working in coordination and they are on the same page. The question arises: if Yamuna water level rises every year because of release of water from Hathni Kund barrage in Haryana, why solid, permanent measures were not taken? It is true the Yamuna is in spate because of heavy rains in Himachal Pradesh and Uttarakhand, but the question arises, why river bank areas like Yamuna Bazar and Yamuna Khadar are flooded every year? The answer: lack of proper desilting of Yamuna river and its drains. Had there been proper desilting, it could have enhanced the water carrying capacity of the river, and water would not have entered adjoining localities. Every year, tall claims are made. The Yamuna Action Plan was prepared in 1993. It was supposed to be implemented fully by 2003. It did not happen. In 2003, Phase 2 of Yamuna Action Plan was implemented. It was supposed to be complete by 2020, but it did not happen. Earlier, Congress and BJP used to level allegations at each other. Kejriwal came to power and he promised complete desilting of Yamuna in the next five years. The deadline was extended time and again. This is the reason why people living in the vicinity of Yamuna river face the brunt of flood fury every year.

NATURE’S FURY IN HP, UTTARAKHAND

With the met department issuing a red alert about possible heavy rains in Shimla, Kullu and Solan, people in Himachal Pradesh are living in fear. The state government has confirmed the deaths of 88 persons, with 16 others missing, 873 roads blocked and bus services suspended on 1,193 routes. There is widespread devastation caused by floods and landslides. The road connecting the tourist spot Manali has been washed away. NDRF teams fixed zip lines to evacuate stranded people wearing safety harness over the swollen river Beas. Nearly 50,000 people stranded in Kullu district have been evacuated, claimed chief minister Sukhvinder Singh Sukhu. Nearly 300 people, mostly tourists, stuck near Chandratal Lake in Lahaul and Spiti district, at a height of 14,100 feet, are facing evacuation challenges. Relief teams are working in sub-zero temperature, in three to four feet of snow to repair the road leading to Chandratal Lake. India TV reporter Pawan Nara met a group of teachers who had gone to Manali for a seminar. They were stranded in their hotel, and heaved a sigh of relief after three days of staying without water, electricity and food. The hotel owner did not take money from them, and instead gave them Rs 20,000 for their safe return, the teachers said. Tourists are leaving Manali in groups, but those stranded in Mandi are facing problems. In Uttarakhand, 341 roads were blocked in the last 24 hours. 68 roads were reopened for traffic on Sunday night, but 273 roads are still blocked. Met department has issued an orange alert for Thursday. So far, 15 people have died due to rains and flood in Uttarakhand. I thank the people of Himachal Pradesh for helping stranded tourists, despite the chief minister Sukhvinder Singh Sukhu’s claim that government is trying to reach out to them. Most of the stranded tourists complained that the state government did not come to the rescue of stranded people.

BE PREPARED, WARN SCIENTISTS

The question now is, why such a heavy downpour in northern India? Will this be an annual phenomenon? Has the downpour got to do anything with Greenhouse Effect? Is it a sign of climate change? Our reporter Nirnay Kapoor spoke to IIT, Gandhinagar scientists. One of them, Prof. Bimal Mishra referred to a research done by IIT on this topic. The conclusion reached was: people in India must be prepared to face extreme weather conditions, which may occur almost every year, frequently. Prof. Mishra said, countries across the world are doing their bit to save the Earth from global warming, but its effect will be noticeable only after 30-40 years. For the next one or two decades, people will have to be prepared to face natural calamities. In layman’s language, scientists want to convey that it will be too hot in summer, too much rains during monsoon, and severe, biting cold during winter. Situations may arise when people will have to face severe drought during summer, and flash floods during monsoon. It may seem simple, but the danger is big. These extreme weather conditions may result in change in our crop cycles, like rabi and kharif crops. This will affect world economy, may cause food shortage, cause epidemics. Scientists say, nature is giving us messages constantly: Be on alert, if the world fails to act unitedly, people should be ready to face nature’s fury.

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सड़क हादसों को रोकने के लिए कड़े कानून बने

