IS MODI PLANNING SOMETHING BIG FOR HIS THIRD TERM?
Prime Minister Narendra Modi addressed two election meetings in Uttarakhand and Rajasthan and had a video conference meeting with party workers of Bihar on Tuesday. At all his meetings, Modi promised to take strong action against those who are corrupt, howsoever big they may be. Modi launched a blistering attack on Congress leader Rahul Gandhi for his remark at Opposition’s Ramlila Maidan rally. He said, “The shahzada (prince) of Congress royal (shahi) family has given a call that if the country choose the BJP for the third time, the country will go up in flames. They have been out of power for ten years after ruling the nation for 70 years. They are now speaking about setting the country on fire. Will you allow the country to be set on fire? Is this language acceptable? Is this the language of democracy? Won’t you teach a befitting lesson to those who utter such words? This time, do ensure that not one of them can win.” Modi said, “this is the first election in which most of the corrupt politicians are uniting together to stop our action against corruption. Don’t you think the corrupt should go to jail? Those who are corrupt are threatening and abusing me, but they can’t stop me. Action will be taken against each of those who are corrupt… Our slogan is “Throw Out The Corrupt”, their slogan is “Save The Corrupt”. The people will have to decide.” The Prime Minister said, not many days are left for the third term of his government to begin. He promised to take speediest action against corruption, once the third term begins. Modi remarked that whatever achievements made during the 10 years of his rule was only a trailer. “The upcoming third term of our government will see historic and decisive measures to propel the nation forward. Much remains to be accomplished.” There is not an iota of doubt that Modi is going to take some big decisions once his third term begins in June this year, if all goes well. He has been regularly giving indications about this. At a business summit, he told industrialists that much of the work has been stalled due to elections, but once the new government is formed, big decisions will be taken. He said, work on these decisions has been going on for last several months and nearly 1.5 million people have been contacted to take their advice. The same indication was given by Narendra Modi in his address to the RBI on its 75th anniversary. Modi told the RBI officials that so long as the general elections are going on, they may have some rest, but once the third term begins, they will have a lot of work in hand.
जेल में केजरीवाल : क्या अब कमान सुनीता के पास ?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल शराब आबकारी मामले में 15 अप्रैल तक तिहाड़ जेल रहेंगे. सोमवार को उन्हें जेल भेजा गया. मंगलवार को दो घटनाएं हुई – मंत्री आतिशी ने आरोप लगाया कि उनके एक नज़दीकी के ज़रिए उन्हें ऑफर भिजवाया गया कि वो बीजेपी खेमे में आ जाएं, वरना एक महीने के अंदर उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा. आतिशी ने ये भी आरोप लगाया कि ईडी उन्हें, सौरभ भारद्वाज, राघव चड्ढा और दुर्गेश पाठक को एक महीने के अन्दर गिरफ्तार करने की योजना बना रही है. मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट से सांसद संजय सिंह के लिए राहत भरी खबर आई. कोर्ट ने संजय सिंह को ज़मानत पर छोड़ने का आदेश दिया. संजय सिंह पिछले छह महीने से तिहाड़ जेल में थे. 11 दिन तक ED की रिमांड में रहने के बाद केजरीवाल को 15 दिन के लिए तिहाड़ जेल भेजा जाना उतनी बड़ी बात नहीं थी, जितना कि ईडी का कोर्ट में ये खुलासा कि केजरीवाल ने पूछताछ के दौरान आतिशी और सौरभ भारद्वाज के नाम लिए हैं. ED ने कोर्ट को बताया कि पूछताछ के दौरान केजरीवाल ने ये कहा कि विजय नायर को वो थोड़ा बहुत जानते है लेकिन विजय नायर उन्हें रिपोर्ट नहीं करता था, विजय नायर तो असल में सौरभ भारद्वाज और आतिशी को रिपोर्ट करता था. ED के मुताबिक विजय नायर वो शख्स है जिसकी भूमिका शराब नीति की ड्राफ्टिंग से लेकर क्रियान्वयन तक थी. विजय नायर पर ही शराब नीति में रिश्वत के तौर पर मिले पैसे को आम आदमी पार्टी तक पहुंचाने का इल्जाम है. कोर्ट को ED ने बताया कि पूछताछ के दौरान केजरीवाल ने कहा कि विजय नायर से उनकी बहुत बात नहीं होती थी, उन्हें तो ये भी नहीं मालूम कि विजय नायर उनके कैंप ऑफिस से काम करता था. ED का दावा है कि केजरीवाल ने बताया कि विजय नायर तो सौरभ भारद्वाज और आतिशी को रिपोर्ट करता था. ED की तरफ़ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि केजरीवाल जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं. ED ने कहा कि अरविंद केजरीवाल के घर से जो डिजिटल डिवाइस ज़ब्त की गई थी, उनके पासवर्ड देने से केजरीवाल ने मना कर दिया है. वहीं, जब विजय नायर और दूसरे आरोपियों के पास से ज़ब्त सोशल मीडिया बातचीत केजरीवाल को दिखाए गए, तो उन्होंने कोई भी जानकारी नहीं होने की बात कही. सोमवार को कोर्ट में अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल भी मौजूद थीं. जब से अरविंद केजरीवाल गिरफ्तार हुए हैं, तब से सुनीता केजरीवाल बहुत सक्रिय हैं. वही आम आदमी पार्टी का चेहरा बन गई हैं. रविवार को मोदी विरोधी मोर्चे की रैली में सुनीता केजरीवाल शामिल हुई और मंच पर सोनिया गांधी के बगल में बैठीं. सोमवार को केजरीवाल की पेशी के बाद सुनीता केजरीवाल ने कहा कि 11 दिन की पूछताछ के बाद भी केजरीवाल को रिहा नहीं किया गया क्योंकि बीजेपी नहीं चाहती कि वो लोकसभा चुनाव तक बाहर आएं लेकिन देश की जनता इसका जवाब देगी. लेकिन सबसे ज्यादा अब चर्चा इस बात की है कि आखिर शराब घोटाले के केस में केजरीवाल ने सौरव भारद्वाज और आतिशी का नाम क्यों लिया? ED का दावा ये है कि शराब घोटाले से मिली रकम में से 45 करोड़ रुपए का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी ने गोवा के विधानसभा चुनाव में किया. गोवा में विधानसभा चुनाव के वक्त आतिशी, गोवा में आम आदमी पार्टी की प्रभारी थी. उस वक़्त उन्होंने इसी हैसियत से चुनाव आयोग को कई चिट्ठियां लिखी थी. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद एनडी गुप्ता ने भी पूछताछ में ED को बताया था कि गोवा के चुनाव में कितने पैसे खर्च हुए, कहां खर्च हुए, इसकी जानकारी सिर्फ़ गोवा की पार्टी प्रभारी आतिशी को थी. केजरीवाल का जेल जाना तय था, ये बात वो खुद जानते थे. इसीलिए उन्होंने ED के 9 समन्स की अनदेखी की. वो चाहते थे कि किसी तरह लोकसभा चुनाव तक गिरफ्तारी को टाला जाए लेकिन उनकी ये मंशा पूरी नहीं हो पाई. हैरानी की बात ये है कि केजरीवाल ने ED के सामने सौरव भारद्वाज और आतिशी सिंह का नाम क्यों लिया? केजरीवाल भी समझते हैं कि अब इन दोनों को समन भेजा जा सकता है, पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है, फिर चुनाव के वक्त दो सबसे सक्रिय नेताओं को इस मुसीबत में क्यों डाला? कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि केजरीवाल चाहते हैं कि इन दोनों को भी गिरफ्तार किया जाए. इसके बाद उनकी पार्टी के लोग कह सकेंगे कि मोदी सरकार उनकी पार्टी को चुनाव से दूर रखना चाहती है. केजरीवाल के जेल जाने के बाद सौरभ भारद्वाज और आतिशी सिंह ही केजरीवाल का बचाव कर रहे थे, रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे. सोमवार को भी दोनों कोर्ट में मौजूद थे. आम आदमी पार्टी में यही दोनों नेता ऐसे हैं, जो केजरीवाल के जेल जाने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी के दावेदार हो सकते थे. इसलिए कुछ ये लोग ये भी कह रहे हैं कि अगर इन दोनों का नाम भी शराब घोटाले में आ गया तो फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सुनीता केजरीवाल के अलावा और कोई नाम नहीं होगा. इसीलिए केजरीवाल ने पत्नी का रास्ता साफ करने के लिए ये दांव चला है. हालांकि कोर्ट में ED के खुलासे के बाद सौरभ भारद्वाज और आतिशी भी हैरान थे. दोनों ने न प्रेस कॉन्फ्रेंस की, न कोई बयान दिया, लेकिन शाम होते होते आतिशी ने ट्विटर पर ये लिखकर कि वो मंगलवार सुबह कोई बड़ा खुलासा करेंगी, सबको चौंका दिया. लेकिन जो लोग आम आदमी पार्टी को करीब से जानते हैं, उनका कहना है कि इस बात की उम्मीद किसी को नहीं करनी चाहिए कि आतिशी केजरीवाल के खिलाफ कुछ बोलेंगी. हालांकि हकीकत क्या है, केजरीवाल के मन में क्या है, ये उनके सिवा कोई और नहीं जानता.
