बिहार में अपराधियों ने फिर मौत का तांडव मचाया. पटना के एक अस्पताल में घुसकर पांच हत्यारों ने उम्र कैद की सज़ा काट रहे एक शख्स को गोलियों से भून दिया. हत्यारे फिल्मी स्टाइल में बड़े इत्मीनान से आए, हत्या करके आराम से चले गए. रोहतास में JD-U के नेता के पिता की हत्या कर दी गई. दानापुर में बीस साल के लड़के को काटकर उसके घर के सामने फेंक दिया गया.
लेकिन बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कुन्दन कृष्णन का कहना है कि ये कोई बड़ी बात नहीं है, हर साल अप्रैल से जून के बीच सुपारी किलिंग का सीज़न चलता है, किसान खाली होते हैं, सुपारी किलिंग करते हैं, बारिश के बाद फिर काम पर लग जाते हैं, इसलिए अब ये सिलसिला बंद हो जाएगा. ADG साहब कह रहे थे कि माता-पिता को अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए, समाज अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा, इसलिए नौजवान जल्द पैसे कमाने के चक्कार में अपराध कर रहे हैं.
बिहार के पुलिस महानिदेशक ने कहा कि पटना में जो हत्या हुई, वह गैंग वॉर का नतीजा है, एक अपराधी को दूसरे अपराधियों ने मार दिया, मरने वाले पर भी दर्जनों केस हैं.
JD-U के नेता केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह ने भी अजीब तर्क दिया. कहा, गैंग वॉर और आपसी दुश्मनी में हत्याएं हो रही हैं, हर जगह, हर राज्य में होते है, अब दो आदमी आपस में झगड़ जाएं, एक दूसरे को मार दें, तो इसमें पुलिस क्या कर लेगीं? इसमें कानून और व्यवस्था की बात कहां से आई?
सवाल ये नहीं है कि लालू के राज में ज्यादा हत्याएं होती थी या नीतीश के शासन में ज्यादा हत्याएं हो रही हैं. ये कोई अपराधों का T-20 match नहीं चल रहा. सवाल तो ये है कि मुख्यमंत्री ने पुलिस को क्या निर्देश दिए ? सवाल तो ये है कि क्या बिहार की पुलिस ने अपराधियों के सामने घुटने टेक दिए हैं? सवाल तो ये है कि बिहार में अपराधी इतने बेखौफ क्यों हैं ?
सवाल तो ये है कि बिहार की पुलिस अपराधियों के सामने इतनी मजबूर, इतनी नाकारा क्यों है? पुलिस की विवशता उसके बहानों में झलकती है. ADG रैंक का officer ये कहे कि किसान हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं, ये अपराध का season चल रहा है और बारिश शुरू होने के साथ खत्म हो जाएगा.
तो क्या ये पुलिस के मानसिक दिवालियापन का सबूत नहीं है?
एक अफसर ने कहा कि किसान जिम्मेदार है, फिर कहा कि समाज अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा. यानी जो हत्याएं, जो लूटपाट हो रही हैं, इसके लिए या तो समाज जिम्मेदार है या किसान. अपराधी आराम से हत्या करके निकल जाते हैं और पुलिस अफसर कह रहे हैं कि वो shooters का Data Bank बनाएंगे.
अब तक पुलिस क्या कर रही थी ? 20 साल से गृह विभाग नीतीश कुमार के पास है. कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी नीतीश कुमार की है. और नीतीश कुमार scene से गायब हैं. पुलिस की इस तरह की बेसिरपैर की बातों का खामियाज़ा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भुगतना पड़ेगा. अगर तेजस्वी यादव इसे मुद्दा बनाते हैं, तो इसमें गलत क्या है?
नीतीश कुमार ने पलटी मारी : मुफ्त बिजली मिलेगी
नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले फिर एक नया दांव चला. बिहार में 125 यूनिट बिजली मुफ्त देने का एलान कर दिया. जुलाई का बिजली का जो बिल आएगा, उसमें 125 यूनिट से कम बिजली इस्तेमाल करने वालों का बिल जीरो होगा और बाकी लोगों के बिल में 125 यूनिट बिजली का पैसा कम किया जाएगा. सरकार का दावा है कि इस फैसले से बिहार के एक करोड़ 82 लाख परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा.
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि उनकी सरकार के इस फैसले से गरीबों को काफी राहत मिलेगी क्योंकि ज्यादातर गरीब परिवार हर महीने 125 यूनिट से कम बिजली खर्च करते हैं.
बिहार के मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि सरकार पहले भी बिजली में 80 परसेंट सब्सिडी दे रही थी लेकिन caste census के बाद पता चला था कि 94 लाख ऐसे परिवार हैं, जो बेहद गरीब हैं, बिजली का खर्च उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है, इसलिए उन्हें राहत देने के लिए ये फैसला लिया गया है.
RJD के नेता मनोज झा ने कहा कि तेजस्वी ने 200 यूनिट बिजली फ्री देने का वादा किया था, इसलिए नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले 125 यूनिट बिजली मुफ्त कर दी. तेजस्वी ने बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने का वादा किया, नीतीश कुमार ने उसे लागू कर दिया. मनोज झा ने कहा कि नीतीश कुमार तेजस्वी की लाइन पर चल रहे हैं, इसलिए अब तो उन्हें भी मान लेना चाहिए कि तेजस्वी में मुख्यमंत्री बनने के सारे गुण हैं.
नेता कुछ भी कहें, लेकिन ये तो सही है कि यही नीतीश कुमार पहले मुफ्त की योजनाओं का विरोध करते थे. उन्होंने मुफ्त बिजली देने को भी गलत बताया था लेकिन अब वही नीतीश कुमार 125 यूनिट बिजली मुफ्त दे रहे हैं.
इसीलिए अगर JD-U के नेता ये मान लें कि ये फैसला चुनाव को देखकर किया गया है, तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा. आज कल सारे नेता, सारी पार्टियां चुनाव से पहले इस तरह के फैसले करती हैं. तेजस्वी यादव मुफ्त बिजली, बुजुर्गों, विधवाओं और बेरोजगारों को पेंशन के जो वादे कर रहे हैं, वो भी तो चुनावी रणनीति का हिस्सा है. जनता सब जानती है. इसलिए नेताओं को इधर-उधर की बातें करने के बजाए सीधी-सीधी साफ-साफ बात करनी चाहिए.