akb full_frame_60183मंगलवार की सुबह एक बुरी खबर आई. जिसने भी वीडियो देखा, उसके मुंह से आह निकल गई. दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर एक ड्राइवर उल्टी दिशा में 8 किलोमीटर तक तेजी से बस भगाते हुए आया, सामने से आती महिन्द्रा टीयूवी बस से टकराई और देखते ही देखते छह बेगुनाह लोगों की मौत हो गई. दो लोग अस्पताल में में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं. इस परिवार की कोई गलती नहीं थी, न ओवर स्पीडिंग कर रहे थे, न लेन चेंज कर रहे थे, न रॉंन्ग साइड पर चल रहे थे, लेकिन अचानक रॉंन्ग साइड से एक बस आ गई. कार चलाने वाला कुछ कर पाता, इससे पहले हादसा हो गया और पूरा परिवार तबाह हो गया. बस का ड्राइवर सिर्फ पांच मिनट बचाने के चक्कर में एक्सप्रेस वे पर रॉन्ग साइड से गाड़ी ले गया. ये सिर्फ एक सड़क दुर्घटना का मामला नहीं है, दुर्घटनाएं तो रोज़ होती हैं, लेकिन मंगलवार की सुबह जो हुआ उसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए. एक्सप्रेस वे पर कैमरे लगे हैं, हर वक्त मॉनिटरिंग का दावा किया जाता है, पैट्रोलिंग होती है, फिर एक ड्राइवर आठ किलोमीटर तक रॉंन्ग साइड पर बस चलाता रहा तो उसे रोका क्यों नहीं गया? उसे गलत दिशा मे आते समय पकड़ा क्यों नहीं गया? सवाल ये भी है कि क्या इस तरह की गलती करने वाला, दूसरों की जिंदगी को खतरे में डालने वाला सिर्फ गैर-इरादतन हत्या, ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन जैसे मामले में थोड़े दिन जेल में रह कर छूट जाएगा? क्या इतनी सजा काफी है? जिस परिवार के छह लोगों की मौत हुई, वे मेरठ के रहने वाले थे और राजस्थान में भगवान का दर्शन करने मंदिर जा रहे थे. दुर्घटना के बाद पुलिस ने गैस कटर से काट कर शवों को बाहर निकाला. मेरठ निवासी दो भाई, नरेंद्र और धर्मेन्द्र अपने पूरे परिवार के साथ खाटू श्याम जी के दर्शन करने जा रहे थे. उन्हें मेरठ से गुड़गांव जाना था, वहां से अपनी बहन को साथ लेना था और फिर खाटू श्याम जी के दर्शन के लिए जाना था. नरेंन्द्र की पत्नी अनीता, दो बेटे हिमांशु और दीपांशु, नरेंद्र के छोटे भाई धर्मेन्द्र, धर्मेन्द्र की पत्नी बबिता, उनके दो बच्चे, बेटी वंशिका और 8 साल का बेटा गाड़ी में थे. हादसे में नरेंद्र और उनके पूरे परिवार की मौत हो गई. धर्मेन्द्र की पत्नी और बेटी की मौत हो गई. धर्मेन्द्र और उनके बेटे गंभीर रूप से घायल हैं. अब सवाल ये उठता है कि इस त्रासदी के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सिर्फ ड्राइवर की गलती है? क्या टोल नाके पर बैठे कर्माचरियों की, पैट्रोलिंग टीम की, .सीसीटीवी मॉनिटरिंग टीम की कोई जिम्मेदारी नहीं है? नरेंद्र के रिश्तेदारों का कहना है कि इस हादसे के लिए हाइवे पर टोल वसूलने वाली कंपनी और प्रशासन ज़िम्मेदार है, क्योंकि ये बस अक्सर रॉन्ग साइड से गुज़रती थी, अगर किसी ने पहले इसे रोका होता, एक्शन लिया होता, तो शायद 6 जानें बच सकती थी. ये बात तो सही है कि क्या टोल पर बैठे कर्मचारियों का काम सिर्फ टोल वसूलना है? क्या रॉन्ग साइड पर आने वाली गाडियों को रोकने की जिम्मेदारी प्रशासन की नहीं है? पता लगा कि जिस बस की वजह से हादसा हुआ, वह एक टूर ऐंड ट्रैवल्स कंपनी की है. पहले ये एक स्कूल बस थी, अभी एक प्राइवेट कंपनी के कर्मचारियों को लाने-ले जाने का काम कर रही थी. पुलिस को पता लगा कि इस बस का 18 बार पहले भी चालान हो चुका था, कभी ओवर स्पीडिंग, कभी सही ट्रैफिक लेन में नहीं चलने की वजह से, और कभी ख़तरनाक तरीक़े से ड्राइविंग करने के लिए. 18 बार चालान के बावजूद इस बस को सड़क पर चलने दिया गया. हमारे देश में हाइवे और एक्सप्रेस वे बन रहे हैं, जितनी अच्छी सड़कें बन रही है, हादसे भी उतने ज्यादा बढ़ रहे हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि हमारे देश में हर साल डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों की जान सड़क हादसों में चली जाती है. दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं भारत में होती हैं. मैंने ‘आप की अदालत’ में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी से एक बार इसी विषय पर पूछा था. गडकरी ने बताया कि उन्हें ये मानने में कोई संकोच नहीं कि 8-9 साल से मंत्री रहने के बावजूद वे सड़क हादसों की संख्या कम नहीं करा पाए. उन्होने मूलत: 4 बातें बताई. एक, रोड इंजीनियरिंग के जडरिये उन ब्लैक स्पॉट्स का पता लगाना, जहां अक्सर हादसे होतें हैं, और वहां अंडरपास और पुल बनाना, (2) कार इंजीनियरिंग के ज़रिए सबी वहानों में 6 एयर बैग लगाने की अनिवार्यता लागू कराना, और पीछे की सीठ पर भी सेट बेलट की अनिवार्यता लागू कराना (3) सख्त ट्रैफिक कानून बनाना, ताकि लोगों को बिना थ्योरी और प्रैक्टिकल टेस्ट के ड्राइविंग लाइसेंस न देना, और (4) अपने अपने लेन में गाड़ी चलाने के बारे में जागरूकता पैदा करना. गड़करी ने कहा कि भारत के 3 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद का नुकसान सड़क हादसों की वजह से होता है. गड़करी ने मुझे एक और हैरान करने वाली बता बताई. उन्होंने कहा कि एक बार उन्होंने महाराष्ट्र में सरकारी बसों के ड्राइवर्क की आंखों की जांच करवाई. पता लगा कि चालीस परशेंट बस ड्राइवर्स ठीक से देख नहीं देख सकते थे. ज्यादातर को कैटरेक्ट (मोतियाबिंद) की बीमारी थी. कुछ तो एक आंख से पूरे तरह अंधे थे. उस वक्त एक मंत्री की गाड़ी का ड्राइवर एक आंख से अंधा था. उसे दिखाई नहीं देता था, वो अंदाजे से गाड़ी चला रहा था. गडकरी का कहना था कि हालात आज भी नहीं बदले हैं अब सोचिए, जिस देश में सरकारी गाडियों के ड्राइवर्स का ये हाल हो, वहां सड़क पर चलने वालों की जिंदगी भगवान भरोसे ही होगी. गड़करी की ये बात सही है कि हमारे देश में आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाता है और उसके बाद ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर सजा भी बहुंत ज्यादा नहीं होती, हजार सौ रूपए देकर छूट जाते हैं. जबकि दूसरे देशों में ट्रैफिक नियम सख्त हैं और सजा भी ज्यादा है. नॉर्वे में गति सीमा से ज्य़ादा तेज़ चलाने पर 65 हज़ार रुपए तक का जुर्माना है , शराब पीकर गाड़ी चलाने और रेड लाइट जंप करने पर लाखों का जुर्माना है. कनाडा के ओंटैरियो में अगर दो साल के भीतर किसी ड्राइवर का दो बार चलान होता है, तो उसका ड्राइविंग लाइसेंस दो महीने के लिए निलंबित कर दिया जाता है. अगर कोई पांच बार रॉन्ग साइड पर गाड़ी ड्राइव करता हुआ पकड़ा जाता है, तो लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है. ब्रिटेन में ट्रैफिक नियम तोड़ने पर अगर तीन साल के अंदर अगर किसी के ऊपर 12 पेनाल्टी लगती है, तो उसका लाइसेंस छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है. बार बार ओवरस्पीडिंग करने पर लाइसेंस छह महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है. ब्रिटेन में शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले को जेल भेज दिया जाता है. अमेरिका में भी ट्रैफिक नियम तोड़ने पर 15 से 25 हज़ार रुपए का जुर्माना होता है, और अगर कोई गति सीमा से ज़्यादा तेज़ गाड़ी चलाता है, तो उस पर पेनाल्टी लगती जाती है. 12 प्वाइंट होने पर लाइसेंस सस्पेंड कर दिया जाता है. क्रोएशिया, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और चीन में ड्राइविंग लाइसेंस से पहले लर्नर लाइसेंस दिया जाता है और ड्राइविंग लाइसेंस तभी कन्फर्म होता है, जब कोई ड्राइवर 100 से 200 घंटे की ड्राइविंग पूरी कर ले. मुझे लगता है कि हमारे देश में भी ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनने चाहिए और इन कानूनों का ईमानदारी से पालन करवाने की जरूरत है, तभी इस तरह के हादसों पर रोक लग सकती है.