KEJRIWAL IN JAIL : IS WIFE SUNITA IN COMMAND?
A day after Arvind Kejriwal was sent to Tihar jail till April 15, Delhi minister Atishi alleged on Tuesday that the BJP had approached her through someone very close offering her to join the party and “save her political career”. Atishi also alleged that she was cautioned that if she declined the offer, she could be arrested by Enforcement Directorate within one month. She alleged that ED has planned to arrest four AAP leaders, including herself, Saurabh Bhardwaj, Durgesh Pathak and Raghav Chadha in the liquor excise case.This allegation come on the heels of a purported revelation made by Kejriwal to ED during interrogation that liquor case accused Vijay Nair never reported to him and that he used to report to Atishi and Saurabh Bhardwaj. Meanwhile, AAP MP Sanjay Singh, who has been in jail since October last year, was granted bail on Tuesday by the Supreme Court after ED did not oppose his bail petition. On Tuesday, nearly 55 AAP MLAs from Delhi met Arvind Kejriwal’s wife Sunita and asserted that the Delhi chief minister should continue to run the government from jail and must not resign at any cost. The BJP has demanded that Kejriwal should resign because he should not run a government from jail. Sending Kejriwal to jail was a foregone conclusion and even the AAP supremo knew that. This was the reason why he continuously ignored nine summons sent by ED for questioning. Kejriwal had anticipated that his arrest could be postponed till the Lok Sabha elections were over, but his hopes were belied. To me, the surprising part is why Kejriwal named his two close confidantes Atishi and Saurabh Bhardwaj in the liquor excise case? Kejriwal knew these two ministers could be sent summons for questioning, if they were named. They why did he put both these active party leaders in difficulty and that too, on the eve of elections.? Some insiders say that Kejriwal wanted both these two leaders be arrested too, so that his partymen could go and tell the people that Modi government wants to keep his party away from elections. Both Atishi and Saurabh Bhardwaj were defending Kejriwal daily at press conferences and they were present in court on Monday. Both of them were leaders in AAP who could have become claimants for the CM’s chair, with Kejriwal in jail. Some people have started saying, if these two leaders were made accused in the liquor excise scam, there will be no strong contender left for the CM post except Sunita Kejriwal. They say, this was the reason why Kejriwal took the gambit in order to clear the path for his wife to become chief minister. Both Atishi and Saurabh Bhardwaj were shocked when ED told the court on Monday that Kejriwal had named both of them to whom accused Vijay Nair was reporting. People who know about the functioning of AAP from inside, say that nobody should expect Atishi to say anything against Kejriwal. This is what she did on Tuesday. It is only Kejriwal who can reveal what is going on in the inner layers of his mind.
मुख्तार अंसारी की मौत पर ज़्यादा आंसू बहाने की ज़रूरत नहीं
गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी के शव को गाजीपुर के कब्रिस्तान में शनिवार को सुपुर्द-ए-खाक किया गया. मुख्तार की मौत किन परिस्थितयों में हुई, इसकी जांच होनी चाहिए. मौत की असली वजह पता लगनी चाहिए. ये नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त है .और हमारे कानून में इसका प्रावधान है…इसलिए जांच हो रही है. लेकिन जांच के बहाने मुख्तार अंसारी के प्रति सहानुभूति जताना, वोटों की राजनीति करना ये ठीक नहीं हैं क्योंकि चाहे अखिलेश यादव हों, या मायावती, दोनों के राज में मुख्तार अंसारी को संरक्षण मिला और उसने नियम कानून की जरा भी परवाह नहीं की . वो तस्वीरें कौन भूल सकता है कि जब 2005 में मऊ में दंगे हुए और मुख्तार अंसारी खुली जीप में बैठकर हथियार लहराता हुआ पूरे शहर मे घूम रहा था? उस वक्त तो मुलायम सिंह की सरकार थी. जब 2007 में मुख्तार जेल में था, तो दर्जनों गाडियों के काफिले के साथ मूंछों पर ताव देता हुआ डीजीपी के दफ्तर में पहुंचता था. उस वक्त मायावती मुख्यमंत्री थी. तब किसी को न्याय की फिक्र क्यों नहीं हुई. ? आज कांग्रेस के नेता मुख्तार अंसारी की मौत पर बयानबाजी कर रहे हैं लेकिन आज जो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं अजय राय, 1991 में उनके भाई अवधेश राय की हत्या मुख्तार अंसारी ने की थी.. 32 साल तक न्याय नहीं मिला., तब किसी ने आवाज क्यों नहीं उठाई?. इस केस में 32 साल के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार के वक्त पिछले साल मुख्तार अंसारी को उम्रकैद की सजा हुई. उसी केस में वो सजा काट रहा था. 2005 में मुख्तार जेल में था और उसके गुंडों ने एक- 47 से धुंधाधार फायरिंग कर के बीजेपी के विधायक कृष्णांनंद राय समेत सात लोगों की हत्या की. इस केस का एक मात्र गवाह बचा था, शशिकांत राय उसकी भी 2006 में हत्या करवा दी. ठेकेदार मन्ना सिंह हत्या करवाई. फिर इस केस में गवाह राम सिंह मौर्य की हत्या करवा दी. 1988 में दो पुलिस वालों पर फायरिंग करके हिरासत से भागा.. एएसपी पर जानलेवा हमला किया.जिस पुलिस अफसर ने मुख्तार अंसारी के गुंडों के कब्जे से ऑटोमैटिक राइफल जब्त की. उसने मुख्तार के खिलाफ पोटा कानून लगाया लेकिन मुख्तार का कुछ नहीं हुआ. उल्टे पुलिस अफसर को नौकरी छोड़नी पड़ी. मुख्तार जेल से बैठ कर मर्डर करवाता था. जेल में उसका राज चलता था. उसके लिए बैडमिन्टन कोर्ट और तमाम तरह की सुविधाएं थी. उसके खिलाफ 37 साल में हत्या, अपहरण, जमीनों पर कब्जे., वसूली के 66 मुकदमे दर्ज हुए. लेकिन किसी भी मामले में सजा नहीं हुई. जब योगी आदित्यनाथ की सरकार आई. तो एक मामले में पंजाब पुलिस उसे ले गई. और कांग्रेस की सरकार ने मुख़्तार को यूपी सरकार को सौंपने से इंकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट तक केस लडना पड़ा. उसके बाद उसे बांदा जेल लाया गया लेकिन बांदा जेल में भी उसने अपना कारोबार शुरू कर दिया. तब पुलिस वालों पर भी एक्शन हुआ. पिछले पांच साल में मुख्तार अंसारी को तीस तीस साल पुराने 8 मामलों में सजा हुई है. न्याय का सिलसिला शुरू हुआ था. उसे मालूम था कि वो जेल से छूटने वाला नहीं है और जेल में मिलने वाली सुविधाएं बंद हो गई हैं. इसीलिए परेशान, .बीमार था. 63 साल का था, शुगर का मरीज था…हार्ट की समस्या थी. इसलिए उसकी मौत चौंकाने वाली नहीं हैं. मुझे नहीं लगता कि इस तरह के हार्डकोर क्रिमिनल की मौत पर ज्यादा आंसू बहाने की जरूरत है. .लेकिन फिर भी जो लोग उसकी मौत की असली वजह जानना चाहते हैं. उन्हें इस मसले पर सियासत करने की बजाए ज्यूडिशियल मजिस्ट्रैट की जांच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए.
MUKHTAR ANSARI : NO TEARS FOR THE DEATH OF A HARDCORE CRIMINAL
Gangster-turned-politician Mukhtar Ansari was laid to rest in Ghazipur, UP, today in the presence of several thousand mourners. A huge contingent of police and armed forces was present to ensure that the funeral took place peacefully. There has been demands from several political parties for a top-level inquiry into the circumstances in which he suffered cardiac arrest in Banda jail and later died. The death must be probed and the real reason for his death must be made public. This will be in accoradance with the principles of natural justice and there are provisions in our law for this. Allegations have been made by Mukhtar’s family members that he was served food laced with slow poison in jail. But it will be unjustified to politicize the issue. As a gangster-turned-politician, Mukhtar Ansari got full protection during the regimes of Akhilesh Yadav and Mayawati. He never followed rules and regulations. Who can forget that famous picture in which Mukhtar Ansari, in a jeep, holding a revolver and moving around the town after the 2005Mau riots. At that time, Mulayam Singh’s government was in power. In 2007, when Mukhtar was supposed to be in jail, he used to reach the office of DGP in a convoy of dozens of vehicles, twirling his moustache. At that time, Mayawati was the chief minister. Why didn’t anybody express apprehensions about the carriage of justice? Congress leaders are making remarks today on Mukhtar’s death, but it was Awadhesh Rai, the brother of current UP Congress chief Ajay Rai, who was brutally murdered in 1991 by Mukhtar Ansari’s henchmen. For 32 years, his family did not get justice. Why was no voice raised at that time? 32 years after the murder was committed, Mukhtar was sentenced to life imprisonment last year during Yogi Adityanath’s rule. In 2005, Mukhtar was in jail, and his henchmen murdered BJP MLA Krishnanand Rai and sic others showering bullets from AK-47 rifles. The lone witness to this mayhem, Shashikant Rai was also murdered in 2006. In contractor Manna Singh’s murder, the witness Ram Singh Maurya was also murdered. In 1988, he fled from police custody after firing on two policemen. The police officer who snatched an automatic rifles from Mukhtar’s men slapped POTA (Prevention of Terrorism Act) against him, but nothing happened to the gangster. Instead, the police officer had to leave his job. Mukhtar used to order murders while sitting inside jails. He had facilities like badminton court in one jail. There were 66 cases of murders, kidnapping, land grab and extortion against him, during the last 37 years. When Yogi Adityanath came to power, Punjab Police came and took Mukhtar away, but the Congress govt in Punjab refused to hand him over to UP police. UP government had to approach the Supreme Court, and ultimately he was brought to Banda jail, where he again resumed his criminal acts of ordering extortion and murder. UP police took action, and in the last five years, Mukhtar was convicted in eight cases which were nearly 30 years old. The process of justice had only begun. Mukhtar knew he would never be released from jail and the facilities that he hitherto enjoyed in jail, were withdrawn. He was worried, ill at the age of 63, he was suffering from sugar and heart problems. Hence, his death was not shocking. I don’t think there is any need to shed tear on the death of a hardcore criminal. For those who want to know the real cause of his death, they should wait for the judicial magistrate’s inquest report, instead of indulging in political mudslinging.
मुख्तार अंसारी : अपराधों से भरी एक ज़िंदगी का अंत
अपराध की दुनिया से राजनीति में आने वाले पूर्वांचल के मुख्तार अंसारी की गुरुवार रात को दिल का दौरा पड़ने से न्यायिक हिरासत में मौत हो गई. शुक्रवार को तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी-अपनी सोच के मुताबिक प्रतिक्रियाएं व्यक्त की. मुख्तार अंसारी के बेटे ने आरोप लगाया कि जेल में उनके पिता को धीमी ज़हर देकर हत्या की गई. बहरहाल राज्य सरकार ने अपर जिला मजिस्ट्रेट से कहा है कि वह बंदी मुख्तार अंसारी की मौत की परिस्थितियों की पूरी तरह जांच करके अपनी रिपोर्ट दें. मुख्तार अंसारी बांदा जेल के शौचालय में गुरुवार को बेहोश पड़े पाए गए थे, जिसके बाद उन्हें बांदा मेडिकल कालेज के सी.सी.यू में भर्ती कराया गया, जहां उन्होने आखिरी सांस ली. मुख्तार अंसारी की मौत के साथ ही उनके आपराधिक जीवन पर पूर्णविराम लग गया है. अपनी जवानी के दिनों में मुख्तार अंसारी क्रॉसकंट्री दौड़ में पारंगत था, लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक में उसने अपराध की दुनिया में कदम रखा और एक गिरोह में शामिल हो गया, जो कोयला, रेलवे निर्माण, कबाड़ की बिक्री, लोक निर्माण और शराब के ठेकों को हथियाने के लिए बाहुबल का इस्तेमाल किया करता था. इसके बाद मुख्तार का गिरोह लोगों से गुंडा टैक्स, वसूली कारोबार और फिरौती के लिए अपहरण जैसे अपराधों को अंजाम देने लगा. गाज़ीपुर, मऊ, वाराणसी और जौनपुर में व्यापारी और अन्य कारोबारी इस गिरोह के नाम से थर-थर कांपते थे. मुख्तार 2005 से जेल में कैद था और उस पर 65 से ज्यादा मामले लंबित थे. इसमें से 25 मामले तो तब बने, जब वो जेल में कैदी था. आठ मामलों में यूपी की कई अदालतों ने उसे सज़ा सुना दी थी. नवम्बर, 2005 में जब मुख्तार और उसके गिरोह के लोगों ने गाज़ीपुर में बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय और 6 अन्य लोगों की दिनदहाड़े हत्या कर दी, तो मुख्तार का नाम राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आया. पिछले साल एक सांसद-विधायक कोर्ट ने मुख्तार को कृष्णानंद राच की हत्या के आरोप में 10 साल कैद की सजा सुनाई थी. इस साल मार्च में एक नकली हथियार लाइसेंस के मामले में कोर्ट ने मुख्तार को उम्र कैद की सजा सुना दी. पिछले साल वाराणसी के एक कोर्ट ने कारोबारी अवधेश ऱाय की 1991 में हुई हत्या के आरोप में उम्र कैद की सज़ा सुनाई. अवधेश राय उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के बड़े भाई हैं. अजय राय इस बार वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने वाले हैं. 1997 में कोयला कारोबारी नंदकिशोर रुंगटा के अपहरण और हत्या के मामले में भी मुख्तार आरोपी था. उसे 2019 में यूपी के बांदा से पंजाब की रोपड़ जेल भेजा गया क्योंकि बांदा जेल से किसी ने मोहाली के एक बिल्डर को फोन करके 10 करोड़ रु. की वसूली मांगी थी. मुख्तार दो साल रोपड़ जेल में रहा. 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि मुख्तार को यूपी वापिस भेजा जाय. तब मुख्तार को बांदा जेल लाया गया. मुख्तार अंसारी 5 बार विधायक चुने गये, दो बार निर्दलीय के रूप में, दो बार बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में, और पांचवी बार अपनी पार्टी कौमी एकता दल के टिकट पर. मुख्तार अंसारी और उनके दो भाई अफज़ल और सिबगतुल्लाह का पूर्वांचल के वोटरों में काफी रसूख है, लेकिन मुख्तार की मौत के साथ ही जरायम की दुनिया में सक्रिय एक जीवन पर पूर्णविराम लग गया है.
MUKHTAR ANSARI : CURTAIN FALLS ON A LIFE FULL OF CRIMES
The death of gangster-turned-politician Mukhtar Ansari, while in judicial custody, due to cardiac arrest in Banda Medical College of Uttar Pradesh on Thursday night has led to political reactions across the spectrum. His son has alleged that the former gangster, convicted to life imprisonment in two cases, died due to slow poisoning but this allegation has been denied by the district administration. An additional chief judicial magistrate will conduct an inquiry into the circumstances leading to his death and submit the report within a month. Mukhtar Ansari was found unconscious inside the jail toilet in Banda, he was rushed to the medical college hospital’s CCU, where he took his last breath. With his death, a curtain has fallen on eastern UP’s most dreaded gangster, who had struck terror among the people for several decades. A cross country runner in his youthful days, Mukhtar Ansari took to crime in Ghazipur, after joining a gang that grabbed government contracts during the Seventies and Eighties. His gang was active in grabbing contracts for coal mining, railway construction, scrap disposal, public works and liquor business and it later branched out into collecting ‘goonda tax’, extortion rackets and kidnapping for ransom. Mukhtar Ansari’s gang was infamous for its criminal activities in Ghazipur, Mau, Varanasi and Jaunpur. In jail since 2005, Mukhtar Ansari had more than 65 criminal cases against him, out of which 25 cases were filed when he was in prison. He was convicted in eight cases by different courts of UP. He came into the national limelight when he and his gang members killed BJP MLA Krishnanand Rai and six others in Ghazipur in November, 2005. In April last year, Mukhtar Ansari was sentenced to 10 years’ imprisonment for killing Krishnanand Rai by an MP MLA court. This year in March, he was handed a life sentence in connection with a fake arms licence case.