बृज भूषण : न्याय होना ही चाहिए

दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने पहलवान बेटियों के यौनशोषण के आरोपों में जो चार्जशीट फाइल की है, उससे भारतीय कुश्ती फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की मुश्किलें बढ़ गई है. दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में कहा गया है कि बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन शोषण के इल्जाम में केस चलाने के लिए पर्याप्त आधार है. बृजभूषण के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है. बृजभूषण का अपराध सजा के काबिल है. चार्जशीट में 108 लोगों के बयान दर्ज हैं, 21 लोगों ने पीड़ित महिला पहलवानों के पक्ष में गवाही दी है, इसमें 6 लोगों ने 164 के तहत अपनी गवाही दर्ज कराई है. गवाही देने वालों में पहलवानों के परिवार के लोग भी शामिल हैं. बृजभूषण के खिलाफ 13 जून को दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी. एक हजार पन्नों की चार्जशीट में यौन उत्पीड़न, महिला का शील भंग करने के इरादे से हमला करना या बल प्रयोग करना और बुरे इरादे से महिला का पीछा करने जैसी संगीन धाराएं लगाई गईं हैं. चार्जशीट के आधार पर कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह को 18 जुलाई को पेश होने का समन पहले ही जारी कर दिया था. कांग्रेस ने मांग की है कि बृजभूषण को उनके पद से और पार्टी से तुरंत हटाया जाय और उन्हें गिरफ्तार किय़ा जाय. बृजभूषण के केस में ये कहा जा सकता है कि ये तो होना ही था. उनपर जो आरोप लगे हैं वो बेहद संगीन हैं, लेकिन बृजभूषण ने कभी भी इन आरोपों की परवाह नहीं की. उनका जो रवैया रहा है, वो गैरजिम्मेदाराना, ज़िद्दी और अपनी छवि के मुताबिक बाहुबली जैसा रहा है. इससे सरकार की छवि खराब हुई, भारतीय कुश्ती का नाम खराब हुआ. मैडल जीतने वाली, देश का नाम रौशन करने वाली पहलवान बेटियों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी. इसलिए बृजभूषण के खिलाफ केस तो चलना ही चाहिए था, लेकिन इस मामले में न्याय हो इतना ही काफी नहीं है, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए, क्योंकि इस केस की एक-एक बात सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है. इस मामले में दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए थे, लेकिन चार्जशीट देखकर ये लगता है कि दिल्ली पुलिस ने इस मामले की तहकीकात ठीक से की, और गवाहों के बयान इतने पुख्ता हैं कि अब बृज भूषण शरण सिंह का बचना मुश्किल होगा.

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ROAD ACCIDENTS : BRING STRINGENT TRAFFIC LAWS

AKBThe horrific crash that took place on Tuesday morning on Delhi-Meerut Expressway should ring an alarming bell for all drivers and for the entire traffic management system. Six members of a family died and two are battling for life after a private bus, that came from the wrong side for nearly eight kilometres, crashed into a Mahindra TUV vehicle. The Meerut-based family was going to Sikar, Rajasthan to visit a temple. The crash took place near Ghaziabad. The bus driver, coming from the wrong side, tried to swerve to the right, but ended up crashing into the TUV, because the car driver too steered to his left. Road accidents occur in India daily, but this crash raises questions about our system. CCTV cameras were installed on the expressway, the authorities claimed that vehicles are monitored round-the-clock on cameras, apart from patrolling, but a bus driver travelled on the wrong side for nearly 8 km, but nobody stopped him. Question has been raised whether the driver, Prem Pal, who committed this grave traffic violation, would walk out of the jail. Indian Penal Code says, “whoever causes the death of any person by doing any rash or negligent act, not amounting to culpable homicide shall be punished with imprisonment up to two years, or with fine, or both”. Is the punishment adequate? Those who died in the crash included Narendra, his wife Anita, their two sons Himanshu and Deepanshu, his brother Dharmendra’s wife Babita and her daughter Vanshika. Dharmendra and his son are battling for life. Gas cutter was used to cut open the mangled vehicle to bring out the corpses. Narendra’s relatives say, it was the toll company which is responsible for this crash, because the bus driver used to regularly take the wrong side daily. Had he been stopped earlier, the lives of six persons could have been saved. Is the work of toll company staff only to collect toll? Is it not the responsibility of administration to stop vehicles travelling from the wrong side? The bus, belonging to a private transport company, used to ferry school children, but of late, it was ferrying employees of a private firm. Police said, the bus was challaned 18 times, for dangerous driving, overspeeding and other traffic violations. At a time when India is witnessing a spectacular growth in road infrastructure, with new expressways being built across the country, you will surprised to know that more than 1.5 lakh people lose their lives in road accidents annually. India tops the world’s list of countries where road accidents occur. Wrong-side driving, after overspeeding, is the second biggest cause of road accident deaths in India. About 43,000 lives were lost between 2017 and 2021 in India due to wrong side driving. I had asked Union Road Transport Minister Nitin Gadkari in my show ‘Aap Ki Adalat’ about how road accidents can be prevented. Gadkari said, “I have no hesitation in accepting that I could not lower the number of road accidents during the last 8-9 years of my tenure”. He gave four main reasons: (1) road engineering, by identifying ‘black spots’ and building underpass, overbridges, (2) automobile engineering, by making 6 airbags in vehicles mandatory, and seat belt fastening on rear seats mandatory, (3) making theoretical and practical tests mandatory for all driving license applicants and (4) creating awareness about sticking to road lanes by taking support from celebrities like Amitabh Bachchan and Akshay Kumar. Gadkari also revealed a surprising incident. Once, he ordered eyesight check for drivers of all government buses in Maharashtra, and found that at least 40 per cent drivers could not see properly, with most of them suffering from cataract. Some bus drivers could not see at all from one eye. He told me, one driver of a minister’s car could not see from one eye, and yet he used to drive the vehicle using his sixth sense. Gadkari said, the situation has still not improved till now. In a country where drivers of government vehicles have failing eyesight, what will be the fate of passengers and others? Gadkari is right when he says, in India, one gets a driving license easily without undergoing strict tests. Secondly, punishments for serious traffic rule violations are not severe. In western countries, traffic rules are stringent and the punishments are severe. In Norway, overspeeding can result in fines up to Rs 65,000, drunken driving and jumping red lights invite fines in several lakhs of rupees. In Ontario, Canada, if a driver is challaned twice in two years, his license is cancelled for the next two months. Any driver caught driving on the wrong side five times, will invite cancellation of license. In Britain, if any driver gets penalties twelve times in three years, his license is suspended for six months. Frequent overspeeding results in suspension of license for six months. Those caught for drunken driving are sent to prison. In the US, traffic violations invite fines ranging from Rs 15,000 to Rs 25,000, overspeeding invites penalty points, and after getting 12 points, the driver’s license is suspended. In Croatia, Japan, Singapore, Australia and China, a driver is first given learner’s license, and his license is confirmed only after he completes 100 to 200 hours of driving. Time has come for enforcing stringent traffic rules in India to prevent major road accidents.