Last year, a Varanasi court sentenced Mukhtar Ansari to life imprisonment for murder of a businessman-cum-politician Awadhesh Rai in 1991. Awadhesh Rai is the elder brother of UP state Congress chief Ajay Rai, who will contest Varanasi Lok Sabha election this year against Prime Minister Narendra Modi. Mukhtar Ansari was also an accused in the kidnapping and murder of coal tycoon Nand Kishore Rungta in Varanasi in 1997. He was shifted to Punjab’s Ropar jail from Banda in 2019, after an extortion call was made to a Mohali-based property dealer for Rs 10 crore from Banda jail. Mukhtar remained in Ropar jail for two years till 2021, when UP government moved Supreme Court seeking to bring him back to UP jail. Mukhtar Ansari was elected MLA in UP five times, twice as an independent, twice as BSP candidate, and the fifth time as his Quami Ekta Dal candidate. Mukhtar Ansari and his two brothers wielded tremendous clout in Poorvanchal region of UP, and with his death, a final curtain has been drawn on his eventful life.
सीटों को लेकर विरोधी दलों में कन्फ्यूज़न
बुधवार 27 मार्च लोक सभा चुनाव के पहले चरण के नामांकन दाखिल करने का आखिरी दिन था, लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में विरोधी दलों के बीच सीटों और उम्मीदवारी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. पहले चरण में यूपी की आठ सीटों पर वोटिंग होनी है. इनमें से रामपुर और मुरादाबाद की दो सीटों पर ज़बरदस्त सिय़ासी ड्रामा हुआ. अखिलेश यादव ने मुरादाबाद सीट पर अखिरी वक्त में उम्मीदवार बदल दिया. सांसद एस टी हसन ने मंगलवार को नामांकन दाखिल किया था, लेकिन बुधवार को अखिलेश यादव ने रूचि वीरा को पार्टी का चुनाव निशान देकर मुरादाबाद भेज दिया. उन्होंने भी नामांकन भर दिया. अब समाजवादी पार्टी के निशान पर दो दावेदार हो गए. हालांकि शाम को समाजवादी पार्टी ने साफ कर दिया कि रूचि वीरा ही अधिकृत उम्मीदवार होंगी. इसी तरह रामपुर में पहले आसिम रज़ा के चुनाव लड़ने की उम्मीद थी, वो तैयारी कर रहे थे, लेकिन बुधवार को आसिम रज़ा और रामपुर में समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष ने लोकसभा चुनाव के बाईकॉट करने का एलान तक कर दिया था. बुधवार को आखिरी वक्त में जैसे ही समाजवादी पार्टी ने मौलाना मोहिबुल्ला नदवी को नामांकन दाखिल करने के लिए भेजा तो आसिम रज़ा ने भी पर्चा भर दिया. अब रामपुर में भी समाजवादी पार्टी के दो उम्मीदवार मैदान में हैं. रामपुर और मुरादाबाद दोनों सीटों पर पहले चरण में 19 अप्रैल को वोटिंग होनी है. समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता कन्फ्यूज़्ड हैं. सवाल है कि ये कन्फ्यूजन किसने पैदा किया? क्या इस में जेल में बंद आजम खां का रोल है? क्या आजम खां के इशारे पर ये संकट पैदा हुआ? पहले मुरादाबाद की बात करते हैं. ढोल नगाड़ों के साथ एस टी हसन ने मंगलवार को पर्चा भरा था, जीत के दावे किए थे. चूंकि एस टी हसन मुरादाबाद से सांसद हैं, लेकिन इसके बाद भी अखिलेश यादव ने उनका टिकट लटकाए रखा, देर से टिकट दिया. एस टी हसन ने पर्चा भर दिया लेकिन रात में खेल हो गया. देर रात ये खबर आई कि मुरादाबाद से एस टी हसन का टिकट कट गया है. अब पूर्व विधायक रूचि वीरा समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ेंगी. इस बीच रुचि वीरा लखनऊ से मुरादाबाद पहुंच गईं लेकिन रुचि के मुरादाबाद पहुंचते ही एस टी हसन के समर्थकों ने उनके खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. इसके बाद अखिलेश यादव ने चार्टर्ड प्लेन से नरेश उत्तम और समाजवादी पार्टी के दूसरे नेताओं को मुरादाबाद भेजा ताकि हालात को काबू में रख सकें. रूचि वीरा मुरादाबाद में पर्चा भरने पहुंच गई, उनके साथ गिने चुने लोग थे, नारा लगाने वाले और पार्टी का झंड़ा उठाने वाले लोग भी नहीं थे. रूचि वीरा ने वक्त खत्म होने से पहले पर्चा भर दिया, समाजवादी पार्टी के चुनाव निशान वाला फॉर्म बी जमा कराया. पता ये चला कि एस टी हसन का पत्ता आजम खां के कहने पर कटा है. आजम खां सीतापुर जेल में बंद हैं लेकिन अखिलेश यादव को लगता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं पर अभी भी आजम खां का जबरदस्त असर है. आजम खां जेल में रहकर भी चुनावी समीकरण बना और बिगाड़ सकते हैं. इसीलिए अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों पर टिकटों के बंटवारे पर राय लेने के लिए सीतापुर जेल में आजम खां से मिले थे. आजम खां ने ही मुरादाबाद सीट पर एस टी हसन की जगह रूचि वीरा के नाम का सुझाव दिया जिसे अखिलेश ने मान लिया और रातों रात हसन का टिकट काट दिया. समाजवादी पार्टी के ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता जानते हैं कि रूचि वीरा आजम खां की करीबी हैं, रुचि वीरा बिजनौर से सपा के टिकट पर विधायक रह चुकी हैं. ये तो कोई नहीं मानेगा कि रूचि वीरा एस टी हसन के मुकाबले बड़ी नेता हैं, उन्हें आजम खां की पैरवी पर ही अखिलेश यादव ने टिकट दिया. बाद में हसन ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम ये फैसला कैसे हुआ, किसके कहने पर हुआ और उन्हें बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई. हसन ने बड़ी महीन सियासी बात कही. उन्होंने कहा कि पूरा हिन्दुस्तान जानता है आजादी के बाद से अब तक जितने चुनाव हुए, उनमें एक बार छोड़कर मुरादाबाद से हर बार मुसलमान उम्मीदवार ही ही चुनाव जीता है. रामपुर में दिल्ली के संसद मार्ग मस्जिद के इमाम मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी और आसिम रज़ा दोनों सपा की उम्मीदवारी का दावा कर रहे हैं. मौलाना को मंगलवार रात लखनऊ से आदेश मिला कि रामपुर पहुंचिए, रामपुर से पर्चा भरना है. मौलाना नदवी रामपुर के रहने वाले हैं लेकिन दिल्ली में पिछले 15 साल से रह रहे हैं. बुधवार को मौलाना ने पर्चा भर दिया. मौलाना नदवी ने कहा कि उनका नाम खुद अखिलेश यादव ने फाइनल किया है, उन्हीं के कहने पर उन्होंने अपना पर्चा भरा है. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार वही हैं. इसके तुरंत बाद आजम खां के करीबी आसिम रज़ा भी पर्चा भरने पहुंच गए. उन्होंने भी पर्चा दाखिल कर दिया. अब फैसला तीस मार्च को पर्चा वापिस लेने के अंतिम दिन होगा कि कौन सपा का असली उम्मीदवार है. इस बात में कोई शक नहीं कि रामपुर पर एक लंबे अर्से तक आजम खान का कब्जा रहा है, वो रामपुर के चप्पे-चप्पे को जानते हैं..यहां के बच्चे-बच्चे को पहचानते हैं लेकिन अब मजबूर हैं. जेल में बंद हैं..उन पर सैंकड़ों केस हैं. योगी आदित्यनाथ ने रामपुर में उनका दबदबा खत्म कर दिया.रामपुर में आज़म खान के उम्मीदवारों को हरा दिया पर आज़म खान आसानी से हार मानने वालों में नहीं हैं. वो जेल में रहकर भी इस इलाके की सियासत पर खासा असर डाल सकते हैं. उनका ये सुझाव कि रामपुर से अखिलेश को लड़ना चाहिए, अच्छा था लेकिन अखिलेश इन चुनावों में एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. अखिलेश के लिए ये चुनाव अस्तित्व का सवाल है. हालांकि वो आज़म खान की बात सुनते हैं लेकिन रामपुर से चुनाव लड़ने की बात नहीं मानी, इसीलिए इतना कन्फ्यूजन पैदा हुआ. दूसरी तरफ बीजेपी ने जबरदस्त चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मेरठ, मथुरा, गाजियबाद में प्रचार कर रहे हैं. 30 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेरठ से बीजेपी के चुनाव प्रचार का प्रारम्भ करेंगे.
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में भी मोदी-विरोधी मोर्चा बिखरता हुआ दिखाई दे रहा है. बुधवार को महाविकास अघाड़ी को पहला झटका प्रकाश आंबेडकर ने दिया. उन्होंने अलग चुनाव लड़ने का एलान कर दिया और 8 सीटों पर वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी. इसके बाद दूसरा झटका राजू शेट्टी ने दिया और कहा कि उनका स्वाभिमानी शेतकारी संगठन महाविकास अघाड़ी का हिस्सा नहीं बनेगा. वो भी अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगे. इसके बाद सबसे जोर का झटका उद्धव ठाकरे ने दिया. उद्धव ने 17 सीटों पर अपनी पार्टी उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी. इस लिस्ट में कई ऐसी सीटें हैं जिन पर शरद पवार की पार्टी और कांग्रेस भी दावा कर रही हैं. अभी तीनों पार्टियों में बात चल रही है लेकिन उद्धव ने फैसले होने का इंतजार नहीं किया, बिना किसी से बात किए अपने उम्मीदवारों के नाम जारी कर दिए. जिन सीटों पर उद्ध ने उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें सांगली, नॉर्थ वेस्ट मुंबई और साउथ सेंट्रल मुंबई की सीट भी है. सांगली सीट से कांग्रेस वसंतदादा पाटिल के पोते विशाल पाटिल को उतारना चाहती थी लेकिन उद्धव के गुट ने चंद्रहार पाटिल का नाम घोषित कर दिया. साउथ सेंट्रल मुंबई सीट से कांग्रेस वर्षा गायकवाड़ को लड़ाना चाहती थी लेकिन उद्धव ने अनिल देसाई को टिकट दे दिया. मुंबई नॉर्थ वेस्ट सीट से कांग्रेस के संजय निरूपम दावेदारी कर रहे थे लेकिन उद्धव ने यहां अमोल कीर्तिकर को टिकट दे दिया. लिस्ट जारी करने के बाद संजय राउत ने कहा कि कांग्रेस भी अपने दस उम्मीदवारों के नाम जारी कर चुकी थीस ऐसे में अगर उद्धव टाकरे ने अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी, तो कौन-सा गुनाह कर दिया? जैसे ही उद्धव की पार्टी की लिस्ट जारी हुई, सबसे पहले कांग्रेस के नेताओं ने ही नाराजगी जाहिर की. बाला साहब थोरात ने कहा कि जब बातचीत चल रही है, कोई फॉर्मूला नहीं निकला है, कुछ सीटों पर बात अटकी है, तो ऐसे में एकतरफा उम्मीदवारों का एलान ठीक नहीं हैं. बाला साहब थोरात ने कहा कि सांगली और मुंबई की सीटों पर उम्मीदवार का एलान करने से पहले उद्धव की पार्टी को कम से कम कांग्रेस के नेताओं को बताना तो चाहिए था. थोरात ने कहा कि इन सीटों पर कांग्रेस ने अपना दावा छोड़ा नहीं था, फिर बिना बताए उम्मीदवारों का एलान करना ठीक नहीं है, ये गठबंधन धर्म के खिलाफ है, उद्धव को अपने फैसले पर फिर से विचार करना चाहिए. उद्धव की पार्टी के सांसद अरविन्द सावंत से संजय निरूपम के बयान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कौन संजय निरूपम? फिर प्रियंका चतुर्वेदी ने भी यही कहा कि संजय निरूपम हैं क्या? उनके पास कांग्रेस में कौन सा पद है? वो किस हैसियत से बोल रहे हैं? उनकी बातों का कोई मतलब नहीं हैं. प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि संजय निरूपम की भाषा बता रही है कि वो बीजेपी में जाने की तैयारी कर चुके हैं. बड़ी बात ये है कि अब तक उद्धव ठाकरे और कांग्रेस का झगड़ा सुलझाने की कोशिश कर रहे शरद पवार भी उद्धव के कदम से नाराज हैं क्योंकि उद्धव ने उन सीटों पर भी उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया जिन पर शरद पवार की पार्टी दावा कर रही थी. मुंबई नॉर्थ ईस्ट पर शरद पवार की दावेदारी थी लेकिन उद्धव ने संजय दीना पाटिल को टिकट दे दिया. इसके विरोध में शरद पवार की एनसीपी के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन शुरू कर दिया. पवार ने कहा कि शिवसेना को गठबंधन धर्म का पालन करना चाहिए था, बिना बातचीत एकतरफा एलान करने से बचना चाहिए था, अच्छा होता तीनों पार्टियां एक साथ मिलकर उम्मीदवारों की घोषणा करते. महाविकास अघाड़ी के अलायंस में बयानबाजी कमाल की है. उद्धव ठाकरे ने सीटों का एकतरफा एलान कर दिया. सहयोगी दल हैरान हैं पर संजय राउत कह रहे हैं कि जो हुआ, सबकी रज़ामंदी से हुआ. कांग्रेस की तरफ से संजय निरूपम ने सीटों के एलान पर नाराज़गी जताई तो शिवसेना के लोग कह रहे हैं कि संजय निरूपम होते कौन हैं? कांग्रेस मुंबई की सीटों की घोषणा को जल्दबाजी बता रही है तो संजय राउत कह रहे हैं कि अब हम नॉर्थ मुंबई सीट के उम्मीदवार का भी एलान कर देंगे. शरद पवार परेशान हैं कि उद्धव सेना ने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया लेकिन अनिल देसाई कह रहे हैं हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं. मलतब साफ है – इस गठबंधन के नेता करते कुछ और हैं और कहते कुछ और हैं.
बिहार
मोदी-विरोधी मोर्चे का जो हाल महाराष्ट्र में है, वही बिहार में दिख रहा है. यहां भी सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय नहीं हुआ है लेकिन तेजस्वी यादव ने अपने उम्मीदवारों को टिकट बांटना शुरू कर दिया है. पांच दिन पहले जेडी-यू छोड कर आरजेडी में शामिल बीमा भारती ने कहा कि लालू यादव ने उन्हें पूर्णिया से चुनाव लड़ने को कहा है. पूर्णिया सीट पर पप्पू यादव दावा कर रहे हैं. पूर्णिया से चुनाव लड़ने के चक्कर में उन्होंने अपनी पार्टी को कांग्रेस में विलय तक करा दिया लेकिन RJD ने बीमा भारती को मैदान में उतारने का इकतरफा फैसला कर लिया. गुरुवार को पप्पू यादव ने कहा कि मैं आत्महत्या तक कर लूंगा लेकिन पूर्णिया छोड़ कर कही से नहीं लडूंगा. पप्पू यादव ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर अंतिम फैला छोड़ दिया. पूर्णिया सीट को पप्पू यादव ने प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है. लेकिन RJD और कांग्रेस के बीच कई और सीटों पर भी टकराव है. दरअसल RJD शुरू में कांग्रेस को बिहार में केवल 6 सीटें देना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस ने पहले 15 सीटें मांगीं और बाद में कहा कि कम से कम 9 सीटें तो चाहिए ही. दिल्ली में मंगलवार को तेजस्वी यादव कांग्रेस के नेताओं से मिले थे कांग्रेस को कुल 8 सीटें – भागलपुर, मुज़फ़्फ़रपुर, बेतिया, सासाराम, किशनगंज, कटिहार, पटना साहिब और समस्तीपुर दोने को तौयार हो गए. लेकिन कांग्रेस पूर्णिया, औरंगाबाद और बेगूसराय पर भी दावा कर रही है. मुश्किल ये है कि इनमें से बेगूसराय सीट RJD ने पहले ही सीपीआई को दे दी है. बेगूसराय से कांग्रेस कन्हैया कुमार को उतारना चाहती थी. कन्हैया कुमार पिछले चुनाव में बेगूसराय से CPI के टिकट पर लड़े थे, हारे थे, फिर कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन अब CPI कन्हैया कुमार के लिए ये सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं. इसी तरह औरंगाबाद सीट पर भी RJD ने अभय कुशवाहा को अपना चुनाव निशान दे दिया है, जबकि कांग्रेस की दावेदारी इस सीट पर भी है. इसीलिए झगड़ा बढ़ रहा है और अब आसानी से सुलझेगा, इसकी उम्मीद कम है.