BRIJ BHUSHAN : JUSTICE MUST BE DONE

Delhi Police chargesheet filed in Rouse Avenue court against former president of Wrestling Federation of India Brij Bhushan Sharan Singh clearly shows his involvement in sexual harassment of female wrestlers. The chargesheet says, Singh is “liable to be prosecuted and punished for offences of sexual harassment, molestation and stalking” under Sections 506 (criminal initimidation), 354 (outraging modesty of a woman, 354 A (sexual harassment) and 354 D (stalking) of Indian Penal Code. The chargesheet includes ‘technical evidence’ that includes two photographs allegedly showing him making advances towards a complainant, his phone location matching another wrestler’s testimony, a set of photos that confirm his presence at a event when an incident of sexual harassment took place. The chargesheet includes statements of 108 persons, out of which 21 persons have given testimonies in favour of the victims. Six of them have given their testimony under Section 164 of CrPC. Among the witnesses are relatives of female werstlers. Police had filed more than 1,000 pages of chargesheet on June 13, and Singh has been summoned to appear in court on July 18. Congress leaders have demanded that Singh should be expelled from BJP and he must be arrested. The chargesheet substantiates the allegations made by women wrestlers against the ex-chief of WFI. This was bound to happen. The charges are serious. But Brij Bhushan never cared for these allegations and his conduct was irresponsible, adamant and he projected his image of a ‘Bahubali’. Brij Bhushan’s action has brought disrepute to the government’s image. Women wrestlers who brought fame for India by winning medals, had to face atrocities. The case must now be taken to its logical conclusion. ‘Justice must not only be done, but must be seen to be done’. Each of the incidents mentioned in the chargesheet are in public domain. Questions were raised about partiality on part of Delhi Police, but the chargesheet clearly shows, Delhi Police has done its investigation astutely. The testimonies of witnesses are so solid that it may be difficult for Brij Bhushan Sharan Singh to wiggle out.

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कुदरत का क़हर : बचने के उपाय