CONFUSION IN OPPOSITION OVER SEAT SHARING
The opposition parties seem to be in a state of confusion over seat sharing and fielding of candidates in key states like UP, Maharashtra and Bihar. On the last day of filing of nominations for the first phase of Lok Sabha elections, there was confusion in two key constituencies of Uttar Pradesh – Rampur and Moradabad , with rumblings in Samajwadi Party coming to the fore. Party chief Akhilesh Yadav changed the candidates in both the constituencies at the last minute, replacing sitting MP S. T. Hasan with Ruchi Vira in Moradabad, and fielding Maulana Mohibullah Nadvi in place of Asim Raza. There are now two candidates each from Samajwadi Party in both constituencies, and voting will take place on April 19. The rank and file of Samajwadi Party is confused. Senior party leader Azam Khan is presently in Sitapur jail. At least two candidates will have to withdraw their nominations by March 30 to allow the official SP candidate to contest on party symbol. Nadvi is the Imam of Delhi’s Parliament Street Jama Masjid. Though he hails from Rampur, he has been based in Delhi for the last 15 years. Ruchi Vira has already submitted the party’s symbol authorisation to the returning officer. S T Hasan was probably replaced at the instance of Azam Khan. Akhilesh Yadav had recently met Azam Khan in jail, and the latter had opposed Hasan’s candidature. Akhilesh feels that Azam Khan, despite remaining in jail, can change the voting equations in both these constituencies. Rampur is Azam Khan’s home constituency. Azam Khan had suggested that Akhilesh should either contest himself from Rampur or field anybody from Yadav community. Instead, Akhilesh fielded Maulana Nadvi. On Wednesday, soon after the maulana filed his nomination, Asim Raza too filed his papers. Asim Raza is Azam Khan’s confidante. When Azam Khan vacated his Rampur seat in 2022, Asim Raza contested the byelection, but he lost to BJP’s Ghanshyam Lodhi by 42,000 votes. This time BJP has again fielded Ghanshyam Singh Lodhi, while BSP has fielded Zeeshan Khan. On March 30, the last date of withdrawal of nominations, the official SP candidate will be known. Rampur has been Azam Khan’s stronghold since 2002. He knows each locality like the back of his hand, but presently he is in jail, serving a two-year imprisonment. UP chief minister Yogi Adityanath cut him to size in Rampur assembly and LS byelection, and for the first time, in 2022, Azam Khan’s candidates lost. Azam Khan is a born fighter. He has several hundred cases against him and he is not going to admit defeat easily. He can still influence politics in Rampur and Moradabad despite staying behind bars. His advice to Akhilesh to contest from Rampur was a good one, but the Samajwadi Party supremo is careful this time. The Lok Sabha general elections will be a testing time for Akhilesh and for the existence of his party. Akhilesh does listen to Azam Khan’s advice, but the confusion was created when he did not accept his advice to contest from Rampur. Already, Yogi Adityanath has started campaigning in western UP. He will be visiting 15 districts to meet party workers and social influencers. In Meerut, he welcomed Ramayana serial actor Arun Govil, who is contesting on BJP ticket. Prime Minister Narendra Modi will launch the Lok Sabha poll campaign from Meerut on March 30.
MAHARASHTRA
There was anger and consternation in the Congress camp in Maharashtra on Wednesday when Shiv Sena (UBT) declared its list of 17 candidates even before the seat sharing formula among Maha Vikas Aghadi allies was finalized. The anti-Modi alliance in Maharashtra has thus split wide open, with Prakash Ambedkar’s Vanchit Bahujan Aghadi and Raju Shetty’s Swabhimani Shetkari Sangathana deciding to contest elections separately. The 17 seats included Sangli, from where Congress wanted to field Late Vasantdada Patil’s grandson Vishal Patil, Mumbai South Central, where Congress wanted to field Varsha Gaekwad, but Shiv Sena (UBT) announced Anil Desai’s name, and Mumbai North West coveted by Sanjay Nirupam of Congress, but Uddhav decided to field Amol Kirtikar. Shiv Sena leader Sanjay Raut said, since Congress has already announced names of 10 candidates, there was nothing wrong in Shiv Sena doing the same thing. He said, Uddhav Thackeray has left Ramtek and Kolhapur seats for Congress, and the formula is now final. Congress leader Balasaheb Thorat said, this was against “coalition dharma” since no formula has been agreed upon and Uddhav should reconsider his decision. Sanjay Nirupam alleged that Uddhav Thackeray is trying to “finish off” the Congress and the voters of Mumbai “ will teach Uddhav a lesson this time” . NCP chief Sharad Pawar is unhappy with Uddhav announcing the names of his candidates. NCP workers shouted slogans on Wednesday even as Pawar was busy in a meeting with party leaders for poll preparations. One is amused to hear the Maha Vikas Aghadi leaders speaking in different voices. Uddhav Thackeray announced his candidates, his allies are stunned, but Sanjay Raut claims this was done with the approval of all. Congress leader Sanjay Nirupam expressed annoyance, but Shiv Sena leaders questioned, who is Sanjay Nirupam? While Congress described Uddhav’s announcement as a step taken in a hurry, Sanjay Raut said, his party was going to announce its candidate’s name for Mumbai North too. Sharad Pawar is worried because Uddhav’s party is not following ‘coalition dharma’, but Shiv Sena leader Anil Desai claims, the alliance parties respect each other’s views. The conclusion is crystal clear: leaders of the opposition alliance say one thing in public, and do something else privately.
BIHAR
The same is the situation with anti-Modi alliance in Bihar over seat-sharing. RJD chief Tejashwi Yadav has already started distributing tickets to his party candidates. RJD ‘s Bima Bharti said, Lalu Yadav has given her the party symbol to contest from Purnea, but Pappu Yadav, who recently joined Congress, said, he would rather commit suicide rather than contesting from any seat other than Purnea. Pappu Yadav has now left the ball in the court of Rahul and Priyanka Gandhi. Purnea will go to the polls on April 25. Bima Bharti was an MLA in JD(U) and she joined RJD five days ago. Pappu Yadav has made the Purnea nomination a prestige issue, but RJD and Congress are also locked in conflict over some other seats too. Earlier, RJD wanted to leave six seats for Congress in Bihar, though the latter had demanded 15 seats, and later scaled down its demand to nine. On Tuesday, Tejashwi Yadav met Congress leaders and offered eight seats – Bhagalpur, Muzaffarpur, Bettiah, Sasaram, Kishanganj, Katihar, Patna Sahib and Samastipur – to Congress, but the latter is also demanding Purnea, Aurangabad and Begusarai seats. The problem is: RJD has already given Begusarai seat to CPI, but Congress wants to field Kanhaiya Kumar, who lost from Begusarai in the 2019 elections while contesting on CPI ticket. Kanhaiya later joined the Congress. This time, CPI is not ready to leave the Begusarai seat for Kanhaiya Kumar. RJD has already given the party symbol to Abhay Kushwaha for Aurangabad seat, but Congress is unwilling to yield. The conflict between RJD and Congress over seats is going to continue.