akb fullदेश के कई हिस्सों से बारिश से हुई तबाही की जो तस्वीरें आईं, वो दिल दहलाने वाली हैं. प्रकृति का सबसे ज्यादा क़हर हिमाचल में दिखाई दिया. हिमाचल प्रदेश में पिछले सत्तर साल में इतनी बारिश कभी नहीं हुई, यहां भयंकर बारिश, बादल फटने की घटनाएं, भूस्खलन और बाढ़ के कारण बेइंतहा तबाही हुई है. दिल्ली का भी बुरा हाल है, यहाँ पिछले चालीस साल में इतनी बारिश कभी नहीं हुई, जितना पानी मॉनसून के पूरे मौसम में बरसता है, उतनी बारिश सिर्फ 12 घंटे में हो गई. यमुना खतरे के निशान को पार कर गई है. हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से लगातार पानी छोड़ा जा रहा है, इसलिए आने वाले दिनों में दिल्ली के हालात और खऱाब होने के आसार है. दिल्ली के इंडिया गेट और कनॉट प्लेस जैसे इलाकों में पानी भर गया. मंत्री और सांसदों के घरों में भी तीन-तीन फीट पानी भर गया. प्रगति मैदान पर जो नई टनल बनी है उसमें इतना पानी भर गया कि उसे बंद करना पड़ा. दिल्ली के अलावा कई ऐसे शहर, जैसे चंडीगढ़, मोहाली, गुड़गांव में भी चारों तरफ पानी भर गया. लोगों का जीना मुश्किल हो गया. चंडीगढ़ में BMW और मर्सिडीज कारें पानी में तैरती दिखाई दी. उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी भारी बारिश मुसीबतों की बाढ़ लेकर आई. चिंता की बात ये है कि मौसम विभाग ने हिमाचल प्रदेश में अगले 48 घंटे में भारी बारिश का रेड एलर्ट जारी किया है. चम्बा, कुल्लू, शिमला, सिरमौर, सोलन और मंडी ज़िलों में तूफ़ानी बारिश और बाढ़ की चेतावनी दी गई है. हिमाचल प्रदेश की सभी नदियां लोगों के लिए मुसीबत बन गई हैं. ऐसा लग रहा है कि सतलुज, रावी और ब्यास अपने आसपास की हर चीज को बहाकर ले जाना चाहती हैं. ये हालात इसलिए पैदा हुए क्योंकि हिमाचल में पिछले दो दिनों में इतनी बारिश हो चुकी है, जितनी लोगों ने कभी नहीं देखी. सोलन ज़िले में तो बारिश ने पिछले 52 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. रविवार को सोलन ज़िले में 135 मिलीमीटर बारिश हुई थी. इससे पहले सोलन ज़िले में 1971 में एक दिन में 105 मिलीमीटर बारिश का रिकॉर्ड बना था. कुछ घंटों की रिकॉर्ड बारिश से सोलन ज़िले में ऐसा सैलाब आया कि बहुत सी सड़कें और पुल बह गए. पूरा पहाड़ कीचड़ की शक्ल में पूरे इलाके में आ गया और हर चीज तिनके की तरह बह गई. पानी के तेज़ बहाव में बड़ी-बड़ी गाड़ियां खिलौनों की तरह बहने लगीं. सवाल ये है कि पूरी दुनिया में और खास तौर पर हमारे देश में इतना पानी क्यों बरस रहा है, जो पिछले 40 साल में या कहीं 70 साल में कभी नहीं बरसा ? बारिश से इतनी तबाही क्यों हो रही है? इसके 2 मेन कारण हैं -पहला क्लाईमेट चेंज, यानी जलवायु परिवर्तन, और दूसरा- शहरों में अनियंत्रित निर्माण. पिछले 10 साल से वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं, रेड अलर्ट का सिग्नल दे रहे हैं कि सबको मिलकर ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने की कोशिश करनी चाहिए, पर कम लोग उनकी बात सुनते हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर गर्मी बढे़गी तो ज्यादा बारिश होगी, बाढ़ आएगी और तबाही होगी. वो समझाते हैं कि अगर एक परसेंट टेम्परेचर बढ़ता है तो समुद्र का 7 परसेंट ज्यादा पानी भाप बनकर निकलता है. बादल बनकर बरसता है, अगर समंदर पर तापमान 2-3 परसेंट बढ़ता है तो पानी 15-20 परसेंट ज्यादा भाप बन जाता है, और जब बादल बनेंगे तो कहीं न कहीं तो बरसेंगे ही. आजकल पहाड़ में इतनी ज्यादा बारिश इसलिए हो रही है क्योंकि वहां हर वक्त हवा चलती रहती है, ये हवा जब पहाड़ से टकराती है तो बादल बरसते हैं, कभी-कभी बादल फटते हैं, इसलिए हिमालय की तलहटी, वेस्टर्न घाट की तलहटी में आजकल इतनी जबरदस्त बारिश हो रही है. इसीलिए हिमाचल और उत्तराखंड में इतनी ज्यादा बाढ़ आई है. इसी तरह के हालात असम और पूर्वोत्तर राज्यों में भी हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खतरा और बढ़ेगा, आने वाले साल में बादल और बरसेंगे और बाढ़ आएगी, ये खतरा इसलिए है क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से कार्बन डाइ ऑक्साइड और मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ रहा है. आज इस वक्त का जो अनुमान है, उसके मुताबिक सन् 2050 तक दक्षिण एशिया में आज के मुकाबले 14 गुना ज्यादा गर्मी की लहर का सामना करना पड़ेगा. आप सोच सकते हैं कि अगर गर्मी 14 गुना ज्यादा बढ़ जाएगी, तो आज जितनी बाढ़ आ रही है, उससे ढाई से तीन गुना ज्यादा ज्यादा बाढ़ आएगी. आज जितने तूफान आते हैं, उससे चार से पांच गुना ज्यादा तूफानी हालात का सामना करना पड़ सकता है. खतरा बड़ा है, इससे बचाने का काम सिर्फ सरकारें नहीं कर सकती, हम सबको इस खतरे को समझना होगा और ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करने के लिए अपना योगदान करना होगा. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है. हम कितने पेड़ काटते हैं, कितने पेड़ लगाते हैं, हम कितना प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं, हम कितना पानी बर्बाद करते हैं, हम कॉन्क्रीट के कितने जंगल खड़े करते हैं, ये सारी बातें इस खतरे को बढ़ाती हैं. अगर इससे बचना है, तो सावधानी तो बरतनी पड़ेगी.

हिंसा : बंगाल की छवि के लिए ठीक नहीं

पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में हिंसा के बाद सोमवार को 697 पोलिंग बूथ्स पर दोबारा वोट डाले गए. मंगलवार को वोटों की गिनती शुरू हुई, और शुरुआती रुझानों के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस सबसे आगे हैं, और बीजेपी दूसरे स्थान पर है. चुनावों में अब तक 41 लोगों की मौत हो चुकी है. बीजेपी ने पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसा के लिए ममता बनर्जी की सरकार को जिम्मेदार ठहराया है, तृणमूल कांग्रेस पर खून खऱाबे का इल्जाम लगाया. बंगाल में विपक्ष के नेता शुभेन्दु अधिकारी ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर छह हजार पोलिंग बूथ्स पर रीपोल कराने की मांग की है. शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि बंगाल में जिस तरह के हालात हैं, उसके बाद केन्द्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 355 का इस्तेमाल कर राष्ट्रपति शासन लगाने की चेतावनी देनी चाहिए. बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने रविशंकर प्रसाद की अगुवाई में चार सदस्यों की तथ्यान्वेषी कमेटी को बंगाल भेजने का फैसला किया है. तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का दावा है कि बंगाल को बदनाम करने के लिए बीजेपी ही हिंसा करवाती है और उसके बाद शोर भी मचाती है. कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल के आई जी से कहा है कि वह सुरक्षा बलों की तैनाती के बारे में रिपोर्ट पेश करें. बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने हाई कोर्ट से आग्रह किया है कि मारे गये लोगों को मुआवज़ा दिया जाय और एक हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में हिंसा की घटनाओं की न्यायिक जांच करायी जाय. राज्यपाल सी वी आनन्द बोस ने सोमवार को गृह मंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की और बाद में घुमा फिरा कर केवल इतना कहा कि जब अंधेरा घना होता है तो समझो सुबह होने वाली है. ऐसा नहीं है कि पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसा में सिर्फ बीजेपी के कार्यकर्ताओं की मौत हुई. हिंसा के शिकार तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और लेफ्ट के कार्यकर्ता भी हुए हैं. इसलिए नाराजगी तो सभी पार्टियों में हैं. जांच की मांग सभी कर रहे हैं. ये बात तो सही है कि बंगाल के पंचायत चुनाव में हिंसा होगी, ये सब जानते थे. इसलिए इसे रोकने के कदम तो उठाए जाने चाहिए थे. सवाल ये भी है कि तमाम रिपोर्ट्स और पुराना रिकॉर्ड सामने होने के बाद भी सेन्ट्रल फोर्सेस की तैनाती वक्त रहते क्यों नहीं की गई? इसके लिए भी कोर्ट को दखल देना पड़ा. फिर जब तैनाती हुई तो उन इलाकों में ठीक से नहीं हुई, जिनमें हिंसा की आशंका ज्यादा थी. नतीजा ये हुआ कि कई सालों के बाद देश ने पोलिंग बूथ लुटते हुए देखे, लोग बूथ में मतपेटियां छीनकर मत पत्रों पर धड़ाधड़ अपनी पार्टी का ठप्पा लगाते हुए दिखे. इसीलिए राज्य चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. मुझे लगता है कि बंगाल में चुनाव चाहे पंचायत का हो, नगर निगम का हो, विधानसभा का हो, लोकसभा का हो, हर बार हिंसा की खबरें आती हैं, गोली चलती है, बम चलते हैं, हत्याएं होती है, ये न लोकतन्त्र के लिए अच्छा है, और न बंगाल की छवि के लिए. ममता बनर्जी को सोचना चाहिए कि वो वामपंथी शासन के खिलाफ लड़कर आईं. इसी तरह की हिंसा से बंगाल को मुक्त करने का वादा करके मुख्यमंत्री बनीं. कम से कम उन्हें बंगाल के लोगों से किए गए वादे को तो याद करना चाहिए