महिला सम्मान का मुद्दा इस बार चुनाव पर हावी रहेगा
नारी का सम्मान, मां-बहनों का स्वाभिमान, लोकसभा के चुनाव में बड़ा मुद्दा बन गया है. बुधवार को चुनाव आयोग ने कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत और भाजपा नेता दिलीप घोष को क्रमश: कंगना रनौत और ममता बनर्जी के बारे में किए गये आपत्तिजनक कमेंट को लेकर कारण बताओ नोटिस भेजा. इधर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संदेशखाली में शेख शाहजहां के जुल्मों की शिकार रेखा पात्रा से मंगलवार को बात की. रेखा पात्रा को बीजेपी ने बशीरहाट से टिकट दिया है. मोदी ने कहा कि रेखा पात्रा शक्ति स्वरूपा हैं. बीजेपी ने उन्हें चुनाव मैदान में उतार कर महिलाओं के सम्मान की रक्षा के प्रति वचनबद्धता साबित की है. मोदी ने कहा कि संदेशखाली का सच जब सामने आया तो देश को पता लगा कि पश्चिम बंगाल में मां बहनों के साथ कितना अत्याचार हुआ है. ‘आज की बात’ में सोमवार को ही मैने कहा था कि बशीरहाट से बीजेपी की उम्मीदवार रेखा पात्रा महिलाओं पर जुल्म के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बनेंगी, मां बहनों का सम्मान सिर्फ बंगाल में नहीं पूरे देश में बीजेपी का बड़ा मुद्दा होगा. मंगवार को प्रधानमंत्री ने रेखा पात्रा से फोन पर बात करके यही संदेश दिया. संदेशखाली में तृणमूल कांग्रेस के नेता शेख शाहजहां के जुल्मों की रौंगटे खड़ी करने वाले किस्से तो पूरा देश जानता है लेकिन इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाली, शेख शाहजहां के खिलाफ सबसे पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने की हिम्मत दिखाने वाली, सामान्य सी महिला रेखा पात्रा को प्रधानमंत्री मोदी ने उसी इलाके से, बसीरहाट लोकसभा सीट से बीजेपी का उम्मीदवार बना दिया. रेखा पात्रा कभी पंचायत का भी चुनाव नहीं लड़ी, घरेलू महिला हैं, गरीब हैं, पढ़ी-लिखी भी नहीं हैंस उनके पास चुनाव लड़ने के संसाधान नहीं हैं, लेकिन मोदी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में उतारा है. इसलिए अब पूरी पार्टी रेखा पात्रा का चुनाव लड़ रही है. मोदी ने खुद रेखा पात्रा से बात की. मोदी ने पूछा कि टिकट मिलने के बाद उन्हें कोई परेशानी तो नहीं हो रही? क्या संदेशखाली में महिलाओं को हिम्मत मिली है? क्या वो मां बहनों के सम्मान के लिए लड़ने के लिए तैयार हैं? रेखा ने मोदी को बताया कि हालात तो इतने खराब हैं कि उन्होंने 2011 के बाद कभी किसी चुनाव में वोट ही नहीं डाला. ये सुनकर मोदी भी हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि वो चुनाव आयोग से अपील करेंगे और उन्हें पूरा भरोसा है कि चुनाव आयोग इस पर गौर करेगा, इस तरह के इंतजाम करेगा कि पश्चिम बंगाल में लोग बिना किसी डर या पक्षपात के अपनी मर्जी से वोट डाल सकें. मोदी ने रेखा पात्रा को भरोसा दिलाया कि वो किसी बात की चिंता न करें, बंगाल की जनता उनके साथ हैं, मां-बहनों का आशीर्वाद उनके साथ हैं और पूरी पार्टी उनके साथ है. रेखा पात्रा ने मोदी से एक बड़ी बात कही. उन्होंने बताया कि संदेशखाली की महिलाएं डरी हुई हैं. बहुत सी महिलाएं हैं जो परिवार की सुरक्षा के डर से उनके पक्ष में खुलकर नहीं बोल रही हैं. या कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो तृणमूल कांग्रेस के गुंडों के डर से उनके खिलाफ भी बोल रही हैं, लेकिन वो इस बात का बुरा नहीं मानती. रेखा पात्रा ने कहा कि जो महिलाएं आज उनका विरोध कर रही हैं, भविष्य में वो उनको भी इंसाफ दिलाने के लिए लड़ेंगी. रेखा पात्रा की ये बात सुनकर मैं हैरान हूं कि संदेशखाली में 2011 से लोगों को वोट देने की आजादी नहीं है, उनके वोट चोरी कर लिए जाते हैं, इस बात का दुख ज्यादा इसीलिए है क्योंकि ममता बनर्जी ने “मां मांटी और मानुष” की बात करके ही पश्चिम बंगाल से लेफ्ट की सत्ता को उखाड़ा था. लेकिन अब ममता के राज में मां बेटियो के खिलाफ जुल्मों की जो खबरें आई, जमीनों पर कब्जे की जो हकीकत सामने आई, उससे ये संदेश तो गया कि बंगाल में न मां सुरक्षित है, न माटी और न मानुष. संदेशखाली में ममता ने जिस तरह से शेख शाहजहां को आखिरी वक्त तक बचाने की पूरी कोशिश की, उससे बीजेपी को मौका मिला और बीजेपी ने संदेशखाली को बड़ा मुद्दा बना दिया. बंगाल के लोग शक्ति के उपासक हैं, मां काली के भक्त हैं, वे कुछ भी बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन मातृ शक्ति का अपमान सहन नहीं कर सकते. इसीलिए मोदी ने मां बहनों पर जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाने वाली रेखा पात्रा को टिकट देकर ममता बनर्जी के लिए मुश्किल बढ़ा दी है. रेखा पात्रा चुनाव तो बशीरहाट से लड़ रही हैं, लेकिन इसका असर पूरे बंगाल के साथ साथ देश की सियासत पर पड़ेगा. ममता बनर्जी को भी पता है कि माता बहनों के साथ ज्यादती पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है. इसलिए तृणमूल कांग्रेस इस मसले पर काउंटर अटैक कर रही है. मंगलवार को दिलीप घोष ने एक गलती की और तृणमूल कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया. दिलीप घोष ने ममता बनर्जी के लिए गैरजरूरी और अपमानजनक बात कह दी. दरअसल दिलीप घोष को बीजेपी ने बर्धमान-दुर्गापुर सीट से मैदान में उतारा है. कीर्ति आजाद तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार हैं. दिलीप घोष ने कहा कि कीर्ति आजाद बाहरी हैं. चूंकि तृणमूल कांग्रेस ने नारा दिया है ‘बंगाल अपनी बेटी चाहता है’, नारा ये होना चाहिए, ‘बंगाल अपना भतीजा चाहता है’. यहां तक तो ठीक था लेकिन इसके बाद दिलीप घोष ने ऐसी बात कह दी जिस पर विवाद हो गया. दिलीप घोष ने कहा कि ममता जब गोवा जाती हैं तो खुद को गोवा की बेटी कहती हैं, त्रिपुरा जाती हैं तो त्रिपुरा की बेटी कहती हैं, उन्हें ये तय करना चाहिए कि उनके पिता कौन हैं. दिलीप घोष ने जो कहा वो गलत है. ममता बनर्जी ही नहीं, किसी भी महिला या किसी भी व्यक्ति के बारे में इस तरह के कमेंट नहीं होने चाहिए. राजनीति में चुनाव के दौरान एक दूसरे पर हमले होते हैं लेकिन ये व्यक्तिगत हों, किसी के परिवार पर सवाल उठाए जाएं, ये ठीक नहीं हैं. दिलीप घोष पुराने, जमीन से जुड़े नेता हैं. इस वक्त बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, बंगाल में बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं. इसलिए जब इतना बड़ा नेता अमर्यादित बात कहता है तो चिंता होती है. हो सकता है दिलीप घोष अपने कमेंट के लिए मांफी मांग लें लेकिन ये गलती करके उन्होंने महिलाओं के सम्मान पर बुरी तरह घिर चुकी तृणमूल कांग्रेस को पलटवार का मौका दे दिया. अब कंगना के बारे में सुप्रिया श्रीनेत के कमेंट पर फंसी कांग्रेस भी अपने बचाव में दिलीप घोष के बयान का हवाला देगी. कंगना पर कमेंट सुप्रिया को महंगा पड़ेगा. वैसे भी सुप्रिया श्रीनेत हर रोज सबको नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं, टीवी डिबेट्स में मीडिया पर बरसती हैं, कभी कभी अपनी महिला होने की बात कहती हैं, लेकिन सुप्रिया एक व्यक्ति नहीं है, वह कांग्रेस के सोशल मीडिया सेल की प्रमुख हैं. इसीलिए इसकी आंच कांग्रेस नेतृत्व तक जाएगी. भाजपा नेता बांसुरी स्वराज और नवनीत राणा ने पूछा है कि प्रियंका गांधी वैसे तो महिलाओं के अपमान पर खूब बोलती हैं, ‘ल़ड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा देती हैं, पर कंगना के बारे में किए गए अभद्र कमेंट पर वो अभी तक खामोश हैं. राहुल गांधी भी मोहब्बत की दुकान चलाते हैं लेकिन किसी प्रोफेशनल महिला पर इस तरह की अभद्रता पर वो भी चुप हैं. कांग्रेस सिर्फ ये कह कर नहीं बच सकती कि किसी ने सुप्रिया के अकाउंट्स से ये पोस्ट कर दिया. जो नेता सोशल मीडिया सेल की इंचार्ज हैं, उनके हैंडल से बिना उनकी अनुमति के कोई और पोस्ट कैसे डाल सकता है? इसलिए जब ये बात निकली है तो दूर तलक जाएगी.
WOMEN’S ISSUE WILL DOMINATE LOK SABHA POLLS THIS TIME
The issue of dignity and self-respect of women is gradually becoming a big issue in the Lok Sabha general elections. On Wednesday, the Election Commission of India issued notices to Congress spokesperson Supriya Shrinate and BJP leader Dilip Ghosh for their comments against actor Kangana Ranaut and West Bengal CM Mamata Banerjee respectively. Supriya Shrinate is in the line of fire because a derogatory comment about Kangana Ranaut, BJP candidate from Mandi, was posted on her social media account and later withdrawn. Shrinate later clarified that somebody who had access to her account posted the comment. Dilip Ghosh, BJP candidate from Bardhaman-Durgapur in West Bengal, made a crass remark about Trinamool Congress chief Mamata Banerjee by questioning her paternity. Meanwhile, Prime Minister Narendra Modi on Tuesday dialled Sandeshkhali survivor and BJP Basirhat candidate Rekha Patra and spoke to her about her ordeals. It was Rekha Patra who led the protests against alleged sexual harassment of women and incidents of landgrabbing by Trinamool leader Shahjahan Sheikh in Sandeshkhali resulting in a nationwide uproar. Modi, in his telephonic talk, described Rekha Patra as “Shakti Swaroopa” (an embodiment of Mother Goddess). She told the Prime Minister that neither she, nor any woman in Sandeshkhali have not cast their votes in any election since 2011 due to the reign of terror unleashed by Shahjahan Sheikh and his goons. Shahjahan Sheikh is presently in CBI custody. It was on Rekha Patra’s complaint that police was forced to arrest Shibaprasad Hazra, a local goon from Shahjahan’s gang. Rekha Patra had staged protests with other women of Sandeshkhali. She carried her girl child on her waist during protests. Rekha Patra has not even contested panchayat elections. A poor, semi-literate housewife, she has no resources to contest, but Modi decided to field her as the BJP candidate from Basirhat. The party machinery will now be campaigning for her in Basirhat. Modi asked Rekha Patra whether she was facing threats after getting the BJP ticket, and whether the women in Sandeshkhali have gained courage after she had been fielded in elections. Modi assured her that the party would request the Election Commission to make full arrangements for her security and provide protection to voters so that they can cast their votes fearlessly. Modi told Rekha Patra not to worry as the people of Bengal and his party stood by her and she has the blessings of the women of Bengal. Rekha Patra told the PM that women in Sandeshkhali are still living in a state of fear, and many of them are unwilling to speak out openly for fear of retribution from the goons. I am surprised to know that voters in Sandeshkhali have not exercised their franchise since 2011 because of fear and that their votes have been stolen. I feel sad, more so because it was Mamata Banerjee who had uprooted three decades of Left rule in Bengal by giving the slogan “Maa, Maati, Manush”. The Sandeshkhali episode of sexual molestation and land grabbing has conveyed the message that neither Maa (women) is secure in Bengal, nor Maati (land) or Manush (people) are secure under her rule. The manner in which Trinamool Congress and Mamata Banerjee tried to shield Shahjahan Sheikh and his goons has given BJP a big handle to raise the issue of women’s security. The people of Bengal are devotees of Maa Kali. They can tolerate everything but will never tolerate the insult to Maatri Shakti (Women Power). By fielding Rekha Patra as the party candidate from Basirhat, Modi has created problems for Mamata Banerjee in the Lok Sabha elections. Rekha Patra may be contesting from Basirhat, but it will have a cascading effect on voters across Bengal. Mamata Banerjee knows that excesses committed against ‘mothers and sisters’ of Sandeshkhali can cost the party dearly in the elections. Trinamool Congress is badly in search of a strong handle for counter-attack, and BJP leader Dilip Ghosh committed a blunder on Tuesday. Ghosh is facing Trinamool candidate ex-cricketer Kirti Azad in Bardhaman-Durgapur. On Tuesday, he described Kirti Azad as an outsider and said, since TMC has given the slogan, ‘Bengal wants its daughter’, the reality is that ‘Bengal wants her nephew’. Soon after, he made a remark about Mamata Banerjee. He said, “Mamata describes herself as the daughter of Goa whenever she visits Goa, she describes herself as the daughter of Tripura, when she goes to Tripura, she should decide who is her father.” What Dilip Ghosh said about Mamata is unacceptable. Such a crude comment must not be made against any individual, whether it is Mamata or any man or woman. In politics, people do launch verbal attacks in the heat of the moment, but making personal attacks about anybody’s family, is unacceptable. Dilip Ghosh is an experienced, grassroots politician. He has been the national vice-president of BJP, was the state BJP chief, and he represented Medinipur in the last Lok Sabha. When such a leader makes a derogatory comment, one should be worried. Dilip Ghosh may apologize for his comment, but it has already given a handle to Trinamool Congress and Congress. Congress leaders are now using Dilip Ghosh’s remark to protect Supriya Shrinate’s alleged remark about Kangana Ranaut. Supriya is already facing the heat and she claims that the social media comment against Kangana was not approved by her. Supriya has been hitting out at media during TV debates, but she must remember she is heading the social media cell of Congress party. The heat from this controversy is surely going to affect the Congress leadership. BJP leaders Bansuri Swaraj and Navneet Rana have already raised the question why Priyanka Gandhi Vadra, who frequently speaks about atrocities on women, is silent on this issue. They are also asking why Rahul Gandhi, who speaks about ‘mohabbat ki dukaan’ is silent when a professional actor has been insulted. Congress cannot save its skin by saying that somebody posted the comment on Supriya’s social media account. Since Supriya is in charge of party’s social media cell, nothing can be posted without her permission. There is a famous lyric: ‘Baat Nikalegi Toh Door Talak Jayegi’.
कंगना विवाद : ये गलती कांग्रेस को भारी पड़ सकती है
सोमवार को कांग्रेस के लिए एक और मुसीबत हो गई. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के सोशल मीडिया हैंडल से एक्ट्रेस कंगना रनौत के खिलाफ अभद्र कमेंट किए गए. इसका ज़बरदस्त विरोध हुआ. कांग्रेस के नेताओं ने भी सुप्रिया श्रीनेत के कमेंट पर नाराज़गी जाहिर की. असल में बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से कंगना को टिकट दिया है और सुप्रिया श्रीनेत के इंस्टाग्राम अकाउंट से कंगना रनौत की एक तस्वीर के साथ कुछ भद्दी बातें लिखी गईं. हालांकि जैसे ही इस पर विवाद हुआ तो सुप्रिया श्रीनेत ने ये पोस्ट हटा लिया, लेकिन उससे पहले ही सुप्रिया निशाने पर आ गईं. कंगना रनौत ने ट्वीट करके सुप्रिया श्रीनेत को जवाब दिया. कंगना ने लिखा कि ” एक कलाकार के नाते पिछले 20 साल में मैंने हर तरह की महिला के किरदार निभाए हैं…फिल्म क्वीन में नादान लड़की से लेकर धाकड़ मूवी में seductive spy बनी थी, फिल्म मणिकर्णिका में देवी बनी तो चंद्रमुखी में एक demon के तौर पर नजर आई…हर महिला सम्मान की हकदार है…उसकी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए. ” इसके बाद सुप्रिया श्रीनेत सामने आईं और कहा कि ये पोस्ट उन्होंने नहीं डाली थी, उनके सोशल मीडिया अकाउंट कई लोग हैंडल करते हैं, उनमें से किसी एक ने ये काम किया है. वो कभी किसी महिला के सम्मान पर हमला नहीं कर सकती. सुप्रिया श्रीनेत अब सफाई दे रही हैं लेकिन इससे बात नहीं बनेगी क्योंकि उनके सोशल मीडिया अकाउंट से कंगना रनौत के बारे में जिस तरह का कमेंट किया गया उसे किसी भी तरह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता. ये गलत था और सुप्रिया श्रीनेत की ये गलती कांग्रेस को भारी पड़ सकती है. हालांकि ये सही है कि कंगना और विवाद अक्सर साथ साथ चलते हैं. अभी सियासत में उनकी एंट्री हुई है. मंडी सीट पर जो समीकरण है, उन्हें देखकर लगता है कि मोदी के नाम पर कंगना जीत तो जाएंगी पर उसके बाद भी विवाद खड़े होते रहेंगे । क्योंकि वो बोलने में कभी पीछे नहीं रहती.
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