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NATURE’S FURY : HOW TO PREVENT

AKBThe onslaught of heavy rains, landslides and floods in northern India has taken a heavy toll of lives and properties with vast areas inundated both in the hills and plains. The worst-hit is Himachal Pradesh, where army and NDRF are engaged in rescue and relief work. Uttarakhand, Punjab, Haryana, Gujarat, UP, Delhi and Rajasthan are facing devastation with rivers like Beas, Sutlej, Ghaghar, Yamuna and Ganga in spate. Thousands of people living near Yamuna banks in Delhi have been moved as the river crossed the danger mark. Highways, vast areas of agricultural land, residential localities in cities have faced the wrath of nature’s fury caused by the combined might of the monsoon and western disturbance. The question is, why this sudden and heavy downpour, which has broken 40 to 70 year old records? I find two main reasons. One: climate change, and Two: unplanned urban development. Scientists have been warning since the last ten years, sending red signals, and appealing to countries to join hands to prevent global warming. Most of their appeals have fallen on deaf years, on the ground. Scientists had warned that too much global warming can also cause heavy rains and cloudbursts. They say, one per cent rise in global temperature can lead to at least seven per cent of our oceans released vapour into the atmosphere, resulting in heavy precipitation and rains. A two to three per cent rise in ocean temperature can lead to 15 to 20 per cent more water evaporation, resulting in huge clouds forming in the atmosphere. Naturally, these clouds will surely cause heavy downpour. The hills are the worse affected because there are strong winds blowing in hilly areas. When strong winds hit the hills, there are bound to be cloudbursts. The foothills of Himalayas and Western Ghat have been witnessing heavy rains in recent weeks. Himachal Pradesh and Uttarakhand are facing the brunt of cloudbursts, floods and landslides. A similar situation exists in Assam and other northeastern states. Scientists warn that this danger may increase in coming years leading to more cloudbursts, floods and landslides. The danger is due to rise in carbon dioxide and methane gas emission caused by climate change. Present estimates predict that South Asia, by 2050, will face heat wave 14 times more than it is occurring presently. Just imagine: If heat level increases 14 times, floods will occur at least two and a half to three times more. Cyclones in the near future will be four to five times stronger compared to the present cyclones. The danger is big and serious. Only governments cannot save us from this danger. We must all realize the danger and contribute our mite towards preventing global warming. There is no way out. Rampant deforestation is going on, we waste huge amounts of water, there is widespread use of plastic, and concrete jungles are being erected in cities and hilly areas to house people. All these developments point towards the bigger danger. If we want to save ourselves, we must exercise caution.

VIOLENCE : NOT GOOD FOR BENGAL’S IMAGE

As counting continued in West Bengal for panchayat elections on Tuesday, with ruling Trinamool Congress taking the lead, and BJP following at No. 2 position, questions have been raised by almost all opposition parties in the state over the manner in which the polls were conducted. BJP chief J P Nadda has sent his fact-finding committee, while state Congress chief Adhir Ranjan Chowdhury has knocked the doors of Calcutta High Court, which has directed the Border Security Force IG to file a ground report on force deployment on the day of polling when there was widespread violence. West Bengal governor C V Ananda Bose met Home Minister Amit Shah in Delhi and made a cryptic comment while quoting English poet Shelley, ‘the darkest hour is just before dawn’. A total of 41 people lost their lives in Bengal panchayat elections, with hundreds of BJP supporters fleeing the state and taking refuge in neighbouring Assam. It is not that only BJP supporters were killed in violence. Supporters of Trinamool Congress, Congress and Left parties were also killed. All the parties except TMC are demanding inquiry. Adhir Ranjan Chowdhury demanded compensation for those killed and a judicial inquiry into violence by a sitting judge of High Court. He alleged that the state government knew violence will take place, but no preventive steps were taken. Questions have been raised on why central paramilitary forces were not deployed at polling stations in time. After several years, TV viewers in India watched polling booths being plundered, ballot boxes being thrown into a pond, ballot papers being torn, and booth capturing taking place. The State Election Commission’s role is being questioned. I think, whether it is panchayat election, or urban local bodies or assembly or Lok Sabha elections, every time we get reports of murders, firing and bomb blasts from West Bengal. This is not good for democracy, nor is it good for West Bengal’s image. Mamata Banerjee must ponder. She came to power after fighting decades of Left Front rule. She became chief minister after promising the people to free them from the scourge of violence. At least, she must remember the promises that she made to the people of Bengal.

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